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27 जून 2025

विलय नहीं समस्या का समाधान हो

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पचास से कम नामांकन वाले प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों का नजदीकी विद्यालयों में विलय करने का निर्णय लिया है. ऐसे विद्यालयों की संख्या हजारों में है जहाँ पर नामांकन पचास से कम है. यदि नामांकन कम है तो उसे बढ़ाया जाये न कि विद्यालय का विलय कर दिया जाये, उसे बंद कर दिया जाये. वैसे भी सरकारों की प्राथमिकता बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होता है. न केवल सरकारों द्वारा बल्कि विश्व बैंक द्वारा भी अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया गया जिनसे बच्चों को विद्यालय लाया जा सके. संविधान में 86वाँ संशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया. निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम अथवा शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं को निःशुल्क प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा से वंचित बस्तियों में विद्यालय खोले गए. इन सकारात्मक कार्यों, योजनाओं के बीच सरकार द्वारा शारदा (स्कूल हर दिन आयें) योजना क्रियान्वित है. इसमें छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे बालक-बालिकाओं का नामांकन होगा, जो किसी विद्यालय में नामांकित नहीं हैं अथवा नामांकन के बाद भी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण नहीं कर सके. ऐसे बच्चों को चिन्हित कर उनका नामांकन नजदीकी विद्यालयों में आयु-संगत कक्षा में कराया जायेगा और शिक्षा से लेकर प्रत्येक सामग्री निःशुल्क उपलब्ध करायी जाएगी.  

 



बच्चों तक शिक्षा की सुलभता सम्बन्धी योजनाओं के बाद भी यदि सरकार को विद्यालयों का विलय करना पड़े तो स्थिति न केवल गम्भीर है बल्कि चिन्तनीय भी है. सरकार को नामांकन कम होने के कारणों-कारकों को खोजा जाना चाहिए. उन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिए जो प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों के नामांकन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं. विद्यालयों का विलय सिर्फ एक विद्यालय बंद होना नहीं होगा बल्कि यह अनेक दुष्परिणामों को साथ लेकर आएगा. सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर ही दिख रहा है. उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के हाउसहोल्ड सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2020-21 में 4.81 लाख, 2021-22 में 4 लाख से अधिक और 2022-23 में 3.30 लाख बच्चों ने बीच में स्कूल छोड़ दिया. एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में स्कूल छोड़ने की दर अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक है. इसमें भी लड़कियों का प्रतिशत लड़कों की अपेक्षा अधिक है.

 

विद्यार्थियों का बड़ी संख्या में विद्यालय छोड़ना, नामांकन न करवाना चिन्ता का विषय है. सामाजिक-आर्थिक कारक, गरीबी, लैंगिक विभेद, शिक्षकों की कमी, बुनियादी ढाँचे की समस्या, शिक्षा में अरुचि, बाल श्रम का प्रचलन, अन्य सामजिक समस्याएँ आदि ड्रॉपआउट का कारण बनती हैं. ऐसे में विचार किया जाये कि जब बच्चे अपने ही गाँव में अथवा न्यूनतम दूरी पर बने विद्यालय नहीं जा रहे हैं, तो उनसे कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे कुछ किमी दूर स्थित विद्यालय जायेंगे? विद्यालयों का दूर होना बालिकाओं के लिए और बड़ी समस्या होगी. निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ, सुरक्षा चिंताओं आदि के कारण उनकी शिक्षा पर पहले से ही संकट छाया रहता है. विद्यालय विलय पश्चात् उनके स्कूल छोड़ने की आशंका और ज़्यादा है. इसके साथ-साथ शिक्षकों के पदों की कटौती, नई शिक्षक भर्ती पर संकट, रसोइयों, शिक्षामित्रों का असुरक्षित भविष्य भी इसी से सम्बद्ध है.

  

यदि कम नामांकन पर ध्यान दें तो सरकारी नियम और कार्य-प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है. शिक्षा का अधिकार अधिनियम में प्रावधान के बावजूद सरकारी प्राथमिक विद्यालय के एक किमी परिक्षेत्र में खुलेआम निजी विद्यालयों को मान्यता दी जा रही है. निजी विद्यालयों का लगातार बड़ी संख्या में खुलते जाना और अधिनियम के अन्तर्गत गरीब विद्यार्थियों को प्रत्येक निजी विद्यालय द्वारा अपने यहाँ निशुल्क प्रवेश देने की बाध्यता भी कम नामांकन का एक कारक है. नियमानुसार निजी विद्यालयों द्वारा गरीब विद्यार्थियों को प्रवेश देने पर सरकार द्वारा निजी विद्यालयों को प्रतिपूर्ति शुल्क दिया जाता है, अभिभावकों को भी एक निश्चित राशि प्रदान की जाती है. इस आर्थिक पक्ष के कारण अभिभावकों, निजी विद्यालयों ने विद्यार्थियों को प्राथमिक विद्यालयों से दूर कर दिया. इसी तरह सरकारी प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश आयु छह वर्ष और निजी विद्यालय में तीन-चार वर्ष होने के कारण भी नामांकन पर असर पड़ा है. इसके चलते भी बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय के स्थान पर निजी विद्यालय में प्रवेश दिला देते हैं. इनके अलावा शिक्षकों की कमी, शिक्षकों का दूसरे सरकारी कार्यों में व्यस्त रहना, विद्यालयों में प्राथमिक सुविधाओं की कमी होना, स्मार्ट क्लासेज की शून्यता आदि भी कम नामांकन के लिए उत्तरदायी बिन्दु हैं.

 

विद्यालयों का विलय स्थायी अथवा दीर्घकालिक समाधान नहीं है. इसकी गारंटी कौन लेगा कि भविष्य में विलय किये गए विद्यालय में कम नामांकन नहीं होगा? ऐसे में विचारणीय बिन्दु यह होना चाहिए कि उन कारणों का पता लगाकर उनका समाधान किया जाये जिनके कारण विद्यालयों में कम नामांकन हो रहा है. सरकार को चाहिए कि विद्यालयों के मूलभूत ढाँचे को सुव्यवस्थित करे. शिक्षकों की कमी को पूरा करने के साथ अन्य कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति करे. कक्षाओं को विकसित बनाया जाये तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु नवीनतम तकनीकों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाये. सरकारी नीतियों, योजनाओं को सहज तरीके से अनुपालन योग्य बनाया जाये ताकि अभिभावक परेशान न हों. सरकार प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र में आ रही समस्या का समाधान करे, लगातार गहराते जा रहे रोग का इलाज करे न कि सम्बंधित अंग को ही काट कर अलग कर दे. शिक्षक संगठनों, अभिभावकों द्वारा इस निर्णय का विरोध किये जाने के बाद सरकार से अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करके शिक्षा को सुलभ, सहज बनाने का प्रयास करेगी. सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसका लक्ष्य बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाना है न कि उनको शिक्षा से वंचित करना, इसके लिए उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही क्यों न उठाना पड़े.

 


05 मई 2025

शासनादेश के नाम पर तुगलकी फरमान

लाल बुझक्कड़ का नाम तो सुना होगा? ऐसे ही एक नाम और सुना होगा चतुर सुजान? इन दोनों नामों के साथ अनगिनत किस्से जुड़े हुए हैं, बेवकूफी भरे.

 

ऐसे ही एक महाशय हैं, इन दोनों नामों का संयुक्त उपक्रम/उद्यम (वैसे संयुक्त ऊधम भी कहा जा सकता है). वैश्विक स्तर की अचूक बेइज्जती सहने वाले इन चतुर सुजान-लाल बुझक्कड़ को आये दिन भसड़ करने की आदत है. इस भसड़ में इसे आये दिन 'मौखिक आदेश' भी मिल जाता है.

 

आजकल एक ऐसी ही भसड़ फैला रखी है. चित्र में दर्शाया गया पत्र सात पेज का है. यह पत्र दिनांक 10 फरवरी 2025 को उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव की ओर से उत्तर प्रदेश शासन के समस्त अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव को लिखा गया है. प्रतिलिपि जिन दस लोगों को की गई है, उसमें कहीं भी निदेशालय का जिक्र नहीं है.

 

बहरहाल, लाल बुझक्कड़-चतुर सुजान की मिक्स ब्रीड (वर्णसंकर प्रजाति) खेलने में लगी है.

 



23 फ़रवरी 2025

शिक्षकों पर कार्यवाई से पहले अनुमति लेना जरूरी

अशासकीय शिक्षण संस्थानों में आये दिन वहाँ के शिक्षक प्रबंधन समिति, संस्थान प्रमुख (प्राचार्य/प्रधानाचार्य) की तानाशाही का शिकार होते रहते हैं. इस सम्बन्ध में कई बार शिक्षकों की ओर से अपनी समस्या को सरकार के समक्ष रखा भी गया. शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही करने की मंशा को लेकर इस बार विधान परिषद् उत्तर प्रदेश सभापति कुँवर मानवेन्द्र सिंह द्वारा सकारात्मक पहल की गई है. उनके द्वारा निर्देशित किया गया है कि अब बिना अनुमति लिए शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही नहीं की जा सकेगी. प्रबंध तंत्र द्वारा निलंबन, सेवा समाप्ति जैसे कदम उठाये जाने के पहले शिक्षा सेवा चयन आयोग से अनुमति लेनी होगी. 


बात-बात पर उच्चाधिकारियों को कार्यवाही हेतु प्रेषित करने की धमकी देने वालों के दिमाग़ अब सन्तुलन की स्थिति में आ जाएँगे.

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अमर उजाला
22-02-2025




20 जून 2024

सरकार के खिलाफ गलत टिप्पणी पर कार्यवाही

उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी सेवकों द्वारा प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, इंटरनेट तथा डिजिटल मीडिया में वक्तव्य देने या पोस्ट करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है.

जारी शासनादेश के तहत अब कोई भी राज्यकर्मी सरकार की नीतियों या फिर विभागीय निर्णयों के प्रति गलत टिप्पणी करेगा तो उस पर कार्रवाई हो सकती है.






 

11 मार्च 2022

उत्तर प्रदेश में भाजपा विजय

उत्तर प्रदेश, मणिपुर और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की शानदार चुनावी सफलता के अपने ही मायने हैं. यह जीत पार्टी के लिए ऐसे समय में एक तरह से संजीवनी का कार्य करने वाली है जबकि सरकार के विरुद्ध माहौल बनाया जा रहा हो. उक्त राज्यों के साथ-साथ गोवा में भी भारतीय जनता पार्टी आधे अंकों के साथ मजबूत स्थिति में है. इन सभी राज्यों में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण विजय उत्तर प्रदेश की स्वीकारी जा सकती है. प्रदेश सरकार की वर्तमान विजय वर्ष 2017  के विधानसभा के मुकाबले इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उस समय के मुकाबले एक सशक्त विपक्षी दल सपा सामने था. कोरोना महामारी, पुरानी पेंशन, किसान आन्दोलन, महंगाई, बेरोजगारी आदि जैसे मुद्दे खिलकर सामने थे. भाजपा के विरुद्ध, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ नकारात्मक माहौल निर्माण किया जा रहा था.


इन सबके बाद भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की यह विजय न केवल आगामी पाँच वर्षों के लिए निष्कंटक सरकार का रास्ता साफ़ करती है बल्कि वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी एक सुरक्षित रास्ता बनाती नजर आती है. यह जीत इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि लगभग चालीस सालों बाद ऐसा हुआ है कि प्रदेश में वर्तमान सरकार को दोबारा सरकार बनाने का अवसर मिला हो. उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत के पीछे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जादू तो काम किया ही इसके अलावा, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हिंदुत्ववादी स्वरूप, अपराधियों के खिलाफ बुलडोजर बाबा वाला कद और गरीबों को लाभ देने वाले अभिभावक जैसा परिजन रूप भी बड़ा कारण बना है.  




भारतीय जनता पार्टी की अपनी नीतियों, अपने निर्णयों के साथ-साथ विपक्षी दलों की नीतियों, बयानों, कार्यप्रणाली ने भी उसकी विजय की राह सहज की. वर्तमान चुनाव में भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी को ही स्वीकारा जा रहा था. इसका एक कारण सरकार के खिलाफ एंटीइनकम्बेंसी फैक्टर तो माना जा रहा था, दूसरा कारण उनके प्रमुख नेता अखिलेश यादव द्वारा पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा करना भी माना जा रहा था. इसके बाद भी सपा उस तरह का प्रदर्शन नहीं कर सकी, जिस तरह का वातावरण उसके प्रति बनाया गया था.


इसमें भी किसी न किसी रूप में सपा ही जिम्मेवार है. वह अपनी चिर परिचित मुस्लिम-प्रेम वाली छवि को तोड़ नहीं सकी. एक तरफ भले ही भाजपा पर हिंदुत्ववादी छवि की मुहर लगी हो किन्तु वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में विजय पश्चात् केन्द्रीय सत्ता पर बैठने के बाद जिस तरह से भाजपा का दलित प्रेम, कोमल हिन्दूवादी चेहरा, सबका साथ सबका विकास जैसा एजेंडा सामने आया है, वह उसके पक्ष में सकारात्मक माहौल निर्मित करता है.


सपा द्वारा भाजपा के इस नरम हिंदुत्व के बरक्श कोई नया फ़ॉर्मूला खड़ा न किया जा सका. इस हिंदुत्व की काट उसके कट्टर मुस्लिम प्रेम से कतई नहीं हो सकती है. इसके साथ-साथ सपा ने बड़े से लेकर छोटे स्तर तक के नेताओं की बयानबाजियों ने भी भाजपा से छिटके निरपेक्ष हिन्दुओं को भाजपा की तरफ लाने में मदद की. 


सपा के इस फैक्टर के अलावा बहुजन समाज पार्टी का खुलकर सपा को हारने के लिए सामने आना भी भाजपा की विजय का एक आधार बना. केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों द्वारा दलित प्रेम भी खूब जमकर दिखाया गया. इस माहौल में सकारात्मकता का कार्य किया बसपा द्वारा सपा प्रत्याशियों को हराने के लिए भाजपा को वोट करने जैसी नीति का खुलकर प्रचार करना. इससे हुआ यह कि भाजपा को सवर्ण वोट, पिछड़ा वर्ग के वोट का जो भी नुकसान सपा की तरफ से हुआ, उससे ज्यादा लाभ बसपा के दलित वोट से हो गया.


सपा और बसपा की अपनी-अपनी राजनैतिक स्थिति के साथ-साथ भाजपा की अपनी नीतियों ने भी मतदाताओं में उसके प्रति विश्वास को बढ़ाया है. मुख्यमंत्री योगी की माफियाओं के विरुद्ध की जाने वाली अनेकानेक कार्यवाहियों ने उनको बुलडोजर बाबा का जो ख़िताब दिया, उसने लोगों के मन में कानून-व्यवस्था का सुधारात्मक रूप स्थापित किया.  अपराधियों पर अंकुश, महिलाओं के प्रति अपराधों में कमी, बेटियों की सुरक्षा आदि के कारण जनमानस में खुद के सुरक्षित होने का भाव जगा. यह किसी भी दल को सबसे आगे खड़ा करता है. इन स्थितियों में सोने पर सुहागा जैसी स्थिति को बनाने में वो लगभग पंद्रह करोड़ लाभार्थी भी नजरअंदाज नहीं किये जा सकते जिन्हें महीने में दो बार अनाज-तेल के साथ नमक भी दिया गया. किसी गरीब को नमक जैसी वस्तु की उपलब्धता बिना कीमत के हो जाये, यह उसके लिए बहुत बड़ी बात होती है. यह एक तरह का भावनात्मक कदम था, जिसने भाजपा को या कहें कि मोदी, योगी को प्रदेश के सबसे निचले तबके तक पहुँचा दिया, सके दिल में बसा दिया.


भाजपा की उत्तर प्रदेश में इस जीत ने राजनीति में समर्थन की, सहयोग की एक अलग तरह की कहानी लिखी है. संभव है कि आगामी लोकसभा चुनाव में बसपा का बहुत बड़ा तबका विकास की राजनीति के नाम पर भाजपा के पक्ष में ही मतदान करने उतरे. इसके अलावा केंद्र सरकार के बक्से में छिपे समान नागरिक संहिता जैसे फैसले पर भी विचार करना लोकसभा की राह को मजबूत करेगा. भाजपा को लोकसभा के साथ-साथ राज्य पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होगी. जिस कानून व्यवस्था के द्वारा, जिस पिछड़े वर्ग के द्वारा, जिस लाभार्थी वर्ग के द्वारा उसको विजयश्री आसानी से प्राप्त हो गई, उन सबकी आशाओं को पूरा करना होगा.


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17 फ़रवरी 2022

जालौन प्रशासन की चुनावी कसरत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर चारों तरफ सरगर्मी दिखाई दे रही है. प्रशासन अपने स्तर पर सक्रिय है, राजनैतिक दल अपनी तरह से सक्रिय हैं, मीडिया अपनी तरह से सक्रिय है. मीडिया जगह-जगह पहुँच कर मतदाताओं के विचार जान रहा है. जनता में किस दल को लेकर, किस प्रत्याशी को लेकर क्या मंथन हो रहा है इस पर लगातार अपने कार्यक्रमों का संचालन-प्रसारण कर रहा है. राजनैतिक दल अपने-अपने स्तर पर मतदाताओं को लुभाने में लगे हुए हैं. सच्चे-झूठे वादों को फेंका-लपेटा जा रहा है. अपने-अपने कामों की गलत-सही सूची दिखाई जा रही है. विभिन्न दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने हिसाब से पूरा जोर लगाये पड़े हैं. इनके साथ-साथ प्रशासन अपने स्तर पर सक्रिय है. उसके सामने निष्पक्ष, पारदर्शी, ईमानदार, हिंसामुक्त चुनाव को सम्पन्न करवाने की चुनौती है. इस चुनौती के साथ-साथ अधिक से अधिक मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए भी वह सक्रिय बना हुआ है.


प्रदेश के अन्य जनपदों के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है मगर जनपद जालौन में जिला प्रशासन द्वारा अधिक से अधिक मतदान के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत की जा रही है. इस मेहनत में उसके द्वारा शिक्षा विभाग को भी दौड़ा दिया गया है. जनपद स्तर पर मतदाताओं को प्रोत्साहित करने या कहें कि मतदान करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. इसके लिए महाविद्यालयों में बुलउआ (बुलावा) टोली का निर्माण करने का आदेश भी महाविद्यालयों में प्रेषित किया गया. इस टोली के द्वारा मतदान दिवस के पूर्व मोहल्ले-मोहल्ले जाकर लोगों को पीले चावल देकर मतदान के लिए आमंत्रित करना है. मतदान वाले दिन भी इस टोली के सदस्यों द्वारा मतदाताओं को आमंत्रित करना है.


प्रशासन द्वारा एक और काम करवाने की कवायद की गई, जो संभवतः पूरे प्रदेश में अकेले जनपद जालौन में हुआ होगा. इसकी पहल भी संभवतः शिक्षा विभाग द्वारा की गई है, ऐसा सम्बंधित आदेश और गतिविधि को देखकर लगता है. इस आयोजन में विद्यार्थियों द्वारा अपने बांयी हथेली पर मेंहदी लगानी है. इसमें उसे किसी तरह की कोई डिजायन नहीं बनानी है बल्कि उसे अपनी हथेली पर लिखवाना है ‘जालौन वोट करेगा अबकी बार, 20 फरवरी दिन रविवार.’ प्रत्येक महाविद्यालय से कम से कम पचास विद्यार्थियों को ऐसा करना है.


हमारे महाविद्यालय में भी इस मेंहदी कार्यक्रम का आयोजन किया गया. बहुत सारे विद्यार्थियों द्वारा अपनी हथेली पर मेंहदी द्वारा उक्त स्लोगन को लिखा गया. विद्यार्थियों में छात्र भी शामिल रहे. महाविद्यालय में ऐसे कार्यक्रमों में प्राध्यापकों की भी सहभागिता रहती है, सो इस आयोजन में यहाँ के प्राध्यापकों ने भी जोर-शोर से सहभागिता की. वैसे जोर-शोर से सहभागिता तो जिला प्रशासन की भी रही. इसमें जिलाधिकारी और जिला विद्यालय निरीक्षक भी अपनी हथेलियों पर मेंहदी लगवाते देखे गए.

जिलाधिकारी जालौन 

जिला विद्यालय निरीक्षक जालौन 

गांधी महाविद्यालय, उरई प्राध्यापकजन 

गांधी महाविद्यालय, उरई के विद्यार्थी 

हमने भी लगवा ली मेंहदी 

हिन्दी विभाग प्राध्यापक 

जिला विद्यालय निरीक्षक जालौन सहित अन्य प्रतिष्ठित जन


19 मई 2018

दुर्घटनाओं से नहीं सीखेंगे

बनारस में निर्माणाधीन फ्लाईओवर की बीम गिरने से हुए हादसे को महज इसलिए संवेदनशील नहीं माना जा सकता कि वह देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र का हादसा है. इस हादसे को इसलिए भी संवेदनशील माना जाना चाहिए क्योंकि इस हादसे का शिकार लोग वे मासूम नागरिक हैं जिनका कोई दोष नहीं. वे सभी के सभी सेतु निगम के अधिकारियों सहित समस्त कार्यशील लोगों की लापरवाही का शिकार हो गए. बीम के रखे जाने के समय अथवा उसके बाद सम्बंधित क्षेत्र में यातायात को न रोकने, उसका डायवर्जन न करने को हादसे का जिम्मेवार बता रहे हैं वे कहीं न कहीं हादसे की गंभीरता को कम कर रहे हैं. ये समझने वाली बात होती है कि जब इस तरह के बड़े निर्माण हो रहे होते हैं और उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कोई बड़ी संस्था के द्वारा संपन्न किया जा रहा होता है तो आम नागरिकों का एक विश्वास बना होता है. तमाम तरह की विसंगतियों के बाद जैसे आम नागरिक लोकतंत्र पर भरोसा करता है, अपने-अपने प्रदेश, देश की सरकार पर विश्वास करता है, उसके कदमों-नीतियों की आलोचना करने के बाद भी उनके प्रति विश्वास व्यक्त करता है ठीक उसी तरह की स्थिति यहाँ बनी होती है. फ्लाईओवर जैसे निर्माण आनन-फानन में नहीं किये जाते. ऐसे विस्तारपूर्ण निर्माण के लिए सम्पूर्ण मशीनरी एकजुटता से कार्य करती है. इसके बाद भी यदि किसी तरह की चूक होती है तो माना जा सकता है कि सम्बंधित तंत्र अपनी जिम्मेवारी को समझ नहीं रहा था.


अब जबकि सेतु निगम के वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है. उनसे और बाकी सम्बंधित पक्षों से पूछताछ की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इस तरह की कार्यवाही से आगे के लिए कोई सबक मिलेगा, ऐसा लगता नहीं है. निगम के कुछ उच्चधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करा दिया गया है, इससे होगा क्या? अदालती प्रक्रिया में तारीखों पर तारीखें पड़ती रहेंगी. हादसे का शिकार परिवार मुआवजे के कुछ लाख रुपये लेकर अपने आँसुओं को रो-रोकर सुखा लेंगे. कई-कई साल बाद संभव है कि कुछ अधिकारियों को सजा, जुरमाना जैसा कुछ हो जाये, ये भी संभव है कि वे छूट भी जाएँ. छूटने की सम्भावना इसलिए भी प्रबल दिखाई दे रही है क्योंकि पूछताछ के दौरान एक तथ्य यह भी निकल कर आया कि बीम रखने सहित अन्य निर्माण सम्बन्धी कार्यों के लिए यातायात रोकने पर निगम के कर्मियों पर प्रशासन द्वारा प्राथमिकी दर्ज करवा दी गई थी. इससे भी साफ़ है कि देश के प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में सार्वजनिक संस्थाओं के बीच आपस में ही समन्वय नहीं है.

यदि प्राथमिकी दर्ज करवाए जाने की बात सत्य है तो यह भविष्य के लिए भी बुरा संकेत है. देश लगातार विकास की प्रक्रिया से गुजरता रहता है. इस चरण में बड़े-बड़े निर्माण समाज में आम नागरिकों के बीच ही संपन्न होते हैं. दैनिक जीवन-चर्या के बीच ऐसे निर्माणों में जोखिम भी बहुत ज्यादा रहते हैं. इन जोखिमों का शिकार कई बार कर्मचारी भी होते हैं और कई बार नागरिक भी इसका शिकार हो जाते हैं. ऐसे किसी भी मामले में सम्बंधित तंत्र को चाहिए कि उससे जुड़े जितने भी विभाग हैं, संस्थाएं हैं सभी में आपस में समन्वय स्थापित कर लिया जाये. इससे भविष्य में भले ही दुर्घटनाओं को, जोखिमों को रोका न जा सके किन्तु कम तो किया ही जा सकता है. इस दुर्घटना से संस्थाएं, शासन, प्रशासन, नागरिक क्या सबक लेंगे कहा नहीं जा सकता है क्योंकि ये कोई पहली या आखिरी दुर्घटना नहीं है. आये दिन मानव-रहित रेलवे क्रासिंग की दुर्घटनाओं को हम देखते-पढ़ते हैं. आये दिन निर्माणाधीन इमारतों का गिरना सुनाई देता है, अक्सर किसी न किसी सार्वजनिक, निजी संपत्ति के कारण दुर्घटनाएं होती रहती हैं. देखने में आया है कि इन दुर्घटनाओं से कोई सीखने को तत्पर नहीं दिखता है. दुर्घटनाओं के होने के बाद भी न केवल मानव-रहित रेलवे क्रासिंग नागरिकों द्वारा पार की जाती है वरन जहाँ क्रासिंग है वहां भी दो-पहिया वाहनों वाले, पैदान नागरिक उसे पार करते देखे जाते हैं. सेल्फी मोड के चलते भी नौजवान अक्सर दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं.

ये सवाल सबसे अहम है कि हम कब सीखेंगे? क्या हम हादसों को देख-सुनकर उन्हें विस्मृत करने का काम ही करते रहेंगे? दुर्घटनाओं के बाद सरकार, शासन, प्रशासन को कोसने का काम करते रहेंगे? मुआवजे के चंद रुपये किसी व्यक्ति की भरपाई नहीं कर सकते. ये बात सरकार को, हम नागरिकों को समझनी ही होगी. न केवल समझना होगा बल्कि प्रण करना होगा कि अब ऐसी लापरवाहियाँ और नहीं, वे चाहें सम्बंधित तंत्र की तरफ से हों या फिर नागरिकों की तरफ से. आखिर एक-एक जान की कीमत उसके परिवार को, देश को चुकानी होती है.

30 मार्च 2018

मानदेय प्रवक्ताओं के भविष्य से खिलवाड़ उचित नहीं


वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार के आने के बाद उत्तर प्रदेश के अशासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत सैकड़ों मानदेय शिक्षकों को अपने विनियमितीकरण को लेकर एक आशा की किरण दिखाई दी थी। इसके पीछे केंद्र सरकार का बेरोजगारी दूर करने का और युवाओं को अधिक से अधिक अवसर देने का संकल्प दिखाई दे रहा था। यद्यपि केंद्र की भाजपा सरकार के किसी भी कदम से पूर्व उत्तर प्रदेश की सपा सरकार द्वारा इन मानदेय शिक्षकों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने के उद्देश्य से समय-समय पर विनियमित करने के कदम उठाये जाते रहे तथापि वे पूर्णता की ओर कभी न जा सके। प्रदेश की सपा सरकार ने विधानसभा 2017 के चुनाव को देखते हुए एक बार फिर इन मानदेय शिक्षकों को लुभाने के लिए कागजी कार्यवाही आरम्भ की। प्रदेश के मानदेय शिक्षक एक बार पहले भी सपा सरकार के इस तरह के कदम का शिकार हो चुके थे जो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा वर्ष 2006 में ठीक चुनाव से पूर्व उठाया गया था। उसके बाद सपा की जगह बसपा सरकार प्रदेश में बनी और मानदेय प्रवक्ताओं के विनियमितीकरण की प्रक्रिया सार्थक रूप न ले सकी।


अबकी मानदेय प्रवक्ता किसी तरह के भुलावे का शिकार नहीं बनना चाहते थे। सपा सरकार की मंशा को भांपते हुए केंद्र की भाजपा सरकार एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आस्था व्यक्त करते हुए मानदेय प्रवक्ताओं ने एकजुट होकर भाजपा को वोट देते हुए प्रदेश में प्रचंड बहुमत से भाजपा की सरकार बनवाई। सरकार बनते ही सभी मानदेय शिक्षकों के चेहरों पर भी स्थायी होने की खुशी झलकने लगी। इस ख़ुशी का आरम्भिक चरण दिखाई भी दिया जबकि प्रदेश में पूर्व में चलती आ रही प्रक्रिया पर वर्तमान प्रदेश सरकार ने अपनी रुचि दिखाई और लगभग 150 मानदेय प्रवक्ताओं को विनियमित किया गया। सरकार के इस कदम से शेष बचे लगभग सात सौ से अधिक मानदेय शिक्षकों में अपने विनियमित किये जाने की आशा जगी। सरकार की ओर से चलने वाली प्रक्रिया को उस समय मानदेय शिक्षकों में उस समय और भी आशा का संचार कर गई जबकि गत वर्ष सितम्बर माह में शासन की तरफ से आनन-फानन समस्त अशासकीय महाविद्यालयों से समस्त मानदेय प्रवक्ताओं के सम्बन्ध में समस्त जानकारी माँगी गई।

इधर मानदेय प्रवक्ता सितम्बर 2017 से लेकर मार्च 2018 तक अपने विनियमित किये जाने सम्बन्धी पत्र का, शासनादेश का इंतजार ही करते रहे और उधर प्रदेश में उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग का गठन हो गया। आयोग के गठित होते ही माननीय न्यायालय के आदेश  का पालन होने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी गई। न्यायालय में लंबित पूर्व विज्ञापन संख्या 37 की नियुक्तियों की प्रक्रिया आरम्भ करते हुए आयोग ने आधा दर्जन से अधिक विषयों के अंतिम परिणाम घोषित कर दिए। आयोग का यह कदम भले ही माननीय न्यायालय के आदेश पर उठा हो मगर इसने प्रदेश भर के मानदेय प्रवक्ताओं में भय का, निराशा का माहौल बना दिया। इसका कारण यह है कि इन नियुक्तियों से मानदेय प्रवक्ता सीधे-सीधे प्रभावित हो रहे हैं।

अब इन सैकड़ों मानदेय शिक्षकों को अपना भविष्य अंधकार में दिखाई देने लगा है और ये शिक्षक केंद्र की मोदी एवं प्रदेश की योगी सरकार से अपने को ठगा सा महसूस कर रहे है। उनको सरकार द्वारा अपने प्रति किसी तरह का सार्थक, सकारात्मक सहयोग मिलता नहीं दिख रहा है। मानदेय शिक्षकों के सामने जितनी बड़ी समस्या उनके बाहर निकल जाने की है उससे बड़ी समस्या उनके दोबारा किसी कार्य के आरम्भ करने की है। उत्तर प्रदेश में मानदेय प्रवक्ताओं की भर्ती वर्ष 1998-99 से होना आरम्भ हुई थी। तब से अपनी युवावस्था के लगभग डेढ़-दो दशक तक अशासकीय महाविद्यालयों में पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा से अपनी सेवाएं दे चुके ये मानदेय शिक्षक उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके हैं कि इनके पास अब रोजगार का कोई दूसरा साधन भी नहीं बचा है। इसके अलावा इन मानदेय शिक्षकों में कई ऐसी महिलाएं भी शामिल हैं जो अपने परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र सहारा हैं। यहाँ इन मानदेय प्रवक्ताओं के भविष्य के अंधकारमय होने के साथ-साथ उनके पाल्यों के भी भविष्य का नकारात्मक रूप से प्रभावित होना दिखाई पड़ता है। मानदेय शिक्षकों की वर्तमान नौकरी चले जाने के बाद उनके बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होने का खतरा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि कोई भी सरकार एक व्यक्ति को लाभान्वित करने के साथ-साथ किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान कैसे पहुँचा सकती है जबकि किसी भी सरकार का नैतिक और प्राथमिक उद्देश्य अपने नागरिकों के हितों की, भविष्य की सुरक्षा करना होता है। आयोग द्वारा घोषित किये जा रहे अंतिम परिणामों और उसके सापेक्ष होने वाली नियुक्तियों के सम्बन्ध में प्रदेश सरकार चाहे तो मानदेय शिक्षकों के भविष्य को अंधकारमय होने से रोक सकती है । विगत कई वर्षों से आयोग द्वारा प्रदेश के अशासकीय महाविद्यालयों में नियुक्तियाँ नहीं की जा सकी हैं, इससे प्रदेश भर में सैकड़ों पद रिक्त हैं। यदि माननीय न्यायालय के आदेशानुसार पूर्व विज्ञापनों की नियुक्तियां उन्हीं मूल पदों पर करने की अनिवार्यता है तो ऐसी नियुक्तियों से प्रभावित होने वाले मानदेय शिक्षकों को अन्यत्र पड़े रिक्त पदों पर भी समायोजित किया जा सकता है। ऐसी विषम परिस्थिति में किसी भी सरकार की नैतिक जिम्मेवारी बनती है कि वह अपने मजबूर नागरिकों के साथ खड़ी हो।

ऐसा भी नहीं है कि प्रदेश के मानदेय प्रवक्ता विनियमित नहीं किये गए हैं और ऐसा भी नहीं है कि शेष बचे मानदेय प्रवक्ताओं के विनियमितीकरण से सरकार पर राजस्व का बोझ बढ़ेगा। दरअसल समस्त मानदेय प्रवक्ता पूर्व निर्धारित पदों पर कार्य कर रहे हैं और वेतन संदाय से मानदेय प्राप्त कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में पूर्व में आई तमाम आपत्तियों का निस्तारण भी किया जा चुका है। चूँकि पिछले वर्ष ही एक सैकड़ा से अधिक मानदेय शिक्षकों को इसका लाभ दिया जा चुका है, ऐसे में शेष बचे मानदेय शिक्षकों को भी सहजता के साथ विनियमित कर उनके सिर पर लटकती तलवार को सदा के लिए दूर किया जा सकता है। वैसे यहाँ समझने वाली बात ये है कि केंद्र और प्रदेश में भाजपा सरकार होने के बाद उनके बीच आपसी किसी तरह के विभेद की कोई सम्भावना भी नहीं है। जहाँ केंद्र और प्रदेश सरकार युवाओं के लिए लगातार नई-नई, भविष्योन्मुख योजनाओं को लाने की बात करती हैं तब इन मानदेय शिक्षकों के विनियमित किये जाने में इतनी हीला-हवाली क्यों हो रही है, ये समझ से परे है। वैसे भी जिस देश में हजारों की संख्या में अन्नदाता परेशान घूम रहा हो, आत्महत्या कर रहा हो वहाँ बच्चों का भविष्य बनाने वाले शिक्षकों के बारे में कौन सोचेगा? ये इस देश की विडम्बना है कि यहाँ अपनी इच्छा से अब मृत्यु को तो चुनना तो संभव हो गया है किन्तु अपनी इच्छानुसार जीना संभव नहीं रह गया है।  अंधकारमय भविष्य को लेकर सशंकित सैकड़ों मानदेय प्रवक्ता पूरी तरह से निराश होकर अब खुद को निकाले जाने का इंतजार कर रहे हैं क्योंकि शासन स्तर से, सरकार के स्तर से उनके विनियमितीकरण का कोई आश्वासन अभी तक नहीं मिला है ।

12 दिसंबर 2017

असंतोष - चुनाव पूर्व भी, चुनाव पश्चात् भी

उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव संपन्न हुए. प्रशासनिक दृष्टि से सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ. कहीं कोई दंगा-फसाद नहीं, कहीं कोई बलवा नहीं, कहीं कोई उपद्रव नहीं. प्रशासन के लिए किसी भी चुनाव को संपन्न करवाना अपने आपमें बहुत बड़ी चुनौती होती है और वर्तमान चुनाव की चुनौती उसने सहजता से पूरी कर ली. इन निकाय चुनाव का एक दूसरा पहलू ये भी रहा कि प्रशासनिक दृष्टि से भले ही ये चुनाव पूरी शांति से निपटे हों मगर सामाजिक रूप से जबरदस्त अशांति इन चुनावों में देखने को मिली. जहाँ-जहाँ परिचित लोग थे, मित्र-सहयोगी थे वहां से आसानी से खबरें सामने आती रहीं. टिकट वितरण को लेकर प्रत्याशियों में असंतोष रहा. उसके बाद कुछ प्रत्याशी बागी बने, कुछ अपना टिकट होता न देख पहले ही निर्दलीय की राह चल दिए. उसके बाद विभिन्न दलों में टूट-फूट का सिलसिला जारी हुआ. बहुत सारी जगहों का जैसा आकलन किया था वैसा कुछ-कुछ वहाँ के हालातों से सामने आता दिखा भी मगर अपने गृह जनपद की स्थिति को आँखों देखा कहा जा सकता है. यहाँ की बहुतायत सीटों पर असंतोष जैसी स्थिति रही, बगावत की स्थिति रही, मतदाताओं के खरीद-फरोख्त की स्थिति रही. गृह जनपद जालौन की चारों नगर पालिकाओं में से सर्वाधिक चर्चित सीट उरई की रही.


उरई नगर पालिका परिषद् में भाजपा सहित अन्य दलों के टिकट वितरण में असंतोष होने से चार प्रमुख दलों-भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा में से सिर्फ कांग्रेस ही एकमात्र पार्टी ऐसी रही जिसमें बगावत नहीं हुई. भाजपा, सपा, बसपा में टिकट वितरण को लेकर नाराजगी रही और उससे बागी प्रत्याशी मैदान में उतर आये. इन बागियों में भी सर्वाधिक चर्चित प्रत्याशी अनिल बहुगुणा रहे. उरई नगर पालिका परिषद् अध्यक्ष पद हेतु चुनावी मैदान में उतरे बाईस प्रत्याशियों में सर्वाधिक चर्चित प्रत्याशी अनिल बहुगुणा ही रहे. टिकट घोषित होने वाले दिन ही महज दो घंटे के भीतर वैश्य समाज की बैठक सम्पन्न हुई, जिसमें सर्वसम्मति से, दबाव से भाजपा के बागी प्रत्याशी के रूप में अनिल बहुगुणा को मैदान में उतार दिया गया. भाजपा से अलग होने के बाद भी भाजपा की जिला कार्यकारिणी, नगर कार्यकारिणी सहित विधायकों एवं अन्य वर्तमान-पूर्व पदाधिकारियों द्वारा बागी प्रत्याशी को मदद की जाती रही. पूरे चुनाव प्रचार जो सामाजिक असंतोष किसी प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखाई देना था, वो तो ज़ाहिर था किन्तु चुनाव परिणामों के बाद निर्वाचित अध्यक्ष अनिल बहुगुणा द्वारा दिए गए बयानों के बाद उस तबके में भी असंतोष दिखाई दिया जिसने बहुगुणा जी को निर्दलीय या फिर कहें कि भाजपा को हराने में सक्षम व्यक्ति को वोट किया. 

चुनाव जीतने के बाद निर्वाचित अध्यक्ष अनिल बहुगुणा द्वारा एक बैठक में सार्वजनिक रूप से बयान दिया गया कि वे सदैव भाजपा में थे, भाजपा में रहेंगे; पार्टी से बगावत करने के बाद वे लगातार प्रदेश अध्यक्ष के संपर्क में रहे; अध्यक्ष की मौन सहमति उनके साथ रही; वे उप-चुनाव में भाजपा प्रचार की जिम्मेवारी भी संभाल रहे हैं; भाजपा से न तो हटाये गए थे, न उन्होंने छोड़ी थी; भाजपा नेतृत्व ने उन पर कोई कार्यवाही भी नहीं की. इस तरह की बयानबाजी से वे लोग ज्यादा आहत दिखे जिन्होंने अनिल बहुगुणा को निर्दलीय समझ वोट किया था. कई लोग इस तरह का आक्रोश, असंतोष प्रदर्शित करते दिखाई दिए. जैसा कि सामाजिक असंतोष पार्टी स्तर पर प्रचार के दौरान दिखाई दे रहा था कुछ उसी तरह का असंतोष परिणाम घोषित होने के बाद भी दिखाई दिया. इस असंतोष में अबकी नव-निर्वाचित सभासद भी शामिल दिखे. यदि इस तरह का असंतोष अभी शपथ-ग्रहण वाले दिन ही दिखाई दे रहा है तो आशंका है कि समूचा कार्यकाल शांति से संपन्न होगा. इसका असर अध्यक्ष या सभासदों की सेहत पर क्या पड़ेगा ये अलग बात है किन्तु सत्य यह है कि इससे उरई के विकास पर अवश्य ही असर पड़ेगा. 

14 दिसंबर 2016

विसंगति बढ़ाएगा वेतन का विशाल अंतर

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी देकर चुनावी दाँव चल दिया है. इस निर्णय से राज्य के सत्ताईस लाख कर्मियों को लाभ पहुँचेगा. वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब राज्य कर्मियों को और पेंशनरों को केन्द्रीय कर्मियों की तरह सातवें वेतन आयोग का लाभ मिलने लगेगा. चुनावों की आहट देखते हुए राज्य सरकार ने वेतन वृद्धि को इसी वर्ष जनवरी से स्वीकार किया है जबकि नकद रूप में यह लाभ अगले माह जनवरी से मिलने लगेगा. यह स्वाभाविक सी प्रक्रिया है कि समय-समय पर बने वेतन आयोगों द्वारा देश की स्थिति, मंहगाई और अन्य संसाधनों के सापेक्ष वेतनमान का निर्धारण किया जाता रहा है, जिसके आधार पर केन्द्रीय कर्मियों के साथ-साथ राज्यों के कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि होती रही है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मानने के बाद उत्तर प्रदेश के कर्मियों में औसतन 14.25 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिलेगी. इस वेतन वृद्धि के बाद राज्य में न्यूनतम वेतन 18000 रुपये हो जायेगा, जो अभी तक 15750 रुपये है. इसी तरह उच्चतम वेतन 2.24 लाख रुपये हो जायेगा, जो अभी 79000 रुपये है. उच्चतम वेतन का लाभ राज्य के पीसीएस उच्च संवर्ग को प्राप्त होगा.


राज्य कर्मियों के लिए ये ख़ुशी का पल हो सकता है कि उनके लिए सरकार ने राज्य वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. नए वेतन का नकद लाभ भी अगले माह से मिलने लगेगा. इस ख़ुशी के साथ-साथ सामाजिक रूप से बढ़ती आर्थिक विषमता की तरफ किसी का ध्यान शायद नहीं जा रहा होगा. एक पल को रुक कर विचार किया जाये तो स्थिति में घनघोर असमानता नजर आती है. समाज का एक व्यक्ति को राज्य कर्मचारी के रूप में अंतिम पायदान पर खड़ा हुआ है वो बीस हजार रुपये का वेतन भी प्राप्त नहीं कर पा रहा है और उसी समाज का उच्च संवर्ग कर्मी उससे दस गुने से अधिक वेतन प्राप्त कर रहा है. समाज में तमाम सारी विषमताओं के साथ-साथ आर्थिक विषमतायें सदैव से प्रभावी रही हैं. इन विषमताओं ने हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के मध्य प्रतिस्पर्द्धा पैदा करने के साथ-साथ वैमनष्यता भी पैदा की है. कमजोर वर्ग को हमेशा से ये लगता रहा है कि सुविधासंपन्न लोगों ने उनके अधिकारों को छीना है, उनके हक़ को मारा है. ऐसी सोच, मानसिकता बहुत हद तक वेतनभोगियों में भी देखने को मिलती है. छठें वेतन आयोग की सिफारिशें स्वीकार किये जाने के बाद से ऐसी सोच खुलेआम देखने को मिली थी. निचले स्तर के और उच्च स्तर के कर्मियों के मध्य वैचारिक टकराव देखने के साथ-साथ वैमनष्यपूर्ण तकरार तक देखने को मिली थी. अब जबकि वेतन का अंतर बहुत बड़ा हो गया है तब वैमनष्यता, टकराव का स्तर और बड़ा हो जाये, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है.


विगत कुछ समय से, जबसे वैश्वीकरण की, भूमंडलीकरण की बयार चली है, आर्थिक गतिविधियों के द्वारा समूचा जीवन संचालित होने लगा है, समाज अपने आपमें एक बाजार बनकर रह गया है तब सरकारों ने नागरिक हितों को भी आर्थिक स्तर पर संचालित करना शुरू कर दिया है. नागरिकों को मिलने वाले तमाम लाभों का निर्धारण लोगों के आर्थिक स्तर के आधार पर होने लगा है. एक निश्चित आय से नीचे के नागरिकों के लिए सरकारें सदैव से कार्यशील रही हैं किन्तु जिस तरह से अब वेतन में जबरदस्त अंतर देखने को मिला है वो न केवल मानसिक अशांति पैदा करेगा वरन सामाजिक विद्वेष का कारक भी बन सकता है. वैश्वीकरण के दौर में जीवन, समाज, व्यक्ति भले ही बाजार के हाथों में खेलने लगा हो किन्तु सरकारों को अपने आपको बाजार बनने से बचना चाहिए. उनका दायित्व अपने कर्मियों को वेतन देना मात्र नहीं है. सरकारों का उत्तरदायित्व अपने नागरिकों को सुरक्षा, उनके विकास, उन्नति का भरोसा दिलाना तो है ही साथ ही उसके लिए अवसर उपलब्ध करवाना भी है. ये सरकारें चाहे केन्द्रीय स्तर की हों अथवा राज्य स्तर की, इन सभी को नागरिक हित में ही कार्य करने होते हैं. वर्तमान सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को जिस तरह से केन्द्रीय स्तर पर और अब राज्य स्तर पर स्वीकार किया गया वो समस्त कर्मियों को लाभान्वित भले करता हो किन्तु मानसिक रूप से, सामाजिक रूप से बहुत से कम कर्मियों को लाभान्वित करेगा. वेतन का विशाल अंतर मानसिक अशांति बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक विद्वेष को बढ़ाएगा, आपसी वैमनष्यता को बढ़ाएगा, न्यूनतम वेतनभोगी कर्मियों की कार्यक्षमता को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा. 

02 नवंबर 2016

समाजवादी परिवार का लाभ अखिलेश के पार्टी बनाने में निहित है

उत्तर प्रदेश विगत कुछ समय से जिस तरह से सरकार और एक परिवार के आपसी विवाद का चल रहा है वो चुनावी वर्ष में क सोची-समझी रणनीति समझ आ रही है. समाजवादी पार्टी के वर्तमान विवाद को जिस तरह से पारिवारिक विवाद के साथ-साथ संगठन और सरकार का विवाद दिखाया जा रहा है, असलियत उससे कहीं अलग है. समूचा घटनाक्रम इस तरह से सामने लाया जा रहा है कि देखने वाले को ये चाचा-भतीजा, बाप-बेटे, भाई-भाई का विवाद समझ आये. यदि गम्भीरता से समाजवादी पार्टी की सरकार के वर्तमान कार्यकाल, उसकी कार्यशैली, मंत्रियों से लेकर सामान्य कार्यकर्त्ता के कार्यों का आकलन, अध्ययन किया जाये तो सहज रूप में इस विवाद के पीछे बहुत कुछ दिखाई दे जाता है. लगभग एक माह पहले स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा भ्रष्टाचार के चलते एक मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से बाहर करने के साथ-साथ अपने ही चाचा शिवपाल यादव के समस्त विभागों को छीन लिया गया था. उसके बाद के नाटकीय घटनाक्रम के पश्चात् न केवल शिवपाल यादव के तमाम विभागों की वापसी हुई वरन मुख्यमंत्री द्वारा बर्खास्त किये गए मंत्री की भी मंत्रिमंडल में वापसी हुई. ये अपने आपमें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत दुखद एवं शर्मनाक पहलू था कि मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त किये गए व्यक्ति की वापसी उसे दोषमुक्त करवाने के बजाय सड़कों पर उतर कर करवाई गई. 



उस शर्मनाक अवसर के गवाह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बने और उन्होंने अपनी लोकप्रियता के ग्राफ में कुछ गिरावट अवश्य ही महसूस की. उस मौके पर अखिलेश यादव को माननीय राज्यपाल महोदय को अपना इस्तीफ़ा सौंपकर विधानसभा भंग करके चुनाव की सिफारिश कर देनी चाहिए थी. यही वो बिंदु था जो न केवल उनकी राजनैतिक छवि को और मजबूत करता वरन कहीं न कहीं उन्हीं के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की नैया भी पार लगा सकता था. लेकिन चूक हो चुकी थी. समाजवादी सरकार के विगत साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल पर जनता की असंतुष्टि की खबर समाजवादी आलाकमान के पास न हो, ऐसा संभव नहीं. ऐसे में समाजवादी पार्टी आलाकमान की तरफ से इस भूल सुधार करने के अलावा और कोई चारा बचता भी नहीं था. विवाद के ऊपरी-ऊपरी सिरों को न देखते हुए उसके सूक्ष्म तत्त्व पर निगाह डाली जाये तो बहुत कुछ स्वतः स्पष्ट सा होता दिखता है.

सबसे पहले शिवपाल यादव का अचानक ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना आश्चर्य का विषय है. सरकारी स्तर पर देखा जाये तो उनके द्वारा इधर ऐसा कौन सा अपराध किया गया था जिसके चलते उनको बर्खास्त किया गया? इस बर्खास्तगी के साथ अन्य चार की बर्खास्तगी भी सवालिया निशान लगाती है. ऐसे में विवाद के पूर्वनियोजित होने का आभास होता है. इस आभास को तब और बल मिलता है, जबकि खुद मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व में हटाये गए मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल में यथावत रखा जाता है. राजनैतिक विश्लेषकों के लिए ये अपने आपमें शोध, चुनौती का विषय होना चाहिए कि आखिर इसके पीछे की समूची राजनीति आखिर है क्या? और यदि है भी तो क्यों?

उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति जनता में एक तरह की असंतुष्टि, एक तरह की नाराजगी, एक तरह का आक्रोश है. इसके पीछे उसके कार्यों से ज्यादा मंत्री स्तर से लेकर कार्यकर्त्ता स्तर तक की कार्यशैली जिम्मेवार है. इसके बाद भी जनमानस में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रति सहानुभूति की लहर है. लोगों में ऐसा विश्वास है कि वे युवा होने के नाते अच्छा काम कर सकते थे किन्तु पारिवारिक और पार्टी के बुजुर्गों के दवाब में ऐसा नहीं कर सके. पार्टी आलाकमान कहीं न कहीं जनता की इस सहानुभूति को अपने पक्ष में वोट के रूप में परिवर्तित करना चाहता है. हालिया विवाद इसी पृष्ठभूमि से निकल कर सामने खड़ा हुआ है. पिछले स्वर्णिम अवसर कर की गई चूक की भरपाई के साथ-साथ आम जनमानस में अखिलेश के प्रति संवेदनात्मक वातावरण का निर्माण भी अदृश्य रूप से किया जा रहा है. इसी रणनीति के अंतर्गत अखिलेश का लालन-पालन उनकी बुआ के द्वारा किया जाना, स्वयं उन्हीं के द्वारा अपना नाम रखना, सौतेली माता का अपने पुत्रमोह में होना, चाचा शिवपाल यादव से नाराजगी आदि विषयों को इसी समय उठाया गया है. एक ऐसी पार्टी जिसकी कार्यशैली को लेकर जनमानस में नाराजगी, असंतुष्टि है उसके पदाधिकारी, आलाकमान ठीक चुनावों के समय इस तरह सार्वजनिक रूप से विवाद पैदा कर रहे हैं, ये सोचने का विषय है.

समाजवादी पार्टी में किसी वजह से आंतरिक कलह मची हुई हो, उनके पारिवारिक सदस्यों में किसी तरह का मनमुटाव हो इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है किन्तु वे सब अपने इसी विवाद के द्वारा उत्तर प्रदेश की चुनावी वैतरणी को पार करने का मन बना चुके हैं. ऐसा इसलिए कि यदि समाजवादी पार्टी इस विवाद के साथ चुनावों में उतरती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, अखिलेश यादव के साथ-साथ रामगोपाल यादव, अमर सिंह, आजम खान जैसे दिग्गजों के अपने-अपने गुट बदला लेने की भावना के साथ भितरघात का काम करें. सम्भावना इसकी भी प्रबल है कि मतदाता समाजवादी पार्टी को नकारते हुए किसी दूसरी पार्टी के प्रति अपना विश्वास व्यक्त करे. ऐसे आशंकित वातावरण में यदि अखिलेश यादव नई पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतारते हैं तो उनके ज्यादा सफल होने की सम्भावना है. इसके पीछे का कारण जनमानस में उनके प्रति विश्वास होना.

जैसा कि अभी तक की स्थितियाँ सामने हैं, उसे देखकर वर्तमान संकट पूर्वनियोजित लग रहा है और यदि वाकई ऐसा है तो अखिलेश के नई पार्टी बना लेने से समाजवादी पार्टी को किसी भी रूप में नुकसान नहीं होने वाला है. नई पार्टी बनाये जाने से जहाँ समाजवादी का वो परंपरागत मतदाता जो मुलायम सिंह के नाम पर एकजुट होता है वो निश्चित रूप से समाजवादी पार्टी को ही वोट करेगा. ऐसा मतदाता जो समाजवादी पार्टी की वर्तमान कार्यप्रणाली से असंतुष्ट है वो तथा ऐसा मतदाता जो अखिलेश के प्रति सहानुभूति रखता है वो निश्चित रूप से अखिलेश के पक्ष में मतदान करेगा. इसके अलावा अखिलेश के नई पार्टी बनाये जाने से उन मतदाताओं को किसी तरह की समस्या महसूस नहीं होगी जो मुलायम सिंह को, समाजवादी पार्टी को कारसेवकों पर गोलियाँ चलाये जाने का दोषी मानते हैं.

ज़ाहिर है कि ऐसी स्थितियों के कारण यदि अखिलेश तीन अंक में सीट जीत ले जाते हैं तो यकीनन सत्ता के दावेदारों में शामिल हो सकते हैं. युवा, स्वस्थ सोच, स्वतंत्र निर्णय लेने की सम्भावना, समाजवादी के तथा परिवार के बुजुर्गों के नियंत्रण से बाहर रहने, विकास के प्रति नजरिया आदि होने के चलते उन्हें अन्य दूसरे दलों का समर्थन भी मिल सकता है. इसके साथ-साथ यदि वर्तमान संकट पारिवारिक स्तर पर नियोजित है तो फिर समाजवादी पार्टी का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष समर्थन भी उनके लिए संजीवनी का काम कर सकता है.

वर्तमान हालात में इस समूचे विवाद को पारिवारिक तौर पर नियोजित कहने का एक और आधार बनता है और वो है बहुजन समाज पार्टी को सत्ता से दूर करने की मानसिकता. देश में, प्रदेश में राजनैतिक उठापटक का, राजनैतिक स्वार्थ का कैसा भी माहौल क्यों न बना हो किन्तु गेस्ट हाउस कांड के बाद से समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के बीच, मुलायम सिंह, मायावती के बीच किसी तरह के राजनैतिक सुलह-समझौते के आसार शून्य ही हैं. ऐसे में समाजवादी किसी भी रूप में नहीं चाहेगी कि उनकी नाकामी का, उनके प्रति जनता के आक्रोश का, नाराजगी का लाभ किसी भी रूप में बहुजन समाज पार्टी को मिले. इस दृष्टि से भी वर्तमान संकट को पूर्वनियोजित माना जा सकता है.


फ़िलहाल तो समाजवादी पार्टी में समझौते जैसे कोई आसार दिख नहीं रहे हैं. भले ही मुलायम सिंह ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बने रहने के संकेत कर दिए हैं किन्तु जिस तरह से उन्होंने अमर सिंह, शिवपाल यादव का समर्थन किया है उससे स्पष्ट है कि ये झींगामुश्ती बहुत लम्बे समय तक नहीं चलेगी. इस विवाद के सहारे पार्टी आलाकमान अपने मंत्रियों, विधायकों, कार्यकर्ताओं, मतदाताओं का लिटमस टेस्ट भी कर ले रहा है. जिसके आधार पर चुनाव से पहले अखिलेश के प्रति जन्मी मतदाताओं की, जनता की सहानुभूति को वोट में परिवर्तित किया जायेगा, भले ही इसके लिए परदे के पीछे से अखिलेश को नई पार्टी बनाये जाने के रास्ते क्यों न खोले जाएँ. 

27 अक्टूबर 2016

नियोजित विवाद का लाभ समाजवादी परिवार को ही

समाजवादी पार्टी के वर्तमान विवाद जिस तरह से पारिवारिक विवाद के साथ-साथ संगठन और सरकार का विवाद दिखाया जा रहा है, असलियत उससे कहीं अलग समझ आती है. प्रथम दृष्टया देखने पर ऐसा ही प्रतीत हो रहा है जैसे कि ये मंत्रियों का, मंत्रिमंडल का, सरकार का विवाद न होकर विशुद्ध पारिवारिक विवाद है. समूचा घटनाक्रम इस तरह से सामने लाया जा रहा है कि देखने वाले को ये चाचा-भतीजा, बाप-बेटे, भाई-भाई का विवाद समझ आये. यदि गम्भीरता से समाजवादी पार्टी की सरकार के वर्तमान कार्यकाल, उसकी कार्यशैली, मंत्रियों से लेकर सामान्य कार्यकर्त्ता के कार्यों का आकलन, अध्ययन किया जाये तो सहज रूप में इस विवाद के पीछे बहुत कुछ दिखाई दे जाता है. लगभग एक माह पहले स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा भ्रष्टाचार के चलते एक मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से बाहर करने के साथ-साथ अपने ही चाचा शिवपाल यादव के समस्त विभागों को छीन लिया गया था. उसके बाद के नाटकीय घटनाक्रम के पश्चात् न केवल शिवपाल यादव के तमाम विभागों की वापसी हुई वरन मुख्यमंत्री द्वारा बर्खास्त किये गए मंत्री की भी मंत्रिमंडल में वापसी हुई. ये अपने आपमें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत दुखद एवं शर्मनाक पहलू था कि मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त किये गए व्यक्ति की वापसी उसे दोषमुक्त करवाने के बजाय सड़कों पर उतर कर करवाई गई.


उस शर्मनाक अवसर के गवाह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बने और उन्होंने अपनी लोकप्रियता के ग्राफ में कुछ गिरावट अवश्य ही महसूस की. उस मौके पर अखिलेश यादव को माननीय राज्यपाल महोदय को अपना इस्तीफ़ा सौंपकर विधानसभा भंग करके चुनाव की सिफारिश कर देनी चाहिए थी. यही वो बिंदु था जो न केवल उनकी राजनैतिक छवि को और मजबूत करता वरन कहीं न कहीं उन्हीं के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की नैया भी पार लगा सकता था. लेकिन चूक हो चुकी थी. समाजवादी सरकार के विगत साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल पर जनता की असंतुष्टि की खबर समाजवादी आलाकमान के पास न हो, ऐसा संभव नहीं. ऐसे में समाजवादी पार्टी आलाकमान की तरफ से इस भूल सुधार करने के अलावा और कोई चारा बचता भी नहीं था. ऐसे में शिवपाल यादव का अचानक ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना आश्चर्य का विषय है. उनके द्वारा इधर ऐसा कौन सा अपराध किया गया था जिसके चलते उनको बर्खास्त किया गया? इस बर्खास्तगी के साथ अन्य चार की बर्खास्तगी भी सवालिया निशान लगाती है. विवाद के नियोजित होने के आभास को तब और बल मिलता है, जबकि खुद मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व में हटाये गए मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल में यथावत रखा जाता है.

उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति जनता में एक तरह की असंतुष्टि, एक तरह की नाराजगी, एक तरह का आक्रोश है. इसके पीछे उसके कार्यों से ज्यादा मंत्री स्तर से लेकर कार्यकर्त्ता स्तर तक की कार्यशैली जिम्मेवार है. इसके बाद भी जनमानस में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रति सहानुभूति की लहर है. लोगों में ऐसा विश्वास है कि वे युवा होने के नाते अच्छा काम कर सकते थे किन्तु पारिवारिक और पार्टी के बुजुर्गों के दवाब में ऐसा नहीं कर सके. पार्टी आलाकमान कहीं न कहीं जनता की इस सहानुभूति को अपने पक्ष में वोट के रूप में परिवर्तित करना चाहता है. हालिया विवाद इसी पृष्ठभूमि से निकल कर सामने खड़ा हुआ है. पिछले स्वर्णिम अवसर कर की गई चूक की भरपाई के साथ-साथ आम जनमानस में अखिलेश के प्रति संवेदनात्मक वातावरण का निर्माण भी अदृश्य रूप से किया जा रहा है. इसी रणनीति के अंतर्गत अखिलेश का लालन-पालन उनकी बुआ के द्वारा किया जाना, स्वयं उन्हीं के द्वारा अपना नाम रखना, सौतेली माता का अपने पुत्रमोह में होना, चाचा शिवपाल यादव से नाराजगी आदि विषयों को इसी समय उठाया गया है.

जैसा कि अभी तक की स्थितियाँ सामने हैं, उसे देखकर वर्तमान संकट पूर्वनियोजित लग रहा है और यदि वाकई ऐसा है तो अखिलेश के नई पार्टी बना लेने से समाजवादी पार्टी को किसी भी रूप में नुकसान नहीं होने वाला है. नई पार्टी बनाये जाने से जहाँ समाजवादी का वो परंपरागत मतदाता जो मुलायम सिंह के नाम पर एकजुट होता है वो निश्चित रूप से समाजवादी पार्टी को ही वोट करेगा. ऐसा मतदाता जो समाजवादी पार्टी की वर्तमान कार्यप्रणाली से असंतुष्ट है वो तथा ऐसा मतदाता जो अखिलेश के प्रति सहानुभूति रखता है वो निश्चित रूप से अखिलेश के पक्ष में मतदान करेगा. इसके अलावा अखिलेश के नई पार्टी बनाये जाने से उन मतदाताओं को किसी तरह की समस्या महसूस नहीं होगी जो मुलायम सिंह को, समाजवादी पार्टी को कारसेवकों पर गोलियाँ चलाये जाने का दोषी मानते हैं. यदि अखिलेश ऐसी स्थितियों में सीट जीत ले जाते हैं तो यकीनन सत्ता के दावेदारों में शामिल हो सकते हैं. युवा, स्वस्थ सोच, स्वतंत्र निर्णय लेने की सम्भावना, समाजवादी के तथा परिवार के बुजुर्गों के नियंत्रण से बाहर रहने, विकास के प्रति नजरिया आदि होने के चलते उन्हें अन्य दूसरे दलों का समर्थन भी मिल सकता है. इसके साथ-साथ यदि वर्तमान संकट पारिवारिक स्तर पर नियोजित है तो फिर समाजवादी पार्टी का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष समर्थन भी उनके लिए संजीवनी का काम कर सकता है.

फ़िलहाल तो समाजवादी पार्टी में समझौते जैसी स्थिति के बाद भी समझौते के आसार दिख नहीं रहे हैं. भले ही मुलायम सिंह ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बने रहने के संकेत कर दिए हैं किन्तु जिस तरह से उन्होंने अमर सिंह, शिवपाल यादव का समर्थन किया है उससे स्पष्ट है कि ये झींगामुश्ती बहुत लम्बे समय तक नहीं चलेगी. इस विवाद के सहारे पार्टी आलाकमान अपने मंत्रियों, विधायकों, कार्यकर्ताओं, मतदाताओं का लिटमस टेस्ट भी कर ले रहा है. जिसके आधार पर चुनाव से पहले अखिलेश के प्रति जन्मी मतदाताओं की, जनता की सहानुभूति को वोट में परिवर्तित किया जायेगा, भले ही इसके लिए परदे के पीछे से अखिलेश को नई पार्टी बनाये जाने के रास्ते क्यों न खोले जाएँ.



10 अक्टूबर 2016

चूके सुधार के बड़े अवसर से

चार वर्ष पहले जब युवा मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश सत्ता में आये तो लगभग सभी ने ऐसा मान लिया था कि प्रदेश की भलाई से सम्बंधित कुछ कार्य अवश्य ही सामने आयेंगे. ऐसा उनके युवा, जागरूक, उच्च शिक्षित होने के कारण हुआ था. तब पारिवारिक सहमति से उनके मुख्यमंत्री बनने को जनता ने अहमियत न देकर उनको हर्ष के साथ स्वीकार किया था. समाजवादी पार्टी की आधारभूत छवि से इतर उनके बयानों में एक गंभीर प्रशासनिक पद की छाप स्पष्ट रूप से दिखती थी. उनके कार्यों का केंद्र बहुतायत में उनका गृहनगर भले ही रहा हो मगर बहुतायत योजनाओं, कार्यों में प्रदेश की जनता को लाभ भी मिला. गृहनगर के कार्यों की आलोचनाओं के बीच उन्हें अन्य कार्यों के लिए जबरदस्त प्रशंसा ही मिली. लैपटॉप का वितरण हो, लखनऊ मेट्रो मामला हो, कन्या धन वितरण हो, समाजवादी पेंशन हो सभी में उनकी दूरगामी सोच की तारीफ की गई. समय बीतता रहा, कार्य होते रहे मगर इसके बाद भी युवा मुख्यमंत्री अपने परिवार और पार्टी के बुजुर्गजनों के नियंत्रण में ही कार्य करते से नजर आये. अधिसंख्यक मामलों में उनको अपने इन बुजुर्गों के सामने असहाय सा देखा-पाया गया. ऐसी स्थिति के बाद भी आशान्वित लोग ये मान रहे थे कि नवोन्मेषी होने के कारण वे किंचित असहाय से भले ही दिख रहे हों किन्तु असफल नहीं हैं. उसके पीछे का एक कारण अखिलेश का हँसमुख दिखना, मेलजोल वाला व्यक्तित्व समझ आने के साथ-साथ उनकी तरफ से आते बयानों में गंभीरता दिखाई देती थी. 


इधर विगत डेढ़-दो वर्षों से उनकी कार्यशैली देखने के बाद लगने लगा था जैसे कि वे इन वरिष्ठजनों की प्रेतच्छाया से बाहर आने को व्याकुल हैं. उनके कार्यों, उनकी प्रशासनिक क्षमता, कार्यशैली, बयानों के आधार पर महसूस किया जा रहा था जैसे कि वे इन बुजुर्गों के नियंत्रण में परिपक्व ही हुए हैं. विधानसभा चुनावों की आहट को भली-भांति महसूस कर रहे प्रदेश में यदि नजर दौड़ाई जाये तो अखिलेश यादव के अलावा कोई और व्यक्ति मुख्यमंत्री पद के योग्य दिखाई भी नहीं दे रहा है. ऐसा सिर्फ सपा में ही नहीं वरन सभी दलों में है. किसी के पास वर्तमान में ऐसा कोई चेहरा नहीं जो मुख्यमंत्री के तौर पर निर्विवाद रूप से स्वीकार्य हो. ऐसे में न केवल सपा पक्षधर लोगों की तरफ से वरन गैर- समाजवादी दलों के समर्थकों की तरफ से भी ऐसी चर्चाएँ होने लगी थीं कि प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश तो अच्छा काम कर रहे हैं बस वे अपने पिता-चाचा की छाया से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. कहीं न कहीं खुले स्वरों में, दबे स्वरों में इसकी चर्चा आम हो गई थी कि अखिलेश अपने बुजुर्गों के नियंत्रण में पूरी तरह से हैं और वे लोग ही उन्हें खुलकर काम नहीं करने दे रहे हैं.

ऐसी नियंत्रण की स्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट अखिलेश में देखने को मिली. चुनावी वर्ष में उनके द्वारा कार्यों का लेखा-जोखा बेहतर तरीके से सामने लाया जाने लगा. विगत कई वर्षों की जातिवादी राजनीति, समर्थकों की गुंडई, जबरिया कब्जे की घटनाओं के बीच खिसकते जनाधार को वापस लाने की कवायद उनके द्वारा की जाने लगी थी. सपा मुखिया मुलायम सिंह द्वारा समय-समय पर मंत्रियों, समर्थकों, कार्यकर्ताओं को सीख देने वाली भाषा में उनके द्वारा की जाने वाली विसंगतियों का स्वीकार्य छिपा होने के बाद भी अखिलेश ने समूचे मामलों को बड़ी ही सहजता से निपटाने का प्रयास किया. इसी बनाव-बचाव की स्थिति के बीच अचानक तूफ़ान सा आ खड़ा हुआ, जिसने न केवल समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह को सामने रखा, न केवल उनके पारिवारिक मतभेद को उजागर किया बल्कि अखिलेश की छवि को भी तार-तार किया. विगत कुछ समय से दो-दो, चार-चार घटनाओं के सहारे सामने आता सपा का मामला किसी से छिपा नहीं है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि कहीं न कहीं पार्टी स्तर पर अखिलेश की बढ़ती छवि को ही कम करने या कहें कि समाप्त करने की कोशिश की गई है.

पहले मुख़्तार अंसारी के दल का विलय रोकना फिर दागी मंत्री को बाहर का रास्ता दिखाना इस बात की पैरवी कर रहा था कि अखिलेश कुछ अच्छा करने की कोशिश में हैं, भले ही ये कोशिश चुनावों को देखते हुए है. ऐसे सशक्त क़दमों के उठाये जाने के तत्काल बाद उनको प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया जाना, फिर उसके बाद के नाटकीय घटनाक्रम के पश्चात् न केवल उनके चाचा के समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन वरन उस दागी मंत्री की वापसी होना अखिलेश के कद को ही कम करता है. अखिलेश समर्थकों को पार्टी से जुड़े तमाम पदों, संगठनों से हटाया गया. उनके समर्थक एमएलसी हटाये गए. वर्चस्व दिखाए जाने का ये खेल महज इतने पर ही नहीं रुका. जिस दल का विलय अखिलेश नहीं चाहते थे, उस दल का विलय हुआ. दागी मंत्री की न केवल वापसी हुई वरन दोबारा मंत्री भी बनाया गया. इसके बाद भी अखिलेश शांत क्यों बने रहे. क्या अपने पिता मुलायम के आदेश के चलते? क्या पिता की कतिपय अंदरूनी मजबूरियों के चलते? क्या अपने परिवार की इज्जत की खातिर? इस बिंदु पर अखिलेश को समझना चाहिए कि वे किसी एक परिवार के मुख्यमंत्री नहीं हैं वरन पूरे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. जहाँ किसी मुख्यमंत्री के पास इतनी शक्ति, इतने अधिकार नहीं कि वह अपने मंत्रिमंडल के भ्रष्ट मंत्री को बाहर का रास्ता दिखा सके तो उसका मुख्यमंत्री बने रहना सवालिया निशान है. समाजवादी की गिरती छवि के बीच अखिलेश की अपनी छवि, अपनी लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ था जो इस प्रकरण के बाद पूरी तरह से विलुप्त हो गया है. समूचे प्रदेशवासियों के बीच एक सन्देश स्पष्ट रूप से चला गया कि वे तमाम सारे निर्णय लेने के बाद भी अपने परिजनों के, वरिष्ठ पार्टीजनों के नियंत्रण में हैं.

जिस समय शिवपाल और उनके समर्थकों द्वारा सड़क पर शक्ति प्रदर्शन किया जा रहा था, उनकी वापसी के साथ-साथ रामगोपाल, अमर सिंह को बाहर किये जाने के नारे लग रहे थे, चाय के साथ वार्ताओं के दौर चल रहे थे, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सरगर्मियाँ बढ़ी हुई थीं. लेने-छोड़ने के दावे किये जा रहे थे तभी अखिलेश को कठोर और सशक्त कदम उठाये जाने की जरूरत थी. परिवार की एकता के लिए, पिता की इज्जत के लिए उनका खामोश रहना भले ही तारीफ काबिल कदम हो किन्तु एक मुख्यमंत्री के नाते, उच्च प्रशासनिक दायित्व के चलते निकाले गए दागी मंत्री की वापसी, वापस लिए गए पदों की बहाली किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है. इससे बेहतर होता कि अखिलेश मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर सूबे में चुनाव की माँग कर देते. आज नहीं तो कल चुनाव तो होना ही है, पर अखिलेश के त्यागपत्र से उनकी लोकप्रियता, कद में जबरदस्त वृद्धि हो जाती. आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर मिले अपने पिता मुलायम के बँगले को छोड़कर दूसरे बँगले में अखिलेश का जाना स्पष्ट करता है कि सबकुछ सही नहीं हुआ है. कुछ इसी तरह से पद छोड़कर अखिलेश बहुत कुछ सही करने का सन्देश अवश्य दे सकते थे. प्रदेश को, लोकतंत्र विरोधियों को, अपने विरोधियों को एक सार्थक सन्देश देने में अखिलेश चूक कर गए. हो सकता है कि इस चूक की कीमत उन्हें भी आगामी विधानसभा चुनावों में उठानी पड़ जाये.