17 January 2010

समझ नहीं आता लोग पढना और देखना क्या चाहते हैं? माइक्रो पोस्ट


क्या आप सब में से किसी को भी ये लघुकथा (जोर से बोलो जिन्दाबाद) और मनोरंजन के लिए लगाए ये चित्र(हम भी करते हैं योग - जय बाबा रामदेव) बिलकुल पसंद नहीं आये?
कोई एक टिप्पणी तक नहीं, क्या किसी ने इन्हें देखा तक नहीं?
समझ नहीं आता लोग पढना और देखना क्या चाहते हैं?



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चित्र गूगल छवियों से साभार

8 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी लगी।

राजीव तनेजा said...

आपकी शिकायत दूर कर दी है मित्र ...
वैसे अपने यहाँ... इस हाथ दे और उस हाथ ले वाला हिसाब-किताब चलता है ना?
:-)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

ब्लोग पाठक के मन जानी यह तो ना जाने अन्तर्यामी

बी एस पाबला said...

गीता का ध्यान रख, आप तो बस लिखते जाईए

बी एस पाबला

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यह तो आप को ही पता करना होगा कि लोग क्या पसंद करते हैं। पर मार्केटिंग का ताजा नियम यह है कि लोगों को जरूरत नहीं हो तो जरूरत पैदा कर दो।

Dr. Smt. ajit gupta said...

भैया यह मन बड़ा बावला है, कभी घटिया सी चीज भी पढ़ लेता है और कभी उम्‍दा चीज को देखता भी नहीं। क्‍या करें? आपका दर्द जायज है, हम सब भी इस दौर से गुजरते हैं।

प्रवीण शाह said...

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आपकी शिकायत दूर कर दी है मित्र ...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आप तो बस बिना फल की इच्छा रखे कर्म करते रहिए...
वैसे है तो थोडा मुश्किल ही:)