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12 जुलाई 2026

वृक्षारोपण में गणित

आज शाम एक ऐसे परिचित मिले जो बात-बात पर कटाक्ष करने की आदत से भरे-पूरे हैं. मिलते ही बिलबिलाये कि आज तुम्हारे कॉलेज में कितनी संख्या में पौधारोपण हुआ?

 

हम समझ रहे थे कि ये सवाल उनके मुँह से काहे निकल भागा है. बिना रुके अगले ही पल उनके मुँह पर ही जवाब दे मारा कि सत्तर हजार.

 

जवाब सुनते ही महोदय एकदम सन्न रह गए. इसकी भी एक वजह ये थी कि वे लालबुझक्कड़ के चिलगोजों में शामिल हैं. उनकी हालत देखकर और उनको किसी आपदा में जाने के पहले ही बताया कि हम ठहरे विज्ञान-गणित के विद्यार्थी.... बड़े से बड़े सवाल 'मान' लेने भर से निपटा दिए, बड़ी से बड़ी प्रमेय भी इसी 'मान' ने हल करवा दीं, सो यहाँ भी मान लिया कि एक गड्ढा बराबर एक हजार पौधे. इस हिसाब से सत्तर गड्ढों में सत्तर हजार पौधे लगे.

 

कुछ खिसियाकर इधर-उधर की पटकना शुरू किया उन्होंने तो कहा कि ज्यादा न बकबकाओ.... न तो कोष्ठक में बंद करके शून्य से गुणा कर देंगे.

 

बेचारे खी-खी करके भागते नजर आये.

 


22 जून 2026

बच्चों के जीवन से खिलवाड़ बंद हो

लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर की आगजनी की घटना में एक दर्जन से अधिक बच्चों की असमय मृत्यु हो गई. इस घटना से भले ही एकबारगी व्यवस्था का लचर होना सामने आया हो मगर हम अभिभावकों का भी असंवेदित होना सामने आया है. ये सच है और ऐसा सच है जो बहुत ही कड़वा है. असल में अब ऐसा माहौल बनता  जा रहा है या कहें कि हम सबकी आदत हो गई है कि किसी भी दुर्घटना के लिए सीधे-सीधे शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताकर हम स्वयं दोषी होने के पाप से मुक्त होने की कोशिश करने लगते हैं. ऐसी हर दुर्घटना के बाद दोषियों को चिन्हित किया जाने लगता है; सम्बंधित को गैर-कानूनी बताया जाने लगता है; अधिकारियों की अक्षमता की पहचान की जाने लगती है मगर आगे के लिए हम कोई सबक नहीं लेते हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सभी ने यह मान लिया है कि समाज में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ तंत्र ही दोषी है, व्यवस्था ही जिम्मेदार है. बच्चों से सम्बंधित किसी भी दुर्घटना के बाद भी अभिभावकों में किसी भी तरह की सजगता उपजती नहीं दिखती है, ऐसा क्यों?   

 

यदि इसी आगजनी की बात करें तो अभिभावकों ने अपने ही बच्चों को वहाँ प्रवेश दिलाया था. वे किसी दूसरे ग्रह से आये बच्चों को लेकर वहाँ नहीं गए थे, ऐसे में क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि सम्बंधित संस्थान की स्थिति का आकलन कर लेते? महत्त्वाकांक्षा की आड़ में हमने अपनी ही बच्चों के जीवन से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है. उनके उज्जवल भविष्य बनाने के लिए कोचिंग सेंटर्स को एकमात्र उपाय मानते हुए हम सभी एक तरह की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम रकम चुकाना ही उनका कर्तव्य बन गया है. कोचिंग में प्रवेश के नाम पर बच्चों को वहाँ भेजना भी एकमात्र उद्देश्य रह गया है. एकबारगी भी संभवतः किसी अभिभावक द्वारा कोचिंग संचालकों से वहाँ के सुरक्षा मानकों को लेकर कोई सवाल नहीं किया जाता है. कोचिंग में सुरक्षा सम्बन्धी क्या उपाय किये गए हैं, इस बारे में भी कोई पूछताछ नहीं करने की मानसिकता बनी हुई है. दिमाग में एक विचार गहराई से बिठा लिया गया है कि कोचिंग संचालक से ज्यादा सवाल-जवाब उनके बच्चे को वहाँ से बाहर का रास्ता दिखा देगा. ऐसी सोच के चलते लोग अकारण ही बच्चों को असुरक्षित माहौल में धकेल देते हैं.

 


आज जिस तरह का माहौल चारों तरफ दिखता है
, उसमें बच्चों के घर से बाहर निकलते ही हम अभिभावकों के मन में तमाम तरह की अनिश्चिन्ताओं, आशंकाओं का बनना शुरू हो जाता है. आये दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में दुर्घटनाओं का होना देख भी रहे हैं. ऐसे में क्या अभिभावकों की कोई जिम्मेदारी नहीं? कोचिंग सेंटर में, किसी संस्था में प्रवेश करवा देना, मोटी फीस जमा कर देना, बच्चों के आवागमन के लिए स्कूटी, गाड़ी आदि खरीदवा देना आदि से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती है. यह समझना चाहिए कि बच्चे आपके ही हैं, कहीं किसी पेड़ से तोड़कर नहीं लाये हैं, कहीं किसी दूसरे ग्रह से नहीं उतरे हैं, तब उनके प्रति, उनकी सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों? कुछ ऐसा ही बच्चों की किसी भी परीक्षा के लिए देरी को लेकर भी है. यदि अभिभावकों को लगता है कि सम्बंधित परीक्षा उनके बच्चे के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, उसके कैरियर के लिए महत्त्वपूर्ण है तो समय का ध्यान करके निकलना चाहिए.

 

शासन-प्रशासन को, व्यवस्था को, तंत्र को सुधरना नहीं है; हम-आपके हाथ में नहीं है कि उसे सुधार सकें तो कम से कम खुद ही सुधर जाएँ. अपनी हठधर्मिता में, शासन-व्यवस्था को दोषी ठहराने की मानसिकता में कम से कम अपने बच्चों की ज़िन्दगी से, उनके भविष्य से आप लोग ही, अभिभावक लोग ही खिलवाड़ करना बंद कर दीजिये. लखनऊ कोचिंग की आज की दुर्घटना और इससे पहले भी हुई अनेकानेक दुर्घटनाओं से हम सबको ही सबक सीखने की आवश्यकता है. इन दुर्घटनाओं के बाद कम से कम हम लोग ही जागें क्योंकि तंत्र तो फिर सो जायेगा. अपने बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से मजबूत बनायें. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने की, संयम से उससे निपटने की राह बनाने की तरकीब सिखाएँ. असामान्य स्थिति में न केवल स्वयं को बचाने की बल्कि अपने साथियों को भी निकालने की कला सिखानी होगी. समय बहुत ही निरंकुश है और उसकी आपदाओं से बचने का रास्ता हमें ही बनाना होगा, अपने बच्चों को सिखाना होगा.

 

ऐसी किसी भी दुर्घटना के लिए सिर्फ व्यवस्था को दोषी बता देना कहीं न कहीं हम लोगों का अपने आपको दोष-मुक्त करने जैसा है. यह घटना कोई पहली घटना नहीं है, इससे पूर्व भी अनेक घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनमें हमारे नौनिहालों ने असमय मौत को गले लगा लिया. कम से कम अब तो हम लोगों को जागना होगा. प्रशासन के बजाय, व्यवस्था के बजाय हम लोगों को ही सजग-सचेत होना पड़ेगा. तंत्र तो अपनी खाना-पूरी करके फिर से अपनी उसी चाल में, उसी ढर्रे पर लग जायेगा मगर हम लोगों को अपने बच्चों के जीवन को, उन्के भविष्य को बचाने के लिए जागना ही होगा. 

31 मई 2026

आवश्यकता नीयत सुधारने की है

देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहने वाली वायु सेना को अब परीक्षार्थियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का जिम्मा भी सौंपा गया है. नीट परीक्षा प्रश्न-पत्र के लीक हो जाने के बाद पुनः आयोजित होने वाली नीट परीक्षा को पूर्णतः सुरक्षित बनाने के लिए सरकार भारतीय वायु सेना की मदद लेने पर विचार कर रही है. इस बार परीक्षा प्रश्नपत्रों को सामान्य परिवहन के स्थान पर वायु सेना के विमानों से केन्द्रों तक सुरक्षित ढंग से एयरलिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसे कुछ लोग भले ही परीक्षा के प्रति गम्भीरता के रूप में देखें किन्तु प्रथम दृष्टया यह हास्यास्पद प्रस्ताव ही कहा जाना चाहिए. समूची प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी तंत्र, नागरिकों के लिए यह एक तरह का शर्मनाक बिन्दु है जबकि देश की सुरक्षा करने वाली सेना अब परीक्षा प्रश्नपत्रों को इधर-उधर ले जाने का काम करेगी.

 

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के, शिक्षा सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का सार्वजनिक हो जाना, उनकी गोपनीयता उजागर हो जाना एक आम चलन के रूप में उभर कर सामने आया है. किसी संक्रामक बीमारी की तरह यह एक परीक्षा से होते हुए दूसरी परीक्षा के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए बढ़ती दिखने लगी है. परीक्षा प्रश्नपत्रों को सार्वजनिक करने का कार्य दो-चार व्यक्तियों द्वारा नहीं होता है बल्कि इसके पीछे एक तरह का सिंडिकेट काम करता है. भले ही किसी परीक्षा प्रश्नपत्र के सार्वजनिक होने की घटना को प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी कहा जाये मगर सोचने वाली बात ये है कि क्या इस तरह के काम बिना किसी संरक्षण के संभव हो सकते हैं? प्रश्नपत्रों के बनने से लेकर उनके प्रकाशन तक, उनको व्यवस्थित करने से लेकर परीक्षा केन्द्रों तक पहुँचाने तक का कार्य नितांत गोपनीयता के साथ पूरा किया जाता है. ऐसे में कैसे सम्भव है कि किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण बिना प्रश्नपत्र बाजार में बिकते दिखाई देने लगें. प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा आयोजन तक की लम्बी प्रक्रिया में जरा सी चूक से परीक्षा आयोजित कराने वाली बड़ी-बड़ी एजेंसियों की गोपनीयता पर भले ही सवाल उठ रहे हों किन्तु ऐसा कार्य तंत्र के भीतर बैठे लोगों की सहायता के बिना हो ही नहीं सकता है. इस तरह के कृत्य करने वाले माफियाओं को विभिन्न प्रकार का राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण मिलता है.

 



इस पूरे संकट के उभरने के बाद कुछ निश्चित से कदम उठाये जाने लगते हैं. व्यवस्थागत सुधार के बजाय राजनीतिक खेल शुरू हो जाता है. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगता है. विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार बताता है तो सत्तापक्ष इसे विरोधियों की साजिश कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है. सत्तापक्ष इसके साथ-साथ धरपकड़ करने की अपनी कार्यवाहियों को भी अंजाम देता रहता है. चार-छह छोटी मछली कहे जाने वाले व्यक्ति गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, पूछताछ का प्रक्रम शुरू हो जाता है और फिर सालों-साल चलने वाली कानूनी प्रक्रिया की आड़ में लोग असली मुद्दा ही भूल जाते हैं. इन सबके बीच राजनीतिक असंवेदनशीलता यह होती है कि ऐसे मामलों को चुनावी रैलियों में, भाषणों में अपने प्रचार का माध्यम बना लिया जाता है मगर इस समस्या के स्थायी समाधान पर कोई भी चर्चा नहीं करता है.

 

इस तरह के घटनाक्रमों में यदि सबसे ज्यादा नुकसान में कोई रहता है तो वह आम परीक्षार्थी होता है, उसका परिवार होता है. दिन-रात की तैयारी के बाद पेपर लीक होना, पुनः पेपर देने के दौरान आशंकित बने रहना परीक्षार्थियों के भविष्य को भी धुंधलके में रखता है. एक आम परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए अपना पेट काटकर उसे तैयारी करवाता है. कई परिवार तो अपनी जमीन गिरवी रख कर्ज लेते हैं. प्रश्नपत्र सार्वजनिक होने के कारण परीक्षा रद्द होने का अर्थ समय की बर्बादी मात्र नहीं बल्कि परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ का पड़ना होता है. अनेक परीक्षार्थी मानसिक तनाव में आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. आज इक्कीसवीं सदी में पहुँच जाने के बाद भी, तकनीक के लगातार विकास करने के बाद भी, उपग्रहों के द्वारा पल-पल की खबर रखने के बाद भी आज के युवाओं को सुरक्षित और पारदर्शी माहौल देने में नाकामी हाथ लग रही है.

 

तकनीक के इस दौर में किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित न रख पाना हमारी तकनीकी और प्रशासनिक तंत्र  की बड़ी विफलता तो है ही साथ ही नागरिक अनुशासन की भी असफलता है. सोचने वाली बात ये है कि प्रश्नपत्र सार्वजनिक करने वाला सिंडिकेट ऐसा काम किसके लिए करता है? क्या ऐसा काम किसी राजनेता को चुनाव जिताने के लिए किया जाता है? क्या प्रश्नपत्र लीक किये जाने के पश्चात् अर्थव्यवस्था में तेजी आ जाती है? क्या इससे विदेश-नीति में किसी तरह का लाभ हो जाता है? प्रश्नपत्र सार्वजनिक करके का कार्य उन्हीं परीक्षार्थियों के लिए किया जाता है जिनको परीक्षा देनी होती है. प्रश्नपत्र भी उन्हीं के हिस्से में आता है जिनके अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम धनराशि सम्बंधित सिंडिकेट तक पहुँचाई गई होती है. ऐसे में यदि राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था को दोषी माना जाता है तो नागरिकों को भी पूर्णतः दोष-मुक्त नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में बाहरी आवरण को मजबूत और तकनीकयुक्त बनाने से कहीं ज्यादा कारगर होगा तंत्र के भीतर की व्यवस्था को मजबूत करना, उस पर सशक्त-सजग निगाह रखना. देखा जाये तो जितनी बड़ी समस्या परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के सार्वजनिक होने की है, परीक्षाओं की गोपनीयता भंग होने की है उससे बड़ी समस्या उस नीयत की कमी का होना है जो भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना चाहती है. राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक रूप से कहीं से भी अब जिम्मेदारी भरा ऐसा प्रयास नहीं दिखता जो भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता हो.

 

अब केवल कड़े बयानों, कुछ छोटी-छोटी गिरफ्तारियों से काम नहीं चलने वाला. अब राजनैतिक-प्रशासनिक-सामाजिक तंत्र में बैठे ऐसे लोगों को चिन्हित किये जाने की, कड़ी सजा देने की आवश्यकता है जो परीक्षाओं की गोपनीयता के साथ-साथ परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.


30 मई 2026

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना

शांत दिमाग से सोचना और विचार करना....

 

क्या कभी आपके घर कोई डॉक्टर आया, जिसने कहा हो कि आपके घर में कोई गर्भवती महिला है, जिसका अल्ट्रासाउंड करके वो बता देगा कि गर्भ में लड़का है या लड़की?

 

क्या कभी आपके घर में किसी परीक्षा से सबंधित कोई कर्मचारी आया है जिसने कहा हो कि सम्बंधित परीक्षा का पेपर इतने रुपये में मिल रहा है?

 

क्या आपके घर कभी यूनिवर्सिटी से कोई व्यक्ति आया है जिसने कहा हो कि वो आपकी संतानों के नंबर बढ़वा देगा?

 

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पिछले दो दशकों से अधिक के अध्यापन अनुभव में एक बात स्पष्ट रूप से देखने को मिली कि लगभग हर साल कुछ न कुछ अभिभावक आते हैं अपने बच्चों की सिफारिश लेकर. कुछ परीक्षा के दौरान ही 'कुछ देख लेने' का इरादा लेकर आते हैं; कुछ आते हैं जो परीक्षाओं बाद 'कुछ हो सकता है क्या?' के विचार के साथ आते हैं; कुछ वायवा-प्रैक्टिकल के समय अपने मंतव्य के साथ आते हैं.  ठीक ऐसी ही स्थिति प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान भी देखने को मिलती है. परीक्षा तिथि के पहले ही सब सेट कर लेने की मानसिकता में अभिभावक भटकने लगते हैं. लाखों रुपये में जो पेपर बेचे जा रहे हैं, उनके सन्दर्भ में विचार करिए कि कितने परीक्षार्थी सीधे तौर पर लाखों रुपये का सौदा करते हैं? बहुतायत के अभिभावक ही सामने आते हैं.

 

किसी भी सरकार को, किसी भी व्यवस्था को दोष देने के पहले हम सबको अपने ही गिरेबान में झाँकना चाहिए. कोई सीधे हमारे पास नहीं आता, हम भी भ्रष्ट बनने को आतुर रहते हैं और उस तरफ जाते हैं. सिस्टम में लगे लोगों को न इस व्यवस्था से मतलब होता है और न ही किसी परीक्षार्थी के भविष्य से. वे भौतिकतावाद के बाजार में उत्पाद लेकर खड़े हैं, जहाँ अभिभावक ग्राहक  के रूप में उपलब्ध हैं. कल को यही ग्राहक समाप्त हो जाएँ तो ये भ्रष्ट व्यवस्था किसे अपने पेपर बेचेगी? यहाँ वही बात सामने आती है कि हम सब चाहते हैं कि क्रांति हो, आन्दोलन हो, व्यवस्था बदले किन्तु इनके लिए कोई शहीद, कोई बलिदानी पैदा हो तो पड़ोस में हो. हमारी संतान कुछ बने, कहीं से उच्च शिक्षा ले मगर व्यवस्था बदलने के लिए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई संतान आगे बढे तो वो पड़ोस की हो.

 

अपनी सोच बदलिए साहब, बिना सोच बदले आप बस अपने मन की भड़ास निकालते रहेंगे और अगले ही पल अवसर मिलते ही अपने बच्चे के लिए गुहार लगायेंगे 'कुछ हो सकता है क्या?'


26 मई 2026

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर शोर मचाने वालो

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर अनावश्यक शोर मचाने वालो, क्या तुमको याद है कि इससे पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब बढ़ाई गई थीं? नहीं पता होगा, क्योंकि तुम लोगों को शोर मचाने से मतलब है न कि कुछ तथ्यात्मक खोजबीन करने से.

 

6 अप्रैल 2022 को पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि हुई थी. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने की वजह से मार्च-अप्रैल 2022 में लगातार दाम बढ़ाए गए थे और 6 अप्रैल 2022 को इस वृद्धि का आखिरी दिन था. इसके बाद दैनिक कीमतों में बदलाव पर लंबी रोक लग गई थी.

 



मई 2022 में केन्द्र सरकार ने उत्पाद शुल्क को कम किया जिससे पेट्रोल आठ रुपये और डीजल छह रुपये प्रति लीटर सस्ता हुआ. (वैसे ये याद नहीं होगा चिल्ला-चोट मचाने वालों को.) मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले केन्द्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दामों में दो रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी. (ये याद है? नहीं न!) इसके बाद अब मई 2026 में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि हुई है. पिछले चार सालों में स्थिर कीमतों में तुम लोगों ने जरा भी साँस न ली. कुछ दिन अपनी साँस को उसी तरह स्थिर किये रहो, वैश्विक संकट दूर होते ही तुम लोग फिर से साँस लेने लगना.


05 मई 2026

जनादेश, व्यक्तिगत अहंकार और संविधान

भारतीय संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनादेश को मान्यता देती है तो जनप्रतिनिधियों से भी आदर्श स्थापन की अपेक्षा करती है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल विधानसभा चुनाव हार चुका है और भाजपा बड़े दल के रूप में सामने आई है. चुनाव परिणामों की इस स्थिति में सामान्य कदम सत्ताधारी दल के मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देना होता है किन्तु पश्चिम बंगाल में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ संविधान से भी मजाक करने जैसा है. सामान्य रूप में इसे भले ही एक राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा हो किन्तु ऐसा नहीं है. भारतीय संविधान ऐसी स्थितियों में भी सशक्त प्रावधानों के साथ जनादेश के विरुद्ध सत्ता हथियाने के कुत्सित इरादों को रोकता है.

 

सबसे पहले यहाँ संविधान के अनुच्छेद 172(1) की उस शक्ति को समझना होगा, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष के लिए होता है. इस पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सम्बंधित विधानसभा का विघटन हो जाता है. यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है. ऐसे में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही इस्तीफ़ा न देने की जिद पर अड़ी हों मगर उनको ये समझना होगा कि वर्तमान विधानसभा के संवैधानिक रूप से अस्तित्वहीन हो जाने पर उनका अस्तित्व क्या होगा? विधानसभा के अस्तित्व में न रहने की स्थिति में उसके आधार पर नियुक्त मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद का कानूनी एवं संवैधानिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. सदन के अस्तित्व में न रहने पर किसी व्यक्ति का अपने पद का बने रहना संवैधानिक रूप से असंभव है.

 


इस संवैधानिक अनुच्छेद के होने के साथ-साथ विवाद की ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका प्रमुख हो जाती है. अनुच्छेद 164(1) के अन्तर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री भी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर कार्य करता है. सामान्य स्थितियों में मुख्यमंत्री का अपने पद पर बने रहना सदन में उसके प्रति बहुमत से निर्धारित होता है किन्तु चुनाव जैसी स्थितियों में इसका निर्धारण जनादेश के माध्यम से होता है. पश्चिम बंगाल में स्पष्ट है कि वर्तमान सत्ताधारी दल पराजित हो चुका है, ऐसे में वहाँ राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ सक्रिय हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ तथा इसके बाद के अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए लेकिन जब नई विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुके हों तो नया जनादेश पिछले किसी भी बहुमत पर भारी पड़ता है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 11 मार्च 1994 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. यद्यपि इस मामले का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकना और सदन के पटल पर बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाना था तथापि इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनादेश ही सरकार की वैधता का अंतिम स्रोत है. जैसे ही नई विधानसभा के चुनाव होते हैं, पुरानी विधानसभा और उसके विश्वास का आधार समाप्त हो जाता है. स्पष्ट है कि ममता बनर्जी वर्तमान में अपने मुख्यमंत्रित्व के अस्तित्व में नहीं हैं. वैसे भी संवैधानिक रूप से चुनाव परिणामों के पश्चात निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा अनिवार्य कदम नहीं बल्कि यह एक लोकतांत्रिक शिष्टाचार और परम्परा है. इसके उल्लंघन होने पर राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री को पदमुक्त करने का, बर्खास्त करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. ऐसा कदम पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ममता बनर्जी के सन्दर्भ में भी उठा सकते हैं क्योंकि ममता बनर्जी के पास अब न तो जनादेश है और न ही सदन का अस्तित्व.

 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के अन्तर्गत चुनाव आयोग नई विधानसभा के गठन के लिए विधिवत गठित अधिसूचना जारी करता है. अधिसूचना के जारी होते ही नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है. अब चूँकि पश्चिम बंगाल में इसी 07 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और अगले दिन राज्य में वैध सरकार न होने की स्थिति में राज्यपाल ऐसा कदम उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने नई विधानसभा के गठन हेतु आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. यह अधिसूचना राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है जिसके पश्चात नई सरकार के गठन तथा शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ममता बनर्जी भले ही पद न छोड़ रही हों किन्तु अब राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वे चुनाव आयोग की अधिसूचना प्राप्त हो जाने के बाद भाजपा के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. राज्यपाल अनुच्छेद 163 और 164 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विजयी दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण लेते ही पूर्व मुख्यमंत्री का दावा कानूनी रूप से शून्य हो जाएगा. प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी राज्यपाल द्वारा नई सरकार के गठन का आदेश देते ही राज्य की सम्पूर्ण नौकरशाही नए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हो जाती है. निवर्तमान मुख्यमंत्री का कोई भी आदेश अवैध माना जाएगा. स्पष्ट है कि राज्यपाल का आदेश स्वतः ही ममता बनर्जी की जिद को अस्तित्वहीन कर देगी.

 

भारतीय लोकतंत्र में जनादेश सर्वोच्च है. यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी वे केवल एक कब्जेधारी की स्थिति में होंगी न कि संवैधानिक शासक की. संविधान ने राज्यपाल को अनेक विवेकाधीन अधिकार दिए हैं जिनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी व्यक्तिगत अड़ियल रुख को दूर किया जा सके. विधानसभा का पाँच वर्ष पूरा होना ममता बनर्जी के अड़ियलपन के ताबूत में अंतिम संवैधानिक कील होगा. इसके बाद भाजपा का सरकार बनाना न केवल राजनीतिक वास्तविकता होगी बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कदम भी.


15 अप्रैल 2026

सोशल मीडिया उपयोग का दबाव क्यों?

सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को विभिन्न कार्यक्रम संपन्न करवाए जाने सम्बन्धी प्रस्ताव भेजा जाना समझ आता है. इन कार्यक्रमों की रिपोर्ट बनाना, उसको जियो-टैगिंग फोटो-वीडियो के साथ सम्बंधित कार्यालय को भेजना भी समझ आता है. इस समझ आने वाली स्थिति के बीच समझ ना आने वाली स्थिति ये है कि इन कार्यक्रमों की फोटो, वीडियो को सोशल साइट्स (फेसबुक,  इन्स्टाग्राम, यूट्यूब आदि) पर अपलोड करके उसकी लिंक भी उपलब्ध करवाना होता है. आखिर ऐसा क्यों? ये सोशल साइट्स न तो आधिकारिक रूप से सरकार के अंग हैं, न ही इनको किसी भी प्राध्यापक, संस्थान द्वारा उपयोग में लाना जाना अनिवार्य बनाया गया है.

 

सरकार की इस तरह की अनावश्यक गतिविधि ही किसी भी संस्थान के तानाशाह प्रवृत्ति की मानसिकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है. यही कारण है कि विश्वविद्यालय स्तर पर, महाविद्यालय स्तर पर, विभागीय स्तर पर व्हाट्सएप ग्रुप की भरमार है. इस तरह के जी के जंजाल से कभी मुक्ति मिलेगी या फिर ये जंजाल किसी दिन सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था की जान लेकर ही मानेगा?


14 मार्च 2026

सहयोग, प्रेम-भाव में कमी भी एक समस्या है

इसे वही समझ सकते हैं जो संयुक्त परिवार में रहते हैं या रहे हैं... या फिर जिनके घर में पर्व-त्यौहार-किसी आयोजन में समूचे नाते-रिश्तेदार जुटते हैं... एकसाथ एक ही घर में रहते हैं....

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सोचिए एक पल को कि घर-परिवार के सब लोग, नाते-रिश्तेदार एकसाथ किसी आयोजन में मिले. पंद्रह-बीस लोगों से घर में चहल-पहल मची है, हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है. ऐसे में भोजन के समय चार-चार, पाँच-पाँच लोग सहजता से खाना खाते जा रहे हैं. रसोई में घर की महिलाएँ हँसी-मजाक के साथ सभी को सहजता के साथ भोजन उपलब्ध कराती जा रहीं हैं.

 

किसी दिन इस हँसी-मजाक में, हल्ला-गुल्ला में परिवार में जुटे सभी लोग एकसाथ भोजन करने बैठ जाते हैं, एक-दूसरे के साथ भोजन करने की ललक में. ऐसा होता है बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना किसी पूर्व जानकारी के... अचानक से ही. चार-छह लगी थालियों में ही परिवार के कई लोग एकसाथ बैठकर मिलजुल कर भोजन करने लगते हैं. किसी की थाली से सब्जी, किसी की थाली से दाल, किसी की थाली से अचार, किसी की थाली से रोटी, किसी की थाली से रायता.... अब फिर सोचिए कि क्या स्थिति उत्पन्न होगी? भोजन करने वाले तो हँसी-मजाक करते हुए बिना कुछ परवाह किये खाना खाने में लगे हैं तभी अचानक से रसोई से रोटियाँ आने की गति रुक जाती है या कहें कि रोटियों का आना रुक सा जाता है. 

 

ऐसा नहीं है कि रसोई में घर की महिलाएँ रोटियाँ नहीं बना रहीं. ऐसा भी नहीं कि आटा समाप्त हो गया हो. ऐसा भी नहीं कि किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न हो गई हो. इसके बाद भी रोटियों के आने की गति थम गई, रोटियाँ एक-दो, एक-दो करके आने लगीं, बाहर खाने के लिए जुटे सभी लोगों को रोटियों की उपलब्धता सहजता से नहीं हो पा रही. किसी को आधी रोटी मिल रही, किसी को उसी में से एक कौर मिल  रहा, कोई किसी की थाली में आने के पहले ही रोटी का कौर उसके हाथ से खींच ले रहा. इन सबके बीच कोई रोष नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई गाली-गलौज नहीं बल्कि हँसी-मजाक और बढ़ने लगता है, आपसी प्रेम और नजर आने लगता है.

 

क्यों नहीं कोई व्यक्ति बाहर सड़क पर जाकर कूड़े के ढेर में रोटी तलाशने लगता है? क्यों नहीं रोटी का एक कौर भी न हासिल कर पाने वाला व्यक्ति घर की महिलाओं की बुराई करने लगता है? क्यों नहीं घर का कोई सदस्य नाली से गंदगी निकाल कर रोटी की जगह खाने लगता है? और भी बहुत कुछ क्यों नहीं होता है? फिर सोचिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परिवार के सभी सदस्यों में आपस में प्रेम-भाव है, एक-दूसरे के प्रति सम्मान है, एक-दूसरे की स्थिति का भान है. यही नहीं है हम सबमें. समाज में व्यक्तिगत रूप से जो है वो पहले हमारे लिए है. समाज में जो है वो पहले हमें मिले. इस तरह की मानसिकता से न समाज का भला होता है और न ही देश का. कुछ ऐसा ही इस समय दिख रहा है. घर में एक सिलेंडर भरा रखा है मगर एक और मिल जाए. बाकी का क्या ही लिखें. जो युद्ध की माँग करते हैं, सीमा पर जान देने का दम भरते हैं, वे दो-चार रोज की स्थिति में अपनी ही गैस निकाल बैठे.


26 फ़रवरी 2026

अनावश्यक ज्ञान बाँटते अज्ञानी-जन

 ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनसे अपना घर न सँभलता है; घर की किसी योजना में उनकी कोई राय नहीं ली जाती है; जिनका काम न केवल घर में बल्कि आस-पड़ोस में भी सिर्फ बकैती करना हो, वे लोग भी विदेश-नीति पर, वैश्विक सम्बन्धों पर, दक्षिण-एशिया के विविध बिन्दुओं पर अपनी राय दे रहे हैं. कई लोग विदेश नीति को असफल बताने में लगे हैं. हास्यास्पद ये भी है कि जो व्यक्ति विगत दो दशक से अधिक समय से संवैधानिक पद पर है, उसके निर्णयों पर, उसके कार्यों पर वे लोग सलाह दे रहे हैं, जिनके हिस्से में किसी तरह का सम्मान आज तक नहीं आया है.

 



यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि जिस UGC का विनियम 2026 का सहारा लेकर अपने लोग ही अब पीठ में छुरा भोंकने की स्थिति में आ गए हैं, आस्तीन का साँप बने बैठे हैं, वे सहज भाव में UGC के विनियम 2012 को पढ़ लें. ध्यान देने की आवश्यकता है कि अमित शाह के द्वारा अर्बन नक्सलवाद का सफाया करने वाले कदम उठाये जाने के बाद से ही क्यों इस तरह के मुद्दे उभर कर सामने आने लगे? इसका एक सीधा सा उत्तर है कि नक्सलवाद से, वामपंथ से जुड़े लोगों को भली-भांति मालूम है कि मोदी की टीम में ऐसे बकबकी करने वालों की संख्या ज्यादा ही है. वे एक बार में ही बहकने वाली मुद्रा में आ जाते हैं, उनको बहकाया जाना आसान है.

 

बहरहाल, बहेलिया (वामपंथ, अर्बन नक्सलवाद) ने जाल बिछाया और बकवास करने वाले कबूतर उसमें फँस गए. अब उन फँसे कबूतरों को सरकार के, मोदी के और तो और और योगी के भी हर कदम, हर निर्णय गलत लग रहे हैं. अब क्या ही कहा जाये, जो इन लोगों के बापों के समय में नहीं हुआ, वो सब हो गया, इनको देखने को मिल गया तो बकबकी निकल रही जुबान से, नहीं तो छिलवा दिए गए थे किसी समय में.


25 फ़रवरी 2026

इंडिकेटर की समस्या

वैसे तो हमारा बहुत सारा समय यात्राओं में निकलता है किन्तु पिछले पाँच-छह महीने से यात्राएँ कुछ ज्यादा ही हो रही हैं. इससे पहले भी और अभी भी रात की यात्रा में सबसे बड़ी जो समस्या देखने को मिली वो इंडिकेटर वाली. देखने में आया कि रात के समय अधिकतर वाहन दूसरे वाहन को पास देने के लिए उसी इंडिकेटर (पीली लाइट) का इस्तेमाल करते हैं, जिसके माध्यम से रास्ता माँगा जाता है. इसके चक्कर में कई बार संशय की स्थिति उत्पन्न होने से दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है.

ऐसी स्थिति को लेकर पिछले दो-तीन साल में मंत्रालय को कई बार पत्र लिखे गए किन्तु इस बारे में कोई सुधार नहीं हुआ. हमारा सुझाव ये है कि गाड़ियों में एक हरे रंग की लाइट और लगनी चाहिए, इसका उपयोग उस समय किया जाये जबकि पीछे से आने वाले वाहन को रास्ता देना हो. पीले रंग के इंडिकेटर का उपयोग रास्ता माँगने के लिए, मुड़ने के लिए ही किया जाये तो सही रहेगा.


10 जनवरी 2026

भारत के लिए भावी बांग्लादेश : मित्र या शत्रु?

उथल-पुथल वाली खतरनाक स्थिति के बाद से बांग्लादेश अराजक ही बना हुआ है. वहाँ के हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों, हमलों, उनकी हत्याओं के चलते ऐसा लग रहा है कि वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाये जाने के बाद बनी अंतरिम सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. आन्दोलन, हिंसा, अराजकता के लम्बे दौर के बाद अब बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं. वहाँ के चुनाव आयोग ने घोषणा करते हुए बताया कि देश में 12 फ़रवरी को राष्ट्रीय चुनाव होंगे. यहाँ विशेष बात यह भी है कि इसी दिन देश में जनमत संग्रह भी होगा. यह चुनाव बांग्लादेश में हुए छात्र नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहली बार होने जा रहे हैं.

 

यद्यपि बांग्लादेश में चुनावों की घोषणा से लोकतंत्र बहाली की उम्मीद जगी है तथापि वर्तमान हालातों को देखते हुए उम्मीद की किरण पर संकट के बादल भी मँडराते नजर आ रहे हैं. ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि बांग्लादेश की राजनीति लम्बे समय से टकराव वाली रही है. वहाँ हमेशा से ही सत्ता और विपक्ष के बीच संघर्ष चलता रहा है. मुख्य दलों में से एक का कट्टरपंथ की तरफ झुकाव होने, भारत के प्रति नकारात्मक भाव रखने और दूसरे का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास होने, भारत के प्रति सद्भाव रखने के कारण वहाँ वैचारिक विभेद भी खुलकर सामने आता रहा है. इसी के चलते वहाँ के चुनावों की निष्पक्षता पर आये दिन सवाल उठते रहे हैं. वैचारिक विभेद सिर्फ विरोध के स्तर पर ही नहीं रहा बल्कि इसका स्वरूप हिंसात्मक भी रहा, जिसके चलते बांग्लादेश में अकसर राजनीतिक तनाव, हिंसात्मक गतिविधियाँ, नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश आदि देखने को मिलता रहा  है. ऐसे वातावरण से समाज में, जनसामान्य में भय और असुरक्षा का माहौल दिखाई पड़ता रहा है.

 



विगत समय के राजनीतिक संक्रमण, सामाजिक तनाव और आर्थिक दबावों के बीच देश आगामी चुनावों की ओर बढ़ रहा है. तनाव, हिंसा, अराजकता के बीच के जो भी हालात बने उसने केवल सत्ता परिवर्तन ही किया और उसके पश्चात् बांग्लादेश को अराजक बना दिया. ऐसे घटनाक्रमों ने बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य, सामाजिक ताने-बाने और क्षेत्रीय स्थिरता को भी गहराई से प्रभावित किया है. अतीत की उपजी राजनीतिक अनिश्चितता का प्रभाव समाज पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. राजधानी ढाका के साथ-साथ अन्य शहर सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में हैं, इसके बाद भी हिंसात्मक गतिविधियों में कमी नहीं आई है. जनसामान्य में, हिन्दुओं में, अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण बना हुआ है. अब जबकि चुनावों की घोषणा हो चुकी है तब वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून-व्यवस्था, लोकतंत्र की बहाली जैसे विषय चर्चा के केन्द्र-बिन्दु बने हुए हैं. आन्दोलन के बाद उपजी हिंसा की आग और अब चुनावी लहर के माहौल में वहाँ की अंतरिम सरकार को, चुनाव आयोग को, सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि किसी भी तरफ की लापरवाह स्थिति अब वहाँ पनपने न पाए. इस तरह के संवेदनशील माहौल में किसी भी तरह की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है.

 

बांग्लादेश के खतरनाक हालातों के स्थायी समाधान के लिए समावेशी राजनीति, पारदर्शी शासन और मानवाधिकारों के सम्मान आदि की आवश्यकता है. यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए तो ये हालात देश की स्थिरता और विकास के लिए और भी गम्भीर खतरा बन सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पड़ोसी देशों की नजरें भी बांग्लादेश पर टिकी हैं. शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव न केवल देश के भीतर विश्वास बहाल करेंगे बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को भी मजबूत करेंगे. आगामी माह में सम्भावित चुनावों के पश्चात् बांग्लादेश की स्थिति का असर भारत पर भी सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप में पड़ेगा, इसे भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. अंतरिम सरकार बनने के बाद भी जिस तरह से अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, वह चिंता का विषय है. पिछले दिनों बांग्लादेश की अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद युनुस द्वारा पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल साहिर शमशाद मिर्ज़ा को एक पुस्तक (आर्ट ऑफ़ ट्रायंफ: बांग्लादेश द न्यू डॉन) और विवादित मानचित्र का उपहार में दिया जाना भारत के प्रति उनकी मानसिकता को ही दर्शाता है. उस मानचित्र में बिहार, झारखंड, ओड़िशा, असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों को ग्रेटर बांग्लादेश के रूप में दिखाया गया है. इस तरह का कृत्य निश्चित रूप से भारत के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने के कारण ही अंजाम दिया गया है. ऐसे में भारत को अत्यंत सजग, सचेत रहने की आवश्यकता है.

 

कुल मिलाकर बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके अनुसार वहाँ शांति बहाली का रास्ता आसान नजर नहीं आ रहा है. ऐसी स्थिति में वहाँ के संवेदनशील जनप्रतिनिधियों को आगे आकर राजनीतिक समझदारी, संस्थागत पारदर्शिता और जनहित को प्राथमिकता देनी होगी. आम जनमानस में सरकार के, लोकतंत्र के प्रति विश्वास जगाना होगा और उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाना होगा. देश के युवाओं को समझाना होगा कि लोकतान्त्रिक मूल्यों और शांति बहाली से ही उनके लिए नए अवसरों के द्वार खोले जा सकते हैं. आने वाला समय यह तो तय करेगा ही कि बांग्लादेश अस्थिरता की ओर बढ़ेगा या लोकतांत्रिक मजबूती की ओर, इसके साथ ही यह भी निर्धारित हो सकेगा कि वह भारत के लिए किस रूप में सामने आ रहा है, मित्र रूप में अथवा शत्रु रूप में.


21 अक्टूबर 2025

राजनीति में स्वच्छ छवि का स्वागत हो

चर्चित लोकगायिका मैथिली ठाकुर को भाजपा की सदस्यता लेने के अगले दिन ही बिहार विधानसभा चुनाव में अलीनगर सीट से प्रत्याशी बनाया गया. उनको प्रत्याशी बनाये जाने को लेकर अनेक तरह के तर्क-वितर्क शुरू हो गए. कोई उनकी उम्र को लेकर टिप्पणी कर रहा है, कोई राज्यसभा में भेजे जाने की बात कर रहा है. किसी के द्वारा उनके राजनैतिक अनुभवशून्यता का उदाहरण दिया जा रहा है तो किसी के द्वारा इसे कला के प्रति अन्याय बताया जा रहा है. सदस्यता लेने के अगले दिन ही प्रत्याशी बनाये जाने को जहाँ पैराशूट प्रत्याशी से तुलना की जा रही है वहीं स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ पक्षपात करना बताया जा रहा है. इन तमाम सारी चर्चाओं के बीच मैथिली ठाकुर के चरित्र हनन करने सम्बन्धी तमाम मीम्स, चुटकुले सोशल मीडिया कुत्सित मानसिकता वालों द्वारा फैलाये जाने लगे.

 

इन चर्चाओं के सापेक्ष कुछ बातों पर ध्यान देना ही होगा. किसी व्यक्ति के राजनैतिक रूप से अनुभवहीन होने के तात्पर्य यह तो कतई नहीं है कि वह राजनीति में असफल हो जायेगा. वह समाजहित में, जनहित में कार्य नहीं कर सकेगा. देखा जाये तो ये सारी बातें मैथिली की उम्र, कला, अनुभवहीनता आदि के कारण नहीं उपजी हैं बल्कि इनके पीछे भाजपा द्वारा स्थानीय कार्यकर्ताओं को, जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा करना है. यह सही हो सकता है कि किसी नए व्यक्ति को पार्टी का सदस्य बनने के अगले दिन ही प्रत्याशी बनाकर उन तमाम पुराने कार्यकर्ताओं, नेताओं की उपेक्षा ही है जो विगत लम्बे समय से अपनी प्रत्याशिता की राह बना रहे थे.

 



एकबारगी मान भी लिया जाये कि यह भाजपा का गलत कदम है कि एकदम नए व्यक्ति को पुराने कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों पर प्रभावी बना दिया गया तो क्या इस बात पर ही किसी भले व्यक्ति को, कलाकार को सक्रिय राजनीति में नहीं उतरने दिया जाना चाहिए? राजनैतिक क्षेत्र को लेकर समाज की विडम्बना यही हो गई है कि एक तरफ लोग राजनीति के गन्दी होने की चर्चा अनेकानेक मंचों से करते हैं मगर उसी के सापेक्ष भले, योग्य व्यक्तियों को सक्रिय राजनीति में देखना भी नहीं चाहते. राजनीति गन्दी है, संसद डाकुओं-लुटेरों से भर गई है, संविधान में हमारा विश्वास नहीं जैसे जुमले आये दिन सुनने को मिल जाते हैं. कविता का मंच होसाहित्य-विमर्श हो या धारावाहिक-फ़िल्मी कार्यक्रम हो सभी में राजनीति को बेकार बताया जाता है. आज राजनीति को गाली देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता हैखुद को जागरूक बुद्धिजीवी समझना होता है.

 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान में बहुतायत जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों से मुकरते जा रहे हैं. राजनीति में पदार्पण करने वाला अत्यंत अल्पसमय में ही बलशाली होकर सामने आ जाता है. कई-कई अपराधों में लिप्त लोग भी माननीय की श्रेणी में शामिल होकर जनता के समक्ष रोब झाड़ते दिखाई देते हैं. राजनीति की वर्तमान व्यवस्था को दोष देने के पूर्व यदि हम अपने क्रियाकलापोंअपनी जागरूकता पर निगाह डालें तो हम ही सबसे बड़े दोषी नजर आयेंगे. हमारे देश की संसद और तमाम विधानसभाओं में एक निश्चित समयान्तराल के बाद चुनाव होता है. चुनाव का निर्धारित समय किसी लिहाज से टाला नहीं जा सकता है और सदन की निर्धारित सीटों को अपने निश्चित समय पर भरा ही जाना है. ऐसे में यदि अच्छे लोग उन्हें भरने को आगे नहीं आयेंगे तो जो भी सामने आयेगा वही आने वाले निर्धारित समय के लिए सदन का निर्वाचित सदस्य होगा. ऐसी स्थिति में दोष हमारा ही है कि हमने स्वयं अपने को अच्छा माना भी है और राजनीति से पीछे खींचा भी है. 

 

देश, प्रदेश को संचालित करने वाली सबसे अहम् प्रक्रिया को, सबसे महत्त्वपूर्ण कदम राजनीति को आज उससे दूर होते जा रहे प्रबुद्ध वर्ग ने नाकारा साबित करवा दिया है. राजनीति को सबसे निकृष्ट कोटि का काम सिद्ध करवा दिया है. इसी कारण गली-चौराहे-नुक्कड़ पर खड़े लोग राजनीतिक चर्चा में तो संलिप्त दिखाई पड़ जाते हैं, उसकी अच्छाइयों से ज्यादा उसमें बुराइयों को खोजने का काम करते हैं, उसमें सक्रिय ईमानदार लोगों से अधिक उसमें सक्रिय भ्रष्ट-माफिया लोगों की अधिक चर्चा करते हैं. इसका दुष्परिणाम ये होता है कि राजनीति के नकारात्मक प्रचार का एक से बढ़ते हुए अनेक तक चला जाता है और समाज की एक सोच ये बनती चली जाती है कि वर्तमान में राजनीति से अधिक घटिया, अधिक बुरी कोई चीज नहीं. राजनीति से प्रबुद्धजनों के मोह-भंग ने, राजनीति के प्रति होते नकारात्मक प्रचार ने, राजनीति के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को प्रेरित न कर पाने ने राजनीति के विरुद्ध नकारात्मक माहौल बना दिया है.

 

आज प्रत्येक मतदाता राजनीति पर बड़ी लम्बी-लम्बी चर्चा करने का दम रखता है मगर अपनी संतानों को राजनीति में आने को प्रेरित नहीं करता. उसके द्वारा राजनीति में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की जाती है मगर उसके उसमें सुधार के लिए भावी पीढ़ी को आगे नहीं किया जाता. ऐसे लोगों की बातों में राजनीति की गिरावट दिखती है मगर इनके मन में बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने पैकेज के सपने सजे होते हैं. इस तरह की चर्चाओं के चलते ही अच्छे लोग न राजनीति में आते हैं न ही चुनावों में उतरते हैं. इस तरह की स्थिति के धीरे-धीरे बढ़ने से भले लोग राजनीति से, चुनावी मैदान से बाहर हैं और अपराधी किस्म के लोग राजनीति में प्रवेश करते जा रहे हैं. राजनीति में आती जा रही गंदगी सिर्फ बातें करने से, अनावश्यक बहस करने से दूर नहीं होने वाली. यदि इसे साफ़ करना है, राजनीतिक गंदगी को मिटाना है तो राजनीति की बातें नहीं वरन राजनीति करनी होगी. आज के लिए न सहीकल के लिए; अपने लिए न सहीअपनी भावी पीढ़ी के लिए लोगों को जागना होगा.

 

हाँ, मैथिली ठाकुर जैसे लोगों का राजनीति में, चुनावों में उतरना सुखद संकेत है लेकिन ऐसे व्यक्तियों को और राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि ऐसे भले लोग, स्वच्छ छवि के लोग, कलाकार आदि पहले कुछ वर्ष जनता के बीच गुजारें, जनहित के कार्यों में अपना समय दें. इससे जहाँ नागरिकों के बीच उनकी छवि पुष्ट तो होगी ही, अपने दल में भी उनके प्रति एक विश्वास पैदा होगा.


25 अगस्त 2025

देश का सुरक्षा कवच सुदर्शन चक्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस को लाल किले से मिशन सुदर्शन चक्र की घोषणा करके भारतीय सामरिक शक्ति की मजबूती तथा सक्षमता का विश्वास व्यक्त किया था. भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से जोड़ते हुए मिशन को आधुनिक रक्षा नवाचारों में मार्गदर्शन के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत से प्रेरणा लेने वाला बताया जा रहा है. यह अपने आपमें सुखद है कि सुदर्शन चक्र अभियान को एक तरफ देश की पौराणिक, सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ा जा रहा है वहीं यह देश की एक प्रमुख स्ट्राइक कोर से भी जुड़ा हुआ है. भारत की प्रमुख स्ट्राइक कोर 21 को भी सुदर्शन चक्र के नाम से जाना जाता है.

 

सुदर्शन चक्र प्रोजेक्ट के पहले चरण में कम और मध्यम दूरी के लिए परीक्षण का कार्य भी सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लिया गया है. परीक्षण के पहले चरण में भारतीय रक्षा अनुसन्धान संगठन (डीआरडीओ) ने ओड़िशा के तट पर इंटीग्रेटेड एअर डिफेंस वेपन सिस्टम (आइएडीडब्ल्यूएस) का सफल परीक्षण किया. आगामी दस वर्षों में अर्थात 2035 तक देश के प्रमुख स्थलों, सामरिक और नागरिक क्षेत्रों को तकनीकी के अत्याधुनिक स्वरूप से सुसज्जित सुरक्षा कवच प्रदान किया जाएगा. इंटीग्रेटेड एअर डिफेंस वेपन सिस्टम अर्थात आइएडीडब्ल्यूएस वह रक्षा प्रणाली है जो एक दिशा में कार्य न करते हुए समग्रता में कार्य करेगी. इसके द्वारा किसी भी दुश्मन देश द्वारा एक साथ छोड़े गए अनेकानेक ड्रोन हमलों के विरुद्ध जवाबी कार्यवाही की जा सकेगी. व्यापक रूप से वायु रक्षा प्रदान करने के लिए इस प्रणाली को रडार, मिसाइल, कमांड-कंट्रोल यूनिट के द्वारा लक्ष्य को सटीक रूप से चुनने, उस पर निशाना साधने के सन्दर्भ में निर्मित किया जा रहा है.

 



विगत लम्बे समय से वैश्विक सुरक्षा की स्थितियों, सामरिक वातावरण, भू-राजनीतिक परिदृश्य में जिस तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं, उसमें सुरक्षा तंत्र का, सुरक्षात्मक प्रणालियों का विशेष महत्त्व बढ़ता जा रहा है. दो देशों के मध्य आपसी तनाव बढ़ने की स्थिति में, युद्ध की स्थिति में अब देखने में आ रहा है कि ड्रोन, मिसाइल के हमले आम बात हो गई है. विश्व भर में चल रहे अनेक युद्धों, देशों के आपसी तनाव के दौरान किये जाने वाले हमलों में इनका चलन बढ़ा ही है. अभी हाल ही में ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान देखने में आया था कि पाकिस्तान की तरफ से अनेक ड्रोन, मिसाइल ने केवल सैनिक क्षेत्रों में बल्कि नागरिक इलाकों में भी छोड़ी गईं. ऐसे में आवश्यक है कि न केवल सामरिक क्षेत्र बल्कि नागरिक क्षेत्र भी सुरक्षित रहें. सुदर्शन चक्र मिशन का मूल उद्देश्य यही है कि आने वाले समय देश के न केवल सामरिक इलाकों को बल्कि रिहायशी क्षेत्रों को भी सुरक्षात्मक रूप से मजबूत बनाया जाये.

 

वर्तमान दौर में युद्ध जैसी स्थिति में दुश्मन देश के द्वारा केवल सैनिक प्रतिष्ठानों को ही निशाना नहीं बनाया जाता है बल्कि बिजली व्यवस्था, ग्रिड, संचार साधनों, खाद्य आपूर्ति, यातायात, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि को भी निशाना बनाया जाता है. ऐसा करने के पीछे दुश्मन की मानसिकता समूची व्यवस्था को पंगु बना देना होता है. युद्धकाल में अथवा किसी भी तरह की तनाव जैसी स्थिति में इस तरह की विषम से देश को बचाने के लिए सुदर्शन चक्र जैसी सुरक्षा प्रणाली की, एक सुरक्षा कवच की महती आवश्यकता है. यद्यपि सुदर्शन चक्र मिशन का अभी पहला चरण ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ है तथापि आने वाले दस वर्षों में इसके द्वारा दुश्मन के मिसाइल-ड्रोन हमलों का जवाब देने, साइबर हमलों को निष्प्रभावी बनाने, हैकिंग के खतरों को दूर करने आदि का कार्य पूर्ण क्षमता के साथ किया जाना सम्भव हो सकेगा. अब जबकि सुदर्शन चक्र जैसा सुरक्षा तंत्र अपने प्रभावी रूप में कार्य करने के लिए व्यावहारिक रूप धारण कर चुका है तो निश्चित ही यह अत्याधुनिक तकनीक, सशक्त सुरक्षा प्रणाली के द्वारा भारतीय सामरिक ढाँचे का प्रमुख आधार बनेगा.


13 अगस्त 2025

बदलाव एवं उपलब्धियों भरी सुखद यात्रा

देश के गौरवशाली इतिहास की छत्रछाया में अमृतकाल जैसी अवधारणा संग स्वतंत्रता का उत्सव जोर-शोर से मनाया जा रहा है. यह समय गौरव करने का इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक पटल से अनेकानेक सभ्यताएँ लुप्त हो गईं किन्तु भारतीय संस्कृति, सभ्यता तमाम चोटों, आघातों को सहने के बाद भी अपनी वैभवशाली गाथा को साथ लिए आगे बढ़ रही है. बहुत से लोगों के लिए इसे भले राजनैतिक कदम, सरकारी एजेंडा कहा जाता हो मगर स्वतंत्रता के उत्सव को उमंग-उत्साह के साथ ही मनाये जाने की आवश्यकता है. यह एक तरफ जहाँ हमारी प्राचीन वैभवशाली संस्कृति, सभ्यता से परिचय कराता है वहीं वर्तमान युवा पीढ़ी को हमारे वीर-वीरांगनाओं का वह बलिदान याद करवाता है, जिसके चलते आज ऐसे उत्सव मना रहे हैं.

 

स्वतंत्रता के इन वर्षों में बहुत सी उपलब्धियाँ हैं जिनका सुखद एहसास रोम-रोम को पुलकित कर देता है. बावजूद बहुत सारी उपलब्धियों के आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो गुलामी के दिनों को, अंग्रेजों के शासन को सही ठहराते हैं. ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या वाकई देश ने आज़ादी से अब तक कुछ पाया नहीं है? क्या अभी तक की यात्रा में किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल नहीं हुई है? विगत उपलब्धियों, अनुपलब्धियों को यदि पूर्वाग्रह मुक्त होकर समग्र रूप में देखें तो हम लोगों को निराशा नहीं होगी. यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाएगी कि जब देश स्वतंत्र हुआ तब देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी. आज स्थिति यह है कि कृषिप्रधान कहे जाने के बाद भी देश का आर्थिक ढाँचा अकेले कृषि आधारित नहीं है, अन्य क्षेत्रों ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है. वर्तमान में अर्थव्यवस्था में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 27 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 54 प्रतिशत है.

 



शिक्षा के बिना उन्नति, विकास की कल्पना करना संभव नहीं. नालंदा, तक्षशिला जैसे शैक्षणिक संस्थानों के नष्ट कर दिए जाने के बाद महसूस हो रहा था कि शायद देश का शैक्षणिक विकास बहुत देर में हो. इस आशंका को विगत वर्षों की यात्रा में गलत सिद्ध किया गया है. प्राथमिक क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र तक देश में पर्याप्त विकास हुआ है. आज़ादी के समय देश में साक्षरता दर लगभग 18.3 प्रतिशत थी जो वर्तमान में लगभग 78 प्रतिशत है. चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में 1950 में देश में केवल 28 मेडिकल कॉलेज थे. नेशनल मेडिकल काउंसिल के अनुसार 2024-25 में 766 मेडिकल कॉलेज हैं, इनमें से 423 सरकारी और 343 निजी मेडिकल कॉलेज हैं. क्या इसे विकास या उपलब्धियों के रूप में नहीं देखा जायेगा? इसके अलावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबन्ध संस्थान, कृषि संस्थान, उच्च शैक्षणिक संस्थानों ने भी संख्यात्मक, गुणात्मक रूप में पर्याप्त विकास किया है.

 

आज़ादी के बाद से लगातार अनेकानेक क्षेत्रों में विकास और बदलाव होते रहे हैं. तकनीक के मामले में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले. किसी समय दूरसंचार माध्यम की अपनी सीमितता थी वहीं आज इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. समाज में गिने-चुने लोगों के घरों में बेसिक फोन की सुविधा हुआ करती थी जो आज हर हाथ में मोबाइल के रूप में परिवर्तित हो गई है. इंटरनेट सुविधा, उसकी स्पीड के द्वारा न केवल धरती पर वरन अन्तरिक्ष क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव देखने को मिले. ज्ञान-विज्ञान में भी देश में हुए बदलाव प्रत्येक नागरिक को गौरवान्वित कर सकते हैं. किसी समय में सेटेलाईट भेजे जाने के लिए हम दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर हुआ करते थे जबकि आज हमारे केंद्र अन्य देशों को यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. परमाणु परीक्षण, टेस्ट ट्यूब बेबी, मंगल ग्रह का अभियान, अन्तरिक्ष स्टेशन पर किसी भारतीय का जाना, बुलेट ट्रेन की तैयारी, ओलम्पिक में पदक जीतना, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का हटना आदि वे स्थितियाँ हैं जिनको उपलब्धि के रूप में ही स्वीकारा जाता है.

 

कहते हैं न कि सफ़ेद पटल पर एक छोटा सा काला बिंदु भी बहुत दूर से चमकता है, कुछ ऐसा हाल इन उपलब्धियों का है, लोगों की मानसिकता का है. ये सच है कि तकनीकी विकास के दौर में हमारे यहाँ सामाजिक विकास में गिरावट देखने को मिली है. साक्षरता का स्तर बढ़ा है मगर स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में अंतर भी बढ़ा है, महिलाओं-बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ बढ़ी हैं. एक तरफ हमें अन्तरिक्ष में अपने कदम रखे हैं तो दूसरी तरफ हमने अपनी ही धरती को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है. कृषि, खाद्यान्न के मामले में हम यदि आत्मनिर्भर होते जा रहे हैं तो हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रख सके हैं. हमारा आर्थिक ढाँचा वैशिक स्थितियों को देखते हुए बहुत सुदृढ़ है मगर लगातार होते घोटालों को हम नहीं रोक सके हैं. मोबाइल, इंटरनेट क्रांति ने समूचे विश्व को एक ग्राम की तरह बना दिया है मगर आपसी भाईचारे-सौहार्द्र को हम मजबूत नहीं कर सके हैं, उसमें अश्लीलता की, अपराध की दीमक लगा दी है.

 

ऐसे कुछ और पहलू भी हैं, जिनके आधार पर बहुत सारे लोग देश की वास्तविक उपलब्धियों को विस्मृत कर जाते हैं. वे भूल जाते हैं हमारी लोकतान्त्रिक शक्ति को जहाँ अंतिम पायदान के व्यक्ति तक को भी अवसर उपलब्ध हैं. ये और बात है कि संवैधानिक नियमों की आड़ में यहाँ एक निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री बन जाता है मगर यही संवैधानिक खूबसूरती भी है कि कोई ऑटो चलाने वाला, आदिवासी समाज से आने वाला, अत्यंत पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाला भी जनप्रतिनिधि बन कर सदन में पहुँचता है, देश का प्रथम नागरिक बनता है. निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विगत वर्षों की भदलाव भरी यात्रा सुखद रही है, उपलब्धियों भरी रही है. इस यात्रा में यदा-कदा मिलते झटकों को भी सफ़र का हिस्सा समझते हुए उनको स्वीकार करना होगा, उनका भी एहसास करते हुए आगे बढ़ना होगा.


27 जून 2025

विलय नहीं समस्या का समाधान हो

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पचास से कम नामांकन वाले प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों का नजदीकी विद्यालयों में विलय करने का निर्णय लिया है. ऐसे विद्यालयों की संख्या हजारों में है जहाँ पर नामांकन पचास से कम है. यदि नामांकन कम है तो उसे बढ़ाया जाये न कि विद्यालय का विलय कर दिया जाये, उसे बंद कर दिया जाये. वैसे भी सरकारों की प्राथमिकता बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होता है. न केवल सरकारों द्वारा बल्कि विश्व बैंक द्वारा भी अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया गया जिनसे बच्चों को विद्यालय लाया जा सके. संविधान में 86वाँ संशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया. निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम अथवा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा से वंचित बस्तियों में विद्यालय खोले गए. इन सकारात्मक कार्यों, योजनाओं के बीच सरकार द्वारा शारदा (स्कूल हर दिन आयें) योजना क्रियान्वित है. इसमें छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे बालक-बालिकाओं का नामांकन होगा, जो किसी विद्यालय में नामांकित नहीं हैं अथवा नामांकन के बाद भी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके. ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उनका नामांकन नजदीकी विद्यालयों में आयु-संगत कक्षा में कराया जायेगा और शिक्षा से लेकर प्रत्येक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध करायी जाएगी.  

 



बच्चों तक शिक्षा की सुलभता सम्बन्धी योजनाओं के बाद भी यदि सरकार को विद्यालयों का विलय करना पड़े तो स्थिति न केवल गम्भीर है बल्कि चिन्तनीय भी है. सरकार को नामांकन कम होने के कारणों-कारकों को खोजा जाना चाहिए. उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए जो प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों के नामांकन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं. विद्यालयों का विलय सिर्फ एक विद्यालय बंद होना नहीं होगा बल्कि यह अनेक दुष्परिणामों को साथ लेकर आएगा. सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर ही दिख रहा है. उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के हाउसहोल्ड सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2020-21 में 4.81 लाख, 2021-22 में 4 लाख से अधिक और 2022-23 में 3.30 लाख बच्चों ने बीच में स्कूल छोड़ दिया. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में स्कूल छोड़ने की दर अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक है. इसमें भी लड़कियों का प्रतिशत लड़कों की अपेक्षा अधिक है.

 

विद्यार्थियों का बड़ी संख्या में विद्यालय छोड़ना, नामांकन न करवाना चिन्ता का विषय है. सामाजिक-आर्थिक कारक, गरीबी, लैंगिक विभेद, शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढाँचे की समस्या, शिक्षा में अरुचि, बाल श्रम का प्रचलन, अन्य सामजिक समस्याएँ आदि ड्रॉपआउट का कारण बनती हैं. ऐसे में विचार किया जाये कि जब बच्चे अपने ही गाँव में अथवा न्यूनतम दूरी पर बने विद्यालय नहीं जा रहे हैं, तो उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे कुछ किमी दूर स्थित विद्यालय जायेंगे? विद्यालयों का दूर होना बालिकाओं के लिए और बड़ी समस्या होगी. निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ, सुरक्षा चिंताओं आदि के कारण उनकी शिक्षा पर पहले से ही संकट छाया रहता है. विद्यालय विलय पश्चात् उनके स्कूल छोड़ने की आशंका और ज़्यादा है. इसके साथ-साथ शिक्षकों के पदों की कटौती, नई शिक्षक भर्ती पर संकट, रसोइयों, शिक्षामित्रों का असुरक्षित भविष्य भी इसी से सम्बद्ध है.

  

यदि कम नामांकन पर ध्यान दें तो सरकारी नियम और कार्य-प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है. शिक्षा का अधिकार अधिनियम में प्रावधान के बावजूद सरकारी प्राथमिक विद्यालय के एक किमी परिक्षेत्र में खुलेआम निजी विद्यालयों को मान्यता दी जा रही है. निजी विद्यालयों का लगातार बड़ी संख्या में खुलते जाना और अधिनियम के अन्तर्गत गरीब विद्यार्थियों को प्रत्येक निजी विद्यालय द्वारा अपने यहाँ निशुल्क प्रवेश देने की बाध्यता भी कम नामांकन का एक कारक है. नियमानुसार निजी विद्यालयों द्वारा गरीब विद्यार्थियों को प्रवेश देने पर सरकार द्वारा निजी विद्यालयों को प्रतिपूर्ति शुल्क दिया जाता है, अभिभावकों को भी एक निश्चित राशि प्रदान की जाती है. इस आर्थिक पक्ष के कारण अभिभावकों, निजी विद्यालयों ने विद्यार्थियों को प्राथमिक विद्यालयों से दूर कर दिया. इसी तरह सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश आयु छह वर्ष और निजी विद्यालय में तीन-चार वर्ष होने के कारण भी नामांकन पर असर पड़ा है. इसके चलते भी बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय के स्थान पर निजी विद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं. इनके अलावा शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का दूसरे सरकारी कार्यों में व्यस्त रहना, विद्यालयों में प्राथमिक सुविधाओं की कमी होना, स्मार्ट क्लासेज की शून्यता आदि भी कम नामांकन के लिए उत्तरदायी बिन्दु हैं.

 

विद्यालयों का विलय स्थायी अथवा दीर्घकालिक समाधान नहीं है. इसकी गारंटी कौन लेगा कि भविष्य में विलय किये गए विद्यालय में कम नामांकन नहीं होगा? ऐसे में विचारणीय बिन्दु यह होना चाहिए कि उन कारणों का पता लगाकर उनका समाधान किया जाये जिनके कारण विद्यालयों में कम नामांकन हो रहा है. सरकार को चाहिए कि विद्यालयों के मूलभूत ढाँचे को सुव्यवस्थित करे. शिक्षकों की कमी को पूरा करने के साथ अन्य कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति करे. कक्षाओं को विकसित बनाया जाये तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नवीनतम तकनीकों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाये. सरकारी नीतियों, योजनाओं को सहज तरीके से अनुपालन योग्य बनाया जाये ताकि अभिभावक परेशान न हों. सरकार प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र में आ रही समस्या का समाधान करे, लगातार गहराते जा रहे रोग का इलाज करे न कि सम्बंधित अंग को ही काट कर अलग कर दे. शिक्षक संगठनों, अभिभावकों द्वारा इस निर्णय का विरोध किये जाने के बाद सरकार से अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करके शिक्षा को सुलभ, सहज बनाने का प्रयास करेगी. सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसका लक्ष्य बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना है न कि उनको शिक्षा से वंचित करना, इसके लिए उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही क्यों न उठाना पड़े.

 


20 मई 2025

सकारात्मक माहौल में नकारात्मक राजनीति

किसी भी देश के राजनैतिक विकास के लिए उसके सत्ता पक्ष और विपक्ष का समन्वित स्वरूप महत्त्वपूर्ण होता है. यह तब और भी विशेष हो जाती है जबकि देश में कोई संकट की स्थिति हो. आवश्यक नहीं कि संकट सीमा-पार से ही उत्पन्न हो, देश की आंतरिक स्थिति, प्राकृतिक स्थिति के कारण भी संकट का सामना करना पड़ता है. ऐसी किसी भी स्थिति में, आपातकाल में यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष में समन्वय रहता है, उनमें सामंजस्य की भावना हो तो समाधान सहजता से हो जाता है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में चारों तरफ शांतिपूर्ण माहौल के बाद भी अशांति लगती है. प्रशासनिक सजगता के बाद भी अराजक तत्त्वों की हलचल दिखती है.

 

विगत दिनों देश का सामना एक असामान्य घटना से हुआ. घटना की प्रतिक्रिया में सरकार ने भी कदम उठाया. आतंकी घटना और उसके बाद ऑपरेशन सिन्दूर की समयावधि में ऐसा लगा जैसे सत्ता पक्ष और विपक्ष में तालमेल बना है. एकाधिक बयानबाजियों को छोड़ दें तो प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से भी आतंकियों के विरुद्ध कार्यवाही की खुली छूट, सरकार को पूर्ण समर्थन जैसे सहयोगात्मक बयानों का आना हुआ. ऑपरेशन सिन्दूर सफलतापूर्वक अपनी पूर्णता को प्राप्त होता उसके पहले ही युद्ध-विराम को अपनाना पड़ा. यह निर्णय देशवासियों को किसी भी कीमत पर पसंद नहीं आया. पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की कार्यवाही का नागरिकों ने जितने खुले दिल से समर्थन किया, युद्द-विराम पर उतने खुले रूप में सरकार का विरोध किया.

 

यहीं देश के सत्ता-पक्ष और विपक्ष का चेहरा देखने का अवसर भी मिला. केन्द्र सरकार को किन कारणों, किन कूटनीतिक स्थितियों के चलते युद्ध-विराम पर सहमत होना पड़ा, ये अलग विषय है किन्तु इसके बाद भी सरकार के अडिग नजरिये में, कठोर निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आया. प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पाकिस्तान सहित सकल विश्व को स्पष्ट रूप से सन्देश दिया गया कि पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग को सहन नहीं किया जायेगा. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी कठोर लहजे में कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर तो ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी है. वैचारिक रूप से अपनी मनोवैज्ञानिक बढ़त के साथ सत्ता पक्ष कूटनीतिक, रणनीतिक रूप से तत्पर था किन्तु विपक्ष अपने पुराने रंग-ढंग में आने लगा.

 



पहलगाम आतंकी हमले के पहले भी कई बार देश ने पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के दंश को सहा है. हर बार देशवासियों की माँग होती कि पाकिस्तान पर हमला कर वहाँ के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए जायें. पाकिस्तान के साथ कई बार युद्ध होने, संघर्ष की स्थिति होने पर देश में उपद्रव होने की आशंका रहती. आतंकी स्लीपर सेल द्वारा गृह-युद्ध जैसे हालात पैदा किए जाने का भय रहता. ऑपरेशन सिन्दूर के बाद सरकार ने पूरी सजगता दिखाई. युद्ध-विराम पर सहमति के बाद भी कार्यवाही को विराम नहीं दिया. उसके द्वारा कूटनीति को धार देते हुए न केवल देश में बल्कि बाहर भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया. वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान के नापाक इरादे बताने के लिए, ऑपरेशन सिन्दूर की आवश्यकता के बारे में तथा आतंकवाद के विरुद्ध भारत के ठोस और कठोर नजरिये के बारे में सरकार द्वारा अभूतपूर्व कूटनीति तैयार की गई. केन्द्र सरकार ने आक्रामक कूटनीतिक पहल करते हुए सात सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल बनाये जो आगामी कुछ सप्ताहों में अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का भ्रमण करेंगे. इसका उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ सामंजस्य स्थापित करना, पाकिस्तान की आतंकवाद में भूमिका को वैश्विक मंच पर उजागर करना है.

 

एक तरफ सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की जानकारी देने वैश्विक यात्रा की तैयारी में है, तब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा विदेशमंत्री एस. जयशंकर पर ऑपरेशन सिन्दूर की जानकारी पाकिस्तान को पहले से देने का आरोप तथा वायुसेना के नष्ट हुए विमानों की संख्या माँगना समझ से परे है. राहुल गांधी के इस बयान को पाकिस्तान में भारत विरोधी वातावरण बनाने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जा रहा है. यदि राहुल गांधी का केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति नजरिये का, बयानों का इतिहास देखें तो यह पहली घटना नहीं है जबकि उनके नकारात्मक विचार सार्वजनिक हुए हैं. उनके द्वारा ऐसा किया जाना आम बात है, बिना यह विचारे कि देश-हित में इन बयानों का क्या प्रभाव पड़ेगा. देखा जाये तो राहुल गांधी का यह बयान देश-विरोधी ताकतों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगा. संवेदनशील समय में ऐसा बयान देने का कारण तो वही बता सकेंगे किन्तु निश्चित ही ऐसे बयान देश की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं. प्रतिनिधिमंडल के लिए कांग्रेस प्रस्तावित चार नामों से इतर शशि थरूर का नाम केन्द्र सरकार द्वारा न केवल प्रतिनिधिमंडल में शामिल करना बल्कि एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व देना कांग्रेस को कतई पसंद नहीं आया. ऑपरेशन सिन्दूर पर केन्द्र सरकार की प्रशंसा करने के लिए कांग्रेस उनसे नाराज चल रही है. ऐसा समझा जा रहा है कि राहुल गांधी का हालिया आरोप इसी की परिणति है.

 

कुछ भी हो मगर ऐसे समय में जबकि पूरा देश आतंकियों के सफाए के लिए एकजुट है; केन्द्र सरकार द्वारा न केवल आंतरिक रूप से बल्कि सीमा पार भी राजनैतिक-कूटनीतिक रूप से सशक्त और सकारात्मक कदम उठा रखे हैं; पड़ोस की भू-राजनीतिक स्थितियों में उथल-पुथल होने के बाद भी देश में स्थिरता वाले माहौल में ऐसे बयान नकारात्मकता पैदा करते हैं. वैश्विक रूप से अपनी सैन्य शक्ति की सशक्तता, निर्णयों की गम्भीरता, कूटनीति की सक्षमता की विकास-यात्रा में यही नकारात्मकता अवरोधक का कार्य करती है. निश्चित रूप से ऐसे बयान न तो परिपक्वता की पहचान कराते हैं और न ही गम्भीरता की.


16 मई 2025

अनावश्यक तुलनात्मक विवेचन

ऐसा माना जा सकता है कि सभी को ये बात मालूम होगी कि तुलनात्मक अध्ययन उन्हीं दो वस्तुओं, व्यक्तियों, स्थितियों के मध्य किया जा सकता है, जहाँ उनके चर एकसमान सम्भावना रखते हों.


सीजफायर के बाद कांग्रेसी आईटी सेल से एकदम इंदिरा गांधी बाहर निकल आईं और अनचाहे ही समाज में एक तुलनात्मक विवेचन किया जाने लगा. तुलना होनी भी चाहिए, आलोचना होनी भी चाहिए मगर पूर्वाग्रह से रहित. इंदिरा गांधी के सन्दर्भ में तत्कालीन स्थितियों को ध्यान रखने के साथ-साथ वर्तमान स्थितियों को भी ध्यान रखना आवश्यक है. प्रत्येक कालखंड के, समय के अपने-अपने सत्य होते हैं जिसे उसी समय के अनुरूप समझा जा सकता है.


फिलहाल देश का एक जवान पाकिस्तानी कैद से रिहा होकर वापस आ चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा विगत वर्षों में, आयरन सत्ता में, मौनी-रिमोट सरकार में ऐसा क्यों नहीं हो सका? आयरन की मात्रा और वजन बताने वाले भी इस पर विचार करेंगे तो और ज्यादा सटीक निष्कर्ष मिल सकते हैं.