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01 सितंबर 2025

वर्तमान दौर की कविता

कविता लिखना

कितना आसान हो गया है अब.

कुछ भी लिखते जाओ

छोटे छोटे वाक्यों में.

न छंद की चिंता

न लय की फ़िकर,

जो मन में आए

उसे शब्दों में ढाल दो,

कई-कई हिस्सों में बाँट दो

फिर देखो गौर से

तुमको दिखेगी एक कविता

बलखाती काव्य रचना.

मत परवाह करो

कि रस, अलंकार, मात्राएँ

सिरे से गायब हैं,

तुकांत, अतुकांत का

सिरदर्द पाले बिना

बस लिखते जाओ कुछ भी,

शब्द भारी भरकम हों

या फिर हों आम बोलचाल के

बस, शब्द होने चाहिए.

न कोई ज्ञान

न कोई आदर्श

न किसी तरह का प्रवचन,

बस, लिखते जाओ

जब तक कि

तुम ख़ुद न थक जाओ

लिखते-लिखते,

शब्दों को

धकेलते-धकेलते,

रुको, रुक कर देखो

नजर आने लगी कविता?

देखो न!

देखो जरा ध्यान से

ये भी तो

बन गई है एक कविता.

करो वाह वाह

या कि आह आह

हमें इससे क्या?

हमें तो लीपना था,

कुछ थोपना था

सो रख दिया सामने,

समझ सको तो ठीक

न समझ सको

तो भी हमें क्या?

हमने तो लिख दी

एक कविता,

आज के दौर की

एक अद्भुत कविता.

 

15 मार्च 2025

दस पृष्ठ की पुस्तक पढ़ने में लगेंगे लगभग बीस करोड़ वर्ष





जो चित्र आप इस पोस्ट में देख रहे हैं, वे एक पुस्तक के हैं. यह एक ऐसी पुस्तक है जिसके बारे में अकाट्य तथ्य है कि कोई भी इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी में इसे पूरा नहीं पढ़ सकता है. ये बात अपने आपमें एक आश्चर्य है और उससे बड़ा आश्चर्य ये है कि इस पुस्तक में मात्र 10 पृष्ठ हैं. आपको भी ये जानकार निश्चित ही आश्चर्य हुआ होगा.

 

यह कोई आश्चर्य नहीं, कोई काल्पनिकता नहीं, कोई जादू नहीं और न ही किसी और दुनिया की बात है. सन 1960 में फ्रेंच लेखक रेयमों क्वेनो (Raymond Queneau) ने दुनिया की सबसे कम पृष्ठ की मगर सबसे लम्बी पुस्तक इस संसार के सामने प्रस्तुत की. इस पुस्तक का नाम है Cent Mille Milliards De Poèmes अर्थात एक लाख अरब कविताएँ. मात्र दस पृष्ठों की इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर एक सॉनेट (Sonnet) छपा हुआ है. ये जानकर तो और भी अचम्भा लगा होगा कि मात्र दस सॉनेट को पूरी ज़िन्दगी में नहीं पढ़ा जा सकता. दरअसल सॉनेट की पंक्तियाँ एक ही तुकबंदी पर बनी हुई हैं और इसकी प्रत्येक पंक्ति को एक पट्टी (स्ट्रिप) में छापा गया है. ऐसा होने के कारण पुस्तक का पाठक अलग-अलग सॉनेट की पंक्तियों को आपस में मिलाकर नई कविताएँ बना सकते हैं.

 

पुस्तक की इस अनोखी संरचना के कारण कविता के कुल संभावित संयोजनों की संख्या 10¹⁴ यानी सौ लाख करोड़ (100 ट्रिलियन) बनती है. इसका सीधा सा अर्थ है कि इस पुस्तक में सौ लाख करोड़ अलग-अलग कविताएँ हैं. निश्चित है कि इतनी सारी सम्भावित कविताओं को पढ़ना किसी भी इंसान के लिए नामुमकिन है. यदि कोई व्यक्ति लगातार बिना खाए-पिए, सोए या कुछ और पढ़े बिना केवल यही पुस्तक पढ़ता रहे तब भी उसे सारी कविताएँ पढ़ने में लाखों साल लग जाएँगे. खुद क्वेनो ने कहा था कि अगर एक कविता पढ़ने में लगभग 45 सेकंड और अगली कविता तैयार करने में 15 सेकंड लगते हैं तो सारी संभावित कविताएँ पढ़ने में लगभग 20 करोड़ साल लगेंगे.

 

पुस्तक का मूल फ्रेंच संस्करण रॉबर्ट मैसिन द्वारा डिज़ाइन किया गया था. अंग्रेजी में दो पूर्ण अनुवाद प्रकाशित किए गए हैं जो जॉन क्रॉम्बी और स्टेनली चैपमैन द्वारा किए गए हैं. 1997 में एक फ्रांसीसी अदालत के फैसले ने क्यूनेउ एस्टेट और गैलिमार्ड प्रकाशन के विशेष नैतिक अधिकार का हवाला देते हुए इंटरनेट पर मूल कविता के प्रकाशन को गैरकानूनी घोषित कर दिया था.

 

इस पुस्तक का वीडियो यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है.  


उक्त जानकारी इंटरनेट, सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म से ली गई है. सभी का आभार.


03 नवंबर 2024

अभिन्न मित्र की तरफ़ से एक संदेश

अभिन्न मित्र की तरफ़ से एक संदेश……. हमारे स्वभाव के संदर्भ में.


इतने कातिल दोस्त के लिए क्या ही कहें




 

11 अप्रैल 2024

उम्मीदों की प्याली : एक अभिनव प्रयोग

पिछले दिनों 'उम्मीदों की प्याली' का आना हुआ. इसे लेकर मित्रों में, परिचितों में एक उत्सुकता दिखाई दी. प्रकाशन पूर्व जब भी इस बारे में चर्चा हुई तो सभी को यही बताया गया कि इस पुस्तक में एक तरह का प्रयोग किया गया है.



अब प्रकाशन पश्चात् इस प्रयोग से कितने लोग पुस्तक के माध्यम से परिचित हुए, इसकी जानकारी नहीं मगर प्रयोग के बारे में पूछा बहुत लोगों ने. पुस्तक कौन खरीदेगा, कौन नहीं... ये अलग विषय है, यहाँ इस पुस्तक में किये गए प्रयोग के बारे में कुछ शब्द.

कविताओं के रूप में होने के बाद भी इसमें संकलित रचनाओं को कविता नहीं कह सकते. असल में किसी कविता को पढ़ कर, बातचीत के दौरान उभरे पद्य विचार को, दो-चार काव्य-पंक्तियों के प्रत्युत्तर के रूप में उभरी काव्य-पंक्तियों को संकलित करके पुस्तक का रूप दे दिया.



इस प्रयोग के साथ-साथ एक प्रयोग ये भी किया कि इस पुस्तक में संकलित सभी 80 काव्य-रचनाओं को एक-एक स्केच के द्वारा सजाया है.




रचनाकार-द्वय के बीच बातचीत के रूप में उभरी काव्य-रचनाओं को स्केच भी रचनाकार-द्वय के द्वारा मिले हैं.
उम्मीदों की प्याली को आप अपने हाथों में लेकर उसका स्वाद लेंगे तो एहसास और भी सुखद होगा.





'उम्मीदों की प्याली' श्वेतवर्णा प्रकाशन की वेबसाइट www.shwetwarna.com पर उपलब्ध है.



 

09 अप्रैल 2023

15 दिसंबर 2022

होंठ थक गये झूठी हँसी बिखेरते - 2250वीं पोस्ट

ग़म छिपाने को

सीखना है दूसरा हुनर,

होंठ थक गये

झूठी हँसी बिखेरते।

 

छिपाये थे राज

बड़ी ही खामोशी से,

आँखें कह गईं सब

भावनाओं में बह के।

 

बात होती उनसे

मगर अधूरी रहती,

कैसे हो पूरी

यही बात न समझे।

 

इक उम्र मिली

चार दिन के लिए,

जन्मों की कहानी

उनसे कैसे कहते।

 

हथेलियों में थामे

हथेलियों का एहसास,

उनकी उँगलियों को

फिसलता देखते रहे।


(इस ब्लॉग की 2250वीं पोस्ट)





 

16 मार्च 2022

जो जगह चले गए हो खाली छोड़ कर

समय कितनी तेजी से भाग रहा है, इसका अंदाजा सामान्य रूप में नहीं होता है. जैसे ही कोई अवसर विशेष की बात हो, किसी यादगार दिन की बात हो, किसी पारिवारिक घटना की चर्चा हो, किसी स्मृति के सम्बन्ध में कोई दिन याद किया जाये (भले ही ऐसा सुखद अथवा दुखद घटना के रूप में हो) तो समझ आता है समय का भागना, बहुत ज्यादा गति से भागना.


आज 16 मार्च है. इस तारीख को भुला पाना संभव ही नहीं है. आज काल-गणना में समझ आई काल की गति. देखते-देखते सत्रह वर्ष गुजर गए, और आँखों के सामने सबकुछ वैसे ही ताजा है जैसे वर्ष 2005 में था. एक-एक फोन, एक-एक शब्द, एक-एक घटना, एक-एक व्यक्ति सबकुछ. कुछ भी आँखों से ओझल नहीं है, सिवाय पिताजी के.


बहरहाल, किया भी क्या जा सकता था, अब किया भी क्या जा सकता है? किसी समय पिताजी को याद करते हुए चंद लाइन लिख गईं थीं, वे ही आज की पोस्ट में पिताजी को समर्पित हैं.



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25 दिसंबर 2021

ठन गई! मौत से ठन गई! सादर समर्पित


 अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता उन्हीं को सादर समर्पित.....
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ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई.

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं.

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा.

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर.

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं.

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला.

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए.

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है.

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई.

मौत से ठन गई.

कैलीग्राफी : कुमारेन्द्र सिंह सेंगर  

27 मई 2021

शाब्दिक आपत्ति वाले समाज में कमीने, छिछोरे की स्वीकार्यता

इधर कुछ दिनों से एक बाल कविता पर बहस चलती देख रहे हैं. यह कविता किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल की गई है. उसके कुछ शब्दों पर आपत्ति जताई गई है. चूँकि सिक्के की तरह किसी भी बात के दो पहलू होते हैं. कुछ ऐसा ही इस कविता के सन्दर्भ में भी हो सकता है. क्या सही है, क्या गलत है इसका आकलन इस पर सभी के मत अलग-अलग हो सकते हैं. कविता के कुछ शब्दों को बालमन पर गलत प्रभाव डालने वाला बताया जा रहा है तो एक पक्ष इन शब्दों को उनकी स्थानीयता के साथ जोड़कर सही मान रहा है. यहाँ हमारा व्यक्तिगत मत उस कविता के न पक्ष में है और न ही विपक्ष में. ऐसा इसलिए क्योंकि कोई एक कविता किसी भी तरह से स्थायी प्रभाव तब तक नहीं डाल सकती जब तक कि उसका कई सालों तक निरंतर वाचन न करवाया जाये.


यदि कोई एक कविता ही किसी भी बालमन को सुधारने, बिगाड़ने का काम करती तो ऐसे लोगों से ही पूछना चाहिए कि उनके अपने समय में पढ़ाई जाने वाली कविताओं को रटने के बाद भी उन्हीं के कालखंड के पुरुष माँ-बहिन की गालियाँ क्यों देते नजर आते हैं? दो-चार शब्दों के सहारे बालमन पर गलत असर पड़ने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में फिल्मों के माध्यम से समाज में लगभग स्वीकार्य शब्दों – सेक्सी, चुम्मा, कमीने, छिछोरे आदि को ऐसी ही पीढ़ी ने रचा है जिसने अपने समय में शालीन शब्दों वाली कविता पढ़ी है.


बहरहाल, उस कविता के कुछ शब्दों पर पढ़ने को मिली बहुत सी आपत्तियों के बाद अपना लिखा एक पुराना आलेख याद आया. यह उस समय लिखा था जबकि फिल्म कमीने बाजार में उतारी गई थी. उसके बाद से तो अशालीन शब्दों की नदी में न जाने कितने शब्द बह चुके हैं. एक बार फिर वही पुराना आलेख आपके बीच.




कमीना.....कमीने....चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये. गाली तो गाली ही होती है या समय के साथ उसका भी परिष्कृत रूप सामने आता है? यह सवाल एक हमारे मन में ही अकेले नहीं घुमड़ता होगा, कभी न कभी, कहीं न कहीं आपको भी परेशान करता होगा. अब करता रहे परेशान तो करे जिसको ये शब्द समाज में प्रचलित करने हैं वे तो कर ही रहे हैं.


इस बात से थोड़ा सा इतर....आपको सेक्सी शब्द के बारे में क्या विचार आता है? कुछ सालों तक इस शब्द के मायने कुछ अलग थे. इस शब्द के उच्चारण में एक प्रकार की झिझक देखने को मिलती थी. आज.....आज ये शब्द हम बड़े बेधड़क होकर इस्तेमाल करते हैं. बड़े बैठें हों या फिर छोटे इस शब्द सेक्सी के प्रयोग में कोई शर्म किसी को नहीं है. और तो और सेक्सी शब्द के मायने अब इस रूप में बदले हैं कि हम अपने नन्हे-मुन्नों के लिए भी इस शब्द को प्रयोग करने लगे हैं. कोई विशेष ड्रेस पहना देख कर, किसी विशेष प्रकार के करतब दिखाने पर हम अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए अकसर कह देते हैं कि इस ड्रेस में बड़ा सेक्सी लग रहा है/लगता है. अकसर हम इस शब्द को मजाक के रूप में भी इस्तेमाल कर लेते हैं और क्या हाल है, बड़े सेक्सी बने घूम रहे हो?


इस शब्द की सहज स्वीकार्यता के सापेक्ष देखा जाये तो क्या कमीना शब्द इतना सहज स्वीकार्य है? या हो पायेगा? हो पायेगा का जवाब शायद कोई भी न दे पाये क्योंकि हमारे फिल्मी संसार ने लगभग स्वीकार्यता की स्थिति में तो इस शब्द को लाकर खड़ा कर दिया है. याद है वो गाना मुश्किल कर दे जीना, इश्क कमीना, यह गाना बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा था/चढ़ा है. अब इस गाने का विकास-क्रम बढ़ा. अब एक फिल्म आ गई है कमीने. स्वीकार्यता की ओर एक और कदम. जैसे हमारे विचार से सेक्सी शब्द की स्वीकार्यता बढ़ी थी मेरी पैंट भी सेक्सी, मेरी शर्ट भी सेक्सी..... से. अब मित्रों में आपस में चर्चा होगी चल कमीने देख आते हैं. माँ के पूछने पर बेटी-बेटे कहेंगे माँ दोस्तों के साथ कमीने देखने जा रहे हैं.  


कई बार इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने में उसका अर्थ न मालूम होने की स्थिति होती है पर यह भी उनके लिए होती है जो कम पढ़े-लिखे या निरक्षर होते हैं. जैसे हमारे एक मित्र के घर काम वाली बाई आती थी. वह जब भी अपने सात-आठ साल के बच्चे की कोई शरारत या फिर किसी हरकत का बखान करती तो बड़े ही गर्वोक्ति भरे अंदाज में कहती लला ने ऐसो कर दओ, बड़ो हरामी है.....या बड़ो हरामी होत जा रओ, अपयें मन की करन लगो है अब.....बगैरह-बगैरह. जब एक दिन उसको बताया कि इस शब्द, हरामी का क्या अर्थ होता है तो उसने फिर इसका इस्तेमाल करना बन्द कर दिया.


क्या काम वाली बाई की तरह ही इन फिल्म वालों की स्थिति है? क्या ये लोग भी इन शब्दों के अर्थ नहीं समझते? क्या अब समाज में विकृत मानसिकता को ही फैलाने का चलन काम करेगा? हो कुछ भी अब आने वाले समय में इस तरह के वाक्यों से भी रू-ब-रू होने की सम्भावना है देखो-देखो मेरे बेटे को, इस ड्रेस में कितना कमीना लग रहा है, आज गजब हो गया, तुम्हारे कमीनेपन ने तो मजा बाँध दिया.


क्या आप इसके लिए तैयार हैं? ये लेख उस समय का है जबकि छिछोरे शब्द फ़िल्मी दुनिया ने फिल्म के रूप में उतारा नहीं था. अब तो उदाहरण में इस छिछोरे शब्द को भी जोड़ा जा सकता है.


++

ये है वो कविता जो आजकल विवादों में है, अपने कुछ शब्दों के कारण.




07 फ़रवरी 2021

तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है



तुम्हारे साथ जो गुजरी वो छोटी जिंदगानी है, 
वही बाकी निशानी है वही बाकी कहानी है। 
तुम्हारे दूर जाने से न जीवन सा लगे जीवन,
रुकी-रुकी सी है धड़कन न साँसों में रवानी है।

तुम्हारी याद के साए में अब जीवन गुजरना है,
लबों पर दास्तां तेरी इन आँखों को बरसना है।
नहीं तुम सामने मेरे मगर मुझको यकीं है ये,
मेरी आँखों में बसना है मेरे दिल में धड़कना है।

भुलाया जाएगा न जो तू ऐसा दर्द लाया है,
तुम्हारे संग हँसे-खेले तुम्हीं ने अब रुलाया है।
हुई होगी कोई गलती हमसे ही निश्चित ही,
तभी तो रूठ कर तुमने अपने को छिपाया है।





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वंदेमातरम्

26 जनवरी 2021

नई कहानी गद्दारी की आज कमीने गढ़ बैठे

गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी में आन्दोलन कर रहे कथित किसानों ने ट्रैक्टर रैली के नाम पर उत्पात मचाया। उनके द्वारा लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा उतार कर अपना झंडा फहरा दिया। इससे व्यथित हो समीक्षा जादौन ने एक कविता सोशल मीडिया पर पोस्ट की। वही कविता आप सभी के लिए।

अपमानित हूँ, स्तब्ध हूँ, क्रोधित हूँ
++

राष्ट्र ध्वजा अपमानित कर लाल किले पर चढ़ बैठे,
नई  कहानी  गद्दारी  की  आज कमीने   गढ़  बैठे।

वीरों के बलिदान का देखो उनको कैसा मूल्य मिला,
आज तिरंगा अपमानित है, शर्मिदा  है  लाल  किला।

खालिस्तानी, पाकिस्तानी टुकड़े-टुकड़े वाले हैं,
इनको गंगा मत समझो ये केवल गन्दे नाले हैं।

क्या एक प्रदेश के रहने वाले ही किसान कहलाते हैं,
जो बाकी किसानों के हक़ को लूट-लूट कर खाते हैं।

दाता वाता कोई नहीं ने ये नीच निकम्मे अभिमानी,
कुछ कुत्ते बस  चाह रहे हैं करना केवल मनमानी।

लज्जित करके संविधान को गुंडे आग लगाते हैं,
झूठे नीच जिहादी देखो दिल्ली रोज जलाते हैं।

कल तक जिनको मान गर्व का प्रहरी समझा जाता था,
गुरुओं सा बलिदानी उनको केहरी समझा जाता था।

शौर्य शेर सा बलिदानों की परिपाटी ही भूल गए,
खालिस्तानी फंडिंग से ही  सारे नल्ले फूल गए।

देश विरोधी, धर्म विरोधी क्या किसान हो सकते हैं?
देश को आग लगाने वाले भी  महान हो सकते हैं?

क्या किसान वर्दी वालों पर ले ट्रैक्टर चढ़ सकते हैं?
आयाम नए गद्दारी के ये क्या किसान गढ़ सकते हैं?

जिन कुत्तों ने वर्दी पहने महिलाओं पर वार किया,
नारी की मर्यादा भूले कुछ भी नहीं विचार किया। 

डंडे पत्थर तलवारों से आखिर कैसा इनका नाता है,
ऐसा  हिंसक   ऐसा  बर्बर  तुम्हीं  कहो ये दाता है।

बहुत हुआ सम्मान इन्हें अब उत्तर भी मिल जाने दो,
देशद्रोहियों, गद्दारों को  मिलकर लाठी डंडे खाने दो।

इनको  उत्तर  नहीं  दिया  तो  ये दंगे करवा देंगे,
हम ऐसे ही  चुप बैठे तो  देश को भी तुड़वा देंगे।

नहीं रगों में दूध दही अब और न दिल में देश रहा,
चरस  अफीम  बहे  लहू  में  इसीलिए  ये वेश रहा।

जान  चुके औकात तुम्हारी अब ये लिख कर धरवा लो,
और  तुम्हारे  बाप  में  दम  है  तो  क़ानून बदलवा लो।

©® समीक्षा सिंह जादौन

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कृपया मूल रूप में ही शेयर करें और रचनाकार का नाम न हटायें।


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वंदेमातरम्

29 सितंबर 2020

तकनीकी दौर में हस्तलिपि का सुखद एहसास

कहा जाता है कि जिसका हस्तलेख सुन्दर होता है, उसकी मनःस्थिति भी सुन्दर होती है. पता नहीं यह कितना सच है मगर एक बात अपने व्यक्तिगत अनुभव से अवश्य कह सकते हैं कि सुन्दर, स्वच्छ हस्तलेख व्यक्ति का आत्मविश्वास अवश्य बढ़ाता है. आज के दौर में जबकि कम्प्यूटर, मोबाइल आदि के आने से कागज, कलम का उपयोग लोगों ने कम कर दिया है जिससे सुन्दर हस्तलिपि से परिचय होना भी कम हो गया है. ऐसी स्थिति के बाद भी यदि आँखों के सामने से हस्तलिपि में कोई कागज़ गुजरता है तो सुखद एहसास जगा जाता है.


हमने स्वयं हस्तलिपि सुन्दर बनी रहे, इसके लिए लगातार अभ्यास किया है. पिछली पोस्ट में आपसे चर्चा भी हुई थी कि पिताजी के लिखे अक्षरों की नक़ल कर-कर के, उनका अभ्यास कर-कर के अपने हस्तलेख को सुधारने का प्रयास किया. यह प्रयास आज तक चल रहा है. बीच में कुछ स्थिति ऐसी बनी जिसके चलते कुछ अक्षरों को लिखने का ढंग बदल गया, लिखने की शैली में कुछ अंतर आ गया इसके बाद भी प्रयास यही है कि अक्षर पिताजी के बनाये हुए अक्षरों जैसे बनें.


आज इस पोस्ट में अपनी एक कविता, जो हमने आज ही लिखी है, का चित्र लगा रहे साथ ही पिताजी की हस्तलिपि का. देखकर साफ़ समझ आ रहा है कि आज भी पिताजी जैसी राइटिंग हम बना नहीं पाए.


ये हमारी हस्तलिपि में हमारी कविता 

ये पिताजी की हस्तलिपि 


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 जुलाई 2020

काव्य रचनाओं में उभर आती है दिल की बात

उस उम्र में पहली कविता लिखी गई जब कविता की समझ बाल-कविताओं के रूप में ही विकसित हो रही थी.  न केवल लिखी बल्कि पिताजी के प्रयास से दो समाचार-पत्रों में प्रकाशित भी हुई थी. तत्कालीन पाठ्य-पुस्तकों में, समाचार-पत्रों के बच्चों का कोना, बाल सभा जैसे साप्ताहिक स्तंभों, बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताओं के द्वारा कविताओं को सिर्फ पढ़ा ही जा रहा था. न ऐसा विचार था और न ही कहीं मन में था कि कभी कविताएँ भी लिखी जाएँगी. अपनी पहली कविता के प्रकाशन बाद भी जबकि बड़ों से आशीर्वाद; साथियों से, छोटों से स्नेह मिला तब भी ऐसा विचार मन में नहीं आया था. नौ-दस वर्ष की उम्र में पहली कविता के लेखन-प्रकाशन के बाद भी कविताएँ लिखते रहने जैसा कोई भाव मन में नहीं जागा.


आज जबकि गद्य के साथ-साथ पद्य लेखन भी लगातार हो रहा है इसके बाद भी ऐसा लगता है कि कविता लिखी नहीं जा सकती है. जी हाँ, हमारे साथ यही वास्तविकता है. आज भी हम कविता लेखन के नाम पर कविता लिख नहीं पाते हैं. यह एक स्वतः स्फूर्त प्रक्रिया है जो क्षणिक भाव-बोध के साथ आरम्भ होती है और किसी रचना के रूप में इतिश्री को प्राप्त होती है. हमारा व्यक्तिगत रूप से ऐसा मानना है कि काव्य-लेखन कोई प्रक्रिया नहीं है वरन मन की अनुभूति है. कविता, गीत, ग़ज़ल आदि विभिन्न काव्य-विधाओं का लेखन हमसे कभी सायास नहीं हुआ. ऐसा कभी नहीं हुआ कि सोच-विचार कर कागज-कलम लेकर बैठे और एक काव्य-रचना का जन्म हो गया. हमारे साथ ऐसा अनायास होता है. कभी ट्रेन-बस में यात्रा करते समय, कभी घर से महाविद्यालय आते-जाते समय, कभी बाजार में नितांत आवारगी से टहलते हुए, कभी देर रात बिस्तर पर सोने की कोशिश करते समय.

सभी काव्य-रचनाओं के केन्द्र में कोई न कोई घटना, स्थिति, व्यक्ति रहा है. प्रेम सम्बन्धी काव्य-रचनाओं पर हमारे साथियों का, पाठकों का, श्रोताओं का एक मासूम सा सवाल हमसे हमेशा रहा है कि ये रचनाएँ किसके लिए लिखी गईं? यह सत्य है कि कुछ रचनाएँ अपने उस अतीत को याद करते हुए लिखी गईं, जो हमारा वर्तमान नहीं बन सका. यह भी सच है कि कुछ काव्य-रचनाओं में उस प्रेम की खुशबू है जो हमारे साथ न होकर भी हमारे जीवन में घुली-मिली है. चूँकि हमें अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सहज और प्रभावित करने वाला माध्यम काव्य समझ आता है. बहुत ही कम शब्दों में किसी भी बात को दिल की गहराइयों तक बहुत ही आकर्षक और आलंकारिक रूप में उतारा जा सकता है. यही कारण है कि हमने अपनी कविताओं के द्वारा अपने मन की, अपने दिल की बात कहने का प्रयास किया है. इसी के चलते अतुकांत रचनाओं का लेखन भी खूब हुआ है. अतुकांत होने के बाद भी उनमें एक तरह लयबद्धता बनी रहे, इसका प्रयास लगातार किया है. बहुत सी रचनाओं में व्याकरणिक अनुशासन दिखाई नहीं देता है. इसके पीछे हमारा स्वयं का मानना है कि जब कोई रचना स्वान्तः-सुखाय के रूप में हो, अनायास भावबोध के कारण जन्मी हो, अनुभूतियों का प्रस्फुटन हो तो उसे किसी बंधन से मुक्त ही माना जाना चाहिए, रखा जाना चाहिए. शेष तो बस लिखने का प्रयास अभी भी है, लगातार है.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

15 जून 2020

क्या ब्लॉगर भी चोरी, सीनाजोरी जैसी हरकतें करने लगे हैं?

कल रात नियमित भ्रमण पर हमारीवाणी पर टहलना हो रहा था. अभी ज्यादा दूर जाना नहीं हो सका था कि एक पोस्ट का शीर्षक हमें अपनी कविता जैसा दिखा. ब्लॉगर का नाम भी पहचाना हुआ था. इसलिए लगा नहीं कि हमारी कविता वहाँ पोस्ट की गई होगी. इसके बजाय लगा कि कहीं हमारी कविता के बारे में तो कुछ लिखा तो नहीं गया है. ऐसा विचार आते ही पोस्ट लिंक पर क्लिक कर दिया. पोस्ट खुली तो हमारी आँखें खुलीं. पूरी की पूरी कविता उस पोस्ट में थी मगर हमारे नाम के बिना. पेज दो-तीन पर रिफ्रेश करके भी देखा, कहीं नेटवर्क कोई होशियारी न कर रहा हो मगर ऐसा नहीं था. हमारा नाम लेखक ने लिखा नहीं था सो वहाँ था ही नहीं. कहीं और भी किसी रूप में ये प्रदर्शित नहीं हो रहा था कि वो पोस्ट हमारी है.


बहरहाल, इस तरह की घटनाओं से आये दिन दो-चार होते हैं. सोशल मीडिया के विशाल जंगल में, इस भूलभुलैया में कब कौन चोर बनकर आपकी रचनाओं के सहारे प्रसिद्धि पाता रहे, कहा नहीं जा सकता. अक्सर घूम-फिर कर हमारी ही रचनाएँ हमें टैग करके भेजी जातीं हैं, किसी और के नाम पर. ऐसे में इस ब्लॉग पोस्ट पर अपनी कविता देखना आश्चर्य का विषय नहीं लगा. उन्हीं की तरह का कदम फेसबुक पर एक महाशय और उठाए हैं, उनको भी संकेत कर दिया है. इन्हीं महाशय के नक्शेकदम पर चलते हुए वे भी हमारी उसी कविता को अपनी पोस्ट में जिंदा किये बैठे हैं. दिमाग में आया कि हो सकता है कि ब्लॉगर गलती से नाम न लिख सके हों. चूँकि ब्लॉगर का नाम खासा जाना-पहचाना हुआ है ब्लॉगिंग में, सो यह सोचा ही नहीं कि किसी तरह की चोरी के उद्देश्य से ऐसा किया गया होगा. ऐसा इसलिए भी नहीं लगा क्योंकि हम इतना बड़ा नाम नहीं कि वे ब्लॉगर हमारी रचना चुराएं.

किसी और ब्लॉग पर लगाई गई हमारी कविता 

दिमाग में ऐसी बातें चलते-चलते उनकी उसी पोस्ट में हमने टिप्पणी के द्वारा उनको कविता के मूल के बारे में बताया. साथ ही अपने ब्लॉग पोस्ट की, जिसमें वो कविता लिखी थी, उनको भेज दी. ब्लॉगर द्वारा टिप्पणी को मॉडरेशन में लगाया गया है इस कारण टिप्पणी उस समय प्रकाशित न हुई. आज भी कई बार देखा तो न टिप्पणी प्रकाशित हुई, न ही कविता में हमारा कोई जिक्र हुआ और न ही वह पोस्ट हटाई गई. पहले लगा कि शायद उन्होंने टिप्पणी देखी न हों मगर जब उनके ब्लॉग पर नजर मारी तो महाशय ने आज ही तीन पोस्ट लगाई हैं. इसका सीधा सा अर्थ यही है कि उन्होंने जानबूझ कर टिप्पणियों को नजरअंदाज किया है. हम स्वयं भी कई बार अपनी ब्लॉग पोस्ट में किसी अन्य की पोस्ट को प्रकाशित करते हैं मगर उसके नाम के साथ, उसकी अनुमति के साथ. ब्लॉग पोस्ट को न हटाया जाना या फिर उसमें हमारी कविता का चर्चा न करना कहीं यह सिद्ध तो नहीं कर रहा है कि अब ब्लॉगर भी चोरी, सीनाजोरी जैसी हरकतें करने लगे हैं?

ये हमारी पोस्ट 

फ़िलहाल तो आज फिर उनको टिप्पणी के द्वारा संकेत कर दिया है, देखना है वो करते क्या हैं. यहाँ कविता के चोरी किये जाने से समस्या नहीं क्योंकि यह घटना तो दिख गई, पकड़ में आ गई. जो चोर परदे के पीछे हैं, हम सबकी निगाह से छिपे हैं उनका कोई क्या कर ले रहा है. यद्यपि इस बारे में एक हम ही नहीं बहुत से लोग परेशान हैं तथापि इसके खिलाफ कदम बढ़ाने का प्रयास कोई कर नहीं रहा है. शायद आरम्भ हमें ही करना होगा. आगे क्या करना है ये तो आगे देखेंगे मगर दुःख हो रहा है कि नामचीन ब्लॉगर भी इस जमात में शामिल होते दिखने लगे.

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हमारे मित्र द्वारा फेसबुक पर लिखी पोस्ट 

आप सभी को अवगत कराएँ कि वह कविता हमने सन 2018 में लिखी थी. उस कविता के बारे में हमारे मित्र ने फेसबुक पर एक पोस्ट भी लिखी थी, उसी सन 2018 में.

ये हमारी कविता की पोस्ट लिंक
https://kumarendra.blogspot.com/2018/11/blog-post_16.html
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ये उस पोस्ट की लिंक जहाँ ब्लॉगर महाशय ने हमारी कविता लगा रखी है

https://akhtarkhanakela.blogspot.com/2020/06/blog-post_60.html 
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ये वो लिंक जो फेसबुक पर हमारी कविता की है, किसी और की पोस्ट पर 

हमारी एक कविता, दो जगह, बिना हमारी जानकारी 

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

23 मई 2020

स्केच, कविता और सुलेख की त्रिवेणी

जनता कर्फ्यू के दिन से यदि जोड़ लिया जाये तो लॉकडाउन जैसी स्थिति के दो महीने हो चुके हैं. वैसे लॉकडाउन वास्तविक स्वरूप में 25 मार्च से आया था. हमने उसी दिन दे स्केचिंग करना फिर से शुरू कर दिया था. किसी समय स्केचिंग खूब की. स्कूल के समय में, कॉलेज में इसका भरपूर आनंद लिया. बाद में कुछ दूसरे कार्यों में फँस जाने के कारण ये शौक धीरे-धीरे डिब्बे में बंद हो गया. यद्यपि स्केचिंग जैसी कलाकारी लगातार चलती रही तथापि ऐसा किसी व्यवस्थित रूप में नहीं हो रहा था. किसी भी कागज़ पर, किसी लिफाफे पर, ट्रेन में यात्रा करने के दौरान वातानुकूलित यान में मिलते कागज़ के लिफाफे पर अथवा किसी और जगह. ऐसी स्केचिंग न हमारे पास रही और न उसे संग्रहित करने की मंशा बनाई.


अब जबकि लॉकडाउन के चलते घर पर ही रहना था. कब तक पढ़ा-लिखा जाता, कितना पढ़ा-लिखा जाता तो विचार किया कि अपने इसी शौक को व्यवस्थित रूप दिया जाये. बहुत पहले अपनी स्केचिंग की फाइल बनाई थी मगर उसे एक बिटिया को उसके शौक को देखते हुए गिफ्ट कर दिया था. इस बार लॉकडाउन शुरू होने वाले दिन से अद्यतन स्केचिंग की जा रही है. सभी को व्यवस्थित रूप से रखा भी जा रहा है. इन स्केच में से कुछ को सोशल मीडिया पर अपने मित्रों के बीच शेयर भी किया जा रहा है. इस बारे में कुछ सुझाव भी मिले हैं, जिन पर अमल किया जा रहा है. इसी के बीच एक विचार में आया. बस उसे सक्रियता से शक्ल देनी है.


चलिए, पहले अपने लोगों के कुछ विचारों से आपको भी अवगत करा दें. हमारे बचपन के मित्र हैं राहुल शर्मा, लॉकडाउन स्केचिंग को देखकर अगले ने ही सबसे पहले एक सुझाव दिया था कि हर एक स्केच के बारे में कुछ लिखा करे. क्यों बनाया उसे? उसे बनाते समय क्या विचार आये? उस स्केच में जो है उसका क्या भावार्थ है? आदि-आदि. इसके अलावा एक अभिन्न मित्र सुभाष के द्वारा कहा गया कि स्केच के साथ कोई न कोई कैप्शन दिया करिए. हालाँकि ऐसा आरंभिक स्केच में किया गया मगर बाद में इसको अमल में नहीं लाये. इसी तरह से लगभग एकसाथ मित्रवत स्थिति में आये अनुज और हेमलता ने एक जैसे विचार दिए. दोनों लोगों का कहना था कि इन सभी स्केच को एक फाइल का रूप दिया जाना चाहिए. संभवतः वे लोग हमारे स्वभाव से परिचित हैं, इसलिए ऐसा उनको सुरक्षित रखने के लिए कहा होगा. इसी के साथ-साथ वर्तमान में लन्दन में निवास कर रही बड़ी बहिन अनुजा दीदी ने उन सभी स्केच की तारीफ करते हुए अपनी अगली भारत यात्रा के बाद उसमें से कुछ अपने साथ लन्दन ले जाने की बात कही. और भी कुछ विचार आये जो स्केच की तारीफ में ही थे. स्थानीय महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक डॉ० रामशंकर द्विवेदी जी का कहना था कि अगर चित्रकला में ही कैरियर बनाते तो भी शायद बुरा न होता. अब भी मुख्य काम से इतर अगर इसे समय दिया जाय तो अतिरिक्त ऊर्जा का उपयोग अच्छा ही होगा. मयूरेश ने एक स्केच को देखकर Salvador Dali जैसी पेंटिंग कह डाला. साथ ही मूंछों को उनके जैसा रखने की सलाह भी दी.

अभी तो ये स्थिति लॉकडाउन की है. आगे पुनः सामाजिक जीवन में सक्रिय होने के बाद इस पर कितना समय दिया जा सकेगा, यह भविष्य के गर्भ में है. लॉकडाउन में अभी तक 80 से अधिक स्केच बना ली हैं. किसी-किसी दिन दो, तीन भी बना डालीं. उक्त विचारों-सुझावों-टिप्पणियों के अलावा हमारा विचार ये आया कि इनमें से सबसे अच्छी लगने वाली 50-60 स्केच का चयन करके प्रत्येक पर एक छोटी सी कविता लिख दी जाये. कविता हस्तलिपि में होगी और दोनों (स्केच तथा कविता) को ब्लॉग के द्वारा प्रकाशित कर दिया जाये. यह पुस्तकाकार रूप में भी लाई जा सकेगी. हाल-फिलहाल तो पाठकों की माँग पर इसे PDF रूप में भी उपलब्ध करवाया जा सकता है. इससे और भी बहुत से लोगों को स्केच तथा कविता से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा.


इस बारे में जल्द ही ब्लॉग का नाम तय किया जायेगा. नाम ऐसा रखा जायेगा, जिसको पुस्तक के शीर्षक के रूप में भी समायोजित किया जा सके. इसके साथ-साथ कोशिश यह होगी कि नाम स्केच और कविता को भी परिभाषित करता हो. चलिए, अब इस काम पर भी लगा जाये, बस आप शुभेच्छुजन अपनी भी राय दे दीजिए कि कैसा विचार है हमारा?

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

22 मई 2020

हम ही जीतेंगे कह दो ये सबसे मगर

फूल खिलने लगे गुलशन के मगर,
फूल गुमसुम हैं कितने घर के मगर.
कौन आया जहाँ में ये हलचल हुई.
आज डरने लगे लोग खुद से मगर.
























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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

19 फ़रवरी 2020

गुज़रे वक़्त की यात्रा (कविता) - 1675वीं पोस्ट


शब्दों की रवानी भी
नज़र की शोख़ी में
छोटी पड़ जाए,
दिल की आवाज़,
दिल से निकले और
सीधे दिल से टकराए.

वो एक पल के शतांश में
तेरी आँखों का यूँ मटकना,
होंठों में लरजन और
शब्दों का गुम हो जाना.

थाम कर
वक़्त की उड़ान को
एक झटके में,
वक़्त के साथ
गुज़रे वक़्त की यात्रा कर आए,
न जाने कितनी हसीन यादें
एक अदा पर समेट लाए.

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कुमारेन्द्र किशोरीमहेन्द्र
12-02-2018

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इस ब्लॉग की 1675वीं पोस्ट. आज कुछ लिखने का मन न किया. दो वर्ष पुरानी एक स्व-लिखित कविता, आपके लिए.


22 मार्च 2019

बुरा मानना हो तो खूब मानो, होली है तो है



आखिरकार होली हो ली. दिन भर धमाचौकड़ी चलती रही, कभी बच्चों की, कभी बड़ों की. इसी धमाचौकड़ी में मित्र-मंडली संग शहर की सुनसान पड़ी सड़कों पर टहलना हुआ. अलग-अलग रंग के, अलग-अलग जीव दिखाई दिए. कुछ रंग में मस्त, कुछ भंग में मस्त. कुछ तेज रफ़्तार बाइक में मगन, कुछ दारू के नशे में टुन्न. एक मित्र मिले, अनजाने से. अनजाने से इसलिए क्योंकि पूरी तरह अपने रंग में थे. न कदमों का होश था, न हमें पहचान पाने का. पता नहीं किस झोंक में चले आये सड़क के इस पार. आकर गले लगे और बोले बुरा न मानो होली है. हमने कहा इसमें बुरा क्या मानना मित्र, आखिर होली है ही ऐसा त्यौहार. उनके चेहरे पर एकदम चमक आ गई, बोले वाह दोस्त, क्या बात कही. फिर एकदम से उनके अन्दर के तरल पदार्थ ने शायद किक मारी. चेहरे को जरा सा सख्त करके बोले, बुरा मानना हो तो खूब मानो. होली है तो है.


हम समझ गए कि उनके और उनके तरल पदार्थ के बीच रस्साकशी चल रही है. अन्दर का तरल पदार्थ उन्हें नाली में पटकने को आतुर दिख रहा था और हमारे मित्र थे कि बिना गिरे-पड़े घर पहुँचने की आतुरता में थे. उनको एक पान की दुकान के किनारे पड़ी बेंच पर बिठाया और सलाह दी कि उतनी ही लिया करो अपने प्याले में, जो न पटके किसी नाले में.

वे हमारा मंतव्य समझ गए तो हो-हो-हो करके हँस दिए. इतनी देर में उनके दिमागी कंप्यूटर ने अपने सॉफ्टवेयर को अपडेट किया और वे हमें पहचान गए. भटकती जीभ के सहारे हमारे हाथ को थाम बड़े भावुक हो गए और बोले, कहाँ रोज-रोज प्याले में भरते हैं, कहाँ रोज-रोज नाले में गिरते हैं. हमने भी उसी भावुकता में वाह-वाह कह दिया.

उस वाह-वाह ने उनके अन्दर के कवित्व को जगा दिया और चंद पंक्तियाँ पटक दी सामने. उसके बाद लगा कि उसे अकेले छोड़ना सही नहीं, सो मित्र-मंडली ने उसे अपने में समेटा और बजाय मयखाने के घर ले जाकर छोड़ा.

उसकी पटकी-पटकाई वही पंक्तियाँ आपके सामने ज्यों की त्यों, बिना लड़खड़ाए. होली की शुभकामनाओं के साथ आनंद लीजिये.  
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लोगों ने बड़ा ही गलत काम किया है,
नाहक ही पीने-पिलाने को बदनाम किया है.
कहाँ बह गए लोगों के दरो-दीवार जश्न में,
बैठकर मयखाने में जाम को ही पिया है.

पीने का मजा क्या जानें दूर रहने वाले,
पूछो उसे जो हैं नशे में चूर रहने वाले.
अपने में खोये रहते हैं दीवानों की तरह,
शहंशाह खुद को जहाँ का बना लिया है.

जाम पर जाम टूट कर बिखर गए कितने,
महकती शाम के दीवाने हो गए कितने.
मदहोशी के आलम में अब होश नहीं अपना,
जाना है घर पता मयखाने का दिया है.