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15 अगस्त 2024

स्वतंत्रता का सिर्फ जश्न न मनाएँ अपनी जिम्मेवारी भी निभाएँ

आज़ादी का जश्न मनाने वाला एक और दिन हम सबके बीच उपस्थित है. देश में स्वाधीनता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, इन दोनों दिनों में नागरिकों में, बच्चों-बड़ों में जबरदस्त उत्साह रहता है. आखिर इन दोनों दिनों में स्वतः ही गौरव की भावना की अनुभूति होती है. ऐसी अनुभूति के चलते सारा दिन उमंग में, उल्लास में गुजर जाता है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हुए अक्सर मन में सवाल उठता है कि हम सब जितना प्रसन्न, जितने उल्लासित इन दो दिनों में रहते हैं उतना शेष दिनों में क्यों नहीं रहते हैं?

 

यह सवाल कतई आश्चर्यचकित करने वाला नहीं लगेगा क्योंकि ऐसा सवाल एक अकेले हमारे मन में नहीं उठता है बल्कि उन सभी नागरिकों के मन में उठता है जो किसी न किसी रूप में देश के विकास में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं. यदि पूरी निष्पक्षता से, बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करें, इन दो दिनों पर दृष्टिपात करें तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि इन दो दिनों के उल्लास के समाप्त होने के बाद अगले दिन से दिल-दिमाग तिकड़म में व्यस्त हो जाता है. भ्रष्टाचार करने के उपाय किये जाने लगते हैं, काम निकालने को रिश्वत देने-लेने की चर्चा की जाने लगती है, स्वार्थ-लिप्सा में लिप्त कदम उठाये जाने लगते हैं.

 



सोचिए एक पल को कि क्या देश का वास्तविक विकास इसी तरह से हो सकेगा? क्या दो दिनों में अपनी राष्ट्रभक्ति दिखाने से ही देश की वास्तविक आज़ादी का मंतव्य पूरा होता है? सच्चाई तो ये है कि अब हम सभी आज़ाद हैं और अपनी स्वतंत्रता का जश्न किसी एक दिन नहीं, किसी विशेष दिन नहीं बल्कि प्रत्येक दिन मनाया जाना चाहिए. आखिर हम सभी अपनी ही आज़ादी का, अपनी ही स्वतंत्रता का एहसास स्वयं नहीं करेंगे तो कैसे अपेक्षा करेंगे कि विदेशी हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे? इसके लिए सबसे पहले हम सभी को अपने-अपने दायित्वों, कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करने की आवश्यकता है. देश के विकास के लिए किसी दूसरे की तरफ ताकने के स्थान पर हम सबका प्रयास यही होना चाहिए कि स्वतः ही अपना सकारात्मक योगदान दे सकें. जब तक इस तरफ की भावना एक-एक नागरिक में नहीं होती है तो अपनी आज़ादी का हम सब सिर्फ जश्न ही मनाते रहेंगे, उसकी वास्तविकता का लाभ नहीं उठा सकेंगे.

 

09 मार्च 2019

अपना शिक्षित होना सिद्ध भी करें


पढ़ा-लिखा होना, शिक्षित होना, साक्षर होना किसी भी व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण होता है. कोई इसके द्वारा खुद को इन्सान बना लेता है और कोई इसके बाद भी अमानवीय, असंवेदनशील हरकतें करता ही रहता है. कई बार देखने में आता है कि कुछ अवसरों पर निरक्षर, अनपढ़ व्यक्ति बहुत ज्यादा संवेदनशीलता दिखा जाता है उसके उलट साक्षर, शिक्षित व्यक्ति अशोभनीय हरकतें करता ही रहता है. पढ़ा लिखा होना बहुत से लोगों के लिए बेकार हो जाने वाला साबित होता है. इसी पढ़े लिखे होने में कुछ लोगों को घमंडी बना रखा है, कुछ लोगों के दिमाग को ख़राब कर रखा है. अनावश्यक रूप से अपने सहयोगियों के साथ, अपने अधीनस्थ लोगों के साथ, अपने कर्मचारियों के साथ ऐसे व्यवहार किया जाता है जैसे वही एकमात्र शिक्षित अथवा साक्षर हैं. ऐसा लगता है जैसे केवल इन्हीं को किसी ईश्वरीय शक्ति ने विशेष रूप से निर्मित करके धरती पर भेजा है. ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि सभी लोग एकसमान स्थिति में हैं, कतिपय कारणवश किसी-किसी की प्रस्थिति में अंतर हो जाता है मगर इसका अर्थ उसके साथ दुर्व्यवहार करना नहीं है. 


इसी तरह कुछ पढ़े-लिखे लोग, साक्षर लोग अपने अधिकारों का, अपने कर्तव्यों का पालन ही नहीं कर पाते हैं. कई बार देखने में आया है कि ऐसे पढ़े-लिखे लोग भी जरा-जरा से काम के लिए, छोटी-छोटी सी बात के लिए दूसरे पर निर्भर रहते हैं. उनकी इस निर्भरता का अगला व्यक्ति फायदा उठाता रहता है. ऐसे लोग पढ़े-लिखे होए के बाद भी समाज के लिए निरर्थक सिद्ध होते हैं. यहाँ समझना चाहिए कि समाज को डिग्रीधारी लोग नहीं चाहिए होते हैं वरन ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो समाज को दिशा देने का काम कर सके, अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें. यदि ऐसा किसी व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा पा रहा है इसका अर्थ है कि उसने अपनी फाइल में बस कागज़ बढ़ाने का काम किया है.

असल में हमारे परिवारों में ही इस तरह की सीख नहीं दी जाती है कि हमें पढ़-लिख कर अहंकारी नहीं बनना है. पढ़ने-लिखने के बाद हमें लोगों की सहायता करनी है. ये भी नहीं सिखाया जाता है कि शिक्षित होने के बाद अपने अधिकारों का प्रयोग करना आना चाहिए. जिम्मेवार लोगों से सवाल करना आना चाहिए. परिवारों में डिग्री को बहुत बड़ी जायदाद बताया जाता है. एक छोटी सी परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के बाद उसका बखान ही बखान किया जाता है. ऐसा महसूस करवाया जाता है जैसे कि मात्र उसी व्यक्ति के द्वारा ऐसा किया जा सका है, शेष लोगों द्वारा बस निरर्थक प्रयास किये जा रहे हैं. इसी तरह शिक्षित होने की अवस्था में परिवार में सिखाया जाता है कि अगले को बस अपने काम से काम रखना है. समाज में क्या हो रहा है, समाज-विकास में उसका क्या योगदान हो सकता है, इस बारे में कभी सिखाया-बताया ही नहीं जाता है. ऐसे में व्यक्ति लाभ शिक्षित हो जाये, कितनी ही बड़ी डिग्री क्यों न हासिल कर ले मगर वह सामाजिक रूप से किसी तरह से सहयोगी नहीं हो सकता है. ऐसे लोगों का योगदान सिर्फ और सिर्फ अपने लिए ही होता है, समाज के लिए, देश के लिए कतई नहीं. इसी समाज द्वारा हमें शिक्षित बनाया गया है, कम से कम हम सभी को उसका ही ऋण चुकता करने के बारे में विचार करना चाहिए.



10 दिसंबर 2018

दूसरों के अधिकार मटियामेट कर मानवाधिकार दिवस मनाएँ


मानव को मार कर, उसके अधिकारों की हत्या कर मानवाधिकार दिवस मनाये जाने का आनंद ही कुछ और है. ऐसा आनंद कहीं और किसी काम में नहीं मिल पाता है. छोटा सा काम हो या फिर बड़ा सा काम, सबके पीछे अधिकारों का होना होता ही है. उन सभी स्थितियों में जो अधिकार संपन्न होता है वो अपने से कमजोर के अधिकारों का हनन करने में लग जाता है. न्यूनतम से न्यूनतम अधिकार मिलते ही सम्बंधित व्यक्ति उसका उपयोग करने से ज्यादा दुरुपयोग करने लगता है. इसके बाद ही मानव के अधिकारों की रक्षा करना ज्यादा अच्छा लगता है. ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकारों की हत्या करने वाला ही भली-भांति जानता है कि उसने किसके किन अधिकारों की हत्या कर दी. जिसके अधिकारों का हनन होता है उसे तो पता ही नहीं चलता कि उसके किस अधिकार का गला दबा दिया गया. वो तो बस राह ताकता है कि कोई आये और उसके अधिकारों की रक्षा करे. ऐसे लोगों के लिए ही आज अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले मानवाधिकार दिवस मनाएंगे. 


मंच पर बैठकर, माइक के सामने खड़े होकर बस अपने कर्तव्यों की बात न करना सबके द्वारा होगा. सब अधिकारों की बात करेंगे मगर कर्तव्यों की बात कोई नहीं करेगा. सोचने वाली बात ये है कि यदि सभी अधिकार ही माँगते रहेंगे तो कर्तव्यों की बात कौन करेगा? करना भी नहीं चाहिए क्योंकि कर्तव्यों के निर्वहन में स्वयं को जिम्मेवारी से जोड़ना होता है जबकि अधिकारों के लिए ऐसा कुछ नहीं करना होता है. अब अधिकारों की बात अपने लाभ से जुड़कर होने लगी है. मानवाधिकारों में स्वार्थ सम्बन्धी बातें होने लगी हैं. कभी कोई बात नहीं करता कि वह कैसे दूसरे के अधिकारों की रक्षा करेगा. मानवाधिकार पर जबरदस्त बहस करने वाले कभी बोलते नहीं देखे जाते कि वे खुद को कर्तव्यों में लगाकर दूसरे के अधिकारों की रक्षा करेंगे. कोई मानवाधिकारी स्वयं के लिए कभी शपथ लेता नहीं दिखता कि वह किसी के अधिकारों का हनन नहीं करेगा. आखिर अपने लाभ को दरकिनार करते हुए किसी दूसरे के अधिकारों के लिए खड़े होना जीवट का काम है. वर्तमान दौर में जबकि सब एक-दूसरे को मारने-काटने की बात कर रहे हों तब दूसरे के अधिकारों की रक्षा के लिए आज के मानवाधिकारी खड़े होंगे, महज कल्पना लगता है.

फिर भी आइये, दूसरों के अधिकारों को मटियामेट करके मानवाधिकार दिवस मनाएँ. इस आयोजन को मानते समय भी देखते रहें, सोचते रहें कि कैसे सामने वाले के अधिकारों में कटौती की जाये. कैसे दूसरे के अधिकारों पर अपने अधिकारों को हावी किया जाये. इसीलिए बधाई आपको कि आप मानवाधिकार दिवस मनाने में सक्षम हैं, अधिकारों का हनन करने के काबिल हैं, कर्तव्यों से विमुख होने के अधिकारी हैं. आखिर आप मानवाधिकारी जो हैं.