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23 अक्टूबर 2024

लला तुम फिरऊ न माने

कॉलेज टाइम की एक लय याद आ गई...

++++

लला के बब्बा बोले

होए

लला की दादी बोली

होए

लला की अम्मा बोली

होए

लला के बाप बोले

होए

लला बवाली से बचियो

होए

लला तुम रगड़े जैहो

होए

लला तुम फिरऊ न माने

होए

लला तुम अपनी पे अड़ गए

होए

लला तुमने अत्तई धर लई

होए

लला फिर बवाली न मानो

होए

लला वो अपनी पे आ गओ

होए

लला तुम गाली खा गए

होए

लला तुमाई कनपटी सिक गई

होए

लला तुम रगड़ के धर दए

होए

लला तुम चीं न कर पाए

होए

लला तुमाई ऐसी-तैसी

होए

लला अब जूते खैहो

होए

लला तुम अभऊँ मान जाओ

होए

लला तुम हार गए

होएएएएए

++++++++++++++

अब रगड़ाई रोज के रोज


29 अक्टूबर 2023

हर कदम पर प्रोत्साहित करते अभय अंकल

आज, 29.10.2023 को अभय अंकल की स्मृति में संगीत निशा का आयोजन वातायन, उरई द्वारा किया गया था. इस एक पंक्ति में दो-तीन शब्द हमारे ब्लॉग के पाठकों के अलावा बहुत सारे लोगों के लिए एकदम नए और अपरिचित होंगे. इसमें पहला शब्द है अभय अंकल, देश-विदेश के वे सारे लोग जो हमसे परिचित हैं, वे सहज ही अभय अंकल से समझ लेंगे कि किस व्यक्तित्व के लिए ये लिखा गया है. हमसे अपरिचित लोगों के लिए एक संक्षिप्त परिचय देना तो बनता ही है. यहाँ एक बात स्पष्ट कर दें कि यदि विस्तीर्ण परिचय देना शुरू कर दें तो यह पोस्ट बहुत ही अधिक लम्बी हो जाएगी. साइंस कॉलेज, ग्वालियर से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे उरई के दयानंद वैदिक महाविद्यालय में रक्षा अध्ययन विभाग में अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे. इसके अलावा जनपद की अनेकानेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं में पदाधिकारी के रूप में भी सक्रिय रहे. 



पहली पंक्ति में जिस दूसरे अनजान शब्द वातायन का जिक्र है, उसके जन्म के पीछे दो लोगों का महत्त्वपूर्ण योगदान है. इसमें एक तो अभय अंकल हैं ही और दूसरे थे ब्रजेश अंकल यानि कि डॉ. ब्रजेश कुमार जी. (ब्रजेश अंकल के बारे में एक पोस्ट अलग से) अभय अंकल वातायन के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में रहे. इस सांस्कृतिक संस्था द्वारा अनेकानेक नाट्य-प्रस्तुतियाँ जनपद में और जनपद के बाहर भी दी गईं. नाट्य-प्रस्तुतियों के अलावा अनेकानेक सांस्कृतिक कार्यक्रम वातायन के बैनर पर होते रहे. अभय अंकल के बारे में एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि वे नैसर्गिक रूप से बहुत बेहतरीन संयोजक थे. किसी भी तरह का कार्यक्रम हो, उनके द्वारा ऐसे संयोजन किया जाता मानो वह कार्यक्रम उनकी उँगलियों पर नाच रहा हो.


इस संयोजन क्षमता के पीछे उनका बुद्धि कौशल तो था ही, उससे बड़ी थी टीम भावना. यहाँ बहुत सारी बातों का जिक्र न करने स्वयं अपने अनुभव से गुजरी एक घटना का जिक्र करना चाहेंगे, जिसने सिद्ध किया कि अभय अंकल किस तरह अद्भुत नेतृत्व क्षमता से परिपूर्ण थे. वर्ष 2004 की बात है. एक दिन दोपहर में अभय अंकल का फोन आया कि तुरंत विभाग में आओ. अगले क्षण हम डीवी कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में उपस्थित थे. एक पत्र उन्होंने हमारे सामने रखते हुए कहा कि एक नेशनल सेमीनार करवाना है. तुम बताओ क्या काम करोगे इसमें? हमने कहा कि जो भी काम हमारे लायक समझें. इस पर अंकल ने कहा कि हमें पता है कि तुम सभी काम बेहतर ढंग से कर सकते हो पर जिसमें तुम्हारी रुचि हो वो बताओ. हमने पूरी बात अंकल पर ही डाल दी.


कुछ देर इधर-उधर की बातों के बाद अंकल ने कहा कि तुम स्मारिका का काम देख लो. इंकार का कोई मतलब ही नहीं था. स्मारिका पर काम अगले दिन से ही शुरू हो गया. अंकल द्वारा बस इतना बताया गया कि इस पर इतना बजट खर्च करना है और इतने पेज की बनना है. इसके बाद उनके द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया गया. हम प्रतिदिन अपने काम के बारे में अंकल को बताते तो वे कहते कि जब फाइनल हो जाये तभी बताना. हमें विश्वास है कि तुम बेहतर स्मारिका निकाल दोगे. फाइनल होते-होते एक समस्या एकदम अंत में आ गई. अभय अंकल द्वारा बताये गए पेज से एक पेज अधिक हो रहा था. इसका कारण भी अभय अंकल द्वारा दिया गया सन्देश था. एक दिन बड़े झिझकते हुए उनको बताया तो बोले कि जब पूरा सम्पादकीय अधिकार तुम्हारे पास है तो झिझको नहीं, अपना काम करो. बस फिर क्या था, अभय अंकल के सन्देश पर भी सम्पादकीय कैंची चला दी गई.


उन्होंने और राजेन्द्र निगम अंकल ने स्मारिका प्रकाशित होने के ठीक एक दिन पहले उसका फाइनल रूप देखा और बहुत आशीर्वाद दिया. स्मारिका का कवर पेज, उसके अन्दर की सामग्री, उसका क्रम आदि सबकुछ हमारे द्वारा ही निर्धारित किया गया. इस पूरे काम को करके इतनी ख़ुशी मिली जो व्यक्त नहीं की जा सकती. इसका कारण काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिलना था. इस घटना ने एक सीख दी कि यदि काम सहज रूप में सफलता के साथ पूर्ण करवाना है तो अपनी टीम पर विश्वास करते हुए उसे पूरी तरह से स्वतंत्र कर देना चाहिए. अभय अंकल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से मिली इस सीख ने आज तक अपना असर दिखाया है. टीम के साथ किये जाने वाले कोई भी काम आजतक असफल नहीं हुए हैं.


आज उनकी स्मृति में आयोजित संगीत निशा के दौरान अभय अंकल बार-बार स्मृति-पटल पर उभरते रहे, आँखों को नम करते रहे, होंठों पर मुस्कान लाते रहे. अभय अंकल को सादर नमन. 





 

13 अप्रैल 2023

कॉलेज की वो आंटी जी

अप्रैल का आना और हॉस्टल मीट का याद आना स्वाभाविक है. इधर लम्बे समय से प्लानिंग बनती जा रही है मगर क्रियान्वित नहीं हो पा रही है. हालाँकि ग्रुप के माध्यम से, सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से लगभग सभी के साथ जुड़ाव बना हुआ है मगर इसके बाद भी एक बार दिल-दिमाग में सबसे मिलने की उत्कंठा जागती है. बहरहाल, इस बार भी एकसाथ सबसे मिलना नहीं हो सकेगा. इधर आपसी बातचीत में हॉस्टल समय की, कॉलेज की कुछ चुहलबाजी याद की गई, उसी में याद आई एक आंटी जी. चूँकि ये घटना हमारे समय की है, वर्ष 1992-93 की, इसलिए हो सकता है कि उसके बाद वाले बैच के भाइयों के सामने इसका जिक्र न हुआ हो या हुआ हो तो उस घटना के साक्षी न होने के कारण याद न हो.

 

बातचीत के दौरान इसका जिक्र जब हमने किया तो उस घटना को फिर से बताने का आग्रह जहाँ छोटे भाइयों का रहा वहीं हमारे साथियों ने अपनी याददाश्त का हवाला देते हुए इसे फिर से बताने को कहा. घटना कोई बहुत विशेष नहीं है मगर इस कारण से विशेष बन जाती है कि वर्ष 1992-93 का समय था, हम स्नातक अंतिम वर्ष में थे. रोज की तरह कॉलेज में खाली समय में प्राचार्य कक्ष की तरफ बने बगीचे में तमाम साथियों के साथ बैठे हुए थे. उसी बगीचे के किनारे पर लगा सूचना पट उन दिनों हम दो मित्रों, हमारे और सुनील के लिए रचनात्मकता का केन्द्र बना हुआ था. सुनील दुबे अपनी दो-चार काव्यात्मक पंक्तियों को रोज बताते और हम उसका लेखन उस पर किया करते. उन दिनों अपनी तरह का यह नया प्रयोग था और सबको पसंद भी आ रहा था.

 

हम सभी मित्रगण बगिया के किनारे पर उसी जगह पर बैठे हँसी-ठहाके में मगन थे उसी समय हम में से किसी मित्र ने चिल्लाकर ‘आंटी जी की पुकार लगाई. एकबारगी तो हम सभी को समझ नहीं आया, इससे पहले कुछ समझ पाते, आंटी जी की आवाज़ दोबारा गूँजी और उसी आवाज़ के साथ हम लोगों के सामने एक लड़की खड़ी दिखी. साड़ी पहले वह लड़की उस समय का आश्चर्य का केन्द्र बनती उससे पहले उसने हम सबकी बोलती सी बंद कर दी. तेज आवाज़ में उसने गुस्से भरे शब्दों में कई बातें कहीं. उसके और ज्यादा उग्र होने के पहले ही हमने खड़े होकर उसके सवाल के जवाब में कहा कि हमने कहा तुमको आंटी जी, अब बताओ क्या करोगी तुम?

 

अपनी क्रिया की इतनी तीव्र और स्पष्ट प्रतिक्रिया देखकर वह एक पल को खामोश हुई और फिर बोली कि शर्म नहीं आती आप सीनियर्स को, इस तरह से मजाक उड़ाते हुए. उसको समझाते हुए कहा कि इतना गुस्सा करने की जरूरत नहीं है. कॉलेज में आपस में ऐसी बातें होती रहती हैं. इसे सामान्य हँसी-मजाक समझना चाहिए. और यदि न समझ आ रहा हो तो बुलाएं सीनियर्स लड़कियों को? उसके जाने के बाद इस आंटी जी संबोधन पर अलग-अलग राय बनती-बिगड़ती रही.

 

अगले दिन कॉलेज का एक लड़का हमारे पास आया और बोला कि भाईसाहब, बस आप इतना बता दो कि कल उस आंटी जी किसने कहा था. हमें लगा कि ये फसाद करने के मूड में है तो उसको बोला कि हमने ही कहा था. इस पर उसने कहा कि न, हम आपको बहुत अच्छे से जानते हैं, आप ऐसा नहीं कह सकते. हॉस्टल के कारण से वह लड़का हमसे बहुत अच्छे से परिचित था. बहुत लम्बी-चौड़ी हील-हुज्जत के बाद भी वह मानने को तैयार नहीं था. बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह लड़की उसकी भाभी है. जल्दी शादी हो जाने के कारण पढ़ाई नहीं सो सकी थी. अब पढ़ना चाह रही हैं. यद्यपि उस लड़की की उम्र हमसे कम ही थी मगर उसके बाद पूरे साल भर हम उसे फिर आंटी जी कहकर ही बुलाते रहे. समय के साथ उसके मन से भी आंटी जी वाला गुस्सा जाता रहा. और तो और बाद में उसके घर पर दो-तीन पारिवारिक कार्यक्रमों में भी हमारा जाना होता रहा.  


 

24 जुलाई 2021

तिरंगे की छाँव में शपथ दिलवाने का रोमांच

टोक्यो ओलम्पिक आरम्भ हो चुके हैं. भारत की झोली में पहला पदक आ भी गया है. ओलम्पिक के शुरू होते ही सोशल मीडिया पर, ओलम्पिक के दीवानों के दिल-दिमाग में सिर्फ और सिर्फ ओलम्पिक खेल ही छाये हुए हैं. इस दीवानगी में उस समय और वृद्धि हो जाया करती है जबकि अपने तिरंगे को लहराते हुये देखते हैं. जब भी मीडिया में, सोशल मीडिया में किसी खिलाड़ी को तिरंगे के साथ देखते हैं तो अपने आपमें ही गर्व का एहसास होने लगता है. इस सुखद एहसास के साथ दिल-दिमाग में ओलम्पिक खेलने का जोश, उसका उत्साह भी उमड़ने-घुमड़ने लगता है. जो लोग खेलों के दीवाने हैं, शौक़ीन हैं, खिलाड़ी हैं वे निश्चित ही कल्पना-लोक में अपने आपको ओलम्पिक खेलों के बीच खड़ा पाते होंगे.


अब पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या नहीं मगर हमारे साथ बहुत जबरदस्त तरीके से होता है. खेलों का आयोजन अपने आपमें रोमांच भरता है और उस पर भी यदि बात ओलम्पिक की हो तो कहने ही क्या. हालाँकि एशियाई खेलों को लेकर भी एक अलग तरह का उत्साह रहता है मगर जिस तरह का जोश ओलम्पिक के आयोजन के समय खुद में नजर आने लगता है, उसकी बात ही निराली है. ओलम्पिक खेल, ओलम्पिक के पाँच गोलों का प्रतीक चिन्ह और उस पर तिरंगा ध्वज का लहराना रोम-रोम में जोश, ऊर्जा का संचार कर देता है. घर पर स्क्रीन के सामने बैठने के बाद भी यही लगता है जैसे उस सम्बंधित प्रतियोगिता में हम स्वयं भाग ले रहे हैं.


इस सुखद एहसास के पीछे का एक कारण हमारा खुद में खिलाड़ी होना भी है. कॉलेज में खेल-खेल में ही एथलेटिक्स में उतर आये थे, जिसके चलते पाँच हजार मीटर और दस हजार मीटर दौड़ के साथ-साथ भाला फेंक में भी सहभागिता होने लगी. स्नातक के अंतिम वर्ष में एथलेटिक्स टीम के कप्तान का दायित्व हमें सौंपा गया. जिस समय हमें इस दायित्व से अवगत कराया गया उस समय इसमें हमें कुछ विशेष समझ नहीं आया मगर जिस दिन कॉलेज में एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं का आरम्भ हुआ उस दिन गर्व की अनुभूति हुई. प्रतियोगिताओं के आरम्भ होने के पहले एथलेटिक्स की विभिन्न स्पर्धाओं में भाग लेने वाले पचास के करीब खिलाड़ियों को खेल भावना का निर्वहन करने सम्बन्धी शपथ का दिलवाया जाना आज भी रोमांच से भर देता है. इस रोमांच का कारण एक तरफ इतनी बड़ी टीम का कप्तान होना तो था ही उससे ज्यादा रोमांच था तिरंगे की छाँव में खड़े होकर शपथ दिलवाना.




ये और बात है कि खेलों की तरफ कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया, उसी क्षेत्र में कैरियर बनाने जैसा कुछ विचार नहीं किया. आज भले ही हम किसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं मगर स्क्रीन पर खेलते खिलाड़ी को देखकर खुद के खेलने का एहसास होता है, तिरंगे के साथ जोश-ऊर्जा में दिखाई देते खिलाड़ियों में अपने होने का एहसास होता है. ये एहसास तिरंगे का है, ये एहसास खेल का है, ये एहसास खेल भावना का है. 


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02 मई 2020

गुलेल के रास्ते आया आँसुओं का ज़लज़ला

काफी देर तक समझाने के बाद भी उस लड़की के आँसू नहीं थम रहे थे. वे चार-पाँच लड़कियाँ गर्ल्स कॉमन रूम के एक कोने में खड़ीं आगे की कुछ योजना बनाने में लगी हुई थीं. उनके ग्रुप की एक दूसरी तेज-तर्रार लड़की बार-बार प्राचार्य से शिकायत करने पर जोर दे रही थी. हमारे एक मित्रवर, जो उन्हीं लड़कियों के साथ पढ़ा करते थे, लगातार समझाने की कोशिश कर रहे थे मगर न तो रोने वाली लड़की के आँसू रुक रहे थे और न ही वह तेज-तर्रार सी लड़की अपने हाव-भाव को नियंत्रित कर रही थी. 

हमारे मित्र वैसे तो बातें पुटकने में बहुत माहिर रहे हैं, आज भी हैं. ये तो संभव ही नहीं था कि वे कोई मामला, खासतौर से लड़कियों से सम्बंधित, सुलझाने जाएँ और वो सुलझे नहीं. बस ऐसे किसी भी मसले में शामिल होने पर वे अपनी इमेज का बहुत ख्याल रखते थे. जब उनको लगा कि बात, हालात उनके नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं, स्थिति तनावपूर्ण होती जा रही है तो उन्होंने एक और दाँव फेंका.

वो बेर तुमको नहीं, इसे मारना था. तुमको तो ग़लती से लग गया. आँसू बहाती लड़की को समझाते हुए मित्रवर ने तेज-तर्रार लड़की की तरफ इशारा किया. उसका इतना कहना था कि उसके आँसू बहना रुक गए और दूसरी लड़की का शिकायत करने का सुझाव कहीं खो गया. अब उसने रोना शुरू कर दिया. तब तक हमारा भी वहाँ पहुँचना हो गया.

असल में जो काण्ड हुआ था, उसके बाद आती प्रलय, आँसुओं के ज़लज़ले को थामने के लिए ही अपने मित्र को भेजा गया था. उसे गए जब देर हो गई तो लगा कि मामला कहीं फँस रहा है. डर ये भी लगा कि कहीं अपनी इमेज बनाने के चक्कर में हमारे मित्र महोदय ज़लज़ले में सबकुछ न उलट-पुलट करवा दें. हमने देखा कि जो रोता हुआ चला था, वह अब शांत है और उसकी जगह कोई और आँसू बहाने में लगा है. हमने मित्र को देख इशारा किया तो उसने शांत रहने का इशारा किया.

जैसे ही उस तेज-तर्रार लड़की ने, जो अब रोने में लगी थी (रोते हुए बड़ी प्यारी लग रही थी. हम अपनी इमेज-फिमेज की चिंता नहीं करते थे, न तो ज़लज़ला आ ही जाने देते उस दिन) उसने जैसे ही हमें देखा तो बड़े गुस्से में बोली, ये सिखाते हो आप लोग अपने जूनियर को? तमीज नहीं कि किसके साथ कैसा व्यवहार करना है?

हमने उसे शांत रहने का इशारा किया मगर वो कहाँ मानने वाली. समझाते ही उसका स्वर और तेज हुआ. बोली, आज की सारी बात अपने भैया लोगों को बताएँगे. अब वे ही आकर निपटेंगे.

जैसे ही ये निपटने, निपटाने जैसे शब्द सुने तो हॉस्टल की पानी की टंकी में उबाल आ गया. समझाने-बात करने, मामला निपटाने के क्रम में मालूम चला कि उसके रिश्तेदारी में मिलाकर आठ-नौ भाई हैं. उससे हमने कहा, सुनो, भाइयों को पिटवाने का शौक हो तो बिलकुल बता देना. तुम्हारे आठ-नौ भाई हैं पर हम चालीस-पचास भाई हैं.

ये सोचकर कि बात न बिगड़े, मामला प्राचार्य तक न पहुँचे, उसे समझाया कि चुप हो जाओ. तुमको तो लगी भी नहीं. जिसे लगी है वह कुछ बोल नहीं रही. उस जूनियर को हम समझा देंगे.

इसके बाद शायद उसको समझ आया. उसने ख्यालों में अपने भाइयों की कुटाई भी देख-समझ ली होगी. आराम से आँसू पोंछ वह सबको लेकर गर्ल्स कॉमन रूम से बाहर निकल आई. हम अपने मित्र को दुखी दुखी सा देखते रहे. उसे लग रहा था कि उनके साथ पढ़ने वाली लड़कियों के सामने एक जूनियर की बदतमीजी ने उसकी इमेज को दाग लगा दिया.


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असल में पूरा किस्सा उस दिन शुरू हुआ पानी की टंकी के पास गिरे बेरों से. उस दिन हम दोस्त पानी की टंकी के पास पड़ी खाली जगह पर बैठे हुए थे. वह जगह एक बेर के पेड़ के नीचे बनी थी. परीक्षा का समय नजदीक था. प्रैक्टिकल चल रहे थे, सो कक्षाएँ भी गिनी-चुनी लग रही थीं. कॉलेज में विद्यार्थियों का आना-जाना भी कुछ सीमित सा हो गया था. हॉस्टल वालों के पास कॉलेज जाना एक अनिवार्य कार्य हुआ करता था. ऐसा लगता था जैसे कॉलेज नहीं जाया जायेगा तो धरती पलट जाएगी, प्रलय हो जाएगी. उस दिन भी धरती को पलटने से बचाने के लिए, प्रलय को रोकने के लिए हॉस्टल की पलटन के कुछ सिपाही उसी जगह जमे हुए थे. हँसी-मजाक, शरारतों का दौर चल रहा था. बेर के पेड़ से टपकते कुछ बेरों का और कुछ गिराए गए बेरों का स्वाद लिया जा रहा था. इस हँसी-मजाक के बीच ही एकदम से हड़बड़ सी समझ आई.

जब तक समझ में बात आती, सामने लड़कियों के एक ग्रुप में से एक लड़की ने हमारी तरफ देखते हुए तीखी, तेज आवाज़ में चिल्लाते हुए कहा कि बैठे-बैठे बदतमीजी करवा रहे हो. उसका रोना साफ़ समझ आया. इससे पहले कि उनसे कुछ पूछते, वे सब वहाँ से तेजी से चल दीं. हमारे पास खड़े एक जूनियर ने बड़े ही तीरंदाजी वाले स्टाइल में हँसते हुए बताया कि उसने गुलेल से बेर मार दिया. उसके मुँह से कुछ और निकलता उसके पहले एक तेज कंटाप से उसे शांत कर दिया. बात को सँभालने के लिए अपने मित्र को भेजा क्योंकि वे लड़कियाँ उसके साथ पढ़ा करती थीं.

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हम हॉस्टल वाले भाई खूब शैतानियाँ, शरारतें करते थे, खूब लड़ाई-दंगे जैसी स्थिति भी बनती थी मगर लड़कियों को परेशान करने, उनको छेड़ने जैसी किसी भी हरकत का समर्थन नहीं करते थे. यही कारण था कि उसी समय गलती का परिणाम एक तमाचे के रूप में उसे मिला. 

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

24 अप्रैल 2020

ये उन दिनों की बात है

सोशल मीडिया पर इन दिनों अपनी बीस वर्ष की उम्र की फोटो शेयर करने का ट्रेंड चलने में लगा है. अच्छा है यह, इस बहाने फुर्सत के पलों में सबको अपने पुराने दिनों में सैर करने का अवसर मिल रहा है. फोटो एल्बम आज से पंद्रह-बीस साल पहले घरों का विशेष आकर्षण हुआ करते थे. मेहमानों के आने पर कुछ देर की बातचीत के बाद एक निश्चित कार्यक्रम हुआ करता था, एल्बम दिखाने का. उन दिनों फोटो खींचना, खिंचवाना और उसके बाद उनका एल्बम बनवाया जाना मुख्य काम में शामिल हो जाया करता था. एल्बम आने के बाद उसे देखने के लिए परिवार में मारा-मारी भी आम बात हुआ करती थी. लॉकडाउन के इस दौर में उन दिनों की याद बीस वर्ष की उम्र की फोटो के चक्कर में बहुत से लोगों ने कर ली होगी.


हमने भी उस उम्र की फोटो खोजने के चक्कर में कई-कई एल्बम देख मारे. घर के, हॉस्टल के, कॉलेज के, दोस्तों के साथ के और एक-एक फोटो के साथ घंटों के हिसाब से कहानियों का सुनना-सुनाना. हम अपनी उस समय की ऐसी फोटो खोज रहे थे जिसमें किसी न किसी तरह की गतिविधि करते हों. उस समय कई फॉर्म वगैरह के चक्कर में सादा पासपोर्ट आकार की फोटो खिंचवाई गईं थीं, जिनमें से कुछ के रंग उड़ गए हैं और कुछ बीस साल की उम्र से इधर-उधर की हैं.


इसी में एक फोटो मिली अपने कॉलेज के समय की. उस समय हम स्नातक अंतिम में थे. उस समय हम बीस वर्ष से महज छह माह पीछे थे. उस फोटो में हमारे जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर के कुलपति महोदय हैं. उनके द्वारा एक कार्यक्रम में हमें कॉलेज की एथलेटिक टीम के कप्तान और एथलेटिक प्रतियोगिता में स्थान प्राप्त करने का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया था.

कुलपति महोदय, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर (मार्च 1993)

दूसरी फोटो उस समय की है जबकि हम बीस वर्ष की उम्र से दो-तीन महीने आगे निकल गए थे. उस समय हमने अपने नए बने मकान के एक कमरे को स्टडी रूम बना रखा था. उसी में अचानक से इस फोटो को खींच लिया गया था.


फोटो के सहारे बीते दिनों में गोते लगाते-लगाते वापस वर्तमान में आना बहुत मुश्किल लगता है. इसके बाद भी आना तो होता ही है. सो एल्बम बंद करके वापस आज में लौट आये, अपनी वे फोटो लगाने को जो बीस वर्ष की उम्र से इधर-उधर की हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 अप्रैल 2017

वर्तमान के साये में अतीत की यात्रा

जिंदगी कई बार बहुत लम्बी लगती है तो कभी बहुत छोटी सी. इसी तरह समय कई बार काटे नहीं कटता और कई बार रोके नहीं रुकता. कुछ ऐसा ही एहसास हुआ आज जबकि चौबीस साल पुराने समय को फिर से आज में उतार लाने की कोशिश की गई. तीन वर्ष की बेहतरीन ज़िन्दगी को कुछ घंटों में जीने की कोशिश की गई. यदि कहा जाये कि किसी अदृश्य टाइम मशीन के द्वारा अतीत को वर्तमान में खड़ा करने का प्रयास किया गया या फिर वर्तमान को उसी अतीत में पहुँचा दिया गया तो अतिश्योक्ति न होगी. सोशल नेटवर्किंग के जरिये एक-एक करके इधर-उधर बिखरे रत्नों को, मोतियों को समेटा-सहेजा जाने लगा. उन सभी को एक-एक करके फिर से खोजा जाने लगा जो समाज में जिंदगी की आपाधापी में कहीं खो गए थे. या कहें कि हमारे आसपास होते हुए भी हमें दिखाई नहीं दे रहे थे क्योंकि हम सभी अपने-अपने परिवार, अपने-अपने रोजगार, अपने-अपने कार्यों में उलझे हुए थे. एक-एक को जोड़ते हुए फिर वही संसार बनाने की एक पहल की गई. किन्तु-परन्तु के बीच पहल की उड़ान शुरू हुई. 





हॉस्टल की वो दुनिया अपने आपमें अद्भुत ही कही जाएगी, जहाँ कोई चिंता नहीं, कोई फिकर नहीं, कोई जिम्मेवारी नहीं, कोई बोझ नहीं बस मस्ती ही मस्ती, हुडदंग ही हुडदंग. हॉस्टल से निकल कर अपने-अपने संसार में सिमटे-लिपटे लोगों के मन में लगातार रहा कि क्या कभी अपने पुराने साथियों से मिलना हो पायेगा? क्या उन साथियों के साथ फिर वही मस्ती भरी हरकतें, शरारतें की जा सकेंगी जो उन कभी हुआ करती थी? और भी सवाल उपजते फिर आपाधापी में खो जाते. जिस भविष्य की कभी चिंता नहीं की उसी भविष्य के संवर जाने के बाद भी सवालों के घेरे साथ चलते. आखिर भावनात्मकता कब तक सवालों के बोझ को सहती? कब तक अपने अत्यंत प्रिय साथियों से बिछड़कर दूर रहती. किसी समय में तकनीक से दूर साथियों ने अपने-अपने डायरी के पन्ने अपने-अपने साथियों के पते-ठिकानों से सजाये थे. उन पते-ठिकानों का लगातार बदलना जारी रहा. शुरुआती पत्र-व्यवहार और गर्मजोशी समय के साथ परिवर्तित होती रही. इस परिवर्तन का असर ये हुआ कि सब अपने में सिमट गए. कुछ मिलते रहे, कुछ और दूर होते चले गए. 





और फिर अंततः वह दिन आ ही गया जिसका सभी को उस दिन से इंतज़ार थाजिस दिन सभी से दूर हुए थे. हॉस्टल के दिनों को हॉस्टल के साथियों ने फिर से जिंदा कर दिया. जिंदगी की आपाधापी में अपने से भी दूर हो गए लोगों को फिर सबसे जोड़ा गया. इस बार वे जुड़े मगर अकेले नहीं. अबकी उनके साथ समूचे हॉस्टल से जुड़ा उनका परिवार भी, उनकी जीवनसाथी भी, उनके बच्चे भी. एक-एक से मिलते-मिलते, सूत्र बटोरते-समेटते सब फिर सामने नजर आने लगे. तकनीक ने सबको जोड़ने में सहयोग दिया. मिलन की उत्कंठा ने सबको और प्रेरित किया. भावनात्मकता का ज्वार उमड़ने लगा. देखते-देखते वह दिन आ ही गया जबकि सबकी सहमति से सबने आपस में अतीत में जाने का, अतीत को वर्तमान में लाने का निश्चय किया. सम्मिलन केंद्र बना वही स्थान जो कि किसी समय हम सभी की कर्मभूमि हुआ करता था. हम सभी के कदमों से जहाँ हलचल मचा करती थी. हम सभी के कार्यों से जहाँ विचलन हुआ करता था. अबकी हम सब अकेले न थे बल्कि साथ में थे वे लोग जो वर्षों से हम सभी की हॉस्टल की कहानियाँ सुनते आ रहे थे. वे साथ थे जो वर्षों से तत्कालीन फोटो देख-देखकर उस अतीत को वर्तमान की निगाहों से देखना चाहते थे. अपने-अपने जीवनसाथी, बच्चों के साथ सबने पूरी आत्मीयता से अपनी उपस्थिति को दर्शाया. 



सम्मिलन के निश्चय से पहले के किन्तु-परन्तु सभी साथियों की सक्रियता, उत्साह, मिलन की तीव्रता देखकर धराशाही हो गए. गले मिलते लोग, उसी बेलौस अंदाज़ में हँसते-बोलते-बतियाते मित्र, फिर से न बिछड़ने देने की नीयत से बारम्बार बाँहों में जकड़ने का अपनापन. सभी के बच्चे, जीवनसाथी बस मुँह खोले आत्मीयता का, अपनेपन का चरम देख रहे थे. शायद उन लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि डेढ़-डेढ़, दो-दो दशकों के बाद मिलते लोग, कुछ परिचित, कुछ अपरिचित चेहरों से मिलते लोग इतनी आत्मीयता दिखायेंगे. भावनात्मकता, अपनत्व के चरम से सराबोर होकर एक दूसरे को सराबोर करते हुए समूचे माहौल को रसमय बना देंगे. सन 1975 से शुरू हॉस्टल यात्रा को कतिपय कारणोंवश विराम लगा सन 2003 में पर तब तक गंगा-जमुना में बहुत सारा पानी बह गया था. काल की धार में बहते रत्न फिर मिले. बहुत से पुराने अनमोल मोतियों ने अपनी उपस्थिति दिखाते हुए अपना उत्साह दिखाया. आश्चर्य लगा कि वर्ष 1988 से लेकर वर्ष 2003 तक के बैच के बहुतायत मित्र सपरिवार समूचे सम्मिलन समारोह में पूरी आत्मीयता, अपनत्व बरसाते रहे. इससे भी अधिक आश्चर्य की बात ये रही कि हॉस्टल के उन बिंदास, बेलौस, बेफिक्र मित्रों से पहली बार मिलते अन्य परिजनों में भी गज़ब का उत्साह था. सबके मन में हॉस्टल देखने की हार्दिक इच्छा, अपने जीवनसाथी के अन्य दूसरे मित्रों के बारे में, उनके परिजनों से मिलने की उत्कंठा दिखी. 



हँसी-मजाक, हुल्लड़ करते समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. एकबारगी किसी का ध्यान अपने मोबाइल की तरफ नहीं गया. पूरे दिन लोगों के अपडेट सोशल नेटवर्किंग में देखने को नहीं मिले. ऐसा लग रहा था जैसे लोग वर्तमान में नहीं वरन अतीत की यात्रा कर रहे हों. जर्जर खड़ी बुलंद इमारत को फिर से जिंदाकर अपने उन्हीं दिनों में खो गए हों. उन दिनों की यादें, उस समय के किस्से, सबकी मासूम सी गोपनीयता को उन्हीं के परिजनों के सामने खोलते, लगा ही नहीं कि सदन में उपस्थित कोई भी व्यक्ति वर्तमान में है. हॉस्टल के तत्कालीन नारे, तत्कालीन जयघोष, वैसी ही शरारतें कुल मिलाकर सबको उसी कालखंड में ले गई थीं जहाँ कि वे कभी रहा करते थे. सूरज के उगने से शुरू हुआ मस्ती भरा दिन कब शाम में बदल गया पता ही नहीं चला. शाम के गहराने के साथ शुरू हुआ फिर से उसी वर्तमान में जाने का क्रम जहाँ जिम्मेवारियाँ हैं, दायित्व हैं, कर्तव्यबोध है. फिर शुरू हुआ वही दशकों पुराना क्रम. गले मिलते, हँसते, आँखों को गीला करते और फिर अपनी राह चलते. दशकों पहले के और अब के समय में एक अंतर दिखा. तक के डायरी-पेन से इतर इस बार तकनीक साथ थी. अगली बार मिलने का निश्चय साथ था. इस वादे के साथ कि हर वर्ष सबका मिलना निश्चित है, हम सभी अतीत की कुछ घंटों की यात्रा के बाद वर्तमान में लौट आये.