01 April 2009

क्या हमें मूर्ख दिवस मनाना आता है?

आज एक अप्रैल है, अप्रैल फूल दिवस। लोगों को मूर्ख बनाने का दिन। इस दिन की शुरुआत हमारे देश में कैसे हुई इसका तो विशेष ज्ञान नहीं है पर बचपन से ही देखते आ रहे हैं कि इस दिन बच्चे तो बच्चे बड़े भी अपनी कारगुजारियों से लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास करते हैं।
मनोरंजन और मस्ती के नाम पर ही इस दिन की शुरुआत की गई होगी, ऐसा हमारा मानना है। विदेश से आई इस परम्परा में वहाँ की भागदौड़ भरी दिनचर्या से समय निकालने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए होता है। इसके ठीक उलट हमारे देश में विभिन्नताएँ सर्वत्र व्याप्त हैं। इसी विविधता के कारण हमारे यहाँ विविध प्रकार से मस्ती, मनोरंजन होता रहता है।
बहरहाल हमने तो हर अच्छी-बुरी परम्परा को स्थान दिया है, इस मूर्ख दिवस को भी स्वस्थ मनोरंजन के नाम पर स्वीकार किया था। इधर अब कुछ समय से देखने में आ रहा है कि इस दिन का नाम लेकर कुछ आपत्तिजनक मजाक, कुछ व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करने की कुप्रथा शुरू हो गई है। मूर्ख बनाने के नाम पर लोगों से किसी की दुर्घटना को समाचार, किसी के देहान्त का भद्दा मजाक, किसी को अन्य किसी प्रकार की बुरी खबर देने का चलन शुरू हो गया है। मूर्ख दिवस के नाम पर यह गलत है।
हमें याद है किसी समय हमारे शहर में आज के दिन एक कवि सम्मेलन हुआ करता था। इसमें भाग लेने वाले कवियों के बीच से एक कवि को अन्त में महामूर्खाधिराज की पदवी दी जाती थी। लोगों को पूरे वर्ष इसका इन्तजार रहता था और बिना किसी बैर-भाव के इसमें कवियों और श्रोताओं की भागीदारी रहती थी। अब आलम ये है कि इस आयोजन का अन्त हो गया है, वह भी एक मजाक के दर्दनाक अन्त के कारण।
चलिए मस्ती, मजाक को दिवस हम सब मस्ती के साथ मनायें, बिना किसी को कष्ट और परेशानी दिए। बिना किसी की भावनाओं को आहत किये, बिना किसी को दुःख पहुँचाये। देखा जाये तो किसी भी पर्व का महत्व उसके द्वारा हर्ष, उल्लास मनाने से है न कि किसी को कष्ट पहुँचान से। क्या आज का मूर्ख दिवस हम इस विचार के साथ मना सकेंगे कि कोई हमारे किसी भी कदम से हताहत न हो, परेशान न हो, दुःखी न हो?

चुनावी चकल्लस-

लड़ो न झगड़ो तुम, एक पद की खातिर,
कुछ तो शर्म करो इस देश की खातिर।
वार्ताओं के दौर बन गये हैं हमारी नियति,
सुलह से एक नेता चुनो देश की खातिर।।

4 comments:

mukti said...

आपके ब्लॉग पर रंग सन्योजन ठीक नही है , कुछ बातें तो थीक से दिखाई ही नही देतीं ।


http://mukti-kamna.blogspot.com/

अनुनाद सिंह said...

सही तो यह है कि हम पक्के नकलची हैं और मानसिक गुलामी को विभिन्न रूपोंमें अभी भी ढ़ो रहे हैं।

mamta said...

चलिए मस्ती, मजाक को दिवस हम सब मस्ती के साथ मनायें, बिना किसी को कष्ट और परेशानी दिए। बिना किसी की भावनाओं को आहत किये, बिना किसी को दुःख पहुँचाये।

आपकी इस बात से पूर्ण रूप से सहमत है ।

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

कुमारेंद्र जी, आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया.. अप्रेल फूल के लिए स्वस्थ मनोरंजन का ही चयन होना चाहिए.. हमारे जयपुर में आज भी हर साल तरुण समाज महामूर्ख सम्मेलन का आयोजन कराता है और इसमें नामी कवि शिरकत करते हैं।