05 April 2010

बेटियों को चाहने के लिए संवेदनशील होने की जरूरत है



आज चोखेरबाली पर एक पोस्ट पढ़ी जो भ्रूण लिंग जाँच से सम्बन्धित किसी जिले के डी0एम0 के दकियानूसी विचारों से सम्बन्धित थी। पढ़कर मन थोड़ा सा विचलित हुआ; थोड़ा सा इसलिए क्योंकि विगत 13-14 वर्षों से अपने जिले में कन्या भ्रूण हत्या निवारण विषय पर ही काम कर रहे हैं।



(चित्र गूगल छवियों से साभार)

हो सकता है कि ब्लॉग पर हमारी महिलाओं से सम्बन्धित कुछ पोस्ट को देखकर हमें महिला-विरोधी करार दिया जाता हो किन्तु जो सत्यता है वह ऊपर दी है। पिछले इतने वर्षों का अनुभव बहुत कुछ सीखने और सिखाने की हालत में हमें खड़ा कर चुका है। आज डी0एम0 ही नहीं कुछ एक राजनेताओं को और कुछ मंत्री जैसे पदों को शोभित करने वालों के द्वारा भी इस प्रकार के कुकृत्य किये जा रहे हैं।

अपने जागरूकता कार्यक्रम के भ्रमण के दौरान हमें इंदौर जाने का अवसर मिला था। वहाँ एक प्रसिद्ध महिला चिकित्सक से मिलना हुआ था। उनसे मिलने का कारण भी विशेष रूप से भ्रूण लिंग जाँच और कन्या भ्रूण हत्या ही था। मिलने पर ज्ञात हुआ कि किसी समय में उन्होंने इस कुकृत्य को धन कमाने की गरज से शुरू किया था और अब उस समय के लगभग 12 वर्ष बीत जाने पर (सन् 2003 में हमारी मुलाकात के समय) उनके न चाहते हुए भी उन्हें ऐसा कार्य करना पड़ रहा है। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए बताया कि अब उनके पास बड़े-बड़े मंत्रियों के, विधायकों, सांसदों के फोन आते हैं, सिफारिशें आतीं हैं, इस काम को करने के लिए। सिफारिशों, फोन के साथ भरपूर पैसा भी आता है। यहाँ तक कि उन्हें सम्बन्धित महिला के पास तक ले जाने और बापस छोड़ देने का बहुत ही गुप्त इंतजाम किया जाता है।

ऐसी बहुत सी ज्ञात और अज्ञात जानकारियाँ हमारे पास हैं किन्तु डी0एम0 का इस तरह का बर्ताव करना इसलिए भी अचम्भित करता है कि वह कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए जिला स्तर पर गठित जिला सलाहकार समिति का समुचित प्राधिकारी होता है।

सही कहा गया है कि पढ़े-लिखे होने और शिक्षित होने में बहुत बड़ा फर्क है। हमारे एक बेटी है और हमारी एक भतीजी भी है। इस बात को लेकर हमें गर्व है कि पिछले इतने वर्षों की कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्य को करने में लगी मेहनत का सकारात्मक परिणाम और पारितोषिक हमें दो-दो बेटियों के रूप में प्राप्त हुआ है।

बेटियों के महत्व को समझने वालों को ही बेटी का स्नेह मिलता है। जहाँ तक वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के तर्क (कुतर्क) देने वालों को याद रखना होगा पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम, स्वामी विवेकानन्द का नाम, सरदार भगतसिंह, आजाद, अशफाकउल्ला का नाम।