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21 April 2016

बोल न ऐसे बोल

प्रदेश के संवैधानिक पद पर बैठे माननीय कहना क्या चाहते थे? लोगों को समझाना क्या चाहते थे? अपने ही कार्यकर्ताओं को क्या सन्देश देना चाहते थे? सपा का झंडा लगाकर लडकियाँ न छेड़ें. समझ से परे है ये बयान, जो कि एक मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया. उत्तर प्रदेश वर्तमान में चुनावी वर्ष में प्रवेश कर चुका है. ऐसे में तमाम सारे राजनैतिक दलों की कोशिश जनता के साथ अधिक से अधिक संपर्क साधने की रहती है. इसमें भी सत्ता पक्ष अपने आपको जनता का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध करने का प्रयास करता है. ऐसा ही कुछ सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी द्वारा प्रदेश में किया जा रहा है. विगत चार वर्षों के इस सरकार के विकास कार्यों को उसी के कार्यकर्ताओं और जाति-विशेष के लोगों की गुंडागर्दी ने कहीं हाशिये पर धकेल रखा है. विकास कार्यों पर गुंडागर्दी, माफियागीरी, जातिवाद हावी रहा. इस कोढ़ में खाज का काम इस दल के इन्हीं बड़े-बड़े नेताओं द्वारा भी किया जाता रहा है. मुख्यमंत्री से पहले पार्टी के मुखिया द्वारा बलात्कार को लेकर किया गया ‘नादानी’ वाला आपत्तिजनक बयान दिया गया था. अबकी खुद मुख्यमंत्री ने ही जैसे लड़कियों के छेड़ने सम्बन्धी गाइडलाइन सी जारी कर दी.

कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ देश ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसे अभियान को संचालित करने में लगा है. देश का लगभग हर राज्य बेटियों के विकास के लिए काम कर रहा है. सरकारी, गैर-सरकारी संगठन बेटियों के विकास के लिए लगातार प्रत्यनशील हैं. इन सबके बीच मुख्यमंत्री जैसे संवेदनशील पद पर, जिम्मेदाराना, संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति किस तरह गैर-जिम्मेवाराना बयान देता है. हो सकता है कि वे अपने दृष्टिकोण से इसे सही समझ रहे हों किन्तु इस बयान का सार देखा जाये तो बहुत कुछ कहता है. कहीं न कहीं एक सन्देश ये भी जाता है कि लड़कियों को छेड़ते समय छेड़ने वाले लोग सपा का झंडा न लगायें. इसका अर्थ ये भी निकाला जा सकता है कि यदि झंडा लगाकर ही छेड़ना है तो किसी और झंडे के साये में ऐसा किया जा सकता है. वर्तमान में मुख्यमंत्री जी अपने भ्रमण के द्वारा, अपने विकास कार्यों के बखान के द्वारा, राहत सामग्री के वितरण के द्वारा विगत चार वर्षों का ‘डैमेज कण्ट्रोल’ करना चाहते हैं. इस चक्कर में वे स्वयं में कुछ अटपटा बोल गए.

सपा के विगत चार वर्षों का लेखा-जोखा देखा जाये तो ये शासन उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर नहीं कहा जा सकता है. सरेआम महिलाओं के, लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ, उनके साथ बलात्कार की वारदातें, गैंग रेप के साथ-साथ उनकी हत्या के जघन्य कांडों ने सपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. इसमें भी उसके लिए मुश्किल इसकी रही कि अधिसंख्यक मामलों में सपा के कार्यकर्त्ता आरोपी की भूमिका में नजर आये. बलात्कार के मामले में स्वयं सपा मुखिया भी नादानी सम्बन्धी बयान देकर विवादों के घेरे में रहे थे. ऐसे में महिला-विरोधी छवि को दूर करने की कवायद में मुख्यमंत्री ने शहर-शहर, नगर-नगर मुख्य मार्गों पर, स्थानीय मार्गों पर महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय बनवाये जाने का आश्वासन दिया, व्हाट्सएप्प पर छेड़खानी की खबर देने पर कार्यवाही करने का भरोसा दिखाया मगर एक जरा से बयान ने सबकुछ साफ़ कर दिया. दरअसल, वे अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के विरोध में मुखरता से बोलने की हिम्मत इस चुनावी वर्ष में नहीं जुटा पाए. वर्तमान सरकार के लिए महिला सुरक्षा जितना बड़ा मुद्दा है, उससे कहीं बड़ा मुद्दा अपने कार्यकर्ताओं के भरोसे को बनाये रखना भी है. देखा जाये तो मुख्यमंत्री ने एक बयान के द्वारा अपने ही कार्यकर्ताओं को ताकत प्रदान की है. यही ताकत उनके लिए चुनावी समर में सीटें लाने का काम करती है. अब महिलाओं को सोचना होगा कि उनके प्रति ऐसी सोच रखने वाले किसी भी दल, किसी भी व्यक्ति के साथ उन्हें कैसा व्यवहार करना है.
 

1 comment:

Kavita Rawat said...

संस्कार बोलते हैं......... बिडम्बना है कि चुनाव के समय एक दिन का मौका जनता को मिलता है लेकिन वह उसका सही उपयोग नहीं कर पाती, फलस्वरूप फिर ५ साल चुपचाप बैठे रहो ...............इसके साथ ही सही सच्चे उम्मीदवार का भी सर्वथा टोटा रहता है, विकल्प में किसी को तो चुनना ही पड़ता है, अधिकांश फिर पार्टी को चुनते हैं।