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24 अक्टूबर 2021

मुलाकात एक महान व्यक्तित्व से

कैप्टन लक्ष्मी सहगल से दो बार मिलने का अवसर मिला था. पहली बार मुलाकात बहुत संक्षिप्त रही और उस मुलाकात में बातचीत का सौभाग्य भी मिला था. दोबारा जब मिलना हुआ तो बस उनको दूर से देखने भर का अवसर मिला. उनसे न बात कर सकते थे, न उनका स्पर्श कर सकते थे. पहली बार उनसे मिलना हुआ था अपने पर्यावरण विषय पर आयोजित होने वाले एक सेमिनार के सम्बन्ध में. उन्होंने अपनी आयु, स्वास्थ्य आदि का हवाला देते हुए सेमिनार में उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त की. हम उनके एक तरह के इंकार से दुखी थे और उसके बाद दोबारा जब मिलना हुआ तो उससे बड़े दुःख के साथ.


खबर मिली कि वे कानपुर के एक मेडिकल सेंटर में एडमिट हैं. उनको देखने वहाँ जाना हुआ तो दूर से ही दर्शन का मौका मिला. यह मौका भी बहुत देर के लिए नहीं मिला था, सबको भी नहीं मिला था. उनकी पुत्री सुहासिनी अली से मुलाकात हुई और उनसे लक्ष्मी सहगल जी से पिछली मुलाकात के बारे में बताते हुए बस चंद पल के दर्शन कर लेने का निवेदन किया. सुहासिनी अली जी को हमारी बातों से जो भी एहसास हुआ हो, एक सेकेण्ड अपने आपसे जैसे विचार किया और फिर लक्ष्मी सहगल जी के दर्शन कराने पर सहमति व्यक्त की. हमें एहसास नहीं था कि लक्ष्मी सहगल जी को आखिरी बार देख रहे हैं. उनकी आँख बंद किये छवि को अपनी आँखों में भरकर, सुहासिनी जी से जरा सी बात करके हम आँखों में एक नमी लिए वापस उरई लौट आये. उसी माह उनके देहांत की खबर हम लोगों को रुला गई. उनका निधन 23 जुलाई 2012 को कानपुर में ही हुआ. उनकी सामाजिकता को, समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी को ऐसे समझा जा सकता है कि उन्होंने अपनी देह को दान कर दिया था. उनके निधन के पश्चात् उनकी पार्थिव देह कानपुर में मेडिकल कॉलेज को सौंप दी गई.




यह हम जैसे लोगों के लिए गौरव का विषय है कि ऐसी महान विभूति से बात करने का, उनका स्पर्श करने का, उनके दर्शन करने का अवसर मिला. गर्व का विषय इसलिए है क्योंकि वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी थीं. फ़ौज में स्थापित रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट की कमाण्डर थीं. आजाद हिन्द सरकार का गठन होने पर उनको महिला मामलों का मंत्री बनाया गया था. उनका जन्म 24 अक्टूबर 1914 को एक तमिल परिवार में हुआ था. राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रभाव उन पर बचपन से ही था. इस कारण जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो वे सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो गईं. 1943 में अस्थायी आज़ाद हिन्द सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं.


सन 1947 में उन्होंने कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर आकर बस गईं. यहाँ आकर उन्होंने अपनी चिकित्सा शिक्षा को जनसेवा में लगाया और इसके साथ-साथ वे वंचितों की सेवा में लग गईं. उनके समाजोपयोगी कार्यों, सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें सन 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया.


उनकी जन्मतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि.

05 सितंबर 2019

छोटी सी ज़िन्दगी ने बचाईं सैकड़ों ज़िंदगियाँ


नीरजा भनोत, ये नाम संभवतः अब लोगों के लिए अनजाना नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके साहसिक कार्य और बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया जा चुका है. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया था. इस फिल्म के आने के पहले कम लोग थे जो इनके बारे में जानकारी रखते थे. ऐसे लोगो संभवतः आज भी होंगे. आज जिस दिन पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है उसी दिन इस साहसी महिला की पुण्यतिथि है. नीरजा ने बहुत कम उम्र में वह साहसिक कारनामा कर दिखाया था जिसके बारे में सोचा जाना भी कठिन समझ आता है. उसी कार्य के चलते भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया था. वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाली पहली महिला हैं. इसके साथ-साथ पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया.


जो लोग उनके बारे में नहीं जानते होंगे निश्चय ही उन्हें आश्चर्य हो रहा होगा और कौतूहल भी कि आखिर ये महिला है कौन और इसने ऐसा कौन सा साहसिक कार्य किया था. नीरजा ने आज ही के दिन पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को आतंकवादियों से बचाया था. अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए नीरजा 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में शहीद हो गईं. 5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. अपने कर्तव्य निर्वहन में नीरजा शहीद हो गईं. 

इस साहसी महिला, नीरजा भनोत का जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. इनके पिता हरीश भनोत मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं थीं. महज 23 वर्ष की उम्र में अपनी जान की परवाह किये बिना यात्रियों की जान बचाने जैसा अदम्य साहस का कार्य करने वाली नीरजा को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन.



29 नवंबर 2018

संकल्पशक्ति का नाम मैरी कॉम


मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम (एम०सी०मैरी कॉम) यह नाम आज किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. एक ऐसी महिला, जिसका जन्म 1 मार्च 1983 को हुआ और समूचा विश्व आज उन्हें मैरी कॉम के नाम से जानता है, एक भारतीय महिला मुक्केबाज हैं. उन्होंने 24 नवंबर 2018 को नई दिल्ली में आयोजित 10 वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 6 विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रचा. इसके साथ सुखद तथ्य यह भी है कि वे जुड़वाँ बच्चों की माँ भी हैं.


वे अब तक दस राष्ट्रीय खिताब जीत चुकी हैं. उन्होंने पहली बार नेशनल वुमन्स बॉक्सिंग चैंपियनशिप वर्ष 2001 में जीती. इसके साथ-साथ 2012 के लंदन ओलम्पिक में उन्होंने काँस्य पदक जीता. एशियाई खेल 2010 में काँस्य तथा 2014 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया. बॉक्सिंग में देश का नाम रोशन करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2003 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से तथा वर्ष 2006 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. वर्ष 2009 में उन्हें भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मध्यप्रदेश के ग्वालियर में वर्ष 2018 में उनको वीरांगना सम्मान से विभूषित किया गया.

मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक गरीब किसान के परिवार जन्मी मैरी कॉम की प्राथमिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट हेवियर स्कूल से पूरी हुई. बाद में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से परीक्षा दी. उनके मन में बॉक्सिंग के प्रति आकर्षण सन सन 1999 में उस समय उत्पन्न हुआ जब उन्होंने खुमान लम्पक स्पो‌र्ट्स कॉम्प्लेक्स में कुछ लड़कियों को बॉक्सिंग रिंग में लड़कों के साथ बॉक्सिंग करते देखा. उनके जीवन पर एक फिल्म भी बनी जिसका प्रदर्शन सन 2014 में हुआ. इस फिल्म में उनकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई.

मैरी कॉम को उनकी उपलब्धि पर शुभकामनाओं सहित सुखद, स्वस्थ जीवन की मंगलकामना.


15 मार्च 2018

रूढ़ियों को दरकिनार कर उड़ाया हवाई जहाज


आज, 15 मार्च को उस महिला की पुण्यतिथि है, जिसने तमाम रूढ़ियों को, अमान्य परम्पराओं को तोड़ते हुए इतिहास रचा था. ऐसा उन्होंने उस समय किया था जबकि हमारा देश आज़ाद भी नहीं हुआ था. सन 1936 में पहली बार किसी भारतीय महिला ने हवाई जहाज उड़ाया था. जी हाँ, अपने आपमें आश्चर्य का विषय इसलिए भी है क्योंकि तब आज की तरह स्त्री-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण चारों तरफ गूँज नहीं रहा था. तब सरकारी अथवा गैर-सरकारी संस्था द्वारा बेटियों को बचाने, उनके सशक्तिकरण के कार्य भी नहीं किये जा रहे थे. गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत में ऐसा जीवट का काम करने वाली वह सम्मानीय महिला थी सरला ठकराल. पहली बार भारतीय महिला द्वारा हवाई जहाज उड़ाए जाने के साथ-साथ कुछ और आश्चर्य भी जुड़े थे, वो ये कि सरला ठकराल ने साड़ी पहन कर हवाई जहाज़ उड़ाने का गौरव हासिल किया था. उस समय वह चार साल की एक बेटी की मां भी थीं.


सरला ठकराल का जन्म सन 1914 में नई दिल्ली में हुआ था. उन्होंने 1929 में दिल्ली में फ़्लाइंग क्लब में विमान चलाने का प्रशिक्षण लेकर एक हज़ार घंटे का अनुभव भी प्राप्त किया. दिल्ली के फ़्लाइंग क्लब में ही उनकी मुलाकात पी०डी० शर्मा से हुई, जिनके साथ बाद में उनका विवाह भी हुआ. उनके पति ने ही उन्हें व्यावसायिक विमान चालक बनने को प्रोत्साहन दिया. इससे प्रोत्साहित होकर सरला जोधपुर फ्लाइंग क्लब में ट्रेनिंग लेने लगी. इसके बाद सन 1936 में वह ऐतिहासिक पल आ गया जो स्वर्णाक्षरों में आज भी अंकित है. महज 22 साल की सरला ठकराल ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, आँखों पर चश्मा चढ़ाया और जिप्सी मॉथ नामक दो सीटों वाले विमान को अकेले ही आकाश में ले उड़ीं. तत्कालीन समय में विमान उड़ाना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी. इस तरह सरला ठकराल भारत की पहली महिला विमान चालक बनीं.

सन 1939 में ही एक विमान दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया. इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ जाने से जोधपुर क्लब बंद हो गया. सरला ठकराल के माता-पिता ने उनका दूसरा विवाह कर दिया और वे विभाजन के बाद लाहौर से दिल्ली आ गईं. दिल्ली आकार उन्होंने पेंटिंग शुरू की, बाद में वे कपड़े और गहने डिज़ाइन करने लगीं. इस क्षेत्र में भी वे खासी सफल रहीं. अपने जीवन में सफलताओं के कई आयाम छूने वाली सरला ठकराल का 15 मार्च 2008 को निधन हो गया. उनका जीवन प्रेरणा, साहस और आत्मविश्वास की एक अनूठी कहानी है. उनकी ज़िन्दगी का संघर्ष और उसके बाद मिली सफलता महिलाओं के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बनी रहेगी.


ऐसी साहसी और आत्मविश्वास की धनी महिला को श्रद्धासुमन अर्पित हैं.

07 सितंबर 2017

हीरोइन ऑफ हाईजैक यानि कि नीरजा

आज साहसी महिला, नीरजा भनोट का जन्मदिन है जिसे अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. इनका जन्म 7 सितंबर 1963 को चंडीगढ़ पंजाब में हुआ था. आपके पिता हरीश भनोट मुंबई में पत्रकारिता क्षेत्र में थे. नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ में हुई, इसके बाद की शिक्षा मुम्बई में हुई. वर्ष 1985 में उनका विवाह संपन्न हुआ किन्तु रिश्ते में स्नेह-प्रेम न होने के चलते वे विवाह के दो महीने बाद ही मुंबई आ गयीं. इसके बाद उन्होंने पैन एम एयरलाइंस में नौकरी के लिये आवेदन किया और ट्रेनिंग पश्चात् एयर होस्टेज के रूप में काम करने लगीं.


5 सितम्बर को पैन एम 73 विमान लगभग 400 यात्रियों को लिए पाकिस्तान के कराची एयरपोर्ट पर अपने पायलट के इंतजार में खड़ा था. तभी 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया. उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि विमान में पायलट को जल्दी भेजा जाये. पाकिस्तानी सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि वह किसी अमरीकी नागरिक को मारने की धमकी से पाकिस्तान पर दबाव बना सकें. नीरजा ने विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी पासपोर्ट आतंकियों को सौंप दिये. फिर आतंकियों ने एक ब्रिटिश को मारने की धमकी दी किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से सूझबूझ से बात करके ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया. धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये. अचानक नीरजा को ध्यान आया कि विमान में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा, तब यात्रियों को बचाना आसान होगा. ऐसा विचार आते ही उन्होंने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना और साथ में विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा.

नीरजा ने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ. विमान का ईंधन समाप्त होते ही चारों ओर अंधेरा छा गया. नीरजा ने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये. सभी यात्री भी आपातकालीन द्वार पहचान चुके थे. योजना के अनुसार सारे यात्री उन द्वारों से नीचे कूदने लगे. यह देख आतंकियों ने अंधेरे में ही फायरिंग शुरू कर दी. नीरजा के सावधानी भरे कदम से कोई यात्री मारा नहीं गया. हां, कुछ घायल अवश्य हो गये थे. इस बीच पाकिस्तानी सेना के कमांडो विमान में आ गए थे. उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया. सबसे अंत में नीरजा निकलने को हुई तभी उन्हें बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी. वे उन बच्चों को खोज कर आपातकालीन द्वार की ओर बढीं तभी बचे हुए चौथे आतंकवादी ने गोलीबारी शुरू कर दी. नीरजा बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल कर उस आतंकी से भिड़ गईं. यद्यपि उस चौथे आतंकी को पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया तथापि वे नीरजा को न बचा सके. 5 सितम्बर 1986 को मात्र 23 वर्ष की उम्र में नीरजा अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए शहीद हो गई.



नीरजा देश की पहली महिला हैं जिन्हें भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया. पाकिस्तान सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया. भारत सरकार ने सन 2004 में नीरजा के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में मशहूर है. वर्ष 2005 में अमेरिका ने उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया. उनकी स्मृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया, जिसका उद्घाटन अमिताभ बच्चन ने किया. नीरजा के साहसिक कार्य और उनके बलिदान को याद रखने के लिये राम माधवानी के निर्देशन में नीरजा फ़िल्म का निर्माण किया गया. इस फ़िल्म में नीरजा का किरदार अभिनेत्री सोनम कपूर ने निभाया. इस फिल्म को 19 फ़रवरी 2016 को रिलीज किया गया. 

23 जुलाई 2016

जालौन की पहली महिला क्रांतिकारी : ताईबाई - (1000वीं पोस्ट)

सन् 1857 की क्रान्ति में सभी ने अपनी क्षमता से अधिक आहुति दी। उत्तर प्रदेश का जनपद जालौन भी किसी दृष्टि से इस संघर्ष में पीछे नहीं रहा। छोटे-छोटे संघर्षों के अतिरिक्त सन् 1857 में यह क्रान्तिकारियों की कर्मभूमि बन कर उभरा। नाना साहब, तात्या तोपे, रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर साहब आदि की रणनीति यहीं पर बनी और क्रियान्वित हुई। इन प्रसिद्ध नामों से इतर जनपद की पहली महिला क्रान्तिकारी ताईबाई ने इस आन्दोलन में सक्रियता दिखा कर क्षेत्र के क्रान्तिकारियों के मध्य एक अलख जगा दी थी। ताईबाई की स्मृति को मिटाने का कार्य तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों द्वारा शुरू कर दिया गया था। उनसे सम्बन्धित समस्त दस्तावेज, वस्तुओं यहां तक कि जालौन स्थित उनके किले को सन् 1860 में जमींदोज करवा दिया गया। अंग्रेजी सरकार की इस कायरतापूर्ण कार्यवाही के बाद भी इस वीर महिला की वीरता का वर्णन करते हुए तत्कालीन झांसी डिवीजन के एक अंग्रेज अधिकारी जे० डब्ल्यू० पिंकने ने लिखा था कि वर्ष 1858 के प्रारम्भ होते-होते दबोह और कछवाघार के कुछ भागों को छोड़ कर पूरा जालौन जिला ताईबाई के अधिकार में आ गया था।

जालौन के राजा बालाराव की मृत्यु पश्चात यहां उत्तराधिकार की समस्या सामने आई। राजा की पत्नी ने एक बालक गोद लेकर राज्य करने का विचार किया मगर उसकी अनुभवहीनता और आपसी झगड़ों में यहां की स्थिति बिगड़ गई। तब स्वर्गीय राजा की पत्नी ने अंग्रेजों से रियासत संभालने का आग्रह किया। तत्पश्चात सन् 1838 में यहां प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। इसी दौरान सन् 1840 में गोद लिए बालक गोविन्दराव की मृत्यु हो गई। इस बार अंग्रेजों ने रानी को पुनः गोद लेने की अनुमति नहीं दी और जालौन रियासत को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी ताईबाई जालौन रियासत के स्वर्गीय राजा बालाराव की बहिन थीं। उनका विवाह सागर के नारायण राव से हुआ था परन्तु विवाहोपरान्त वे अपने पति सहित जालौन के किले में ही निवास करने लगीं। अंग्रेजों से बदला लेने के लिए उनके भीतर स्वाधीनता क्रान्ति का अंकुर फूटने लगा उन्होंने गुपचुप तरीके से अपनी योजना को क्रियान्वित करने का विचार बनाया।

उधर कानपुर में क्रान्ति की शुरूआत होने की सूचना 6 जून 1857 को उरई पहुंची। इसके पश्चात यहां भी क्रान्तिकारियों ने कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। क्रान्ति का आरम्भ होते ही जालौन के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ब्राउन ने भागने में ही अपनी भलाई समझी। कैप्टन ने भागते समय गुरसराय के राजा केशवदास को पत्र लिख कर जालौन में शांति स्थापित करने में सरकारी अधिकारियों की सहायता करने को कहा। राजा केशवदास मौकापरस्त व्यक्ति था, उसने ताईबाई तथा अन्य क्रान्तिकारियों के तेवर देखे तो उसने ताईबाई का साथ देने में ही अपनी बधाई समझी। केशवदास ने अपने दोनों पुत्रों के साथ जालौन आकर अन्य सरकारी अधिकारियों को भगा कर किले पर अधिकार कर लिया। केशवदास के इस कृत्य को ताईबाई आदि ने क्रान्तिकारियों का सहयोग समझकर धन-बल से उसकी सहायता की। इस क्रान्ति में दो अंग्रेजी डिप्टी कलेक्टर पशन्हा और ग्रिफिथ को बन्दी बना लिया गया था। जिन्हें क्रान्तिकारियों की पराजय के साथ ही केशवदास ने परिवार सहित सकुशल कानपुर पहुंचा दिया। इस घटना के बाद से ताईबाई को विश्वास हो गया कि केशवदास अंग्रेजों के लिए कुछ भी कर सकता है।
पराजित क्रान्तिकारी कानपुर से भागकर कालपी आ गये। ताईबाई ने तात्या तोपे के साथ मिलकर केशवदास को वापस गुरसराय जाने पर विवश कर दिया। इस घटना के बाद तात्या ने ताईबाई के पांच वर्षीय पुत्र गोविन्द राव को जालौन की गद्दी पर बिठा कर उनको संरक्षिका घोषित कर दिया। इस कार्यवाही से जालौन में क्रान्तिकारियों की सरकार का गठन हो गया और पेशवाई राज्य की स्थापना हुई। क्रान्तिकारियों की सरकार बन चुकी थी और ताईबाई ने सफल संचालन के लिए प्रधानमंत्री तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की। उन्होंने अद्भुत क्षमता से अत्यल्प समय में एक बड़ी सेना का गठन किया। अपनी सूझबूझ और कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण सम्पूर्ण जनपद में अंग्रेजों का नामोनिशान भी न रहने दिया। उनकी बढ़ती शक्ति से अंग्रेज भी परेशान थे। एक ओर क्रान्तिकारी घटनाएं हो रही थीं और रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब आदि की गतिविधियों के साथ-साथ ताईबाई का शासन अंग्रेजों को रास नहीं आ रहा था। इस समय तक कालपी क्रान्तिकारी घटनाओं के संचालन का केन्द्र बन चुका था। अंग्रेज भी जालौन के स्थान पर कालपी किले पर कब्जा करना चाह रहे थे। इसका कारण एक तो वे क्रान्तिकारियों की शक्ति को सीधे तौर पर कम करना चाहते थे और दूसरी ओर ताईबाई के साथ संघर्ष में अंग्रेज अपनी शक्ति को कम नहीं करना चाहते थे। अंग्रेजों ने नई कूटनीति का इस्तेमाल करते हुए उनके सहयोगियों को मिटाना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने युद्ध का नहीं वरन् नरसंहार का सहारा लिया। सबसे पहले हरदोई के जमींदार अंग्रेजी सेना के कोपभाजन बने। एक दर्जन से अधिक क्रान्तिकारियों को खुलेआम पेड़ से लटका दिया गया। अंग्रेजों का नरसंहार जारी रहा। अन्ततः ताईबाई ने नरसंहार रोकने के लिए मई 1858 को अपने पति और पुत्र के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने उनकी समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली। राजद्रोह और विद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें तथा उनके सहयोगियों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। ताईबाई की लोकप्रियता और शक्ति से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें जालौन से बहुत दूर मुंगेर-बिहार- भेज दिया गया। यहीं पर कैदी जीवन बिताते हुए उनकी मृत्यु सन् 1870 में हो गई। उनकी मृत्यु के बाद भी अंग्रेज उनकी लोकप्रियता और शक्ति से घबराते रहे। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके कैदी बेटे को पढ़ने के लिए तो इलाहाबाद भेज दिया गया किन्तु उनके बंदी पति को जालौन में रहने की आज्ञा नहीं दी गई।


छोटे से स्थान पर ताईबाई ने अपनी कार्यक्षमता और कुशल सैन्य संचालन से अक्टूबर 57 से मई 58 तक, सात माह, स्वतन्त्र सरकार की स्थापना कर उसका संचालन किया। जनपद जालौन की इस क्रान्तिकारी महिला को लोग इस कारण से भी नहीं पहचानते हैं कि अंग्रेजों ने यथासम्भव जालौन से उनसे सम्बन्धित सभी वस्तुओं, दस्तावेजों आदि को समूल नष्ट कर दिया था। अंग्रेजों द्वारा लिखे गये भ्रामक इतिहास को पुनः लिखने और सामने लाने की आवश्यकता है, कुछ इसी तरह की पहल की आवश्यकता ताईबाई के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने की है। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी को इन्हीं समवेत प्रयासों के माध्यम से ही देशवासियों के सामने लाया जा सकता है, तभी हम सभी अन्य वीर-वीरांगनाओं की तरह ही ताईबाई को भी याद रख सकेंगे।

07 अगस्त 2011

बेटियों ने किया अपने पिता का अंतिम संस्कार


इस लिंक को जरूर देखिये और साथ में देखिये पुत्रियों का जागरूक होना. उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में उरई में पुत्रियों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया.


प्रदेश के अति बौद्धिक लोगों की दृष्टि में पिछड़े बुन्देलखण्ड के पिछड़े उरई में इस तरह की ये शायद चौथी घटना है जो पिछले एक साल के दौरान सामने आई है.

इन लड़कियों के और इनसे पहले की लड़कियों के द्वारा उठाये गए इस तरह के कदम से कथित महिला सशक्तिकरण वालों को और अभी-अभी बेशर्मी मोर्चा खोलने वालियों को कुछ सीखने को मिलेगा. देखा जाए तो इस तरह की घटनाओं को ही जागरूकता कहते हैं, महिला सशक्तिकरण कहते हैं.

http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20110806a_002155003&ileft=459&itop=589&zoomRatio=183&AN=20110806a_002155003

(विशेष==इस लिंक के क्लिक करने पर यदि लिख कर आये कि This Operation is not Allowed तो आप उसे OK कर दें. आवश्यक सामग्री दिखने लगेगी) लिंक एवं चित्र अमर उजाला से साभार ली गई है


21 दिसंबर 2009

आत्मविश्वास और साहस की पहचान है ये खिलाड़ी..शाबास

अभी पिछले दिन ताऊजी के खुल्ला खेल फर्रुखावादी को देख रहे थे। समीर भाई के आयोजन में खेले जाने वाले खेल में एक चित्र देखा जिसको एक दूसरे चित्र ने ढाँक रखा था। सवाल जिस चित्र के बारे में पूछा गया था उस चित्र का जितना हिस्सा दिख रहा था उससे साफ जाहिर था कि ये किसी खिलाड़ी का चित्र है और ऐसा खिलाड़ी जो पैर से विकलांग होने के बाद भी लम्बी कूद में भाग ले रहा है। इसके बाद भी कृत्रिम पैर का हिस्सा जिस तरह से दिख रहा था उससे एक प्रकार की शंका भी उत्पन्न हो रही थी। कभी भ्रम होता कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लम्बी कूद में भाग लेने वाले खिलाड़ी की आड़ में कुछ और दिख रहा हो?





वैसे शायद आम चित्र होता या आम सवाल होता तो इसके जवाब के लिए हमें कोई कौतूहल न होता किन्तु चित्र में छिपी महिला खिलाड़ी को देखकर उसके जवाब को बिना देखे नहीं रहा गया। (कृपया महिला शब्द पर ध्यान न दें, हमारा कौतूहल उस खिलाड़ी को लेकर था जो पैर से विकलांग-जैसा सोच रखा था-होने के बाद भी लम्बी कूद में हिस्सा ले रहा था।)

जवाब देखा तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। महिला खिलाड़ी पैर से विकलांग थी और इसके बाद भी लम्बी कूद में हिस्सा ले रही थी। चित्र के जवाब के साथ उस खिलाड़ी का पूरा परिचय बताने सम्बन्धी लिंक भी दी गई थी। समीर जी को उनके सहयोगी डाक्टर झटका सहित इस कार्य के लिए बधाई।



उस खिलाड़ी का नाम है Annette Roozen, जिसका जन्म 11 मार्च 1976 को हुआ था। लगभग सोलह वर्ष की होने पर उसका एक पैर हड्डी के कैंसर के कारण घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। बाद में कृत्रिम पैर के साथ उन्होंने एथलैटिक्स की तैयारी शुरू की और परिणाम आपके सामने है। (लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ें)




ज्यादा कुछ न कहते हुए उनके आत्मविश्वास और साहस को नमन। आप भी साथ में दी गई लिंक के द्वारा उनके बारे में देख-पढ़ सकते हैं। (एक लिंक यहाँ भी है, इसे भी देख सकते हैं)

साथ में दिया गया वीडियो उनके वीजिंग में हुई प्रतियोगिता में भाग लेने का है। (यह लिंक वीडियो के लिए है)

कृपया देखें अवश्य। ऐसे लोगों को देखकर प्रेरणा मिलती है।


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चित्र गूगल छवियों से साभार लिए हैं। इसके अलावा अन्य सभी लिंक का उपयोग करने का भी आभार व्यक्त करते हैं।

27 अक्टूबर 2008

इन महिलाओं से कुछ सीखना होगा

दीपावली का त्यौहार आ गया है, लक्ष्मी जी की पूजा होगी; इससे पहले नव रात्रि का पावन पर्व भी मनाया गया. इस पर्व पर भी किसी न किसी रूप में नारी शक्ति की पूजा की जाती है, कन्याओं को भोजन करवाया जाता है. इसी के ठीक उलट ये भी सत्य है कि महिलाओं को इसी समाज में अपने अस्तित्व के लिए लडाई करनी पड़ रही है और लड़कियों को जन्म के लिए आन्दोलनों का सहारा लेना पड़ रहा है. इन्हीं सबके बीच कुछ लोग (इनमें महिलायें और पुरूष दोनों शामिल हैं) नारी-शक्ति, स्त्री-विमर्श को पुरजोर हवा दे रहे हैं. अनेक नारे, अनेक गोष्ठियां, अनेक तरह के लेख आदि ये सिद्ध करने में लगे हैं कि नारी-शक्ति कुछ भी कर सकती है. ये सत्य है कि नारी-शक्ति कुछ भी कर सकती है पर आज स्त्री-विमर्श, स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर जो हो रहा है वो स्त्री को कटघरे में ही खडा करता है. कुछ कहे बिना आज की कुछ वस्तविक नारियों के उदहारण आपको बताते हैं, शायद आपको लगे कि ये ही वो नारियां हैं जो सही मायनों में स्त्री-शक्ति का उदहारण हैं।
देश में पुरोहिती, कर्म-कांडों का अपना स्थान रहा है और अभी तक ये सब पुरुषों के द्वारा ही होता आया है। अब कुछ महिलाओं ने इस क्षेत्र में कदम रख कर अपनी शक्ति का अहसास करवा दिया है।
बनारस के तुलसीपुर में स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कुछ लड़कियों ने विवाह करवाने का कार्य शुरू किया। इसके लिए उनका ब्राहमण होना आवश्यक नहीं है। महाविद्यालय की आचार्य नंदिता शास्त्री बड़े ही गर्व से बतातीं हैं कि अब इन छात्राओं को देश के अतिरिक्त विदेश से भी लोग बुला रहे हैं।
यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी का कहना है कि उनके पास अमेरिका तक से आमंत्रण आ रहे हैं। ये छात्राएं विवाह करवाने के साथ-साथ शान्ति-यज्ञ, गृह-प्रवेश, मुंडन, नामकरण, यज्ञोपवीत आदि करवा रहीं हैं।
इसी तरह कानपुर के कानपूर विद्या मन्दिर डिग्री कालिज की प्राचार्य डॉ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करतीं हैं। उन्हों ने किसी भी विरोध की परवाह किए बगैर अपनी छात्राओं को वेद पाठ भी करवाया। इसके अतिरिक्त उन्हों ने महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माने गए क्षेत्र श्मशान घाट में जाकर अन्तिम संस्कार भी करवाए हैं और करवा भी रहीं हैं। अपने पिता और श्वसुर का अन्तिम संस्कार भी उन्हीं ने किया था.
इन्हीं की तरह सुनीति गाडगिल ने विवाह के अतिरिक्त श्राद्ध कर्म भी करवाए हैं। बनारस की ही पांडेयपुर की निवासी वन्दना जायसवाल उर्फ़ अनु ने, नगर निगम के सफाई कर्मी मुन्ना की विधवा बीडा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डॉ0 अलका मुखर्जी आदि ने अपने परिवार में किसी अन्य पुरूष के न रहने पर माता, पिता, पति आदि का अन्तिम संस्कार विधवत संपन्न किया।
ऐसा नहीं है कि पढ़ी-लिखी महिलाओं द्वारा ऐसा किया जा रहा है। राजस्थान की 72 वर्षीय विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने अर्थी को कन्धा दिया और चिता को मुखाग्नि देकर पिंडदान तक किया.
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमा देवी ने तो अपने पति की मृत्यु पर आपने बेटों को अर्थी को कंधा नहीं लगाने दिया। उसका कहना था कि इन बेटों ने जीते-जी अपने पिता, मेरे पति की सेवा नहीं की इस कारण इनको कोई अधिकार नहीं कि उनकी अर्थी को कन्धा दे या फ़िर अन्तिम संस्कार करें. अंततः उस महिला की जिद के बाद उसकी दोनों बहुओं और पड़ोस की दो अन्य महिलाओं ने उसके पति की अर्थी को कन्धा दिया, मुखाग्नि उसके पोतों ने दी।
इस तरह की घटनाओं के अतिरिक्त कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विवाह के अवसर पर होने वाले रस्मों में परिवर्तन तक मात्र इस कारन कर रहे हैं क्योंकि वे लड़के-लड़कियों में किसी तरह का अन्तर नहीं करते हैं.
बनारस के कश्यप फ़िल्म एंड टेलीविसन रिसर्च इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ0 डी0 कश्यप ने अपने तीन बेटों के विवाह में बेटों को नहीं बल्कि अपनी बहुओं को घोडी पर चढ़वाया था. उन्हों ने अपनी बहुओं का द्वारचार संस्कार कर पहले उनको मंच पर महाराज कुर्सी पर बिठवाया उसके बाद उनके लड़कों ने आकर जयमाला डाली। इस विवाह में फेरे, कन्यादान जैसी रस्मों को नहीं निभाया गया. यहाँ सिर्फ़ जयमाल और सिंदूरदान हुआ।
इसी तरह जयपुर की जुड़वां बहनों ने एक साथ विवाह के समय घोडी पर सवार होकर बिन्दौरी नामक परम्परा मे ये क्रांतिकारी कदम उठा कर दिखा दिया कि उनमें और लड़कों मे किसी तरह का अन्तर नहीं है।
शादी-विवाह, मुन्दम, संस्कारों से इतर एक और कार्य में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्शाई है और वो है बालाजी के मन्दिर में नाइनों का काम शुरू करके। इस मन्दिर में आने वाले लोग अपने केशों को भगवान् पर चढाते हैं और इनमें महिलाएं भी होतीं हैं। महिलाओं ने अब यहाँ भी बाल काटने का काम शरू किया है जिसे अभी तक यहाँ सिर्फ़ पुरूष ही करते थे।
एक मुस्लिम महिला ने तो क्रन्तिकारी कदम उठा कर पहली महिला काजी होने का गौरव प्राप्त किया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की शबनम आरा ने अपने काजी पिता के लकवा-ग्रस्त हो जाने पर निकाह आदि में उनका सहयोग करना शरू किया। धीरे-धीरे उनको शरीयत का इल्म हो गया। बाद में पिता की मृत्यु के बाद उन्हों ने अपना पंजीयन काजी के रूप में करवाया। मुश्किलों के बीच अंततः वे सफल रहीं और आज काजी के रूप में काम कर रहीं हैं।
ये कुछ उदाहरण हैं जो महिलाओं की हिम्मत को दर्शाते हैं। यही असली महिला-शक्ति है जो विपरीत परिस्थितियों से न घबरा कर अपना मुकाम बना चुकीं हैं। क्या कम कपडों और लचकते बदन को नारी-शक्ति समझने वाली महिलायें इन महिलाओं से कुछ सीखेंगीं? पुरुषों को कुछ सीखने की जरूरत नहीं क्योंकि उसे महिला की जरूरत नहीं, यदि होती तो कन्या-भ्रूण हत्या न हो रहीं होतीं?

{ये जानकारी श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर नगर मंडल, कानपुर के लेख "बदलते सरोकारों के बीच स्त्री समाज" द्वारा प्राप्त हुई। ये लेख स्पंदन (साहित्यिक पत्रिका) के मार्च 2008 अंक में प्रकाशित हुआ था।}