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18 जनवरी 2026

भेदभाव उन्मूलन में दूसरे संग भेदभाव न हो

उच्च शिक्षा के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय की भावना के प्रति सकारात्मकता पैदा करने का कार्य करने के साथ-साथ इंसानों में संवेदनशीलता, मानवीयता गुणों का विकास किया जाता है. इसी उद्देश्य को लेकर ही देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की स्थापना की गई थी. अपनी स्थापना से लेकर अद्यतन यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों लोकतांत्रिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आधारशिला निर्मित करने का प्रयास किया जाता रहा है. आयोग द्वारा इसी 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए समता के संवर्द्धन हेतु विनिमय 2026 को अधिसूचित कर दिया गया. ये विनियम 2012 से लागू भेदभाव-रोधी नियमों का अद्यतन रूप है. यूजीसी द्वारा यह अद्यतन रूप भी अचानक से लागू नहीं कर दिया गया. इसका प्रारूप फरवरी 2025 में जारी हुआ था. लगभग 11 महीने की प्रक्रिया, जिसमें नागरिकों की सहमति, असहमति संसदीय समिति के विचार आदि के बाद इसे अंतिम रूप दिया गया.

 



इस अधिनियम के लक्ष्य में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना. यदि इस उद्देश्य पर विचार किया जाये तो यह किसी एक वर्ग के प्रति भेदभाव जैसी स्थिति नहीं दिखाता है. इसके बाद भी इसे सामान्य वर्ग के विरुद्ध बताया जा रहा है, जिसके चलते देशभर में यह बिल चर्चा के केन्द्र में है. चर्चा के दौरान जो बात उभर कर सामने आई है वो दर्शाती है कि अधिनियम में जिस तरह के प्रावधान किये गए हैं उसके अनुसार इस विचार को मजबूती मिलती है कि सामान्य वर्ग के लोग भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते बल्कि वे सिर्फ भेदभाव ही कर सकते हैं. इस सोच के पीछे वे तमाम अधिनियम हैं जिनका दुरूपयोग करके सामान्य वर्ग को परेशान किया जाता रहा है.

 



यह पूर्णतः सत्य है कि किसी भी समाज में, संस्था में किसी भी तरह के भेदभाव का स्थान नहीं होना चाहिए और इससे भी किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि समाज से भेदभाव कम करने के प्रयास ज्यादा से ज्यादा होने चाहिए. इस सन्दर्भ में आयोग द्वारा जारी अधिसूचना को भी समझना आवश्यक हो जाता है. अधिनियम के बिन्दु 3 के अन्तर्गत विभिन्न सन्दर्भों को परिभाषित किया गया है, जिसमें 3ख में पीड़ित का सन्दर्भ ऐसे व्यक्ति से लगाया गया है जिसके पास इन विनियमों के अंतर्गत शिकायतों से सम्बंधित या जुड़े मामलों में कोई शिकायत है. इसमें भी जातिगत उल्लेख नहीं है अर्थात पीड़ित व्यक्ति किसी भी वर्ग का हो सकता है. इसके अतिरिक्त 3थ में हितधारक का अर्थ स्पष्ट किया गया है कि इसमें छात्र, संकाय सदस्यों, कर्मचारी और प्रबंध समिति के सदस्य, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थान का प्रमुख भी शामिल है. एक बिन्दु 3ग अवश्य ऐसा है जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव को परिभाषित करता है. इस सम्बन्ध में शिकायत मिलने पर 24 घंटे में प्राथमिक कार्रवाई करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट देनी होगी. आरोपी विद्यार्थी पर संस्थागत अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में पहले उसे चेतावनी दी जाएगी, इसके पश्चात् जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गम्भीर मामलों में विद्यार्थी को शिक्षण संस्थान से निष्कासित भी किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त सामान्य भेदभाव में नस्ल, लिंग, धर्म, दिव्यांगता, जन्म-स्थान आदि को शामिल किया गया है. सामान्य वर्ग का व्यक्ति इस आधार पर अपने साथ होने वाले भेदभाव की शिकायत कर सकता है.

 



अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने की दृष्टि से प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समान अवसर केन्द्र की स्थापना करनी होगी. इसका कार्य वंचित समूहों के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर नजर रखना; शैक्षणिक, वित्तीय, सामाजिक एवं अन्य मामलों में मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रदान करना; तथा परिसर में सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहित करना होगा. प्रत्येक समान अवसर केन्द्र एक समता समिति के माध्यम से कार्य करेगा. यदि इस अधिनियम में बिन्दु 3ग के अलावा बिन्दु 7 खटकता है, जो कहता है कि समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह बिन्दु भी इनके होने की अनिवार्यता की बात नहीं करता है. इस अधिनियम का दुर्भाग्यपूर्ण बिन्दु यह माना जाना चाहिए कि झूठी शिकायत मिलने पर सम्बंधित व्यक्ति के लिए किसी भी तरह की सजा, जुर्माना अथवा कार्यवाही का प्रावधान नहीं किया गया है. यद्यपि मसौदा नियमों में इसका प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को हतोत्साहित किया जाए और इसके लिए जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया था तथापि अंतिम अधिसूचित नियमों में यूजीसी ने इस प्रावधान को हटा दिया और अन्य पिछड़ा वर्ग को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में शामिल कर लिया. इस कारण यूजीसी का वर्तमान अधिनियम न केवल बेहद सख्त हो जाता है बल्कि अन्यायपूर्ण भी समझ आने लगता है.

 




अतः आवश्यकता इस बात की है कि इस अधिनियम पर जल्दबाजी अथवा उतावलेपन में विरोध के बजाय व्यापक विमर्श, पारदर्शिता और हितधारकों से संवाद के साथ इसका स्वरूप निर्धारित किया जाए. शिक्षा सुधार का लक्ष्य जाति-आधारित भेदभाव नहीं बल्कि स्वतंत्र, समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. यूजीसी को भी जनमानस के विचारों का सम्मान करते हुए इस पर पुनर्विचार करना चाहिए. यह न केवल वर्तमान समय की माँग है बल्कि देश के शैक्षणिक भविष्य के लिए आवश्यक भी है. ध्यान रखना चाहिए कि एक वर्ग के साथ सम्भावित भेदभाव को दूर करने के प्रयास में दूसरा वर्ग भेदभाव का शिकार न हो जाये.

 


14 दिसंबर 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लेकर गम्भीरता नहीं

नई शिक्षा नीति 2020 (NEP) के लागू होने के साथ ही महाविद्यालय में क्रियान्वयन समिति के प्रभारी का दायित्व मिला था. तत्कालीन प्राचार्य डॉ. ए.के. सक्सेना जी द्वारा सदस्यों के चयन और नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन हेतु यथोचित कदम अपनाए जाने हेतु पूरी स्वतंत्रता प्रदान की गई थी. उस समय NEP का पूरी समिति द्वारा पर्याप्त अध्ययन किया गया. महाविद्यालय स्तर पर उसके क्रियान्वयन, पाठ्यक्रम सम्बन्धी बदलाव, परीक्षा सम्बन्धी प्रक्रिया आदि पर पूरी समिति द्वारा गहन मंत्रणा, विचार-विमर्श के आधार पर समझ आया कि एक अच्छी शिक्षा नीति विद्यार्थियों के लिए व्यावहारिक रूप में सामने आई है.

 



विगत चार वर्षों की शासन-प्रशासन की कार्य-शैली, प्रणाली को देखकर लग रहा है कि ऐसी नीति को वास्तविक रूप प्रदान करने लायक वातावरण अभी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में नहीं है. न केवल विश्वविद्यालय स्तर से बल्कि महाविद्यालय स्तर से भी किसी भी तरह की गम्भीरता नहीं दिखाई जा रही है. विद्यार्थियों के प्रवेश, पाठ्यक्रम, माइनर विषय, मिड टर्म परीक्षा, सेमेस्टर परीक्षा आदि को लेकर किसी भी तरह का सकारात्मक माहौल नहीं है. एक अच्छी, सकारात्मक शिक्षा नीति की दुर्दशा होते हुए अपने क्षेत्र में देखी जा रही है, देखने की विवशता भी है. उच्चाधिकारियों को कई बार लिखा भी है, सुझाव भी दिए हैं, कमियों से परिचित करवाया है मगर सिवाय अनदेखी के, आलोचना के, दोषारोपण के कुछ नहीं मिला है.

 

विषम सेमेस्टर के प्रवेश, परीक्षा को लेकर खिलवाड़ जारी है.

 


18 फ़रवरी 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ खिलवाड़

बँधी-बँधाई लकीर पीटने वाले, मूढ़ बुद्धि वाले, ख़ुद को एकमात्र ज्ञानवान समझने वाले यदि किसी भी नीति, योजना आदि को क्रियान्वित करने वाले हों तो किसी भी अच्छी से अच्छी नीति, योजना का बंटाधार होना निश्चित है. कुछ ऐसा ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ हो रहा है.


बाक़ी जगहों की बहुत ज़्यादा व्यावहारिक जानकारी नहीं मगर बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी में ऐसा ही हो रहा है. आये दिन एनईपी 2020 से सम्बन्धित आने वाले आदेशों, नियमों, दिशा-निर्देशों में किसी भी रूप में स्पष्टता देखने को नहीं मिलती. व्यावहारिक रूप से इनका पालन करना कठिन होता है. इस कठिनाई को बहुसंख्यक महाविद्यालयों के प्राचार्य और भी बढ़ा देते हैं.




पिछले वर्ष एक आदेश आया था, सतत आंतरिक मूल्यांकन में विद्यार्थी को न्यूनतम 15 अंक अनिवार्यतः देने के सम्बन्ध में. इस पर तबसे लेकर आजतक विवाद, भ्रम की स्थिति बनी है. बहुतेरे महाविद्यालयों में अनुपस्थित विद्यार्थियों को भी 15 अंक देने का दबाव प्राचार्यों द्वारा बनाया जा रहा है. इस बारे में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है कि आख़िर अनुपस्थित विद्यार्थी को अंक कैसे दिये जाएँ?


इस तरह के आदेश प्रोजेक्ट को लेकर, लघु शोध प्रबंध को लेकर, क्षेत्रीय भ्रमण/सर्वेक्षण को लेकर, माइनर विषयों को लेकर भी आते रहे हैं, जो भ्रम, विवाद ही पैदा करते आ रहे हैं. इस बारे में न तो बहुत से प्राचार्यों द्वारा कोई जानकारी ली जा रही है और न ही विश्वविद्यालय द्वारा स्पष्ट नीति बनाई जा रही है.


वैसे, देखने में आ रहा है कि अब अपने उच्चाधिकारियों से चर्चा करने में, विमर्श करने में शिक्षक भी घबराने लगे हैं. अपने आपको विश्वासी, सक्षम बनाने में असफल ऐसे अनेकानेक शिक्षक विद्यार्थियों को कैसे विश्वासी, सक्षम बना सकेंगे?

 






 

30 जनवरी 2024

ग्रेडिंग प्रणाली समाप्त करना समाधान नहीं

देश की शैक्षणिक व्यवस्था में लगातार किसी न किसी रूप में सुधारात्मक कदम उठाये जाते रहे हैं. समयानुसार ऐसा किया जाना एक सतत प्रक्रिया है. उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक क़दमों के रूप में राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद (नैक) की कार्यकारी परिषद की बैठक में निर्णय लिया गया कि अब देश में उच्च शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रणाली (एक्रीडिटेशन सिस्टम) के द्वारा ग्रेड नहीं दिया जाएगा. अब महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ए डबल प्लस से लेकर डी तक किसी भी प्रकार का ग्रेड नहीं मिलेगा. इसके स्थान पर उच्च शिक्षण संस्थानों को द्विआधारी मान्यता पद्वति के द्वारा मान्यता प्राप्त या मान्यता प्राप्त नहीं के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा. यह व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2024-25 से लागू हो जाएगी.

 



उच्च शिक्षण संस्थानों में ग्रेडिंग के स्थान पर मान्यता प्रणाली को दो चरणों में लागू किया जायेगा. पहले चरण में बताया जाएगा कि संस्थान मान्यता प्राप्त है अथवा मान्यता प्राप्त नहीं है. पहले चरण की इस प्रक्रिया के पश्चात दूसरे चरण में संस्थानों को एक से लेकर पाँच तक के स्तर पर आँका जायेगा. इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों को अच्छा करते रहने के लिए प्रेरित करना होगा. जिस संस्थान का प्रदर्शन जिस क्षेत्र में जितना अच्छा होगा, उसे उसी के अनुसार एक से पाँच तक की रेटिंग दी जाएगी. नैक की कार्यकारी परिषद् का मानना है कि इस द्विआधारी व्यवस्था से अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए यह पहचानना सहज हो जायेगा कि कौन सा संस्थान मान्यता प्राप्त है और कौन सा नहीं. इसी के साथ उस शैक्षणिक संस्थान की एक से पाँच तक की रेटिंग के अनुसार वे उसे अपने अध्ययन हेतु चयनित कर सकेंगे.

 

अभी तक की संचालित व्यवस्था में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के दिशानिर्देशों के अन्तर्गत नैक द्वारा पूरे देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ग्रेड प्रदान किये जाते हैं. जो विश्वविद्यालय और महाविद्यालय नैक टीम के निरीक्षण के दौरान उनके द्वारा निर्धारित मापदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं, उनको ग्रेड प्राप्त करने में मुश्किल होती है. यूजीसी के अनुसार देश के कुल 1113 विश्वविद्यालयों में से 437 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि बाकी 676 के पास नैक मूल्यांकन नहीं है. इसी तरह देश में 43796 महाविद्यालयों में से 9335 के पास ही नैक मूल्यांकन ग्रेडिंग है जबकि 34461 कॉलेज अभी तक मूल्यांकन नहीं करवा सके या असफल हुए हैं. नैक एक स्वायत्त संस्था है, जिसे 1994 में यूजीसी द्वारा स्थापित किया गया था. इसका काम देश भर के विश्वविद्यालयों, उच्च शिक्षण संस्थानों, निजी शिक्षण संस्थानों में गुणवत्ता को परखना, उनका मूल्यांकन करके ग्रेडिंग देना है. यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए नैक से मान्यता प्राप्त करना आवश्यक है. यदि किसी संस्थान द्वारा इसकी मान्यता नहीं ली जाती है तो उसे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है.

 

जैसा कि नैक की कार्यकारी समिति के अध्यक्ष भूषण पटवर्धन ने कहा कि मान्यता की द्विआधारी पद्धति यह सुनिश्चित करेगी कि ग्रेड की अस्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्धा जड़ से समाप्त हो जाए. वह दौड़ जिसमें एक महाविद्यालय को ए डबल प्लस से सम्मानित किया गया और दूसरे को ए प्लस से सम्मानित किया जाना था, समाप्त हो, ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वाकई ऐसा हो सकेगा? इस स्तर पर आकर विचारणीय यह है कि ऐसे संस्थान जो मान्यता प्राप्त नहीं वर्ग में आयेंगे उनके शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों का भविष्य क्या होगा? उनके कैरियर की दिशा क्या होगी? शिक्षण दायित्वों से इतर अनेकानेक कार्यों के लिए शिक्षकों को अनुमति होगी अथवा नहीं? नैक मूल्यांकन-रहित संस्थानों के भविष्य के साथ-साथ उनसे जुड़े शिक्षकों, कर्मियों, विद्यार्थियों के भविष्य पर भी समवेत रूप से विचार किया जाना महती आवश्यकता है.

 

एक लम्बे समय से यूजीसी द्वारा बार-बार निर्देशित किये जाने के बाद भी बहुसंख्यक संस्थानों द्वारा नैक मूल्यांकन नहीं करवाया गया. इसके पीछे ऐसा नहीं कि संस्थानों की मंशा मूल्यांकन करवाने की नहीं है बल्कि वास्तविकता ये है कि बहुत बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान हैं जिनका मूलभूत ढाँचा ही नैक द्वारा निर्धारित किये गए मानदंडों के आसपास भी नहीं ठहरता है. ग्रामीण अंचलों में संचालित संस्थानों में तो स्थिति और भी दयनीय है. मूलभूत ढाँचे के अभाव के साथ-साथ शिक्षकों की कमी, विद्यार्थियों का बहुत बड़ी संख्या में अनुपस्थित रहना, पाठ्यक्रमों का रोजगारपरक न होने से प्रवेश का कम होना आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भी बहुत से संस्थान नैक मूल्यांकन में सफल नहीं हुए हैं.

 

विगत कुछ वर्षों में शिक्षा के उन्नतीकरण से अधिक जोर उसके व्यवसायीकरण पर दिया गया. परिणामस्वरूप निजी संस्थानों की भरमार हो गई, जिनमें से बहुतायत में शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों, विद्यार्थियों, परीक्षा, मूल्यांकन आदि की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. ऐसे संस्थान धनबल की ताकत से किसी भी कार्य को पूर्ण करवाने का दम भरते भी हैं और रखते भी हैं. इसी के चलते माना जाने लगा था कि नैक मूल्यांकन भी अब पारदर्शी नहीं रह गया है. नवीन व्यवस्था के पहले चरण को आगामी चार महीनों में पूरा किया जाना है. ऐसे में वे संस्थान जिनका ढाँचा ही सही नहीं है, जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, वे कैसे इस चरण के लिए आवेदन कर सकेंगे? निश्चित है कि संस्थानों द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए वही अतार्किक, असंगत उपाय अपनाए जाने की आशंका रहेगी जिनके कारण नैक मूल्यांकन को अनुपयुक्त माना जाने लगा है. यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों की मूल्यांकन प्रणाली बदलने से इतर प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि संस्थान अपने मूलभूत ढाँचे में, शैक्षणिक गुणवत्ता में, शैक्षणिक वातावरण, विद्यार्थियों की उपस्थिति में आवश्यक सुधार करें. बिना इसके किसी भी बदलाव का बहुत सारगर्भित प्रभाव नहीं होने वाला. 






 

06 फ़रवरी 2023

सीबीसीएस के आधार पर निर्धारित ग्रेडिंग प्रणाली

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद से बहुत से प्रदेशों ने इसे लागू किया और आमूल-चूल परिवर्तन किये. इससे पहले की पोस्ट में जीपीए के बारे में जानकारी देने का प्रयास किया गया. (इसे यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है) इस पोस्ट में जीपीए के द्वारा किस तरह सीजीपीए को निकालते हैं, इसे समझाने का प्रयास किया गया है. 


संलग्न तालिकाओं के द्वारा एसजीपीए/जीपीए और सीजीपीए निकालने की प्रक्रिया को समझा जा सकता है.

तालिका 01

(किसी विद्यार्थी का सेमेस्टर एक का परीक्षा परिणाम)

पाठ्यक्रम

क्रेडिट

अंक

Point Earned

अंक ÷ 10

Point Secured

PE x क्रेडिट

A

5

75

7.5

37.5

B

4

80

8.0

32.0

C

4

77

7.7

30.8

D

2

70

7.0

14.0

योग

15

302

 

114.3

 

इस विद्यार्थी का इस सेमेस्टर का GPA =  Total of Point Secured ÷ Total of Credit

GPA = 114.3 ÷ 15 = 7.62

उदहारण स्वरूप यह एक सेमेस्टर का जीपीए है. इसी तरह यदि किसी विद्यार्थी ने पूरे छह सेमेस्टर परीक्षा देने के डिग्री प्राप्त की तो उसका परीक्षा परिणाम किस रूप में सामने आएगा, इसे यहाँ से समझा जा सकता है. यहाँ एक सेमेस्टर के GPA को उदाहरण स्वरूप तालिका एक में दिखाया ही गया है. इसी आधार पर मान लिया जाये कि दूसरे सेमेस्टर में कुल क्रेडिट होंगे 15 और जीपीए आएगा 7.11, तीसरा सेमेस्टर कुल 15 क्रेडिट का होगा और जीपीए होगा 7.84, चौथे सेमेस्टर में कुल क्रेडिट होंगे 20 और जीपीए होगा 8.19, पाँचवाँ सेमेस्टर भी 20 क्रेडिट का और जीपीए निकला 7.88, छठवाँ और अंतिम सेमेस्टर भी 20 क्रेडिट का अनु जीपीए हुआ 7.56.

इस आधार पर किसी विद्यार्थी का सीजीपीए निकाला जाये तो उसको निम्न तालिका से समझा जा सकता है.

तालिका 02

(किसी विद्यार्थी का सभी सेमेस्टर के बाद का परीक्षा परिणाम)

सेमेस्टर 1

क्रेडिट = 15

जीपीए = 7.62

सेमेस्टर 2

क्रेडिट = 15

जीपीए = 7.11

सेमेस्टर 3

क्रेडिट = 15

जीपीए = 7.84

सेमेस्टर 4

क्रेडिट = 20

जीपीए = 8.19

सेमेस्टर 5

क्रेडिट = 20

जीपीए = 7.88

सेमेस्टर 6

क्रेडिट = 20

जीपीए = 7.56

इस तालिका में उस कल्पित विद्यार्थी के क्रेडिट और जीपीए को अंकित किया गया है, जिसने अपने सभी छह सेमेस्टर का अध्ययन पूर्ण कर लिया गया है. ऐसे विद्यार्थी के लिए सीजीपीए निकालने के लिए इन्हीं छहों सेमेस्टर के क्रेडिट और जीपीए की आवश्यकता होगी.

सीजीपीए निकालने के लिए एक-एक सेमेस्टर के क्रेडिट और जीपीए के गुणनफल का योग करना होगा.

= 15x7.62 + 15x7.11 + 15x7.84 + 20x8.19 + 20x7.88 + 20x7.56

= 114.3 + 106.65 + 117.6 + 163.8 + 157.6 + 151.2

= 811.15

यहाँ कुल जीपीए और क्रेडिट के गुणनफल का योग तो प्राप्त हो गया. इन्हीं कुल छह सेमेस्टर के क्रेडिट का योग 15+15+15+20+20+20= 105 हुआ. प्राप्त गुणनफल के योग में कुल क्रेडिट के योग का भाग देने पर CGPA प्राप्त हो जाता है. इस प्रकार CGPA को प्राप्त करने के लिए जीपीए और क्रेडिट के योग 811.15 को कुल क्रेडिट 105 से विभाजित करना होगा. अतः सीजीपीए हुआ 811.15 ÷ 105 = 7.72

यह उदाहरण में लिए गए विद्यार्थी का सीजीपीए आया. ग्रेडिंग तालिका के आधार पर इस विद्यार्थी का परीक्षा मूल्यांकन किया जा सकता है. ग्रेडिंग सम्बन्धी तालिका निम्नवत है.

ग्रेड

परिणाम

अंक

O

Outstanding - असाधारण

10

A+

Excellent - उत्कृष्ट

09

A

Very Good - बहुत अच्छा

08

B+

Good – अच्छा

07

B

Above Average – औसत के ऊपर

06

C

Average – औसत

05

P

Pass – उत्तीर्ण

04

F

Fail – अनुत्तीर्ण

00

Ab

Absent – अनुपस्थित

00

 

उक्त ग्रेडिंग तालिका के आधार पर यदि विद्यार्थी के परीक्षा परिणाम का मूल्यांकन करें तो विद्यार्थी का सीजीपीए प्राप्त हुआ 7.72 जो तालिका के अनुसार ग्रेड A अर्थात बहुत अच्छा में आता है.

यहाँ समझने वाली बात ये है कि सीबीसीएस के लागू होने के बाद से अंकों के आधार पर मूल्यांकन बंद हो जायेगा मगर मूल्यांकन होना बंद नहीं होगा. विद्यार्थियों को अब अंक नहीं बल्कि अंकों के सहारे ग्रेड लाने के लिए मेहनत करनी होगी.