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14 दिसंबर 2018

राफेल नौटंकी पर अदालत का पर्दा

लम्बे समय से भारतीय राजनीति में चर्चित रहा राफेल विमान सौदा मामला आख़िरकार सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा एक तरफ से समाप्त कर दिया गया. तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा 14 नवम्बर को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. इसे आज, 14 दिसम्बर को सुनाया गया. न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया कि राफेल विमान सौदे में किसी तरह की कमी नहीं है. इस मामले में केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है. न्यायालय द्वारा यह भी कहा गया कि वर्तमान में वायु सेना को इन विमानों की आवश्यकता भी है. ज्ञात हो कि देश ने लगभग 58,000 करोड़ रूपए की कीमत पर 36 राफेल विमान खरीदने के लिये फ्रांस के साथ समझौता किया है ताकि भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में सुधार किया जा सके. इस सौदे को लेकर विपक्षी दलों में विशेष रूप से कांग्रेस द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन किये जाते रहे. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा अनेकानेक बार सार्वजनिक रूप से और सदन में भी इस मामले को उठाया जाता रहा है. उनके द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर घोटाला किये जाने का आरोप लगाया गया. 


असल में भारतीय वायुसेना की क्षमता लगातार कम होती जा रही थी. इसलिए वायुसेना द्वारा मांग किये जाने पर अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने 126 लड़ाकू विमान खरीदने का प्रस्ताव रखा. कालांतर में उनके इस प्रस्ताव को उनके बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने आगे बढ़ाया. तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी की अगुआई में रक्षा खरीद परिषद ने 126 एयरक्राफ्ट खरीदने की मंजूरी अगस्तर 2007 में दी. इसके बाद बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई. यूपीए सरकार में इस सौदे पर आपसी सहमति न बन पाने के कारण समझौता न हो सका. इसके पीछे मूल कारण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध का पैदा हो जाना रहा था. इस मामले में दोबारा सक्रियता उस समय शुरू हुई जबकि सन 2014 में केंद्र में मोदी सरकार का गठन हुआ. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान वर्ष 2015 में भारत और फ्रांस के बीच राफेल विमान की खरीद को लेकर समझौता किया गया. इस मामले में विवाद इसी के बाद शुरू हुआ. वर्तमान केंद्र सरकार का कहना है कि उसने इस समझौते के बाद विमान खरीद में लगभग 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं. इस बीच मीडिया में आई खबरों के द्वारा यह तथ्य सामने आता रहा कि यह पूरा सौदा 7.8 अरब रुपये यानी 58,000 करोड़ रुपये का हुआ है और इसकी 15 फीसदी लागत एडवांस में दी जा रही है. इसे लेकर कांग्रेस सहित अन्य विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर हो गया. उनका कहना है कि पूर्व की यूपीए सरकार 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये दे रही थी जबकि वर्तमान मोदी सरकार सिर्फ 36 विमानों के लिए 58,000 करोड़ दे रही है. कीमत के इस विवाद के अलावा विपक्षियों का एक आरोप यह भी है कि वर्तमान केंद्र सरकार ने इस खरीद में देश की प्रमुख कंपनी एचएएल को किनारे लगाकर एक निजी कंपनी को वरीयता दी. इससे न केवल निजी कंपनी को लाभ पहुँचाया गया वरन एचएएल को भी करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है.

लगातार बढ़ते विवाद के बीच सर्वोच्च न्यायालय को बीच में लाया गया. अब जबकि न्यायालय द्वारा निर्णय वर्तमान केंद्र सरकार के पक्ष में आया है तब देश के सामने लगातार तथ्यात्मक झूठ बोलने के कारण विपक्षी दल और नेता क्या कदम उठाएंगे. ये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि देश की सुरक्षा के लिए, वायुसेना की ताकत बढ़ाने की दृष्टि से खरीदे जाने वाले विमानों पर भी राजनीति की जाने लगी. एक पल को ये स्वीकार भी कर लिया जाये कि वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा कीमतों को लेकर किसी तरह से घोटाला किया गया और बारबार विपक्षी दलों के कहने के बाद भी समझौते से सम्बंधित दस्तावेज, कीमतों से सम्बंधित तथ्य सार्वजनिक नहीं किये तो खुद विपक्षियों को तत्कालीन कीमतों और अन्य दस्तावेजों को सार्वजनिक करते हुए वर्तमान केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल उठाये जाने चाहिए थे. यह तो पूरे देश ने देखा था जबकि सदन में कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा फ़्रांस के राष्ट्राध्यक्ष की कथित मुलाकात, बातचीत का हवाला दिया गया था. उसके तुरंत बाद इस मामले के तूल पकड़ने पर दोनों देशों की तरफ से सम्बंधित बिंदु पर सफाई सार्वजनिक रूप से प्रकट की गई थी. ऐसे में स्पष्ट है कि केंद्र सरकार विरोधियों के पास, मोदी विरोधियों के पास राफेल विमान सौदे को लेकर किसी तरह के तथ्य अथवा प्रामाणिक जानकारी नहीं थी. वे महज राजनीति के लिए इस मुद्दे को हवा देकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को धूमिल करना चाह रहे थे. इस पूरे प्रकरण का लाभ उनके द्वारा हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में भी उठाये जाने की मंशा रही होगी. बहरहाल, अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में अपना निर्णय सुना दिया गया है तब समूचे देश के सामने लगातार झूठ बोलने के लिए राहुल गाँधी को और अन्य नेताओं को माफ़ी माँगनी चाहिए.

28 सितंबर 2018

महिला हुई यौन स्वतंत्र, पुरुष अपराध मुक्त


विगत दो-तीन दिन से सर्वोच्च न्यायालय ऐतिहासिक निर्णय देने में लगा है. स्त्री-पुरुष के विवाहेतर संबंधों से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि व्याभिचार अपराध नहीं है. विगत माह, अगस्त में देश की शीर्ष अदालत में इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था कि व्याभिचार कानून महिलाओं का पक्षधर लगता है लेकिन असल में यह महिला विरोधी है. अदालत का कहना था कि शादीशुदा संबंध में पति-पत्नी दोनों की एक बराबर जिम्मेदारी है. फिर अकेली पत्नी पति से ज्यादा क्यों सहे? इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में कुछ साल पहले एक अर्जी दाखिल कर कहा गया था कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद-14 यानि समानता की भावना के खिलाफ है. अगर किसी अपराध के लिए मर्द के खिलाफ केस दर्ज हो सकता है, तो फिर महिला के खिलाफ क्यों नहीं? इस अर्जी को अदालत ने खारिज कर दिया था.


हाल-फिलहाल व्यभिचार से संबंधित आईपीसी की धारा 497 के बारे में इतना समझिये कि यह धारा किसी विवाहित महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने से सम्बंधित है. इसमें दो पक्ष हैं. एक- यदि महिला से कोई गैर-पुरुष बिना सहमति सम्बन्ध बनाता है तो शिकायत पश्चात् सम्बन्ध बनाये जाने पुरुष के खिलाफ रेप का केस दर्ज किया जायेगा. दो- यदि विवाहित महिला अपनी सहमति से किसी गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाती है तो उस ऐसी स्थिति में उस पुरुष पर तब कार्यवाही हो सकती है जबकि महिला का पति शिकायत कर दे. यहाँ इसका कोई अर्थ नहीं कि महिला की सहमति से सम्बन्ध बने थे. इसमें भी दोषी वह पुरुष रहता है जिसने सम्बन्ध बनाये. अर्थात कोई ऐसी महिला के साथ, जो किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसके साथ कोई अन्य पुरुष यह विश्वासपूर्वक जानते हुए कि बिना उसके पति की सहमति या उपेक्षा के वह शारीरिक संबंध बनाता है तो वह बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. शिकायत होने की स्थिति में वह व्याभिचार के अपराध का दोषी होगा और उसे इसके लिए पाँच वर्ष की कारावास की सजा या आर्थिक दंड अथवा दोनों से दंडित किया जा सकता है. ऐसे मामले में महिला दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी.  हालाँकि यह अपराध महिला के पति की सहमति द्वारा समझौता करने योग्य है. इस मामले में पत्नी को अपराध में हिस्सेदार नहीं माना जाएगा. इस धारा को लेकर आधुनिकतावादी, नारीवादी इसलिए खिलाफ थे क्योंकि उनका मानना था कि सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी महिला के पति द्वारा शिकायत करना दर्शाता है कि वह महिला उस पुरुष की संपत्ति है.

आज भी भारत के संविधान का ज्यादातर हिस्सा भारत सरकार अधिनियम 1935 से ज्यों का त्यों नकल करके बनाया गया है. इसलिये ज्यादातर कानून अंग्रेजों के द्वारा बनाये हुये हैं और आज भी स्वतंत्र भारत में लागू हैं. भारत की अपराध दंड संहिता यानी आईपीसी लिखने वाले लॉर्ड बैंबिंगटन मैकाले चाहते थे कि विवाह संबंध में अगर पत्नी और किसी अन्य के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाने की स्थिति में उसे अपराध न माना जाए. आईपीसी बनने से पहले देश में नागरिकों के लिए कोई लिखित कानून नहीं था और परंपरा से न्याय होता था. जब मैकाले के सामने विवाह संबंधी अपराधों को स्पष्ट करने की स्थिति आई, तो यह प्रश्न भी उठाया गया कि पत्नी के साथ किसी बाहरी व्यक्ति के यौन संबंध यानि व्याभिचार को अपराध माना जाए या नहीं? मैकाले ने तत्कालीन भारतीय समाज के अपने अनुभवों के आधार पर यह जान लिया था कि उस समय यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे की पत्नी को भगा ले जाता है अथवा उसके साथ यौन संबंध बनाता है तो ज्यादातर मामलों में पीड़ित पक्ष यानि पति चाहता था कि उसकी पत्नी उसे वापस मिल जाए या फिर उसे इसका आर्थिक मुआवजा मिल जाये. मैकाले ने अनुमान लगा लिया था कि ऐसे प्रकरणों में अपराध जैसी श्रेणी तत्कालीन समाज में स्वीकार्य नहीं थी. परम्पराओं, संस्कृति, सभ्यता, परिवार आदि की दुहाई देकर ऐसे प्रकरणों को भावनात्मकता के आधार पर सुलझाने की कोशिश की जाती थी. इसके बाद भी आईपीसी का निर्धारण होते समय मैकाले का हस्तक्षेप इसमें पूर्ण रूप से नहीं हो सका क्योंकि उसका विचार व्याभिचार को दीवानी मामला बनाया जाना और आर्थिक आधार पर इनका फैसला करने का था. मैकाले अपने विचारों को प्रतिपादित करवाने में असफल रहा और व्याभिचार को आईपीसी में अपराध मान लिया गया और इसके साथ ही भारतीय कानूनों में धारा 497 जुड़ गई.

सर्वोच्च नयायालय के फैसले का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा कि यह सभी महिलाओं के हित में होने के साथ-साथ, लैंगिक तटस्थता वाला फैसला भी है. यहाँ भले ही इस धारा को समाप्त करने सम्बन्धी फैसला आया है मगर इसके परिणामों को भारतीय समाज के परिदृश्य में देखने की आवश्यकता है. विगत कई वर्षों से लिव-इन-रिलेशन के चलन में आने के बाद से विवाह संस्था कमजोर होती दिखाई दे रही है. इसके बाद समलैंगिक संबंधों के हितों की रक्षा की खातिर धारा 377 की समाप्ति ने विवाह संस्था के साथ-साथ परिवार की नींव को हिलाया है. ऐसे संक्रमणकाल में अदालत के इस फैसले से स्त्री, पुरुष दोनों ही दो अलग-अलग बिन्दुओं पर प्रभावित दिख रहे हैं. अब स्त्री (पत्नी) किसी पुरुष (पति) की संपत्ति के तौर पर नहीं दिख रही है. इसके साथ ही पुरुषों को इस रूप में राहत मिली है कि व्याभिचार कानून के नाम पर अब सिर्फ उन्हें ही अपराधी नहीं माना जा सकता है. इसके बाद भी कहीं न कहीं ये फैसला समाज में व्याभिचार को ही बढ़ावा देगा. समाज में आज भी बहुतेरे नारीवादी मंचों से महिलाओं के शोषण की बात उठती है, उनके पक्ष में आवाज़ उठाई जाती है. एकाधिक बार ऐसी भी खबरें सामने आईं हैं जहाँ कि पति को अपनी ही पत्नी से वेश्यावृत्ति करवाए जाने का, देह-व्यापार करवाए जाने का अपराधी माना गया. ऐसे में इस फैसले से शोषित पत्नी की दशा और ख़राब होने का खतरा नहीं है? आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर दौड़ रहे समाज में इस फैसले का भी स्वागत हुआ है. इसके परिणाम आने में अभी समय लगेगा. तब तक सब खुद को आधुनिक, समान समझ कर गर्व कर ही सकते हैं.

06 सितंबर 2018

महकते उपवन में नये निजाम मिलेंगे - समलैंगिकता


सर्वोच्च न्यायालय के धारा 377 पर दिए गए निर्णय के बाद समलैंगिक सम्बन्ध अपराध की श्रेणी में नहीं आयेंगे. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान ने धारा-377 की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए यह साफ किया था कि इस कानून को पूरी तरह से निरस्त नहीं किया जाएगा. यह दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध तक ही सीमित रहेगा. पीठ ने कहा था प्राकृतिक और स्वाभाविक क्या है? क्या बच्चा पैदा करने के लिए ही यौन संबंध बनाना प्राकृतिक है? क्या वैसे यौन संबंध जिनसे बच्चा पैदा नहीं होता वह प्राकृतिक नहीं है?  


धारा 377 का पहली बार मुद्दा गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन ने उठाया था. इस संगठन ने 2001 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी और अदालत ने समान लिंग के दो वयस्कों के बीच यौन संबंधों को अपराध घोषित करने वाले प्रावधान को गैरकानूनी बताया था. बाद में उच्चतम न्यायालय ने 11 दिसंबर 2013 को दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध माना था. इसी फैसले को लेकर नवतेज सिंह जौहर, सुनील मेहरा, अमन नाथ, रितू डालमिया और आयशा कपूर आदि ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल कर उच्चतम न्यायालय से समलैंगिकों के संबंध बनाने पर धारा 377 सम्बन्धी अपने फैसले पर विचार करने की मांग की थी. उनका कहना है कि इसकी वजह से समलैंगिक डर कर जी रहे हैं और ये उनके अधिकारों का हनन है.

इस आदेश के बाद सामाजिकता की स्थिति क्या होगी? विवाह संस्था की स्वीकार्यता का क्या होगा? दो बालिगों के मध्य यौन सम्बन्धी रिश्तों का आधार क्या बनेगा? ऐसे और भी प्रश्न हैं जो लगातार सिर उठाते रहेंगे. इनके जवाब भी हम सबको खोजने होंगे क्योंकि अदालत अपना निर्णय सुना चुकी है, समलैंगिक अपनी आज़ादी प्राप्त कर चुके हैं. इन सबके बीच हम सब हमारी स्व-रचित एक काव्य-रचना का पाठ करेंगे.
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महकते उपवन में नये निजाम मिलेंगे
कली कली से, भौंरे भौंरों पर मँडराते मिलेंगे।।

चोरी-चोरी जो प्यार के गीत गाते थे,
आँखों-आँखों में ही बस गुनगुनाते थे।
खुल्लम खुल्ला होगी अब इजहारे-मुहब्बत,
प्रेम-प्यार की नित नई इबारत लिखेंगे

बाप बेटियों के सोयें चादर तान के,
आयाम देखो उनकी स्वच्छन्द उड़ान के।
क्यों घबराते हो उनके रिश्तों को लेकर,
नहीं इससे उनके पैर भारी मिलेंगे

शर्म की बात करते हो नादान हो,
होगा क्या सोच कर क्यों परेशान हो?
बेलौस होकर मदमस्त रहेंगे जोड़े,
कूड़े के ढेर पर नहीं नवजात मिलेंगे

अभी तक पड़े थे हाशिये पर जो,
करते हैं याद उन वेद-पुराणों को,
बात कुछ हजम नहीं होती मेरे यार,
पॉप कल्चर वाले क्या वेद-पुराण पढ़ेंगे


07 अगस्त 2018

सुखद परिणाम तो नहीं देगा यह संशोधन


अंततः केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए एससी/एसटी एक्ट में संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित करवा ही दिया. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी दलित व्यक्ति द्वारा शिकायत के बाद तत्काल सवर्ण की गिरफ़्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया था. अदालत के इस आदेश को गैर-भाजपाई दलों ने, दलित संगठनों ने मोदी का, केंद्र सरकार का आदेश साबित करते हुए केंद्र सरकार पर अनावश्यक दबाव बना डाला. केंद्र की सत्ताधारी भाजपा के अन्दर भी इस आदेश के प्रति असंतोष दिखाई दिया. अदालत के आदेश को नकारात्मक रूप में समाज में प्रस्तुत किया गया. ऐसे दर्शाया गया जैसे इस अधिनियम को समाप्त ही कर दिया गया है. इसके बाद तो खुलेआम और गुपचुप ढंग से सरकार के खिलाफ लामबंदी की जाने लगी. आगामी चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने हथियार डालते हुए दलितों की रक्षा करने का मन बनाया.


इस अधिनियम में संशोधन के बाद इसका कितना उपयोग, दुरुपयोग दलित कर पायेंगे, इस अधिनियम के चलते कितने सवर्ण फंसेंगे, कितने बचेंगे ये तो बाद की बात है मगर यह तय है कि नब्बे के दशक में आरक्षण के लागू होने के बाद बनी सवर्ण-दलित की खाई को एक बार फिर गहरा कर दिया गया है. जातिगत भावना से समाज में विभेद की, भेदभाव की बात करने वाले भी इस संशोधन बिल की वकालत करते देखे जा रहे हैं. विगत कई वर्षों की जातिगत राजनीति देखने-समझने के बाद एक बात तो स्पष्ट है कि इस देश से जातिगत स्थिति कभी समाप्त होने वाली नहीं है. दलित वर्ग के बहुतेरे लोगों में भले ही आरक्षण के सहारे आगे बढ़ने की मानसिकता का विकास न हुआ हो मगर अपने नाम के साथ किसी सवर्ण की उपजाति लगाने का लोभ संवरण नहीं होता है. इसी तरह सवर्ण वर्ग के बहुत से लोगों में भले ही दलितों के प्रति सकारात्मक भावना का विकास न हुआ हो मगर आरक्षण की मलाई चाटने के लिए वे खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग अथवा दलित वर्ग में शामिल करवाने को तैयार हैं. इस तरह की स्थिति के बीच अब इस संशोधन बिल के बाद की स्थितियाँ विकट नहीं तो कम से कम सुखदायी नहीं होने वाली.

राजनैतिक दल इसका अपने चुनावी समीकरणों के उपयोग करेंगे और वहीं दलित वर्ग के बहुतेरे ईर्ष्यालु, विद्वेषपूर्ण मानसिकता वाले लोग इसका दुरुपयोग सवर्णों को जबरन फँसाने में करेंगे. राजनैतिक दलों में भाजपा जहाँ इसी संशोधन बिल के द्वारा दलित वोटों को एपीआई तरफ खींचने की कोशिश करेगी वहीं, गैर-भाजपाई दल इसके द्वारा दलित वोटों को अपनी तरफ यह दिखाकर लाने का प्रयास करेंगे कि उनके दबाव के कारण ही यह संशोधन बिल सामने आ सका. भाजपा-विरोधी दल संगठित रूप से अदालत के फैसले को सरकार की मंशा बताने में सफलता प्राप्त कर ही चुके हैं, ऐसे में उनके लिए इस संशोधन बिल का राजनैतिक लाभ और ज्यादा ले पाना आसान हो गया है. यदि ऐसा होता है तो यह कदम भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा. इसके अलावा समाज में विद्वेष बढ़ने के भी आसार नजर आते हैं. अदालत के आदेश के बाद जिस तरह से दलित संगठनों ने, भाजपा-विरोधी दलों ने भारत बंद के दौरान हिंसात्मक प्रदर्शन किये थे, वे सिवाय विद्वेष की भावना के और कुछ नहीं थे. अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के दुरुपयोग के एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके कारण ही सर्वोच्च न्यायालय को तत्काल गिरफ़्तारी न करने का आदेश पारित करना पड़ा था. बहरहाल, केंद्र सरकार ने अपना चुनावी दाँव खेल दिया है. लोकसभा में जितनी सहजता से यह बिल पारित हो गया, उतनी ही सहजता से यह राज्यसभा में पारित हो जायेगा. महामहिम राष्ट्रपति की तरफ से भी इसके रोके जाने की कोई आशंका नहीं है. इसके लागू होने के बाद देखना यह है कि कौन किस स्तर तक जाकर इसका उपयोग वास्तविक रूप में करता है.

03 अगस्त 2018

सवर्ण राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं

उच्चतम न्यायालय द्वारा एससी-एसटी एक्ट के सम्बन्ध में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाते हुए सरकार संशोधन विधेयक वर्तमान सत्र में ला रही है. इसकी तैयारी के बीच पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा दे दिया गया है. दलितों-पिछड़ों के लिए उठाये जाते इन कदमों के बीच आरक्षण सम्बन्धी तमाम सारे और भी कदम इस दौरान उठाये जाते रहे हैं. शिक्षा, नौकरी के साथ-साथ पदोन्नति में भी आरक्षण यथावत रखा गया है. केंद्र सरकार के दलितों-पिछड़ों को लेकर किये जा रहे तमाम सारे कार्यों में से शायद ही किसी का इतना विरोध हुआ जो जितना कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन को लेकर हो रहा है. यह स्थिति तब है जबकि इस एक्ट में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने के बजाय उच्चतम न्यायालय द्वारा महज इतनी व्यवस्था की गई थी कि आरोपी सवर्ण की गिरफ़्तारी बिना जाँच के नहीं होगी. इस आदेश को मोदी सरकार की मंशा बताते हुए विपक्षियों ने उपद्रवी माहौल बना डाला. इसका नकारात्मक असर यह हुआ कि केंद्र सरकार संशोधन बिल लाने को तैयार हो गई.


न्यायालय के आदेश के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार का इस तरह से संशोधन विधेयक लाने के मूल में विशुद्ध राजनीति है. यह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है वरन केंद्र सरकार के कदमों से बराबर सिद्ध होता रहा है कि वह किसी भी रूप में सवर्णों को मददकारी हो या न हो मगर दलितों-पिछड़ों के लिए मददगार अवश्य रहेगी. देश के सवर्णों को सरकार के इस कदम से आपत्ति या निराशा जैसा कुछ नहीं लगना चाहिए क्योंकि सिर्फ यही सरकार नहीं वरन देश की सभी सरकारों का एकमात्र उद्देश्य ऐसे कदमों से दलितों-पिछड़ों का वोट प्राप्त करना है. यदि गंभीरता से देखा जाये तो दलित-पिछड़े किसी भी राजनैतिक दल के लिए आज मुख्यधारा के लोग हैं. सवर्ण अपने आपको किसी भी रूप में मुख्यधारा में न माने, राजनीति के लिए खुद को अहम् न माने. आज न सरकारों को और न ही विपक्ष को सवर्णों की, उनके वोट की आवश्यकता है. यदि सामाजिक प्रस्थिति के रूप में इस बिंदु पर निगाह डाली जाये तो नब्बे के दशक से राजनीति की मुख्यधारा से सवर्णों का पतन किया जाना आरम्भ हो गया था. हिन्दू धर्म की छुआछूत की भावना को, विभेद की भावना को समस्त राजनैतिक दलों द्वारा बुरी तरह से अपने पक्ष में दोहन किया गया. यही कारण है कि जाति का विरोध करने वाले इन राजनैतिक दलों द्वारा जाति-विहीन समाज की बात भले ही की जाती हो मगर समाज से जाति दूर करने की बात नहीं की जाती है. इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जातिगत आधार पर न केवल राजनैतिक दलों का गठन हुआ वरन वे सत्ता में भी काबिज होने लगे.

यहाँ आकर सवर्णों को समझना होगा कि वे अब राजनीति की मुख्यधारा की माँग नहीं हैं. अर्थशास्त्र का माँग और आपूर्ति का नियम सिर्फ अर्थशास्त्र में ही लागू नहीं होता बल्कि समाज के प्रत्येक हिस्से में लागू होता है. आज देश की राजनीति की माँग दलित हैं, पिछड़े हैं तो सत्ता पक्ष द्वारा, विपक्ष द्वारा, राजनैतिक दलों द्वारा उनकी माँग को स्वीकार किया जा रहा है. सवर्णों को यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि वे किसी भी रूप में प्रभावकारी मतदाता हैं. कायदे से देखा जाये तो सवर्ण आज भी निपट कबीलों में बंटा हुआ है. अतीत की छोटी-छोटी रियासतों की तरह वह आज भी छोटे-छोटे से वर्गों में विभक्त है. यही कारण है कि उसके पक्ष में एक आदेश के साथ किसी भी राजनैतिक दल के सवर्ण जनप्रतिनिधि भी आकर नहीं खड़े हुए. देश में वर्तमान में हो रही राजनीति की चाल को समझने की आवश्यकता है. यहाँ सभी राजनैतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता की प्राप्ति होता है, वह कैसे हो यह उसका विचार-बिंदु होता है. उन्हें न सवर्णों के हितार्थ कोई कदम उठाना है और न ही दलितों-पिछड़ों के हितार्थ. सत्ता की खातिर उन्हें कब कौन सा कदम उठाना पड़ सकता है, ये उन्हें खुद नहीं मालूम होता है.  

02 अप्रैल 2018

राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए विरोध


देश के बहुत सारे दलित संगठनों ने एससी/एसटी एक्ट पर उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरोध में भारत बंद का ऐलान किया था. भारत बंद को कांग्रेस, बसपा सहित कई राजनीतिक पार्टियों का समर्थन भी मिला. इस आन्दोलन में लगे संगठनों और राजनैतिक दलों की मांग थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में उच्चतम न्यायालय द्वारा किये संशोधन को वापस लिया जाये और एक्ट को पहले की तरह लागू किया जाए. उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कुछ दिन पहले कहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति की गिरफ़्तारी न की जाये बल्कि उसे जमानत दी जाये. आदेश में कहा गया है कि ऐसे किसी मामले में न केवल गिरफ़्तारी को रोका गया है बल्कि एफआईआर लिखने को भी प्रतिबंधित किया गया है. एफआईआर दर्ज करने के पहले डीएसपी द्वारा ऐसे मामले की जाँच की जाएगी. ऐसे मामलों में किसी अधिकारी की गिरफ़्तारी के पहले उसके उच्चाधिकारियों से अनुमति लेनी होगी और किसी सामान्य व्यक्ति के सन्दर्भ में एसएसपी से ऐसी अनुमति चाहिए होगी. इस आदेश के आने के बाद से तमाम दलित संगठनों के अलावा कई राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को सरकारी मंशा से ओतप्रोत बताया. उनके द्वारा आरोप लगाया गया कि सरकार द्वारा संविधान से छेड़छाड़ की जा रही है और दलितों के हितों से खिलवाड़ किया जा रहा है. यहाँ समझना होगा कि आखिर उच्चतम न्यायालय का आदेश सरकार का आदेश कैसे हुआ? दूसरी बात कि न्यायालय ने इस अधिनियम को समाप्त तो किया नहीं है वरन ऐसे व्यक्तियों के हितों का संरक्षण किया है जो दुर्भावना के तहत इस अधिनियम में फँसा दिए जाते हैं.


दरअसल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 11 सितम्बर 1989 को संसद में पारित किया गया, जो जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण देश में लागू किया गया. यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो एससी/एसटी वर्ग से सम्बंधित नहीं है और इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है. इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं. यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है. इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए लिए विशेष अदालतों की भी व्यवस्था है. उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश वर्ष 2009 को महाराष्ट्र के गवर्नमेंट फार्मेसी कॉलेज में एक दलित कर्मचारी की तरफ से फर्स्ट क्लास के दो अधिकारियों के खिलाफ कानूनी धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराने के बाद उत्पन्न हुआ. इंस्टिट्यूट के प्रभारी डॉ० सुभाष महाजन द्वारा लिखित में कोई निर्देश नहीं देने के बाद दलित कर्मचारी ने सुभाष महाजन की शिकायत कर एफआईआर दर्ज कराई. सुभाष महाजन ने उच्च न्यायालय से अपनी एफआईआर रद्द करने की मांग की किन्तु उच्च न्यायालय ने इस माँग को ठुकरा दिया. बाद में सुभाष महाजन ने उच्चतम न्यायालय में अपील की. जहां उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को हटाने का आदेश दिया गया. इस मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि ST/SC एक्ट के तहत गिरफ्तारी न की जाए बल्कि अग्रिम जमानत की मंदूरी दी जाए.


किसी निर्णय का विरोध करना लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है. ऐसा करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है किन्तु भारत बंद के दौरान जिस तरह से हिंसात्मक तरीके अपनाये गए वह न केवल आपत्तिजनक है बल्कि निंदनीय है. इस बंद के दौरान किये गए उत्पात में न केवल सार्वजनिक, निजी संपत्ति को नुकसान हुआ वरन कई जगह से लोगों के मारे जाने की खबर भी आई है. यहाँ ऐसे संगठनों को सोचना होगा कि वे आखिर चाह क्या रहे हैं? वे खुद भी बहुत अच्छे से समझते हैं कि उनके द्वारा इस कानून का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है. पूरे देश में दर्ज ऐसे मामलों में 85 प्रतिशत मामले फर्जी पाए जाते हैं. संविधान द्वारा संशोधन करके दलितों के हितों का संरक्षण करने के लिए, उनके साथ भेदभाव को समाप्त करने के लिए बनाया गया अधिनियम एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है. आये दिन दलितों द्वारा इस अधिनियम के अंतर्गत फँसा देने की धमकी दिए जाने की खबरें सामने आती रहती हैं. ऐसे में यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा कोई आदेश आया था तो उसके लिए लोकतान्त्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज करवाया जा सकता था. ऐसा न करते हुए तमाम सारे दलित संगठनों और राजनैतिक दलों ने इस निर्णय को अपनी राजनीति चमकाने का अवसर माना. उनके द्वारा न्यायालय के इस निर्णय की आड़ में मोदी का, भाजपा का विरोध किया जाना था और उसका परिणाम जान-माल के नुकसान के द्वारा सामने आया.

आज जिस तरह से सवर्णों के देवी-देवताओं के साथ अभद्रता की जा रही है, उनके धार्मिक स्थलों, मानकों के साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया जा रहा है, उनको इस अधिनियम के द्वारा जबरन फंसाया जा रहा है उससे साफ़ है कि ये दलित संगठन और इनके नेता किसी भी रूप में आपसी सद्भाव नहीं चाहते हैं. आज दलित वर्ग कानूनी प्रावधान की आड़ लेकर सवर्णों का उत्पीड़न करने का कार्य कर रहा है और इसे उनके पूर्वजों के उत्पीड़न का बदला बताया जा रहा है तो कालचक्र किसी दिन फिर घूमेगा. उत्पीड़न का बदला उत्पीड़न वाला नियम चलता रहेगा, जिसे कभी कानून मदद करेगा तो कभी जन-समुदाय. इस नियम से, इस सोच से संभवतः किसी का भला तो नहीं ही होने वाला, चाहे वाल व्यक्ति हो या संगठन.



31 जुलाई 2017

राजनीति का शिकार हुए शिक्षामित्र

उच्चतम न्यायालय के बहुप्रतीक्षित निर्णय में लाखों शिक्षामित्रों का समायोजन निरस्त कर दिया गया है। समायोजन निरस्त किए जाने से शिक्षामित्रों में आक्रोश है और वे उपद्रव रूप में सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं। ये अपने आपमें संवेदित करने वाली बात ही है कि एक निर्णय से लाखों परिवारों के जीवनयापन पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। इसी संदर्भ में समझने वाली बात यह भी है कि शिक्षामित्रों द्वारा किया जा रहा उपद्रव इस प्रश्नचिन्ह को दूर नहीं करेगा। नियुक्त किए जा रहे शिक्षकों को जान से मारने की धमकी, विद्यालय न खोलने देने की धमकी, उनकी समस्या पर विचार न करने पर इस्लाम कबूलने की धमकी उनके प्रति संवेदना को समाप्त कर रही है। इसमें दोराय नहीं कि किसी भी व्यक्ति की आजीविका पर संकट आता है तो वह बिना सोचे-विचारे कदम उठाने लगता है। ऐसी स्थिति में शिक्षामित्रों को समझना चाहिए कि उनके समायोजन को राजनैतिक लाभ के लिए किया गया था और इसे किसी सरकार ने नहीं वरन उच्चतम न्यायालय ने निरस्त किया है। ऐसी दशा में उनको विरोध का ऐसा रास्ता अपनाया जाना चाहिए था जो न केवल सरकार को बल्कि न्यायालय को भी उनकी स्थिति पर पुनर्विचार करने को प्रेरित करता।

ग्रामीण और शहरी स्तर की प्राथमिक शिक्षा को सुचारू रूप से संचालित करने की दृष्टि से शिक्षामित्रों का चयन किया गया था। इंटरमीडिएट योग्यता के आधार पर नियुक्त शिक्षामित्रों की संख्याबल को देख राजनैतिक दलों द्वारा उनको वोटबैंक के रूप में देखा जाने लगा। इस क्रम में उनके समायोजन के लिए अपेक्षित योग्यता के मानकों को पूरा करने के प्रयास किए जाने लगे। इसका आरम्भ भी बसपा सरकार द्वारा किया गया। उसकी ओर से दूरस्थ बीटीसी करवाये जाने की अनुमति भी ले ली गई किन्तु योजना के अमल में आने से पूर्व ही प्रदेश में सरकार परिवर्तन की स्थिति आ गई। अब प्रदेश में बसपा की जगह सपा की सरकार बनी जिसने शिक्षामित्र रूपी वोटबैंक को अपने पक्ष में मोड़ने का अवसर न गँवाया। उनकी शैक्षिक एवं अन्य योग्यताओं के आधार पर शिक्षामित्रों को नियमित शिक्षक के रूप में समायोजित किया गया। वोटबैंक के लालच में तत्कालीन सरकार यह गौर करना भूल गई कि शिक्षामित्रों के समायोजन के समय बहुत बड़ी संख्या में टीईटी पास व्यक्ति शिक्षक बनने की आस लगाए बैठे थे। सरकार के इस निर्णय को इन्हीं टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों द्वारा अदालत में चुनौती दी गई। तमाम सारे पहलुओं और बिन्दुओं पर विचार करने के बाद पहले उच्च न्यायालय ने और बाद में उच्चतम न्यायालय ने शिक्षामित्रों के समायोजन को गलत ठहराते हुए उसे निरस्त कर दिया।

यकीनन इस समायोजन में यदि कमियाँ थी तो उनमें शिक्षामित्रों का कोई दोष नहीं था। उनके द्वारा समायोजन के लिए तत्कालीन सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों का ही पालन किया गया। इसमें भी जो शिक्षामित्र उस योग्यता को पूरा नहीं कर पा रहे थे वे समायोजन से बाहर ही रहे थे। यहाँ एक बात गौर करने योग्य है कि आखिर सरकार के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को नियुक्त करने की बजाय शिक्षामित्रों को समायोजित करने में लग गई? यदि सरकार का मन वाकई समायोजन करने का ही था तो क्यों नहीं मानकों के अनुरूप कदम उठाए गए? वोटबैंक की राजनीति के चलते राजनैतिक दलों, सरकारों ने हमेशा स्वार्थपरक कदम उठाए हैं। उनके द्वारा क्षणिक लाभ को देखा जाता है और दूरगामी लाभों को, नुकसान को नजरअंदाज कर दिया जाता है। तत्कालीन सपा सरकार की इसी अगम्भीरता ने लाखों परिवारों के सामने रोजीरोटी का संकट पैदा कर दिया है। अब जबकि शिक्षामित्रों के हाथ से सारी स्थिति निकल चुकी है तब उनके सामने सिर्फ सहानुभूति का, संवेदना का ही रास्ता बचता है। शांतिपूर्वक अपने विरोध को दर्शाते हुए वे उच्चतम न्यायालय से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील करें। उपद्रव, हिंसा, धमकी आदि उनके मामले को कमजोर बनाने के अलावा कुछ और न करेगा। इनके संगठनों और नेताओं को इस पर आक्रोशित हो राजनीति करने के बजाय शांतिपूर्ण ढंग से समाधान का रास्ता खोजने, बनाने का प्रयास करना होगा।