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16 जून 2025

भावनाओं से खिलवाड़

अहमदाबाद हवाई जहाज दुर्घटना के अंतिम कुछ सेकेण्ड के फोटो, वीडियो....

इस तरह की बहुत सी पोस्ट दिखाई देने लगी हैं. सोशल मीडिया में हवाई जहाज दुर्घटना के बाद से एकदम से फोटो और वीडियो की बाद सी आ गई. अपनी-अपनी पोस्ट पर लाइक, शेयर, कमेंट बटोरने के चक्कर में भावनात्मकता, संवेदना को दरकिनार करते हुए फोटो और वीडियो अपलोड करने में लगे हुए हैं. लाइक, शेयर, कमेंट करने वाले भी बिना सत्य जाने, बिना तथ्य जाने आँखें बंद किये उसी दिशा में बहे जा रहे हैं. अंतिम समय के फोटो में भी उन्हीं तीन मासूम बच्चों के फोटो सामने आ रहे हैं जो अपने माता-पिता के साथ लन्दन शिफ्ट होने के लिए जा रहे थे. निश्चित रूप से फोटो-वीडियो के द्वारा लोगों की भावनाओं से खेलने वाले जानते हैं कि किस फोटो से उनको ज्यादा से ज्यादा शेयर, लाइक मिलने वाले हैं.

 



यहाँ एक बात समझ नहीं आ रही कि ये सबकुछ ख़त्म होने के अंतिम कुछ सेकेण्ड पहले की फोटो, वीडियो किसने लिए? किसने सार्वजनिक किये?

 

क्या उन बच्चों के माता-पिता अपने पूरे परिवार की मौत को लेकर, हवाई जहाज की दुर्घटना को लेकर एक तरह से आश्वस्त हो चुके थे, तभी उन्होंने चिल्लाते-चीखते बच्चों को सँभालने की बजाय उनकी फोटो खींचकर अपने किसी परिचित को भेजे, अपने किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड किये?

 

क्या जहाज के अन्दर कोई सीसी टीवी कैमरा टाइप कुछ रहता है जो किसी नेटवर्क के माध्यम से लगातार फोटो, वीडियो बनाता हुआ कहीं धरती पर बने सेंटर को भेजता रहता है?

 

क्या इसी जहाज में कोई ऐसा व्यक्ति था जो बिना डर, भय, बचने की कोशिश के फोटो, वीडियो खींच कर अपने किसी परिचित को लगातार भेजता रहा?

 

क्या दुर्घटना स्थल से किसी व्यक्ति का अथवा कई व्यक्तियों के मोबाइल इस हालत में मिले हैं, जिनसे ये फोटो, वीडियो निकाल कर सार्वजनिक किये जा रहे हैं?

 

सोशल मीडिया में तैर रहे तमाम एविएशन एक्सपर्ट इस बारे में भी अपनी विशेषज्ञतापूर्ण राय दें.


10 जनवरी 2024

पत्थर होती मानवीय संवेदना

एक स्टार्ट-अप कंपनी की सीईओ ने अपने चार वर्षीय बेटे की हत्या कर दी. हत्या का कारण तलाक प्रक्रिया के दौरान अदालत द्वारा उसके पति को बेटे से मिलने की अनुमति प्रदान किया जाना था. अदालत के इस निर्णय से वह महिला चिढ़ी हुई थी. ये घटना इसी समाज की है जहाँ स्वीकारा जाता है कि पूत तो कपूत हो सकता है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती. तलाक की प्रक्रिया जिस पति से चल रही, उससे चिढ़ होना सहज है मगर उसके चलते अपने ही बेटे की हत्या कर देना संवेदनहीनता के साथ-साथ मानसिक असंतुलन का परिचायक है. मामूली सी बात पर अपने ही परिजन की हत्या जैसा जघन्य अपराध समाज के लिए नया नहीं है. 




अभी कुछ दिनों पूर्व खबर आई कि एक महिला ने अपने पति की हत्या महज इस कारण से कर दी क्योंकि उसके पति ने महिला को सोशल मीडिया पर रील बनाने से रोका था. यद्यपि किसी भी रूप में किसी इन्सान की हत्या को स्वीकार्य नहीं माना जाता है तथापि स्वरक्षा हेतु किसी अपराधी की, आतातायी की जान ले भी ली जाये तो उसे कानूनी रूप में, सामाजिक रूप में क्षम्य माना गया है. अब जिस तरह की घटनाओं के चलते हत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं उनमें तो विवाद भी इस तरह का नहीं होता है कि आवेश में, क्रोध में, बदले की भावना में किसी व्यक्ति की जान ले ली गई हो. लिव इन रिलेशन में रहने के बाद मन ऊब जाने के कारण हत्या कर देना रहा हो, प्रेम विवाह के बाद मनमुटाव होने पर सूटकेस में टुकड़े-टुकड़े में मिलना, प्रेमी के साथ मिलकर पति और बच्चों की हत्या, व्यावसायिक लाभ के लालच में पत्नी का सौदा करना, नशा न करने देने पर माता-पिता की हत्या, पिता द्वारा बेटी के साथ बलात्कार करना आदि खबरें प्रतिदिन ही हमारी नज़रों के सामने से गुजरती हैं. बड़ी संख्या में होती इन घटनाओं को किसी बाहरी तत्व द्वारा अंजाम नहीं दिया जा रहा है वरन परिवार के निकट सम्बन्धियों द्वारा ऐसा किया जा रहा है.


इस तरह की घटनाएँ स्पष्ट रूप से मानवीय संवेदनाओं के मृत होने की ओर इशारा करती हैं. तकनीकी, बौद्धिक रूप से समृद्ध होते जा रहे समाज की यह बहुत बड़ी विडम्बना बनती जा रही है कि यहाँ मानवीयता के प्रति नकारात्मकता देखने को मिल रही है. संवेदनाओं के कम होने के कारण, मानवता के प्रति लोगों की सकारात्मकता कम होने से आपसी प्रेम-स्नेह, समन्वय आदि में भी गिरावट आई है. मानवीय संवेदना के चलते ही एक मनुष्य दूसरे से संपर्क रखता है, उसके साथ रिश्तों का निर्वहन करता है. ऐसा होने के कारण ही मनुष्य अपनी व्यक्तिगत सीमा-रेखा से बाहर आकर अपने परिवार के साथ-साथ अपने आस-पड़ोस, अपने क्षेत्र, समाज आदि के प्रति चिंता का भाव रखता है. संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने में सहायक होती है. संवेदनाओं का लगातार क्षरण होते जाने से मनुष्य क्रूरतम से क्रूरतम कदम उठाने से नहीं डर रहा है.


मानवीय संवेदनों के समाप्त होने के पीछे के कारण मानव ने स्वयं उत्पन्न किये हैं. तीव्रतम गति से किसी भी रूप में सफलता को प्राप्त कर लेने की तृष्णा ने जैसे सोचने-समझने की शक्ति को छीन लिया है. शिक्षित होने के बाद भी समाज से नैतिक शिक्षा का लोप हो चुका है. सोशल मीडिया की स्वतंत्रता ने रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर दिया है. इस तरह की प्रवृत्ति ने जहाँ एक तरफ नैतिकता को,मानवीयता को समाप्त किया है वहीं दूसरी तरफ हमारे संस्कारों की, संस्कृति की पाठशाला संयुक्त परिवारों का भी क्षरण किया है. संयुक्त परिवारों के विघटन के बाद जन्मे एकाकी परिवारों ने बच्चों की सामूहिकता समाप्त कर दी है. अब उनका बचपन विशुद्ध रूप से मशीनों के साथ बीतता है. ऐसे में उसके भीतर संस्कारों का, संवेदनाओं का होना एक कल्पना ही है.


संवेदनाओं की लगातार होती कमी के साथ मानव में सहनशक्ति की भी कमी होती जा रही है. इधर देखने में आ रहा है कि विगत कुछ समय से इस तरह की जघन्य वारदातों, अपराधों के पीछे बहुत छोटी सी बात, मामूली सी घटना ही कारण हुआ करती है. पारिवारिक सदस्यों को किसी काम को करने से रोकना, उनको अनुशासन में रहना सिखाना, अनुपयोगी कार्यों को न करने की सलाह देना आदि ऐसे कारण बनते हैं. देखा जाये तो एक व्यक्ति के जीवन में बचपन से लेकर अंतिम अवस्था तक कदम-कदम पर घर-परिवार में, विद्यालय में, कार्यक्षेत्र में, समाज में एक तरह का प्रतिस्पर्द्धा का माहौल बना रहता है. उसे न केवल समाज में, अपने कार्यक्षेत्र में बल्कि परिवार तक में आपसी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है. ऐसा करने के लिए उसे प्रेरित भी किया जाता है, कभी-कभी उसे हतोत्साहित करके भी आपसी प्रतिस्पर्द्धा में शामिल कर दिया जाता है. प्रतिस्पर्द्धा के इस तरह के बनावटी माहौल में ऐसा इन्सान अपने-पराये का, अच्छे-बुरे का, संयम-आवेश का अंतर भुला बैठता है, सहनशीलता को विस्मृत कर देता है. उसके लिए किसी भी रूप में सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत विजय ही मायने रखती है.


सहानुभूति, संवेदना, दुःख, मानवीयता आदि रहित इन्सान जब समाज में अपना अस्तित्व बनाता जा रहा है तो आये दिन इस प्रकार की शर्मसार करने वाली घटनाएँ घटित होना स्वाभाविक है. आज नैतिक मूल्यों का ह्रास और आडम्बर के द्वारा खुद को उच्च स्तर पर दिखाना जीवन बन गया है. पति-पत्नी का साथ-साथ रहना मुश्किल हो गया है, माता-पिता और संतानों में कटुतापूर्ण रिश्ते बने हुए हैं, रक्त-सम्बन्धी ही एक-दूसरे के खून के प्यासे हों तो उस वातावरण में मानवीय मूल्यों का जीवंत बने रहना दुष्कर ही है. 





 

16 नवंबर 2022

एहसासों का दरिया....

भावनाओं का अतिरेक

उमड़ते देखा,

एहसासों का दरिया

इस आँख से उस आँख तक

मचलते देखा,

नजरें चुरा कर

आँखों की बारिश

थामने की कोशिश,

शब्द-शब्द पर लबों को

लरजते देखा।


उक्त पंक्तियाँ पोस्ट के लेखक की ही हैं. कई बार कुछ पंक्तियाँ ही समूची मनोदशा की परिचायक होती हैं. इन पंक्तियों में भी कुछ ऐसा ही है. भावनाओं, एहसासों, संबंधों आदि महज शब्द नहीं होते हैं, यदि इनको माना जाये, इनकी गहराई को समझा जाये तो ये बहुत अधिक आत्मीय और संवेदना से भरे शब्द होते हैं. दो-चार वर्णों से बने इन शब्दों में किसी भी व्यक्ति को बाँधे रखने की शक्ति होती है. कितना भी कठोर दिल इन्सान हो उसकी आँखों को नम कर देने की क्षमता भी इन शब्दों में होती है.


आज के दौर में जहाँ बहुतायत सम्बन्ध, रिश्ते स्वार्थपूर्ति के लिए बनाये जाने लगे हैं वैसे में भावनात्मकता से भरे संबंधों का अपना ही महत्त्व है. इस महत्ता को, इन संबंधों को वही समझ सकता है जो इनको उसी गंभीरता से निभाता हो. इस स्थिति से दो-चार होने पर एहसास हुआ कि कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं, अपनी बात कहने के लिए. बात को कहने से ज्यादा शब्दों को रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. शब्दों से ज्यादा आँखों की नमी सबकुछ कह देने को व्याकुल सी दिखती है. खुद को कमजोर न पड़ने देने के साथ-साथ सामने वाले को भी कमजोर न होने देने का प्रयास करना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि शब्दों को प्रकट कर देना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उनको रोके रखना? आँखों की नमी को छिपाना ज्यादा मुश्किल है या फिर नजरों का न मिलाना?


बहरहाल, ये हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बहुत से क्षणों में बात को न कहना, आँखों की नमी का छलकना, नज़रों का सामने वाले की नजर से बचाना ही सबकुछ कह देता है. इस सबकुछ कहे जाने को समझना ही महत्त्वपूर्ण है. 




10 फ़रवरी 2022

हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगीतो इसमें आश्चर्य न होगा. यह सच है कि हम लोग मौत की खबरों का, किसी की मृत्यु से पूर्व की शारीरिक अवस्था का, कहीं भी हुई दुर्घटनाओं के वीभत्स दृश्यों आदि का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती. कुछ लोग संवेदनहीनता की हद से आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगेमीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगाक्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहींकिसी सड़क दुर्घटना के वीभत्स दृश्यचिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है. इसके अलावा किसी सेलिब्रिटी की मृत्यु पर उसकी शारीरिक अवस्था की दुर्बलता, उसकी बीमारी से उपजी मनोदशा आदि का प्रसारण, किसी ख्यातिलब्ध व्यक्ति की मृत्यु की भ्रामक, गलत खबर का लगातार प्रसारित किया जाना भी संवेदनहीनता की, मृत्यु का आनंद लेने जैसी ही अवस्था है. 


ऐसा सोशल मीडिया के नशे की तरह से इस्तेमाल करने, सबसे पहले हमारे द्वारा की मानसिकता, पल दो पल में अनेक वीभत्स चित्रों, वीडियो के आते रहने के कारण होने लगा है. देखा जाये तो सोशल मीडिया पर ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गयाखेल का सामान हमारे लिए बन गया लगातार चरितार्थ होती दिख रही है. कहीं सुखद घटना हो या फिर दुखदहास्य का विषय हो या फिर विषाद काकिसी कार्यक्रम का आयोजन है या फिर कोई दुर्घटना की भयावहतासबकुछ आनन-फानन सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइलहर हाथ में इंटरनेटहर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है.


आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन हैसमाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज परसमाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों सेप्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हमारे द्वारा की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है. तकनीक का वर्तमान दौर भयावह सा लगने लगा है. यहाँ हर कोई अपने आपको तकनीक का पुरोधा समझ कर उसका दुरुपयोग करने में लगा है. इस दुरुपयोग से मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ हैसंवेदनाओं को नष्ट किया है.


यदि संजीदगी से विचार किया जाये तो हम लगभग रोज ही सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से हिंसाबलात्कारहत्यादुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स तस्वीरों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शवफंदे पर लटकता किसी का शवदुर्घटना में क्षत-विक्षत देहशारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की नग्न देह सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर भेज दिए जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर काकिसी देह काकिसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता हैकिसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता है किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी.


तकनीक से जुड़े रहने के क्रम मेंसबसे पहले सूचना देने के लोभ मेंबहुतायत लोगों तक सूचना-सम्प्रेषण के चलते वर्तमान में ऐसे-ऐसे चित्रों कावीडियो का प्रसारण किया जा रहा है जो किसी भी रूप में नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे आज के दौर में जबकि रिश्तों कासंबंधों कासंस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना होता है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. किसी समय में पत्रकारिता में ऐसे चित्रों का प्रकाशनप्रसारण निषिद्ध माना जाता थाऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करने जैसा समझा जाता थाशारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की पहचान को किसी भी रूप में उजागर करना सामाजिक रूप से प्रतिबंधित माना गया थाक्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस समझा जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे अपराध उजागर करने के लिए अनिवार्य माना जाने लगा हैजागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है.


तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. कई बार सरकारों की तरफ से सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया किन्तु उसमें वो सफल नहीं हुई. आश्चर्य तो इसका हुआ कि पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का विरोध अति-जागरूक जनता ने करके सरकार को अपने कदम वापस लेने को विवश कर दिया. ऐसे में स्वयं नागरिकों कोसोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या-क्या पोस्ट किया जायेक्या-क्या प्रतिबंधित रखा जाये. जिस तरह से क्षत-विक्षत शवों कीदर्दनाक हादसों कीदेह की नग्नता कीहत्याओं-आत्महत्याओं की तस्वीरेंवीडियो सोशल मीडिया के विविध माध्यमों के द्वारा एक पल में हजारों-हजार लोगों तक प्रेषित कर दिए जाते हैं वो चिंतनीय है. ये सत्य है कि वर्तमान में सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ आते एक अप्रत्यक्ष सा संकट को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के नाम पर ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरेंवीडियो अपने आरंभिक दौर में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैंसंवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देती हैं. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों के लिए अभ्यस्त हो जाना संवेदनाओं को समाप्त करता है. घटना के प्रतिदुर्घटना के प्रतिमरने वाले के प्रतिशोषित के प्रतिमृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्याबलात्कारआत्महत्याहिंसादुर्घटना आदि की खबरेंदृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैंसूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्याबलात्कारदुर्घटनामृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. कब हम इंसान से जानवर बन जाते हैंकब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्तिइससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता कावीभत्सता काविकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.


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(उक्त आलेख को जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र सच बेधड़क, दिनांक 10-02-2022, के अंक में प्रकाशित किया गया है.)

01 जून 2021

संवेदनहीन होकर हम मौत को एन्जॉय करने लगे हैं

आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगी, हमारे प्रति एक अलग तरह की ही सोच बनी होगी तो इसमें आश्चर्य न होगा. हमने खुद इस शीर्षक को लिखने के पहले बहुत सोचा मगर सच यही लगा कि हम सबने अब मौत को ‘एन्जॉय’ करना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए भी कह सकते हैं क्योंकि इस कोरोना के विषम समय में भी लोग मौत की खबरों का प्रसारण करने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं. मौतों का होना एक तरह की घटना है जो उससे सम्बंधित व्यक्ति को जोड़ती है तो बहुत से लोगों को परेशान भी करती है. ऐसा समझने के बाद भी यदि हम मौत की खबरों का इधर-उधर भेजना नहीं रोक पा रहे हैं तो स्पष्ट है कि अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती.


हाँ, ऐसा तब गलत हो जाता है जबकि ऐसा किसी हमारे अपने के साथ हुआ हो. किसी अपने की मृत्यु पर हम विचलित भी होते हैं, संवेदित भी होते हैं, भावनाओं में भी बहते हैं. अपने परिजनों से इतर, अपने ख़ास लोगों से अलग किसी भी मृत्यु को हम सभी आजकल एन्जॉय करने लगे हैं. ऐसा गलत न लगे तो खुद देखिये आजकल सोशल मीडिया पर मौतों की खबरों को. ऐसे-ऐसे लोगों के बारे में लोग खबरें लगाने में लगे हैं जिनसे उनका सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है. बात यहाँ तक कुछ ठीक भी मान ली जाये मगर कुछ लोग इससे आगे जाकर मौतों पर कार्टून बनाने लगे, मीम्स, जोक्स बनाकर मस्ती करने लगे. इसे क्या कहा जायेगा? क्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहीं? कोरोना से होने वाली मौतों, श्मशान घाट के चित्र, वीडियो, चिकित्सालयों में मृतकों और उनसे जुड़े लोगों की स्थिति आदि को संवेदनहीनता के स्तर से दिखाया जाना यही साबित करता है.




इधर ऐसा समझ आ रहा है कि आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन है, समाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हम की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. देखने वाला उसे अपनी आँखों से देखता है. कोई उस मृत देह की मांसलता देखता है, कोई उस मृत देह में जेवरात खोजता है, कोई उसके परिधान देखता है. किसी के लिए भी वह संवेदनशीलता का मसला नहीं होता है. एक पल में सम्बंधित चित्र को देखने के बाद, सम्बंधित खबर को पढ़ने के बाद उससे सम्बंधित कार्टून, चुटकुले दिमाग में उभरने लगते हैं. इसके बाद वही होता है जो आजकल हम सभी करने में लगे हैं. एक चित्र और उसके साथ कई-कई चुटकुले, कार्टूनों का प्रसारण, शेयर कई-कई लोगों तक होने लगता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके.

 

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16 जुलाई 2020

इस बार तुमने रुला दिया अशीम

उस दिन बहुत से चेहरों से दो दशक से अधिक समय बाद मिलना हो रहा था. बहुत से चेहरे तो ऐसे थे जिनसे पहली बार मिलना हो रहा था. उस दिन के पहले न कभी भी, कहीं भी मुलाकात हुई थी, न कभी कोई बात हुई थी, न फोन से कोई बात हुई थी इसके बाद भी उन तमाम नए चेहरों पर सम्मान भाव झलक रहा था, आदर का भाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था.


कॉलेज के उस कैम्पस में, जिसे छोड़े हुए चौबीस साल हो गए थे बहुत सारे जाने-अनजाने चेहरों से आत्मीयता के साथ मिलना हुआ. उन्हीं पहली बार मिलने वाले चेहरों में से एक चेहरा ऐसा सामने आया जो बस परेशान सा करता दिख रहा था. परेशान करने का अंदाज भी ऐसा जिसमें परेशानी नहीं बल्कि अपनेपन का बोध झलक रहा था. लोगों के साथ हँसी-मजाक करने का ऐसा स्वरूप जो उस चेहरे के खिलंदड़ बोध को बता रहा था.

हॉस्टल मीट के दौरान चाय-नाश्ते के इंतजाम में खुद तत्पर अशीम 

उसकी तमाम उलटी-सीधी हरकतों के बीच हमारी चाय पीने की इच्छा को वह जग भर चाय लेकर पूरी करने आ गया. अपने उस परिवार में बड़े होने के हमारे बोध ने उस चेहरे के प्रति आकर्षण नहीं जगाया मगर इतना संकेत अवश्य करवाया कि ये व्यक्ति चुपचाप बैठने वालों में से नहीं है. चाय-नाश्ता बनने के दौरान उसकी तमाम हरकतों के बीच उस नए-नवेले चेहरे का परिचय अपने पुराने साथियों से लिया तो मालूम चला कि उस चेहरे का नाम अशीम है, अशीम प्रकाश जैन. उसकी तमाम हरकतों को देखते हुए मन ही मन एक प्रतिक्रिया उभरी कि हमारे परिवार का ये भी एक बवाली सदस्य समझ आ रहा है.


चूँकि उस दिन हम सभी हॉस्टल मीट के आयोजन पर दो दशकों से अधिक समय बाद मिल रहे थे तो सभी एक-दूसरे से मिलने, पुराने दिनों को याद करने, आपस में सबकी टांग खिंचाई में लगे थे. उसी दौरान अशीम की अपनी स्वाभाविक सी हरकतों के बीच किसी ने हमारी तरफ इशारा करते हुए उसे टोका भी कि न हुए तुम इन भाईसाहब के समय में न तो भूल जाते सब नौटंकी. उसकी प्रतिक्रिया में उसकी हँसी पर हम सब मुस्कुरा कर उसकी हरकतों का आनंद लेते रहे.

कॉलेज के हॉल में बैठने के बाद आपसी संवाद, परिचय, कार्यक्रम के दौरान अशीम की गतिविधियाँ निरंतर बिना किसी गतिरोध के, बिना किसी झिझक के चलती रहीं. मंच संचालक युवक-युवती से माइक छीन कर अपनी बात कहने लगना, परिचय के दौरान अपने साथियों पर कमेंट करना आदि हास्यबोध के रूप में बराबर बना रहा. उस दौरान उसे यह कहते हुए टोका कि अशीम अब न माने तो अभी मंच पर सबके सामने तुम्हारी रैगिंग ले ली जाएगी. इसी दौरान एक बड़े भाई द्वारा उसे एक टिप्पणी पर बुरी तरह से डाँट भी पड़ी मगर अशीम जैसे किसी सीमा में बंधा ही नहीं था. उसकी बालसुलभ हरकतें लगातार ज़ारी रहीं.


वो दिन सबके हंगामा काटने का ही दिन था, सबको एक-दूसरे को देखकर उत्साहित होने के दिन था, सबको पुराने दिनों में गोते लगाने का दिन था इसलिए सब अपनी ही रौ में मगन थे. उस दिन के बाद अशीम से मुलाकात का माध्यम सोशल मीडिया के मंच बने रहे. कभी-कभी उसकी वही हास्य से भरी इक्का-दुक्का टिप्पणी पढ़ने-देखने को मिलतीं, कभी-कभी फोटो-वीडियो से मुलाकात हो जाती मगर उस दिन के बाद आमने-सामने मिलना न हो सका.

इसके बाद भी जिस बंधन में हम सभी हॉस्टल के भाई बंधे हुए हैं वह आपस में आत्मीयता बनाये रहा. उसी आत्मीय माला के एक मोती के रूप में आज अशीम के सीमामुक्त हो जाने का समाचार मिला. एकबारगी विश्वास ही न हुआ. अभी महज बारह-पंद्रह दिन पहले उसके वीडियो देखे थे. आपस में टीका-टिप्पणी भी हुई थी और आज ये खबर. विश्वास न होने के कारण इधर-उधर संपर्क साधा गया और अंततः बुरी खबर के सत्य होने की पुष्टि हुई. हॉस्टल के भाइयों की माला का एक फूल असमय सूख गया. अचानक से 8 अप्रैल 2017 का वह दिन और अशीम की तमाम हरकतें आँखों के सामने घूम गईं.

उस दिन के बाद से हॉस्टल बगिया के दो फूल असमय मुरझाकर हम सबको रुला गए. बहुत कुछ सोचते थे, बहुत कुछ बस विचारों में ही रह गया. अब न अशीम को मिलना है, न उसकी उन हास्यबोध से भरी हरकतों से सामना होना है, न उससे रैगिंग लिए जाने की बात कह पाना है. अब बस वो हम सबकी यादों में है, यादों के सहारे ही हम सबके बीच है. जहाँ भी रहो, हमेशा वैसे ही हँसते-हँसाते रहो.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

29 अप्रैल 2020

मृत्यु की खबर पर हम संवेदनशील या असंवेदनशील

हम सबको किसी की मृत्यु भी तभी संवेदित करती है जबकि वह किसी नामधारी से जुड़ी हुई हो. किसी जनसामान्य की मृत्यु पर हम आम नागरिकों का संवेदित होना शायद हम सबको ही न सुहाता हो. ऐसा करना शायद हमें अपनी ही तौहीन समझ आता हो. ऐसा सिर्फ आपके साथ ही नहीं, हमारे साथ भी है. किसी क्षेत्र विशेष के प्रसिद्द व्यक्ति के गुजरने पर हम सभी ऐसे शोकाकुल होते हैं जैसे वह व्यक्ति हमारे अत्यंत निकट का हो. इसके उलट हम उस व्यक्ति के लिए उस गहराई से संवेदित नहीं हो पाते जो हमारे ही शहर का हो मगर हमसे परिचित न हो. संवेदना प्रकट करने की इस स्थिति का अपना ही मनोविज्ञान है.


किसी भी प्रसिद्द व्यक्ति से हम सभी भले ही एकबार भी न मिले हों, भले ही उसे कभी आमने-सामने न देखा हो किन्तु उसके निधन की खबर हमें दुःख देती है. ऐसा इसलिए क्योंकि हम उसे किसी न किसी माध्यम में, किसी न किसी मंच से देखते रहे हैं. उसकी बातों को सुनते रहे हैं, उसके हावभाव से परिचित रहे हैं. ऐसे में वह व्यक्ति हमें अपना सा लगता है. इसके साथ-साथ किसी नामधारी व्यक्ति के निधन पर संवेदना के दो शब्द हमारी गंभीरता के परिचायक भी बनते हैं, हमें जागरूक बनाने का काम करते हैं, ऐसा कहीं न कहीं हमारे अचेतन में चलता है. ऐसी घटना, खबर के बाद भी यदि हम दो शब्द श्रद्धांजलि के प्रकट नहीं करते हैं तो हमें लगता है कि हमारे जानने वाले क्या सोचेंगे? लोग हमारे बारे में क्या कहेंगे? सोशल मीडिया के इस दौर में यह सोच, यह मानसिकता और अधिक हावी हुई है.


हमारा मंतव्य यह कतई नहीं कि ऐसा नहीं होना चाहिए. ये सबका नितांत निजी, व्यक्तिगत मामला है कि वह किसके प्रति संवेदित होता है, किसके प्रति संवेदना प्रकट करना चाहता है, किसके प्रति नहीं. इसके लिए किसी के कदमों पर, किसी के प्रयासों पर सवालिया निशान नहीं लगाया जाना चाहिए. आज के इस दौर में हमने ऐसा होते देखा, आज फिर देखा उस दौर में देखा जबकि एक दिन में पूरे विश्व में हजारों की संख्या में मौतें हो रही हैं मगर हम एक पल को संवेदित नहीं हुए. इन मौतों के कारण यदि हम कुछ हुए हैं तो भयभीत. यदि इन पर हमने कुछ किया है तो खुद को और अपने परिजनों को बचाए रखने का काम. विश्व स्तर पर ही नहीं देश में ही इन्हीं दिनों में कई-कई हत्याएं हुईं, कई-कई मौतें हुईं मगर हमने उन पर संवेदना किसी न किसी राजनैतिक कारणों से की न कि अपने इन्सान होने के कारण.

ये हम सबके लिए सोचने का विषय है, खुद हमारे लिए भी कि हम कितने अमानवीय होते जा रहे हैं, क्यों? हम इस कदर असंवेदनशील क्यों होते जा रहे हैं? क्यों हम मृत्यु जैसी खबर को लेकर या तो संवेदना के शीर्ष पर होते हैं या फिर असंवेदना के रसातल पर? सोचने की आवश्यकता है, शायद सोचने का काम करें भी क्योंकि लॉकडाउन अभी इसके लिए समय भी दे रहा है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

25 मई 2019

बच्चों का ऊँची इमारत से कूदने को भी तुमने इवेंट बना दिया


सूरत की बिल्डिंग में लगी आग सिर्फ वहाँ की अव्यवस्था की निशानी नहीं है बल्कि वहाँ तमाशबीन बने नागरिकों के संवेदनहीन होने की तथा सरकारी तंत्र की नाकामी की भी निशानी है. आग लगने के बाद जिस तरह से उस इमारत की चौथी मंजिल से बच्चे कूदते दिखाई दे रहे थे, वह घबराहट पैदा करने वाला है. उन बच्चों को निश्चित ही यह मालूम होगा कि इतनी ऊँचाई से कूदने के बाद उनके बचने की उम्मीद बहुत कम होगी. इसके बाद भी उनका कूदना कहीं न कहीं यही आशा लिए होगा कि शायद बच जाएँ. संभव है कि आग लगने के दौरान मची भड़भड़ के दौरान उन बच्चों को पहले तो आग से अपनी जान बचाना समझ आया होगा, वे यह भूल ही गए होंगे कि ऊंची इमारत से कूदना भी सुरक्षित नहीं है. वे बच्चे तो अग्निकांड से, बढ़ते धुँए से परेशान रहे होंगे, अपनी जान बचाने की कोई न कोई राह तलाश रहे होंगे, किसी न किसी तरह बस बचना चाह रहे होंगे. उस समय उनके सोचने-समझने की क्षमता पर ग्रहण लगना स्वाभाविक सा है मगर उसी इमारत के नीचे इकट्ठी भीड़ तो संज्ञा-शून्य नहीं थी. उसके पास किसी तरह से बचने की, अपनी जान बचाने की कोशिश करने की कोई हड़बड़ी नहीं थी. उसके सामने उसकी जान का संकट भी नहीं था. इसके बाद भी तमाशबीन भीड़ बस एक संवेदनहीन भीड़ ही बनी रही. अपने परिचितों के उन लोगों को जो वहां नहीं थे, उनके लिए, सूरत से दूर बैठे उनके परिचितों के लिए, सोशल मीडिया के मित्रों के लिए वे वीडियो बनाने में लगे हुए थे.


एक पल को सोचिये, चौथी मंजिल से कूदते बच्चे, सड़क पर खड़ी भीड़, वीडियो बनाते लोग, चिल्लाते-सिर पकड़ते नागरिक, मुँह ताकती फायर ब्रिगेड की फ़ौज. यह सब दिल दहलाने वाला है. सोचकर ही दिल डूबने सा लगता है. मन उदास नहीं होता वरन उस भीड़ पर गुस्सा करता है. वीडियो बनाती भीड़ ने, आग बुझाने आये दमकलकर्मियों ने उस समय अपना दिमाग क्यों नहीं दौड़ाया? क्यों उन्होंने कूदते बच्चों को बचाने के प्रयास नहीं किये? सोचिये, क्या उस बिल्डिंग के आसपास की दुकानों में चादरें न रही होंगी, परदे न रहे होंगेक्या भीड़ बनकर ताकते, रिकॉर्डिंग करते लोग मिलकर एक सघन घेरा नहीं बना सकते थेक्या फायर ब्रिगेड के पास कूदते लोगों को बचाने के लिए कोई जाल वगैरह नहीं होता? या फिर इन सब सवालों से बड़ा सवाल कि क्या हम सब संवेदनहीन हो चुके हैं? हम वाकई संवेदनहीन हो चुके हैं. जितनी भीड़ वहाँ दिख रही है उसके द्वारा उसी तरह से मानव इमारत बनाया जा सकता था जैसा कि दही-हांडी फोड़ने के समय बनाया जाता है. ऐसा यदि उस भीड़ के द्वारा नहीं किया जा सकता था तो कम से कम भीड़ मिलकर सघन घेरा बना सकती थी.  चादरों, पर्दों के द्वारा, नागरिकों के बनाये सघन घेरे से गिरते बच्चों के फ़ोर्स को कम तो किया ही जा सकता था. ऐसा कुछ नहीं किया जा सका. न तो भीड़ जिम्मेवार दिखी और न ही अग्निशमन वाले. क्या उस विभाग के पास इतने इंतजाम नहीं कि ऊंची इमारत तक पहुँचा जा सके? क्या उसके पास किसी ऊंची इमारत से कूदते-गिरते लोगों को बचाने के लिए एक जाल नहीं. यह उस विभाग की, सरकारी तंत्र की अक्षमता को ही दर्शाता है. 


अब सारा ठीकरा कोचिंग सेंटर पर, उसकी अनुमति देने वाले पर, उस इमारत के मालिक पर फोड़ा जायेगा. उनको दोष देते हुए सारे मामले को दबाने की कोशिश की जाएगी. तमाम सारे अनर्गल कदम उठाये जाने के बाद भी कोई सार्थक कदम नहीं उठाया जायेगा. किसी को जिम्मेवार न बनाते हुए बस उस हादसे को भुला दिया जायेगा. समझ नहीं आता कि इस तरह की बड़ी-बड़ी इमारतों में बाहर निकलने के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किये जाते? क्यों इस तरह की व्यापारिक, व्यावसायिक जगहों पर सुरक्षा के इंतजाम सशक्त नहीं किये जाते? क्यों प्रशासन द्वारा नागरिकों को ऐसी किसी विभीषिका से निपटने के तरीके नहीं बताये जाते? बाकी कोचिंग सेंटर्स या फिर ऐसी ऊँची-ऊँची इमारतों में संचालित अनेक संस्थाओं, रेस्टोरेंट, दुकानों आदि की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में कहना ही क्या. हम सभी लोग, सबकुछ जानने के बाद भी अनजान बने रहते हैं. आँखों पर पट्टी बांधे रहते हैं. होंठों को सिले रहते हैं. अब बोलेंगे भी, लिखेंगे भी, आँसू भी बहाए जायेंगे, मोमबत्तियां भी जलाई जाएँगी, जुलूस निकाले जायेंगे मगर ध्यान रखियेगा, जो बच्चे चले गए, वे वापस न आयेंगे. और हाँ, हम इसके बाद भी आगे के लिए सचेत न हो पाएंगे.

07 अप्रैल 2019

सवालिया निशान हम सबके ऊपर भी हैं


किस हद तक असंवेदनशील होते जा रहे हैं हम इसका अंदाजा लगातार किसी न किसी घटना से लगता ही रहता है. कभी पढ़ने को मिलता कि खाद्य-सामग्री में मिलावट की जा रही है. दूध में यूरिया मिलाया जा रहा. दवाइयों में मिलावट की जा रही है. कुछ सालों पहले खून में भी मिलावट करके बेचने वाला गिरोह पकड़ा गया था. मानव-अंगों की तस्करी की खबरें भी सामने आती रहती हैं. किसी लालच के चलते बच्चों की बलि दिए जाने की खबरें इक्कीसवीं सदी में पढ़ने को मिलती रहती हैं. मासूम बच्चियों का शारीरिक शोषण करके उनकी बर्बर हत्या कर देने की खबरें भी इधर आम हो चली हैं. इन खबरों को पढ़ने के बाद मन खिन्न हो उठता है कि आखिर किस दिशा में समाज जा रहा है? पढ़े-लिखे होने का दंभ करने के बाद भी कैसा समाज बनाने में लगे हैं हम सभी. आज एक खबर पढ़ने को मिली तो मनोदशा अजब सी हो गई. एक बच्ची के बोर-वेल में गिरने के बाद शुरू हुआ बचाव कार्य उसे निकाले बिना ही रोक दिया गया. 


बचाव कार्य के दौरान वह बच्ची सीमा, पच्चीस फीट से सरकते हुए साठ फीट तक पहुँच गई. गड्ढे में भेजी जा रही ऑक्सीजन की पाइप भी इस दौरान टूट गई, जिससे गड्ढे में ऑक्सीजन पहुँचना भी बंद हो गया. साठ फीट पर बच्ची के पहुँच जाने के बाद और मिट्टी के रेतीली होने के कारण लगातार वह धसक रही थी. आसपास के मकानों के गिरने का भी संकट उत्पन्न हो गया था. ऐसे में बचाव कार्य में लगे लोगों द्वारा यह मानते हुए कि साठ फीट गहराई तक जा चुकी बच्ची जीवित न रही होगी, बचाव कार्य रोक दिया गया. यह अपने आपमें कितना संवेदनहीन मामला है कि एक बच्ची को बिना निकाले, बिना स्पष्ट पुष्टि हुए कि वह जीवित भी है या नहीं बचाव कार्य रोक दिया गया. मन सोच-सोच कर ही व्यथित हो उठता है कि सिर्फ बचाव कार्य ही नहीं रोका गया वरन वहाँ के सभी गड्ढों को मिट्टी डालकर बंद कर दिया गया.


एक बार को उस स्थिति की कल्पना कीजिये कि कैसे उस बच्ची के घरवालों ने बचाव कार्य बंद करने सम्बन्धी सहमति दी होगी? किस मनोदशा में बचाव कार्य को बंद किया गया होगा? कैसे बचाव कार्य में लगे अधिकारियों ने उन गड्ढों को मिट्टी से भरने का आदेश दिया होगा? कैसे दस-बारह मकानों का बचाया जाना एक बच्ची के बचाने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया? फ़िलहाल तो वह बच्ची जिंदा ही दफ़न कर दी गई उस बोर-वेल में, यह मानते हुए कि वह जीवित न बची होगी. क्या अब भी इस तरह की घटनाओं से सबक नहीं लिया जायेगा? क्या ऐसे मामलों में बोर-वेल खुदवाने वालों को अपराधी घोषित करते हुए उनको कानूनन सजा नहीं दी मिलनी चाहिए? क्या ऐसी घटनाएँ बस दो-चार दिन चर्चा में रहने के बाद फिर किसी बच्चे की मौत का इंतजार करने लगेंगी? क्या सिर्फ प्रशासन को ही दोष देते हुए हम नागरिक अपनी जिम्मेवारियों से बचते रहेंगे? क्या हमारा कोई दायित्व नहीं है? बहुत से बिन्दु हैं जो हमारे बुद्धिजीवी होने पर, हम सभी के इक्कीसवीं सदी के नागरिक होने पर, हम सभी के संवेदनशील होने पर सवालिया निशान लगाते हैं.

05 मार्च 2019

पता नहीं किस गर्भनाल से जुड़े हैं हम सब

सत्यपाल, तुम्हारे और हमारे बीच क्या रिश्ता था? न सगे सम्बन्धी, न कोई रिश्तेदारी. जब पहली बार मिले 1991 में उससे पहले से भी कोई परिचय नहीं. मिलने के बाद भी बहुत लम्बा समय साथ नहीं गुजरा. मात्र दो साल साथ बीते, वे भी बहुत आत्मीयता से नहीं, बहुत अंतरंगता से नहीं. एक भाव था हमारे-तुम्हारे मिलने में. एक बड़े-छोटे का लिहाज, एक जूनियर-सीनियर की अप्रत्यक्ष सी दीवार का. उस दीवार का जिसे हम हॉस्टल वाले भाइयों के कभी का गिरा दिया था. उस दीवार के गिरने के बाद हॉस्टल में बस एक ही रिश्ता रह गया था भाई का. वो चाहे कुछ दिन रहा हो या बहुत दिन मगर जितने दिन रहा तो भाई बनकर. तो क्या हम दोनों भाई वाले रिश्ते से साथ जुड़े थे? ये सवाल आज भी कौंधा हमारे मन में जब तुम इस निस्सार संसार को छोड़कर जा चुके थे. ये सवाल बार-बार कौंधा मन में जबसे तुम्हारे सबको छोड़ कर जाने की खबर सुनी. क्या बस भाई का रिश्ता था हम दोनों के बीच? ऐसा इसलिए कि जबसे तुम्हारे बारे में सुना, तबसे यही सोचने में लगे कि तुमसे इस अवस्था में भी मिलने की आतुरता क्यों? तुमको क्यों इस अंतिम अवस्था में देख लेने की कामना क्यों? क्यों विचार आया बार-बार मन में कि तुम्हें तो पंचतत्त्व में विलीन हो जाना ही है फिर क्यों इतनी आकुलता तुम्हारे अंतिम दर्शन कर लेने की? क्यों? ये समझ न सके, समझ भी नहीं पा रहे.


जितना समझने की कोशिश की, उतनी बार ही असफल रहे. हॉस्टल में तो हम लोग महज दो साल के लिए मिले. वे भी बहुत अंतरंगता से नहीं मिले. बहुत आत्मीयता से नहीं मिले. यकीन मानो उन दो सालों की एक-दो बातों को छोड़ कोई बातें याद नहीं कि हम दोनों ने बहुत आत्मीय पल एकसाथ गुजारे हों. फिर क्यों ऐसी आकुलता तुमको देखने की? क्यों ऐसी आकांक्षा तुमसे अंतिम बार कुछ बात कहने की? विचार करते हैं कई बार तो लगता है कि हॉस्टल में तो बहुत लोग रहने को आये, बहुत से लोग रहे  और चले गए. बहुत से लोगों ने हॉस्टल को बस एक तरह का धर्मशाला समझ लिया था. हम-तुम जैसे बहुत से भाई ऐसे रहे जिन्होंने हॉस्टल को एक घर माना और एक घर में रहने वाले आत्मा से, दिल से जुड़े होते हैं, किसी रिश्ते से नहीं. बहुत से भाई ऐसे हैं जिनका और हमारा कोई साथ न हुआ हॉस्टल में, कभी देखा भी नहीं एक-दूसरे को मगर वे किसी भी छोटे भाई से ज्यादा अपने लगते हैं. 


बहुत बार लगता है कि यही हॉस्टल के पानी का कमाल है कि न जाने कितने अनजान भाइयों को एक धागे में बाँध दिया है. अलग-अलग माताओं की कोख से जन्मने के बाद भी लगता है कि सबकी गर्भनाल एक ही है. सब इसी एक गर्भनाल से आपस में जुड़े हुए हैं. इसी का असर है कि आज सबकी आँखों में आँसू हैं. कोई काले चश्मे की आड़ में छिपा रहा है, कोई किसी साफी के द्वारा पोंछ रहा है, कोई बातचीत में नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहा है. मात्र दो सालों का सम्बन्ध ऐसा नहीं होता, वो भी तब जबकि हॉस्टल छोड़ने के बाद दशकों तक कोई मुलाकात न हो. इसका मतलब है कि कोई अप्रत्यक्ष गर्भनाल हम सबके बीच जुड़ी हुई है, न सही जन्म देने वाली माँ की वरन कर्मक्षेत्र वाली माँ की. सत्यपाल, सुन लो, तुम किसी भी रूप में हो, कहीं ही हो.... तुमको अपने से अलग न होने देंगे. मोक्ष मिलेगा या नहीं ये भविष्य की बात है मगर हॉस्टल वाले भाई हर कदम पर मिलेंगे, ये विश्वास रखना. तुम अपने को अकेले न समझना इस राह पर, हम सब हॉस्टल वाले भाई हैं तुम्हारे साथ. हॉस्टल का कोई भी भाई तब भी अकेला न था, आज भी अकेला नहीं है, कल भी अकेला न रहेगा.

16 दिसंबर 2018

संवेदनहीन भी बना रहा है सोशल मीडिया


आजकल सोशल मीडिया पर ये पंक्ति वो तड़प कर अपनी जान से गया, खेल का सामान हमारे लिए बन गया लगातार चरितार्थ होती दिख रही है. कहीं सुखद घटना हो या फिर दुखद, हास्य का विषय हो या फिर विषाद का, किसी कार्यक्रम का आयोजन है या फिर कोई दुर्घटना की भयावहता, सबकुछ आनन-फानन सोशल मीडिया पर शेयर करने का चलन हो गया. दरअसल हर हाथ में मोबाइल, हर हाथ में इंटरनेट, हर हाथ में तकनीक ने यदि जीवन को विविध पहलुओं के सन्दर्भ में सहज-सरल बनाया है तो उसके साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का गला भी घोंट दिया है. तकनीक का वर्तमान दौर भयावह सा लगने लगा है. यहाँ हर कोई अपने आपको तकनीक का पुरोधा समझ कर उसका दुरुपयोग करने में लगा है. इस दुरुपयोग से मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है, संवेदनाओं को नष्ट किया है. आज सोशल मीडिया की उपयोगिता को भुलाया नहीं जा सकता है पर इसके साथ-साथ वह अपने साथ एक अप्रत्यक्ष सा संकट लिए चला आ रहा है.


यदि संजीदगी से विचार किया जाये तो हम लगभग रोज ही सोशल मीडिया के किसी न किसी माध्यम से हिंसा, बलात्कार, हत्या, दुर्घटना सम्बन्धी वीभत्स तस्वीरों को देख रहे हैं. रक्तरंजित शव, फंदे पर लटकता किसी का शव, दुर्घटना में क्षत-विक्षत देह, शारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की नग्न देह सहित न जाने कितनी तरह के ह्रदयविदारक चित्र हमारे सामने एक क्लिक पर भेज दिए जाते हैं. यहाँ इन चित्रों को भेजने वालों की मंशा किसी भी रूप में किसी शरीर का, किसी देह का, किसी की नग्नता का प्रदर्शन करना नहीं होता है, किसी भी रूप से उसका मकसद नग्न देह को देखने-दिखाने का भी नहीं होता है किन्तु ऐसे लोग अनजाने में एक ऐसी प्रवृत्ति का विकास कर रहे होते हैं जो भविष्य में मानवीय संवेदनाओं को समूल नष्ट कर देगी. तकनीक से जुड़े रहने के क्रम में, सबसे पहले सूचना देने के लोभ में, बहुतायत लोगों तक सूचना-सम्प्रेषण के चलते वर्तमान में ऐसे-ऐसे चित्रों का, वीडियो का प्रसारण किया जा रहा है जो किसी भी रूप में नैतिक नहीं कहा जा सकता है. वैसे आज के दौर में जबकि रिश्तों का, संबंधों का, संस्कारों का मोल न रह गया हो वहाँ नैतिकता की बात करना स्वयं को कटघरे में खड़ा करना होता है किन्तु समझना होगा कि जाने-अनजाने समाज को किस दिशा में मोड़ा जा रहा है. किसी समय में पत्रकारिता में ऐसे चित्रों का प्रकाशन, प्रसारण निषिद्ध माना जाता था; ऐसे चित्रों को उजागर करने का अर्थ मृत व्यक्ति के साथ अन्याय करने जैसा समझा जाता था; शारीरिक दुराचार का शिकार किसी महिला की पहचान को किसी भी रूप में उजागर करना सामाजिक रूप से प्रतिबंधित माना गया था; क्षत-विक्षत देह को सार्वजानिक रूप से प्रदर्शित करना नृशंस समझा जाता था किन्तु आज तकनीकी के चलते इसे अपराध उजागर करने के लिए अनिवार्य माना जाने लगा है; जागरूकता फ़ैलाने वाला समझा जाने लगा है.

 तकनीक के प्रचार-प्रसार को रोक पाना अब किसी के लिए संभव नहीं है. कई बार सरकारों की तरफ से सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया किन्तु उसमें वो सफल नहीं हुई. आश्चर्य तो इसका हुआ कि पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध लगाने का विरोध अति-जागरूक जनता ने करके सरकार को अपने कदम वापस लेने को विवश कर दिया. ऐसे में स्वयं नागरिकों को, सोशल मीडिया का अतिशय उपयोग करने वालों को सजग होना पड़ेगा कि उनके द्वारा क्या-क्या पोस्ट किया जाये, क्या-क्या प्रतिबंधित रखा जाये. जिस तरह से क्षत-विक्षत शवों की, दर्दनाक हादसों की, देह की नग्नता की, हत्याओं-आत्महत्याओं की तस्वीरें, वीडियो सोशल मीडिया के विविध माध्यमों के द्वारा एक पल में हजारों-हजार लोगों तक प्रेषित कर दिए जाते हैं वो चिंतनीय है. अपराधों के प्रति जागरूकता लाने के नाम पर इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. नज़रों के सामने से गुजरती ऐसी तस्वीरें, वीडियो अपने आरंभिक दौर में मन-मष्तिष्क को विचलित करती हैं, संवेदित करती हैं किन्तु नज़रों के सामने से लगातार इनका गुजरते रहना इसका अभ्यस्त बना देती हैं. मन-मष्तिष्क का ऐसे दृश्यों के लिए अभ्यस्त हो जाना संवेदनाओं को समाप्त करता है. घटना के प्रति, दुर्घटना के प्रति, मरने वाले के प्रति, शोषित के प्रति, मृत देह के प्रति ऐसा व्यक्ति संवेदना के स्तर पर जुड़ने में असहज महसूस करता है या कहें कि जुड़ नहीं पाता है. यही कारण है कि आज हत्या, बलात्कार, आत्महत्या, हिंसा, दुर्घटना आदि की खबरें, दृश्य हमें संज्ञा-शून्य बनाये रखते हैं. हमारे लिए ऐसी खबरें मात्र खबर बनकर रह जाती हैं, सूचनाएँ बनकर समाप्त हो जाती हैं. लगातार एक के बाद एक तक प्रसारित-प्रचारित करते ऐसे वीभत्स दृश्य कब हमें संवेदनाहीन बना देते हैं, कब हमें इंसान से जानवर बना देते हैं, कब इन दृश्यों को महज जानकारी आदान-प्रदान करने का माध्यम बना देते हैं हमें स्वयं ही पता ही नहीं चल पाता है. काश कि हम सभी अपनी भावी पीढ़ी को नृशंसता का, वीभत्सता का, विकृतता का अर्थ समझा सकें. कहीं ऐसा न हो कि कल को ऐसे दृश्य इनके लिए मनोरंजन का साधन बन जाएँ.

02 नवंबर 2018

दिल के बजाय दिमाग के नियंत्रण में इंसान

हालात किस तरह इन्सान के साथ होने के बाद भी उसके नियंत्रण में नहीं होते हैं. वह चाहता कुछ और है और होता कुछ है. इसी तरह वह करता कुछ और है और हो कुछ और जाता है. ऐसी स्थिति में उसकी स्थिति तो जो होना है, वैसी होती है मगर उसके दिल की हालत बड़ी अजीब हो जाती है. आज भी देखने में आता है कि इन्सान किसी भी स्थिति में अपने बहुतेरे निर्णय दिमाग की बजाय दिल से लेता है. दिल के निर्णय लेने में हो सकता है उसे आर्थिक लाभ न हो, हो सकता है कि अन्य सामाजिक लाभ जो उसे मिलने हों वे न मिलें मगर वह संवेदनात्मक रूप से लाभान्वित रहता है. यही संवेदनात्मक लाभ कई बार उस व्यक्ति के लिए दुःख का कारक भी होता है. दिमाग की जगह पर दिल से काम करने वाला इन्सान किसी भी रूप में कुटिल नहीं हो सकता, ऐसा लेखक नहीं कहता वरन तमाम सामाजिक विज्ञान के शोधों से स्पष्ट हुआ है. ऐसे व्यक्ति को अनेकानेक बार संकटों का सामना करना पड़ता है. दिमाग से काम करने वाले उसके दिल का दुरुपयोग करके उसका अनुचित लाभ लेते हैं.


ये सामाजिक शोध विज्ञानियों को समझना होगा कि आखिर दिमाग की जगह पर दिल से काम करने वालों को कष्ट की अनुभूति क्यों होती है? शारीरिक संरचना के आधार पर देखा जाये तो दिल हो या दिमाग, दोनों कि शरीर के अंग मात्र हैं, इसके बाद भी दोनों कार्य संरचना और अनुभूति में अंतर क्यों? आज भी दिल से काम करने वालों को तरजीह नहीं मिलती वरन समाज के बहुसंख्यक लोगों की निगाह में उसे नाकारा समझा जाता है. क्या महज इसलिए कि दिल का सम्बन्ध विशुद्ध प्यार से जोड़ा गया है? क्या इसलिए कि दिल का मामला कहकर किसी भी इन्सान की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने की छूट सभी को मिल जाती है? क्या इसलिए कि दिल शब्द आने मात्र से किसी भी स्थिति को महज एक स्त्री एक पुरुष के बीच की बना दी जाती है? आखिर दिल को दिमाग के मुकाबले इतना हल्का क्यों माना जाता है? आखिर क्या कारण है कि दिल से लिए गए निर्णयों को सिर्फ हँसी का पात्र बनना पड़ता है? इस पर विचार करने की आवश्यकता है. सोचने वाली बात महज इतनी है कि दिल है तभी दिमाग संचालित है, तभी इन्सान संचालित है, तभी अन्य सामाजिक संक्रियाएं संचालित हैं. यदि दिल न हो सभी जगह सिर्फ और सिर्फ पाशविकता नजर आये. ऐसे में विचार सिर्फ और सिर्फ इसी का करना है कि हम समाज कैसा चाहते हैं, दिमाग-संचालित या फिर दिल-संचालित?

21 अगस्त 2018

मृत होती संवेदनाओं के बीच

पिछले कुछ दिनों से लगातार ऐसे समाचार पढ़ने को मिल रहे हैं जिससे समाज में संवेदनशीलता के स्तर का आभास होता है. तकनीकी, शैक्षिक, वैज्ञानिक, व्यापारिक, वैदेशिक विकास करने के बाद भी समाज में अभी संवेदनशील विकास अपेक्षित है. इन्सान ने चाहे सभी क्षेत्रों में भले ही विकास कर लिया हो, अपने झंडे गाड़ लिए हों मगर मानवीयता के स्तर पर वह अभी बहुत पीछे है. ऐसा नहीं है कि समाज से, इन्सान से मानवीयता का, संवेदनशीलता का पूरी तरह ह्रास हो गया हो किन्तु इसके सापेक्ष जिस तरह से असंवेदनशीलता, अमानवीयता बढ़ी है वह चिंतनीय है. भूख से तीन-तीन बेटियों की मृत्यु हो जाना, संरक्षण गृहों की बच्चियों के साथ यौन अपराध करना, आपसी रंजिश में महिला को जला देना, किसी साजिश की शंका में किसी महिला को सरेबाजार निर्वस्त्र कर देना आदि ऐसी घटनाएँ हैं जो समाज की असंवेदनशीलता को प्रकट करती हैं.


सोचने वाली बात है कि आखिर एक मोहल्ले में जहाँ दो-चार-दस परिवार आसपास रहते हों, क्या वहां एक परिवार ऐसा नहीं रहा जो एक समय तीन बच्चियों के लिए भोजन की व्यवस्था कर देता? क्या उन तीन बेटियों का पिता वाकई इतना मजबूर या बुरा व्यक्ति था कि उसे कहीं से भी एक समय का भोजन उपलब्ध नहीं हो सका? क्या आपस में एकसाथ रह रहे परिजन, मोहल्ले के परिवार आपस में इस कदर एक-दूसरे के कटे हुए थे कि वे भूख से तड़पती बच्चियों को देखते रहने के बाद भी संवेदित न हुए? ये इन्सान के नैतिक पतन की कहानी है. इसी तरह दो प्रदेशों के दो बालिका संरक्षण गृहों से जिस तरह की खबरें आईं हैं वे निंदनीय ही नहीं शर्मनाक हैं. ऐसे संरक्षण गृहों में वे बालिकाएं ही भेजी जाती हैं, रह रही होती हैं जो समाज में प्रताड़ित हैं. जिनके साथ परिवार नाम की संस्था पहले से ही नहीं है. जो लड़कियाँ किसी न किसी रूप में समाज के शोषण का शिकार हैं. ऐसी बच्चियों को यौन शोषण के लिए प्रताड़ित करना यही दर्शाता है कि समाज में कोई महिला आज भी सेक्स की, उपभोग की वस्तु समझी जा रही है. इसके पीछे के क्या कारण हैं, क्या सन्दर्भ हैं ये अलग विषय है किन्तु जिस तरह से छोटी-छोटी उम्र की बच्चियों के साथ यौन सम्बन्ध बनाना, उनको नशे के इंजेक्शन देकर बेहोशी में उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाना, ऐसा न करने पर उनके साथ शारीरिक-मानसिक अत्याचार करना, उन बच्चियों को समाज के कथित ठेकेदारों के पास भेजना आदि मानवीयता का पतन ही है. कैसे कोई व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, किसी मासूम बच्ची का, समाज से प्रताड़ित बच्चियों का किस मानसिकता में शोषण करने को तैयार हो जाता है?

समाज में ऐसी एक-दो नहीं अनेकानेक घटनाएँ हैं जहाँ संवेदनशीलता लगातार कम होते दिख रही है. सैकड़ों घटनाओं के बीच एक-दो घटनाएँ सुखद एहसास कराती नजर आती हैं मगर उनकी चर्चा न के बराबर होती है. आपसी बातचीत में अच्छे कामों की, अच्छे व्यक्तियों की चर्चा उस स्तर या व्यापकता से नहीं होती जैसी चर्चा बुरे कामों की, बुरे व्यक्तियों की होती है. धीरे-धीरे यही चर्चा, यही स्तर विस्तार पाकर इंसानियत पर हावी हो जाता है. समाज में उन सभी लोगों को जो इस तरह की अमानवीयता, असंवेदित घटनाओं को लेकर लगातार चिंतित रहते हैं, चिंतन-मनन करते हैं, उन्हें सक्रियता से इसके लिए कार्य करना होगा. समाज में लगातार अच्छे कामों का, अच्छे लोगों का प्रसार-प्रचार करते हुए उन्हें बुराई पर प्रतिष्ठित करना होगा. 

मर चुकी संवेदनाओं के बीच
हम क्या ज़िंदा रखना चाहते हैं.
खो चुके हैं ख़ुद को फिर भी
ख़ुद को पाना चाहते हैं.

20 अगस्त 2018

अनाज बैंक का उद्देश्य - कोई भी भूखा न सोये

उत्तर प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र अनेकानेक प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न होने के बाद भी भोजन, पानी की समस्या से परेशान बना रहता है. हालत इस तरह की हो चुकी है कि ग्रामीण अंचलों के बहुतायत गाँवों से युवाओं को पलायन करके शहरी क्षेत्रों की तरफ जाना पड़ रहा है. बारिश की स्थिति विगत कई वर्षों से ऐसी है जिससे सूखे के हालात उत्पन्न होते रहे हैं. खेत के खेत सूखे की चपेट में आ रहे हैं. फसलें खड़े-खड़े बारिश के इंतजार में सूखने लगती हैं. खाद्यान्न की जबरदस्त कमी के चलते बुन्देलखण्ड क्षेत्र के अनेक गाँवों में भुखमरी जैसे हालात पैदा होने लगते हैं. विगत वर्ष कुछ गाँवों से भूख से मौत की खबरें आने के बाद प्रशासनिक लीपापोती शुरू कर दी गई थी. स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फसलों के अभाव में जानवरों के लिए चारे की भी समस्या उत्पन्न हो जाती है. इसके चलते यहाँ के निवासी अपने पालतू जानवरों को खुला छोड़ देते हैं. जिसके चलते अन्ना समस्या भी बुन्देलखण्ड में विकराल रूप धारण करने लगी है. भूख की स्थिति के कारण ही अनेकानेक अपराधों को प्रश्रय मिलता है. कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में बना रह सकता है मगर अपनी भूख के चलते, अपने परिजनों की भूख के चलते, अपने बच्चों की भूख के चलते वह किसी भी तरह के अपराध को करने को प्रवृत्त हो जाता है. भूख ही मनुष्य को अपराध की तरफ ले जाती है, भूख ही उसे मौत की तरफ ले जाती है, भूख ही व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने लगती है.


अभी हाल में दिल्ली में भूख से तीन बच्चियों की मृत्यु के मामले ने सबको झकझोर कर रख दिया. इस एक घटना से ऐसा लगा जैसे समाज से संवेदना एकदम समाप्त हो चुकी है. दिल्ली जैसी जगह में भूख से तीन-तीन बच्चियों की मृत्यु का होना अपने आपमें शर्मनाक स्थिति है. आखिर समाज को क्या होता जा रहा है? सरकारी कदमों, योजनाओं की खिल्ली हम समाज के लोग आये दिन उड़ाते रहते हैं. इसके उलटे कभी एक कदम बढ़कर हम ही आगे क्यों नहीं आते हैं? यह एक ऐसा सवाल है जो उन तमाम लोगों के मुँह बंद करता है जो सिर्फ और सिर्फ तमाशबीन बने समाज को देखते रहते हैं. समाज के अनेकानेक असंवेदित लोगों के मध्य कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भूख के खिलाफ पूरी ईमानदारी से लड़ाई लड़ने में लगे हैं. ऐसे ही लोगों में काशी के डॉ० राजीव श्रीवास्तव हैं जो अनाज बैंक के माध्यम से भूख के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं. उनके अनाज बैंक से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड में भी पहला अनाज बैंक उरई शहर में स्थापित किया गया. इसके द्वारा प्रतिमाह दो बार गरीब, असहाय महिलाओं को अनाज की व्यवस्था की जाती है. अनाज बैंक का उद्देश्य है कि कोई भी भूखा न सोने पाए. इसके लिए सामाजिक स्तर से प्राप्त होने वाली मदद के द्वारा गरीब महिलाओं की मदद की जाती है.


अनाज बैंक के द्वारा सिर्फ गरीब महिलाओं की ही नहीं वरन उनकी भी मदद की जाती है जो परिस्थिजन्य भूख से भी पीड़ित हैं. प्राकृतिक आपदाओं के चलते अपने घरों से विस्थापित लोगों को भोजन की व्यवस्था अनाज बैंक द्वारा की जाती है. अभी हाल ही में उरई के कुछ क्षेत्रों में बारिश का पानी भर जाने के कारण बेघर हुए लगभग तीन सौ लोगों को अनाज बैंक, उरई द्वारा दोनों समय भोजन की व्यवस्था की गई. ऐसे में सवाल उठता है कि कैसे भूख से लोगों की मौत हो जाती है? क्या आज भी समाज किसी संस्था, किसी एक व्यक्ति के भरोसे ही बैठा है? क्या एक-एक परिवार इतना भी सक्षम नहीं कि वह अपने बगल के गरीब, मजबूर परिवार को एक समय का भोजन करवा सके? क्या किसी मोहल्ले में इतनी भी संवेदना शेष नहीं कि वह अपने बीच के एक परिवार को सप्ताह में दो-चार दिन भोजन उपलब्ध करवा सके? काशी से विश्व के पहले अनाज बैंक के रूप में शुरू हुआ अभियान अब बुन्देलखण्ड में भी सफलतापूर्वक संचालित है. अनाज बैंक का उद्देश्य यही है कि समाज में कोई भी भूखा न रहे. समाज के लोगों को, समाज के लोगों द्वारा ही जगाने का, भूख से बचाने का काम अनाज बैंक के द्वारा किया जा रहा है. अपेक्षा यही की जा सकती है कि आने वाले दिनों में कोई मृत्यु भूख के कारण न होने पाए.  

22 जून 2018

वाकई शो मस्ट गो ऑन


जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह जीवन भी दो पहलुओं में सिमटा हुआ है. दुःख और सुख का, हँसी और आँसू का, ख़ुशी और गम का सह-सम्बन्ध जीवन में सहज ही देखने को मिलता है. जीवन जितना सहज, खुशनुमा, सुरमयी दिखाई देता है उतना ही क्रूर, जटिल, दुखद भी है. दुःख-सुख के एकसाथ आने या फिर क्रमशः आने की अनिश्चितता के चलते जीवन को एक रंगमंच सरीखा माना गया है. कुछ भी हो जाये, कुछ भी होता रहे मगर जीवन-चक्र चलता ही रहता है. दुखों का साया हो या फिर खुशियों का आँचल जीवन की गति रुकती नहीं है. शो मस्ट गो ऑन की संतोषमयी अवधारणा के चलते इन्सान तमाम सारी समस्याओं, परेशानियों के सामने आने के बाद भी सतत आगे बढ़ता रहता है. इसे जीवन गति के आगे बढ़ाते जाने की मजबूरी समझी जाए या फिर इन्सान की जिजीविषा, जिसके चलते वह दुखों, कष्टों के सामने बने रहने के बाद भी सामान्य ढंग से जीवन-पथ पर आगे बढ़ता जाता है. देखने में आया है कि सहज भाव से जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहता है. दुखों, कष्टों, समस्याओं, परेशानियों के होने के बाद भी मनुष्य इस कारण से आगे बढ़ता रहता है क्योंकि उसके सामने सुखों, खुशियों के आने की सम्भावना बनी होती है.


सोचने वाली बात यह है कि कोई इन्सान जब अपनी पूरी क्षमताओं से खुशियों का आनंद उठाने में लगा हो ठीक उसी पल दुखों का साया उसे घेर ले, तब वह जीवन को किस तरह जीता है? दुखों की घड़ी आने के बाद भी उसे खुशियों भरे पल का निर्वहन करना है तब उसी मानसिकता क्या, कैसी रहती होगी? यह स्थिति विषम से भी अधिक विषम समझ आती है. एक तरफ दुःख के कारण पसरा मातम और दूसरी तरफ खुशियों के पल का निर्वहन. निश्चित ही जीवन की इसी अनिश्चितता के चलते व्यक्ति यदि कमजोर बनता है तो दूसरी तरफ यही अनिश्चितता उसे ताकत प्रदान करती है. यही अनिश्चितता उसे अतीत को विस्मृत करके वर्तमान में जीने का सन्देश देती है. सैद्धांतिक रूप से ऐसा कहना सहज होता है कि अतीत को भुलाकर वर्तमान में जीना चाहिए. यह कहना भी सरल होता है कि शो मस्ट गो ऑन, यह समझाना भी आसान होता है कि दुखों को भुलाकर खुशियों का स्वागत करना चाहिए मगर ऐसा करना तब बहुत मुश्किल होता है जबकि दुःख किसी अपने के जाने का हो. अपने मन को समझा पाना तब और भी कठिन होता है जबकि जाने वाला व्यक्ति आपका जन्मदाता हो. ऐसा करना तब और भी कठिन हो जब अतीत महज चंद घंटे पुराना हो. ऐसी स्थिति के बाद भी यदि व्यक्ति और पूरा परिवार हँसते-मुस्कुराते हुए दरवाजे खड़ी खुशियों का स्वागत कर रहा हो, सामने खड़े उल्लासित पल पर अतीत की छाया नहीं पड़ने दे रहा है तब समझ आता है कि वाकई इन्सान की जिजीविषा ही जीवन को गति प्रदान करती है. भविष्य की सुखद संकल्पना इसी की कोख से जन्म लेती है.

ऐसा कहीं और नहीं जब खुद सहना पड़ता है, अपने परिवार के साथ होना देखना पड़ता है तब शब्द मुस्कुराते हुए कहते हैं शो मस्ट गो ऑन मगर दिल अन्दर ही अन्दर आँसू बहा रहा होता है. बहुत बड़ा दिल चाहिए खुशियों भरे पल का स्वागत करने के लिए जबकि चंद घंटे पहले आपने अपने परिजन को खोया हो, किसी ने पत्नी को, किसी ने माँ को, किसी ने दादी-नानी को, किसी ने किसी और रिश्ते को. अपने परिवार में इस विषम स्थिति को, सुख-दुःख को एकसाथ सामने खड़े देखा. बहरहाल, दुःख का आना, किसी का जाना प्राकृतिक सत्य है, जीवन का क्रम है जिसे न तो भुलाया जा सकता है न ही टाला जा सकता है. इसके बाद भी वर्तमान की खुशियों का स्वागत करने की जीवटता, सामने खड़े सुखद पल को आत्मसात करने की मानसिकता, दुखों के साए पर खुशियों का आँचल ओढ़ाने की जिजीविषा जिस प्रकार देखने को मिली वह अनुकरणीय है. ऐसी जिजीविषा के लिए, ऐसी अदम्य जीवटता के लिए, वर्तमान को सुखद बनाने के साहस के लिए अपने परिवार को नमन, अपने परिजनों को नमन.

18 मार्च 2018

आजकल हम मौत को 'एन्जॉय' करने लगे हैं


आप में से बहुतों को शीर्षक पढ़कर आश्चर्य हुआ होगा. यदि ये कहें कि आश्चर्य से ज्यादा कुछ अजीब सी अनुभूति आई होगी, हमारे प्रति एक अलग तरह की ही सोच बनी होगी तो इसमें आश्चर्य न होगा. ऐसा सच है क्योंकि हमें खुद इस पोस्ट का ये शीर्षक लिखने में बहुत सोचना पड़ा मगर सच यही है कि हमने अब मौत को ‘एन्जॉय’ करना शुरू कर दिया है. अब किसी की मौत हमें परेशान नहीं करती. किसी की मौत हमें संवेदित नहीं करती. किसी की मृत्यु हमें विचलित नहीं करती. हाँ, ऐसा तब गलत हो जाता है जबकि ऐसा किसी हमारे अपने के साथ हुआ हो. किसी अपने की मृत्यु पर हम विचलित भी होते हैं, संवेदित भी होते हैं, भावनाओं में भी बहते हैं. अपने परिजनों से इतर, अपने ख़ास लोगों से अलग किसी भी मृत्यु को हम सभी आजकल एन्जॉय करने लगे हैं. न हो तो अभी हाल में हुई श्रीदेवी की मृत्यु को देख सकते हैं. देश से बाहर उनकी मृत्यु कतिपय संदिग्ध स्थिति में हुई. उसके बारे में अलग-अलग तरीके से राय व्यक्त की गई. अलग-अलग तरीके से जाँच को दर्शाया गया. मीडिया ने भी अपनी तरह से उस मौत का चर्चा किया. इन सबसे इतर यदि देखें तो जैसे ही ये खबर प्रसारित हुई कि श्रीदेवी की मृत्यु बाथटब में डूबने से हुई है वैसे ही सोशल मीडिया पर बाथरूम से, बाथटब से, पत्नियों से, पतियों से, प्रेमिकाओं से, विदेश यात्रा से सम्बंधित न जाने कितने चुटकुले, न जाने कितने कार्टून अपनी हलचल दिखाने लगे. इसे क्या कहा जायेगा? क्या ये किसी कि मौत को एन्जॉय करना नहीं?


इधर श्रीदेवी जैसी अभिनेत्री की मौत का मसला था जो मीडिया के कारण लगातार चर्चा में रहा. उसके बाद उन पर बने चुटकुलों और कार्टूनों ने और भी मसाला समाज को दे दिया. इसके अलावा आजकल सोशल मीडिया की जन-जन तक पहुँच ने भी संवेदनशीलता को समाप्त किया है. हर हाथ में मोबाइल और हर हाथ में इंटरनेट ने सभी को पत्रकार बना दिया है. एक ऐसा पत्रकार जो संवेदनहीन है, समाज की वास्तविकता से परे है. उसे पता नहीं है कि उसके द्वारा प्रसारित करने वाली किस खबर से समाज पर, समाज के व्यक्तियों पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है. उसे इसका भी भान नहीं है कि उसके द्वारा जाने-अनजाने में प्रसारित की जाने वाली खबरों से, प्रसारित किये जाने वाले चित्रों से लोगों के मन-मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ रहा है. सबसे पहले हम की अनावश्यक कोशिश के चलते बहुधा दुर्घटनाओं की फोटो लोगों के मोबाइल पर सहज पहुँच में हैं. ऐसी फोटो देखने के बाद जहाँ एक तरफ संवेदना उपजनी चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है. ऐसी दुर्घटनाओं के चित्र देखकर भी लोगों में उनके प्रति घृणा का, व्यंग्य का भाव उत्पन्न होने लगता है. मरने वाले के कपड़ों, उसकी देहयष्टि, उसकी मांसलता, उसके जेवरात आदि पर चर्चाएँ होने लगती हैं. इसी तरह रेप अथवा किसी अन्य महिला सम्बंधित खबरों पर सम्बंधित महिला के कपड़ों, उसके रहन-सहन आदि पर चर्चा की जाने लगती है. इस तरह की चर्चाओं में पुरुष, स्त्री बराबर से शामिल रहते हैं.


दरअसल हम सभी की संवेदनाएं मर चुकी हैं. रोज हम हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, मृत्यु की सजीव फोटो देखते रहते हैं. दो-चार दिन की संवेदना के बाद हम सभी वही चिर-परिचित पाषाण ह्रदय बन जाते हैं. उसके बाद सामने वाला हमारे लिए महज एक देह बन जाता है. देखने वाला उसे अपनी आँखों से देखता है. कोई उस मृत देह की मांसलता देखता है, कोई उस मृत देह में जेवरात खोजता है, कोई उसके परिधान देखता है. किसी के लिए भी वह संवेदनशीलता का मसला नहीं होता है. एक पल में सम्बंधित चित्र को देखने के बाद, सम्बंधित खबर को पढ़ने के बाद उससे सम्बंधित कार्टून, चुटकुले दिमाग में उभरने लगते हैं. इसके बाद वही होता है जो आजकल हम सभी करने में लगे हैं. एक चित्र और उसके साथ कई-कई चुटकुले, कार्टूनों का प्रसारण, शेयर कई-कई लोगों तक होने लगता है. आखिर हम सबको उस मौत पर एन्जॉय तो करना ही है क्योंकि वो मरने वाला हमारा अपना नहीं. अब वो मरने वाला कोई नामचीन है या फिर सामान्य व्यक्ति, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें तो बस इससे मतलब है कि उसमें ऐसा क्या है जो उसकी मौत भी हमारा एन्जॉय कर सके.



08 जनवरी 2018

संवेदना की भावभूमि पर आँसुओं की खरोंच

समय बीतता जाता है और इसके साथ-साथ बहुत कुछ रीत जाता है. बहुत कुछ याद रहता है बहुत कुछ भूल जाता है. न जाने क्या-क्या साथ रहता है और न जाने कितना छूट जाता है. इस छूटने, भूलने में रिश्ते भी होते हैं, सम्बन्ध भी होते हैं, इन्सान भी होते हैं. रिश्तों, संबंधों की भावात्मकता के चलते न जाने कितने लोग अपने बनते हैं और न जाने कितने लोगों से अपनापन बनता है. इस अपनेपन में दो दिलों के बीच, दो विचारों के बीच, दो भावनाओं के बीच की आपसी सामंजस्य क्षमता, आपसी समन्वय आदि का बहुत बड़ा योगदान रहता है. संबंधों का ये अपनापन समाज में स्नेह, प्रेम की आधारशिला होता है. आवश्यक नहीं कि इस स्नेह में, इन संबंधों में आपस में किसी तरह की स्वार्थी मानसिकता छिपी हो. दिल से दिल का तालमेल विशुद्ध रूप से मनोभावों की शुद्धता का परिणाम है. दो दिलों के बीच की आपसी ईमानदारी का प्रतिफल है.


दो लोगों के बीच की आपसी भावात्मक ईमानदारी के चलते संबंधों में, रिश्तों में प्रगाड़ता बढ़ती है. रक्त-सम्बन्धी न होने के बाद भी अनेक रिश्ते रक्त-संबंधों से ज्यादा सशक्त और विश्वासपरक सिद्ध होते हैं. देखा जाये तो यह एक तरह की आपसी बॉन्डिंग होती है जो बिना कुछ कहे, बिना कुछ करे दो लोगों में स्वतः ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षण का भाव जगाती है. यही भाव दो लोगों को करीब लाता है, उनमें रिश्तों की, संबंधों की उष्णता का प्रवाह करता है. विशुद्ध ईमानदारी, विश्वास पर आधारित इस तरह के रिश्तों, संबंधों की पावन इमारत सदियों तक दिल को धड़काती है. गुजरते दिनों की स्मृतियों को जीवंत रखती है. समय गुजरता रहता है और अपनेपन की, अपनों की यही स्मृतियाँ, यही यादें उनको हमारे बीच सदैव जीवित रखती हैं. व्यक्ति सामने है या नहीं, इससे अधिक मायने रखता है कि व्यक्ति दिल में है या नहीं. दिल में किसी के बसे होने के कारण ही वर्षों बीत जाने के बाद भी उसे भुलाया नहीं जाता है.


संबंधों, रिश्तों की प्रगाड़ता दो दिलों को जोड़ती है, दो लोगों के बीच कहे-अनकहे संसार का विस्तार करती है. यही प्रगाड़ता यदि संबंधों का, प्रेम का विस्तार करती है, चेहरे पर हँसी का प्रादुर्भाव करती है तो यही प्रगाड़ता आँखों में नीर भी भरती है. न जाने किस तरह की भावनात्मकता का संसार चारों तरफ रचा-बसा होता है जहाँ हँसी-ख़ुशी के साथ आँसुओं का प्रवाह होता है, अपनों के खोने का भय होता है, सबकुछ उजड़ जाने का डर होता है. किसी का एक पल में मिलकर जीवन भर के लिए जुड़ जाना और किसी का जीवन भर साथ रहकर भी एक पल में जुदा हो जाना, आश्चर्यबोध जैसा कुछ प्रतीत करवाता है. न कहने के बाद भी सबकुछ समझने का भाव, सबकुछ समझते हुए भी कुछ न कहने का बोध, जैसे अलौकिक दुनिया का निर्माण करता है. काश! संबंधों, भावनाओं, रिश्तों, संवेदना की मासूम सी आधारभूमि पर आँसुओं की, जुदा होने की, सबकुछ छूट जाने की कष्टप्रद खरोंच न बनने पाती.