26 June 2008

हड़ताल की समस्या

बड़े जोर-शोर से कई सारे लोगों की भीड़ ने जिन्दावाद-मुर्दावाद करते हुए शहर में हलचल मचा दी। दुकानदार अपनी-अपनी दुकान बंद कर इधर-उधर भागने लगे हैं। सड़कों पर टहलते लोग भी सर छुपाने की जगह देखने लगे। लोगों को डर लग रहा था कि कहीं किसी तरह का बलवा न हो जाए। भीड़ पूरी ताकत के साथ चीखती हुई शहर को बंद करा रही थी, जो दुकान, स्कूल बंद नही करता उसके साथ मारपीट भी हो रही थी। एकाएक भीड़ के नेतानुमा इन्सान ने भीड़ का मुंह सरकारी संपत्ति की ओर मोड़ दिया। अब भीड़ सरकारी संपत्ति की ओर दौड़ पड़ी।


आगे क्या हुआ यह बताने के पहले आपको बताते चलें कि यह भीड़ किस बात के लिए है, क्यों हंगामा कर रही है, क्यों दुकानों आदि को बंद करा रही है, क्यों अब सरकारी संपत्ति की ओर मुड रही है? ये भीड़ है नए-नए ब्लोगर्स की जिन्होंने एक संघटन बना कर अपनी पोस्ट पर टिप्पणी न करने वालों के विरुद्ध आन्दोलन खड़ा कर रखा है। इनकी मांग थी कि नए ब्लोगर्स की प्रत्येक पोस्ट पर कम से कम दस टिप्पणी जरुर होनी चाहिए यदि ऐसा नहीं होता है तो सरकार इस तरह की व्यवस्था करे कि प्रत्येक पोस्ट पर दस टिप्पणियां प्रकाशित हों। जब आश्वासन के बाद भी नए ब्लोगर्स की पोस्ट पर पर्याप्त टिप्पणियां नहीं मिलीं तो नए ब्लोगर्स के संगठन "नव-ब्लोगर्स संघर्ष मोर्चा" ने हड़ताल कर शहर में हंगामा शुरू कर दिया।


अब भीड़ की बात, भीड़ अपनी पूरी ताकत से अब कुछ अलग करने के विचार में आ गई। सरकारी संपत्ति होती ही ऐसी है कि उसमें चाहे आग लगाओ, चाहे तोडो , चाहे उसको चुरा ले जाओ, न तो अपना नुकसान होता है, न अपने रिश्तेदारों का, न अपने मित्रों का। सरकारी संपत्ति का नुकसान करने का बाद सीना तान कर, ताल ठोंक कर अपने कारनामों का बखान मीडिया के सामने करो कोई कुछ करने वाला तो है नही हाँ आपके नेता बनने के चांस बढ़ जाते हैं। इसी नेतागीरी के चक्कर में मैं जोश में सबसे आगे जाकर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए दौड़ पड़ा। सामने एक सरकारी बस, पोस्ट ऑफिस दिख रहा था, सोचा अब तो हीरो बन ही गए। इससे पहले की किसी भी चीज को हाथ लगते सामने से अचानक कई सारे पुलिस वाले प्रकट हो गए। घबरा कर कुछ समझ में नहीं आया, इससे पहले कि हम भाग पाते पुलिस वालों ने हमें घेर लिया। हमारे भागने के सारे के सारे प्रयास धरे के धरे दिखने लगे। हम न तो भाग पा रहे थे न ही बचाव के लिए चिल्ला पा रहे थे। पुलिस वालों ने हमें पकड़ कर हिलाना-डुलना शुरू कर दिया। मैं घबरा कर कुछ करता इससे पहले मेरी नींद खुल गई, देखा मेरा छोटा भाई मुझे जगा रहा है।
जागने पर ख़ुद को हक्का बक्का पाया। जब ख़ुद को सामान्य स्थिति में पाया तो सोचने लगा कि हमारे देश में हो भी तो यही रहा है। किसी भी बात पर कोई भी हड़ताल करना शुरू कर देता है। बिना यह देखे कि किसी तरह की तोड़-फोड़ समस्या का हल नहीं वल्कि समस्या को और बढ़ाना है। हम बिना इस बात की परवाह किए कि हमारे द्वारा नुकसान करी जा रही संपत्ति हमारी ही है, हम तोड़-फोड़ करते रहते हैं। सर झटक कर बिस्तर से उठ बैठा और सोचने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि फ़िर से सपने में "नव ब्लोगर संघर्ष मोर्चा" ट्रेन रोकने को निकल पड़े।

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