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31 जनवरी 2026

शोध परियोजनाओं हेतु गैर-सरकारी संस्थाओं से वित्तीय सहायता

Research Funding Opportunities (Non-Government Agencies)

 

1. Tata Trusts

https://www.tatatrusts.org

Areas Supported: Education, Rural development, Social innovation, Public policy, Community development

Funding is provided for research projects and social impact studies.

 

2. Infosys Foundation

https://www.infosys.com/infosys-foundation

Areas Supported: Education, Indian culture and literatur, Social development, Community projects

Research projects related to education and society may receive support.

 

3. Azim Premji Foundation/Azim Premji University

https://azimpremjiuniversity.edu.in

Areas Supported: Education policy, School education, Social development, Rural studies, Governance

 

4. Ford Foundation

https://www.fordfoundation.org

Areas Supported: Social justice, Gender equality, Human Rights,  Public policy, Cultural studies

International collaborations are also possible.

 

5. British Council Research Grants

https://www.britishcouncil.org

Areas Supported: Higher education research, Cultural relation, English language education, International academic collaboration

This is especially useful for English and Humanities faculty.

 

6. India Foundation for the Arts (IFA)

https://indiaifa.org

Areas Supported: Literature, Cultural studies, Arts and humanities, Documentation and archives

 

7. Wellcome Trust (UK)

https://wellcome.org

Areas Supported: Humanities, Health and society, Medical humanities, Social sciences related to health

27 जनवरी 2026

शोध परियोजनाओं हेतु केन्द्रीय सरकारी एजेंसियों द्वारा वित्तीय सहायता

विभिन्न केंद्रीय सरकारी एजेंसियां अलग-अलग विषयों में वित्तीय सहायता (फंडिंग) के लिए शोध प्रस्ताव (Research Proposals) आमंत्रित कर रही हैं. शोध प्रस्ताव नैक (NAAC) के अनुसंधान और नवाचार मापदंडों के लिए भी महत्वपूर्ण है.

 

The following major funding agencies and portals may be explored:

 

1. ICSSR (Indian Council of Social Science Research)

https://icssr.org

Relevant Areas: Social Sciences, Literature, Education, Gender Studies, Governance, Culture, Public Policy, Society.

Major Research Project

Minor Research Project

Collaborative Research Projects

 

2. ANRF (Anusandhan National Research Foundation) – EarlierSERB

https://www.anrfonline.in

Relevant Areas: Science, Technology, Interdisciplinary Research, and Innovation.

Core Research Grant (CRG)

Advanced Research Grant

Early Career Research Grants

 

3. ICPR (Indian Council of Philosophical Research)

https://icpr.in

Relevant Areas: Philosophy, Ethics, Indian Knowledge Systems, Religious and Cultural Studies.

 

4. ICHR (Indian Council of Historical Research)

https://ichr.ac.in

Relevant Areas: Indian history, culture, civilization, archives, historical studies.

 

5. Ministry of Culture Research Grants

https://indiaculture.gov.in

Relevant Areas: Indian heritage, literature, culture, traditions, art and cultural studies.

12 अप्रैल 2025

तीस लाख वर्ष की मातृशक्ति 'लूसी'

इथियोपिया में 1975 में एक कंकाल मिला था. जाँच के बाद बताया गया कि यह कंकाल लगभग तीस लाख साल पहले पृथ्वी पर रहने वाली एक औरत का है. इसे इस दुनिया का सबसे पुराने मानव कंकाल के रूप में चिन्हित किया गया. जाँच से जानकारी मिली कि यह कंकाल ऑस्ट्रेलोपिथेकस एफरेंसिस प्रजाति का है, जो लगभग बत्तीस लाख वर्ष पुराना माना जा रहा है. इस कंकाल के मिलने के बाद से ही इस पर अनेक तरह के शोध किये गए, अनेक तरह से इसकी वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास किया गया. कंकाल का वास्तविक स्वरूप सामने लाने के लिए लगातार शोध भी चल रहे थे.

 



इसी सन्दर्भ में एक खबर सामने आई कि वैज्ञानिकों की एक टीम ने फॉरेंसिक फेसियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से कंकाल की खोपड़ी के थ्री-डी स्कैन और चिम्पांजी के सॉफ्ट टिशू डाटा की सहायता ली. वैज्ञानिकों की टीम ने इस तकनीकी की मदद से कंकाल की खोपड़ी का लगभग वास्तविक चेहरा बना लेने में सफलता प्राप्त कर ली. इस चेहरे का अनुमानिक आकार पाने के बाद वैज्ञानिकों ने इस कंकाल या कहें कि कंकाल से बने चेहरे का नाम लूसी रखा. इस कंकाल की अनुमानित लम्बाई साढ़े तीन फीट है.

 

मानवीय सभ्यता के सबसे पुराने पूर्वजों में से एक लूसी का चेहरा, भले ही यह काल्पनिक अथवा तकनीक से उत्पन्न हुआ हो, इसे देखना रोमांचकारी है. इस चेहरे के द्वारा अपने अतीत से जुड़ना निश्चित ही अद्भुत है, रोमांचक है. तकनीकी सहायता से कंकाल से निर्मित चेहरे लूसी को नमन, लूसी के रूप में लाखों-लाखों वर्ष पहले की मातृशक्ति को नमन.

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इंटरनेट, सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 

12 फ़रवरी 2025

यूजीसी केयर लिस्ट की समाप्ति

शोध पत्रिकाओं (रिसर्च जर्नल्स) की यूजीसी केयर सूची को बंद करने और सहकर्मी-समीक्षित पत्रिकाओं के लिए पैरामीटर विकसित करने के संबंध में यूजीसी की सार्वजनिक सूचना




13 अक्टूबर 2024

शोध-आलेखों में सन्दर्भ लेखन

अकादमिक क्षेत्र में लेखन का बहुत महत्त्व है. वर्तमान में अनेक नीतियों के चलते न केवल शोधार्थियों के लिए बल्कि प्राध्यापकों के लिए भी लेखन महत्त्वपूर्ण हो गया है. जहाँ शोधार्थियों के शोध-कार्य हेतु शोधपरक लेखन को अनिवार्य जैसा किया गया है वहीं उच्च शिक्षा क्षेत्र से सम्बंधित प्राध्यापकों के लिए शोधपरक लेखन को उनकी अकादमिक योग्यता से जोड़ दिया गया है. शोध कर रहे विद्यार्थियों के लिए तो अपने शोध ग्रन्थ को लिखते समय उनसे अपेक्षा ही की जाती थी कि वे शोधपरक आलेख लिखेंगे. अब प्राध्यापक वर्ग के लिए भी एक तरह की अनिवार्यता लगा दी गई है कि वे अपनी अकादमिक प्रोन्नति हेतु स्वयं भी शोधपरक लेखन हेतु तत्पर रहेंगे. शोधपरक लेखन को, उसके प्रकाशन को प्राध्यापक वर्ग हेतु उनके मूल्यांकन से जोड़ दिया गया है. अब इनकी अकादमिक प्रोन्नति हेतु, उनकी अकादमिक योग्यता के लिए एपीआई के लिए लेखन को, शोधपरक लेखन को वरीयता दी जा रही है.

 

आलेख और शोध-आलेख में बहुत बड़ा अंतर नहीं है. इसे मात्र इतने से परिचयात्मक रूप में समझा जा सकता है कि जिस आलेख के साथ सन्दर्भ जुड़े हुए हैं, उसे शोध-आलेख कहते हैं. इसका सीधा सा अर्थ है कि उस आलेख में अपनी बात को प्रामाणिक ढंग से कहा गया है अथवा किसी तरह की शोध का उल्लेख किया गया है. इसके अलावा सन्दर्भ रहने पर आलेख विश्वसनीय बन जाता है. किसी आलेख में सन्दर्भों का होना उस लेखक के शोध कार्य को भी प्रमाणित करते हुए विश्वसनीय बनाता है. इसके साथ-साथ आलेख में सन्दर्भों का होना लेखक की लेखकीय योग्यता को, उसकी क्षमता को, प्रतिभा को, मेहनत को भी प्रदर्शित करता है.

 



सन्दर्भों के होने की स्थिति के साथ-साथ अक्सर न केवल शोधार्थियों में बल्कि प्राध्यापकों में भी इसे लेकर संशय की स्थिति रहती है कि उनके द्वारा सन्दर्भों का उल्लेख कहाँ किया जाये, किस तरह किया जाये? ये समस्या अब और जटिल होती समझ आने लगी है जबकि शोध कार्यों को लेकर, शोध-प्रबंधों को लेकर, शोध-आलेखों को लेकर लगातार एकसमान नीति पर जोर दिया जाने लगा है. शोध-आलेख के साथ सन्दर्भ लिखने के कुछ अलग-अलग तरीके लेखकों द्वारा प्रयोग में लाये जाते रहे हैं. कुछ लेखक आलेख में यथास्थान सन्दर्भों का उल्लेख करते हैं. ऐसा करने पर पाठकों के लिए अवरोध उत्पन्न होता है. इस अवरोध का बचाव करने के लिए सन्दर्भों को शोध-आलेख के अंत में अथवा प्रत्येक पृष्ठ पर सबसे नीचे दिए जाने की व्यवस्था को एकसमान रूप से स्वीकार किया गया. ऐसे सन्दर्भ जो प्रत्येक पृष्ठ पर नीचे दिए जाते हैं, उन्हें पाद-टिप्पणी/फुटनोट (Footnote) कहते हैं और जो सन्दर्भ आलेख के अन्त में एक ही जगह दिए जाते हैं उनको अन्त-टिप्पणी/एंडनोट (Endnote) कहते हैं. शोध-आलेखों की प्रमाणिकता, महत्ता के लिए इस तरह के दो सन्दर्भों में से किसी एक सन्दर्भ का होना आवश्यक है. बिना सन्दर्भ के लिखे गए लेख को शोध-आलेख के रूप में मान्यता नहीं मिलती है. ऐसे आलेख की कोई विश्वसनीयता भी नहीं होती है.

 

किसी भी शोध-आलेख में सन्दर्भों को कई जगहों से एकत्र किया जाता है. कई सन्दर्भ पुस्तकों से लिए जाते हैं तो बहुत से सन्दर्भों को शोध-पत्रिकाओं से लिया जाता है. वर्तमान में इंटरनेट का बहुतायत उपयोग होने के कारण से अनेक वेबसाइट भी सामग्री संग्रहण के काम आती हैं. शोध-आलेखों में उनका भी सन्दर्भ देना आवश्यक होता है. ऐसी स्थिति में कई बार शोधार्थियों के समक्ष, लेखकों के समक्ष, प्राध्यापकों के समक्ष समस्या आती है कि इन विभिन्न माध्यमों से एकत्र किये गए सन्दर्भों का उल्लेख कैसे किया जाये? एकरूपता की दृष्टि से भी ये आवश्यक हो जाता है कि शोध-आलेख में सन्दर्भों को एकसमान रूप से लिखा जाये.

 

यहाँ पुस्तकों, शोध-पत्रिकाओं, इंटरनेट पर उपलब्ध वेबसाइट से ली गई सामग्री, आँकड़ों आदि के सन्दर्भ को लिखने का ढंग कुछ इस प्रकार से अपनाया जा सकता है. यदि सन्दर्भ पुस्तक से लिए गए हैं तो उनके लिखने का तरीका इस प्रकार होगा. सबसे पहले पुस्तक के लेखक का नाम लिखा जायेगा, इसमें भी उपनाम पहले लिखा जायेगा फिर नाम. इसके बाद पुस्तक के प्रकाशन का वर्ष लिखा जाता है. प्रकाशन वर्ष लिखने के बाद बोल्ड फॉर्मेट में पुस्तक का नाम दिया जायेगा. इसके पश्चात् पुस्तक के प्रकाशन का स्थान और फिर पुस्तक के प्रकाशक का नाम आता है. सन्दर्भ लिखने के क्रम में सबसे अंत में पृष्ठ संख्या लिखना होता है. इसे इस उदाहरण से और आसानी से समझा जा सकता है.

सेंगर, कुमारेन्द्र सिंह (डॉ.), 2009, पत्रकारिता के सन्दर्भ, उरई (उ.प्र.), बुन्देलखण्ड प्रकाशन, पृ. 97

 

पुस्तकों के साथ-साथ शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेखों से भी सामग्री को लिया जाता है. ऐसे में इनका सन्दर्भ देने में क्रम कुछ इस तरह से रखते हैं. पुस्तक की तरह ही यहाँ सबसे पहले लेखक का नाम लिखा जाता है, इसमें भी उपनाम को पहले लिखते हैं फिर लेखक का नाम, इसके बाद आलेख के प्रकाशन का वर्ष लिखा जाता है. प्रकाशन वर्ष लिखने के बाद सम्बंधित आलेख का शीर्षक लिखा जाता है, जिससे सामग्री को लिया गया है. जिस पत्र, पत्रिका अथवा संकलन में वह आलेख प्रकाशित है उसका नाम वोल्ड फॉर्मेट में लिखा जाता है. इसके बाद पत्रिका की अंक संख्या, पत्रिका प्रकाशक का नाम और फिर पत्रिका के प्रकाशन का स्थान लिखा जाता है. क्रम लिखने में सबसे अंत में पृष्ठ संख्या लिखते हैं. इसे निम्न उदाहरण से सहजता से समझा जा सकता है.

सेंगर, कुमारेन्द्र सिंह (डॉ.), 2010, वृन्दावन लाला वर्मा के साहित्य में सौन्दर्य-बोधमेनिफेस्टो (शोधपत्रिका), Vol.II, अंक- 2, समाज अध्ययन केन्द्र, उरई, पृ. 94.

 

वर्तमान दौर में तकनीक के उपयोग से इनकार नहीं किया जा सकता है. ऐसे में शोध-सामग्री को बहुत सी वेबसाइट से भी एकत्र किया जाता है. वेबसाइट से ली गई सामग्री का सन्दर्भ भी देना चाहिए. इससे शोध-आलेख की प्रमाणिकता बनी रहती है. इसके लिए सबसे पहले इस वेबसाइट की लिंक, जिसे यूआरएल कहा जाता है उसे लिखा जाता है, इसके बाद जिस तारीख को सम्बंधित वेबसाइट से सामग्री को लिया गया उसे लिखना होगा है. उदाहरण के लिए निम्नवत को देख सकते है.

https://dastawez.blogspot.com/2022/02/blog-post_28.html (दिनांक 19-09-2023 को देखा गया.)

 

हिन्दी भाषा के शोध-आलेखों के लिए पिछले कुछ समय से सर्वमान्य रूप में सन्दर्भों को इस रूप में लिखा जा रहा है, स्वीकारा जा रहा है. बावजूद इसके शोधार्थी और प्राध्यापकगण अपने-अपने क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थान के नियमानुसार इसकी जाँच करके ही अपने शोध-आलेखों में सन्दर्भ लेखन करें.

 

ये आलेख सूचना, जानकारी मात्र के लिए है.


27 अप्रैल 2024

शोध कार्य में गुणवत्ता की सम्भावना?

उच्च शिक्षा क्षेत्र में सक्रियता से अपनी भूमिका का निर्वहन करता विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) इस क्षेत्र में गुणवत्ता बनाये रखने हेतु कदम उठाता रहता है. शोध कार्य को लेकर यूजीसी द्वारा विशेष रूप से कार्य किया जा रहा है. उच्च शिक्षा से सम्बद्ध संस्थानों में अध्यापन के साथ-साथ शोध कार्य को लेकर अनेक सुधार किये गए. अनेक सुधारात्मक उपायों के बीच अभी हाल ही में यूजीसी द्वारा एक बड़ा निर्णय लेते हुए पी-एच.डी. के लिए अब राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है. अभी तक नेट परीक्षा के माध्यम से दो श्रेणियों में परीक्षार्थी उत्तीर्ण होते थे. इसके माध्यम से एक तरफ जेआरएफ के लिए विद्यार्थी चयनित किये जाते थे, दूसरी तरफ उत्तीर्ण विद्यार्थी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर पद की पात्रता प्राप्त कर लेते थे. यूजीसी के इस नए बदलाव के बाद नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों की एक तीसरी श्रेणी भी अस्तित्व में आ गई है. अब नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों को पी-एच.डी. करने की पात्रता भी प्राप्त हो सकेगी. जून 2024 की नेट परीक्षा के लिए यूजीसी द्वारा जारी अधिसूचना में इस बदलाव को शामिल किया गया है.

 

विगत कुछ वर्षों से पी-एच.डी. में नामांकन हेतु विश्वविद्यालय स्तर पर प्रवेश परीक्षा का आयोजन करवाया जा रहा है. इसमें चयनित विद्यार्थी ही पी-एच.डी. हेतु अपना नामांकन करवा पाता है. इधर देखने में आ रहा था कि बहुत से विश्वविद्यालय समय से पी-एच.डी. हेतु परीक्षा का आयोजन नहीं करवा रहे हैं. इसके अलावा यह भी देखने में आया कि पी-एच.डी. में प्रवेश को लेकर यथोचित मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है. इससे ऐसे लोगों द्वारा अनावश्यक रूप से प्रवेश लिया जा रहा है जिनका न तो शोध से कोई लेना-देना है और न ही उच्च शिक्षा से. ऐसी स्थिति के चलते यूजीसी शोध कार्य में गुणवत्ता और उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार की जिस व्यवस्था को लागू करना चाह रही है, वह भी पूरी नहीं हो पा रही है. इसे देखते हुए नेट परीक्षा के माध्यम से पी-एच.डी. करने की नई व्यवस्था लागू किये जाने के साथ ही यूजीसी ने विश्वविद्यालयों द्वारा ली जाने वाली प्रवेश परीक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है.

 



यूजीसी द्वारा नेट के माध्यम से पी-एच.डी. हेतु नामांकन की व्यवस्था किये जाने से निश्चित रूप से उन विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिलेगा जो वास्तविकता में इसके लिए अपना नामांकन चाहते हैं. इस व्यवस्था से उन विद्यार्थियों का विभिन्न विश्वविद्यालयों की पी-एच.डी. सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं हेतु भटकने से बचना होगा जो वास्तविक रूप में उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन कार्य को अपना लक्ष्य बनाये हुए हैं. नेट परीक्षा के माध्यम से जहाँ वे असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने की पात्रता प्राप्त कर लेंगे वहीं पी-एच.डी. हेतु भी अपना नामांकन करवा सकेंगे. इस व्यवस्था के लागू होने के बाद भी यह निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता है कि इसके द्वारा शोध कार्यों में गुणवत्ता का विकास होगा. यूजीसी द्वारा भले ही पी-एच.डी. को शोध कार्य हेतु एक प्रक्रिया माना जाता हो मगर समाज में आज भी इसे महज एक उपाधि मानकर औपचारिकता को पूरा किया जाता है. मौलिक शोध कार्य को वरीयता देने से अधिक महत्त्व नाम के साथ डॉक्टरेट उपाधि का लग जाना रहता है.

 

देखा जाये तो आज भी कला, साहित्य, मानविकी आदि विषयों में इस प्रकार के शोध कार्य नहीं हो रहे हैं जिनके द्वारा समाज को एक दिशा दी जा सके. समाज के मुख्य बिन्दुओं, समाज की समस्याओं, दैनिक जीवन में सहयोगी होने वाले विषयों आदि से सम्बंधित शोध कार्य हेतु प्रोत्साहन भी नहीं दिया जाता है. ऐसे में इन क्षेत्रों में शोध कार्य को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है. पी-एच.डी. के लिए किया जाने वाला शोध कार्य महज एक पुस्तकीय संस्करण बन कर रह जाता है. यदि शोध कार्य व्यक्ति के कैरियर के लिए होगा, उसकी एपीआई बढ़ाने के लिए होगा, उसकी प्रोन्नति के लिए आवश्यक होगा तो शोध कार्य में गुणवत्ता कैसे आएगी?  बावजूद इसके, इस नई व्यवस्था से शोध कार्य में गुणवत्ता के, योग्यता के आने की सम्भावना देखनी चाहिए लेकिन उसके लिए यूजीसी को कुछ सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है.

 

भले ही नेट की परीक्षा उत्तीर्ण करना विद्यार्थियों के लिए सदैव से चुनौती रहा हो मगर इसके द्वारा गुणवत्ता को बढ़ाने वाली योग्यता का चयन ही होगा, ऐसा कहना मुश्किल है. शोध कार्य की गुणवत्ता के लिए ऐसे योग्य विद्यार्थियों का चयन किये जाने की आवश्यकता है जिनकी रुचि शोध कार्य में हो. नेट परीक्षा आरम्भ से ही असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बनने की पात्रता मात्र रही है, अब यह पी-एच.डी. करवाने की पात्रता भी बन गई है. इससे शोध कार्य में गुणवत्ता के आने की, उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार की सम्भावना न के बराबर ही है. यदि यूजीसी वाकई शोध कार्य में गुणवत्ता चाहती है तो उसे शोध कार्य हेतु एक अलग मार्ग निर्धारित करना होगा. जहाँ किताबी शोध कार्य के बजाय समाज के बीच जाकर शोध कार्य करवाया जाये. शोध कार्य इस तरह का हो जिससे आमजन के जीवन में सकारात्मकता आये, लोगों को एक दिशा मिले, कार्योंन्मुख जीवन-शैली का विकास हो, तब तो शोध कार्य की सार्थकता समझ आती है. यदि ऐसा करने में कोई भी शोध कार्य सफल नहीं होता है तो निस्संदेह वह कार्य महज उपाधि प्राप्ति का ही साधन मात्र बना रहेगा फिर भले ही उसे नेट परीक्षा के माध्यम से करवाया जाये या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा.  





 

03 अगस्त 2023

इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल 'बोहल शोध मंजूषा' में हम भी संदर्भित

इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल 'बोहल शोध मंजूषा' के जुलाई 2023 अंक में प्रकाशित शोध-पत्र में हमें भी संदर्भित किया गया है. (पृष्ठ 12)

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शोध-पत्र शीर्षक - दलित साहित्य और भारतीय समाज

शोधार्थी - बाबु बिगुल्ला

हिन्दी विभाग, डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, हैदराबाद

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प्रकाशक - गुगनराम एजुकेशनल एण्ड सोशल वैलफेयर सोसायटी, भिवानी (हरियाणा)

सम्पादक - डॉ. नरेश सिहाग 'बोहाल'





09 जनवरी 2023

वृन्दावनलाल वर्मा जी को याद करते हुए

आज, 09 जनवरी को सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. वृन्दावनलाल वर्मा जी की जन्मतिथि है.

हिन्दी साहित्य में उनका अपना एक विशेष स्थान है. ऐसा इसलिए क्योंकि जिस समय उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचन्द एक युग की भांति छाए हुए थे, उस समय ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन का जोखिम वृन्दावनलाल वर्मा जी ने उठाया. उन्होंने अपने उपन्यासों के द्वारा न केवल ऐतिहासिकता को चित्रित किया बल्कि बुन्देलखण्ड की संस्कृति को भी बखूबी उभारा है.


ये हमारा सौभाग्य है कि हिन्दी साहित्य में वाचस्पति उपाधि (पीएच.डी.) आपके ही उपन्यासों पर शोध कार्य करने पर प्राप्त हुई.

शोध शीर्षक 'डॉ. वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन' के द्वारा वृन्दावनलाल वर्मा जी के ऐतिहासिक और सामाजिक उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन करने का प्रयास किया था.  

वृन्दावनलाल वर्मा जी को सादर नमन. 







 

27 अप्रैल 2022

उच्च शिक्षा क्षेत्र में आती गिरावट

कुछ माह पहले अपने अकादमिक कैरियर सम्बन्धी एक कोर्स, जो अनिवार्य रूप से करना होता है, उसमें ऑनलाइन सहभागिता की गई. लगभग एक महीने तक चलने वाले इस कोर्स में बहुत से विद्वान वक्ताओं ने अपने विचारों को साझा किया. ज्यादातर लोगों ने अपने उद्बोधन में अभी हाल ही में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भी चर्चा की. यह हमारे व्यक्तिगत स्तर पर सुखद संयोग कहा जायेगा कि अपने महाविद्यालय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन हमें अपने साथियों संग करने को मिला है. ऐसे में इसके प्रति ज्यादा सजगता से सुना-समझा गया. बहुत से विद्वानों और सहभागिता करने वाले साथियों ने उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में अपनी बातें भी रखीं. बहुत से लोग इस क्षेत्र में आती गिरावट को लेकर भी चिंतित दिखे.


उच्च शिक्षा क्षेत्र की स्थिति यह है कि एक तरफ शैक्षिक उन्नयन की नीतियां बनाई जाती हैं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नित ही कोई न कोई नियम निकाल कर उच्च शिक्षा गुणवत्ता लाये जाने के प्रयास किये जाते हैं दूसरी तरफ खुद उच्च शिक्षा के साथ खिलवाड़ देखने को मिलता है. पिछले कुछ वर्षों से शोध कार्य को लेकर गंभीरता देखने को मिली मगर उस गंभीरता में भी हल्कापन रहा. शोध और अध्यापन को एकसाथ लाने का एक जबरिया प्रयास किया जा रहा है. शोध पत्रों के प्रकाशन को लेकर भी एक अलग तरह का खेल चल रहा है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो किसी भी क्षेत्र में शोध का अपना महत्त्व है और अध्यापन का अपना महत्त्व है. यूजीसी की तरफ से, सरकार की तरफ से, विश्वविद्यालयों की तरफ से लगातार उत्कृष्ट शोधकार्यों के लिए प्रयास किये जाते रहे हैं किन्तु उन पर वास्तविक रूप से अमल नहीं किया जाता रहा है. ऐसा लगता है जैसे इन संस्थाओं का वास्तविक उद्देश्य किसी भी रूप में व्यक्ति को पी-एच०डी० की उपाधि प्रदान करवा देना है, शोधकार्य की प्रमाणिकता, उसकी मौलिकता, स्तरीयता को जांचे-परखे बिना स्वीकृति प्रदान कर देना मात्र रह गया है. यदि ऐसा न होता तो आज भी तमाम विश्वविद्यालयों से पी-एच०डी० के नाम पर कूड़ा-करकट समाज में न आया होता; यदि ऐसा न हो रहा होता तो शैक्षिक क्षेत्र में मौलिक शोधकार्यों का अभाव न दिख रहा होता; यदि ऐसा न हो रहा होता तो अध्यापन कार्य में रत बहुतायत लोगों को इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर अपना शोधकार्य पूरा न करना पड़ रहा होता.




अध्यापन कार्य में सहजता, सर्वोत्तम कार्य करने वाले व्यक्ति को यदि शोधकार्य में असहजता, असुविधा महसूस होती है तो क्या आवश्यक है कि उसे भी शोधकार्य के लिए जबरन धकेला जाये? ठीक इसी तरह का व्यवहार उस व्यक्ति से भी किया जाता है जो स्वयं को शोधकार्य के लिए उपयुक्त पाता है, अपनी सोच का, अपनी मौलिकता का शोधकार्य में गुणवत्तापूर्ण उपयोग कर सकता है. ऐसी स्थिति में सोचा जा सकता है कि कोई अपनी भूमिका के साथ न्याय कैसे कर सकता हैइसके साथ-साथ प्राध्यापकों के कैरियर के लिए गुणांकों की अनिवार्यता ने इस स्थिति को और भी विकृत कर दिया है. इसके चलते जहाँ एक तरफ रिसर्च जर्नल्स की बाढ़ सी आ गई है वहीं दूसरी तरफ इसने बौद्धिकता को भी बाज़ार बना दिया है. चंद रुपयों की कीमत पर शोध-पत्र प्रकाशित किये जा रहे हैं; सेमिनार, गोष्ठी आदि के प्रमाण-पत्र बांटे जा रहे हैं; घर में प्रकाशन खोलकर, पुस्तकों से सामग्री की चोरी कर, उसमें जरा सा हेर-फेर करके अपने नाम से अंधाधुंध प्रकाशन किया जा रहा है. ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी बहुतायत लोगों के चलते उच्च शिक्षा में शोध के नाम पर, अध्यापन के नाम पर लगातार गिरावट आ रही है. इस तरह की बौद्धिक जालसाजी को रोकने के नाम पर अनेक सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जो लेखन में होने वाली चोरी को पकड़ने की बात करते हैं. ऐसा संभव है मगर उस चोरी को रोकने की बात कोई नहीं करता. आखिर यह समझने का विषय है कि एक अध्यापक पर जबरिया शोध पत्र लिखने, उसके प्रकाशन के लिए दवाब क्यों बनाया जा रहा है? क्यों उसके प्रमोशन के समय इनके अंकों की गणना का प्रावधान किया गया है?


उच्च शिक्षा में गिरावट की इस स्थिति का रहा-सहा कचूमर निजी शैक्षणिक संस्थानों ने शामिल होकर निकाल दिया है. ‘कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ की तर्ज़ पर इनके द्वारा शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा है. गाँव-गाँव, खेतों के मध्य खड़ी होती इमारतें, तमाम सारे पाठ्यक्रमों का सञ्चालन, हजारों-हजार विद्यार्थियों का प्रवेश किन्तु अध्यापकों के नाम पर जबरदस्त शून्यता. स्थिति की भयावहता, उच्च शिक्षा के मखौल का इससे ज्वलंत उदाहरण क्या होगा कि महाविद्यालय में किसी विषय में अनुमोदन किसी और व्यक्ति का है, उसके स्थान पर महाविद्यालय में पाया कोई और व्यक्ति जा रहा है. विश्वविद्यालय स्तर से अनुमोदित व्यक्ति न केवल एक महाविद्यालय में ही नहीं वरन कई-कई दूसरे विश्वविद्यालयों के महाविद्यालयों में अनुमोदित है. बिना योग्यता सूची प्रवेश की सहजता, कक्षाओं में न आने की स्वतंत्रता, नक़ल-युक्त परीक्षाओं की व्यवस्था, उड़नदस्ता द्वारा पकड़े जाने पर विश्वविद्यालय से निर्दोष साबित करवाए जाने की सुविधा... सोचिये ऐसे में किस नियम से, किस विधान से, कौन सी सरकार, कौन सा आयोग उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार कर देगा


स्थिति अत्यंत विकराल है, शिक्षा के साथ घनघोर मजाक हो रहा है और ऐसा महज उच्च शिक्षा क्षेत्र में ही नहीं अपितु शिक्षा के आरंभिक बिन्दु से ही हो रहा है. शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने का दुष्परिणाम है कि जहाँ किसी समय हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था गौरव का विषय हुआ करती थी आज हम विश्व के सैकड़ों सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में भी शामिल होने से वंचित रह जा रहे हैं. ऐसी व्यवस्था के लिए किसी एक को दोष देना उचित नहीं है. एक तरफ सरकारें हैं जिनके पास कोई जमीनी नीति नहीं है, एक तरफ आयोग है जिसके पास क्रियान्वयन के कोई ठोस बिन्दु नहीं हैं, एक तरफ राज्य सरकारें हैं जो किसी भी नीति पर केन्द्र सरकारों से दुश्मनी निकालती रहती हैं, एक तरफ विश्वविद्यालय हैं जिनके पास नीति-निर्देशक नहीं हैं, एक तरफ महाविद्यालय हैं जिनके पास नियंत्रण नहीं है. ऐसे में उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण विकास होगा, कहना मुश्किल है; ऐसे में शोधकार्यों में वैश्विक पहचान मिलेगी, सोचना भी हास्यास्पद है; ऐसे में अध्यापन कार्यों के द्वारा ज्ञान का प्रसार होगा कपोलकल्पना है; ऐसे में विद्यार्थियों द्वारा शिक्षा व्यवस्था के प्रति विश्वास जागेगा भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है. जिस तरह से नीतियों के अभाव में, गुणवत्ता के अभाव में, अध्यापन के अभाव में उच्च शिक्षा में गिरावट आई है, उससे उच्च शिक्षा का भविष्य काला दिखाई दे रहा है, संकटग्रस्त दिखाई दे रहा है. अब आवश्यकता वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां बनाने मात्र से नहीं वरन नीतियों का व्यावहारिक क्रियान्वयन करवाने से कोई सार्थक, सकारात्मक हल निकलेगा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने से कुछ आशा की किरण दिखाई देती है पर देखना है कि यह किरण कितना उजाला करेगी?


23 फ़रवरी 2022

बचपन से परिचित नाम जुड़ा डिग्री में भी, कैरियर में भी

वृन्दावन लाल वर्मा, इस नाम से परिचय बचपन में ही हो गया था. यद्यपि उस समय आपके बारे में बहुत जानकारी नहीं थी तथापि इतना अवश्य पता चल गया था कि ये कहानियों जैसा, किताबों जैसा कुछ लिखते हैं. सात-आठ वर्ष की उम्र में साहित्य के नाम पर बस कहानी, कविता शब्द ही समझ आते थे क्योंकि इनको अपनी पाठ्य-पुस्तकों में देख-पढ़ रहे थे. इसके अलावा घर पर पढ़ने का माहौल बना होने के कारण भी पुस्तकों के रूप में वृन्दावन लाल वर्मा नाम देखने को मिल रहा था. बाद में टीवी पर आने वाले मृगनयनी धारावाहिक को देखने के दौरान और भी स्पष्ट जानकारी हुई. उसी धारावाहिक को देखने के दौरान मृगनयनी उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला.


बाद में कक्षाओं में, पाठ्य-पुस्तकों में ऐसे उलझे कि साहित्य के नाम पर बहुत सी पुस्तकों से परिचय स्नातक अध्ययन के दौरान ही कॉलेज के पुस्तकालय के माध्यम से हुआ. उसमें भी वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य को अलग-अलग करके नहीं देखा-समझा. झाँसी की रानी और गढ़ कुंडार उसी दौरान पढ़ने को मिले. बस पढ़ने का शौक था, सो पढ़ लिया मगर कभी सोचा नहीं था कि बचपन से सुनते चले आ रहे इस नाम का सम्बन्ध हमारे कैरियर से, हमारी डिग्री से भी हो जायेगा.


हिन्दी साहित्य से परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद पितातुल्य ब्रजेश अंकल के द्वारा पीएच.डी. करने का आदेश हुआ. हमारी तरफ से बहुत दिनों से इस मामले को लेकर टालमटोल हो रही थी. एक दिन अंकल ने न केवल आदेश दिया बल्कि हमारे ऊपर अत्यंत स्नेह भाव, वरदहस्त रखने वाले डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी के पास भी ले गए. उनके सामने शिष्य भाव से जाकर बैठ गए. उस समय तक दिमाग में ये था कि जब परास्नातक की डिग्री ले ली है तो अपने नाम के आगे डॉ. अवश्य ही लगवाएंगे मगर ऐसा कब करेंगे, किस विषय से करेंगे ये न सोचा था. विषय का चक्कर इसलिए भी था क्योंकि हिन्दी साहित्य से परास्नातक के पूर्व हम अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल कर चुके थे.


खैर, दो-चार सवाल इधर-उधर के होने के बाद, सामान्य सी बातचीत होने के बाद डीपी सर (डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी को सामान्य बोलचाल में इसी संबोधन से पहचाना जाता रहा है) ने हिन्दी साहित्य में हमारी रुचि और हमारे पसंद के शोध क्षेत्र की जानकारी ली. सर को बताया कि गद्य में ज्यादा रुचि है और हम चाहते हैं कि हमारी पीएच.डी. किसी भी विषय में हो पर क्षेत्र बुन्देलखण्ड का हो. ऐसा जानते ही सर ने तत्काल कहा कि वृन्दावन लाल वर्मा जी के साहित्य में कर लो, उनका साहित्य मूलतः गद्य ही है. चूँकि इस नाम से हम बचपन से ही परिचित थे, सो हमने भी तुरंत सहमति में अपना सिर हिला दिया.


उसी समय सर ने शोध-विषय ‘वृन्दावन लाल वर्मा के साहित्य में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ निर्धारित कर दिया. अगले दिन सिनोप्सिस बना कर विश्वविद्यालय जमा करने का आदेश दिया. बाद में बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा संशोधन के बाद हमें शोध-कार्य करने के लिए ‘डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन’ शीर्षक अनुमोदित हुआ. दो वर्षों की अवधि में अपना शोध-कार्य विश्वविद्यालय में जमा करके अगले वर्ष सम्पूर्ण आवश्यक प्रक्रिया के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की अनुमति और गौरव प्राप्त हुआ. किसी समय बस नाम से परिचित होने वाले व्यक्तित्व से अपने शोध-कार्य के दौरान व्यापकता के साथ परिचय हुआ. यह बात हमें आज भी गौरवान्वित करती है कि बचपन से परिचित नाम हमारे साथ न केवल डिग्री रूप में जुड़ा बल्कि यही डिग्री आगे चलकर हमारा कैरियर बनी. वर्ष २००५ में हिन्दी साहित्य से ही स्थानीय गांधी महाविद्यालय में अध्यापन करने का अवसर मिला और सहायक प्राध्यापक के रूप में हमारा चयन हुआ. इसके साथ ही हमारे लिए यह भी गौरव का विषय आज तक है कि हमारे शोध-निर्देशक डॉ. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव जी देश में तीसरे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने दो विषयों में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की हुई थी. डीपी सर ने हिन्दी साहित्य और भाषा विज्ञान में डी.लिट्. उपाधि हासिल की थी.




एम.ए. करने के बाद अपने नाम के आगे डॉ. लगाने की इच्छा रखने की पूर्ति इस रूप में हुई कि हिन्दी साहित्य के साथ-साथ अर्थशास्त्र विषय से भी बाद में पीएच.डी. उपाधि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी से प्राप्त की. अपनी पढ़ाई के दौरान से ही हम पर विशेष स्नेह रखने वाले डॉ. शरद जी श्रीवास्तव सर ने निर्देशन में अर्थशास्त्र विषय में पीएच.डी. उपाधि हासिल करने का सौभाग्य मिला. इसका भी शोध-क्षेत्र हमने बुन्देलखण्ड ही चुना.


आज, २३ फरवरी को प्रसिद्द उपन्यासकार, नाटककार वृन्दावन लाल वर्मा जी की पुण्यतिथि है.  हिन्दी उपन्यास के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने ऐसे दौर में जबकि प्रेमचंद उपन्यास विधा में एक युग बन चुके थे, उपन्यास के क्षेत्र में न केवल प्रवेश किया बल्कि ऐतिहासिक उपन्यासों की सफल रचना करके अपना एक अलग, विशिष्ट स्थान बनाया. देखा जाये तो वृन्दावन लाल वर्मा जी ने एक तरफ प्रेमचंद की सामाजिक परंपरा को आगे बढ़ाया तो दूसरी तरफ हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास की धारा को उत्कर्ष तक पहुँचाया.


आज उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.


28 दिसंबर 2021

अनेक रिसर्च के बाद भी नए शोध की गुंजाइश रह ही जाती है

शिक्षकों को भी समय-समय पर खुद को अपडेट करने के लिए पढ़ना पड़ता है। कहा जाए कि  बस पढ़ना ही पड़ता है, तो ये सही न रहेगा बल्कि उनको भी इसके लिए किसी विद्यार्थी की तरह कक्षा मे बैठना पड़ता है, शिक्षकों से पढ़ना होता है। वर्तमान मे कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हो रहा है। Faculty Induction Programme के नाम पर अनिवार्य रूप से किया जाने वाला एक कोर्स किया जा रहा है। देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्था माने जाने वाले जवाहर लाल नेहरू (JNU) से आयोजित होने वाले इस प्रोग्राम मे हमारी भी सहभागिता हो रही है। 27 दिसम्बर 2021 से 22 जनवरी  2022 तक चलने वाले इस प्रोग्राम मे प्रतिदिन चार सेशन चलने हैं, जिसमें देश के प्रतिष्ठित बौद्धिक लोगों का लेक्चर होना है।


आज दूसरा दिन है, इस प्रोग्राम का। हमारा अपना विचार तो यही है कि आपके बीच प्रतिदिन के सेशन के बारे मे कुछ न कुछ जानकारी शेयर की जाए मगर देखिए कि कितना कर पाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सुबह 09:30 से शुरू होने वाला सत्र शाम 05:15 तक लगभग निर्बाध रूप से चलता राहत है। आज दूसरे दिन के तीसरे सत्र मे प्रोफेसर आर. के. शर्मा जी का व्याख्यान हुआ। उनके द्वारा रिसर्च के बारे मे जानकारी दी गई। उनके द्वारा स्पष्ट रूप से बताया गया कि किसी भी विषय मे, किसी भी बिन्दु पर चाहे कितनी भी रिसर्च क्यों न हो जाएं, उसमें कोई न कोई बिन्दु ऐसा रह जाता है जहां कि शोध की जगह रह जाती है। यह जगह किसी भी शोधार्थी को देखनी चाहिए, खोजनी चाहिए।


हमारे द्वारा अपनी जिज्ञासा समाधान के रूप मे उनसे पूछा गया कि आज हिन्दी साहित्य मे स्त्री-विमर्श अथवा दलित विमर्श को लेकर पर्याप्त शोध हो चुका है, ऐसे मे नए शोध की गुंजाइश कहाँ रह जाती है? शोध जाँचने वालों द्वारा भी किसी नए प्रोजेक्ट को यह कहकर अस्वीकार कर दिया जाता है कि संबंधित विषय पर पर्याप्त काम हो चुका है, ऐसे मे शोधार्थी क्या करे? शर्मा जी का स्पष्ट रूप से कहना था कि किसी विषय पर शोध करने के लिए उसको ऊपर-ऊपर से देखना उचित नहीं। उस विषय की गहराई मे जाकर देखने की आवश्यकता है। यदि शोधार्थी गंभीरता से अध्ययन करे तो कोई न कोई बिन्दु अवश्य ही निकल आएगा, जहां कि इन्हीं विषयों पर शोध किया जा सकता है।


इसी बात को गाँठ बाँधते  हुए संबंधित प्रोग्राम मे अपना रिसर्च पेपर ‘हिन्दी महिला उपन्यासकारों का स्त्री-विमर्श और सामाजिक सरोकार’ प्रस्तुत कर दिया है। अब देखना ये है कि यह स्वीकार होता है या अस्वीकार? बाकी, कल से कोशिश रहेगी रोज की रिपोर्ट यहाँ प्रस्तुत करने की।


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