22 April 2009

हिन्दी.....हिन्दी......हिन्दी........

अभी दो-तीन दिन एक कार्यशाला में व्यस्त रहे। कभी-कभी कार्यक्रमों में कुछ लोग ऐसे मिल जाते हैं जो अपनी बातों के द्वारा कुछ न कुछ सिखा देते हैं। कार्यशाला पर जाने से पहले एक पुस्तक में हिन्दी भाषा को लेकर आलेख पढ़ रहे थे। आलेख में कुछ बातें बहुत ही अच्छी दी हुईं थीं। ऐसी बातें अधिकतर देखा गया है कि आजकल सिखाई नहीं जा रहीं हैं। पुस्तक में लिखीं बातों को ध्यान से इस कारण भी पढ़ा क्योंकि कहीं न कहीं हिन्दी के प्रति एक अलग तरह की अनुभूति होती है।
यह पता नहीं संयोग कहा जायेगा या और कुछ कि वर्कशाप में जिन सरल, सहज स्वभाव के सज्जन से मुलाकात हुई उन्हों ने भी अपनी बातों के दौरान हिन्दी भाषा के प्रति कुछ जानकारियाँ दीं। तमाम सारी बातों के बाद हम लोगों की चर्चा ने साबित किया कि हम लोग हिन्दी के प्रति तो सचेत हैं किन्तु अंग्रेजी के भय ने हमें हिन्दी से दूर कर दिया है।
हमारे देश का एक होनहार छात्र वैज्ञानिक बनने के लिए उस विषय से सम्बन्धित पुस्तकों का अध्ययन करना चाहता है किन्तु उसका मष्तिष्क तो अंग्रेजी-हिन्दी-विषय के चक्रव्यूह में उलझा रहता है। ऐसे में उसका स्वाभाविक विकास कैसे होगा? होता भी है तो वह हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य बोध को खो चुका होता है।
देखा जाये तो भाषा को आपसी सम्बन्ध, वार्तालाप के लिए, सम्पर्क के लिए बनाया गया था। आज भी भाषा के माध्यम से ही हम अपने मनोभावों को आसानी से सबके बीच रख पाते हैं। इस समझ के बाद भी हम क्यों भाषा को क्लिष्टता का जामा पहनाने के पक्ष में रहते हैं? सहजता के साथ हम जिस अभिव्यक्ति को कर सकते हैं वह क्लिष्टता के साथ कदापि सम्भव नहीं है। इसके बाद भी हम भाषा को लगातार जटिलता की ओर लिए जा रहे हैं। कहीं हम भाषा को जटिलता प्रदान कर अपने आपको बुद्धिजीवी तो साबित नहीं करना चाहते? यदि ऐसा है तो इस विचार को छोड़ कर भाषा को सरलता प्रदान करें और आपसी सम्बन्धों में आती दूरियों को मिटाने का प्रयास करें।

चुनावी चकल्लस-

जिनके हाथ सने खून से वे जीवन देते दिखे,
जिन्होंने दिए धोखे वे विश्वास व्यक्त करते दिखे,
बदल लेते हैं वे अपने चरित्र को पल भर में,
हमसे मिले वो जब भी मुखौटा लगाये ही दिखे।

3 comments:

Udan Tashtari said...

उसी प्रयास में लगे हुए हैं/// जितना सरल कर सकते हैं, उतना तो कर ही रहे हैं. :)

Anil said...

हिंदी कविता-कहानी की ही भाषा बनी रहेगी क्या? हिंदी में विज्ञान और तकनीकी विषयों पर शिक्षा की भी पहल करनी पड़ेगी। लेकिन करेगा कौन?

नदीम अख़्तर said...

वैसे हिन्दी को सरल करने से ज्यादा ज़रूरी है, इंटरनेट में इसके प्रयोग को व्यापक बनाना। अभी कितने सारे लोग ऐसे हैं, जो हिन्दी के माध्यम से कम्प्यूटर पर काम कैसे किया जाता है, ये भी नहीं जानते। जबकि हममें से कई लोग ऐसे हैं, जो कम्प्यूटर पर हिन्दी के अलावा किसी अन्य भाषा में काम ही नहीं करते।