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29 जनवरी 2022

अभिभावक करें सहयोग

कोरोना के संक्रमण गति बढ़ने के कारण देश में लगभग सभी गतिविधियों पर विराम सा लगा दिया गया था. सभी तरह के क्षेत्रों में बंदी की स्थिति बन चुकी थी. बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी लोग घर पर रहते हुए ही अपने काम को पूरा कर रहे थे. आर्थिक ढाँचा यदि गड़बड़ हो रहा था तो शैक्षिक जगत में भी नकारात्मक माहौल देखने को मिल रहा था. सरकारें, प्रशासन, शासन आदि सभी लोग देश के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के बारे में विचार करने में लगे हुए थे, आज भी लगे हुए थे. यहाँ देश के आर्थिक स्तर से अधिक सोचनीय स्थिति बच्चों के शैक्षिक और मानसिक स्तर को समझने की है. भले ही वर्तमान दौर बहुत अधिक चिंता का कारण न हो मगर बच्चों के लिए यह समय अवश्य ही चिंताजनक बना हुआ है. ऐसे माहौल में जबकि आये दिन कोरोना संक्रमण के चलते संस्थानों को बंद करवा दिया जाता है, बाजार, पार्क, कोचिंग आदि पर भी पहरा सा लगा दिया जाता हैऐसे हालात में जबकि सामाजिकता का स्तर आपसी मेल-मिलाप के मामले में लगभग शून्य हो चुका हो तब बच्चों के शारीरिकमानसिक स्तर परउनकी क्रियाशीलता पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है.

 

यह वो स्थिति है जबकि बच्चे पूरी तरह से घरों में बंद हैं. उनके सामने ऑनलाइन क्लास करना, खेलने के नाम पर कंप्यूटर, मोबाइल हैं, मनोरंजन के नाम पर भी टीवी, मोबाइल आदि हैं, सामाजिक सक्रियता के नाम पर, खेलकूद के नाम पर अपने परिजन ही हैं. नित्यप्रति के वही सीमित से कार्यवही एक जैसी दिनचर्या गुजारते रहने के कारण बच्चों में एक तरह का चिड़चिड़ापन आता जा रहा है. इस वर्तमान परिदृश्य में अभिभावकों के लिए बच्चों के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस लगभग कैदखाने जैसे वातावरण में उनके लिए बच्चों का लालन-पालनउनकी परवरिश समस्याजनक हो गई है. बच्चों का उद्दंड होते जानाअत्यधिक उग्रता धारण करना एक समस्या है तो अभिभावकों का व्यवहार भी चिंताजनक है. बात-बात पर आदेशनुमा कदमकिसी भी कार्य का टोकाटाकी भी उचित नहीं है. इसे समझने की आवश्यकता है. इसके लिए बाल मनोविज्ञान को समझना-परखना अत्यंत आवश्यक है.

 

इस समय कोरोनाकाल के चलते बच्चों के स्कूल बंद हैं तथापि ऑनलाइन क्लास अवश्य ही चालू हैं. यहाँ भी स्थिति चूँकि सामान्य कक्षा जैसी नहीं है, सामान्य रूप से विद्यालय जाने वाली नहीं है. इस कारण ऑनलाइन क्लास करवाने के लिए बच्चों को सुबह जगाने के नाम पर चीखना-चिल्लानाउनको नाश्ता कराने-भोजन करवाने के नाम पर क्रोधित होनाउनको पढ़ाने के नाम परहोमवर्क करवाने के नाम पर खीझना अभिभावकों के लिए सामान्य गतिविधि बन गई है. इस तरह के व्यवहार में वर्तमान लॉकडाउन जैसी स्थिति भी बहुत हद तक जिम्मेवार है. इससे पहले भी बच्चों का सड़क पर निकल करघर से बाहर जाकर खेलना-कूदनाशरारत करना जैसे फूहड़पन की बातें हो गई थींइसे इस लॉकडाउन जैसी स्थिति ने और भी भयावह बना दिया है. अब बच्चे घर से बाहर निकले बिना ही अपने समय को व्यतीत कर रहे हैं. जरा-जरा सी बात पर एक तरफ उनके साथ टोका-टाकी बढ़ी है दूसरी तरफ अत्यधिक सुरक्षित रहने के दवाब ने भी बच्चों को परेशान सा कर रखा है.

 

पहले भी बच्चों को बाहर खुले में खेलने की न तो जगह दिखती थी और न ही उनको बाहर खेलने की बहुत ज्यादा अनुमति मिलती थी. जितनी आज़ादीजितनी अनुमति उनको अपनी कॉलोनीअपनी सोसायटी अथवा अपनी गली-मोहल्ले की बहुत छोटी जगह में खेलने-कूदने के लिए मिलती थी वह भी इस आपदा में छीन ली गई है. ऐसी विषम परिस्थिति में उनके शारीरिक मनोरंजन केअपने दोस्तों के साथ शरारत करने के जो नाममात्र के अवसर हुआ करते थेवे तो समाप्त ही हो गए हैं किन्तु स्कूल का जो बोझ उनके दिमाग परउनके मन पर था वह ज्यों का त्यों बना हुआ है. स्कूल के कामपढ़ाई के बोझऑनलाइन क्लास की अनिवार्यता में वे खुद को दबा हुआ पा रहे हैं. इस समय बच्चों के पास खेलने के लिए भी कंप्यूटर या मोबाइल ही हैंजिनके साथ वे ऑनलाइन क्लास के कई-कई घंटे बिताकर आये होते हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका नैसर्गिक विकास नहीं हो पा रहा है. यदि इसी में उनको प्रतिदिन की सुबह से शाम तक की टोका-टाकी होने लगे तो ये बच्चे खुद को कमतर समझने लगते हैं. इससे न केवल बच्चे काम करने से दूर भागने लगते हैं बल्कि अपने ही अभिभावकों के प्रति नकारात्मकता पालने लगते हैं.

 

आज की स्थिति में माता-पिता को बच्चों के साथ न सही एक दोस्त की तरह पर दोस्ताना माहौल में काम करने की आवश्यकता है. यदि माता-पिता इस तरह का वातावरण अपने परिवार मेंघर में बना पाते हैं तो बच्चों का स्वाभाविक विकास करने के प्रति एक कदम बढ़ा सकते हैं. इसके लिए अपने बच्चों से उनके दैनिक अनुभवों के बारे में बात करें. वे दिन के बहुत बड़े भाग को ऑनलाइन क्लास में बिताने के बाद अकेले जैसे ही हैं. ऐसे में उनकी पढ़ाई से ज्यादा आवश्यक है कि उनको उनकी रुचियों की तरफ ले जाया जाये. उनको अन्य गतिविधियों में संलिप्त करवाया जाये. घर के ऐसे छोटे-छोटे कामों में उनको शामिल किया जाना चाहिए जिससे उनके अन्दर सामूहिकता की भावना जगेउनमे कार्य करने के प्रति रुचि बढ़े. बागवानीड्राइंगसंगीतक्राफ्ट आदि ऐसे विषय हैं जिनके द्वारा बच्चों में उत्पन्न हो रही निराशा को दूर किया जा सकता है.

 

कोरोना का यह दौर बहुत कुछ सिखाने के लिए आया है. यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर समय सिर्फ पढ़ाई की बातें बच्चे से नहीं करनी चाहिए. वर्तमान युग में कैरियर एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है मगर जिस भविष्य की इमारत की नींव को यदि आज कमजोर कर दिया जायेगा उस पर बुलंद इमारत बनाया जाना संभव नहीं होगा. ऐसे में उसके साथ किसी भी तरह से ऐसा व्यवहार न करें जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाये. किसी भी काम को करने के लिए तेज आवाज़ में बोलनाबच्चे की छोटी से छोटी गलती के लिए उसको डाँटनाचिल्लाते हुए किसी काम को करने का आदेश देना आदि ऐसे कदम हैं जिनके द्वारा बच्चे में एक तरह का भय बैठ जाता है. उसके अन्दर कमजोरी के भाव पनपने लगते हैं. ऐसे में वह हीनभावनाअसुरक्षाअवसाद जैसी स्थिति का शिकार होने लगता है. कोरोनाकाल में ऐसी अवस्था बच्चों को नकारात्मकता की तरफ धकेल सकता है. सभी अभिभावकों को ऐसे माहौल में अपने बच्चों के साथ सहयोगात्मक रूप में कार्य करने की आवश्यकता है.



(उक्त आलेख जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'सच बेधड़क' के दिनांक 29 जनवरी 2022 अंक के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.)

29 मई 2020

अभिभावक और शिक्षक करें बाल मनोविज्ञान का अध्ययन

वर्तमान परिदृश्य में अभिभावकों के लिए बच्चों के मनोविज्ञान को समझना एक जटिल कार्य होता जा रहा है. उनके लिए बच्चों का लालन-पालन, उनकी परवरिश को लेकर भी आये दिन समस्याजनक होता जा रहा है. अभिभावकों और बच्चों का एकदूसरे के प्रति व्यवहार भी रूखा और असंयत होता दिखता है. इसके लिए कहीं अप्रत्यक्ष तरीके से कोई काम भले ही चल रहा हो मगर प्रत्यक्ष में ऐसा होते नहीं दिखता है. बच्चों का उद्दंड होते जाना, अत्यधिक उग्रता धारण करना एक समस्या है तो अभिभावकों का व्यवहार भी चिंताजनक है. बात-बात पर आदेशनुमा कदम, किसी भी कार्य का टोकाटाकी भी बच्चों को उद्दंड बनाती जा रही है. इन सबको समझने की आवश्यकता है. इसके लिए बाल मनोविज्ञान को समझना-परखना अत्यंत आवश्यक है. इस मनोविज्ञान को न केवल विद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिए अपितु माता-पिता को भी इसके बारे में पढ़ना-समझना चाहिए.


असल में देखा जाये तो बाल मनोविज्ञान सामान्य मनोविज्ञान की एक विशेष शाखा भले हो मगर इसे सामान्य रूप से सभी अभिभावकों को इसलिए समझना चाहिए क्योंकि यह बच्चों के विकास और व्यवहार पर केंद्रित है. इसके द्वारा स्कूल जाने वाले बच्चों के शारीरिक, संवेगात्मक, संज्ञानात्मक और सामाजिक विकास का अध्ययन किया जाता है. आजकल देखने में आ रहा है कि बच्चे पढ़ाई से अधिक ध्यान कहीं दूसरी जगह लगाने लगे हैं. उनकी सक्रियता अधिक है किन्तु वह कई बार सकारात्मक दिशा में नहीं है. उनकी सक्रियता किसी न किसी रूप में ध्वंस कर रही है. ऐसी तमाम स्थितियों के बारे में बाल मनोविज्ञान समझाने का काम करता है.


यदि आज के माता-पिता बाल मनोविज्ञान का अध्ययन करते हैं तो उनको अपने बच्चे को समझने में मदद मिल सकती है. वे इसे विषय के रूप में कतई न स्वीकारें, वे यह धारणा भी न बनायें कि यह किसी तरह का शैक्षिक पाठ्यक्रम है, जिसे उत्तीर्ण करना है. वे इसे अपने बच्चे के साथ किये जाने वाले व्यवहार, बच्चे के द्वारा किये जाने वाले व्यवहार के बारे में जानने के लिए स्वीकार कर सकते हैं. कुछ सामान्य सी बातों को ध्यान में रखते हुए यदि अभिभावक आगे बढ़ें तो उनको अपने बच्चे को समझना आसान हो सकता है.


इसके लिए अपने बच्चों से उनके दैनिक अनुभवों के बारे में बात करें. उनके स्कूल, उनके साथियों, उनकी दिन भर की गतिविधियों के बारे में चर्चा करें. यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर समय सिर्फ पढ़ाई की बातें बच्चे से नहीं करनी चाहिए. वर्तमान युग में कैरियर एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है मगर जिस भविष्य की इमारत की नींव को यदि आज कमजोर कर दिया जायेगा उस पर बुलंद इमारत बनाया जाना संभव नहीं होगा. ऐसे में बच्चों को पढ़ने की महत्ता समझानी चाहिए. उनको शिक्षा के द्वारा सफलता की प्राप्ति के बारे में बताया जाना चाहिए. यहाँ अभिभावकों को एक बात का स्मरण हमेशा रहना चाहिए कि आज के दौर में आपका बच्चा भी तकनीक से किसी न किसी रूप में परिचित हो रहा है. टीवी चैनलों से, धारावाहिकों से, कार्टून चैनलों से अथवा अन्य किसी माध्यम से वह भी आत्मसम्मान, व्यक्तित्व, इमेज आदि की बातें देख-समझ रहा है. ऐसे में उसके साथ किसी भी तरह से ऐसा व्यवहार न करें जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाये. किसी भी काम को करने के लिए तेज आवाज़ में बोलना, बच्चे की छोटी से छोटी गलती के लिए उसको डाँटना, चिल्लाते हुए किसी काम को करने का आदेश देना आदि ऐसे कदम हैं जिनके द्वारा बच्चे में एक तरह का भय बैठ जाता है. उसके अन्दर कमजोरी के भाव पनपने लगते हैं. ऐसे में वह हीनभावना, असुरक्षा, अवसाद जैसी स्थिति का शिकार होने लगता है.  

अभिभावकों को अपने व्यवहार को नियंत्रित रखते हुए बच्चों के नैसर्गिक विकास की तरफ ध्यान देना चाहिए. बच्चे को पढ़ाई के साथ-साथ किसी न किसी नए कार्य के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. समय-समय पर उसे उसके स्कूल में अथवा नगर में होने वाली प्रतियोगिताएं में सहभागिता करने के लिए भी प्रेरित करना चाहिए. उसे इसका आभास होना चाहिए कि ज़िन्दगी में हमेशा जीत ही नहीं मिलती है, कभी-कभी हार का भी सामना करना पड़ता है. तमाम प्रतियोगिताओं में उसकी सहभागिता उसमें समन्वय, सहयोग, सामूहिकता की भावना का विकास करती है.

बाल मनोविज्ञान इसी तरह के अनेक उपायों को सबके सामने रखता है. इसका अध्ययन तमाम समस्याओं का समाधान देने में मदद करता है. इसका अध्ययन न केवल शिक्षक के लिए बल्कि माता-पिता के लिए भी बेहद उपयोगी सिद्ध हो सकता  है. एक बात और मुख्य रूप से याद रखनी चाहिए, जब भी आप अपने बच्चे से किसी भी तरह का व्यवहार करें तो एक बार अपने बचपन को याद कर लें. क्या आपके माता-पिता द्वारा आपके साथ वैसा ही व्यवहार किया गया था? क्या आप ऐसे ही व्यवहार किये जाने से प्रसन्न रहते थे? ऐसे कई सवाल खुद से करिए, खुद से जवाब लीजिये और फिर अपने बच्चे के प्रति अपना व्यवहार करिए. आप स्वयं समझदार हैं.

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