23 March 2010

पर्यटन के नए और आधुनिक केन्द्र बने मंदिर




भगवान के दर पर बड़ी भीड़ लगी है, मैया के दर पर भक्तों की भारी भीड़ जमा है। वाकई आधुनिकता भरे समाज में जहाँ माता-पिता के सम्मान के लिए किसी के पास समय नहीं है, वहाँ देवी-देव के दर पर जाने वालों की भीड़ बहुत ही अधिक होती जा रही है।
संस्कृति-सभ्यता के नाम पर किये जा रहे कृत्यों को ढ़ोंग बताने वालों के पास पत्थर की मूर्तियों को पूजने का समय तो निकल ही आता है। प्रातःकाल माता-पिता के चरणों में शीश नवाने वाले भले ही न मिलें किन्तु सुबह-सुबह मंदिर में मत्था टेकने वालों की लम्बी कतार देखने को मिल सकती है। माता-पिता बीमारी से परेशान होंगे, उनके इलाज के लिए किसी को भी फुर्सत नहीं होगी किन्तु अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा भी आसान सी लगती है।


हम अपने आसपास देखते हैं कि आजकल नवयुवकों-नवयुवतियों का मंदिर के प्रति, भगवान के प्रति, देवी-देवताओं के प्रति एकाएक मोह बढ़ सा गया है। पब-कल्चर को पसंद करने वाली इस पीढ़ी को भक्ति का माहौल भी पसंद आने लगा है। डिस्को, पॉप, जैज की धुनों पर थिरकती युवा पीढ़ी आज भजनों पर सिर हिलाती, ताली बजाती दिख रही है।
सवाल मन में उमड़ते हैं कि क्या वाकई युवा पीढ़ी का रुझान भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ा है? क्या अब लोगों में भगवान के प्रति श्रद्धा-भाव अधिक पैदा हो गया है? क्या अब लोगों के पास परेशानियों का अम्बार है जिसका निपटारा वे भगवान से करवाना चाहते हैं? लोग इतनी बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की शरण में क्यों चले जा रहे हैं?
मन ही सवाल करता है और मन ही जवाब देता है। ये सवाल ऐसे हैं जो किसी की भावनाओं को आहत करते हैं अथवा किसी को उसकी भक्ति पर सवाल सा खड़ा करते दिखते हैं। मन के सवाल किसी पर उँगली नहीं उठाते, बस उस चलन के प्रति जवाब माँगते हैं जो इस समय चल रहा है।
मन जवाब देता है कि अब मंदिर, देवी-देवताओं की भक्ति का चलन एक शौक बनता जा रहा है। कोई अपनी समस्या लेकर हो सकता जाता हो किन्तु अब अधिक से अधिक लोगों का जाना शौकिया तौर पर ही होता दिखता है। मंदिर जैसी पवित्र और पावन जगह, जहाँ किसी के मन में कलुषित विचारों के आने का सवाल ही नहीं उठता और किसी के द्वारा किसी भी तरह के हस्तक्षेप का भी सवाल नहीं उठता। आशय आप समझ ही गये होंगे....!!!!
इसके अलावा आप सभी ने देखा होगा कि आजकल मंदिरों में नामी-गिरामी लोगों के जाने का भी चलन बढ़ता जा रहा है। कभी कोई सिनेमा का कलाकार, कभी कोई उद्योगपति, कभी कोई खिलाड़ी तो कभी कोई नेता और आश्चर्य देखिये परेशानी का समाधान खोजने, सुख की तलाश में जाने वालों के साथ लाखों, करोड़ों का माल भी जाता है। मंदिरों की दान-पेटियाँ एक झटके में लखपति-करोड़पति हो जातीं हैं।
सोचिए कि लाखों के जेवरात, धन देने वालों के पास किस तरह की परेशानी होती होगी?
परेशानी तो उस के पास है जो छप्पर में लेटा है और सरदी, गरमी, बरसात को अपनी देह पर सह रहा है। परेशानी तो उसके पास है जो उसी मंदिर के बाहर पड़ा इन धनकुबेरों से दो-चार रुपये देने की गुहार कर रहा है। परेशानी में वह है जो सुबह घर से निकलता है और शाम को बापस बेरोजगारी की ही स्थिति में बापस लौटता है। परेशानी में वह है जिसकी बेटी विवाह को बैठी है और उसके पास लाखों रुपये नहीं है दहेज के लिए। परेशानी में वह है जो पानी की कमी से अपने खेतों की फसल को सूखता हुआ देख रहा है। परेशानी उसके पास है जो एक समय के भोजन की व्यवस्था भी अपने बच्चों के लिए नहीं कर सकता है। परेशानी में वह है जो अभी जन्मी ही नहीं और उसको मौत देने की तैयारी होने लगी है।
क्या अब भी आपको लगता है कि ये धनकुबेर और हाथों में हाथ डाले घूमती हमारी युवा पीढ़ी किसी भक्ति-भाव से देवी-देवताओं के दर्शनों के लिए मंदिर आदि में जाते हैं? वर्तमान आधुनिक युग में मंदिर आदि भी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो गये हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि पर्यटन स्थलों का आधुनिक रूप मंदिर हो गये हैं।






1 comment:

Minendra Bisen said...

बिलकुल सही, आज भक्ति और पर्यटन के मायने बदल गए हैं. पहले लोग तीर्थयात्रा पर जाते थे और आज पर्यटन करने. साथ ही यह जरुरी नहीं रहा कि यह कहाँ किया जाये और इसीलिए उत्तराखंड की चारधाम यात्रा ने अपने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, वैष्णोदेवी की यात्रा फैशन बन गई है. जिसका सीधा प्रभाव उन क्षेत्रों पर देखा जा सकता है. लोगो में भक्ति भावना, तीर्थ करने की भावना समाप्त होती जा रही है, बस एक चिन्ह पूजा अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए हो रही है.