22 July 2010

उनकी ऐतिहासिक विदाई और इनकी चिपरिचित पिटाई




आज भारत और श्रीलंका की क्रिकेट टीम के बीच पहले टेस्ट मैच का अंतिम दिन था। जैसा कि कल के हालात और रनों को देखकर अंदाज हो गया था, अन्त में परिणाम भी वैसा ही निकला। भारतीय क्रिकेट टीम को हाराना था सो हारी, ये तो गनीमत रही कि पारी की हार से बच गये।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)


एक बात हमें विशेष रूप से भारतीय क्रिकेट टीम में लगती है वह है उसका विश्वास तोड़ने की परम्परा। आज तक हमने जब-जब भारतीय क्रिकेट टीम पर विश्वास किया है उसने हमारा दिल नहीं तोड़ा है। जब भी हमें लगा कि यह मैच हमारी टीम हारेगी, वह उस मैच को हार ही गई। है किसी भी देश की टीम में इतनी विश्वास की भावना और अपने प्रशंसकों का विश्वास टूटने देने की क्षमता?

फिलहाल तो आज के मैच में दो चीजें विशेष रूप से दिखाई दीं। (हमें दिखीं अब यह विशेष बातें मीडिया को, भारतीय क्रिकेट टीम के प्रशंसकों को, हमारे थक चुके, चुक चुके खिलाड़ियों के एक-एक शॉट पर उछल-उछल कर आसमान में सुराख करने वाले प्रशंसकों को दिखीं या नहीं पता नहीं)

एक ने अपनी गेंदबाजी से रिकॉर्ड बनाया और 800 का आँकड़ा छूने के बाद अपने चरम पर पहुँच कर क्रिकेट को अलविदा कहा। जी हाँ, परिचय के मुहताज नहीं हैं श्रीलंका के मुरलीधरन............। दूसरी तरफ हमारे कुछ खिलाड़ी हैं जो किसी एक मैच में कुछ दहाई रनों को जोड़ने के बाद अगले कुछ दहाई मैचों तक के लिए सुरक्षित हो जाते हैं। (यह दूसरी विशेष बात नहीं है।) किसी ने खेल से संन्यास लेने के सम्बन्ध में कहा है कि आप तब संन्यास लें जबकि आपके प्रशंसक आपको अभी और खेलना देखना चाहते हों। कुछ ऐसा ही अभी मुरलीधरन के मामले में कहा जा सकता है। (कम से कम हम तो व्यक्तिगत रूप से अभी उसको और गेंदबाजी करते देखना चाहते हैं)

गेंदबाजी में किंवदन्ती बन चुके मुरलीधरन के आठ सौंवें विकेट लेने के स्वर्णिम पल के गवाह हम भी बने। एक ऐतिहासिक पल को हमने अपनी आँखों के सहारे अपने दिल में कैद किया। एक स्वर्णिम विदाई को अपनी आँखों से देखा, भले ही इसके लिए टी0वी0 का सहारा लेना पड़ा हो। खुशी को मुरलीधरन की आँखों से छलकता देखा और हमने भी मैच की समाप्ति पर अपनी आँखों से अपने मोती छलका दिये।

एक ओर ऐतिहासिक विदाई हो रही थी और दूसरी ओर चिरपरिचित पिटाई हो रही थी। हमारी टीम अपना विश्वासपरक खेल दिखाते हुए पूरे 10 विकेट से हारी। (ये है दूसरी विशेष बात) आँसू दोनों देशों के प्रशंसकों की आँखों में छलक रहे थे। उस ओर खुशी के थे और इस तरफ ग़म के। उस तरफ आठ सौ के आँकड़े को छूने की उमंग थी और यहाँ दस विकेट से हार का मातम था।

इसके बाद भी हमने उत्साहित होकर तालियाँ बजाईं। अरे न सही अपनी टीम के लिए, हमने मुरलीधरन के लिए तालियाँ पीटीं। हम भारतीयों में यही तो खास बात है, हम भले ही कुछ कर पायें पर हम हर सफलता के पीछे अपने होने का तथ्य खोज ही लेते हैं। यहाँ अपने मूल के होने का नहीं, खेल भावना के होने का तथ्य तो हमारे साथ था ही, सो सब भूलकर हमने खेल भावना दिखाई और खूब तालियाँ पीटीं, खूब सीटी मारी।

इसके बाद भी दिल में एक टीस उभर रही थी। वो ऐतिहासिक विदाई कर रहा था और हम चिरपरिचित पिटाई का शिकार हो रहे थे।


11 comments:

Anonymous said...

हम तो पिटते हैं हर जगह...क्या खेल क्या खिलाडी क्या देश क्या पडोसी क्या क्या क्या क्या
कितने क्या दिखाएँ सर जी?

Anonymous said...

हम तो पिटते हैं हर जगह...क्या खेल क्या खिलाडी क्या देश क्या पडोसी क्या क्या क्या क्या
कितने क्या दिखाएँ सर जी?

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

यही ख़ुशी की बात है की विकेट से हारे पारी से नहीं, तुम भी!!

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

यही ख़ुशी की बात है की विकेट से हारे पारी से नहीं, तुम भी!!

अक्षय कटोच *** AKSHAY KATOCH said...

यही ख़ुशी की बात है की विकेट से हारे पारी से नहीं, तुम भी!!

Anonymous said...

sahi kaha aapne.
Rakesh Kumar, Knp.

Anonymous said...

sahi kaha aapne.
Rakesh Kumar, Knp.

ashwani said...

कल तो हम भी इसी मैच को देख रहे थे, हारना तो चौथे दिन ही तय हो गया था, हाँ इस बार इन्द्र देव ने भी मदद नहीं की.

Devendra said...

BHAIJI YE TO HAAL HAI HI HAMARI TEAM KA. PAR CHALO SHRILANKA KO KHUSHI HUI TO HAM BHI KHUSH KYONKI HAMARA PADOSHI KHUSH HAI.

Devendra said...

BHAIJI YE TO HAAL HAI HI HAMARI TEAM KA. PAR CHALO SHRILANKA KO KHUSHI HUI TO HAM BHI KHUSH KYONKI HAMARA PADOSHI KHUSH HAI.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

ऐसा है जी, सुनने में शायद बुरा लगे पर भारत में कोई खेल नहीं होता है ... कम से कम क्रिकेट तो नहीं ... जिस खेल के पीछे भारत वासी पागल हैं ... वो यहाँ होता ही नहीं है ... क्रिकेट के नाम पर केवल पोलिटिक्स और व्यवसाय हो रहा है ... वैसे तो यहाँ और भी बहुत सारे खेल के नाम पर बस राजनीति और तिजारत हो रही है ... पर क्रिकेट कि बात ही कुछ और है क्यूंकि हम (कम से कम ५० % भारतीय) अपनी जिंदगी के बहुत सारा समय इस बकवास के पीछे बर्बाद करते हैं ...
अगर सही मायने में कुछ खेल हो रहा है तो वो है शतरंज और बडमीनटन जिसमे आनंद और सायना जैसे कुछ प्रतिभा कार्यकर हैं ...
ये किसी भी तर्क से परे है कि कुछ लोग हर देश में घूमने का, करोड़ों कमाने का और ऐश के नए नए कीर्तिमान गढ़ने का काम कर रहे है, और अगर कभी थोडा समय मिले तो खेल लेते हैं ... और करोड़ों भारतवासी ... मध्यवर्ग ... जिनको पैसा कमाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है ... वो अपना सारा काम छोडके ... पैसा और समय खर्च करके ... क्रिकेट देखने जाते हैं ... या फिर रेडियो या टीवी से चिपके रहते हैं ...
ये समय कि बर्बादी नहीं है ?
हमें क्या हक है अपनी सरकार और लम्पट मंत्रियों को गाली देने का ? अरे आम भारतीयों से बढ़कर कामचोर, अतार्किक जनता आपको और कहीं मिले तो बताईएगा ...