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06 April 2013

बच्चे के विकास में सहायक बनें न कि अवरोध

‘क्या करें, ये जंक फ़ूड के अलावा कुछ खाता ही नहीं’ ‘अभी ये महाशय दो साल के नहीं हुए हैं पर कोल्ड ड्रिंक का स्वाद पहचानते हैं’ ‘इन्हें देख लो, मोबाइल इनका सबसे प्यारा खिलौना है’ ‘कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाये, किसी भी बात की जिद पर रोता-सर पटकने लगता है’ ‘ये किसी बच्चे के साथ आसानी से एडजस्ट होता ही नहीं’...इस तरह के जुमले आपको भी अधिकतर सुनाई पड़ जाते होंगे. आज के अभिभावकों की एक बहुत बड़ी समस्या अपने बच्चों के व्यवहार को लेकर है. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि आज के ये बच्चे एकदम से इतने हाइपर, अति-आधुनिक कैसे हो गए हैं? आज के बच्चों में अति-सक्रियता के साथ-साथ एक तरह की आक्रामकता भी दिख रही है. इस आक्रामकता में वे न सिर्फ अपने घर के, पड़ोसियों के सामान को नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि कई बार खुद को भी चोटिल कर बैठते हैं.
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अपने बच्चों की समस्या का रोना रोने के पहले यदि एक बार माता-पिता अपने खुद के व्यवहार को, क्रियाकलापों को देख-समझ लें तो संभव है कि उनकी समस्या का हल निकल भी आये. यहाँ समझने वाली बात ये है कि क्या दो-तीन वर्ष के बच्चे ने अपने आप कोल्ड ड्रिंक पीने को माँगा होगा? क्या बच्चों ने सबसे पहली बार जिद करके फ़ास्ट फ़ूड खाने को मंगवाया होगा? क्या मोबाइल से खेलना उन्हें पैदा होने के साथ आया था? टी० वी० देखने की आदत बच्चों में किसने लगाई है? दरअसल आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में परिवार नाम की संस्था का बुरी तरह से बिखंडन हो चुका है, संयुक्त परिवार एकल परिवार में बदल कर अब नाभिकीय परिवार में आ चुके हैं. इन परिवारों में पति-पत्नी के अलावा सिर्फ एक बच्चा और शामिल हो जाता है. ऐसे में माता-पिता भी इस प्रयास में रहते हैं कि उनके बच्चे को किसी तरह से अकेलापन महसूस न हो, उसको किसी भी बात का बुरा न लगे, उसकी हर मांग को पूरा करना माता-पिता अपना फ़र्ज़ समझते हैं और इस सोच के चलते अधिकतर बच्चों की गलत मांगों को भी मान लिया जाता है. शुरूआती दौर में ये स्थिति बच्चे को बहलाने-फुसलाने की एक प्रक्रिया होती है किन्तु धीरे-धीरे यही प्रक्रिया बच्चे की घनघोर जिद बन जाती है और माता-पिता की समस्या के रूप में सामने आती है.
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इसके अलावा आज के माता-पिता अपने बच्चे को सर्वगुण संपन्न मानने-समझने के अलावा उसके सामने इस बात को दर्शाने से भी नहीं चूकते हैं. ये बात और है कि प्रत्येक माता-पिता को अपने बच्चे सबसे अच्छे, सबसे बेहतर, सबसे समझदार लगते हैं किन्तु कई बार यही सोच उन्हें बच्चों के प्रति अंध-प्रेम का विकास करवाती है. उन्हें अपने बच्चे की चंद खूबियों के पीछे से होने वाली उसकी कुछ कमियां, गलतियाँ, जिद आदि नहीं दिखाई देती हैं. कालांतर में यही अंध-प्रेम बच्चों के मन में एक तरह की अहंकारी भावना विकसित कर देती है. इसके चलते कई मौकों पर यही बच्चे नकारात्मकता का प्रदर्शन करने लगते हैं. स्कूल में अपने साथ के बच्चों के साथ समायोजन न बना पाने की समस्या, खुद को सर्वोत्कृष्ट मानने की भावना, किसी भी रूप में अपनी जिद को पूरी ही करवाने की कुचेष्टा, पढ़ाई में एक तरह की अनावश्यक प्रतिद्वंद्विता बच्चों में दिखाई देने लगती है.
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बच्चों के स्वर्णिम भविष्य के लिए आवश्यक है कि उन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए, उनके सर्वांगीण विकास के लिए उनको समयानुसार समस्त आवश्यक संसाधनों के संपर्क में लाया जाये, उनको सर्वोत्कृष्ट बनने के प्रति भी प्रेरित किया जाये किन्तु ये भी ध्यान रखा जाए कि इससे कहीं उस बच्चे में अकेलेपन का, अहंकारी भावना, आक्रोश का तो विकास नहीं हो रहा. बच्चे की उपलब्धियों पर उसकी घनघोर प्रशंसा हो किन्तु उसे उसकी गलतियों पर थोड़ा सा टोका भी जाये. उसको नवीनतम तकनीक के लाभ से परिचित करवाया जाये साथ ही उसके नुकसानों को भी बताया जाये. माता-पिता उसके चारों तरफ सुरक्षा घेरे के रूप में रहें किन्तु उसे स्वतंत्र रूप से अपने आपको भी समझने दें. नाभिकीय परिवारों के चलते माता-पिता भले ही खुद को अपने बच्चों के मित्र के रूप में स्थापित-परिभाषित करें किन्तु उसे अपनी आयुवर्ग के बच्चों के साथ खेलने-कूदने के पर्याप्त अवसर भी उपलब्ध करवाएं. इसी तरह के और भी छोटे-छोटे कदम हैं, प्रयास हैं जिनके द्वारा कोई भी माता-पिता अपने बच्चों के सकारात्मक विकास में मददगार हो सकते हैं और बच्चे भी सार्थक संरक्षण के द्वारा सर्वांगीण विकास की राह पर हँसते-खेलते चल सकते हैं.
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1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन बिना संघर्ष कोई महान नहीं होता - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !