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26 अप्रैल 2026

अंत की ओर बढ़ता समाज?

पिता द्वारा अपने बच्चों की हत्या करने के बाद आत्महत्या करने की, माँ द्वारा अपनी संतान को कुँए में फेंकने की, पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे की हत्या करवाने-करने की, प्रेमी-प्रेमिका द्वारा सम्बन्धों में बाधक बनने पर परिजनों की हत्या कर देने की घटनाएँ अब लगभग रोज ही पढ़ने को मिलने लगी हैं. आपराधिक कृत्यों की ये घटनाएँ समाचार मात्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक संवेदनाओं के क्षरण का, पारिवारिक मूल्यों के समाप्त होते जाने का संकेत हैं. इस तरह की घटनाएँ बताती हैं कि इंसान का तेजी के साथ मानसिक और सामाजिक क्षरण होता जा रहा है. रक्त-सम्बन्धियों के मध्य जब घृणित अपराधों का ताना-बाना बुना जाने लगता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी सामाजिकता में बड़ी गिरावट आ चुकी है. इन घटनाओं को किसी एक व्यक्ति की अथवा व्यक्तियों के समूह की विकृति कह कर नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. देखा जाये तो ऐसी घटनाएँ हमारी बदलती जीवनशैली, गिरते नैतिक मूल्यों और बढ़ते अलगाव के कारण उत्पन्न होती हैं.

 

दरअसल आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने व्यक्ति को मानसिक दबाव में जकड़ लिया है. इस दबाव ने उसे अकेलेपन का भी एहसास कराया है. ऐसी स्थिति में उसे अनुभव होने लगता है कि उसके प्रति लोगों का, परिवार का, समाज का समर्पण नहीं है. सामान्य रूप में कहा जाये तो वह व्यक्ति स्वयं को सामुदायिक समर्थन-विहीन समझने लगता है. वर्तमान नाभिकीय परिवारों और फ्लैट कल्चर ने व्यक्ति के अकेलेपन को और बढ़ा दिया है. इस एकाकीपन ने मनुष्य को भावनात्मक रूप से कमजोर तो बनाया ही है साथ ही मानसिक अवसाद जैसी स्थिति ने उसे हिंसक भी बना दिया है. इसी अवसाद, हिंसक व्यवहार, अकेलेपन ने परिवारवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद को प्रमुखता दी है और इसके चलते नैतिक मूल्यों का पतन चारों ओर दिखाई देने लगा है. न केवल समाज में अपरिचित लोगों के मध्य बल्कि परिवार में भी स्वार्थ और कुत्सित वासनाओं से भरा व्यवहार चलन में आता जा रहा है. रिश्तों की पवित्रता पर व्यक्तिवाद और कामुकता हावी होती जा रही है. यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में लोगों ने सही और गलत के बीच का अंतर समझना बंद कर दिया है.

 



सामाजिक अकेलेपन, व्यक्तिवाद, संकुचित सोच के साथ-साथ यदि विस्तीर्ण रूप में विचार करें तो वर्तमान में व्यक्ति के मन-मष्तिष्क को अपने नियंत्रण में करते जा रहे डिजिटल युग, सोशल मीडिया को भी नकारा नहीं जा सकता है. इसके चलते चरित्र निर्माण, नैतिकता, सहानुभूति आदि तो पूरी तरह से रसातल की ओर जा रहे हैं. इस दुनिया ने मनुष्य के भीतर एक तरह की होड़ पैदा करवा दी है. दूसरों की चमक-धमक, उसकी आभासी शानो-शौकत देखने से वह खुद को हीन महसूस करने लगता है. ऐसी कथित हीनभावना के कारण मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे ईर्ष्या, क्रोध पनपने लगता है. इस तरह की नकारात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य इंटरनेट पर परोसी जा रही हिंसा और अश्लीलता के द्वारा किया जाने लगता है. लगातार आँखों के सामने से गुजरती हिंसा, वीभत्सता ने मानवीय मस्तिष्क को संज्ञा-शून्यता की स्थिति में ला खड़ा किया है. ये सहज रूप में देखने में आया है कि अब दुर्घटना की, अपराध की, मृत्यु की, हिंसा की खबरें विचलित करने के स्थान पर उनको शेयर करने के लिए उकसाती हैं. इस संवेदनहीनता ने मानसिक विकार को जन्म दिया है जो मनुष्य को अपराध के रास्ते पर ले जाता है.

 

नैतिकता, मूल्य, सामाजिकता, पारिवारिकता, हिंसा, अश्लीलता आदि को भले ही एकबारगी सामाजिक विघटन के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाये किन्तु यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कानून व्यवस्था के कारण भी आपराधिक प्रवृत्ति वालों के हौसले बुलंद रहते हैं. इन घटनाओं के पार्श्व में न्याय व्यवस्था में होने वाली देरी और कानून के भय का कम होना भी शामिल है. यद्यपि केवल कानून से समाज नहीं सुधर सकता है तथापि इसके लिए समाज को भी बदलना होगा. हमें फिर से उन मूल्यों की ओर लौटना होगा जहाँ इंसान, इंसानियत, रिश्तों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि का सम्मान होता था. जहाँ परिवार का अस्तित्व था, रिश्तों में मर्यादा थी, आपस में संवादहीनता नहीं थी, पारिवारिक सदस्य एक दूसरे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे.

 

समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा करनी होगी. शिक्षा क्षेत्र में जीवन कौशल, संवेगात्मक बुद्धि पर ध्यान देना होगा जिससे लोग संवेदनशील इंसान भी बन सकें. मन-मष्तिष्क को, ह्रदय को विचलित करने वाली ये घटनाएँ हमारे लिए एक चेतावनी है. यदि हमने अब भी अपने सामाजिक और नैतिक ढाँचे को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो रिश्तों की गरिमा पूरी तरह समाप्त हो जाएगी. तकनीक और आधुनिकता के साथ-साथ अपने मूल्यों और संस्कारों को भी विकसित करना होगा. ध्यान रखना होगा कि इस तरह के आपराधिक कृत्यों से केवल एक परिवार का नहीं बल्कि यह एक सभ्यता का, एक समाज का अंत होता है. जीवन की आपाधापी में, कथित आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हमें एक पल को रुक कर विचार करना होगा कि कहीं हम समाज को उसके अंत की तरफ तो नहीं ले जा रहे? 

 


03 मार्च 2023

एक भ्रम, जो दिलासा देता है

मनुष्य खुद को किसी न किसी बहाने से, किसी न किसी भ्रम में रखना पसंद करता है. ऐसा व्यतिगत रूप से हमें लगता है, संभव है कि सभी के साथ ऐसा न हो. हम लोग खुद को कितने धोखे में, भ्रम में रखते हैं, ये हम लोग ही जानते हैं. कभी अपने किसी आत्मीय के नाम पर, कभी अपने किसी पालतू जीव-जानवर के नाम पर, कभी कहीं आने-जाने के नाम पर, कभी किसी उपहार आदि के नाम पर. ऐसा हम सभी सोशल मीडिया पर रोज ही होता देख रहे हैं. सोशल मीडिया पर रोज ही यदि जन्मदिन वाली पोस्ट देखने को मिलती हैं तो आत्मीयजनों के चले जाने की खबरें भी मिलती हैं. अपने किसी आत्मीय के, परिजन के चले जाने का दुःख हम सबने किसी न किसी रूप में सहा ही होगा. ये पोस्ट इसी सन्दर्भ में हैं. 




ऐसा हम सभी को अक्सर देखने में आता है कि हम लोग अपने उस परिजन के चित्र पर माला डाल देते हैं, जो अनंत यात्रा पर जा चुका होता है. निश्चित है कि अपने किसी भी परिजन को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है. उसकी याद बने रहना, किसी अवसर विशेष पर उसका याद आना एक सामान्य सी घटना है. हम सभी में से से सभी ने ही अपने-पाने किसी न किसी परिजन को, कभी न कभी खोया ही है. उनके जाने के दर्द को महसूस किया है. उनके चले जाने का दुःख हम सभी किसी न किसी रूप में सहते ही हैं. जो परिजन हमसे बहुत दूर चले गए होते हैं, हम उनकी यादों को, उनकी स्मृतियों को चित्रों, फोटो के माध्यम से संजो कर रखते हैं. अक्सर हम उनके चित्रों पर माल्यार्पण भी करते हैं. ऐसा करने के पीछे उनको एक तरह से श्रद्धांजलि देने का काम किया जाता है.


विगत कुछ वर्षों में अपने परिजनों को हमने खोया है. उनकी फोटो पर हमने आजतक माला नहीं डाली है. अइया-बाबा का चित्र इस बारे में अपवाद है, वो भी शायद इस कारण कि पिताजी ने हमारे कहने के बाद भी उन पर माला डाले रखी. हमने पिताजी के, अपने छोटे भाई मिंटू के चित्र पर आज भी माला नहीं डाली है. सब कुछ जानते हुए भी मन में एक भ्रम रहता है उनकी फोटो देखकर कि वे हमारे साथ हैं. कितना बड़ा धोखा हम खुद को दे रहे हैं. ये जानते हुए भी कि अब देर रात घर आने पर, असमय घर आने पर पिताजी की डांट नहीं पड़ने वाली, कुछ करने के पहले पिताजी की राय नहीं मिल पानी; ये मालूम होते हुए भी कि अब पूरे अधिकार से पैसे माँगने, कुछ काम करवाने को मिंटू नहीं है, हमारी डांट सुनने के लिए वो घर पर नहीं है..... एक भ्रम पाले हैं कि ये लोग हमारे साथ हैं.


एक भ्रम है जो दिलासा देता है. एक धोखा है जो बस दिए जा रहे हैं. शायद ऐसा हममें से बहुत सारे लोगों के साथ होगा.






 

21 दिसंबर 2022

इक मुलाकात जरूरी है ज़िन्दगी के लिए

हम सभी के साथ अक्सर ऐसा होता होगा कि हम लोगों से मिलने का मन बनाये रहते हैं, बहुत से लोगों से बात करने का मन बनाये होते हैं मगर अपनी ओढ़ी हुई व्यस्तता के कारण न मिलने का समय निकाल पाते हैं और न ही फोन से बात कर पाते हैं. दिन में कई बार ऐसे विचार आने के बाद भी उसे आने वाले समय में कर लेने का सोच कर टाल जाते हैं. मिलने-जुलने, बातचीत करने का लगातार सोचते रहने के बाद भी कई-कई बार तो महीनों गुजर जाते हैं और अपने विचार को क्रियान्वित नहीं कर पाते हैं. मिलना-जुलना, मेल-मिलाप, बातचीत आदि एक सामाजिक क्रिया है और इससे संबंधों में प्रगाढ़ता तो आती ही है, आपसी समन्वय-सहयोग की भावना का विकास भी होता है. यह जानते-समझते हुए भी देखने में आ रहा है कि लोगों में मिलने-जुलने की भावना कम से कमतर होती जा रही है.


ये सदियों पहले की बात नहीं है जबकि समाज में मिलने-जुलने का भाव प्रमुख था. नब्बे के दशक में भी इस तरह की गतिविधियाँ सहज रूप से संपन्न हुआ करती थीं, जबकि लोग बड़े प्रेम, स्नेह के साथ एक-दूसरे के परिजनों के साथ मेल-मिलाप करते हुए अपना जीवन-यापन करते थे. हमें बहुत अच्छे से याद है कि शाम का समय यार-दोस्तों के साथ मिलकर गप्पबाजी करने में, घूमने-टहलने में बीता करता था. किसी दोस्त के दो-चार दिन न मिलने पर उसके घर पहुँचकर उसके हालचाल लिए जाते थे. दोस्तों के बीच ही सामंजस्य या मधुर सम्बन्ध नहीं हुआ करते थे बल्कि उनके परिजन भी आपस में मैत्रीभाव से जुड़े होते थे, एक-दूसरे के बारे में जानकारी रखते थे, उनका ध्यान रखते थे. अब ऐसा देखा जाना दुर्लभ हो गया है.




इस बारे में बीते दिनों हमारी अपने एक परिचित से मुलाकात हुई. अब घर जाकर मिलने में तमाम तरह की बाध्यताओं का पालन करने के कारण से बहुत से लोगों के घरों में जाना बंद कर दिया है. अब नियमित रूप से उन्हीं मित्रों, परिचितों के घर जाया जाता है जहाँ आज भी कोई औपचारिकता नहीं है, किसी तरह की कोई बाध्यता नहीं है. हाँ तो, एक शाम हमारे एक परिचित सड़क की चहलकदमी के दौरान मिले. इधर-उधर की बातचीत के दौरान मिलने-जुलने सम्बन्धी विषय पर चर्चा आकर टिक गई. उन्होंने अपना एक अनुभव हमारे साथ बाँटा तो एक पल को झटका सा लगा. उन्होंने बताया कि उनके रिश्ते के एक भाई ने एक बार उनके पारिवारिक आयोजन के दौरान एक सवाल सबके सामने रखा कि हम लोगों का अगले दस-पन्द्रह साल में आपस में कितनी बार मिलना संभव है?


देखने-सुनने में यह सवाल एकदम सामान्य सा, सीधा-साधा सा है. बावजूद इसके हमारे परिचित के परिजनों में आश्चर्य के साथ-साथ एक अनदेखे भय का भी संचार हुआ जबकि आपस में मिलने की संख्या बहुत अधिक नहीं हो सकी. उन सबके बीच सामान्य रूप से एक बात यह उभरी कि यदि परिवार में शादी-विवाह न हों, अन्य कोई पारिवारिक आयोजन न हो तो सबका आपस में बरसों-बरस तक मिलना नहीं होता है. यह स्थिति अकेले हमारे परिचित के परिवार की नहीं है कमोबेश सभी की है. एक पल को आप भी विचार करके देखिये कि अपने परिवार में जिन सदस्यों को आप अपना बहुत ख़ास कहते हैं, सार्वजानिक रूप से जिनके लिए आप जान तक देने का दम भरते हैं, उनके साथ मुलाकात की समयावधि क्या होती है? याद करके देखिएगा कि अपने किसी आत्मीय से, जो आपका परिजन नहीं है उसके साथ आपने अंतिम मुलाकात कर की थी?


ज़िन्दगी वाकई बहुत छोटी है. मिलना-जुलना, बातचीत करना बनाये रहना चाहिए. परिवार हो या मित्र, सभी से आत्मीय सम्बन्ध बने रहना एक बात है और उनसे मिलकर अपनी भावनाओं को प्रकट कर देना एक अलग बात है. मिलना-जुलना, आपस में बैठकर तमाम बातें करना बहुत सी परेशानियों को दूर भी करता है, बहुत सी समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है. जिससे मन करे उससे मिल आना चाहिए. जिससे मन करे उससे बात कर लेना चाहिए. क्षणभंगुर जीवन में पता नहीं कब आप ही कहें कि काश! उससे मिल आये होते, फलां व्यक्ति बहुत भला था. इससे पहले संबंधों में, रिश्तों में, आत्मीयता में ‘है के स्थान पर ‘था लगे अपने कदम घर के बाहर निकालिए और अपने आत्मीय को अपनी बाँहों में भर लीजिये, उसे अपने गले लगा लीजिये.  





 

16 नवंबर 2022

एहसासों का दरिया....

भावनाओं का अतिरेक

उमड़ते देखा,

एहसासों का दरिया

इस आँख से उस आँख तक

मचलते देखा,

नजरें चुरा कर

आँखों की बारिश

थामने की कोशिश,

शब्द-शब्द पर लबों को

लरजते देखा।


उक्त पंक्तियाँ पोस्ट के लेखक की ही हैं. कई बार कुछ पंक्तियाँ ही समूची मनोदशा की परिचायक होती हैं. इन पंक्तियों में भी कुछ ऐसा ही है. भावनाओं, एहसासों, संबंधों आदि महज शब्द नहीं होते हैं, यदि इनको माना जाये, इनकी गहराई को समझा जाये तो ये बहुत अधिक आत्मीय और संवेदना से भरे शब्द होते हैं. दो-चार वर्णों से बने इन शब्दों में किसी भी व्यक्ति को बाँधे रखने की शक्ति होती है. कितना भी कठोर दिल इन्सान हो उसकी आँखों को नम कर देने की क्षमता भी इन शब्दों में होती है.


आज के दौर में जहाँ बहुतायत सम्बन्ध, रिश्ते स्वार्थपूर्ति के लिए बनाये जाने लगे हैं वैसे में भावनात्मकता से भरे संबंधों का अपना ही महत्त्व है. इस महत्ता को, इन संबंधों को वही समझ सकता है जो इनको उसी गंभीरता से निभाता हो. इस स्थिति से दो-चार होने पर एहसास हुआ कि कई बार शब्द कम पड़ जाते हैं, अपनी बात कहने के लिए. बात को कहने से ज्यादा शब्दों को रोकने की कोशिश करनी पड़ती है. शब्दों से ज्यादा आँखों की नमी सबकुछ कह देने को व्याकुल सी दिखती है. खुद को कमजोर न पड़ने देने के साथ-साथ सामने वाले को भी कमजोर न होने देने का प्रयास करना पड़ता है. समझ नहीं आता है कि शब्दों को प्रकट कर देना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या फिर उनको रोके रखना? आँखों की नमी को छिपाना ज्यादा मुश्किल है या फिर नजरों का न मिलाना?


बहरहाल, ये हमारा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि बहुत से क्षणों में बात को न कहना, आँखों की नमी का छलकना, नज़रों का सामने वाले की नजर से बचाना ही सबकुछ कह देता है. इस सबकुछ कहे जाने को समझना ही महत्त्वपूर्ण है. 




11 नवंबर 2022

संबंधों में दिखावा

संबंधों के चलन में विगत लगभग दो दशक से बहुत ज्यादा दिखावा होने लगा है. संबंधों के निर्वहन में एक तरह की बनावट भी आ चुकी है. ऐसा नहीं है कि सभी तरह के संबंधों में अथवा सभी लोगों के संबंधों में ऐसा होता है किन्तु बहुतायत में ऐसा देखने को मिल रहा है. कुछ लोग लगभग प्रत्येक व्यक्ति जे जीवन में ऐसे होते हैं जो उनके बहुत ख़ास होते हैं. उनके अत्यंत निकट के होते हैं. ऐसे लोगों से किसी तरह का कोई औपचारिक सम्बन्ध नहीं होता है. उनके सामने भी उसी तरह का व्यवहार होता है, जैसा कि उनके पीछे. इसे उलट रूप में भी समझा जा सकता है कि उनके प्रति जैसी सोच और मानसिकता उनके पीछे होती है, ठीक वही उनके सामने भी होती है. इसमें किसी तरह का दिखावा नहीं होता है. 




इसके ठीक उलट ऐसे सम्बन्ध भी अस्तित्व में आ चुके हैं जहाँ जबरदस्त तरीके से बनावट है. सामने मिलने पर ऐसे मुलाक़ात की जाती है मानो इनसे बड़ा कोई ख़ास है ही नहीं. मिलने वाले जिगरी सम्बन्धी समझ आते हैं. एक-दूसरे के लिए जान देने वाला इनसे बड़ा और कोई नहीं संसार में, ऐसा दिखाई देता है. और जब यही लोग एक-दूसरे के पीठ पीछे होते हैं तो यही एक-दूसरे की काट करने वाले होते हैं. यही एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाले, एक-दूसरे को हराने की मानसिकता रखने वाले होते हैं.


हो सकता है कि ऐसी मानसिकता वर्षों से समाज में अपना अस्तित्व बनाये हुए हो मगर जिस तरह से पिछले दो-ढाई दशकों में ऐसा होते दिखा है, वो आश्चर्यचकित करने वाला है. इधर संबंधों के बनाने में, उनके निर्वहन में स्वार्थ को प्रमुखता से अपनाया गया. जहाँ से भी लाभ मिलने की उम्मीद दिखी, वहीं संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की कोशिश शुरू हो गई. संबंधों का ये निर्वहन उसी स्थिति तक गति पाता रहता है, जहाँ तक कि लाभ की स्थिति बनी रहती है. ऐसे सम्बन्ध अल्पकालिक रहते हैं किन्तु दिखावे के कारण बहुतेरे लोग संबंधों को खींचते रहते हैं. यही लोग वे होते हैं जो सामने आने पर आत्मीयता का चरम दिखाते हैं और पीठ पीछे यही लोग विश्वासघात करने का काम करते हैं. आज के समय ऐसे लोगों से बच कर रहने की आवश्यकता है. 






 

04 सितंबर 2022

मोना अंकल की यादें

कुछ रिश्ते किसी तरह के नामकरण से मुक्त दिल के करीब होते हैं, दिल से बने होते हैं. ऐसे ही रिश्ते की डोर से हम सबको बाँधे हुए थे हमारे मोना अंकल. जी हाँ, सामाजिक रूप में ‘मोना भाईसाहब के रूप में ख्याति प्राप्त श्री सुरेन्द्र सिंह जी को हम तीनों भाई मोना अंकल ही पुकारते रहे हैं. पिताजी से उनकी बहुत ज्यादा घनिष्टता रही और हमारे मामा लोगों को वे भाई की तरह मानते रहे. पिताजी से उम्र में बड़े होने के कारण मोना अंकल उनका नाम लेते थे और मामा जी से रिश्ता होने के कारण अम्मा जी को छोटी बहिन जैसा मानते हुए पैर छूते थे. ऐसे में बचपन में हम भाइयों के सामने बड़ी समस्या थी मोना अंकल को किस रिश्ते से पुकारा जाये. इसका भी समाधान करते हुए उन्होंने अंकल संबोधन को पास कर दिया, जिसमें ताऊजी और मामाजी दोनों शामिल थे. उनको अंकल भले पुकारते रहे मगर मोना अंकल की धर्मपत्नी ने मामी के अलावा कोई और संबोधन स्वीकार नहीं किया. मोना अंकल राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के छोटे भाई थे. हमारे परिवार का अत्यंत निकट का सम्बन्ध होने के कारण बचपन से ही घर आना-जाना हुआ करता था. जब कभी राजमाता का आना होता तो पिताजी के साथ हमारा भी यदाकदा जाना होता. वे बुआ कहलवाना पसंद करती थीं.




उनकी इंटरनेशनल ट्रैक्टर की एजेंसी हुआ करती. उसके और कभी-कभी अपनी जमीन आदि की कानूनी सलाह के लिए मोना अंकल का अक्सर घर आना हुआ करता था. उन दिनों वे विल्ली की जीप खुद चलाकर आया करते थे. वापस जाने पर हम भाइयों को जीप में बिठाकर दो-चार किमी का चक्कर लगवाना जैसे उनका नियम था. सिर पर गोल कैप, चेहरे पर मोहक मुस्कान उनकी पहचान हुआ करती थी. राजकीय इंटर कॉलेज में अपनी पढ़ाई के दौरान अपने मित्रों पर रोब गाँठने के चक्कर में हम उनको लेकर आये दिन कॉलेज के सामने बनी अंकल की ट्रैक्टर एजेंसी चले जाया करते थे.


जो स्नेह, दुलार, प्यार अंकल से, मामी से मिलता रहा वही स्नेह उस घर में भाइयों और भाभियों से मिलता है. ये किसी के लिए भी बहुत सौभाग्य की बात होती है कि तीन पीढ़ियों से किसी परिवार से स्नेह-सूत्र जुड़ा हुआ है. आज मोना अंकल के अनंत-यात्रा को प्रस्थान कर जाने की खबर मिली तो भीतर से बहुत कुछ समाप्त होता सा लगा. बहुत सारी बातें, उनकी सादगी, पिताजी पर उनका विश्वास, हम भाइयों पर उनका स्नेह आदि जाने कितना कुछ याद आया. कहा जाये तो अपने आपमें एक युग का अवसान हो गया आज. अब बस उनकी यादें शेष हैं, उन सुहाने दिनों की बातें शेष हैं.


अंकल को सादर नमन. 




 

25 जुलाई 2022

खुश रहना जहाँ भी रहना

विगत कई वर्षों की भांति चिर-परिचित तरीके से श्वेता की उपस्थिति का एहसास अपने बीच किया गया. इसे याद करना नहीं कहा जायेगा क्योंकि याद हम सभी उसे करते हैं जिसे भूल जाएँ. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी भी, किसी भी रूप में भुलाए नहीं जा सकते. ऐसे ही व्यक्तित्वों में श्वेता को सहज ही शामिल किया जा सकता है. जो लोग भी उससे मिले होंगे वे निश्चित ही इससे अपनी सहमति देंगे कि वो भुलाने योग्य व्यक्तित्व नहीं है.

 

दस जून ऐसी तारीख बन गई है, जिसे चाह कर भी अपनी स्मृति से मिटाया नहीं जा सकता. उस तारीख के साथ चल कर आई दुखद स्मृति को विस्मृत करने का अत्यंत नायाब तरीका श्वेता के जीवनसाथी अंकुर ने खोज निकाला. दस जून को उनके द्वारा मुस्कान हॉस्पिटल में रक्तदान शिविर का आयोजन विशुद्ध पारिवारिक रूप में किया जाने लगा है. सामाजिक रूप में अंकुर की जो छवि बनी हुई है, उसके अक्स में रूप में श्वेता की झलक उन दिनों में दिखाई पड़ जाती थी. अब जबकि श्वेता की आत्मिक उपस्थिति हम सबके बीच है, ऐसे समय में रक्तदान जैसा पावन कर्म उसकी उपस्थिति को और भी गहरे से महसूस करवाता है.

 



इस बार भी दस जून को रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ. किसी से आग्रह नहीं, किसी से जोर-जबरदस्ती नहीं, किसी की मनुहार नहीं, किसी पर दवाब नहीं इसके बाद भी श्वेता और अंकुर के हार्दिक व्यवहार के चलते लोगों की स्नेहिल उपस्थिति पूरे समय बनी रही. इस बार विशेष बात यह रही कि मुस्कान सेंटर के बच्चों ने अत्यंत उत्साह दिखाया.

 

मुस्कान हॉस्पिटल के रक्तदान शिविर में अपनी सकारात्मक उपस्थिति के बाद लगातार लिखने का मन करता रहा परन्तु हर बार आज की तारीख भी याद आती. दोनों तारीखों को जब भी हम व्यक्तिगत रूप से अपने भावनात्मक तराजू में तौलते तो हमें आज की तारीख ज्यादा वजनदार महसूस होती. इस 25 जुलाई वाली तारीख में श्वेता की अनुपस्थिति का आभास नहीं होता. आज की तारीख में उसके जाने का नहीं बल्कि इस दुनिया में आने का एहसास दिखाई देता है. उसके खोने की पीड़ा से बहुत अधिक उसके होने की ख़ुशी समाहित दिखती है.

 

श्वेता, जन्मदिन पर तुमको आशीर्वाद, तुम जिस रूप में जहाँ हो हमेशा सुखी रहो, हँसती रहो. लोगों को उसी तरह अपना बनाती रहो जैसे हम सबके बीच रहते हुए सबको अपना बनाती रही.






14 मई 2022

पुराने दिनों की सोंधी महक

कितना कुछ ऐसा देखा है, एहसास किया है हमारे समय की पीढ़ी ने. इस पीढ़ी को जानने के लिए इक्कीसवीं सदी के पहले जाना पड़ेगा. यह वो पीढ़ी है जो सत्तर-अस्सी के दशक में जन्म लेकर तमाम सारे बदलावों की साक्षी बनने के लिए आगे बढ़ रही थी. आज की पीढ़ी को मोबाइल, कम्प्यूटर आदि से चिपके देखते हैं तो अनायास ही पुराने दिन याद आ जाते हैं. उन दिनों के याद आने का कारण आज की पीढ़ी का इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निरंतर चिपके रहना नहीं है. उन दिनों को याद आने के पीछे तत्कालीन सामाजिकता, व्यावहारिकता, पारिवारिकता आदि भी प्रमुख है. सामूहिक रूप से खेलना, खुले मैदानों में बचपन का गुजरना एक अलग स्थिति तो है ही, उससे बड़ी और प्रमुख बात है उन दिनों में आपस में अपनत्व होना, समन्वय होना.


अपने बचपन के वे दिन कभी नहीं भूलते जबकि गर्मियों की रातें छत पर गुजरती थीं. शाम से ही छतों को पानी से नहलाने का काम बच्चों के कंधों पर आ जाता. सबकी अपनी-अपनी जगह निर्धारित हो जाती. रात की ठंडक के आते ही मोहल्ले भर की छतें गुलजार हो उठती थीं. यदि लाइट की कृपा रही तो पीले-पीले बल्बों की रौशनी में सबके घर चमकते न तो कहीं लालटेन की, कहीं ढिबरी की मद्धिम रौशनी बिखरती रहती. इसी रौशनी में सबकी छतों पर भोजन करने का लगभग सामूहिक कार्यक्रम शुरू हो जाता. किसी छत से आवाज़ आती चटनी ले जाने के लिए, कोई आवाज़ देता आम का पना पहुँचाने के लिए. किसी चाची के हाथ का अचार सबको ललचाता था तो किसी की छौंक लगी दाल से मुँह में पानी आ जाता. ये किसी एक दिन की बात नहीं होती बल्कि रोज का ही काम होता था. खाद्य सामग्री बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी जातिगत भावना के छतों-छतों घूमती-टहलती अपना स्वाद बाँटती रहती.




ऐसी स्थिति आज नहीं दिखती. आज छतों पर सोने का, टहलने का जैसे रिवाज ही नहीं रह गया. सुबह हों या शाम या फिर रात, छतों पर टहलते लोग, शरारत करते बच्चे दिखाई ही नहीं पड़ते. लाइट आये या न आये, लोग घरों में ही घुसे रहना पसंद करने लगे हैं. बच्चों के पास स्कूल के काम उन दिनों भी हुआ करते थे मगर आज के जैसा बोझ नहीं हुआ करता था. उन दिनों हमारे सिर पर अधिक से अधिक नंबर लाने का, अपने ही मित्र से ज्यादा नंबर लाने का, कक्षा में ही नहीं बल्कि पूरे शहर में टॉप करने का दवाब नहीं हुआ करता था. इस कारण से हमारी पीढ़ी ने उस समय को भी खुलकर जिया है और आज भी उसी मस्ती में जिए जा रही है. उन दिनों में संसाधन सीमित हुआ करते थे मगर वे अपार खुशियाँ देते थे. तब हम बच्चे लोग अकेले-अकेले किसी खेल में मगन नहीं रहा करते थे. कई-कई बच्चों के गुट बने होते थे, जो बस मौका निकालने का इंतजार करते थे. खेलों के अपने ही नियम हुआ करते थे, खेलों के कोई मानक उपकरण नहीं हुआ करते थे. कपड़े धोने वाली मुगरी क्रिकेट का बैट बन जाया करती थी तो लुगदी कपड़ों पर साईकिल ट्यूब की रबड़ से गेंद बन जाया करती थी. बाँस के टुकड़े हॉकी का रूप ले लिया करते थे तो कई बार हार्ड बोर्ड के टुकड़े, कॉपियों की दफ्ती बैडमिंटन के रैकेट का काम किया करती थी.


वे दिन, बचपन के वे सुहाने दिन हमारी पीढ़ी के लिए तो लौट कर आने ही नहीं हैं. जो पीढ़ी वर्तमान में अपने बचपन में है, उसके सहारे भी हमारी पीढ़ी अपने बचपन को नहीं जी सकती. आव की स्थितियाँ बहुत अलग हैं, ऐसे में पुराने दिनों को उन पर थोपा नहीं जा सकता मगर बहुत हद तक उन दिनों का कुछ स्वरूप बनाया जा सकता है. इसके लिए पुरानी पीढ़ी यदि कोई कदम भी उठाती है तो आज की तेज भागती पीढ़ी को वे सब काम, वे सब कदम, वे सब बातें बोरिंग लगती हैं, पुरातन काल की लगती हैं, उनको पिछड़ा सिद्ध करती हैं. फ़िलहाल तो हम अपने उन्हीं दिनों को याद करते हुए वर्तमान को उसी रौ में जी रहे हैं.


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06 मई 2022

नमन संजू भैया

 


परिवार को एक और आघात. जिस तरह की घटनाएँ कभी सोची भी न हों, कभी सपने में भी उस तरह की घटनाओं का आना न हो वैसी परिवार में वास्तविकता में घटित हो जाएँ तो मन व्यथित रहता है. बस, कुछ कहने का मन नहीं. विगत एक वर्ष से लगातार किसी न किसी रूप में आघात पहुँच रहा है, भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं.

नमन संजू भैया.


04 मई 2022

पारिवारिक एकजुटता की खुशियाँ

परिवार में कोई आयोजन हो और यदि सभी परिजन शामिल हों तो उस आयोजन में और भी अधिक मजा आता है. ऐसी सुखद अनुभूति का अवसर आया गृह प्रवेश के दौरान जबकि सभी लोग वहाँ उपस्थित हुए. ये पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक ही कहा जायेगा कि सुख-दुःख में सभी सदस्य एकसाथ दिखाई देते हैं. आज जब समाज में तमाम सारी विसंगतियों को देखते हैं वैसे समय में अपनी पारिवारिक एकजुटता पर गर्व होता है. मन कामना करता है कि इसे कभी किसी की नजर न लगे.


वर्तमान दौर इस तरह का बनता जा रहा है जबकि व्यक्ति आपस में तालमेल बनाकर नहीं रहना चाहता है. परिवार के चार सदस्यों के बीच जरा-जरा सी बात पर मनमुटाव हो जाता है, उनके बीच वैमनष्यता आ जाती है. आवश्यकता होती है आपस में समन्वय बनाने की, एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करने की, उनको आदर देने की. हम में से बहुत से लोग ऐसा करने में चूक जाते हैं. हम में से बहुतायत लोग चाहते हैं कि उनको सम्मान मिले, उनकी बातों को अहमियत दी जाये मगर जब दूसरों के लिए ऐसा करने की बारी आती है तो वही लोग पीछे हट जाते हैं. यही वह स्थिति होती है जबकि मनमुटाव आने लगता है.


बहरहाल, समाज की अपनी गति, अपनी दिशा है. यहाँ सबकुछ नियंत्रित होते हुए भी लगता है कि अनियंत्रित है. सबके साथ माहौल एक जैसा नहीं रहता. एक जैसा माहौल सभी को नहीं मिलता. पारिवारिक एकजुटता के इस हँसी-ख़ुशी के अवसर पर छोटे भाई मिंटू की कमी भी महसूस हुई. आँखों में ख़ुशी की झलक के साथ इस दर्द की नमी भी बराबर तैरती रही. ज़िन्दगी का शायद यही ढंग है और इसे स्वीकारना ही पड़ता है, चाहे वो अनमने रूप में ही क्यों न हो.










11 अप्रैल 2022

मुठी भर कलम तबा की स्याही, ताको विद्या कभऊँ न आई

पिछले दो-तीन दिनों से अपने संग्रह के तमाम पेन की देखभाल का काम चल रहा है. उनकी धुलाई-पुछाई हो रही है, कुछ नए पेनों को काम पर लगाया जा रहा है, कुछ पुराने पेनों को आराम दिया जा रहा है. जो गिफ्ट किये गए पेन हैं, उनको सुरक्षित रखने का काम चल रहा है. इसी में एक पेन आँखों के सामने से गुजरा तो उससे जुड़ी एक घटना भी न चाहते हुए याद आ गई. घटना के बरबस याद आ जाने के पीछे छोटा भाई मिंटू है, जो अब बस यादों में है.


वो फाउंटेन पेन अपने आकार में बहुत छोटा है. उरई के परिचित दुकान वाले हमारे पेन के, विशेष रूप से फाउंटेन पेन के शौक को जानते हैं, ऐसे में यदि कोई विशेष पेन या नया पेन हुआ करता है उनके पास तो वे हमें सूचित कर देते हैं. बहुत साल पहले किसी सामान लेने के लिए दुकान पर पहुँचे तो पता चला कि एक बहुत छोटा पेन आया है, वो भी फाउंटेन. हमने दिखाने को कहा और पेन भी ऐसा था कि पहली नजर का प्यार हो गया उससे. बस बिना किसी संकोच के साथ उसके साथ सम्बन्ध जोड़ते हुए उसे घर ले आये.




नए-नए पेन का उपयोग करने का अपना ही मजा है, बस उसी मजे को लेते हुए घर आते ही उसमें स्याही भरी गई और लिखना शुरू. ऐसे ही एक दिन अपने कमरे में बैठे कुछ लिखा पढ़ी हो रही थी. उसी समय सबसे छोटे वाले भाई का आना हुआ. उसने पेन देखा और आश्चर्य से उसे अपने हाथ में लेकर बोला, ये तो बहुत अच्छा लग रहा, बहुत छोटा भी है. उसकी आँखों की चमक बता रही थी कि अगले को वो पेन चाहिए है. यहाँ एक पल रुक कर आप सबको बता दें कि पेन, घड़ी के शौक भी उसे हमारी तरह रहे हैं. हमने कहा कि वो पेन रख दो, तुम्हारे लिए अलग रखा है एक पेन.


उसे जब ये भरोसा हो गया कि उसके लिए भी छोटा सा पेन रखा है तो उसी ख़ुशी के साथ अचानक से उसका स्वर कुछ गम्भीर हुआ और हमसे बोला कि भाई जी, ऐसे छोटे पेन से न लिखा कीजिये. हमने उसकी तरफ सवालिया निगाह से देखा तो उसने पेन अपनी मुट्ठी में बंद करते हुए कहा कि आपने सुना तो होगा इसे....


मुठी भर कलम, तबा की स्याही,

ताको विद्या कभऊँ न आई.


उसके बहुत ही गंभीरता से इतना कहते ही हमने बहुत जोर का ठहाका लगाया. दो-तीन मिनट की हमारी अनियंत्रित हँसी को रोकने के बाद हमने उससे कहा कि दो पी-एच.डी. कर ली और कितनी विद्या चाहिए, जो मुठी भर कलम इस्तेमाल करने से न आएगी. हमारे इतना कहते ही उसकी भी हमारे अंदाज वाली हँसी गूँज उठी.


आज उस पेन को देखकर भरी आँखें लिए बस मुस्कुरा कर ही रह गए क्योंकि हमारी हँसी में अपनी हँसी मिलाने वाला वो भाई हमारे साथ न था.   


16 जनवरी 2022

तुमसे अब ऐसे ही मिलना हुआ करेगा

अभी तक तो हम तुमको देख पा रहे थे, भले ही पार्थिव रूप में. आज एक साल होने को आया जबकि हमने तुमको पञ्चतत्त्व में विलीन कर दिया. जिस किसी भी, भले ही वह तुम्हारा निर्जीव रूप था, तुमको देख रहे थे मगर आज के बाद तो तुमको देख भी नहीं सके, तुमको छू भी नहीं सके. हम तो उस दिन तुमको छूने में भी संकोच कर रहे थे. समझ नहीं आ रहा था कि क्या कह के तुमको स्पर्श करें? उस दिन तो कोई आशीर्वाद भी तुम तक नहीं पहुँच रहा था. कोई आवाज़ भी तुम नहीं सुन रहे थे. दीपू ने कितनी बार कहा हमसे कि भाई जी मिंटू को बोलो कि उठे, मगर तुम किसी की सुन ही कहाँ रहे थे. तुम तक हमने बहुत बार हाथ बढ़ाया, बहुत बार तुमको छुआ मगर तुमने कोई जवाब नहीं दिया. तुमको उस दिन उठना ही नहीं था, तुम उठे भी नहीं.


कितनी बड़ी सजा है ये कि तुमको किसी दिन अपने कंधों पर उठाने वाले, तुमको खिलाने वाले उस दिन भी तुमको अपने कंधों पर लिए जा रहे थे मगर सबकी आँखों में आँसू थे. वे सब उस दिन खुश नहीं थे, हँस नहीं रहे थे. उस दिन गिरते-पड़ते हमने भी कुछ कदम तुमको अपने कंधे पर बिठाया था, ये सोच कर कि शायद तुम उठ बैठो मगर तुम न उठे. हम जानते थे कि तुमको अब नहीं उठाना है फिर भी खुद को धोखा देने का काम कर रहे थे. तुम उस धोखे में नहीं आये. तुम नहीं उठे.


बहरहाल, उस दिन को, उस बहुत बुरे दिन को आज एक साल हो गए हैं मगर ऐसा लगता है जैसे आज, अभी इसी समय की बात हो. एक पल भी तुम्हारे बिना नहीं गुजारा हमने. लोग पागल कह सकते हैं हमें, यदि उनको बताया जाये. कहने को कुछ भी कहा जाये मगर आज एक साल बाद भी एक सेकेण्ड तुम्हारे बिना नहीं गुजरा हमारा. आज पिंटू इंदौर में थे तो वो टिंकू, रश्मि और विक्रम सहित उज्जैन हो आये. तुम उज्जैन जाते रहते थे, रश्मि की भी ऐसी इच्छा थी. अब तुम हम सबके बीच या कहें कि तुम्हारे साथ हम सभी लोग इसी तरह बस संस्कारों के माध्यम से आते रहेंगे.







तुमको बार-बार आशीर्वाद, जहाँ रहो खुश रहो, सुखी रहो.