23 May 2009

हिन्दी भाषियों की गलतियाँ

आज सुबह ही इसे पोस्ट किया था, कुछ कारणों से इसे दोबारा पोस्ट करना पड़ रहा है। आशा है इस अतिरिक्त खुराक के लिए क्षमा करेंगे।
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सरकार का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, सांसद जो अब मंत्री पद प्राप्त कर चुके थे, शपथ ले रहे थे। हम ऐसे कार्यक्रम देखने का प्रयास करते हैं, इस कारण से नहीं कि कोई विशेष रुचि है वरन् इस कारण से कि ऐसे कार्यक्रमों में कुछ न कुछ विशेष देखने को भी मिल जाता है। अपने सांसदों, मंत्रियों को भाषा के प्रति प्रेम बड़ी ही सुन्दरता से परिलक्षित होता है।
हिन्दी भाषियों का भी हिन्दी का गलत उच्चारण करना, गलत तरह से लिखना-बोलना हमें हैरत में डालता है। इस पोस्ट के द्वारा हमारा उद्देश्य कदापि हिन्दी सिखाना नहीं है न ही यह समझाना है कि सही हिन्दी क्या है, कैसे बोली-लिखी जाये। दरअसल हुआ यह कि कुछ दिनों पूर्व एक ब्लाग पर हिन्दी को लेकर की गई टिप्पणी पर सात मेल प्राप्त हुए, जिनके द्वारा कुछ सवाल उठाये गये थे। यहाँ हम पुनः स्पष्ट कर दें कि हमारा मकसद कतई किसी को हिन्दी सिखाने का नहीं है। बस थोड़ा सा प्रयास यह दिखाने का है कि ‘हम हिन्दीभाषी होने का भरते हैं दम और करते हैं हिन्दी को ही बेदम।’
कुछ छोटे-छोटे से उदाहरण आपके सामने हैं जो अपने आप बतायेंगे कि हम कितना सही प्रयोग करते हैं हिन्दी का बोलने और लिखने में।
बहुत से लोग ‘अनेक’ शब्द को भी बहुवचन बनाकर ‘अनेकों’ लिख देते हैं। यह गलत है, ‘अनेक’ तो खुद में बहुवचन है।
लिखने में ‘आशीर्वाद’ को ज्यादातर ‘आर्शीवाद’ लिखने की गलती की जाती है। ठीक इसी तरह की गलती ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ को ‘अन्र्तराष्ट्रीय’ लिखकर की जाती है।
‘संन्यासी’ शब्द को ‘सन्यासी’ तथा ‘उज्ज्वल’ को ‘उज्जवल’ लिखने की गलती बहुत देखने को मिलती है।
‘उपलक्ष’ तथा ‘उपलक्ष्य’ का अर्थ अलग-अलग है फिर भी दोनों को अधिकतर एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है।
इसी तरह योजक शब्द ‘और’, ‘तथा’, ‘एवं’, ‘व’ सीधे-सीधे और के ही रूप में प्रयोग किये जाते हैं किन्तु यदि देखा जाये तो इनका प्रयोग अलग-अलग तरह से किया जाता है। (इस बारे में बाद में)
हम अब तो पत्र लिखना लगभग बन्द ही कर चुके हैं। जब लिखते थे और जो आज भी लिख रहे हैं वे अपने पत्र में अपने से बड़ों को सम्बोधित करने में इस प्रकार की गलती जरूर करते हैं। ‘पूज्य’ और ‘पूजनीय’ का अन्तर नहीं कर पाते हैं। सम्बोधन में ‘पूज्य’ अकेले ही प्रयोग किया जाता है, ‘पूज्यनीय’ शब्द गलत है। इसके स्थान पर ‘पूजनीय’ का प्रयोग किया जाना चाहिए।
इस तरह के और बहुत से शब्द हैं जो हम आमतौर पर गलत प्रयोग करते हैं। इसके अलावा लिखने और बोलने में बहुत बार हम शब्दों के क्रम पर और उसके रूप पर भी ध्यान नहीं देते हैं। गलत प्रयोग करते हैं किन्तु किसी के टोकने पर हिन्दी भाषी होने का कुतर्क करते हैं और अपनी ही बात को सही साबित करने का प्रयास करते रहते हैं। (यहाँ भी कुछ ऐसा ही होने वाला है।)
आपने देखा होगा कि हम आम बोलचाल के रूप में अधिकतर कहते दिखते हैं ‘‘पानी का गिलास उठा देना’’ या फिर ‘‘पानी की बोतल ला देना’’। सोचिए क्या वाकई ‘गिलास’ या ‘बोतल’ पानी के हैं?
इसी तरह हम कहते हैं ‘‘एक फूल की माला देना’’। क्या अर्थ हुआ इसका? ‘एक फूल’ की माला?
लिखने-बोलने की एक बहुत बड़ी गलती होती है जब हम लिखते-कहते हैं ‘महिला लेखिकायें’ या ‘महिला लेखिका’। यह गलती बड़े-बड़े हिन्दी पुरोधाओं को करते देखी है। यदि ‘महिला लेखिका’ है तो ‘पुरुष लेखिका’ भी कहीं होगी? अरे भाई ‘लेखिका’ तो अपने आप में महिला होने का सबूत है।
शब्दों के क्रम का गलत प्रयोग किस तरह हम करते हैं और पूरा-पूरा अर्थ बदल देते हैं, इसका एक उदाहरण देकर अपनी बात समाप्त करते हैं।
एक शब्द है ‘केवल’ और इसका गलत प्रयोग क्या-क्या गुल खिला सकता है, देखिएगा।
‘केवल’ मैं सवाल हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ हुआ कि सवाल ‘मैं’ ही हल कर सकता हूँ।)
मैं ‘केवल’ सवाल हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ हुआ कि मैं केवल ‘सवाल’ हल कर सकता हूँ और कुछ हल नहीं कर सकता हूँ।)
‘मैं सवाल ‘केवल’ हल कर सकता हूँ।
(इसका अर्थ होगा कि मैं सवाल को केवल ‘हल’ कर सकता हूँ, उसे समझा नहीं सकता हूँ।)
चलिए आज इतना ही, यह न सोचिएगा कि हम क्लास लेने लगे। हम तो हिन्दी के एक बहुत छोटे से विद्यार्थी हैं। गलती हम भी करते हैं और सीखने का प्रयास करते हैं। घमंड हमें भी अपने हिन्दी भाषी होने का है पर हिन्दी को बिगाड़ना हमें मंजूर नहीं। जिसे जो कहना हो कहे पर हिन्दी भाषी होने का कतई तात्पर्य यह नहीं कि हम हिन्दी सही लिखते-बोलते हैं। आशा है कि आप हमें भी हमारी गलती बतायेंगे।

5 comments:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

निःसंदेह उत्तम लेख....
साधुवाद स्वीकारिये

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर सलाह!

PN Subramanian said...

ज्ञान वर्धन हुआ. हमें भी पता चल गया कि हम कहाँ गलती किया करते थे. कुछ गलतियाँ फोनेटिक की बोर्ड के प्रयोग से भी उपजती हैं. कभी कभी जैसा हम चाहते हैं वैसा टंकण नहीं हो पाता और हम समझौता कर लेते हैं.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...
This comment has been removed by the author.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपका यह लेख वास्तव में वर्तनी को सुधारने में सहायक सिद्ध होगा।