08 September 2010

त्वमेव माता च पिता त्वमेव --- रामजन्मभूमि मंदिर - बाबरी मस्जिद विवाद




कितने प्रयास होते हैं लोगों के द्वारा स्वयं को बुद्धिजीवी घोषित करवाने के, भले ही समाज में उनको बेवकूफों की श्रेणी में भी न गिना जाता हो। यह वे सभी भली-भाँमि जानते हैं जो इस तरह के प्रयासों में लगे होते हैं, बावजूद इसके उनके द्वारा अपने आपको बुद्धिजीवी घोषित करने के नये-नये प्रयास होते ही रहते हैं।

कुछ इसी तरह के प्रयास मीडिया के द्वारा समय-समय पर होते रहते हैं और कतिपय अतिबुद्धिजीवियों द्वारा भी होते रहते हैं। इस समय तो पूरे देश में अयोध्या को लेकर, बाबरी मस्जिद को लेकर, आने वाले अदालती फैसले को लेकर लोगों में बुद्धिजीवी बनने का शौक चढ़ा हुआ है।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

अदालत का फैसला विवादित जमीन के मालिकाना हक को लेकर है और आने वाले दिनों में इसका अन्तिम फैसला (भले ही उच्च न्यायालय की ओर से) आने वाला है। फैसला कुछ भी हो पर अभी दोनों पक्षों की ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है। हाँ, मीडिया ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है इस फैसले के पूर्व अपने कारनामें दिखाने के। लगभग रोज ही कोई न कोई रिपोर्ट, कोई न कोई पुरानी क्लिप दिखा कर मामले को गरम रखा जा रहा है।

इस गरमागरमाहट के पीछे बुद्धिजीवी बनने के लालची स्वयं को छोटी-छोटी बैठकों में विषय-विशेषज्ञ मानकर लगभग निर्णय सा सुना दे रहे हैं। ( ध्यान रहे ये बुद्धिजीवी हिन्दू, मुस्लिम दोनों पक्षों से हैं, सिर्फ हिन्दुओं की गिनती इसमें न की जाये)

हमारा भी इस तरह की कुछ एक बैठकों में शामिल होने का मौका लग जाता है। अकसर देखा है कि ज्यादातर में सबके सब निहायत बुद्धिजीवीपना दर्शा कर अजीब-अजीब से सुझाव पटक देते हैं। कोई अस्पताल बनवाने की बात करता है, कोई स्कूल खुलवा देने की बात करता है, कोई सुझाव देता है कि मंदिर-मस्जिद दोनों ही एकसाथ बनवा दिये जायें आदि-आदि। कुल मिलाकर पूरी तरह से निष्पक्ष सुझाव देने की मानसिकता का प्रदर्शन इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा होता है। समझ नहीं आता कि ये लोग भी सरकार की तरह से, नेताओं की तरह से सोचते हैं या फिर वाकई इनका दिमाग बुद्धिजीवी बनने की ओर चल पड़ा है।

कुछ भी हो इस मुद्दे पर बुद्धिजीवीपना छोड़कर कुछ व्यवहारिक बात करनी होगी। मंदिर और मस्जिद के विवाद को हल करने की मंशा का अवलोकन करना होगा। आम आदमी भले ही कुछ भी सोच रहा है पर नेता किसी भी रूप में इस विवाद को सुलझाना नहीं चाहते।

विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है, यह बात मुस्लिम तबका भी भली-भाँति जानता है। इसके बाद भी अपने पक्ष को साबित करने पर तुला है। यहाँ एक बात और है कि भले ही मालिकाना हक की लड़ाई हो रही हो पर अब सवाल भावनाओं का भी है। किसी भी परिवार में चाहे वह हिन्दू हो अथवा मुस्लिम, अपने बुजुर्गों का सम्मान करने की परम्परा है और परिवार में दिवंगत हो चुके बुजुर्गों को भी हम सम्मान देते हैं। किसी भी रूप में हमें उनके सामानों को, उनकी यादों को ताजा करती वस्तुओं को, उनकी तस्वीरों को भी अपमानित करने की भावना जन्म नहीं लेती। यदि हमारे परिवार के सदस्यों के प्रति हमारी ऐसी धारणा है, अपने परिवार की भावनाओं का इतना ख्याल है तो फिर देश के करोड़ों-करोड़ हिन्दुओं की भावनाओं का कोई ख्याल क्यों नहीं?

यह सवाल नहीं बल्कि भावनाओं की ओर ध्यान दिलाना है। रही बात अदालत की तो यह कोई अन्तिम फैसला तो है नहीं जिसे सहजता से स्वीकार कर लिया जाये। इसके अलावा एक बात तो समूचे देश को याद रखनी होगी कि जब आतंकवाद के नये रंग का प्रयोग केन्द्रीय मंत्री करने लगे; आतंकवाद के नये सूत्रों को जानबूझ कर पैदा किया जाने लगा हो; एक पूरे-पूरे राज्य को विशेष दर्जा दिया जाता हो; तुष्टिकरण के चलते योजनाओं को भी दोतरफा रूप में देश में पेश किया जाता हो; विशेष वर्ग के विरोध के बाद जनसंख्या सम्बन्धी आँकड़ों में परिवर्तन हो जाता हो; अदालत के फैसले के बाद भी प्रदेश में मुस्लिमों को अल्पसंख्यक माना जाता रहा हो; न्यायालय के फैसले के बाद भी देश का विवादित शाहबानो प्रकरण संसद की ओर से एक वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर लाया जा सकता है वहाँ अदालत के फैसले की परवाह इस वर्ग को, इस वर्ग के रहनुमाओं को, इस वर्ग के धर्मनिरपेक्ष नेताओं को क्यों हो? चिन्ता करें तो हिन्दू क्योंकि वही साम्प्रदायिक है; उसी के राम साम्प्रदायिक हैं; उसी ने देश में इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ने का मौका दिया; भगवा आतंकवाद का नया नाम भी हिन्दू का है और अदालती फैसले के बाद भी दंगा करने की नीयत उसी की समझी जा रही है।

और लोग तो देश में शान्ति लाने का कार्य कर रहे हैं पर हिन्दू तो बस.......................।


12 comments:

Anonymous said...

Sir ji ye bada hi vivad ka vishy ho gaya hai aapne likha ye bahut himmat ka kam hai.
Rakesh Kumar

Anonymous said...

Ek baat aur ki aap dekhiye ki ab neta kaise shant baithe hain, han kuch log shanti se tamasha dekhne ke mood men hain.
Rakesh Kumar

Anonymous said...

abhi aapki post ke pahle bhi kai jagah is vishay par likha dekha par koi sarthakta nahin dihti,
sach to kahna hi padega.
rakesh kumar

ललित शर्मा said...


बेहतरीन लेखन के बधाई

356 दिन
ब्लाग4वार्ता पर-पधारें

प्रवीण शाह said...

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उम्मीद है चौबीस सितंबर की दोपहर आने वाला फैसला इस विवाद को हमेशा के लिए शांत कर देगा। जिनको हिन्दुस्तान में यकीन है उन्हें ये सपना देखना ही चाहिए।

सुनिये मेरी भी....
यही सपना देखिये आप भी ! ...
क्योंकि फैसला अब आने ही वाला है...



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अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

ये बहुत संवेदनशील मुद्दा है. देश हित में कुछ विचार करना ही चाहिए. अब दोनों पक्षों को अपनी भावनात्मकता दिखानी होगी.

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

@ Blogger प्रवीण शाह

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उम्मीद है चौबीस सितंबर की दोपहर आने वाला फैसला इस विवाद को हमेशा के लिए शांत कर देगा। जिनको हिन्दुस्तान में यकीन है उन्हें ये सपना देखना ही चाहिए।
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आपकी बात एकदम सही है पर सवाल वही की कितने हैं जो हिन्दुस्तान में यकीन रखते हैं? वन्दे भारत, वन्दे मातरम् बोलने वालों को आप किस तरह हिन्दुस्तान से जोड़ेंगे?

Anonymous said...

kya baat hai? kuchh kahin padh liya jo itna saara likh diya. is mudde par ab kuchh hai nahi kahne ko. janta bhi trast ho gai hai.

Anonymous said...

kya baat hai? kuchh kahin padh liya jo itna saara likh diya. is mudde par ab kuchh hai nahi kahne ko. janta bhi trast ho gai hai.

AlbelaKhatri.com said...

बेहतरीन पोस्ट का जीवन्त उदाहरण !

anshumala said...

कुछ भी नहीं होने वाला है जिसके पक्ष में फैसला नहीं होगा वो ऊपर की अदालत में चला जायेगा और साठ साल की छुट्टी और जब वहा का फैसला आएगा तब तक ना आप होंगे ना ही हम इसलिए निश्चिन्त रहे |

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें