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22 मार्च 2024

राजनैतिक गलियारे के व्यवस्था परिवर्तक

आखिरकार कई-कई समन को अस्वीकार करने वाले अरविन्द केजरीवाल को ईडी ने अपने चंगुल में ले ही लिया. आबकारी नीति मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया. आम आदमी पार्टी के इससे पहले कई जनप्रतिनिधि जेल में हैं. मनीष सिसौदिया, संजय सिंह, सतेन्द्र जैन आदि पहले से गिरफ्तार होकर जेल में हैं. अब अरविन्द केजरीवाल गिरफ्तार कर लिए गए हैं और छह दिन की रिमांड पर हैं. संभव है कि वे भी अपने साथियों के बीच जल्द ही दिखाई देंगे. 


अरविन्द केजरीवाल की गिरफ़्तारी ने भी एक तरह का अलग रिकॉर्ड बना दिया है. देश में यह पहला मामला है जबकि किसी मुख्यमंत्री को उसके पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया है. यहाँ उनकी गिरफ़्तारी से सम्बंधित सवाल-जवाब अथवा विमर्श की तरफ इस पोस्ट को कतई नहीं ले जाना है. आज इस विषय पर पोस्ट लिखने का सन्दर्भ महज इतना है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुए आन्दोलन से, लोकपाल को लाने के संकल्प के साथ जन्मे एक दल ने और उसके नेताओं ने आम आदमी के विश्वास को न केवल तोडा है बल्कि घनघोर तरीके से चकनाचूर भी कर दिया है.




अन्ना आन्दोलन के दौरान जिस तरह से इन नेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी बातें की गईं, खुद को ईमानदारी का एकमात्र प्रतिनिधि बताया गया, दूसरे दलों के नेताओं के सैकड़ों-सैकड़ों कागजों में भ्रष्टाचार के सबूत दिखाए गए, खुद को राजनीति की, सत्ता की चकाचौंध से बाहर रखने के जुमले फेंके गए, बच्चों तक की कसमें खाई गईं और अंततः सबके सब ही एक ही रंग में रँगे नजर आये. दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ खुले मंचों से लहराए जाने वाले कागजात सत्ता में आने के बाद न जाने कहाँ गायब हो गए? जिस कांग्रेस के खिलाफ पूरा आन्दोलन चलाया गया, उसी के साथ मिलकर सरकार बनाई गई. इसके बाद भी इन सबका खुद को व्यवस्था बदलने वाला, नई तरह की राजनीति करने का ढोल पीटना बंद नहीं किया गया.


जो सारे कार्य इन लोगों ने अपने लिए निषिद्ध मान रखे थे, कह रखे थे, वे सारे के सारे अपनाए गए. आम जनमानस को इससे समस्या पैदा होने वाली नहीं थी और न है. आखिर राजनीति के गलियारों में यह कोई नई या अनोखी बात नहीं है. कोई भी दल हो आज बात भले सिद्धांतों की, शुचिता की, ईमानदारी की करता हो मगर काम स्वार्थपरक ही करेगा, सत्तालोलुप रहेगा. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से, इनके नेताओं के रंग बदलने से नकारात्मक प्रभाव उन छोटे-छोटे सामाजिक संगठनों पर पड़ा जो वाकई में छोटे से क्षेत्र में ईमानदारी से, कुशलता के साथ कार्य कर रहे थे. आम आदमी पार्टी के कृत्यों से सबसे निचले स्तर के व्यक्ति की ईमानदारी, शुचिता पर, उसके कार्यों पर संदेह किया जाने लगा है. आम जनमानस में एक धारणा गहरे तक बैठ गई कि किसी भी रूप में समाज से भ्रष्टाचार को दूर नहीं किया जा सकता है. कोई कितना भी आन्दोलन करे, कसमें खाए, खुद को ईमानदार बताता घूमे लेकिन यह सब सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए, स्वार्थ-पूर्ति के लिए ही किया जाता है.


आन्दोलन से लेकर अद्यतन इनके कृत्यों को देखने के बाद बचपन में किसी कक्षा में पढ़ी डाकू खड्ग सिंह और बाबा भारती की कहानी याद आ गई. 





 

26 जून 2023

बाजारवाद के खिलाफ

चलो अच्छा है बाजारवाद के खिलाफ एक माहौल बन रहा है... भले ही फेसबुक पर बन रहा हो. वैसे बाजार वो स्थिति है जिसने बड़े-बड़े आन्दोलनों को निगल लिया. बड़े-बड़े आन्दोलनों की दिशा को बदल दिया. पहली बात ये कि बाजारवाद है क्या? क्या महज सौन्दर्य प्रसाधन बेचना ही बाजारवाद है? क्या वस्तु के सापेक्ष स्त्री को खड़ा कर देना बाजारवाद है? क्या महज सात दिनों में गोरा बना देने का दावा बाजारवाद है? क्या एक-एक बालों की सफेदी को रंगों में लिपटा लेना बाजारवाद है? क्या माँ के स्तनपान की जगह पर बाजारू दूध बच्चे को पिला देना बाजारवाद है? क्या मेरे कपड़े तेरे कपड़ों से सफ़ेद दिखा देना बाजारवाद है? क्या हवन-पूजन के  समय सेक्स की याद करते हुए कंडोम का फ्लेवर याद कर लेना बाजारवाद है? आखिर बाजारवाद का विरोध करते लोग/लुगाइयां भी बताएं कि बाजारवाद क्या है?

 

यदि बाजारवाद का विरोध लिपस्टिक, काजल, बिंदी, मस्कारा, आई-लाइनर, फाउंडेशन, नेल पोलिश आदि न लगाना है तो विशुद्ध ड्रामा है ये. किसी साबुन, क्रीम, लोशन के सहारे चेहरे की झुर्रियों को छिपाने की कला भी नेचुरल नहीं है. बालों की सफेदी में कालिख पोतना भी नेचुरल नहीं है. सुबह जगाने से लेकर रात सोने तक अनेकानेक रूप में चेहरे को प्रयोगशाला बना देना नेचुरल नहीं है. बाकी का सेल्फी के नाम पर कुछ भी हो मगर नेचुरल नहीं है. हो सकता है बहुतों को ये पोस्ट स्त्री-विरोधी लगे मगर इसे पढ़ने के बाद एक बार जब बेशिन के सामने खड़े होकर कोई फेसवाश लगाया जाये, चेहरे की झुर्रियों पर उँगलियों को फिराया जाये, बालों की सफेदी को दूर करने के लिए कोई नेचुरल कलर घोला जाने लगे तो याद करियेगा कि कहीं इसी नेचुरल कलर की तरह आपकी सेल्फी भी तो नेचुरल नहीं?


 

29 दिसंबर 2020

नकारात्मक है कृषि सुधार कानून विरोधी आन्दोलन

इस समय देश की राजधानी और देश की वर्तमान राजनैतिक स्थिति किसान आन्दोलन की चपेट में है. सामान्य नागरिकों को देश के किसानों और जवानों के सन्दर्भ में किसी तरह का तर्क-वितर्क सुनना पसंद नहीं आता है, इसी कारण से बहुतेरे नागरिक बिना कुछ और विचार किये अपना समर्थन वर्तमान में चल रहे किसान आन्दोलन को देने लगे. किसानों का यह आन्दोलन केंद्र सरकार द्वारा पारित किये गए तीन बिलों, कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन बिल आवश्यक वस्तु अधिनियम के विरोध में हो रहा है.


किसी भी सामान्य नागरिक, जिसे राजनीति से कहीं भी खड़े होकर चर्चा कर लेने भर का सम्बन्ध होता है, को इससे कोई सरोकार नहीं होता है कि किसी भी सरकार द्वारा किसी बिल को, किसी भी संशोधन को अकारण अथवा बिना किसी नियम-कानून के नहीं कर दिया जाता है. यदि उक्त किसान सम्बन्धी कानूनों की ही बात की जाये तो यह अकेले किसी एक-दो व्यक्तियों की सोच नहीं, एक-दो मंत्रियों का कार्य नहीं. किसी भी ऐसे कानून को अथवा ऐसे बदलाव को, जिसका असर पूरे देश पर पड़ने वाला होता है उसे एक व्यापक सोच के साथ पूरे नियम-विधान के बाद ही पारित किया जाता है.


यहाँ यदि एक पल को कानूनों का संक्षिप्त रूप देखें तो स्पष्ट समझ आता है कि कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 के अनुसार किसान मनचाही जगह पर अपनी फसल बेच सकते हैं. इसमें वे बिना किसी समस्या के दूसरे राज्यों में भी फसल बेच और खरीद सकते हैं अर्थात एपीएमसी (APMC) के दायरे से बाहर भी फसलों की खरीद-बिक्री संभव है. इसमें एक लाभ यह है कि की बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा और इसके साथ ही ऑनलाइन बिक्री की भी अनुमति होगी. संभव है कि इस कदम के बाद किसानों को अच्छे दाम मिलने लगें.


इस बिल के साथ पारित मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 के द्वारा देशभर में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग करने सम्बन्धी व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है. इसके अनुसार यदि फसल खराब होती है तो नुकसान की भरपाई अनुबंध करने वाले पक्ष को करनी होगी. ऐसा माना जा रहा है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी और बिचौलिया राज खत्म होगा. तीसरे कानून के रूप में आवश्यक वस्तु संशोधन बिल आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम में संशोधन किया गया है. यह कानून सन 1955 में बनाया गया था. इसमें संशोधन करते हुए अब खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू जैसे कृषि उत्‍पादों पर से स्टॉक लिमिट (भण्डारण सीमा) हटा दी गई है. राष्‍ट्रीय आपदा, सूखा जैसी अपरिहार्य स्थितियाँ होने की दशा में भण्डारण सीमा निर्धारित की जाएगी.


इन कानूनों को लेकर जिस तरह से विपक्षी दलों द्वारा उकसाने की राजनीति की जा रही है, वह चिंतनीय है. जो लोग वर्तमान कृषि स्वरूप से, बिक्री और भण्डारण की स्थिति से परिचित हैं वे भली-भांति समझ सकते हैं कि इन कानूनों के आने से किसान को हानि कम है जबकि लाभ ज्यादा है. आज भी मंडियों में छोटे और मंझोले किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मिल ही नहीं पाता है. छोटी जोतों वाले किसान तो मंडियों का मुँह भी नहीं देख पाते हैं. उनकी फसल का मूल्य तो गाँव के महाजन अथवा बड़े किसान द्वारा निर्धारित करके चुका दिया जाता है.


वर्तमान आन्दोलन की आड़ में सक्रिय राजनैतिक दल जनता की कमजोर नब्ज पकड़ कर अपना हित ही साधने का प्रयास कर रहे हैं मगर यह समझना नहीं चाहते कि इसका समाज पर, देश पर क्या असर पड़ने वाला है. यह विचारणीय है कि वर्तमान दौर औद्योगीकरण, वैश्वीकरण का होने के बाद भी कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. एक अनुमान के अनुसार माना जाता है कि देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. इसके बाद भी देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है.


विगत कई दशकों में देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए हैं किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया था. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


देश के लगभग हर राज्य में किसान अपनी समस्याओं से पीडि़त हैं और सरकारी तन्त्र द्वारा उनकी समस्याओं के समाधान की बात तो की जाती है किन्तु किसी प्रकार का समाधान उनके द्वारा होता दिखता नहीं है. अब जबकि कृषि सुधार कानूनों के द्वारा सरकार कुछ सकारात्मकता दिखाने का प्रयास कर रही है तो राजनैतिक दलों द्वारा अनावश्यक रूप से किसानों को उकसाया जा रहा है. यहाँ राजनैतिक दलों को वर्तमान संशोधित कानूनों के परिणामों को देखने का इंतजार करना चाहिए था. यदि वे वाकई किसानों के हितैषी हैं तो कम से कम एक वर्ष में इन सुधारों को अमली रूप में आते देखते. वर्तमान हालातों में आन्दोलन कर देने से, सड़कें जाम कर देने से, राजधानी को बंधक बना लेने से किसानों की समस्याओं का हल नहीं निकलने वाला है. दवाब की राजनीति के द्वारा सरकार को कानून वापस लेने के लिए बाध्य करना भविष्य के लिए कितना घातक होगा, इसे अभी महसूस नहीं किया जा रहा है. किसी भी लोकतान्त्रिक संस्था द्वारा लम्बे विमर्श के बाद बनाये और दोनों सदनों में बहस के पश्चात् पारित कानूनों को वापस लेने के लिए आन्दोलन करना आत्मघाती कदम है. यह भविष्य के लिए नकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करेगा.




(उक्त आलेख 29-12-2020 के समाचार-पत्र बीपीएन टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.)
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वंदेमातरम्

11 दिसंबर 2020

आन्दोलन की आड़ में अराजकता फ़ैलाने की कोशिश?


ये चित्र इधर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है. यह दिल्ली में कथित रूप से किसान आन्दोलन के साथ जुड़ा हुआ कटाया जा रहा है. जिस दिन से इस आन्दोलन का आरम्भ हुआ था, उसी दिन से किसानों के नाम पर कभी मोदी को देख लेने की बात कही गई, कभी हिन्दू महिलाओं के लिए अशालीन बयान दिए गए, कभी खालिस्तान समर्थन के नारे, कभी पाकिस्तान के पक्ष में नारे सुनाई दे रहे थे. उसी समय से बराबर हमने कहा था कि ये किसानों का आन्दोलन नहीं बल्कि कृषि-व्यापारियों का आन्दोलन है. बहरहाल, वह चर्चा अलग है. यदि ये चित्र वाकई दिल्ली में चल रहे इसी आन्दोलन से सम्बंधित है तो वाकई चिंता का विषय है. सोचने वाली बात ये है कि किसानों का सम्बन्ध इन अलगाववादी लोगों से कैसे है? कृषि से सम्बंधित कानूनों से जुड़े बिन्दुओं, उनसे जुड़े लाभ-हानि का तख्तियों पर चिपके चित्रों से क्या लेना-देना?


किसानों के आन्दोलन का ऐसी बातों से जुड़ा होने का अर्थ समझ से परे है. किसानों की आड़ लेकर देश में या कहें कि देश की राजधानी में फिर से अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है. इस पूरे आन्दोलन में जिस तरह का मुस्लिम गठजोड़ देखने को मिला, सिखों का भेष धारण किये हुए मुस्लिम युवक पकड़े गए वह भी अपनी अलग कहानी कहता है. शाहीन बाग़ के बाद भी दिल्ली में उस स्तर की अराजकता शायद ये ताकतें नहीं फैला सकीं थीं जैसी कि वे चाहती थीं, इसलिए अब दोबारा कोशिश की जा रही है. ये सभी को मालूम है कि दिल्ली में होने वाली हलचल समूचे विश्व में देखी-सुनी जाती है. ऐसे में दिल्ली में अराजकता फैलने से सरकार की, प्रशासन की छवि पर नकारात्मक असर भी पड़ता है. किसानों के रूप में बैठे ऐसे कृषि-व्यापारियों, खालिस्तान समर्थकों, पाकिस्तान समर्थकों का उद्देश्य कृषि सम्बन्धी कानून में संशोधन नहीं बल्कि अराजकता के द्वारा देश को, सरकार को बदनाम करना है. इसका प्रमाण इस चित्र के माध्यम से (यदि ये चित्र सही है) लिया जा सकता है.


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वंदेमातरम्

06 दिसंबर 2020

आन्दोलन की आड़ में हिन्दू विरोधी स्वरों का उठना

दिल्ली में चल रहे तथाकथित किसान आन्दोलन में अपने आपको सिख कहने वाले योगराज द्वारा विवादित बयान दिया गया. उस व्यक्ति ने अपने बयान में इतिहास की तरफ जाकर बताया कि सिखों ने हिन्दू महिलाओं को मुगलों के सामने टके-टके पर बिकने से बचाया. यहाँ खुद को सिख बताने वाले योगराज को भारतीय इतिहास की जानकारी नहीं है. एक बार वह खुद ही सिखों की उत्पत्ति और मुगलों के समय को देख-परख ले तो शायद उसकी बुद्धि खुल जाए. इधर कुछ जगह से जानकारी हुई है कि अगला व्यक्ति खालिस्तान आन्दोलन का समर्थक है और उसकी साजिश है कि दिल्ली में चल रहे तथाकथित किसान आन्दोलन के भीतर से खालिस्तान समर्थन में, हिन्दुओं के विरोध में स्वर उठने लगें. योगराज के अनर्गल बयान के बाद जिस तरह से सिख विरोधी पोस्ट सामने आ रहीं हैं, वे उस व्यक्ति की साजिश को सफल करने को दर्शाती हैं. ये कहना अपने आपमें सही हो सकता है कि सिखों का उदय हिन्दुओं से ही हुआ है. यह भी सत्य है कि हिन्दू-सिख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

 



इस सत्य के पीछे से एक अजीब सी आहट सुनाई दे रही है, उसे समझने की आवश्यकता है. सिक्कों के दो पहलुओं को अलग-अलग किये जाने की साजिश रची जाने लगी है. किसान आन्दोलन के भीतर से जिस तरह से खालिस्तानी आन्दोलन के स्वर उभरने लगे हैं, जिस तरह से हिन्दू विरोधी बयान दिए जाने लगे हैं, जिस तरह से हिन्दू धर्म विरोधी ताकतें अपने मंसूबे सफल बनाने के लिए जुटने लगी हैं, जिस तरह से सिखों के भेष में मुसलमान पकड़े गए हैं उससे बहुत बड़ी साजिश की बू आ रही है. यहाँ सिखों को भी इस साजिश को समझने की आवश्यकता है. हर बार की तरह हिन्दुओं को ही संयत रहने, शांत रहने, समझदारी दिखाने की सीख दी जाने लगी है. सिखों को अपने अतीत से सीखने की जरूरत है. उनके दामन पर आतंकवाद जैसी कालिख लगी हुई है. ये और बात है कि सम्पूर्ण देश ने, समस्त हिन्दुओं ने उनके काले अतीत को विस्मृत करते हुए उनको अपने ह्रदय में बसाए रखा है.

 

सिखों को इस कदम का सम्मान करना चाहिए. योगराज जैसों के हिन्दू विरोधी बयानों का विरोध किया जाना चाहिए. किसान आन्दोलन की आड़ में हिन्दू विरोधी एजेंडा सेट करने की कोशिश का विरोध सिखों को भी करना चाहिए. किसान आन्दोलन के भीतर से उठ रहे खालिस्तान समर्थन के स्वरों को भी उन्हीं सिखों को दबाया जाना चाहिए जो हिन्दू-सिख एकता की बात करने में लगे हैं. आपसी फूट से कभी किसी का लाभ नहीं हुआ है मगर सोचने वाली बात है कि किसी भी विवादित स्थिति में, किसी भी विभेद की स्थिति में, किसी भी अनपेक्षित स्थिति के सामने आने के बाद सिर्फ हिन्दुओं से ही धैर्य, संयम, शांति रखने की अपेक्षा क्यों की जाती है? क्या हिन्दू सिर्फ गाली खाने के लिए ही पैदा हुए हैं, जिसे कभी मुस्लिम संगठन गाली देने लगते हैं, और अब हिन्दुओं के पर्याय कहे जाने वाले सिख भी गाली देने पर उतर आये हैं?


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वंदेमातरम्

21 जुलाई 2020

रामलला हम आ रहे, अबकी मंदिर ही बना रहे

इधर लगातार खबरें आ रही हैं कि पाँच अगस्त को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की आधारशिला रखी जानी है. इस खबर में कितनी सत्यता है, कितनी नहीं ये तो खबर प्रसारित करने वाले जानें मगर दिल को बहुत शांति मिली इस खबर के बाद. पिछले कई दशकों में अपने ही देश में अपने ही आराध्य को लेकर जिस तरह की जलालत झेलनी पड़ी है, वह असहनीय रही. इस खबर के बाद याद आ रहा है वह दौर जबकि किसी भी व्यक्ति के लिए अपना कैरियर बनाने का समय होता है. उस दौर में हमारे समय के लोगों को एक तरफ आरक्षण सम्बन्धी कानून की मार से जूझना पड़ा साथ में अपने मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को बचाने के लिए लड़ना पड़ा.



उन दिनों को याद करते हुए आँखों में बार-बार नमी आ जाती है जबकि उन दिनों के अपने मित्रों के, अपने कार्यों को याद करते हैं. ये ईश्वर का आशीर्वाद कहा जायेगा कि हम लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण देखने के लिए जीवित हैं, बहुत से कारसेवक ऐसे हैं जो किसी और के नेत्रों से इस दृश्य को देख रहे होंगे. उन दिनों जैसे जूनून सिर पर हावी था. कारसेवकों की सूची बनानी हो, लोगों को अयोध्या के सम्बन्ध में जागरूक करना हो, श्रीराम जन्मभूमि के बारे में जानकारी देना हो सब ऐसे होता था जैसे ये जीवन के लिए अनिवार्य हो. ऐसा नहीं कि सभी साथी इसी में अपने आपको झोंक दिए हों मगर कुछ साथी ऐसे थे जिनके लिए यही एकमात्र काम था. न भविष्य की चिंता, न कैरियर की चिंता, न नौकरी की चिंता बस दिमाग में एक ही बात रहती कि कैसे भी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का सपना सच करवाना है.

हमारे हॉस्टल के बहुत से साथियों ने अपना सक्रिय योगदान इसमें दिया. बहुत से लोग दिन-रात एक करके इसी में लगे हुए थे. छोटे-छोटे ग्रुप बनकर सपने को सच करवाने के लिए लगे हुए थे. उस समय बस एक सपना सच हुआ कि एक विवादित ढाँचा गिरा. उसके बाद सपनों भरी आँखों ने और अधिक सपने सजा लिए. अबकी उन सपनों में मंदिर का निर्माण था. सपने समय के साथ सच होते हैं, ऐसा सुना था मगर आज देख लिया. तमाम कानूनी दांवपेंच, अवरोध दूर होते रहे और अब खबर आने लगी श्रीराम मंदिर निर्माण की. इन्हीं आँखों ने विवादित ढाँचा गिरते देखा था, यही आँखें श्रीराम मंदिर निर्माण भी देखेंगी.

जय श्रीराम


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

28 अक्टूबर 2018

सेनेटरी नेपकिन पर आधुनिक महिलाओं की अमानुषिक सोच

समाज आये दिन नए-नए आन्दोलनों से रूबरू होता है. आधुनिकता के वशीभूत आगे बढ़ता या कहें कि आगे बढ़ने का नाटक करता ये समाज ऐसे-ऐसे आन्दोलनों के सहारे चलने की कोशिश करने में लगा है जो भारतीय समाज में ही नहीं वरन किसी भी समाज में स्वीकार नहीं होंगे. सबरीमाला मंदिर विवाद के बाद से इस तरह का एक आन्दोलन सामने आया, वो भी सेनेटरी नेपकिन के आन्दोलन के रूप में. ऐसी खबर सार्वजनिक रूप से आ रही है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर आंदोलित महिलाओं में एक महिला वहाँ स्थापित भगवान की मूर्ति पर माहवारी के दिनों में प्रयुक्त सेनेटरी नेपकिन को फेंकना चाहती है. सोचने वाली बात ये है कि ये किस तरह का आन्दोलन है? किस तरह की आज़ादी है? इस खबर के सन्दर्भ में सरकार की एक महिला मंत्री के बयान पर कुछ आधुनिक महिलाएं लामबंध हो गईं. वे माहवारी के दिनों में उपयोग में लाये सेनेटरी नेपकिन को लेकर इतनी संजीदा हो गईं, मानो ऐसे नेपकिन वे अपने संग्रह में सुरक्षित रख लेती हैं. या फिर ऐसे नेपकिन खाने की मेज पर साथ लेकर बैठती हैं.

इन महिलाओं ने महिला मंत्री के उस बयान को निशाना बना रखा है जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि क्या महिलाएं उपयोग किये गए नेपकिन अपने मित्र के घर ले जा सकती हैं? इसके अलावा इन आधुनिक महिलाओं का आन्दोलन सेनेटरी नेपकिन के पवित्र-अपवित्र को लेकर भी चालू है. ये स्वीकार है कि माहवारी किसी भी महिला की प्राकृतिक अवस्था है. ये भी स्वीकार है कि इसी अवस्था के चले इन्सान का जन्म होता है. ये भी स्वीकार है कि इस स्थिति को नकारा नहीं जा सकता है. इन सबके बाद भी इसे भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि इन स्थितियों में उपयोग में लाये जाने वाले नेपकिन उपयोगी हैं, सुरक्षित हैं, स्वास्थ्यवर्धक हैं. यदि माहवारी की अवस्था विशुद्ध पवित्र है तो क्या इस समय में उपयोग किये गए नेपकिन यही आधुनिक महिलाएं अपने ड्राइंग रूम में सजा कर रखेंगी? क्या यही महिलाएं अपने उपयोग किये गए नेपकिन को अपने साथ खाने की मेज पर लेकर भोजन करेंगी? यदि उपयोग किया गया नेपकिन पवित्र अवधारणा से लिप्त है तो क्या वे ऐसे नेपकिन अपने किसी कार्यक्रम में किसी को उपहार स्वरूप गिफ्ट करेंगी? निश्चित है ऐसा कोई भी महिला नहीं कर पाएगी. 

असल में इस तरह की नौटंकी सिर्फ सरकार विरोध के लिए की जा रही है. ऐसी महिलाओं के निशाने पर केंद्र सरकार है उसके मंत्री हैं. यदि ऐसा नहीं है तो प्रति महीने पांच दिनों के लिए इन्हीं महिलाओं को इसी पवित्र स्थिति से गुजरना पड़ेगा. इसी बार से अपने ऐसे उपयोग किये गए नेपकिन अपने पति-बेटे-बेटी के लंच बॉक्स में रखकर भेजें. ऐसे नेपकिन को अपने किसी परिचित को उपहार स्वरूप भेंट करें. ऐसे उपयोग किये गए नेपकिन को वे खाने की प्लेट में साथ रखकर भोजन का स्वाद लें. यदि वे ऐसा करने में समर्थ हैं, सक्षम हैं तो उनके आन्दोलन को समर्थन है. अन्यथा की स्थिति में अपनी बकबक को अपने घर तक सीमित रखें और अपने दिमाग में भी एक सेनेटरी नेपकिन लगाकर बैठें ताकि अनावश्यक होने वाले स्त्राव को रोका जा सके.

10 अप्रैल 2018

चुनावी आहट और उनकी साजिश भरी हलचल

लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है. इस आहट को सुनकर सभी राजनैतिक दल अपने-अपने हथकंडे आजमाने की जुगत भिड़ाने लगे हैं. इन्हीं हथकंडों के रूप में एक सप्ताह में भारत ने दो भारत बंद का सामना किया. भारत बंद की इस राजनीति में क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम परिलक्षित हुआ. उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरोध में शुरू हुए आन्दोलन को आहिस्ता से केंद्र सरकार विरोधी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विरोधी बना दिया गया. दलितों से सम्बंधित संगठनों और कुछ राजनैतिक दलों ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को अपने हथकंडों के रूप में परिभाषित किया और देश भर के तमाम दलितों के बीच सन्देश फैलाया कि उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की मंशा से एससी/एसटी एक्ट को समाप्त कर दिया है. इसके साथ-साथ अब केंद्र सरकार आरक्षण को भी समाप्त करने की योजना बना रही है. इस तरह के कुत्सित प्रचार के चलते दलितों में असंतोष के साथ-साथ आक्रोश भी दिखाई देने लगा और उसकी परिणति दो अप्रैल को हुए भारत बंद के दौरान हिंसा के रूप में सामने आई. इसी हिंसा की प्रतिक्रिया के रूप में सोशल मीडिया को मंच बनाया गया जिसके चलते एक और नेतृत्वविहीन भारत बंद का भय देखने को मिला.


पहले दो अप्रैल को हुए भारत बंद और उसके साथ हुई हिंसा की बात कर ली जाये. आखिर ये दुष्प्रचार किसने किया कि एससी/एसटी एक्ट को समाप्त कर दिया गया है? इस दुष्प्रचार के पीछे किसकी सोच काम कर रही थी कि अगले कदम के रूप में केंद्र सरकार आरक्षण को समाप्त करने जा रही है? यहाँ देश भर के राजनीति का विश्लेषण करने वालों को, सोशल मीडिया पर उछल-कूद करने वालों को, बिना बात किसी भी बात को हवा देने वालों को विचार करना होगा कि वे अपने दुष्प्रचार के द्वारा करना क्या चाहते हैं? केंद्र सरकार क्या करने वाली है, चुनावों के पहले नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा, किसने कौन सा बयान दिया इसे फोटोशॉप करने के बजाय मूल-रूप में सबको बताया जाये. किसी भी बात को कभी नरेन्द्र मोदी का बयान कह कर, किसी भी घटना को कभी केंद्र सरकार का कदम बताकर, किसी भी स्थिति को आगामी आशंका बताकर देश में जिस तरह से अराजकता का माहौल बनाया जा रहा है वह किसी के लिए भी सुखद नहीं है. इस तरह की कुत्सित नीति अपनाने वाले असल में राजनीति नहीं कर रहे हैं वरन देश को रसातल में ले जाने का रास्ता बना रहे हैं. कभी सबके खाते में पंद्रह लाख रुपये आने की बात, कभी पाकिस्तान पर हमला करने की बात, कभी कश्मीर, कभी अयोध्या, ये बातें किसी भी रूप में राजनीति नहीं हैं.

यहाँ समझने वाली बात ये है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध असंतोष व्यक्त किया जा सकता है, उसके खिलाफ आन्दोलन भी किया जा सकता है, उसके निर्णय से असहमति भी बनाई जा सकती है पर ये किस संविधान में लिखा है कि किसी निर्णय के विरोध में सार्वजनिक संपत्ति को आग लगा दी जाए? किस दलित पुरोधा ने संविधान में उल्लेख किया है कि आन्दोलन के दौरान घर की बालकनी में खड़े युवा को गोली मार दी जाए? ये सब सोची-समझी साजिश का हिस्सा है, जिसका शिकार उन दलितों को आसानी से बना लिया गया है जो आज भी आरक्षण का लाभ लेने के इंतजार में हैं. उन दलितों के हाथों में झंडों के साथ-साथ हथियार थमा दिए गए हैं जो एससी/एसटी एक्ट होने के बाद आज भी प्रताड़ित हैं. सीधी सी बात है भारत बंद के दौरान हुई हिंसा का लाभ जिसे मिलना था, उसने पूरी रूपरेखा बनाई और एक सामान्य से निर्णय को इस तरह बढ़ा-चढ़ा कर बताया मानो देश में दलितों पर सिर्फ और सिर्फ अत्याचार ही होना है. ऐसी स्थिति में आकर इन्हीं दलितों को समझना होगा कि उनकी नेता मायावती ने जब इसी एक्ट में संशोधन करके किसी दलित की गवाही को अनिवार्य किया था तब किसी नेता ने, किसी दलित संगठन ने, किसी राजनैतिक दल ने इसे संविधान के साथ खिलवाड़ क्यों नहीं बताया था? तब किसी दलित ने इस एक्ट के समाप्त होने की बात करते हुए मायावती के खिलाफ आन्दोलन क्यों नहीं किया था? सोचने वाली बात है कि तब तो एक व्यक्ति ने ऐसा निर्णय लिया था जबकि अबकी ऐसा निर्णय, ऐसी किसी भी रिपोर्ट पर गिरफ़्तारी से पहले जाँच होगी, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया.

साफ़ सी बात है कि चुनाव सामने दिख रहे हैं और देश के तमाम दल इस समय मुद्दे-विहीन हैं, विषय-विहीन हैं. ऐसे में उनके सामने अस्तित्व का संकट है. इसी संकट से खुद को निकालने के लिए भारत बंद का ऐलान किया गया, उसमें हिंसा की गई और फिर उनके द्वारा ही प्रतिक्रियास्वरूप सवर्ण-पिछड़ा वर्ग का भारत बंद ऐलान करवाया गया. जब तक लोकसभा के चुनाव नहीं हो जाते तब तक भाजपा-विरोधी राजनैतिक दलों, व्यक्तियों द्वारा ऐसे कदमों को झेलना, सहना, देखना आम नागरिक की मजबूरी होगी.

18 मार्च 2018

सोच बदलने को अशालीन होने की जरूरत नहीं


स्तनपान करवाती मॉडल की फोटो अब फिर से चर्चा में है. इस बार उसके चर्चा में आने का कारण उसके समर्थन में उतरी कुछ महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाने और उसकी फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालना रहा है. इन जागरूक महिलाओं ने इस सम्बन्ध में अपने-अपने स्तर के तर्क-कुतर्क गढ़े हैं. किसी पत्रिका के कवर पर मॉडल की स्तनपान करवाती फोटो के विवाद को शांत करने का यही सर्वोत्तम तरीका समझ आया उसके समर्थन में उतरी महिलाओं को. यदि उस पत्रिका के सम्पादक का कथन ही सच मान लिया जाये कि उस चित्र का सन्दर्भ लोगों में सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाती किसी भी महिला के प्रति सकारात्मक सोच बनाना था. ऐसी माँ के इस कृत्य को अश्लील न समझा-माना जाये तो उसके समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान करवाती फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करती महिलाएं क्या वाकई इसी सन्देश का प्रसार-प्रचार कर रही हैं? असलियत में गंभीरता से विचार किया जाये तो इस तरह का प्रदर्शन किसी न किसी रूप में अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता की वकालत करता ही दिखता है.


समाज सभी तरह के लोगों से मिलकर बना होता और उसमें अच्छे, बुरे लोगों का भी समावेश होता है. सकारात्मक तरीके से विचार करने की आवश्यकता बस इतनी है कि आज भी सड़क चलते सभी लोगों को न तो लूटा जा रहा है और न ही सड़क चलते सभी लोग लूटने में लगे हैं. स्पष्ट है कि उसी सड़क पर जहाँ लूटमार करने वाले हैं, लुटने वाले हैं वहीं बहुतायत में ऐसे लोग भी हैं जो शांतिपूर्ण ढंग से अपना काम कर रहे हैं. संभव है कि किसी सार्वजनिक स्थल पर खुलेआम किसी माँ को स्तनपान करवाते देख बहुत से व्यक्तियों की आँखों के, चेहरे के हाव-भाव बदल जाते हों मगर इसके बाद भी ऐसे व्यक्तियों (पुरुषों कह लीजिये) की भी संख्या बहुतायत में है जो ऐसी महिला के प्रति सामान्य भाव रखते होंगे. आज आवश्यकता ऐसी भावना के प्रचार-प्रसार की है. आज जरूरत इसकी नहीं कि सिर्फ भय दिखाकर ही शांति लाने का काम किया जाये. आज आवश्यकता इसकी भी है कि कैसे सुरक्षित भाव दिखाकर लोगों में और सुरक्षा की भावना का विस्तार किया जाये. हाँ, यदि इस तरह के आन्दोलनों, प्रदर्शनों से महिलाओं को अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता चाहिए तो फिर कोई बात ही नहीं है.

ऐसी आशंका महज इस कारण उपजती है कि समाज में बनी दशकों पुरानी अवधारणा को, सोच को बदलने के लिए आक्रामकता की बजाय, सकारात्मकता की बजाय देह-प्रदर्शन जैसी स्थिति, अशालीन स्थिति बना दी जाती है. महिलाओं की माहवारी के सम्बन्ध में सोच बदलने की जरूरत महसूस हुई तो हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन छेड़ दिया गया. विपरीतलिंगियों में प्रेम का आदान-प्रदान का समर्थन करने की बात सामने आई तो किस ऑफ़ लव का आयोजन कर लिया गया. अब स्तनपान को सार्वजनिक स्थलों पर सहजता से लेने की बात की गई तो उसके लिए स्तन-प्रदर्शन की राह चलाई जाने लगी. स्त्री हो या पुरुष इस सन्दर्भ में इतना समझना चाहिए कि यदि देह की परिभाषा को अंगों-उपांगों के आधार पर तय किया जायेगा, उसके आधार पर निर्मित किया जायेगा तो समाज में नग्नता ही देखने को मिलेगी, अश्लीलता ही देखने को मिलेगी. यदि स्त्री की देह के अंगों-उपांगों के प्रदर्शन की आज़ादी उसे प्राप्त है तो बहुत से ऐसे पुरुष हैं जो मात्र ऐसी ही किसी आज़ादी की उंगली पकड़ना चाहते हैं. अंग के बदले अंग का प्रदर्शन समाज को कहाँ ले जायेगा, पता नहीं? अंग के बदले अंग के प्रदर्शन की सोच स्त्री-पुरुष को कहाँ जाकर खड़ा करेगा, पता नहीं? और जिस तरह से प्रत्येक सकारात्मक स्थिति को महज अपने आपको स्थापित करने की भावना से विवादस्पद बनाने की भावना समाज में विकसित होती जा रही है, स्त्री-पुरुष दोनों में बलवती हो रही है उससे आशंका इसकी है कि कहीं किसी दिन दाम्पत्य जीवन के गोपन का प्रस्तुतिकरण सड़क पर न होने लगे. आखिर, सत्य को समाज को आज की भाषा में समझाए जाने की आवश्यकता जो है. गोपन को अगोपन बनाये जाने की आवश्यकता जो है.

24 सितंबर 2017

निम्नतर मानसिकता का विरोध

एक पत्रकार की हत्या होती है और देश भर में एकदम से आक्रोश दिखाई देने लगता है. लोग सड़कों पर उतर आते हैं. चौराहों पर मोमबत्तियाँ जलाई जाने लगती हैं. बड़े-बड़े चैनल, नामधारी पत्रकार संगठित होने लगते हैं, प्रमुख राजनैतिक व्यक्तित्व अपना निर्णय सा सुनाने लगते हैं. बहुतेरे लोग इस हत्या को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताते हैं. कुछ लोगों के लिए यह लोकतंत्र की हत्या कही जाने लगती है. यह सब देख सुनकर लगने लगता है कि क्या देश में वाकई लोकतान्त्रिक व्यवस्था शेष रही भी है या नहीं? इन सबका विलाप सुनकर मन द्रवित हो उठता है और एहसास होने लगता है कि वाकई देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी है ही नहीं. यहाँ बोली का जवाब गोली से दिया जाने लगा है. अभी इस तरह के अनजाने डर से खुद को बाहर निकाल भी न पाए थे कि एक और पत्रकार की हत्या हो जाती है. अबकी मारे जाने वाला पत्रकार अपने पीछे किसी तरह का हंगामा नहीं खड़ा कर पाता है. कोई बड़ा राजनैतिक व्यक्ति उसके समर्थन में आकर बयान नहीं देता है. किसी मीडिया संस्थान की तरफ से कोई प्रदर्शन नहीं किया जाता है. चौराहों पर इकट्ठा होकर नारेबाजी करने, मोमबत्तियाँ जलाने वाले कहीं गायब नजर आते हैं. देश से और न ही विदेश से कोई आवाज़ उठती है कि अब भी देश में बोली का जवाब गोली से दिया जा रहा है. दिमाग भन्ना जाता है कि आखिर हम सब किस युग में जी रहे हैं? क्या हम सबकी इंसानियत महज राजनैतिक विचारधाराओं में ही सिमट कर रह गई है?


मन-मष्तिष्क में उठते अनेक तरह के सवालों के बीच जब दोनों घटनाओं का और अतीत में घटित कई-कई घटनाओं का आकलन करते हैं तो पता चलता है कि विरोध की राजनीति ने, भाजपा-विरोध की राजनीति ने सभी तरह की मानवता का ह्रास कर दिया है. इस विरोध की राजनीति में किसी समय देश की राजनीति का मुख्य केंद्रबिन्दु रहा राजनैतिक दल और उसके तमाम पदाधिकारी हैं. उनका संगठित स्वरूप सिर्फ और सिर्फ भाजपा को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. उनके साथ इस खेल में वे वामपंथी ताकतें भी शामिल हैं जो विगत कई दशकों के बाद भी जनमानस के बीच अपनी स्वीकार्यता नहीं बना सकी हैं. इन विरोधी शक्तियों को और ताकतवर बनाने का काम कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियों द्वारा भी किया जा रहा है. इन सबका आंतरिक उद्देश्य किसी न किसी तरह केंद्र सरकार को, भाजपा को, नरेन्द्र मोदी को बदनाम करना है, उनका विरोध करना है. यदि ऐसा न होता तो गौरी लंकेश हत्या के मामले में चंद मिनट बाद ही आरोप न लगाया जाता कि इस हत्या में हिन्दुवादी ताकतों का, संघ का हाथ है. बिना आगापीछा सोचे तमाम बड़े मीडिया संस्थानों द्वारा, मीडिया के बड़े नामों द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा. देश को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा. यदि इन लोगों को वाकई देश की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था की चिंता होती, यदि इन लोगों को वाकई अभिव्यक्ति की आज़ादी की चिंता होती तो इनके वही विरोधी मुखर स्वर शांतनु चौधरी की हत्या के बाद भी उभरने चाहिए थे. चिंता की बात तो ये रही कि इस युवा पत्रकार की हत्या पर ऐसा कुछ न हुआ. किसी भी गैर भाजपाई राजनैतिक दल की तरफ से, किसी भी मीडिया संस्थान की तरफ से इस युवा पत्रकार की हत्या पर दो शब्द भी नहीं कहे जा सके.

असल में आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस हो या फिर अस्तित्व की खोज में लगी अनेक कथित धर्मनिरपेक्ष शक्तियां हों, सबका एकमात्र उद्देश बजाय अपने को स्थापित करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करना है. इसी के चलते उनके द्वारा अकसर भाषाई संयम खो दिया जाता है. इस भाषाई संयम खोने का उदाहरण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और कभी मंत्री रहे मनीष तिवारी के रूप में देखा जा सकता है. देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का चौथा स्तम्भ मानने वाले पत्रकार भी इस भाषाई संयम को खोने में पीछे नहीं दिखे. ये सारे लोग किसी भी रूप में इस बात को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा केंद्र में सत्तासीन होने के साथ-साथ अनेक राज्यों में अपनी सत्ता जमा चुकी है. वे सब ये भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि जिस नरेन्द्र मोदी के पीछे सभी साजिशन विगत एक-डेढ़ दशक से पड़े हुए थे, उस व्यक्ति को किसी भी मामले में दोषी सिद्ध न कर सके. उनको ये स्वीकार नहीं हो पा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने न केवल निर्विवाद रूप से सत्ता प्राप्त की वरन लगातार अपनी छवि को भी परिष्कृत किया है. जिस तरह की वोट-बैंक की राजनीति विगत कई दशकों से देश की धुरी बनी हुई थी, मोदी ने उसे दरकिनार करते हुए विकासपरक राजनीति को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया. गैर-भाजपाई मानसिकता वाले दलों, व्यक्तियों, मीडिया संस्थाओं के लिए ये स्वीकार कर पाना अत्यंत दुष्कर होता जा रहा है कि देश के आम जनमानस ने प्रधानमंत्री की अनेक योजनाओं में न केवल उनका समर्थन किया वरन एकाधिक बार उन कठिन परिस्थितियों में भी उनका समर्थन किया जबकि लगने लगा था कि जनमानस विरोध करेगा.


देश के सामने कांग्रेस अथवा अन्य दूसरे दल अपनी मानसिकता के चलते, हिन्दू-विरोधी रवैये के कारण विश्वास जगा नहीं सके. इसी के साथ-साथ समय-समय पर उनके द्वारा उठाये गए पूर्वाग्रही कदमों ने भी जनमानस के मन-मष्तिष्क से इन दलों के प्रति, व्यक्तियों के प्रति विरोधी वातावरण तैयार किया. इस वातावरण को और पुख्ता करने का काम इन्हीं दलों, व्यक्तियों ने समय-समय पर किया. अशालीन, अशिष्ट बयानबाज़ी के चलते भी ये लोग अनजाने ही नरेन्द्र मोदी के पक्ष में, भाजपा के पक्ष में माहौल बनाते नजर आये. कुछ ऐसा ही अब रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में दिख रहा है. समझने वाली बात है कि आखिर किसी देश से उनको क्यों भगाया जा रहा है? उनके उस सम्बंधित देश से भागने या भगाए जाने का कारण क्या है? उनको देश में शरण देने के क्या औचित्य हैं? बिना सोचे-समझे सिर्फ मुसलमान होने के नाते रोहिंग्या लोग देश में शरणार्थी नहीं बनाये जाने चाहिए. एक सवाल उनका समर्थन करने वालों से कि आखिर यदि उनके प्रति मानवाधिकार का मुद्दा नजर आ रहा है, संवेदना दिखाई दे रही है तो ऐसा कुछ कश्मीरी हिन्दुओं के पलायन करते समय क्यों नहीं दिखा? तब न सही तो अब क्यों नहीं दिख रहा है? आखिर वे तो किसी दूसरे देश के नहीं, इसी देश के नागरिक हैं, जिस देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सही करने का स्वयंभू ठेका ये राजनेता, मीडिया संस्थान लेते नजर आते हैं. 

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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, 23 सितम्बर 2017 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है.

19 नवंबर 2016

सुखद माहौल की आस जगी

दिशाहीन राजनीति को दिशा मिलने की सम्भावना नजर आती दिख रही है, केंद्र सरकार के नोटबंदी के निर्णय से. संभव है कि जो लोग नोटबंदी फैसले के विरोध में हैं वे इससे इत्तेफाक न रखें. इसके लिए थोड़ा पीछे जाकर देखने की आवश्यकता है. विगत एक-दो दशक की राजनीति में जिस तरह से माफियाओं का, धनबल का, बाहुबल का, अपराधियों का प्रवेश हुआ है उससे आम जनमानस के मन से राजनीति के लिए सम्मान भाव समाप्त सा हो गया था. लोगों के मन में एक विचार गहरे से पैठ गया था कि राजनीति निकृष्ट कोटि का काम हो गया है. राजनीति को न जाने कितने अपमानजनक विशेषणों से नवाजा जाने लगा था. जनता की इस नकारात्मकता का प्रभाव राजनीतिज्ञों पर भी हुआ. राजनीति के अपराधीकरण और अपराधियों के राजनीतिकरण ने अच्छे-बुरे का भेद समाप्त कर दिया. राजनीति में सक्रिय भले लोगों की पहचान धीरे-धीरे संकट में पड़ने लगी. यहाँ पूरी तरह से धनबल, बाहुबल का वर्चस्व दिखाई देने लगा. भू-माफिया, बालू-माफिया, अपराधी आदि जबरदस्त तरीके से सक्रिय होकर पैसे के दम पर शासन-प्रशासन-जनता को अपने पैरों की जूती समझने लगे. 



राजनीति से विमुख होती पीढ़ी के बीच राजनीति में आने की इच्छुक पीढ़ी भी दिखाई दी. ये किसी भी तरह का सुखद संकेत करती नजर नहीं आई वरन इस पीढ़ी के मन में भी जल्द से जल्द अधिकाधिक धन पैदा करने, अकूत संपत्ति बनाने, बड़ी-बड़ी, मंहगी गाड़ियों का काफिला रखने की लालसा दिखाई देने लगी. ऐसी विभ्रम की स्थिति के बीच, निराशा के दौर में एक आशा की किरण उस समय जागती दिखी जबकि देश की राजधानी में अन्ना आन्दोलन की शुरुआत हुई. समूचे देश से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनमानस उठ खड़ा हुआ. लोगों की जागरूकता देखकर लगा कि जिस जनमानस के मन में भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति नैराश्य भाव जाग चुका था वही जनमानस इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आया है. लगा कि अभी देश में सकारात्मकता की लौ बुझी नहीं है. इसी ज़ज्बे का, जनमानस की इसी भावना का लाभ उठाते हुए अन्ना आन्दोलन के एक सदस्य ने राजनीति में पदार्पण किया. सत्ता नहीं, व्यवस्था बदलने आये हैं कि जयघोष के साथ उनके द्वारा मुख्यमंत्री पद धारण किया गया. भ्रष्टाचार से जूझती जनता को, जनलोकपाल बिल के लिए संघर्ष कर रहे जनमानस को, राजनीति में सुधार के अवसर तलाशती युवा पीढ़ी को लगा कि अब सही अवसर आया है. अच्छा-अच्छा विचार करते जनमानस को एकाएक उस समय झटका सा लगा जबकि व्यवस्था परिवर्तन करने वाले भी उसी रंग में रंगे दिखाई दिए जिसमें बहुतायत राजनीतिज्ञ रंगे हुए लग रहे थे. सत्ता मिलते ही अचानक विरोधियों के खिलाफ सबूत गायब हो गए. सत्ता पाते ही उनके साथ के लोग भ्रष्टाचार में लिप्त मिलने लगे. अपराधीमुक्त राजनीति देने का दावा करने वालों के साथी अपराधी नजर आने लगे. ये परिदृश्य उन लोगों के लिए अत्यंत कष्टकारी लगा जो वास्तविक रूप से जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे थे. ये स्थिति उनके लिए असहज हो गई जो राजनीति में सुधारवादी दृष्टिकोण से लगातार काम कर रहे थे. वे सब अपने को ठगा सा महसूस करने लगे.


किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति में ऐसे लोग हतप्रभ दिखाई दे रहे थे. उनके सामने कोई रास्ता नहीं बचा समझ आ रहा था. स्वच्छ राजनीति की बात करने वाले खुद अस्वच्छता में लिप्त दिखे. भ्रष्टाचारमुक्त राजनीति करने वाले भ्रष्टाचार के पोषक दिखे. जनलोकपाल बिल की वकालत करने वाले उसे भूलते दिखे. इस विषम स्थिति में जनमानस में हताशा, निराशा का माहौल पनपने लगा. वे ताकतें जो राजनीति को अपराध का, भ्रष्टाचार का, माफियागीरी का अड्डा मान रही थी, और तेजी से अपना विस्तार करने लगी. अवैध संपत्ति पैदा करना, संपत्ति पर कब्ज़ा, जाली मुद्रा का प्रसार, नशे के कारोबार का बढ़ना, रिश्वतखोरी को सामान्य शिष्टाचार बना देना आदि-आदि इनके प्रमुख कार्य हो गए. हताश जनमानस और भी निराशा के गर्त में चला गया. राजनीति में स्वच्छता की बात करना उसे कपोलकल्पना लगने लगा. ईमानदार और स्वच्छ छवि वालों की राजनीति में कोई जगह नहीं दिख रही थी. ऐसे माहौल में जबकि आम जनमानस का राजनीति से, राजनीतिज्ञों से, सत्ता के शीर्ष से विश्वास उठता जा रहा था तब केंद्र सरकार का नोटबंदी का कठोर फैसला नरम झोंके के समान नजर आया है. इस कदम से देश की व्यवस्था में, राजनीति में भले ही बहुत अधिक सकारात्मक प्रभाव न दिखाई दे किन्तु सामान्य रूप में एक सन्देश उनके खिलाफ अवश्य गया है जो सिर्फ धन को ही ज़िन्दगी का अंतिम सत्य मान बैठे थे. उनके खिलाफ एक कड़ा सन्देश गया है जो धनबल, बाहुबल से राजनीति को अपनी रखैल की तरह बना बैठे थे. ये फैसला उन लोगों को प्रोत्साहित करेगा जो राजनैतिक सुधार के लिए लगातार संकल्पित हैं. वे अब लोगों को समझा सकते हैं कि सत्ता का शीर्ष यदि चाहे तो परिस्थितियों से लड़ा जा सकता है. ये फैसला उन लोगों के अन्दर से नैराश्यबोध दूर कर सकता है जो मान बैठे थे कि राजनीति में सुधार संभव नहीं, राजनीतिज्ञों के वश का कुछ नहीं. यद्यपि नोटबंदी के फैसले से आम जनमानस को कतिपय कष्ट हुआ है, क्षणिक परेशानी का अनुभव हो रहा है तथापि इससे उसी को दीर्घकालिक लाभ मिलने वाला है. यदि राजनीति के प्रति, राजनीतिज्ञों के प्रति, शीर्ष सत्ता के प्रति जरा सा भी सकारात्मक वातावरण बनता है तो वह देश के विकास के लिए, देश की राजनीति के लिए, देश के नागरिकों के लिए ही लाभप्रद होगा.

09 अगस्त 2016

इरोम के मौन संघर्ष की समाप्ति और सवाल

सोलह वर्ष से चला आ रहा अनशन आज समाप्त करने की घोषणा मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने की. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (AFSPA-अफस्पा)को ख़तम करने के लिए शुरू किया गया उनका अनशन संभव है कि युवा भावुकता के साथ आरम्भ हुआ हो किन्तु उसका एकाएक समापन भावुकता के कारण नहीं हुआ है. AFSPA-अफस्पा वह विशेष कानून है जो पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न हिस्सों में लागू है. इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को किसी को भी देखते ही गोली मारने या बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार है. शर्मिला इसके खिलाफ इम्फाल के जस्ट पीस फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़कर भूख हड़ताल कर रही हैं. मणिपुर के ईटानगर के एक कस्बे में नवम्बर 2000 में सैनिकों की गोलीबारी में 10 नागरिक मारे गए थे. उनमें से कोई भी इरोम का दोस्त या रिश्तेदार नहीं था किन्तु इरोम इससे बहुत विचलित हुई. इस एक घटना के परिणामस्वरूप अट्ठाईस वर्षीय लड़की ने अनशन करने का मन बनाया. इरोम ने इसके लिए किसी से चर्चा नहीं की, अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार, संगठन आदि को भी नहीं बताया. अपनी माँ के पास आकर उनका आशीर्वाद लिया और अपना अनशन शुरू कर दिया. परिवार वालों को बाद में पता चला कि इरोम ने AFSPA-अफस्पा हटाने के लिए भूख हड़ताल करने का फ़ैसला लिया है.

इरोम शर्मिला 
उस समय मालोम गाँव, जहाँ उक्त घटना घटित हुई थी, के लोग भी नहीं चाहते थे कि इरोम वहाँ भूख हड़ताल करें. उन्हें डर था कि इस कारण ग्रामवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. धारे-धीरे लोग इरोम के समर्थन में जुटने लगे. शुरूआती दौर में इसे युवा जोश मानकर शासन-प्रशासन द्वारा बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया. बाद में भूख हड़ताल लंबी खिचने पर इरोम पर आत्महत्या करने का आरोप लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद से उनको लगातार हिरासत में ही रखा गया. न्यायालय में उनसे अनशन समाप्त करने के बारे में पूछा जाता और उनका जवाब हर बार न में होता. सरकार ने शर्मिला को आत्महत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया था और ऐसी गिरफ्तारी एक साल से अधिक नहीं हो सकती अतः हर साल उन्हें रिहा करते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता था. नाक से लगी एक नली के द्वारा उनको भोजन दिया जाता. बार-बार गिरफ़्तारी और नली के सहारे भोजन देने की प्रक्रिया के चलते एक सरकारी अस्पताल के एक कमरे को अस्थायी जेल बना दिया गया था. यद्यपि इरोम को 20 अगस्त 2014 को सेशन कोर्ट के आदेश से रिहा कर दिया गया किन्तु मणिपुर की राजधानी इंफाल के लगभग बीचों-बीच बना यही अस्पताल एक दशक से भी ज़्यादा समय से इरोम शर्मिला का घर रहा है. इन सोलह वर्षों में इरोम ने एक तरह की तपस्या सी की. उन्हें हर पन्द्रह दिन पर इंफाल के जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज से कोर्ट ले जाया जाता रहा. उनकी गाड़ी उनके असली घर के सामने से गुज़रती. किन्तु इरोम ने अपनी माँ से लिए प्रण के चलते उनसे या अपने परिजनों से मिलने की कोशिश नहीं की. बाकी बाहरी लोगों को उनसे मिलने की अनुमति भी नहीं थी. विशेष परिस्थितियों में, विशेष अनुमति के बाद कुछ लोगों को उनसे मिलवाया गया. सोलह वर्षों से अस्पताल ही उनकी दुनिया रहा है. इन सालों में उनकी जीभ ने किसी खाद्य-पदार्थ का स्वाद नहीं चखा. इस दौरान उनका ब्रश करना रुई के सहारे रहा ताकि और बिना पानी गलती से उनके होठों को न छू जाए.


इस विषम स्थिति के बाद, सोलह वर्षों से नाक की नली से दिए जाते भोजन के सहारे जिन्दा इरोम का अनशन समाप्त करने का फैसला उतना ही चौंकाने वाला रहा जितना कि अनशन शुरू करने वाला था. अनशन समाप्त करना, अपने ब्रिटिश प्रेमी-सहयोगी से विवाह करने तथा चुनाव लड़ने की घोषणा से लगता है कि उनके अनशन का आरम्भ भले ही युवा भावुकता हो किन्तु उसका समापन भावुकता की परिणति कदापि नहीं है. मीडिया में उनके अनशन समाप्ति को, उनके द्वारा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में उतरने को क्रांतिकारी कदम बताया जा रहा है. सम्भावना जताई जा रही है कि इरोम के लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के बाद उनके संघर्ष को धार मिलेगी. माना जा रहा है कि राजनीति में बढ़ते जा रहे अँधियारे के बीच इरोम जैसे संघर्षशील लोग रौशनी का कार्य कर सकते हैं. और भी कई-कई सम्भावनाओं पर विचार किया जा रहा है. अनेकानेक भावी क़दमों की अपेक्षा की जा रही है. जिस समय इरोम ने अनशन शुरू किया था, उस समय भी किसी ने उसका भविष्य नहीं जाना था. अब जबकि उनका अनशन समाप्त हो चुका है कोई नहीं कह सकता कि भविष्य क्या होगा. सम्भावनाओं, अपेक्षाओं के बीच जो मूल बिन्दु सामने आता है वो यह कि आखिर इतने लम्बे संघर्ष के बाद हासिल क्या हुआ? जिस AFSPA-अफस्पा के लिए उनका अनशन चल रहा था उसमें किंचित मात्र भी संशोधन नहीं किया गया. ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सोलह वर्षों के अपने संघर्ष के बाद भी किसी तरह का परिणाम न आते देख इरोम अन्दर से टूटने लगी हों? अपना अनशन उनको निरर्थक समझ आने लगा हो? समाज में रहने के बाद भी सामाजिक स्थितियों से दूर रखी गई इरोम के भीतर नैराश्य न जन्मने लगा हो? युवा आँखों के सपनों के असमय मरने का डर पैदा न हो गया हो? अनशन समाप्ति की घोषणा के साथ ही साथ विवाह करने और चुनाव लड़ने की घोषणा ऐसे सवालों को जन्म देती ही है. बहरहाल अंतिम सत्य क्या है इसे सिर्फ इरोम ही जानती है, वही बता सकती है. इरोम का अनशन समाप्त करना यदि सवालों को जन्म देता है तो इतनी लम्बी समयावधि में सरकारों की चुप्पी भी अनेक सवालों को जन्म देती है. क्या शांतिपूर्ण चलने वाले अनशन का कोई महत्त्व नहीं? क्या अकेले व्यक्ति का संघर्ष सकारात्मक परिणाम लाने के लिए सरकार को मजबूर नहीं कर सकता? AFSPA-अफस्पा समाप्त करना सरकारों को भले ही तर्कसंगत न लगता हो किन्तु सोलह वर्षों के संघर्ष को नजरअंदाज करना क्या तर्कसंगत है?
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(चित्र गूगल  छवियों से साभार लिया गया है) 

30 जनवरी 2016

धार्मिक समानता का नाटक


एक बार फिर स्त्री और मंदिर विवादों के केन्द्र में है. अबकी शनि देव पर तेल चढ़ाने को लेकर बवाल मचा हुआ है. ये समझ से परे है कि आखिर ऐसी जागरूक महिलाएँ धर्म के नाम पर ऐसी आज़ादी की माँग किसके लिए और क्यों कर रही हैं? एक तरफ यही जागरूक और प्रगतिशील महिलाएँ धर्म को महिलाओं के लिए बंधन, उनको गुलाम बनाने वाला बताती हैं और दूसरी तरफ यही महिलाएँ सड़कों पर आन्दोलन करने में लगी हुई हैं. समूचे परिदृश्य को देखकर बहुत कुछ स्पष्ट होता है कि ऐसी महिलाओं का उद्देश्य समाज की अन्य स्त्रियों को शनिदेव की पूजा करने, उन पर तेल चढ़ाने की आज़ादी दिलवाना नहीं है वरन किसी न किसी रूप में अपने आपको मीडिया में स्थापित किये रहना ही है. यही वे महिलाएं हैं जो कुछ समय पूर्व किस ऑफ़ लव का आन्दोलन छेड़े हुए थीं, फिर उसके बाद यही महिलाएं हैप्पी टू ब्लीड के समर्थन में उतरी और अब धर्म के नाम पर झंडा उठाये घूम रही हैं.
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सड़क पर आंदोलित इन महिलाओं के हिसाब से औरत को पूरी आज़ादी चाहिए है. सच भी है, किसी भी इन्सान को महज इस कारण आज़ादी से वंचित नहीं किया जा सकता है कि वो स्त्री है अथवा पुरुष है. यदि महिलाओं की वास्तविक आज़ादी शनिदेव को तेल चढ़ाने से ही होती है तो फिर धार्मिकता के नाम पर महिलाओं को गुलाम बनाये जाने का आरोप इस समाज पर क्यों गढ़ा जाता है? दरअसल ये विरोध न तो धर्म के लिए है, न महिलाओं की आज़ादी के लिए है वरन ये विरोध केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध है, हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है. यहाँ एक बात विशेष रूप से समझने वाली है कि जिन महिलाओं द्वारा समाज में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था की माँग की जाती हो, ट्रेन में अलग महिला कोच की माँग की जाती हो, स्कूल, बैंक, बाज़ार आदि की अलग माँग रखी जाती हो वे धर्म के नाम पर ही समानता क्यों चाहती हैं? समानता की माँग के बाद भी देह की विशिष्टता को बनाये रखकर ऐसी प्रगतिशेल महिलाएं खुद को ही आरोपी बना रही हैं, अपने आन्दोलन को, अपनी माँग को कटघरे में खड़ा कर रही हैं.
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देह को विशिष्ट बनाकर उसको भेदभाव का अंग बनाकर पुरुषों को आरोपी बना देना सहज है और फिर इसी के उलट समानता की बात करना एक तरह का छद्म दिखाता है. परीक्षाओं के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा किसी छात्रा की तलाशी महज उसके स्त्री होने के कारण नहीं हो सकती; सड़क चलते किसी स्त्री की देह का अनायास स्पर्श हो जाना भी पुरुष को बलात्कारी बना देता है; राह चलते किसी स्त्री को देख लेना भी कानूनी जुर्म हो गया है, तब समानता के लिए एकमात्र स्थान मंदिर ही बचता है. ऐसी जागरूक महिलाओं को धर्म के साथ-साथ अन्य स्थानों पर जागरूकता, समानता लाने का काम करना चाहिए. ऐसा नहीं कि महिलाओं का प्रवेश मंदिर में नहीं होना चाहिए; ऐसा भी नहीं कि महिलाओं द्वारा किसी देव विशेष के पूजन कर लेने से समाज में प्रलय आ जाएगी किन्तु महज प्रचार की, आत्ममुग्धता की दृष्टि से किये ऐसा जाने की मंशा को अवश्य निषेध किया जाना चाहिए. एक तरफ मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलित होना दूसरी तरफ विरोध के लिए खुद को दैहिक रूप से स्वतंत्र बना देना कहीं न कहीं आंदोलनरत महिलाओं के दोहरेपन के रवैये को रेखांकित करता है.
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समाज में किसी भी गलत कार्य का विरोध होना चाहिए, किसी भी अमान्य स्थिति के विरोध में आन्दोलन होना चाहिए मगर महज विरोध की राजनीति के लिए विरोध नितांत भ्रम की स्थिति है, सर्वथा गलत है. इन्हीं जागरूक महिलाओं द्वारा उन महिलाओं के पक्ष में अभियान क्यों नहीं छेड़ा जाता जो आज भी खुले में शौच को मजबूर हैं; जो असमय अपनी शिक्षा को छोड़ दिए जाने को बाध्य कर दी जाती हैं; जो कम उम्र में कई-कई बच्चों की माँ बना दी जाती हैं; जो आज भी दहेज़ के नाम पर आये दिन प्रताड़ित की जा रही हैं; जो आज भी कार्यक्षेत्रों में अपने सहकर्मियों द्वारा शोषित की जा रही हैं; जो आज भी लोकतान्त्रिक रूप से प्रतिनिधि बनने के बाद भी पारिवारिक पुरुषों की गुलाम बनी हुई हैं; जो समान कार्य करने के बाद भी पुरुषों के समान अवसरों से वंचित रह जा रही हैं.

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04 जून 2015

हानिकारक खाद्य पदार्थों का विरोध हो, राजनीति न हो


बच्चों के लिए ‘बस दो मिनट’ में तैयार होने वाली मैगी संकट की स्थिति में दिख रही है. मनमाफिक घरेलू पकवानों, नाश्ते की स्वादिष्ट परम्परा को समाप्त करके मैगी विगत कई वर्षों से माताओं के लिए वरदान साबित हो रही थी. किसी भी समय नाश्ते में, भोजन में. छुट्टियों में, सुबह में, शाम में, दिन में, रात में ‘कुछ भी’ बनाकर खिलाने की बचपन की जिद का समाधान मैगी ने माताओं के हाथ में थमा दिया था. मैगी और अन्य जंक फ़ूड पारंपरिक नाश्ते पर, खाद्य पदार्थ पर भारी सिद्ध हो रहे थे. भागदौड़ भरी जिंदगी में, आपाधापी के माहौल में, शारीरिक मेहनत से बचने की कवायद में कब इन खाद्य पदार्थों ने रसोई पर कब्ज़ा कर लिया, कब हमारी मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया हमें पता ही नहीं चल सका. समय के साथ इन खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ता ही जा रहा है. घर हो, रेस्टोरेंट हो, होटल हो, बच्चों की पार्टी हो, वैवाहिक कार्यक्रम हो अथवा किसी भी तरह का कोई भी आयोजन सभी में ऐसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सहजता से मिलती है. ये जानते-समझते हुए भी कि ये खाद्य पदार्थ कहीं न कहीं हमारी जीवनशैली को, हमारे शरीर को, हमारी सोच को, हमारे बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं, इनका प्रयोग कम नहीं हुआ. रसोई को थकाऊ, उबाऊ प्रक्रिया मानने, अभिभावकों के नौकरीपेशा होने ने, जीवनशैली के अनियमित होने ने भी इन खाद्य पदार्थों को स्वीकार्यता प्रदान करवा दी. माता-पिता की मजबूरी का फायदा उठाते हुए मैगी जैसे अन्य खाद्य पदार्थों ने बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी अपना दीवाना बना दिया. इस दीवानगी का खामियाजा कहीं न कहीं अपने शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के चलते भुगतना पड़ रहा है.
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ऐसे खाद्य पदार्थों के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति अकेले हम ही चिंतित नहीं दिख रहे हैं वरन वैश्विक रूप से अनेक देश इसके प्रति चिंतित नज़र आ रहे हैं. कुछ वर्ष पहले अमेरिका, चीन सहित अनेक यूरोपीय देशों ने इन जंक फ़ूड को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी, बच्चों के शारीरिक परिवर्तनों का अध्ययन करते हुए उनके प्रतिकूल व्यवहार को सामने रखा था. अब जबकि हमारे देश में मैगी में खतरनाक तत्त्व मिलने की पुष्टि हुई है, कई-कई राज्यों में मैगी अपने परीक्षण में असफल हुई है, इससे भी इसके हानिकारक होने की पुष्टि हुई है. ऐसा नहीं है कि अकेले मैगी ही हानिकारक है और अन्य दूसरे खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ आदि सुरक्षित हैं. ये समझने वाली बात है कि जब किसी खाद्य पदार्थ को उसकी प्राकृतिक अवस्था से इतर कई-कई माह के लिए सुरक्षित रखा जाना हो तो उसको किसी न किसी रासायनिक पदार्थ के द्वारा संरक्षित करना पड़ेगा. जाहिर सी बात है कि ये रासायनिक पदार्थ भले ही खाद्य पदार्थों को, पेय पदार्थों को देखने में, स्वाद में भले ही ताजा बनाये रखते हों किन्तु इनके प्राकृतिक तत्त्वों को नष्ट करके कहीं का कहीं मानव शरीर के लिए हानिकारक बना देते हैं. स्पष्ट है कि भले ही ऐसे पदार्थ अपना दुष्प्रभाव तात्कालिक रूप में न दिखाते हों किन्तु इनके दुष्प्रभाव दीर्घकालिक अवश्य ही रहता है.
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अब जबकि किसी भी तरह से मैगी पर कार्यवाही के चलते ऐसे खाद्य पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है तो बजाय इसका स्वागत किये जाने के दबे-छिपे स्वर में इसका विरोध किया जा रहा है. इसको भी राजनैतिक रंग दिए जाने की कोशिश की जाने लगी है. मैगी का भले ही खुलेआम समर्थन न किया जा रहा हो किन्तु अनेक अभिभावकों द्वारा अन्य दूसरे पदार्थों पर अंकुश लगाये जाने की वकालत किया जाना अप्रत्यक्ष रूप से मैगी का समर्थन ही कहा जायेगा. ऐसे मौके पर होना ये चाहिए कि समवेत रूप से ऐसे सभी पदार्थों का विरोध किया जाना चाहिए जो बचपन के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं, बच्चों के भविष्य को खोखला बनाने में लगे हैं. समझना होगा कि ऐसे पदार्थों के सेवन से ही बच्चों में आक्रमकता जन्म ले रही है, समय से पूर्व उनके हारमोंस विकसित होने की खबर भी आई है, मोटापा, अनिद्रा, अवसाद जैसी अनेक स्थितियों ने भी जन्म लिया है. हम सभी को अपने लिए नहीं वरन अपने बच्चों के लिए मैगी के विरुद्ध चलने वाली प्रक्रिया में सहयोग करें. मैगी पर ही ऐसी आफत क्यों आई, मैगी अकेले पर प्रतिबन्ध क्यों, अन्य नशे वाले पदार्थों पर रोक क्यों नहीं आदि-आदि कहकर मैगी का अप्रत्यक्ष सहयोग न करें. ये हम सभी कहीं न कहीं स्वीकारते ही हैं कि ये पदार्थ शरीर पर दुष्प्रभाव डालते हैं तो महज दो मिनट की सुविधा के लिए अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ न हम करें न किसी और को करने दें. एक मैगी के सहारे अन्य दूसरे दूषित, हानिकारक पदार्थों का भी विरोध करें. आइये इसके लिए बिना राजनीति किये एकजुट हो जाएँ.

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