14 January 2009

मीडिया पर अंकुश की तैयारी

मनमोहन सरकार की तरफ़ से मीडिया की मनमर्जी रोकने के लिए एक कानून बनाने की तैयारी हो रही है और मीडिया के पेट में दर्द उठाना शुरू हो चुका है. ये सत्य है कि मीडिया के कारण ही सरकारी तंत्र की कारगुजारियों को, उसकी निरंकुशता को बहुत हद तक रोका जाता है पर क्या मीडिया की निरंकुशता को रोकने के लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है? ऐसा नहीं है कि हमारे विचार मीडिया के ख़िलाफ़ और सरकार के पक्ष में हैं, बस कुछ भी विरोध या समर्थन करने के पहले सही-ग़लत का निर्णय अवश्य कर लेना चाहिए.

मीडिया के मूलभूत लक्षण अब लगभग समाप्त होते दिख रहे हैं. कहीं-कहीं तो ये सरकारी भोंपू के रूप में ही काम कर रहा है. यदि इसे सकारात्मक रूप से देखा जाए तो कोई न कोई मीडिया समूह आज किसी न किसी आर्थिक घराने या राजनैतिक दल का पिछलग्गू बना घूम रहा है. समाचार पत्र अपना रोल अलग तरह से निभा रहे हैं और इलेक्ट्रोनिक चैनल अपनी-अपनी तरह से अपने रोल का निर्वहन कर रहे हैं। देखा जाए तो सभी के सामने अपने-अपने अस्तित्व को बचाने का संकट है. कोई विज्ञापन के सहारे इसे बचा रहा है तो कोई चरणगान करके अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहा है.

मीडिया का जो कार्य स्वतंत्रता के पूर्व था अब उसमें बहुत से बदलाव आ गए हैं. अब सरकारी तंत्र की कमियों को जनता के सामने लाने की, जनता की समस्याओं को सही ढंग से उठाने का कार्य मीडिया की तरफ़ से हो रहा है. इसी के साथ मीडिया को चौथा खम्बा मानने के कारण मीडिया के लोगों में एक प्रकार की निरंकुशता आ गई है. इस निरंकुशता में मीडिया को लगता है कि वो जो कर रहा है, जिसे दिखा रहा है वो एकदम सही है पर ऐसा नहीं है। मीडिया के द्वारा "पहले दिखाने के लालच" ने कुछ भी दिखा देने को, कुछ भी देखने को विवश कर दिया.

यहाँ किसी घटना को उदाहरण के रूप में नहीं रख रहे हैं क्यों कि आप सब वास्तविकता से परिचित हैं. कोई एक घटना नहीं है घटनाओं का पूरा भण्डार है पर मीडिया नहीं मानेगी कि उसकी तरफ़ से कोई ग़लती होती है. मीडिया माने या न माने पर जनता को तो जानना चाहिए कि क्या सही है क्या ग़लत. सरकार क्या करेगी ये बाद की बात है पर हम मीडिया को कितना बचाते या गिराते हैं ये सोचना होगा. क्या मीडिया ये सोचेगा???

1 comment:

अल्पना वर्मा said...

मीडिया के द्वारा "पहले दिखाने के लालच" ने कुछ भी दिखा देने को, कुछ भी देखने को विवश कर दिया.
bilkul sahi likha hai--kayee ghatnayen hain.

aaj....media par kuchh had tak ankush ki jarurat hai.