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07 May 2017

सख्त कदम उठाये सरकार घाटी में

पाकिस्तान के जन्म के साथ ही जम्मू-कश्मीर का विवाद शुरू हो गया था. आज तक आमजन के समझ के परे है कि देश के लिए पाकिस्तान के अलावा मुख्य समस्या क्या है, जम्मू-कश्मीर या फिर जम्मू-कश्मीर के निवासी? इस समस्या को सरकारों ने और भी जटिल बनाया है. देश की आज़ादी के तुरंत बाद जब रियासतों के विलय की प्रक्रिया चल रही थी, उस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने अपने लिए समस्या को पैदा कर लिया था. संभव है कि तत्कालीन परिस्थितियों में ऐसा करना उपयुक्त रहा हो पर उसके सन्दर्भ में भी कभी भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसा क्यों किया गया. उसके बाद से जो स्थितियाँ वहाँ बनती आई हैं वे किसी से छिपी नहीं हैं. पाकिस्तान ने अपने जन्म के साथ ही उत्पात मचाना शुरू कर दिया था. शांति-अहिंसा-समझौतों की राह पर चलने वाले तत्कालीन लोगों की नीतियों के कारण देश का एक हिस्सा आजतक पाकिस्तान के कब्जे में है. इतने के बाद भी पाकिस्तान की नीयत में बदलाव नहीं आया. उसकी तरफ से आतंकवाद को पोषित किया जाता रहा और किसी समय खुशहाल घाटी में हिंसा, अत्याचार, बमों, बंदूकों के शोर उभरने लगे. वहाँ के हिन्दू नागरिकों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा. महिलाओं, बच्चियों के साथ शारीरिक अमानवीयता की पराकाष्ठा दिखाई गई. ज़ुल्मों-सितम के चलते वहाँ के हिन्दू नागरिकों को घाटी से पलायन करना पड़ा. आतंक-प्रिय लोगों को इसके बाद भी चैन नहीं मिला. आये दिन उनके द्वारा घाटी में आतंक को विस्तार दिया जाता रहा.  


समय बदलने के साथ देश में केंद्र सरकारें बदलती रही किन्तु जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति नीतियों में बदलाव देखने को नहीं मिले. केंद्र सरकार में परिवर्तन हुआ और देश की जनता ने भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता सौंपी. इसके पीछे कहीं न कहीं इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध वातावरण का बनना, पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने की संकल्पना काम कर रही थी. इस अवधारणा के बीच घाटी में हुए विधानसभा चुनावों ने भी भाजपा के लिए राह निर्मित की. लगातार राज्य की सत्ता से बाहर बनी भाजपा को वर्तमान में राज्य सरकार में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ. देश में गठबंधन सरकार के विरोध भी किया गया क्योंकि बहुसंख्यक लोगों का मानना था कि अलगाववादियों का समर्थन करने वालों के साथ भाजपा को सरकार नहीं बनानी थी. इसके बाद भी बहुसंख्यक लोग इसके पक्षधर रहे. उनका मानना था कि कम से कम इस बहाने राज्य सरकार के सञ्चालन में, वहाँ की स्थानीय व्यवस्था में भाजपा का हस्तक्षेप होने से जम्मू-कश्मीर में चले आ रहे अलगाववादी कदमों में कुछ लगाम लगे. सरकार बनने के बाद भी सकारात्मक परिवर्तन देखने को नहीं मिले बल्कि आये दिन उत्पात की, हिंसा की, उपद्रव की घटनाएँ और तेज होने लगीं. शैक्षिक संस्थान में देश विरोधी नारे लगाये गए. भारत माता की जय कहने वालों का उत्पीड़न किया गया. सेना को पत्थरों की मार सहनी पड़ी. सैनिकों को दुर्वयवहार सहना पड़ा. पाकिस्तान की तरफ से हमलों की संख्या में वृद्धि होने लगी. वीर शहीदों के पार्थिव शवों के साथ भी हैवानियत दिखाई गई. केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बाद भी किसी दिन नहीं लगा कि जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए कोई प्रयास किये जा रहे हों. 


यहाँ केंद्र सरकार को और राज्य सरकार में गठबंधन करती भाजपा को सोचना होगा कि देश की तरफ से, घाटी की तरफ से उनको बहुमत मिलने के पीछे कहीं न कहीं उनका वो एजेंडा था जो धारा 370 को हटाने की बात करता था. कहीं न कहीं वो बयानबाजी थी जो पाकिस्तान को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए होती थी. ऐसे में जनसमुदाय में आक्रोश होना स्वाभाविक है. अब सरकार को या कहें कि भाजपा को विशेष रूप से इस तरफ ध्यान देने की जरूरत है. घाटी के अलगाववादियों के साथ सख्ती से पेश आने की आवश्यकता है. इसके अलावा एक बात और विशेष रूप से केंद्र और राज्य सरकार को अमल में लानी होगी वो है वहाँ की स्थानीय पुलिस का हस्तक्षेप. स्पष्ट सी बात है कि सेना केंद्र के आदेशों के इंतज़ार में बनी रहती है और स्थानीय पुलिस को वहाँ के स्थानीय लोगों के समर्थन के साथ-साथ राज्य सरकार का संरक्षण मिल हुआ है. यही कारण है कि वहाँ आये दिन पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने लगते हैं. देश विरोधी नारेबाजी की जाने लगती है. घाटी में शांति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक कदमों में प्राथमिकता के आधार पर स्थानीय पुलिस के स्थान पर सेना को वरीयता दी जाये. इसके अलावा किसी भी कीमत पर अलगाववादियों को मिलने वाली तमाम सुविधाओं को समाप्त कर उन पर सख्त कार्यवाही की जाये. सेना को सीमापार से घुसपैठ रोकने, सीमापार से आते आतंकियों और हमलों को रोकने, पाकिस्तानी सेना द्वारा की जा रही कार्यवाही का जवाब देने को पर्याप्त रूप से आज़ादी दी जानी चाहिए. बातचीत एक रास्ता हो सकता है मगर सभी समस्याओं का समाधान बातचीत ही नहीं है. समझने-सोचने वाली बात है कि राज्य में भाजपा सरकार के गठबंधन के बाद ही अचानक से पत्थरबाजी की, आतंकी हमलों की, पाकिस्तानी सेना के हमलों की घटनाएँ क्यों बढ़ गईं? 

1 comment:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बुद्ध पूर्णिमा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।