13 May 2010

यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया - (भाग - 2)


यौन शिक्षा - चुनौतीपूर्ण किन्तु आवश्यक प्रक्रिया
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
===================================

(2) यौनांगों के प्रति उत्सुकता - पाँच से दस वर्ष की अवस्था
=====================================


पाँच वर्ष से दस वर्ष तक की उम्र के बच्चों में अपने लड़के एवं अपने लड़की होने का एहसास उस अवस्था में आ जाता है जहाँ उनकी लैंगिक जिज्ञासा तीव्रता पकड़ती है पर वे एक दूसरे से अपने यौनिक अंगों के प्रदर्शन को छिपाते हैं। लड़के-लड़कियों में एक-दूसरे के प्रति मेलजोल का झिझक भरा भाव होता है। इस समयावधि में ‘सेक्स’ से सम्बन्धित जानकारी, शारीरिक परिवर्तनों से सम्बन्धित जानकारी के लिए वे समलिंगी मित्र-मण्डली की मदद लेते हैं। इस आधी-अधूरी जानकारी को जो टी0वी0, इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाओं आदि से प्राप्त होती है, के द्वारा वे ‘सेक्स’ से सम्बन्धित शब्दावली, यौनिक अंगों से सम्बन्धित शब्दावली को आत्मसात करना प्रारम्भ कर देते हैं। यह जानकारी उन्हें भ्रमित को करती ही है, अश्लीलता की ओर भी ले जाती है। इस समयावधि में शारीरिक विकास भी तेजी से होता है जो इस उम्र के बच्चों में शारीरिक आकर्षण भी पैदा करता है। लड़का हो या लड़की, इस उम्र तक वह विविध स्त्रोतों से बहुत कुछ जानकारी (अधकचरी ही सही) प्राप्त कर चुके होते हैं और यही जानकारी उनको ‘सेक्स’ के प्रति जिज्ञासा पैदा करती है जिस ‘सेक्स’ को शारीरिक क्रिया से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि परिवार में इस उम्र से पूर्व वे बच्चे अपने माता-पिता अथवा घर के किसी अन्य युगल को शारीरिक संसर्ग की मुद्रा में अचानक या चोरी छिपे देख चुके होते हैं जो उनकी जिज्ञासा को और तीव्र बनाकर उसके समाधान को प्रेरित करती है; लड़कियों में शारीरिक परिवर्तनों की तीव्रता लड़कों के शारीरिक परिवर्तनों से अधिक होने के कारण उनमें भी एक प्रकार की जिज्ञासा का भाव पैदा होता है; अभी तक के देखे-सुने किस्सों, जानकारियों के चलते विपरीत लिंगी बच्चों में आपस में शारीरिक आकर्षण देखने को मिलता है।

खेल-खेल में, हँसते-बोलते समय, पढ़ते-लिखते समय, उठते-बैठते समय, भोजन करते या अन्य सामान्य क्रियाओं में वे किसी न किसी रूप में अपने विपरीत लिंगी साथी को छूने का प्रयास करते हैं। इस शारीरिक स्पर्श के पीछे उनका विशेष भाव (जो भले ही उन्हें ज्ञात न हो) अपनी यौनिक जिज्ञासा को शान्त करना होता है और इसमें उनको उस समय तृप्ति अथवा आनन्दिक अनुभूति का एहसास होता है जब वे अपने विपरीत लिंगी साथी के अंग विशेष -गाल, सीना, कंधा, जाँघ आदि- का स्पर्श कर लेते हैं। इस यौनिक अनुभूति के आनन्द के लिए वे विशेषतः बात-बात पर एक दूसरे का हाथ पकड़ते, आपस में ताली मारते भी दिखायी देते हैं।

===========================================
पूरा आलेख पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें अथवा अगले भाग का इंतज़ार करें....कल रात 8 बजे तक ...
============================================
चित्र गूगल छवियों से साभार लिए गए हैं......


3 comments:

मनोज कुमार said...

उपयोगी जानकारी।
उत्तम प्रस्तुति।

दीपक 'मशाल' said...

पुनः बेहतरीन लेखन का उदहारण..

ढपो्रशंख said...

ज्ञानदत्त और अनूप की साजिश को बेनकाब करती यह पोस्ट पढिये।
'संभाल अपनी औरत को नहीं तो कह चौके में रह'