करवाचौथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
करवाचौथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

17 अक्टूबर 2019

करवाचौथ व्रत नितांत व्यक्तिगत मामला है


समाज आधुनिकता की बात करने में लगा है, उसके द्वारा स्त्री-पुरुष समानता की बात की जा रही है, चंद्रमा पर आदमी के उतरने की आहटें सुनाई दे रही हों तब चंद्रमा के द्वारा किसी इन्सान की लम्बी उम्र की कामना किया जाना एक प्रक्रिया को हास्यास्पद बनाता ही है. सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर दिया जाये कि इस आलेख का उद्देश्य किसी भी रूप में किसी की भावनाओं से, किसी की परंपरा से, किसी की श्रद्धा से खिलवाड़ करना नहीं है. इसके द्वारा स्वयं अपने आपके तमाम सवालों के जवाब प्राप्ति का रास्ता तलाशना है. प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों के पास खुद को प्रफुल्ल्ति रखने के, लोगों से मेल-मिलाप बढ़ाने के तरीकों में पर्व-त्यौहार आदि ही हुआ करते थे. इनके माध्यम से वह मेले, प्रदर्शनी आदि का आयोजन भी कर लिया करता था. जैसा कि कतिपय कारणोंवश समाज में पर्दा प्रथा का आरम्भ हुआ, महिलाओं का घर के अन्दर रहना जैसे अनिवार्य हो गया वैसे में उनके लिए ख़ुशी पाने का रास्ता त्योहारों, पर्वों, मेलों आदि से ही गुजरता था.

ऐसे में उनके द्वारा ही एक त्यौहार करवाचौथ के रूप में भी सामने आया होगा. इसे भी पति की लम्बी उम्र से जोड़ने के भी अपने सामाजिक कारण रहे होंगे. यह हम सभी को भली-भांति ज्ञात है कि समाज में आज भी विधवाओं के प्रति सोच में सकारात्मकता उस स्तर तक नहीं आ सकी जिस स्तर तक समाज विकास कर चुका है. ऐसे में सोचा जा सकता है कि दसियों साल पहले विधवाओं के प्रति किस तरह की मानसिकता समाज में व्याप्त रही होगी. उस समय जबकि विज्ञान ने आम जनमानस के बीच अपनी पैठ नहीं बनाई होगी, तकनीक ने अपनी स्थिति स्पष्ट न की होगी तब समाज में भगवान ही सबका पालनहार, तारणहार हुआ करता था. ऐसे में किसी भी महिला के लिए अपनी स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक था कि उसके पति की आयु लम्बी रहे. ऐसे में उसके सामने भगवान् ही एकमात्र सहारा रहा होगा. उसके द्वारा इसी कारण सामाजिक मान्यताओं के अधीन बने करवाचौथ को सहज स्वीकार कर लिया होगा.


आज जबकि चंद्रमा के बारे में स्थिति सबके सामने है, किसी भी ग्रह, उपग्रह के द्वारा किसी भी व्यक्ति की उम्र बढ़ने की असलियत के बारे में भी सबको जानकारी है तब करवाचौथ मनाये जाने की स्थितियां पहले से कहीं अधिक भिन्न हैं. आज आधुनिकता के दौर में न केवल त्यौहार-पर्व आधुनिक हुए हैं वरन परम्पराओं-संस्कृतियों ने भी आधुनिकता का चोला ओढ़ लिया है. आज करवाचौथ का सामान्य सा सन्दर्भ पति की लम्बी उम्र से बहुत कम लोग ही लगाया करते होंगे. आज करवाचौथ का सन्दर्भ एक त्यौहार के आयोजन सा है. इस आयोजन में आधुनिक पति भी उसी तरह से अपनी पत्नी का सहयोग करते हैं, जैसी कि स्त्री-पुरुष समानता के विचार में अपेक्षा की जाती है. आज के दौर में इस पर्व का सन्दर्भ सजने-संवरने से, खरीददारी करने से, दाम्पत्य संबंधों की मधुरता से संदर्भित करके देखा जाने लगा है. सभी को ज्ञात है कि उम्र बढ़ने के लिए संयमित जीवन-शैली, नियंत्रित खानपान, उचित देखभाल की आवश्यकता है न कि किसी व्रत की.

आज के दौर में जैसा कि देखने में आता है कि व्यक्ति आधुनिकता की आपाधापी से ऊब कर अब पुनः प्राचीन मान्यताओं की तरफ, प्राचीन जीवन-शैली की तरफ, उसी रहन-सहन की तरफ आकर्षित हो रहा है. कुछ इसी तरह का बदलाव अब नई पीढी में देखने को मिल रहा है. नव-युगलों को हनीमून के नाम पर भले ही अपने शहर से कोसों दूर विचरण करते देखा जाता हो मगर नव-युवतियों में मांग भरने, मंगलसूत्र पहनने, कलाई भर-भर चूड़ियाँ पहनने का चलन सामान्य रूप से देखने को मिल रहा है. कपड़ों के नाम पर भले ही उनके साथ आधुनिकता हो मगर इस तरह के श्रृंगार में अभी भी पारम्परिकता देखने को मिल रही है. इसे भी नई पीढ़ी का पारंपरिक फैशन कहा जा सकता है.

कुछ इसी तरह से ही करवाचौथ के व्रत को लिया जाना चाहिए. यह किसी भी व्यक्ति के लिए उसका नितांत व्यक्तिगत मामला है. इसे न तो जबरिया मनवाया जाना चाहिए और न ही मनाये जाने वालों की भावनाओं का मजाक बनाया जाना चाहिए. करवाचौथ का मनाया जाना अथवा न मनाया जाना किसी भी रूप में स्त्री-विमर्श से संदर्भित नहीं किया जाना चाहिए. इसे किसी भी महिला का व्यक्तिगत रुचि का मामला समझकर उसी पर छोड़ देना चाहिए. आज भी समाज में लाखों महिलाएँ ऐसी हैं जिन्होंने पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत को मनाया मगर आज वैधव्य को भोग रही हैं. बहुत सी महिलाएँ ऐसी होंगी जो आये दिन अपने पति के हाथों प्रताड़ना का शिकार होती होंगी मगर फिर भी उसकी लम्बी आयु के लिए इस व्रत को रखती होंगी. तमाम महिलाएँ ऐसी होंगी जो बिना ऐसे किसी व्रत के बहुत ही हंसी-ख़ुशी से अपने दाम्पत्य जीवन का सुख भोग रही हैं. ऐसे में करवाचौथ व्रत को नितांत व्यक्तिगत मसला समझकर उन्हीं पर छोड़ दिया जाना चाहिए. ये किसी भी महिला के या कहें कि दंपत्ति के प्रसन्न रहने के, ख़ुशी तलाशने के अपने रास्ते हैं, जहाँ जबरन हस्तक्षेप करने का किसी को कोई अधिकार नहीं.

27 अक्टूबर 2018

करवाचौथ पर आधुनिकतावादियों का असमंजस


करवाचौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. इसे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में मनाया जाता है. हिन्दी महीनों के अनुसार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सुहागिन (शादीशुदा) महिलाओं द्वारा इसे मनाया जाता है. यह व्रत सूर्योदय से पहले आरम्भ होकर रात में चंद्रमा दर्शन के साथ अपनी संपूर्णता को प्राप्त होता है. करवाचौथ व्रत ग्रामीण से लेकर आधुनिक महिलाएं बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं. यह आवश्यक नहीं कि सभी महिलाएं ऐसा करती हों. शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया जाता है. वर्तमान में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं.


आज करवाचौथ होने के कारण बहुत सी महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु कामना के साथ इस व्रत को पूर्ण किया गया. जैसा कि विगत कुछ वर्षों से सोशल मीडिया के माध्यम से एक परम्परा का निर्वाह कतिपय आधुनिकतावादियों द्वारा किया जाने लगा है कि जैसे ही कोई हिन्दू पर्व आया नहीं कि उनकी दार्शनिकता बाहर निकली नहीं. कुछ ऐसा इधर भी हुआ, हो रहा है. महिला मोर्चा का संगठन संभाले स्त्री-पुरुष एक स्वर से करवाचौथ व्रत का, इसे सम्पूर्ण करने वाली स्त्रियों का उपहास उड़ाने में लग गए. यहाँ वे महिलाएं इनके निशाने पर रही जो विगत कई वर्षों से परम्परा के नाम पर ये व्रत करती चली आ रही हैं. इसके साथ-साथ वे महिलाएं भी निशाना बनीं जो खुद को आधुनिकतावादी बताती हैं इसके बाद भी इस व्रत को कर रही हैं. यहाँ ऐसी महिलाओं का उनको जवाब दिया जाता है कि वे किसी परम्परा का निर्वहन नहीं कर रहीं वरन खुद के सजने-सँवरने के शौक को पूरा कर रही हैं. इस व्रत के द्वारा वे आयोजन का आनंद ले रही हैं. मेंहदी, साज-श्रृंगार आदि के द्वारा अपने रूप-सौन्दर्य में निखार ला रहीं हैं. ऐसी आधुनिकतावादी महिलाएं ऐसे व्रत के रहने के बाद भी खुद को ईश्वरीय श्रद्धा से इतर बताती हैं. देखा जाये तो सच भी है, किसी भी व्यक्ति को अपने मन-मष्तिष्क के अनुसार किसी भी आयोजन को अपनी तरह से मनाये जाने की आज़ादी है. यह उसकी मनोदशा, व्यक्तित्व आदि पर निर्भर करता है कि वह किसी भी पर्व को, आयोजन को, परम्परा को किस तरह से स्वीकार करता है. 

इस स्वीकार्यता के बाद, इस आज़ादी के साथ ही ऐसी स्थिति भी आती है जबकि यही महिलाएं खुद को परम्परा में बाँधकर पुरुषों को दोषी बताने निकल पड़ती हैं. इसके लिए वे इसी करवाचौथ व्रत का सहारा लेती हैं. ऐसी महिलाओं को जब भी किसी बहाने से, किसी आयोजन के बहाने से, किसी व्रत के द्वारा पुरुषों को आरोपित करना होता है तो वे पुरुषों को दोषी बनाते हुए करवाचौथ व्रत को ही केंद्र में रखती हैं. तब इन महिलाओं द्वारा आरोप लगाया जाता है कि एक पत्नी अपने पति की दीर्घायु के लिए करवाचौथ का व्रत करती है. दिन भर बिना कुछ खाए-पिए भूखी रहती है और पति न तो उसके लिए कोई व्रत रखता है, न ही इस व्रत में सहयोगी बनता है. यहाँ आकर इन्हीं महिलाओं को समझ नहीं आता है कि सत्य क्या है, वे कहना क्या चाहती हैं, वे करना क्या चाहती हैं. एक तरफ वे इसी व्रत को महज अपने शौक, आनंद के लिए मानती हैं, अगले ही पल इसी का आधार वे पति की उम्र से जोड़ने लगती हैं. यदि इस पर्व का आयोजन उनकी निगाह में महज मौज-मस्ती, एक दिन के आनंद के लिए है तो वे इसे किसी दूसरी औरत के लिए पति की दीर्घायु से क्यों जोड़ने लगती हैं? किसी भी मौज-मस्ती के, आनंद के, शौक के दिन या रात का, पर्व का, व्रत का सम्बन्ध किसी की आयु से कैसे हो सकता है? आधुनिकता के वशीभूत अनिश्चय की स्थिति में डोलती आधुनिक महिलाओं को खुद स्पष्ट नहीं है कि सज-संवर कर इस व्रत को मनाने का समर्थन करें या फिर इसके द्वारा अपनी मौज-मस्ती का? उनको महज हिन्दू व्रत-त्योहारों का विरोध करना है, सो वे सज-संवर कर इसे पूरी तन्मयता से करने में लगी हैं. उन्हें न अपने शौक से मतलब है न दूसरी महिला के पति की दीर्घायु की कामना से.

03 नवंबर 2015

करवाचौथ व्रत का आयोजन किसलिए - सोचिये, विचारिये

भक्ति, आस्था के सागर में हिलोरें लेता हुआ पति-पत्नी के आपसी विश्वास-प्रेम का पर्व करवाचौथ बीत गया. चाँद को देखकर दिनभर से निर्जला व्रत रही पत्नी ने अपना उपवास खोला और अपने पति की लम्बी उम्र की कामना की. कितना हास्यास्पद सा लगता है आज के आधुनिक समाज में जबकि उन्नत और विकसित चिकित्सकीय सुविधाएँ, सेवाएँ भी किसी की मृत्यु को नहीं रोक पा रही हैं, चन्द महिलाएँ भूखे पेट रहकर चाँद से सिफारिश कर रही हैं अपने पति की उम्र बढ़ाने की. आपको लगता है हास्यास्पद या नहीं, सच-सच कहियेगा? संभव है कि आपको कई बार ये हास्यास्पद लगता हो और कई बार आप भारतीय संस्कृति के चलते इसे भक्ति-भाव से, आपसी समन्वय से जोड़कर देखते हों और हास्यास्पद न मानते हों. कितनी बड़ी विडम्बना है कि जहाँ एक तरफ हमारा समाज पढ़-लिख कर चाँद को अपने पैरों तले रौंदने को तैयार बैठा है वहाँ आज की युवा महिला पीढ़ी ही उसी चाँद की पूजा करते हुए अपने पति की दीर्घायु की कामना कर रही है. क्या है आखिर ये सब? क्यों है आखिर ये सब? किसलिए है आखिर ये सब? क्या महज इसलिए कि समाज को दिखाने के लिए पारिवारिक संस्कारों का निर्वहन करना है? क्या महज इसलिए कि कहीं न कहीं आधुनिक शिक्षित पीढ़ी और दकियानूसी होती जा रही है और मानती है कि उसके व्रत-उपवास से जीवन-चक्र में अन्तर आता है? क्या महज इसलिए कि इस तरह के आयोजन भारतीय स्त्रियों को विभिन्न क्रियाकलापों के लिए स्वतंत्रता प्रदान करते हैं? क्या महज इसलिए कि इस तरह के व्रत-उपवासों के द्वारा ऐसी स्त्रियाँ पतियों के दीर्घायु होने की कामना की आड़ में अपने वैधव्य को बचाना चाहती हैं? अंतिम बात शायद ज्यादा कड़वी महसूस हो किन्तु किसी न किसी रूप में एक सत्य ये भी है इस व्रत का.
.
करवाचौथ व्रत का आयोजन किन सन्दर्भों, परिस्थितियों में आरम्भ हुआ था, इसकी अपनी अलग कहानी है किन्तु आज जबकि स्त्री-पुरुष संबंधों को, खासतौर से पति-पत्नी के आपसी संबंधों को भी स्त्री-विमर्श के सींकचे में जकड़ लिया गया हो; महिलाओं के किसी भी काम को पुरुषों से इतर और विशिष्ट बताकर स्त्री-पुरुष संबंधों में विभेद पैदा किया जा रहा हो; पुरुष के किसी भी कदम को स्त्री-विरोधी बताकर दोनों के बीच के संबंधों में ज़हर भरा जा रहा हो; जब आस्ता-विश्वास से भरे किसी भी कदम को, आयोजन को एहसान सिद्ध करने के प्रयास किये जाते हों तो ऐसे व्रतों के आयोजन भी संदिग्ध समझ आते हैं. संभव है कि किसी समय में ऐसे व्रत-उपवास का सन्दर्भ पति-पत्नी के आपसी विश्वास-प्रेम की अभिव्यक्ति करना रहा हो, ये सवाल उठाया जा सकता है कि इस अभिव्यक्ति के लिए पुरुष को व्रत रहने का प्रावधान क्यों नहीं किया गया? बहरहाल, समाज ने आधुनिकता के चलते इक्कीसवीं सदी में प्रवेश किया और फिर पुरातनकाल से चले आ रहे आयोजनों पर अनेक विमर्शधारियों द्वारा सवाल खड़े किये जाने लगे. पारिवारिक रिश्तों पर सवाल खड़े किये गए; भाई-बहिन के रिश्तों को कलंकित किया गया; सभी रिश्तों की बुनियाद को स्वार्थ से जोड़कर, आर्थिक तत्त्व से जोड़कर, नारी-देह से जोड़कर उसको विद्रूपता के साथ परिभाषित किया गया. नारीवादियों ने स्त्री-पुरुष के किसी भी कदम को अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया और दोनों के संबंधों को स्वार्थमय सोच में बदलने का कुत्सित प्रयास किया. इसके लिए ऐसे व्रतों, आयोजनों, पर्वों को उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है जो स्त्री-पुरुष से किसी न किसी रूप में आपस में जुड़े हुए हैं.

.
रक्षाबंधन पर्व को बहुतायत नारीवादियों द्वारा बहिनों का शोषण करने वाला बता कर इस पर्व के साथ-साथ भाइयोंको भी कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. एक प्रसिद्द नारीवादी लेखिका का यहाँ तक कहना है कि एक धागे के बंधवाने पर चंद रुपये देकर भाइयों द्वारा बहिनों का मुँह सालभर के लिए बंद कर दिया जाता है ताकि वे पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा न मांगें. क्या वाकई इस व्रत का आयोजन इसीलिए किया जाता है? कुछ इसी तरह के कुतर्क करवाचौथ को लेकर दिए जाने लगे हैं. पुरुष अपनी पत्नी की दीर्घायु के लिए  व्रत क्यों नहीं रहते रहे हैं, इसके कारण खोजने पड़ेंगे किन्तु एक तरफ इन्हीं नारीवादियों की मान्यता है कि व्रत रहने से, चाँद की पूजा करने से किसी की उम्र नहीं बढ़ती तो फिर वे नारीवादी पतियों के व्रत न रहने को आरोपित क्यों करती हैं? आज के वैज्ञानिक युग में जबकि एक तरफ स्त्रियों की शिक्षा, उन्नति, आर्थिक सशक्तिकरण की चर्चा की जा रही है वहीं इस तरह के कुतर्कों के द्वारा पत्नियों के व्रत को समर्थन दिया जा रहा है. कतिपय हिन्दी फिल्मों के चलते बहुतायत में नौजवान आज अपनी पत्नी के साथ इस दिन व्रत रहने लगा है तो उसका क्या सन्दर्भ निकाला जाये कि अब पत्नियाँ भी दीर्घायु होने लगेंगी? इसके क्या सन्दर्भ निकाले जाएँ कि चाँद की पूजा करने से, व्रत रहने से किसी व्यक्ति की आयु को प्रभावित किया जा सकता है? यदि ये सत्य नहीं है तो फिर नारीवादियों द्वारा क्या सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है? पत्नी द्वारा व्रत रखकर पति के ऊपर एहसान किये जाने की बात कह कर क्या साबित करने का प्रयास किया जा रहा है? यदि ऐसे व्रत-उपवासों से पति की आयु बढ़ रही होती तो देश में वैधव्य जीवन बिता रही स्त्रियों की संख्या इस कदर न होती. ऐसे व्रतों-उपवासों को महज आपसी विश्वास, प्रेम, स्नेह का परिचायक माना जाना चाहिए और उन्हें विवादों से दूर बनाये रखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए. विवाद के नाम पर रिश्तों के कलंकित होने के सिवाय और कुछ नहीं मिलने वाला. यदि इसी को आधार बनाया जाए तो जिस तरह से नारीवादी पुरुष की आलोचना करते हुए स्त्रियों के व्रत रहने को एहसान बताते हैं ठीक उसी तरह से कहा जा सकता है कि कहीं करवाचौथ का व्रत पत्नियाँ अपने आपको वैधव्य से बचाने के लिए तो नहीं रखती हैं? आखिर उनके पति की उनसे पहले मृत्यु उनको वैधव्यपूर्ण जीवन दिखाती है. यदि व्रत-उपवास किसी की उम्र को प्रभावित करते हैं तो सोचिये और विचार करिए कि इस व्रत की वास्तविक असलियत है क्या, पति की दीर्घायु की कामना या फिर अपने को वैधव्य से बचाने का प्रयास? 
.