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29 जनवरी 2022

अभिभावक करें सहयोग

कोरोना के संक्रमण गति बढ़ने के कारण देश में लगभग सभी गतिविधियों पर विराम सा लगा दिया गया था. सभी तरह के क्षेत्रों में बंदी की स्थिति बन चुकी थी. बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी लोग घर पर रहते हुए ही अपने काम को पूरा कर रहे थे. आर्थिक ढाँचा यदि गड़बड़ हो रहा था तो शैक्षिक जगत में भी नकारात्मक माहौल देखने को मिल रहा था. सरकारें, प्रशासन, शासन आदि सभी लोग देश के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के बारे में विचार करने में लगे हुए थे, आज भी लगे हुए थे. यहाँ देश के आर्थिक स्तर से अधिक सोचनीय स्थिति बच्चों के शैक्षिक और मानसिक स्तर को समझने की है. भले ही वर्तमान दौर बहुत अधिक चिंता का कारण न हो मगर बच्चों के लिए यह समय अवश्य ही चिंताजनक बना हुआ है. ऐसे माहौल में जबकि आये दिन कोरोना संक्रमण के चलते संस्थानों को बंद करवा दिया जाता है, बाजार, पार्क, कोचिंग आदि पर भी पहरा सा लगा दिया जाता हैऐसे हालात में जबकि सामाजिकता का स्तर आपसी मेल-मिलाप के मामले में लगभग शून्य हो चुका हो तब बच्चों के शारीरिकमानसिक स्तर परउनकी क्रियाशीलता पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है.

 

यह वो स्थिति है जबकि बच्चे पूरी तरह से घरों में बंद हैं. उनके सामने ऑनलाइन क्लास करना, खेलने के नाम पर कंप्यूटर, मोबाइल हैं, मनोरंजन के नाम पर भी टीवी, मोबाइल आदि हैं, सामाजिक सक्रियता के नाम पर, खेलकूद के नाम पर अपने परिजन ही हैं. नित्यप्रति के वही सीमित से कार्यवही एक जैसी दिनचर्या गुजारते रहने के कारण बच्चों में एक तरह का चिड़चिड़ापन आता जा रहा है. इस वर्तमान परिदृश्य में अभिभावकों के लिए बच्चों के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस लगभग कैदखाने जैसे वातावरण में उनके लिए बच्चों का लालन-पालनउनकी परवरिश समस्याजनक हो गई है. बच्चों का उद्दंड होते जानाअत्यधिक उग्रता धारण करना एक समस्या है तो अभिभावकों का व्यवहार भी चिंताजनक है. बात-बात पर आदेशनुमा कदमकिसी भी कार्य का टोकाटाकी भी उचित नहीं है. इसे समझने की आवश्यकता है. इसके लिए बाल मनोविज्ञान को समझना-परखना अत्यंत आवश्यक है.

 

इस समय कोरोनाकाल के चलते बच्चों के स्कूल बंद हैं तथापि ऑनलाइन क्लास अवश्य ही चालू हैं. यहाँ भी स्थिति चूँकि सामान्य कक्षा जैसी नहीं है, सामान्य रूप से विद्यालय जाने वाली नहीं है. इस कारण ऑनलाइन क्लास करवाने के लिए बच्चों को सुबह जगाने के नाम पर चीखना-चिल्लानाउनको नाश्ता कराने-भोजन करवाने के नाम पर क्रोधित होनाउनको पढ़ाने के नाम परहोमवर्क करवाने के नाम पर खीझना अभिभावकों के लिए सामान्य गतिविधि बन गई है. इस तरह के व्यवहार में वर्तमान लॉकडाउन जैसी स्थिति भी बहुत हद तक जिम्मेवार है. इससे पहले भी बच्चों का सड़क पर निकल करघर से बाहर जाकर खेलना-कूदनाशरारत करना जैसे फूहड़पन की बातें हो गई थींइसे इस लॉकडाउन जैसी स्थिति ने और भी भयावह बना दिया है. अब बच्चे घर से बाहर निकले बिना ही अपने समय को व्यतीत कर रहे हैं. जरा-जरा सी बात पर एक तरफ उनके साथ टोका-टाकी बढ़ी है दूसरी तरफ अत्यधिक सुरक्षित रहने के दवाब ने भी बच्चों को परेशान सा कर रखा है.

 

पहले भी बच्चों को बाहर खुले में खेलने की न तो जगह दिखती थी और न ही उनको बाहर खेलने की बहुत ज्यादा अनुमति मिलती थी. जितनी आज़ादीजितनी अनुमति उनको अपनी कॉलोनीअपनी सोसायटी अथवा अपनी गली-मोहल्ले की बहुत छोटी जगह में खेलने-कूदने के लिए मिलती थी वह भी इस आपदा में छीन ली गई है. ऐसी विषम परिस्थिति में उनके शारीरिक मनोरंजन केअपने दोस्तों के साथ शरारत करने के जो नाममात्र के अवसर हुआ करते थेवे तो समाप्त ही हो गए हैं किन्तु स्कूल का जो बोझ उनके दिमाग परउनके मन पर था वह ज्यों का त्यों बना हुआ है. स्कूल के कामपढ़ाई के बोझऑनलाइन क्लास की अनिवार्यता में वे खुद को दबा हुआ पा रहे हैं. इस समय बच्चों के पास खेलने के लिए भी कंप्यूटर या मोबाइल ही हैंजिनके साथ वे ऑनलाइन क्लास के कई-कई घंटे बिताकर आये होते हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि उनका नैसर्गिक विकास नहीं हो पा रहा है. यदि इसी में उनको प्रतिदिन की सुबह से शाम तक की टोका-टाकी होने लगे तो ये बच्चे खुद को कमतर समझने लगते हैं. इससे न केवल बच्चे काम करने से दूर भागने लगते हैं बल्कि अपने ही अभिभावकों के प्रति नकारात्मकता पालने लगते हैं.

 

आज की स्थिति में माता-पिता को बच्चों के साथ न सही एक दोस्त की तरह पर दोस्ताना माहौल में काम करने की आवश्यकता है. यदि माता-पिता इस तरह का वातावरण अपने परिवार मेंघर में बना पाते हैं तो बच्चों का स्वाभाविक विकास करने के प्रति एक कदम बढ़ा सकते हैं. इसके लिए अपने बच्चों से उनके दैनिक अनुभवों के बारे में बात करें. वे दिन के बहुत बड़े भाग को ऑनलाइन क्लास में बिताने के बाद अकेले जैसे ही हैं. ऐसे में उनकी पढ़ाई से ज्यादा आवश्यक है कि उनको उनकी रुचियों की तरफ ले जाया जाये. उनको अन्य गतिविधियों में संलिप्त करवाया जाये. घर के ऐसे छोटे-छोटे कामों में उनको शामिल किया जाना चाहिए जिससे उनके अन्दर सामूहिकता की भावना जगेउनमे कार्य करने के प्रति रुचि बढ़े. बागवानीड्राइंगसंगीतक्राफ्ट आदि ऐसे विषय हैं जिनके द्वारा बच्चों में उत्पन्न हो रही निराशा को दूर किया जा सकता है.

 

कोरोना का यह दौर बहुत कुछ सिखाने के लिए आया है. यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर समय सिर्फ पढ़ाई की बातें बच्चे से नहीं करनी चाहिए. वर्तमान युग में कैरियर एक महत्त्वपूर्ण विषय हो सकता है मगर जिस भविष्य की इमारत की नींव को यदि आज कमजोर कर दिया जायेगा उस पर बुलंद इमारत बनाया जाना संभव नहीं होगा. ऐसे में उसके साथ किसी भी तरह से ऐसा व्यवहार न करें जो उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाये. किसी भी काम को करने के लिए तेज आवाज़ में बोलनाबच्चे की छोटी से छोटी गलती के लिए उसको डाँटनाचिल्लाते हुए किसी काम को करने का आदेश देना आदि ऐसे कदम हैं जिनके द्वारा बच्चे में एक तरह का भय बैठ जाता है. उसके अन्दर कमजोरी के भाव पनपने लगते हैं. ऐसे में वह हीनभावनाअसुरक्षाअवसाद जैसी स्थिति का शिकार होने लगता है. कोरोनाकाल में ऐसी अवस्था बच्चों को नकारात्मकता की तरफ धकेल सकता है. सभी अभिभावकों को ऐसे माहौल में अपने बच्चों के साथ सहयोगात्मक रूप में कार्य करने की आवश्यकता है.



(उक्त आलेख जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'सच बेधड़क' के दिनांक 29 जनवरी 2022 अंक के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.)

15 नवंबर 2019

लड़ना खुद से, जीतना-हारना भी खुद से


आज कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा था किन्तु कल से ही दिमाग में, दिल में ऐसी उथल-पुथल मची हुई थी, जिसका निदान सिर्फ लिखने से ही हो सकता है. असल में अब डायरी लिखना बहुत लम्बे समय से बंद कर दिया है. बचपन में बाबा जी द्वारा ये आदत डाली गई थी, जो समय के साथ परिपक्व होती रही. डायरी लिखने का महत्त्व भी समझ आता रहा सो डायरी लेखन लगातार बना रहा. बीच-बीच में ऐसे पल भी आये जबकि डायरी लेखन ने जीवन में काफी उठापटक मचा दी. भावनाओं का, संबंधों का अतिक्रमण करते हुए कुछ लोगों द्वारा डायरी का पढ़ना हो गया और उसका अनावश्यक दुष्प्रचार करके हमारी अपनी भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई. बहरहाल, समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता रहा, डायरी लेखन की आदत छूट न सकी और समयांतराल के साथ-साथ यह आदत बार-बार उभरती रही. हर बार कोई न कोई कारण ऐसा बनता रहा कि इसे बीच-बीच में बंद करते रहना पड़ा. इसी बीच तकनीक से परिचय हुआ, ब्लॉग का आना हुआ और डायरी लेखन की आदत कागज से हटकर डिजिटल मंच पर आने लगी. ब्लॉग कहीं न कहीं डायरी के रूप में हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया.


इधर बहुत लम्बे समय से ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम जीवन के विविध मंचों पर, तमाम आयामों पर असफल से होते जा रहे हैं. ऐसा नहीं कि जीवन के किसी मोड़ पर सफलता नहीं मिली हो मगर जिस तरह से असफलताओं का आना होता रहा, उसके हिसाब से सफलताएँ कम ही साथ आईं हैं. यदि एक सामान्य रूप से अपने जीवन का आकलन, विश्लेषण करने बैठ जाएँ तो असफलताओं का कैनवास बहुत बड़ा दिखाई देता है. विगत कुछ समय से अचानक ऐसी स्थितियों ने दिल-दिमाग पर जैसे कब्ज़ा सा कर लिया है. अपने आपका अपनी ही दृष्टि से मूल्यांकन किया जाता रहता है. कहाँ-कहाँ, किस-किस तरह की गलतियाँ हमारे द्वारा होती रहीं इनका विश्लेषण किया जाता रहता है. किस-किस गलती को सुधारा जा सकता है, कैसे सुधारा जा सकता है इसका भी आकलन किया जाता रहता है. भरसक प्रयास किया जाता है कि लगभग सभी गलतियों को सुधार दिया जाए. इसके बाद भी बहुत से कदम ऐसे हैं जिनको अब टाइम मशीन के द्वारा ही दोबारा पाया जा सकता है. उन कदमों के साथ हुई गलतियों को अब किसी भी रूप में सुधारा नहीं जा सकता है. ऐसे में लगता है कि उनका प्रायश्चित ही कर लिया जाए. यहाँ आकर भी सिर्फ खाली हाथ नजर आते हैं क्योंकि यह भी समय के चक्र में कहीं दूर हो चुकी स्थिति है.

फिलहाल तो आजकल अपने आपसे लड़ना हो रहा है. खुद से लड़ना, खुद से जीतना, खुद से हारना और फिर सबकुछ शून्य में विलीन होकर ज्यों का त्यों उसी अवस्था में दिखाई देने लगता है, जहाँ से लड़ना शुरू किया था. दिल-दिमाग लगाने के बाद भी हर एक स्थिति समझ से बाहर लगती नजर आती है. सबकुछ साथ होने के बाद भी साथ छूटता सा दिखाई देता है. हर गलती स्वीकारने के बाद भी, हर गलत कदम का प्रायश्चित करने के बाद भी गलतियाँ कम होने का नाम नहीं लेती हैं. तमाम सारी आदतों के बीच एक और आदत जो बाबा जी के द्वारा विकसित करवाई गई थी, रात को सोने के पहले दिन भर की गतिविधियों में से अच्छी और बुरी गतिविधियों का आकलन करना. अच्छी बातों को आगे करते रहने का संकल्प करना और बुरी बातों के लिए माफ़ी मांगते हुए आगे से न करने का वादा करना. हर रात उसी एक दिन की गतिविधियों के आकलन से शुरू होती है जो चलते-चलते अतीत तक पहुँच जाती है. अच्छी बातों के ऊपर गलत बातों का साया फैलता दिखाई देने लगता है. कब तक, कितनी बार, किस-किस से प्रायश्चित किया जाये? प्रत्यक्ष से, अप्रत्यक्ष से, चेतन से, अचेतन से, जीवित से, मृतक से न जाने किस-किस से ऐसा करना होता है, किया जा रहा है. इसके बाद भी खुद में हार जैसा, खुद में असफल होने जैसाएहसास बराबर बना रहता है. पता नहीं अन्दर से ऐसी कौन सी शक्ति विश्वास को बढाए रहती है, आत्मविश्वास को कमजोर नहीं होने देती है अन्यथा खुद के हार कर, टूट कर बिखरने में कोई कमी समझ नहीं आती है. पता नहीं कब तक ऐसा होता रहेगा?

16 जुलाई 2018

नकारात्मकता को त्याग कर ही होगा विकास


गणितीय नियमों के अनुसार दो ऋण मिलकर भले ही धन बना देते हों मगर जीवन में एक भी ऋण परेशानी पैदा कर देता है। यहाँ ऋण का तात्पर्य किसी तरह के आर्थिक क़र्ज़ लेने से नहीं वरन सोच में, कार्य में, रहन-सहन में, बातचीत में आती जा रही नकारात्मकता से है। वर्तमान में समाज में बहुतायत में नकारात्मकता देखने को मिल रही है। परिवार के स्तर से लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नकारात्मकता विभिन्न चरणों में, विभिन्न स्तरों में देखने को मिल रही है। काम करने का ढंग, जीवन-शैली, सोचना-समझना, तर्क-वितर्क, सामाजिक सरोकार आदि-आदि में नकारात्मकता परिलक्षित हो रही है। लगातार विकासोन्मुख होता इन्सान उसी के सापेक्ष नकारात्मक होता जा रहा है। ऐसा लगने लगा है जैसे इन्सान नकारात्मकता में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। इस नकारात्मक सोच के पीछे खुद इन्सान की ही बहुत बड़ी भूमिका है। किसी भी तरह की जरा सी परेशानी को, छोटे से कष्ट को, किसी छोटी सी घटना को वह अपने दिल-दिमाग में इस कदर बैठा लेता है कि उसके सापेक्ष सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने लगता है, उन्हीं घटनाओं के सन्दर्भ में आने वाले समय की सफलताओं-असफलताओं को निर्धारित करने लगता है। अतीत की समस्याओं, परेशानियों, कष्टों को वर्तमान अथवा भविष्य के साथ जोड़कर कार्य करने से जहाँ एक तरफ कार्य-क्षमता प्रभावित होती है वहीं दूसरी तरफ अन्य विकासात्मक कार्यों में भी व्यवधान पड़ता है।


असल में किसी भी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, नकारात्मकता उसकी सोच पर निर्भर करती है। यह भी सच है कि परिस्थितियाँ भी किसी न किसी रूप में मनुष्य के सोचने-समझने को प्रभावित करती हैं किन्तु इसके बाद भी उससे बड़ा सच यह है कि यदि मनुष्य अपने आपको स्थिर रखे, संयमित रखे, नियंत्रित रखे तो निसंदेह वह अपनी सोच को भी नियंत्रित कर सकता है। इसी सोच के द्वारा वह अपने आपको परिस्थितियों से बाहर निकाल पाने में सक्षम होता है। देखा जाये तो किसी के भी जीवन में सकारात्मकता हो या फिर नकारात्मकता, वह कहीं बाहर से नहीं आती है। ये उसकी सोच और उसके बाद के क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि नकारात्मकता आने पर या फिर लगातार बढ़ते जाने पर व्यक्ति के स्वभाव-व्यवहार में निराशा, हताशा, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, उदासी, तनाव आदि साफ़-साफ़ परिलक्षित होने लगते हैं। इसके चलते उसका व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है। यदि उसके द्वारा बहुत जल्दी अपने इस स्वभाव पर, अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, अपनी नकारात्मकता पर अंकुश नहीं लगाया जाता है तो उसके स्वभाव में दिखने वाले नकारात्मक लक्षणों की तीव्रता बढ़ती जाती है। इसके चलते वह अपने परिजनों, सहयोगियों, सामाजिक क्रियाकलापों में तन्हाई का, अकेलेपन का अनुभव करने लगता है। इसके साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों में प्रत्येक कामों में, प्रत्येक गतिविधियों में नकारात्मकता ही नजर आने लगती है। उसकी आँखों के सामने से गुजरने वाली किसी भी गतिविधि में दोष ही नजर आने लगता है। उसके सामने वाले सफल व्यक्ति के व्यक्तित्व में भी खोट नजर आने लगती है।

ऐसा नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आई नकारात्मकता को दूर नहीं किया जा सकता है। चूँकि यह स्थिति विशुद्ध सोच पर, मानसिकता पर आधारित है, इस कारण इससे छुटकारा भी पाया जा सकता है। नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले तो किसी भी व्यक्ति को अपने विश्वास को, अपनी सोच को कमजोर नहीं मानना चाहिए। आत्मविश्वास को सर्वोच्च स्तर तक बनाये रखने वाले व्यक्ति किसी भी तरह की नकारात्मकता को अपने आसपास फटकने भी नहीं देते। ऐसे व्यक्ति जिनको छोटी-छोटी समस्याओं, परेशानियों के चलते नकारात्मक विचार आने शुरू हो जाते हैं उन्हें सदैव ऐसे लोगों से मिलने से बचना चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक बातों को प्रश्रय देते हैं, उन्हें बढ़ावा देते हैं। व्यक्ति को किसी भी स्थिति में अपना नियंत्रण न खोते हुए इस पर अमल करना चाहिए कि मैं ऐसा कर सकता हूँ। अक्सर देखने में आता है कि व्यक्ति आपसी वार्तालाप में नकारात्मक शब्दों का प्रयोग करता है, अपने साथ होने वाले कष्ट को, दुःख को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता है, उसे ऐसा करने से बचना चाहिए। सकारात्मक शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ-साथ जीवन को निरुद्देश्य समझकर गुजारने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अपना महत्त्व है और वह उसी के अनुसार इस समाज में अपना योगदान दे रहा होता है। समाज में अपना योगदान से रहे ऐसे लोगों को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए साथ ही अपने किसी शौक को भी स्थापित करने की आवश्यकता है। बहुधा देखने में आता है कि व्यक्ति लगातार कार्य करने के बाद भी समाज में, परिवार में उस प्रस्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है जिसका हक़दार वह खुद को समझता है। इसके चलते भी उसमें नकारात्मक सोच का जन्म होने लगता है। ऐसे व्यक्तियों को अपने किसी न किसी शौक के द्वारा अपने व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास करना चाहिए।

गणितीय नियमों की तरह सामाजिक जीवन में भी नकारात्मक को सकारात्मक में बदला जा सकता है। इसके लिए मनुष्य को अपने कार्य से संतुष्टि, अपनी सोच में विश्वास, अपने रहन-सहन में नियंत्रण, अपने जीवन को उद्देश्यपरक बनाये रखना चाहिए। याद रखना होगा कि मनुष्य की सकारात्मकता ही मनुष्य को सफलता प्रदान करवाती है, उसे मंजिल तक ले जाती है, समाज को दिशा प्रदान करती है।


27 जून 2018

महबूबा मौत और जिन्दगी का सच


लोगों से मिलने-मिलाने के क्रम में, जानकारियों, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के दौरान, पढ़ने-लिखने के शौक में अक्सर देखने में आता है कि लोगों को जीवन के बारे में दार्शनिक रूप में अपनी राय रखने में बड़ा ही आनंद आता है. ऐसे लोगों का अपनी जीवन-शैली को लेकर, अपने जीवन-निर्वहन को लेकर, अपने सुखों, अपने दुखों, अपने रिश्तों, अपने संबंधों, अपने रोजगार, अपनी आजीविका आदि को लेकर उसका शायराना, दार्शनिक, सूफियाना अंदाज दिखाई देता है. क्षणभंगुर जीवन की स्वीकार्यता महज उनकी बातों में दिखाई देती है. ऐसा लगता है जैसे वे जीवन के प्रतिक्षण सिर्फ और सिर्फ मौत को गले लगाने को बैठे हैं. ऐसे लोगों की बातों में एक फ़िल्मी गीत ज़िन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी जैसा ज़िन्दगी और मौत का जबरदस्त दर्शन दिखाई देता है. इन लोगों को अपने साथ चलती ज़िन्दगी की कद्र नहीं होती है, जिन्दगी को जिन्दगी बनाने वालों की चिंता नहीं होती, जिन्दगी के वर्तमान का आनंद लेने की फुर्सत नहीं होती है. इसके उलट अपने शब्दों के, बातों के बताशे फोड़ते हुए ये लोग मृत्यु नामक महबूबा के लिए परेशान रहते हैं. उसके साथ जाने की आतुरता है. ये और बात है कि इस दर्शन को मानने वालों में से किसी ने भी अपने आप आगे कदम बढ़ाकर अपनी महबूबा का हाथ नहीं थामा है.


यहाँ आकर ज़िन्दगी और मौत की हमारी अपनी ही एक अलग थ्योरी है. आखिर मौत को किसलिए, किस कारण महबूबा माना जाता है? क्या ऐसा मानने वाले अपनी जिन्दगी के ऊब चुके होते हैं? क्या उन्हें अपनी जिन्दगी से किसी तरह का आनंद नहीं मिल रहा होता है? असल में ज़िन्दगी एक जीवनसाथी के समान है, एक मित्र के समान है जो आपके साथ है, आपके कदम से कदम मिलाकर साथ चल रही है और शायद इसीलिए ऐसे लोगों को जिन्दगी की कद्र नहीं है. जिन्दगी वही है जो आपके साथ है, अच्छे में, बुरे में, आपके साथ लड़ती-झगड़ती भी है. आपसे प्यार-दुलार भी करती है. कहने का आशय कि आपको अच्छे दिन भी दिखाती है, आपको बुरे दिन भी दिखाती है.

अब जैसे कहा जाता है न कि दूसरे की थाली का भात बहुत पसंद आता है, ठीक इसी तरह अपने साथ रहती ज़िन्दगी पसंद नहीं आती. सो एक अदद मौतरुपी महबूबा खोज लाये, ज़िन्दगी में थ्रिल के लिए. खुद को ये समझाने के लिए कि ज़िन्दगी रुपी जीवनसाथी के अलावा भी हमारे पास एक महबूबा है. खुद को मौज-मस्ती के चरम तक ले जाने के लिए कि हमारे पास भी महबूबा है. आराम से सपनों में चैटिंग करके, नींद में व्हाट्सएप्प करके, अचेतन में मोबाइल घुमाकर अपनी महबूबा की तस्वीर बनाकर मौज-मस्ती कर लिया करते हैं. कुछ अपनी महबूबा को सड़कों पर खोजते फिरते हैं. कुछ तेज रफ़्तार बाइक के द्वारा, कुछ बाइक के स्टंट के द्वारा, कुछ हैरतअंगेज करतबों के द्वारा आये दिन महबूबा को बुलाते रहते हैं. इसके बाद भी इनमें से किसी ने चाहकर भी अपनी महबूबा का आलिंगन नहीं किया और न ही करना चाहा. हाँ, लोगों के सामने अपनी महबूबा की तारीफ के लिए, खुद को बहुत रोमांटिक दिखाने के लिए वे बात-बात में मौत को चैलेंज करते रहते हैं. कल मरते हों तो आज मर जाएँ, मौत हमारे लिए बाँए हाथ का खेल है, ज़िन्दगी से ऊब गए, अब मौत की नींद सोना है आदि-आदि जैसे कथनों से सिर्फ बातों के बताशे ही फोड़े जाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि मौतरुपी महबूबा से खेलने में और उसके साथ हँसते-हँसते चल देने में बहुत बड़ा अंतर है. बहुतों को देखा है जबकि इस महबूबा के आने की आहट हुई तो सकपका गए. जो भी सामने मिला उसी के हाथ-पैर जोड़कर मौतरुपी महबूबा से मुक्ति पाने की कामना करने लगे. उस समय उनको मौत महबूबा नहीं वरन किसी चुड़ैल जैसी लगने लगी. ज़िन्दगी तब बेवफ़ा नहीं वरन जीवनसाथी सी लगने लगी. एक झटके में सारी दार्शनिकता, सारा शायराना अंदाज हवा हो जाता है. सामाजिक दायित्व, कर्तव्य, परिवार, माता-पिता, भाई-बहिन, जीवनसाथी, बच्चे, दोस्त, रिश्तेदार दिखाई देने लगते हैं. महबूबा के साथ चलने में असमर्थता दिखने लगती है. बड़े से बड़े चिकित्सालय के साथ-साथ गली-कूचे का तांत्रिक असरकारी नजर आने लगता है.

ऐसे ही विषम मोड़ पर ज़िन्दगी का मोल समझ में आता है. ऐसे ही संकट के समय महबूबा के साथ आलिंगनबद्ध होने की असल परीक्षा होती है. संकट का एक पल सामने आता है  तो मौत जैसी महबूबा से अधिक अहमियत ज़िन्दगी सरीखे जीवनसाथी  की समझ आती है. समझ आता है कि ज़िन्दगी बेवफा नहीं वरन वही है जो साथ चल रही है. मौतरुपी महबूबा तो सिर्फ परिवार बिगाड़ने आई है. अपनों से अपने को दूर करने आई है. अपनों  की आँखों में आंसू देने आई है. उनके घरों में झाँक कर देखो जहाँ किसी नौजवान की मृत्यु हुई है, उन परिवारों से पूछो जिन्होंने अपने घर का आधार-स्तम्भ खोया है, उन लोगों से पूछो जिन्होंने अपने सिर से आशीर्वाद का साया खोया है तब पता चलता है कि महबूबा कौन है मौत या जिन्दगी. दर्शन बहुत अलग चीज है, इसके सहारे जीवन नहीं चला करते. सच तो ये है कि ज़िन्दगी ही अंतिम सत्य है, यदि वही बेवफ़ा है तो वही महबूबा भी है. बस एक बार महबूबा की तरह उससे रोमांस करके तो देखो, मौतरुपी महबूबा को भूलकर ज़िन्दगीरुपी महबूबा के आलिंगन में बंधे रहोगे. उसी के प्रेम में निमग्न रहोगे.

18 जून 2018

दर्द एक मीठा सा एहसास है


दर्द, ये एक ऐसा शब्द है जो प्रत्येक व्यक्ति के साथ जुड़ा हुआ है. अमीर हो या गरीब, राजा हो या रंक, नेता हो या जनता, मालिक हो या नौकर, रोजगारपरक हो या बेरोजगार, किसान हो या उद्योगपति या अन्य कोई भी सबका दर्द से सामना होता ही है. दर्द के भी अपने अलग-अलग फलसफे हैं. कोई किसी दर्द से पीड़ित है तो कोई किसी दूसरे दर्द से. कोई तन के दर्द से दोहरा हुआ जा रहा है कोई मन के दर्द से पीड़ित है. किसी को दिमागी दर्द है तो कोई दिल के दर्द से परेशान है. किसी के बोलने में दर्द है, किसी की ख़ामोशी में दर्द है. कोई गीत गाकर अपने दर्द को बयां कर रहा है तो कोई ग़ज़ल लिखकर अपने दर्द की अभिव्यक्ति कर रहा है. आखिर एक दर्द के अनगिनत अफसाने कहाँ से, कैसे और किसने बनाये? चिकित्सा विज्ञान में भले ही दर्द को शारीरिकता से जोड़कर देखा जाता है मगर उसके अलावा जहाँ भी इसको परिभाषित किया गया है वहां इसका सम्बन्ध मन से, दिल-दिमाग से बताया गया है.  


समझने वाली बात है कि दर्द अपने आपमें एक कटु अनुभव, एक पीड़ादायक अनुभव है. दर्द विशुद्ध रूप से संवेदनात्मकता, भावनात्मकता से जुड़ा हुआ है. दैहिक रूप से दर्द की अनुभूति हो या फिर मानसिक रूप से इसका आभास हो, सभी किसी न किसी रूप में संवेदनात्मकता से ही जुड़े हुए हैं. वैसे इधर देखने में आया है कि दर्द की वर्तमान अनुभूति शरीर से ज्यादा मन से, दिल-दिमाग से जुड़ गई है. लोगों के रहन-सहन में सामान्य स्तर की जगह से विशेषीकरण का प्रभाव बढ़ने लगा है. ऐसे में दिल-दिमाग किसी भी परिस्थिति को सामान्य रूप से स्वीकार करने में असफल हो रहे हैं. यही असफलता दर्द को बढ़ा रही है. चिकित्सा विज्ञान में तो इसका कोई इलाज है नहीं संभव है कि मनोविज्ञान में इसका कोई इलाज हो. वैसे दर्द की अनुभूतियाँ भी स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग भी होती हैं. दर्द किसी भी तरह का हो यदि वह किसी अपने से जुड़ा हुआ है तो उसकी संवेदनात्मकता, उसकी भावनात्मकता कहीं गहराई तक होगी. ऐसा नहीं है किसी गैर के दर्द को देखकर खुद को दर्द की अनुभूति कम हो. संभव है कि यहाँ भी दर्द का स्तर उसी बिंदु पर आकर स्थिर हो जाये जहाँ किसी अपने के कारण स्थिर हुआ था. ऐसी स्थितियों के कारण ही दर्द, चाहे वह शरीर में उपजा हो अथवा मन में या फिर किसी की अनुभूति से उसका सीधा सा सम्बन्ध भावना से है.

चोट खाने से भी दर्द की अनुभूति होती है, किसी सौन्दर्यबोध से भरी हुई विरोग रचना को सुन-पढ़-देख कर भी दर्द की अनुभूति होती है. ऐसे किसी भी दर्द के पीछे का मूल कारण इन्सान का भावनात्मक होना है. तो फिर सवाल उठता है कि क्या जानवरों को दर्द नहीं होता? यदि जानवरों का दर्द सिर्फ शारीरिक है तो भी सवाल वहीं का वहीं कि क्या उनको मानसिक दर्द नहीं होता है? जानवरों या कहें कि पशु-पक्षियों के व्यवहार को देखें तो साफ समझ आता है कि वे अपने साथी के लिए संवेदी रूप से सक्रिय रहते हैं. ये भले ही कहा जाये कि दिमागी रूप से कुछ जानवर ही सक्षम हैं मगर संवेदनात्मक रूप से सभी पशु-पक्षी समान भाव से सक्रिय रहते हैं. एक पल को शारीरिक दर्द की स्थिति से इतर सिर्फ मानसिक दर्द की बात की जाये तो यह भी स्पष्ट है कि मिलने-बिछड़ने का, सुख-दुःख का, हँसी-उदासी का अपना-अपना दर्द जितना इंसानों में महसूस किया जाता है उतना ही पशु-पक्षियों में देखने को मिलता है. स्पष्ट है कि दर्द का रिश्ता विशुद्ध रूप से संवेदनाओं का है. संवेदनात्मक रूप से जिस तरह से सामाजिक ताना-बाना आज छिन्न-भिन्न होता दिख रहा है, उतनी तेजी से दर्द का रिश्ता भी टूटता जा रहा है. आज कोई भले कहे कि वह दिल के, दिमाग के, अपनों के दिए धोखे के या फिर जीवन की किसी भी स्थिति के चलते दर्द को झेल रहा है, सह रहा है लेकिन यह नितांत झूठ है. आज जिस तरह की जीवन-शैली इंसानों ने अपना रखी है, उसमें वह दर्द नहीं बल्कि तन्हाई सह रहा है, एकांतवास झेल रहा है, अकेलेपन से जूझ रहा है. देखा जाये तो दर्द वह मीठा सा एहसास है जो उसे समाप्त करने के लिए इन्सान को, जीवन को सक्रिय बनाता है, हँसना सिखाता है, रुलाता नहीं है, निष्क्रिय नहीं बनाता.