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17 जून 2014

आपदाओं से कुछ सीखेंगे या मरते ही रहेंगे




आपदाओं पर आपदाएँ आती जाती हैं, चली जाती हैं, हम साल-दर-साल इन आपदाओं में मारे गए लोगों को, हताहत हुए लोगों को याद कर लेते हैं और फिर से नई आपदा के आने का इंतज़ार सा करने लगते हैं। एक के बाद एक होती आपदाओं से भी हम सीखने का प्रयास नहीं करते हैं। हर आपदा के बाद प्रकृति को, प्रबंधन को, व्यवस्था को, शासन-प्रशासन को, सरकार को दोष देकर अपनी गलतियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। यदि हम बिना किसी पूर्वाग्रह के देखें तो कुछेक आपदाओं को छोड़कर समूची आपदाएँ, समूची दुर्घटनाएँ मानव-जन्य होती हैं। ट्रेन दुर्घटनाएँ हों, सड़क के हादसे हों, नदियों में लोगों के डूब जाने की घटनाएँ हों, केदारनाथ जैसी दर्दनाक त्रासदी हो सभी में कहीं न कहीं मानवीय चूक अधिक रही है। इस मानवीय चूक में उससे सम्बंधित प्रबंधन, उससे सम्बंधित व्यवस्था, उससे सम्बंधित सुरक्षा, उससे सम्बंधित जानकारी कुछ भी हो सकती है।
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अभी हाल ही में व्यास नदी में कुछ युवाओं के बह जाने का दर्दनाक हादसा हुआ तो केदारनाथ त्रासदी को भी एक वर्ष हुआ। बजाय भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के हम व्यवस्था को कोसने में लग गए। देखा जाये तो व्यवस्था में लगे लोग, प्रबंधन में लगे लोग भी इन्सान हैं और उनसे चूक होना भी संभव है। ऐसे में उपाय क्या हों इस पर विचार करने की आवश्यकता है।  
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सड़क पर चलते समय ध्यान इस बात पर दिया जाए कि महज हम अकेले नहीं हैं जो यात्रा कर रहे हैं, सड़क का उपयोग कर रहे हैं। हमारे साथ-साथ अनेक लोग कई तरह से सड़क का उपयोग करते दिखते हैं। न केवल हमारी अपनी बल्कि दूसरों की सुरक्षा, सहूलियत का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। बाइक, कार आदि चलाते समय इस बात का ख्याल रखा जाए कि अनियंत्रित गति एक तरफ हमारे अपने लिए घातक है तो दूसरी तरफ सड़क पर चल रहे अन्य यात्रियों के लिए भी घातक है।
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नदियों, तालाबों, नहरों, स्विमिंग पूल आदि में स्नान करने, तैराकी करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पानी का तेज बहाव अनियंत्रित होता है। मानवीय प्रबंधन एक सीमा तक ही इसके विकराल रूप पर अंकुश लगा सकता है, उसके बाद तो पानी की मार नागरिकों को सहनी पड़ती है। ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जहाँ पानी के अनियंत्रित बहाव ने तो नुकसान किया ही है हमारी अपनी चूक ने भी त्रासदी को जन्म दिया है।
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अपने मकान, दुकान अथवा अन्य दूसरे निर्माण के समय इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि हमारा निर्माण किसी भी रूप में अतिक्रमण न पैदा कर रहा हो। ये अतिक्रमण पेड़-पौधों के काटने को लेकर, सड़क को कब्जाने को लेकर, नालियों को अवरुद्ध करने को लेकर हो सकता है। हाल के दिनों में आई बाढ़ का बहुत बड़ा कारण शहरों की नालियों, नालों के अवरुद्ध होने तथा आसपास की नदियों, नहरों पर अतिक्रमण ही रहा है। चंद इंच भूमि के लिए हम प्रकृति से खिलवाड़ करके अपने जीवन से ही खिलवाड़ करते हैं।
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वैसे देखा जाए तो ये सब यहाँ लिखना-कहना बेकार की बात हो गई है। आखिर हम सब, जो यहाँ इस आलेख को पढ़ रहा है, नेट का इस्तेमाल कर रहा है, वो पढ़ा-लिखा है और आसानी से समझता है कि क्या सही है, क्या गलत है। इसके बाद भी हम इस भाव से कि हमारी गलती का खामियाजा कौन सा हमें भुगतना है, गलती पर गलती किये जाते हैं। और सच भी होता है कि हमारी गलती का परिणाम हमारे नौनिहाल भुगतते हैं। कभी वे बाढ़ का शिकार होते हैं तो कभी सड़क दुर्घटनाओं के, कभी वे शुद्ध हवा को तरसते हैं तो कभी मौसम की अनियमितता का शिकार बनते हैं। चलिए अपने लिए न सही, अपने बच्चों के लिए ही सही... हम भी गलती कम से कम करें, अपने बच्चों को भी कम से कम गलती करने की शिक्षा दें। उनको सजग रहना, सतर्क रहना, सुरक्षित रहना, सहायक होना, जागरूक होना आदि सिखाएं। संभव है कि आने वाली पीढ़ी कुछ हद तक कुछ सीखकर आपदाओं पर नियंत्रण लगाना सीख जाए।
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25 जून 2013

ये आपदा सीख भी देती है



उत्तराखंड की आपदा, केदारनाथ की तबाही से प्रभावित इंसानों ने अपना बहुत कुछ गंवाया है, अपने परिवार को खोया है. वहां रह रहे लोगों ने एक तरह से अपने वजूद को भी गंवाया है. हर गलती इन्सान को कुछ न कुछ सीखने का अवसर देती है. हर संकट से बाहर निकलने के रास्ते मिलते हैं, संकट से लड़ने की शक्ति मिलती है. इस आपदा से भयंकर जन-धन की तबाही हुई है और कहीं न कहीं इस बात को मानने से संकोच नहीं करना चाहिए कि ये आपदा मानवजनित अधिक है. हम सब भले ही इसके लिए बादलों के फटने को, घनघोर बारिश को, नदियों के तेज बहाव को दोष दें किन्तु असल सत्य यही है कि हम इंसानों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि इस तरह की आपदाएं आने वाले वर्षों में आम हो जाएँगी. हाल-फ़िलहाल तो राहत कार्य, बचाव कार्य चल रहे हैं और हम सभी को भी अभी उसी की पूर्ण सफलता के प्रयास करने चाहिए पर ये आपदा कहीं न कहीं हम इंसानों के लिए एक तरह की सीख लेकर आई है. यदि हमने कुछ सीखने की कोशिश की तो ये हमारी जागरूकता होगी अन्यथा की स्थिति में आने वाले वर्षों में हमें और भयावह अवसरों का सामना करना पड़ेगा.
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हमें आगे के लिए अपनी योजनाओं, अपनी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है. अपने मकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, होटलों आदि के निर्माण के समय इस बात का ध्यान दिया जाए कि प्राकृतिक असंतुलन न होने पाए. हमारे किसी भी कदम से नदियों के बहाव में अड़चन पैदा न हो, नदियों की प्राकृतिकता नष्ट न हो. जो लोग पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं वे इस बात का ख्याल रखें कि उनके विकास कार्य पहाड़ों को अस्थिर न बनाते हों. इनके अलावा और भी तमाम कार्य ऐसे हो सकते हैं जिनके उठाये जाने से हम प्राकृतिक असंतुलन को रोक सकते हैं. ये सावधानी भरे कदम इन्सान के लिए तो हैं ही, सरकारों को भी इस तरफ मुस्तैदी और ईमानदारी से विचार करने की जरूरत है.
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इसके अलवा एक और अहम सीख, जो हमारी नज़रों में, मिली कि धन के पीछे अंधाधुंध रूप से भागना भी इन्सान को बंद करना चाहिए. तमाम कहानियां केदारनाथ के दर्द से बाहर आईं, जिनके द्वारा पता लगा कि लोगों के लाखों रुपये, लाखों की संपत्ति उनके किसी काम न आ सकी. बैंक में जमा लाखों धन की निकासी के लिए काम आने वाले एटीएम निर्जीव से बेकाम वहीं मलबे में पड़े रहे. लोगों को एक-एक रोटी के लिए अपने जेवरातों को मिटटी के मोल देना पड़ा. उस विभीषिका में काम आई तो लोगों की सहानुभूति, लोगों का सहयोग, लोगों की मंगल कामनाएं, दान देने की प्रवृत्ति. भौतिकतावादी होने का अर्थ ये नहीं होना चाहिए कि हम धन को अनिवार्य समझ लें, हाँ, ये आवश्यक हो सकता है पर अनिवार्य नहीं.
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रिश्तों, सहयोग, जनभावना, संवेदनशीलता को इस आपदा ने अवश्य ही सिखाया होगा. ये अपवाद स्वरुप जरूर हो सकता है कि कुछ स्वार्थी ताकतों ने ऐसे समय में भी लूटमार की, सामानों को बहुत अधिक कीमत पर बेचा किन्तु देश भर से मदद को उठे हाथ, जवानों का बेख़ौफ़ जमे रहना, आम आदमी का भी सहायता को सामने आना आदि ऐसी घटनाएँ हैं जिनको सीखा जा सकता है. ये सत्य है कि इस भीषण आपदा को शायद ही कभी भुलाया जा सके किन्तु इस आपदा के पीछे से आती सीख को यदि हम आत्मसात कर सकें तो संभव है कि आने वाली पीढ़ी को हम स्वस्थ समाज दे सकें.
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20 जून 2013

अब भी न संभले तो रोज आएँगी ऐसी आपदाएँ



ऐसा लग रहा है जैसे हमारे देश में प्राकृतिक आपदा पहली बार आई हो. सभी चिंतातुर हैं, मीडिया से लेकर समाजसेवी तक, राजनेता से लेकर आम आदमी तक किन्तु कुछ सीखेंगे नहीं. जिस-जिस के हाथ में कैमरा है, जिस-जिस के पास इंटरनेट है, जिस-जिस के सामने टीवी खुला हुआ है वो ‘सबसे पहले हमने’ की तर्ज़ पर विनाशकारी मंज़र की फोटो चिपकाने में लगा हुआ है. हम भारतवासी लगभग प्रतिवर्ष इसी तरह की विभीषिका से दो-चार होते रहते हैं, इसके बाद भी ‘जैसे कुछ हुआ ही न हो’ के अंदाज़ में प्रकृति से खिलवाड़ करने लगते हैं. आज ऐसा लग रहा है जैसे बाढ़ का आना कोई विभीषिका नहीं, कोई पर्व हो गया हो. ऐसे विनाशकारी हालात में भी बहुत से लोग हैं जो मानवता को छोड़ व्यापार को, अपने लाभ को ज्यादा महत्त्व देने में लगे हैं. (समाचारों के द्वारा ज्ञात हुआ कि स्वार्थपरक लोग विपदा में फंसे लोगों की मजबूरी का लाभ उठाकर अधिक मूल्य पर सामान उपलब्ध करवा रहे हैं) 
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कुछ दिनों सभी का केंद्रबिंदु बना रहेगा ये तबाही का मंज़र, कोई लाशों की चर्चा करेगा, किसी के पास नेताओं की बुराई की बातें होंगी, कोई वहां की अव्यवस्था की बात करेगा, किसी की जुबान पर सेना के साहसिक कदमों की तारीफ होगी...और कुछ दिन के बाद इस तबाही को, इसके पीछे के कारणों को बिसरा दिया जायेगा.
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विकास की अंधी दौड़ में इन्सान इस कदर शामिल है कि वो भूल जाता है कि उसके कदम एक तरफ भले ही विकास ला रहे हों किन्तु दूसरी तरफ विनाश को भी आमंत्रण दे रहे हैं. लगातार काटे जाते वृक्ष, महंगे इमारती पत्थरों की तृष्णा में पहाड़ों को काटकर साफ़ कर देना, लकड़ी की चाह में जंगल के जंगल मिटा देना, बालू की जबरदस्त मांग के चलते नदियों में जगह-जगह सैकड़ों मीटर गहरे गड्ढे करके नदियों के पानी को अवरुद्ध कर देना, इमारतें बनाने के लालच में नदियों-नालों की जमीन पर कब्ज़ा करके उनके प्रवाहमार्ग को संकरा कर देना आदि-आदि वे लालची कदम हैं जो पल-पल इन्सान को विनाश की तरफ ले जा रहे हैं.
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ये बात सभी को समझना चाहिए, उन्हें भी जो अपने-अपने घरों में सुरक्षित हैं, उन्हें भी जो इस विपदा से बचकर सुरक्षित अपने-अपने ठिकानों को लौटने लगे हैं, उन्हें भी जो समझते हैं कि इस तरह की कोई प्राकृतिक आपदा उनके आसपास फटक नहीं सकती, कि यदि विकास की गति इस तरह से प्रकृति को नज़रंदाज़ करके होती रही तो इस तरह की आपदाएं आये दिन हमारे सामने प्रकट हो जाया करेंगी. 
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02 सितंबर 2008

जिम्मेवार हम ही हैं

बिहार में पानी अपनी तबाही मचा रहा है, लोग बचने के लिए जद्दो-जहद कर रहे हैं जो बचे हैं वे अपनी राजनीती के लिए जद्दो-जहद कर रहे हैं. पानी की तबाही एकाएक नहीं आई होगी, क्या समस्या रही क्या कारण रहे ये भी उतना अहम् है जितना की ये कि सरकार या प्रशासन किस स्तर का सहयोग कर रहे हैं. देखा जाए तो पानी के बारे में प्रचिलित एक लोकुक्ति को हम लोगों ने लगभग भुला दिया है और वो ये कि पानी रास्ता मांगे तो उसको दे दो, यदि उसे पूछना पड़ेगा तो तबाही आयेगी

कहने का तात्पर्य ये कि पानी हमेशा से अपनी चाल से बहता हुआ आनंद देता रहा है. ऐसा नहीं है कि पहले तबाही या बाढ़ नहीं आती थी पर तब ये स्थिति प्राकृतिक होती थी. अब ये स्थिति हम लोगों ने बना दी है. कभी हम बाढ़ के शिकार होते हैं तो कभी हम सूखे के शिकार बन जाते हैं. अभी बिहार की दुखद स्थिति किसी से छिपी नहीं है. क्या इस के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सरकार या प्रशासन ही जिम्मेवार है? क्या हमारा कोई दोष नहीं दीखता है? यहाँ मेरा मकसद सरकार/प्रशासन की गलतियों को छिपाना नहीं है, अपने दोषों को बताना भी है. हमने स्वार्थ में अंधे होकर ये भी नहीं देखा कि हम किस बेदर्दी से वृक्षों को काटते जा रहे हैं, जमीन का बेतरतीब अधिग्रहण करते जा रहे हैं. नदियों के किनारे, छोटे-छोटे नालों के किनारे भी हमने कब्जा लिए, पानी को रास्ता दिया नहीं और चाहते हैं कि वो अपनी धारा की गति भी न बढाये। यहाँ मनुष्य के एक छोटे से वर्ग के लालच का दुष्परिणाम पूरा बिहार झेल रहा है.

गाँवों के गाँव पानी की चपेट में हैं, लाखों आदमी बहते पानी के साथ बह रहा है और हम अभी भी इस कोशिश में हैं कि कहाँ से किसकी जमीन कब्जाई जा सकती है, कहाँ से किसके नाम पर बाढ़ की सहायता राशि लूटी जा सकती है. बहरहाल हालत हमें हमेशा कुछ न कुछ सिखाती है पर हम सीखते नहीं हैं. इस हादसे से भी न सीखे तो कब सीखेंगे?