03 July 2009

समलैंगिकता कानूनी - भविष्य कैसा होगा?

समलैंगिकता पर अदालत का आदेश आया तो देश में उत्साह और आक्रोश का मंजर व्याप्त हो गया। समझ नहीं आया कि इस मुद्दे पर कहा क्या जाये? यह वाकई मानव की विजय है जिससे उसको समानता का अवसर मिला या फिर यह हमारी मानसिकता के बीमार होने का परिचायक है?
अदालत ने कहा कि संविधान के समानता के अनुच्छेद के कारण इस प्रकार का आदेश देने का बल मिला; आदमी की भावनाओं को महत्व दिया। हमारे राजनेताओं ने और फिल्मी हस्तियों ने भी इसका समर्थन करते हुए समलैंगिकों को बधाई दे डाली। उन लोगों का यहाँ तक कहना था कि आधुनिकता के माहौल में हमें बदलना होगा।
चलिए मान लिया जाये
कि सेक्स के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। समलैंगिक गतिविधियों से एड्स रुकेगा या नहीं, अन्य बीमारियाँ होंगीं या नहीं, अपराधबोध कम होगा या नहीं यह तो बाद की बात है पर देखा जाये तो आधुनिक होने का दम्भ और बढ़ जायेगा।
सभी की अपनी मर्जी है कि वह अपनी शारीरिक संतुष्टि का रास्ता स्वयं चुने पर क्या अप्राकृतिक रास्ता चुनने की अनुमति दी जानी चाहिए? हमारे देश में विवाह को सिर्फ शारीरिक संतुष्टि के लिए ही नहीं स्वीकारा गया। विवाह के पीछे का मकसद सेक्स और संतानोत्पत्ति रहा है। आज दो व्यक्तियों (समलैंगिकों) के मध्य का प्यार सेक्स आधारित ही है। क्या इससे विवाह और परिवार की अवधारणा खण्डित नहीं होती है?

इसके अलावा जो लोग इस निर्णय की वकालत यह कहते हुए घूम रहे हैं कि हमें व्यक्तियों की भावनाओं का ख्याल भी रखना चाहिए; संविधान में भी समानता का अधिकार दिया गया है; किसी के साथ कानूनी डंडा हमेशा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए वगैरह...वगैरह। वे लोग आज के समाज की स्थिति देख कर थोड़ा इस ओर भी सोचें।
आज हम देखते हैं कि आधुनिकता में अंधे होकर बाप बेटी से, श्वसुर बहू से, भाई बहिन से, लड़का अपनी माँ, मौसी, चाची, मामी जैसे पवित्र सम्बन्धों, रिश्तो से भी सेक्स की भूख मिटा रहा है। कल को (आज से दस-बीस वर्ष बाद) यदि इसी मानसिकता के लोग ज्यादा हो गये तथा समाज में इस तरह की घटनायें और भी तेजी से बढ़ने लगीं तब उसके बाद की स्थिति की कल्पना कीजिए।
ये लोग भी सड़को पर इन्हीं समलैंगिकों की तरह आन्दोलन करेंगे कि बाप की शादी बेटी से, भाई की शादी बहिन से होने दी जाये; माँ, मौसी, चाची, मामी आदि सम्बन्धों को परिवार के लड़को, बेटों, के साथ रहने दिया जाये; श्वसुर को बहू का पति घोषित किया जाये। तब निश्चय ही अदालत वर्ष 2009 के कल के अपने फैसले की नजीर पेश करते हुए यही फैसला देगी कि सभी की समानता का ख्याल रखते हुए ऐसा गैरकानूनी नहीं है। किसी को भी किसी के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाने की, किसी को किसी के साथ रहने की आजादी है।

आधुनिकता में पले-बढ़े हम इस निर्णय पर भी सड़को पर जश्न मनायेंगे। अपनी जीत साबित करेंगे। इस निर्णय पर आज वाकई विचार करने की जरूरत है।

(सभी फोटो यहाँ से साभार लीं हैं)

12 comments:

Science Bloggers Association said...

वही होगा, जो मंजूरे खुदा होगा।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Dipti said...

आपकी ये चिंता जायज़ है। जिस आधार पर कोर्ट ने फैसला दिया है उसके इतर लोग इसका दुरुपयोग करेंगे या फिर इसे फ़ैशन का हिस्सा मानकर इसे अपना लेंगे इस बात का डर ज़्यादा है।

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

अब जो होगा देखा जायेगा लेकिन मै इस फ़ैसले के खिलाफ़ हूं...आगे देखते है की क्या होता है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

डाक्टर साहब! आप का बहुत बहुत धन्यवाद कि आप ने तीसरा खंबा पर आ कर टिप्पणी दर्ज कराई। आप की पोस्टें मैं नियमित रूप से पढता रहता हूँ। मैं ने पोस्ट यह पोस्ट शाम को ही पढ़ ली थी लेकिन टिप्पणी नहीं की थी। टिप्पणियाँ भी बात को कभी कभी तूल देती हैं। लेकिन यह मामला तूल देने का है ही नहीं। कुछ नहीं हुआ है और हल्ला बहुत हो रहा है। आप की तरह बहुत लोग चिंतित हैं। चिंता स्वाभाविक भी है। लेकिन यह एक वास्तविकता कुछ और है जिस से शायद लोग अभी अपरिचित हैं। अप्राकृतिक मैथुन से उत्पन्न होने वाली एडस् के आंकड़े ही भारत में उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इस का सर्वेक्षण ही संभव नहीं हो पा रहा है। इस का एक कारण यह है कि यह भारत में एक अपराध है। कौन यह कहने को तैयार होगा कि वह अपराधी है? दूसरा यह प्रवृत्ति जन्मजात शारीरिक बनावट के कारण भी है। किसी को जन्मजात शारीरिक बनावट के लिए अपराधी तो घोषित नहीं किया जा सकता।
अदालत का निर्णय बहुत उचित है। लेकिन उस का मीडिया ने हल्ला कर दिया है। नाज फाउंडेशन वाले भी मौके से तुरंत ही विदा हो लिए और चुप हो गए। उन का उद्देश्य पूरा हो चुका था।
वास्तव में यह टीआरपी का मामला हो गया है।

हम अपने परंपरागत समाज को देखें तो वहाँ यह बुराई इतनी मात्रा में है कि केवल पर्दे के पीछे जा कर ही देखा जा सकता है। धार्मिक चोलों में छुपे बहुत लोगों को मैं ने प्रत्यक्ष इस बुराई में गरदन तक डूबे देखा है। वे बच्चों को इस का शिकार बनाते हैं। कोई भी धर्म इस से नहीं बचा है। आज धार्मिक गुरू इस के विरोध में उठ खड़े हुए हैं लेकिन यह वैसा ही है कि अपराधी सब से जोर से अपराध के विरुद्ध भाषण दे। बहुत से राजनीतिक लोगों को इस मं संलिप्त देखा है। लेकिन यह अपराध होने के कारण आज तक छुपा रहा है। कुछ गंदगी निकल कर बाहर आएगी तो पता लगेगा कि मात्रा कितनी है। उस का उपचार करने में मदद मिलेगी। इस के अप्राकृतिक कृत्य होने पर तो कोई पाबंदी नहीं लगा सकता है। वह तो हमेशा बना रहेगा। पर लोगों को मूल प्राकृतिक धारा में लाने में इस से मदद मिलेगी।
यदि कोई बालक इस प्रवृत्ति का शिकार होता रहे और अभिभावकों को पता ही न हो तो उसे बुराई से कैसे बचाएंगे?

जहाँ तक अपराध का प्रश्न है तो इस धारा के तहत अपराध दर्ज ही नहीं होते या बहुत कम होते हैं। मैं ने तो अपने इकत्तीस वर्ष की वकालत में कोटा और बारां में एक भी मुकदमा चलते नहीं देखा। अब ऐसे में केवल राजनीति ही करना शेष रह गया है। इस मुद्दे से सिर्फ जो लोग चिकित्सा के क्षेत्र में संजीदा हो कर काम कर रहे हैं उस के अलावा किसी को कोई अंतर नहीं पड़ रहा है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भाई!
हम तो पुरानी पीढ़ी के लोग हैं।
आडवानी, मनमोहन, राहुल और सोनिया की प्रतिक्रिया का इन्तजार कर रहे हैं

सतीश पंचम said...

विकास चक्र उल्टा घूम रहा है और वह भी लडखडाते हुए।

mahashakti said...

बहुत ही जटिल विषय है, इसे कानूनी दण्‍ड से मुक्‍त किया जा सकता है किन्‍तु विवाह सरीखे मान्‍यता देना गलत होगा। एकान्‍त में आप क्‍या करते वह बाद की बात है किन्‍तु दो मर्द पति और पत्‍नी के रूप में घूमेगे कम से कम यह इस देश की रीति नही है।

janta ki aawaz said...

jaisa ki dinesh ji ne kaha hai ki jitna halla ho raha hai wah uchit nahi hai ....ye sirf media ke t.r.p. ka masala ho gaya hai to ye kahna galat hoga . mai is faisle k khilaf hoon ........

अजय कुमार झा said...

कुमारेन्द्र जी..इस विषय पर मेरे द्वारा पढ़े गए कुछ अछे आलेखों में से एक...दिनेश द्विवेदी जी ने बहुत ही विस्तार से कई बातों का उल्लेख करते हुए ..टिप्प्न्नी की है ..हालांकि कुछ बातों से मैं इत्तेफाक नहीं रखता..ये की अदालतों में इस धारा के तहत मुकदमें दर्ज नहीं होते..क्यूंकि यहाँ राजधानी में तो बाल न्यायालयों में तो बहुत से मुकदमें इसी धारा के तहत चल रहे हैं..जाहिर है की उनपर इसका कोई फर्क नहीं पडेगा..
जैसा की मैं शुरू से कह रहा हूँ की सवाल विरोध या समर्थन का नहीं है सवाल है की इसे अधिकार के रूप में मांगना कितना जायज़ और जरूरी है..खैर ...समाज यदि पतन के रास्ते पर चल रहा है तो ..देर सवेर उसके परिणाम भी सामने आयेंगे ही...और मुझे कभी भी नहीं लगा की ये मर्सी किल्लिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा है..

हर्षवर्धन said...

पता नहीं इस बहस से कुछ भला होगा या बस ऐसे ही ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

विकृति है, सजा खत्म कर दी ठीक किया लेकिन चैनलों द्वारा महिमा मंडित किया जाना ठीक नहीं है.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

किसी अखबार में कोर्ट - रूलिंग के बारे में पढ़ा था उसकी भाषा कुछ ऐसी थी जैसे कोर्ट होमोसेक्स्सुअल्टी या समलैंगिकता के पक्ष में निर्णय दे तथा शासन द्वारा सम्बंधित सजा की धारा समाप्त करना नैसर्गिक एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर किया गया महान कार्य है | अगर समाचार-पत्र द्वारा उल्लिखित भाषा और निर्णय आदि की भाषा एक ही है , तो फिर हमें सोचना पड़ेगा की नैसर्गिक एवं प्राकृतिक का वास्तविक अर्थ क्या हैं ? क्या वो जो कुछ बीमार सोच वाली मानसिकता के लोग परिभाषित कर रहे हैं या वो जो इस ' प्रकृति ' द्वारा हमें ' नैसर्गिक ' रूप से दिया या प्रदत्त किया गया है ? कहीं अति आधुनिक एवं तथा कथित प्रगति शील कहलाने की अंधी दौड़ में हम अपने पैरों पर कुल्हाडी तो नहीं मारे ले रहें हैं ,जब की अभी तक प्रकृति के साथ की गयी अपनी मूर्खताओं की अलामाते मानव - समाज भुगत रहा है ,फिर भी उसकी आंखे नहीं खुल रहीं हैं |||


वैसे पुरुष -समाज के लिए एक जानकारी और चेतावनी :-- निम्न ब्लॉग पर है
" स्वाइन - फ्लू और समलैंगिकता [पुरूष] के बहाने से "