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09 जून 2024

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी

नरेन्द्र मोदी से पहले भाजपा से तीन बार प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी.


आज नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है. हम सभी हर्षित, उत्साहित हैं. यहाँ अति-उत्साह, हर्ष में अपनी-अपनी पोस्ट में उनके तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ लेने की बात लिख रहे हैं, वे थोड़ा सा संशोधन करते हुए उसे 'लगातार तीसरी बार' लिखें.

 

तीन बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वालों में जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी भी रहे हैं. ये बात और है कि अटल जी लगातार तीन बार शपथ लेने वालों में नहीं थे, जैसे कि नेहरू जी रहे और अब मोदी जी हैं.

 



अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार निम्न समयावधि में रहे.

पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए

दूसरी बार 1998 में 13 महीने की अवधि के लिए

तीसरी बार 1999 में पूर्ण कार्यकाल पाँच वर्ष के लिए...

25 दिसंबर 2021

ठन गई! मौत से ठन गई! सादर समर्पित


 अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता उन्हीं को सादर समर्पित.....
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ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई.

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं.

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा.

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर.

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं.

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला.

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए.

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है.

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई.

मौत से ठन गई.

कैलीग्राफी : कुमारेन्द्र सिंह सेंगर  

25 दिसंबर 2020

सादगी की प्रतिमूर्ति अटल जी

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे. वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था. पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापन कार्य तो करते ही थे इसके अतिरिक्त वे हिन्दी और ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे. पुत्र में काव्य के गुण वंशानुगत परिपाटी से प्राप्त हुए. महात्मा रामचन्द्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी. अटल जी की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज (वर्तमान में महारानी लक्ष्मीबाई कालेज) में हुई. छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने.

 

कानपुर के डी०ए०वी० कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एल-एल०बी० की पढ़ाई भी प्रारम्भ की. पिता-पुत्र की जोड़ी के एकसाथ पढ़ाई करने, परीक्षा देने का यह अनुकरणीय उदाहरण खूब चर्चा में रहा. बाद में अपनी यह पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वे पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये. डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलता पूर्वक करते रहे.

 



अटल जी भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक थे. सन् 1968 से 1973 तक वह उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे. सन् 1952 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा परन्तु सफलता नहीं मिली. बाद में सन् 1957 में बलरामपुर से जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकसभा में पहुँचे. सन् 1957 से 1977 तक जनता पार्टी की स्थापना तक वे बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे. मोरारजी देसाई की सरकार में सन् 1977 से 1979 तक विदेश मन्त्री रहे और विदेशों में भारत की छवि बनायी. सन 1980 में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर इन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की. 1980 में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व अटल जी को सौंपा गया. वे लोकसभा के अतिरिक्त दो बार राज्यसभा के लिये भी निर्वाचित हुए. लोकतन्त्र के सजग प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी ने सन् 1996 में प्रधानमन्त्री के रूप में देश की बागडोर संभाली. पहली बार उनकी सरकार महज 13 दिन तक रह सकी. कालांतर में तेरह महीने और फिर पूरे पाँच वर्ष के लिए दो बार वे फिर प्रधानमंत्री बने. गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने पाँच वर्ष तक सरकार चलाई. सर्वोन्मुखी विकास के लिये किये गये योगदान तथा असाधारण कार्यों के लिये 2015 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

 

आज अटल जी के जन्मदिन पर उनको सादर श्रद्धांजलि.


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वंदेमातरम्

18 अगस्त 2018

तन्हा रह गया अटल जोड़ी का जोड़ीदार

विगत लगभग एक दशक तक सार्वजनिक जीवन से अदृश्य रहे और मीडिया की सुर्ख़ियों से लगभग अदृश्य से रहे अटल जी अपनी अनंत यात्रा के बाद से लगातार सुर्ख़ियों में हैं. किसी ब्लॉग के माध्यम से, किसी लेख के द्वारा, कहीं कविताओं के रूप में, कहीं भाषणों के द्वारा, कहीं समाचारों के द्वारा वे लगातार जनमानस के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं. अत्यंत सामान्य परिवार से निकल कर खुद को सर्वोच्च तक ले जाने वाले अटल जी वास्तविक रूप में इसके हक़दार हैं भी कि उनके व्यक्तित्व पर लगातार चर्चा हो. ऐसे दुखद और संवेदना भरे समय में उनकी चर्चाओं के बीच एक और व्यक्ति ऐसा है जो इसी तरह की चर्चाओं का हक़दार है. अटल जी को सर्वोच्च तक पहुँचने में सहायक बने उस व्यक्ति का योगदान का योगदान किसी भी रूप में कम नहीं है. न ही अटल जी के विकास में और न ही भारतीय जनता पार्टी के विकास में. ऐसा व्यक्ति जो छह दशक से अधिक समय से अटल जी के साथ परछाईं की भांति साथ रहा, दिल-धड़कन की तरह साथ रहा, आज वह उनके जाने के बाद खुद को किस तरह अकेला, नितांत अकेला महसूस कर रहा है यह अंतिम विदाई के क्षणों में साफ़-साफ़ दिखाई दिया. अपने अभिन्न मित्र, अपने हमसाया, अपने राजनैतिक जोड़ीदार के निधन पर लाल कृष्ण आडवाणी अत्यंत दुखी, कमजोर, भावुक नजर आये. अटल जी को अंतिम विदाई देने के समय और वापस लौटने के दौरान उनकी भाव-भंगिमा अपने आप सबकुछ बयान कर रही थी.


दुःख होना स्वाभाविक भी है. आखिर उन दोनों लोगों का साथ कोई दो-चार वर्षों का नहीं था. उन दोनों की दोस्ती में कभी अविश्वास जैसी बात दिखाई नहीं दी. ऐसे में अब जबकि लाल कृष्ण आडवाणी नई तरह की दिखाई देती भाजपा में महज नाममात्र वाले मार्गदर्शक के रूप में नजर आते हैं उस समय उनका एकदम से तनहा रह जाने का कष्ट सिर्फ वही समझ सकते हैं. नितांत फ़िल्मी अंदाज में हुई उन दोनों व्यक्तियों की पहली मुलाकात इस तरह देश की विश्वसनीय राजनैतिक जोड़ी के रूप में जानी-पहचानी जाने लगेगी, इसका अंदाजा शायद उन लोगों को स्वयं भी न होगा. सन 1952 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी के रूप में अटल जी उनके साथ ट्रेन से मुंबई जा रहे थे. उस समय लालकृष्ण आडवाणी कोटा में प्रचारक हुआ करते थे. उनको पता लगा कि वे लोग स्टेशन से गुजरने वाले हैं तो आडवाणी जी वहां मिलने आ गये. वहीं पर मुखर्जी ने दोनों की मुलाकात करवाई थी. उसके बाद अटल-आडवाणी जोड़ी देश की सर्वाधिक प्रसिद्द राजनैतिक जोड़ी के रूप में सामने आई. अटल-आडवाणी एक-दूसरे के पूरक बनकर जनसंघ में उभरे और फिर भाजपा के गठन से केंद्र में सरकार बनाने तक साथ रहे. भाषण देने की अद्भुत कला के चलते सन 1957 में अटल जी को जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय के कहने पर लोकसभा भेजा गया. अटल जी ने तभी लाल कृष्ण आडवाणी को अपनी मदद के लिए दिल्ली बुला लिया.


आडवाणी को अपने साथ रखना, उनकी राजनैतिक सहायता लेना अटल जी की एक तरह की मजबूरी भी थी. उस समय जनसंघ के एक महत्त्वपूर्ण नेता बलराज मधोक अटल जी के लिए खतरा बने हुए थे. मधोक अपने आपमें कट्टर विचारों की छवि वाले व्यक्ति थे. अटल जी कट्टर विचारों की जगह उदार, संतुलित वैचारिकी को पसंद किया करते थे. इसी के चलते अटल जी और बलराज मधोक में मतभेद बने रहते थे. एकाधिक अवसरों पर मधोक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक एम एस गोवलकर से शिकायत भी की थी. उसी दौरान सन 1968 में जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय की अचानक मृत्यु के बाद अटल जी पार्टी अध्यक्ष बने. पांच साल की कार्यकाल समाप्ति के बाद जब पार्टी की कमान लाल कृष्ण आडवाणी को मिली तो उन्होंने मधोक को जनसंघ से निष्कासित कर दिया. यह वाजपेयी के लिए एक राहत जैसी बात तो थी ही, राजनैतिक परिदृश्य में आडवाणी जी का उदय भी था. इसके बाद तो दोनों में विश्वसनीयता और गहरा गई. दिल्ली की सड़कों पर स्कूटर से घूमने, चाट खाने दे शुरू हुआ दोस्ती का सफ़र लगातार आगे ही बढ़ता रहा चाहे वह आपातकाल की जेल हो या सत्ता में मंत्रिमंडल, दोनों एकसाथ ही रहे.


सन 1984 में हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी पूरे देश में महज दो सीटों पर अपनी जीत दर्ज कर पाई. इसके बाद आज देश के बहुसंख्यक राज्यों में भाजपा के सत्तासीन होने में अटल-आडवाणी की जोड़ी का महत्त्वपूर्ण स्थान है. आज इसे भले ही मोदी लहर कहकर ख़ारिज कर दिया जाये मगर सत्य यही है कि इसकी नींव इसी जोड़ी ने रखी थी. यद्यपि उनकी दोस्ती के इस लम्बे समय में कई बार उनके बीच मतभेद की खबरें सामने आईं लेकिन दोनों नेताओं के संतुलित व्यवहार ने ऐसा होने न दिया. आडवाणी जी का अटल जी के प्रति समर्पण महज इतने से समझा जा सकता है कि जब उन्होंने 90 के दशक में रथ यात्रा निकाली उस समय उनकी लोकप्रियता भी चरम पर थी. इसके बाद भी उन्होंने ही प्रधानमंत्री पद के लिए अटल जी का नाम प्रस्तावित किया था. आडवाणी जी सदैव अटल के नेतृत्व में सारथी की भूमिका में नजर आते रहे. इसे इसी जोड़ी की विश्वसनीयता कहा जायेगा कि जब सन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तक महज दो सीटों वाली भाजपा ने जब अगले आम चुनाव में भाजपा अटल-आडवाणी कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान के नारे के साथ प्रचार अभियान आरम्भ किया तो उसकी सीटों की संख्या 02 से बढ़कर 89 तक जा पहुँची.

इस बात की जानकारी भी शायद बहुत कम लोगों को होगी कि सबसे पहले आडवाणी जी ने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखकर अटल जी को भारत रत्न देने की मांग की थी. उन्होंने अपने पत्र में सरकार के सामने दस बिंदु रखते हुए बताया था कि अटल जी को भारत रत्न क्यों दिया जाए. उस सरकार में यह माँग पूरी न हो सकी थी किन्तु सन 2014 भाजपा सरकार बनने के बाद अटल जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया. अटल-आडवाणी की दोस्ती को गंभीरता से देखने वाले सहज रूप से आकलन कर लेंगे कि दोनों ने एक-दूसरे पर भरपूर विश्वास किया और उसी का सुखद परिणाम उनको इस रूप में मिला कि उनके द्वारा सन 1980 में भाजपा के रूप में रोपा गया बीज आज वट वृक्ष बन कर खड़ा हुआ है. इस वट वृक्ष में यद्यपि आडवाणी जी खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहे हैं. प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उनके नेतृत्व में भाजपा आशातीत परिणाम हासिल न कर सकी. कालांतर में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने प्रचंड प्रदर्शन करते हुए बहुतायत राज्यों में खुद को खड़ा किया. ऐसे समय में जबकि आडवाणी जी की मेहनत से विशाल स्वरूप पाने वाली पार्टी उनके अस्तित्व को लगभग नकारने में लगी है, उनका आहत होना स्वाभाविक है.

वर्तमान में भाजपा के सत्ता में होने के बाद भी आडवाणी जी पार्टी के लिए निर्णय लेने वाली दो महत्त्वपूर्ण समितियों- संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति में नहीं हैं. आडवाणी जी को अटल जी की कमी किस कदर महसूस हो रही है इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अटल जी के निधन की खबर सुनकर आडवाणी ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था. इसके बाद वे श्रद्धांजलि देने कृष्ण मेनन मार्ग ही पहुंचे थे, उससे पहले किसी से भी नहीं मिले. आडवाणी जी ने अटल जी के निधन पश्चात् अपने पत्र में अपने और अटल जी के छह दशक से अधिक की दोस्ती को याद किया. अटल जी के जाने के बाद आडवाणी जी नितांत तन्हा हो गए हैं और इसके साथ ही अटल-आडवाणी-जोशी की त्रिमूर्ति भी स्वभाविक रुप से खत्म हो गई है.

17 अगस्त 2018

वो सवाल ही दोहरा देते खामोश जाते अटल जी


मौत से कई बार ठनी और हर बार मौत को सामने से वार करने की चुनौती देकर वापस लौटाते रहे. इस बार फिर मौत से ठनी. इस बार की ठना-ठनी कुछ गंभीरता से हो गई. अबकी न मौत वापस जाने को तैयार दिखी और न ही राजनीति के अजातशत्रु हारने को राजी हुए. भाजपा के ही नहीं वरन राजनीति के भीष्म पितामह रूप में स्वीकार अटल जी विगत लगभग एक दशक तक अटल बने रहे. महाभारतकालीन भीष्म पितामह की भांति अटल जी ने कोई प्रतिज्ञा तो नहीं ले रखी थी किन्तु भाजपा रुपी हस्तिनापुर को वे सुरक्षित देखना चाहते थे; भारत माता को सुरक्षित हाथों में देखना चाहते थे; संसद में किसी समय संख्याबल को लेकर हुए उपहास पर दिए गए जवाब को सार्थक देखना चाहते थे; अंधियारी रात में हवा-पानी के किनारे किये गए हुँकार कि कमल खिलेगा, अवश्य खिलेगा को साकार होते देखना चाहते थे; इसी कारण पिछले एक दशक से अधिक का समय वे नितांत एकांतवास की स्थिति में व्यतीत करने के बाद भी आमजनमानस के बीच पूरी तरह रचे-बसे रहे. मौत से ठना-ठनी होने के बाद भी मौत के साथ चलने को तब तक तैयार नहीं हुए जब तक कि वह सब नहीं देख लिया जो वे देखना चाहते थे. ऐसा लगा मानो भीष्म पितामह की भांति समय का इंतजार करने के बाद उन्होंने मौत को सीधे-सीधे हराने के बजाय उसे जिताकर हराने का विचार बनाया.


मौत से उनकी वर्षों पुरानी ठना-ठनी बंद हुई. वे मौत को जिताने का भ्रम पैदाकर खुद जीतकर अनंत यात्रा पर उसके साथ निकल गए. लगभग एक दशक तक सार्वजनिक जीवन से लगभग विलुप्त, दूर रहने के बाद भी जब वे तिरंगे का आँचल लपेट मौत के साथ कदम से कदम मिलाते हुए चले तो वे अकेले नहीं थे. उनका विशाल भाजपा परिवार उनके साथ था. उनकी भारतमाता की संतानें उनके साथ थीं. उनके सहृदय व्यवहार के कायल सभी धर्म, जातियाँ, वर्ग उनके साथ थे. उनकी राजनैतिक शुचिता के प्रशंसक अनेक राजनैतिक दल, व्यक्ति उनके साथ थे. अपनी कार्यप्रणाली और निर्भीक निर्णय क्षमता का वैश्विक स्तर पर लोहा मनवाने वाले देशों के लोग उनके साथ थे. सारा देश ही नहीं वरन समूचा विश्व उनके साथ चल रहा था. ये सब उनकी वो थाती है जो मौत के जीत जाने के बाद उसे हारा साबित कर रही थी. वे अब एक शरीर के रूप में नहीं, एक व्यक्ति के रूप में नहीं, एक कवि के रूप में नहीं, एक राजनेता के रूप में नहीं वरन एक-एक व्यक्ति के रूप में जीवित हो उठे थे; एक-एक नागरिक के रूप में जिन्दा दिख रहे थे; एक-एक साँस में जीवन निर्वहन करते दिख रहे थे; अपनी अंतिम यात्रा में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शामिल एक-एक व्यक्ति में वे एक एहसास के सहारे जिंदा दिखे. यह देखकर मौत खुद हतप्रभ दिखी. जीतने के बाद भी हारी हुई लगी. उनके लम्बे एकांतवास को तोड़कर मौत जब उन्हें बाहर लेकर आई तो सोचा होगा कि वे खामोश ही रहेंगे. उनका बाहर आना हुआ तो उनकी कविताएँ बोलने लगीं, उनके संसद में दिए गए चुटीले अंदाज के कथन बोलने लगे, सार्वजनिक सभाओं में दिए गए उनके भाषण बोलने लगे, समरसता, मानवता, शांति के लिए किये गए उनके प्रयास बोलने लगे.


आज भी याद है उनका वो बोलना. हास-परिहास के उसी चिर-परिचित अंदाज में उनका बोलना. परिवार के बुजुर्ग की तरह से पढ़ाई के बारे में पूछना. ढाई दशक से अधिक समय पहले उनका पहली बार स्पर्श. उनके चरणों का स्पर्श. उनका प्यार से सिर पर हाथ फिराना. खुश रहो का आशीर्वाद देना. उस समय भी और आज भी अटल जी सम्मोहित व्यक्तित्व दिखे. ग्वालियर के शैक्षिक प्रवास के दौरान अनेकानेक गतिविधियों में सहभागिता बनी ही रहती थी. ऐसी ही एक सहभागिता के चलते पता चला कि अटल जी का एक कार्यक्रम है. हम हॉस्टल वालों को कुछ जिम्मेवारियों का निर्वहन करना है. कोई मंच की व्यवस्था में, को खानपान की व्यवस्था में, कोई जलपान की व्यवस्था में, कोई यातायात की व्यवस्था में, कोई अतिथियों के व्यवस्थित ढंग से आने-जाने की व्यवस्था में. सहज आकर्षित करने वाले, सम्मोहित करने वाले, मुस्कुराते चेहरे के साथ अटल जी मंचासीन हुए. सामान्य सा मंच, सामान्य सी व्यवस्था, गद्दे-मसनद के सहारे टिके, अधलेटे, बैठे मंचासीन अतिथि. अटल जी से मिलने का लोभ हम हॉस्टल के भाइयों में था. व्यवस्था हमारे ही हाथों थी सो कभी कोई किसी बहाने मंच पर जाता, तो कभी कोई किसी और बहाने से. आज की तरह कोई तामझाम नहीं, कोई अविश्वास नहीं, फालतू का पुलिसिया रोब नहीं. मंचासीन अतिथियों से मिलने का सबसे आसान तरीका था पानी के गिलास पहुँचाते रहना. तीन-चार बार की जल्दी-जल्दी पानी की आवाजाही देखने के बाद अटल जी ने मुस्कुराते हुए बस इतना ही कहा कि क्या पानी पिला-पिलाकर पेट भर दोगे? भोजन नहीं करवाओगे? अपने पसंदीदा व्यक्ति से बातचीत का अवसर, बहाना खोजते हम लोगों से पहला वार्तालाप इस तरह मजाकिया, सवालिया अंदाज में हो जायेगा, किसी ने सोचा न था. हम सब झेंपते हुए मंच से उतर आये मगर कार्यक्रम के बाद भोजन के दौर में खूब बातें हुईं. खुलकर बातें हुईं.  

काश कि वे आज भी वैसे ही बोल देते. काश कि आज उनको पानी पिलाने के बहाने उनके पास तक जाना हो पाता तो शायद वे वही सवाल दोहरा बैठते. काश कि वे आज चरण स्पर्श करने पर उसी तरह आशीर्वाद भरा हाथ सिर पर फिरा देते. अब तो बस काश ही काश है, याद ही याद है.  



16 अगस्त 2018

मौत से ठन गई : अटल जी - सादर नमन


पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता उन्हीं को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित.... 
(24.12.1924 - 16.08.2018) 



ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।