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12 जुलाई 2021

बाजार के हाथ में मातृत्व

शिक्षित व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. इधर कुछ समय से लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर साक्षरता जैसे देह के आसपास सिमटती जा रही है. इस देह में भी उस विमर्श के लिए स्त्री-देह सबसे सहज विषय-वस्तु बन गई है. इसी कारण अब तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्देमहिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों परमामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं. विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा हैकुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्योंवाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहाबहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्नअर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहालस्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता हैसुखद अनुभूति होती है. स्तनपान की अहमियत को एक महिला, जो माँ बन चुकी है, बखूबी समझ सकती है. किसी पत्रिका के कवर पेज के लिए, भले ही उसका मंतव्य किसी न किसी रूप में स्तनपान की अवधारणा को विकसित करना ही क्यों अ रहा हो, स्तनपान को सार्वजनिक करना मातृत्व का परिचायक नहीं है. बहुत सूक्ष्म रूप में इसे न समझ सहज भाव से समझने की आवश्यकता है कि स्तनपान के द्वारा एक माँ न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रहे होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयतासंतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

समझने वाली बात यह भी है कि जो महिलाएं कुछ दिनों पूर्व तक हैप्पी टू ब्लीड के नाम पर उस मानसिकता से स्वतंत्रता पाना चाहती थीं जो स्त्रियों को माहवारी के दिनों में कैद जैसी स्थिति दे देता है वे आज़ादी के रूप में स्तनपान की सार्वजनिकता चाह रही हैं. यही महिलाएं ब्रा से मुक्ति की चाह में सडकों पर ब्रा की होली जलाती हैं, खुद को बिना ब्रा के प्रदर्शित करती हैं वही महिलाएं अब स्वतंत्रता, सार्वजनिक होने के नाम पर ब्रा-युक्त स्तनपान की अवधारणा पैदा कर रही हैं. आखिर स्वतंत्रता को किस पैमाने पर उतारकर महिलाओं की आजदी के लिए वास्तविक आज़ादी की माँग ये कर रही हैं, इन्हें स्वयं नहीं मालूम. असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएंअपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. बॉडी स्प्रे का विज्ञापन हो तो महिला ऐसे दिखाई जाती है जैसे वह सारी उम्र, सारी शर्म छोड़कर सिर्फ देह की चाह रखती है. एक अगरबत्ती का विज्ञापन ऐसे दिखाता है जैसे उसकी महक किसी भी स्त्री को सेक्स के लिए उत्तेजित कर सकती है. चाय हो, ब्लेड हो, बनियान हो, साबुन हो, सौन्दर्य प्रसाधन हो या फिर कोई अन्य उत्पाद सभी के द्वारा महिलाओं को कामुक, उत्तेजक भूमिका में इसी बाजार ने खड़ा कर दिया है.

वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. जिस तरह से उस मॉडल को स्तनपान कराते प्रस्तुत किया गया है वह बाजारी दृष्टि को ही प्रदर्शित करता है. ऐसे बाजार को न माता से मतलब हैन शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. इसके लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग होंचाहे पैड का नीला-लाल रंग होकंडोम की कामुकता होअगरबत्ती में छिपी मादकता होब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गएबहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?


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यह आलेख जनसंदेश टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर दिनांक 08-03-2018 को प्रकाशित किया गया था.

24 अगस्त 2020

स्त्री-विमर्श के अपने-अपने भ्रम

इधर कुछ दिन से सोशल मीडिया पर कुछ विशेष लोगों की स्त्री-विमर्श से सम्बंधित पोस्ट देखने को मिल रही हैं. कुछ ब्लॉग पर भी इसी तरह की पोस्ट पढ़ने को मिलीं. समाज में बहुत सारे विमर्शों के बीच आज भी दो विमर्श अपनी-अपनी तरह से जिन्दा रखे जा रहे हैं. इनमें एक स्त्री विमर्श है और दूसरा दलित विमर्श. किसी समय में इन दोनों विमर्शों को एक तराजू पर तौलने की कोशिश भी की गई थी. बहरहाल, देखने में आता है कि इक्कीसवीं सदी में खुद को स्थापित करने के बाद भी यदि कहीं से भी एक भावात्मक बिंदु खोजने की कोशिश की जाती है तो इन्हीं दो विमर्शों के नाम पर. अभी चर्चा स्त्री-विमर्श की. खुद को पुरुषों के बराबर मानने वाली, पुरुषों से कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने वाली, कहीं-कहीं खुद को पुरुषों से आगे भी बताने वाली स्त्री अचानक से स्त्री-विमर्श के द्वारा खुद को ही कमजोर बताने लग जाती है. ऐसी पोस्ट से वह खुद को कमजोर बताने के साथ-साथ अपने समकक्ष और अपने बाद की पीढ़ी में एक तरह का भय पैदा करके अपना अनुनायी बनाने की चेष्टा करने का प्रयास भी करती है.



असल में नारी-सशक्तिकरण, स्त्री-विमर्श को लेकर असल बिंदु या फिर असल स्थिति क्या है, ये स्त्री-विमर्श के पैरोकारों को भी असलियत में ज्ञात नहीं. स्त्री-विमर्श आज बाजार के हाथों में सिमट चुका है. स्त्री की दशा सुधारने की बात करने वाली, उसकी दशा कमतर बताने वाली स्त्री खुद बाजार के हाथों संचालित हो रही है. नारी की स्थिति को यदि पुरुष द्वारा चित्रित किया जाये तो वो स्त्री को बदनाम करने की साजिश कही जाती है और यदि वही छवि किसी महिला द्वारा दिखाई जाये तो उसे नारी सशक्तिकरण कहा जाता है. नारी के बिना कोई उत्पाद नही बिक सकता. यहाँ नारी को उत्पाद बनाने की बात हो रही है, उसको कम कपडों में उतारने की बात हो रही है तो ये क्या है, नारी-सशक्तिकरण या फ़िर नारी की गरिमा का पतन?

यदि स्त्री-विमर्श, सशक्तिकरण के लिए पिछली सदी की नायिकाओं की बात करें तो महारानी लक्ष्मी बाई को कोई भी नहीं भूला होगा. उस समय परदा-प्रथा आज से अधिक था, महिलाओं की शिक्षा आज से बदतर थी तब भी रानी ने कई राजाओं को संगठित कर अपने झंडे तले, अपने आधिपत्य में लड़वाया था. ये है नारी-सशक्तिकरण का उदहारण. रानी ने तो कम कपडों का सहारा नहीं लिया था, वे तो किसी फैशन शो का हिस्सा नहीं थीं. फिलहाल समझाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि समाज को चलाने वाले नहीं चाहते कि अब ये दो ध्रुव- स्त्री,पुरूष- एक होकर किसी समस्या का हल निकालें. दोनों में संघर्ष बना रहे, बाज़ार चमकता रहे, नारी अपनी झूठी शान में, पुरूष अपने झूठे अहंकार में भटकता रहे. इसी से बिकेंगे अंडरवीयर, शराब, ब्लेड और भी बहुत कुछ पर किसी कम कपडों में बलखाती नारी के साथ. यही तो है आज का नारी-सशक्तिकरण.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 जनवरी 2019

आज़ादी की चाह और बेड़ियाँ पहनने की आतुरता


महिला सशक्तिकरण के दौर में जहाँ कि सभी क्षेत्रों में अपनी हनकदार उपस्थिति का गर्व महिलाओं में दिखाई दे रहा है वहाँ एक मंदिर में किसी भी तरह से प्रवेश को लेकर जद्दोजहद मची हुई है. अदालती आदेश के बाद भी मंदिर प्रबंधकों तथा स्थानीय भक्तों द्वारा महिलाओं के प्रवेश को लेकर बनी स्थिति ज्यों की त्यों रही. कुछ अतिशय क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा लगातार संघर्ष बनाये रखा गया कि कैसे भी मंदिर में प्रवेश करने को मिल जाए. अंततः खबर आई कि अँधेरे में दो महिलाओं ने मंदिर में घुसपैठ करके महिला सशक्तिकरण का इतिहास रच दिया. आये दिन धर्म को इसी बात के लिए कोसा जाता है कि इसने महिलाओं की स्वतंत्रता में अवरोध पैदा किया है. महिला सशक्तिकरण के नाम पर न जाने कितनी धार्मिक, पौराणिक कथाओं, पुस्तकों, ग्रंथों को गरियाया जाता है. इसके बाद भी ऐसी क्रांतिकारी महिलाओं द्वारा मंदिर में प्रवेश की आतुरता देखने को मिल रही थी. 


हो सकता है बहुत से लोग, तमाम नारीवादी इसकी वकालत करें कि आखिर मंदिर में प्रतिबन्ध जैसा भेदभाव क्यों? आखिर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वंचित क्यों किया जा रहा है? एक हिसाब से ऐसे सवालों का उभरना सही भी है. आखिर जब समानता, स्वतंत्रता, अधिकारों की बात की जाती है तो फिर भेदभाव क्यों? क्यों किसी भी स्थान पर सिर्फ पुरुष का प्रवेश हो? क्यों महिलाओं को उनकी अपनी प्राकृतिक अवस्था के कारण मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित किया जाये? इसी बिंदु पर आकर सोचने की आवश्यकता है कि आखिर प्रतिबन्ध तोड़ने की प्रतिबद्धता या फिर जिद सिर्फ मंदिर के सन्दर्भ में ही क्यों? ऐसा किसी मस्जिद के लिए क्यों नहीं दिखाई देता? क्या वहाँ ऐसा करना समानता की बात करना न होगा? असल में ऐसे मामलों में बहुत गहराई से विचार किये जाने की आवश्यकता है. सिर्फ एक मंदिर प्रकरण से नहीं वरन तमाम सारे और प्रकरणों को भी इसी सन्दर्भ में देखा जाना आवश्यक है जबकि ऐसे कदमों के द्वारा प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुत्व पर, हिन्दू धर्म पर, उसके रीति-रिवाजों पर चोट करने का प्रयास किया गया है. ऐसा ही कुछ मंदिर मुद्दे पर हुआ है.

अब जबकि दो महिलाओं ने मंदिर में अपने चरण घुसा ही दिए हैं, तब यह देखना है कि वे कहाँ-कहाँ तक अपने पैर घुसा पाने में सफल होती हैं. सिर्फ एक मंदिर ही नहीं अनेकानेक ऐसी जगहें हैं जहाँ आज भी महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है. महिला सशक्तिकरण के दौर में एक और सशक्त कदम का इंतजार रहेगा.

28 अक्टूबर 2018

सेनेटरी नेपकिन पर आधुनिक महिलाओं की अमानुषिक सोच

समाज आये दिन नए-नए आन्दोलनों से रूबरू होता है. आधुनिकता के वशीभूत आगे बढ़ता या कहें कि आगे बढ़ने का नाटक करता ये समाज ऐसे-ऐसे आन्दोलनों के सहारे चलने की कोशिश करने में लगा है जो भारतीय समाज में ही नहीं वरन किसी भी समाज में स्वीकार नहीं होंगे. सबरीमाला मंदिर विवाद के बाद से इस तरह का एक आन्दोलन सामने आया, वो भी सेनेटरी नेपकिन के आन्दोलन के रूप में. ऐसी खबर सार्वजनिक रूप से आ रही है कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर आंदोलित महिलाओं में एक महिला वहाँ स्थापित भगवान की मूर्ति पर माहवारी के दिनों में प्रयुक्त सेनेटरी नेपकिन को फेंकना चाहती है. सोचने वाली बात ये है कि ये किस तरह का आन्दोलन है? किस तरह की आज़ादी है? इस खबर के सन्दर्भ में सरकार की एक महिला मंत्री के बयान पर कुछ आधुनिक महिलाएं लामबंध हो गईं. वे माहवारी के दिनों में उपयोग में लाये सेनेटरी नेपकिन को लेकर इतनी संजीदा हो गईं, मानो ऐसे नेपकिन वे अपने संग्रह में सुरक्षित रख लेती हैं. या फिर ऐसे नेपकिन खाने की मेज पर साथ लेकर बैठती हैं.

इन महिलाओं ने महिला मंत्री के उस बयान को निशाना बना रखा है जिसमें उनके द्वारा कहा गया कि क्या महिलाएं उपयोग किये गए नेपकिन अपने मित्र के घर ले जा सकती हैं? इसके अलावा इन आधुनिक महिलाओं का आन्दोलन सेनेटरी नेपकिन के पवित्र-अपवित्र को लेकर भी चालू है. ये स्वीकार है कि माहवारी किसी भी महिला की प्राकृतिक अवस्था है. ये भी स्वीकार है कि इसी अवस्था के चले इन्सान का जन्म होता है. ये भी स्वीकार है कि इस स्थिति को नकारा नहीं जा सकता है. इन सबके बाद भी इसे भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि इन स्थितियों में उपयोग में लाये जाने वाले नेपकिन उपयोगी हैं, सुरक्षित हैं, स्वास्थ्यवर्धक हैं. यदि माहवारी की अवस्था विशुद्ध पवित्र है तो क्या इस समय में उपयोग किये गए नेपकिन यही आधुनिक महिलाएं अपने ड्राइंग रूम में सजा कर रखेंगी? क्या यही महिलाएं अपने उपयोग किये गए नेपकिन को अपने साथ खाने की मेज पर लेकर भोजन करेंगी? यदि उपयोग किया गया नेपकिन पवित्र अवधारणा से लिप्त है तो क्या वे ऐसे नेपकिन अपने किसी कार्यक्रम में किसी को उपहार स्वरूप गिफ्ट करेंगी? निश्चित है ऐसा कोई भी महिला नहीं कर पाएगी. 

असल में इस तरह की नौटंकी सिर्फ सरकार विरोध के लिए की जा रही है. ऐसी महिलाओं के निशाने पर केंद्र सरकार है उसके मंत्री हैं. यदि ऐसा नहीं है तो प्रति महीने पांच दिनों के लिए इन्हीं महिलाओं को इसी पवित्र स्थिति से गुजरना पड़ेगा. इसी बार से अपने ऐसे उपयोग किये गए नेपकिन अपने पति-बेटे-बेटी के लंच बॉक्स में रखकर भेजें. ऐसे नेपकिन को अपने किसी परिचित को उपहार स्वरूप भेंट करें. ऐसे उपयोग किये गए नेपकिन को वे खाने की प्लेट में साथ रखकर भोजन का स्वाद लें. यदि वे ऐसा करने में समर्थ हैं, सक्षम हैं तो उनके आन्दोलन को समर्थन है. अन्यथा की स्थिति में अपनी बकबक को अपने घर तक सीमित रखें और अपने दिमाग में भी एक सेनेटरी नेपकिन लगाकर बैठें ताकि अनावश्यक होने वाले स्त्राव को रोका जा सके.

12 अक्टूबर 2018

मीटू, मीटू रटे जमाना


पश्चिम की धरती पर उगे विमर्श, अभियान किसी न किसी तरह भारत भूमि पर भी पल्लवित-पुष्पित होने लगते हैं. पता नहीं पश्चिम की सोच में, मानसिकता में, वहां की मिट्टी में ऐसा कौन सा उपजाऊपन छिपा हुआ है कि वहाँ की चीज तो यहाँ पल्लवित होती ही है, अपने देश की चीजें, विचार आदि भी पश्चिम जाकर पल्लवित होकर वापस लौटी. योग को इसी रूप में देखा जा सकता है, जो योगा होकर लौटा और घर-घर में जाना जाने लगा. बहरहाल, पश्चिम की धरती पर उगे तमाम सारे अभियानों के बीच वर्तमान में मीटू अभियान अपना सिर उठाये फ़िल्मी-राजनीतिक गलियों से विचरण करते हुए सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है. इस अभियान का आरम्भ 2017 में हॉलीवुड के बड़े निर्माता हार्वी वाइनस्टीन पर कई महिलाओं द्वारा यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोप लगाए जाने के बाद हुई थी. अमेरिका में काम करने वाली इतालवी मूल की अभिनेत्री आसिया अर्जेंटो ने उक्त निर्माता पर आरोप लगा कर इसकी शुरुआत की थी.


देश में इस अभियान का आरम्भ फ़िल्मी गलियों में तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर पर लगभग दस वर्ष पूर्व किसी सेट पर यौन उत्पीड़न के प्रयास किये जाने से हुआ. उसके बाद से कई महिलाओं द्वारा सोशल मीडिया पर इस अभियान के द्वारा अपने यौन उत्पीड़न की बात शेयर की गई. यह अभियान विशुद्ध रूप से सोशल मीडिया के अंतर्गत चलने वाला अभियान है जो अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त किये हुए है. इसके अलावा भारत में फ़िल्मी और राजनैतिक जगत से जुड़े लोगों के इसमें शामिल होने, अपनी बात कहने को अभी तक देखा गया है. इस अभियान के द्वारा किसी पुरुष पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के पीछे की सत्यता-असत्यता क्या है, ये तो आरोप लगाने वाली महिला ही जाने किन्तु जैसा कि पूर्व के आन्दोलनों, विमर्शों, अभियानों में होता रहा है कि पश्चिमी धरती पर सार्थक रूप से फलते-फूलते आये अभियानों का यहाँ स्वरूप विकृत कर दिया गया, ऐसा ही कुछ इस अभियान के साथ हुआ. इससे पूर्व स्त्री-विमर्श ने अपनी राह से भटक कर इसे विशुद्ध साहित्यकारों का विषय बना दिया. स्त्री-विमर्श चर्चा में रहा किन्तु स्त्री सशक्तिकरण सही दिशा में न हुआ. इसी तरह कुछ दिन पहले हैप्पी टू ब्लीड अभियान के भौंड़ेपन ने उसके भीतर छिपे सन्देश को मटियामेट कर दिया. इसी तरह से मीटू अभियान के साथ होता दिख रहा है. ऐसा लगने लगा है कि ये आन्दोलन किसी सार्थक दिशा को प्राप्त करने के बजाय कहानियों का, चटखारा लेने वाले बिन्दुओं का, मसालेदार घटनाओं का कोलाज बनता जा रहा है.

एक मिनट को रुक कर सोचा जाये तो देश में आरोप लगाने वाली महिलाओं के सापेक्ष यह सवाल बार-बार खड़ा हो रहा है कि जब आर्थिक, सामाजिक रूप से सक्षम महिला किसी पुरुष की बदतमीजी का तत्काल जवाब नहीं दे सकी तो आम महिला की हैसियत ही क्या है कि वह खुलकर अपनी बात रखे. यदि तनुश्री दत्ता जैसी अभिनेत्री को अपनी बात कहने के लिए दस साल इस अभियान का इंतजार करना पड़े तो इन आरोपों के पार्श्व में असल कहानी पर भी लोगों की राय प्रकट होगी. फ़िल्मी जगत और राजनीति का क्षेत्र ऐसा है जहाँ कास्टिंग काउच जैसी घटनाएँ पूर्व में भी खुलकर सामने आती रही हैं. इन क्षेत्रों में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की, यौन शोषण की खबरें भी समय-समय पर सिर उठाती रही हैं. इन खबरों के पीछे से स्वार्थपूर्ति की खबरें भी सामने आती रही हैं. खुद के स्थापित करवाने के लिए, खुद को किसी पद पर स्थापित करवाने के लिए, किसी मुख्य भूमिका के लिए, किसी टिकट के लिए आये दिन इस तरह की खबरें सामने आती रही हैं. क्या माना जाये ऐसे में, कि उस समय इन महिलाओं की चुप्पी उनके कैरियर के कारण रही? क्या माना जाये कि स्वार्थपूर्ति के लिए ये महिलाएं तब अपना यौन उत्पीड़न करवाती रहीं? आज ये महिलाएं अपनी कहानी को मीटू के रूप में सामने ला रही हैं, क्या ये अपने घरों में, कार्यालयों में काम करने वाली आम औरत की यौन शोषण की घटनाओं को, उन पुरुषों को इस अभियान के द्वारा सामने लाने का काम करेंगी? क्या ये ऐसी कमजोर महिलाओं के हितों के लिए संघर्ष करने का काम करेंगी? क्या ये महिलाएं अपने इसी अभियान के द्वारा यह बताने की हिम्मत दिखाएंगी कि इन्होंने किसी पुरुष का शोषण नहीं किया है?

यह सत्य है कि देश में महिलाएं यौन उत्पीड़न का शिकार हैं, यौन शोषित हैं पर जिन महिलाओं की घटनाएँ मीटू अभियान के साथ बाहर आ रही हैं, क्या वाकई न्याय की अपेक्षा के साथ आ रही हैं? क्या मान लिया जाये कि समाज में पुरुष यौन उत्पीड़न का शिकार नहीं है? क्या इस अभियान के साए में सामने आती कहानियाँ वाकई सच्चाई हैं? कहीं ऐसा न हो कि यह अभियान भी हैप्पी टू ब्लीड की तरह सोशल मीडिया पर कुछ फोटो, वीडियो के साथ ही एक वर्ग विशेष तक सीमित रह जाये?

18 मार्च 2018

सोच बदलने को अशालीन होने की जरूरत नहीं


स्तनपान करवाती मॉडल की फोटो अब फिर से चर्चा में है. इस बार उसके चर्चा में आने का कारण उसके समर्थन में उतरी कुछ महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाने और उसकी फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालना रहा है. इन जागरूक महिलाओं ने इस सम्बन्ध में अपने-अपने स्तर के तर्क-कुतर्क गढ़े हैं. किसी पत्रिका के कवर पर मॉडल की स्तनपान करवाती फोटो के विवाद को शांत करने का यही सर्वोत्तम तरीका समझ आया उसके समर्थन में उतरी महिलाओं को. यदि उस पत्रिका के सम्पादक का कथन ही सच मान लिया जाये कि उस चित्र का सन्दर्भ लोगों में सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान करवाती किसी भी महिला के प्रति सकारात्मक सोच बनाना था. ऐसी माँ के इस कृत्य को अश्लील न समझा-माना जाये तो उसके समर्थन में सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान करवाती फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करती महिलाएं क्या वाकई इसी सन्देश का प्रसार-प्रचार कर रही हैं? असलियत में गंभीरता से विचार किया जाये तो इस तरह का प्रदर्शन किसी न किसी रूप में अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता की वकालत करता ही दिखता है.


समाज सभी तरह के लोगों से मिलकर बना होता और उसमें अच्छे, बुरे लोगों का भी समावेश होता है. सकारात्मक तरीके से विचार करने की आवश्यकता बस इतनी है कि आज भी सड़क चलते सभी लोगों को न तो लूटा जा रहा है और न ही सड़क चलते सभी लोग लूटने में लगे हैं. स्पष्ट है कि उसी सड़क पर जहाँ लूटमार करने वाले हैं, लुटने वाले हैं वहीं बहुतायत में ऐसे लोग भी हैं जो शांतिपूर्ण ढंग से अपना काम कर रहे हैं. संभव है कि किसी सार्वजनिक स्थल पर खुलेआम किसी माँ को स्तनपान करवाते देख बहुत से व्यक्तियों की आँखों के, चेहरे के हाव-भाव बदल जाते हों मगर इसके बाद भी ऐसे व्यक्तियों (पुरुषों कह लीजिये) की भी संख्या बहुतायत में है जो ऐसी महिला के प्रति सामान्य भाव रखते होंगे. आज आवश्यकता ऐसी भावना के प्रचार-प्रसार की है. आज जरूरत इसकी नहीं कि सिर्फ भय दिखाकर ही शांति लाने का काम किया जाये. आज आवश्यकता इसकी भी है कि कैसे सुरक्षित भाव दिखाकर लोगों में और सुरक्षा की भावना का विस्तार किया जाये. हाँ, यदि इस तरह के आन्दोलनों, प्रदर्शनों से महिलाओं को अपनी देह के प्रदर्शन की स्वतंत्रता चाहिए तो फिर कोई बात ही नहीं है.

ऐसी आशंका महज इस कारण उपजती है कि समाज में बनी दशकों पुरानी अवधारणा को, सोच को बदलने के लिए आक्रामकता की बजाय, सकारात्मकता की बजाय देह-प्रदर्शन जैसी स्थिति, अशालीन स्थिति बना दी जाती है. महिलाओं की माहवारी के सम्बन्ध में सोच बदलने की जरूरत महसूस हुई तो हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन छेड़ दिया गया. विपरीतलिंगियों में प्रेम का आदान-प्रदान का समर्थन करने की बात सामने आई तो किस ऑफ़ लव का आयोजन कर लिया गया. अब स्तनपान को सार्वजनिक स्थलों पर सहजता से लेने की बात की गई तो उसके लिए स्तन-प्रदर्शन की राह चलाई जाने लगी. स्त्री हो या पुरुष इस सन्दर्भ में इतना समझना चाहिए कि यदि देह की परिभाषा को अंगों-उपांगों के आधार पर तय किया जायेगा, उसके आधार पर निर्मित किया जायेगा तो समाज में नग्नता ही देखने को मिलेगी, अश्लीलता ही देखने को मिलेगी. यदि स्त्री की देह के अंगों-उपांगों के प्रदर्शन की आज़ादी उसे प्राप्त है तो बहुत से ऐसे पुरुष हैं जो मात्र ऐसी ही किसी आज़ादी की उंगली पकड़ना चाहते हैं. अंग के बदले अंग का प्रदर्शन समाज को कहाँ ले जायेगा, पता नहीं? अंग के बदले अंग के प्रदर्शन की सोच स्त्री-पुरुष को कहाँ जाकर खड़ा करेगा, पता नहीं? और जिस तरह से प्रत्येक सकारात्मक स्थिति को महज अपने आपको स्थापित करने की भावना से विवादस्पद बनाने की भावना समाज में विकसित होती जा रही है, स्त्री-पुरुष दोनों में बलवती हो रही है उससे आशंका इसकी है कि कहीं किसी दिन दाम्पत्य जीवन के गोपन का प्रस्तुतिकरण सड़क पर न होने लगे. आखिर, सत्य को समाज को आज की भाषा में समझाए जाने की आवश्यकता जो है. गोपन को अगोपन बनाये जाने की आवश्यकता जो है.

11 फ़रवरी 2018

शर्म, संकोच की दीवार गिराना होगी पहले


पैड मैन जैसी फिल्मों को सामाजिक परिवर्तन का वाहक बताया जा रहा है. पता नहीं ये बॉक्स ऑफिस पर फिल्म के चलने के कारण है या फिर समाज के लोगों को इसके विषय की अहमियत समझ आ गई है? इस बारे में एक बात साफ़ है कि समाज में इसे महज फिल्म के रूप में ही देखा जा रहा है और इसको तारीफ के लायक महज इसलिए बताया जा रहा है कि इसके द्वारा एक ऐसे विषय को सामने लाया गया जो कि अभी तक शर्म का विषय माना जाता है. ऐसा न केवल पुरुष वर्ग में है वरन खुद महिलाओं में भी अपने पैड को लेकर शर्म, घृणा जैसा माहौल बना हुआ है. इधर पैड मैन के द्वारा समाज में सन्देश देने की कोशिश की जा रही है वहीं महिलाओं में इस विषय को लेकर एक अजब तरह की स्थिति देखने को मिल रही है. अभी तक जिस तरह के भारतीय समाज की, परिवारों की संकल्पना देखने को मिली है उसे देखकर सहज नहीं है किसी भी महिला के लिए ऐसे किसी भी विषय पर चर्चा करना जिसे गोपनीय माना जाता रहा है. यहाँ वे महिलाएं अपवाद हैं जो अपने उन पांच दिनों के ब्लीड को भी गर्व से सबको दिखाने को आतुर बैठी हैं.

ऐसे किसी भी विषय का स्वागत होना चाहिए जो किसी भी इन्सान की जीवन-शैली में सुधार लाते हों या ला सकते हों. कुछ इसी तरह का विषय इस फिल्म का है. आज भी बहुत सी जगहें ऐसी हैं, बहुत सी महिलाएं ऐसी हैं जो अपनी माहवारी के समय में अत्यंत कष्ट का जीवन व्यतीत करती हैं. बहुतेरी महिलाएं आर्थिक कारणों से नैपकिन से वंचित रहती हैं. ऐसी महिलाएं गंदे कपड़ों का सहारा लेकर अपने स्वास्थ्य से ही खिलवाड़ करती हैं. इसके अलावा बहुतेरी महिलाओं को अपने उन पांच दिनों के बारे में गंभीरता से जानकारी नहीं होती है. इसके चलते उन्हें सामाजिकता का, धार्मिकता का, पारिवारिकता का नाम लेकर बहुतेरे कार्यों से दूर रखा जाता है. ये स्थिति उन बच्चियों के लिए बहुत ही जटिल हो जाती है जो इसका शुरुआती परिचय प्राप्त कर रही होती हैं. आज के तकनीकी भरे समय में समय से पहले बालिग़ होती बच्चियों को माहवारी, उनके सुरक्षा उपायों के बारे में आसानी से पता रहता है मगर वे बच्चियाँ अवश्य ही असमंजस में रहती हैं जो ग्रामीण अंचलों से जुड़ी हैं. हालाँकि ऐसे विषयों के प्रति सरकारी उपक्रम और गैर-सरकारी उपक्रमों द्वारा बहुत समय से उपाय क्रियान्वित किये जा रहे हैं मगर विषय को महिलाओं से सम्बंधित होने के कारण, उनकी देह की क्रिया से सम्बंधित होने के कारण उनमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली है. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि खुद लेखक भी कई वर्ष पूर्व इस तरह के एक कार्यक्रम में सहभागी रहा है और ग्रामीण अंचलों के विद्यालयों की बात अलग है, शहरी क्षेत्र के विद्यालयों, महाविद्यालयों में इस विषय पर जागरूकता लाने में बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा था.

आज जबकि इस विषय पर फिल्म बन चुकी है. उसकी चर्चा जोरों पर है. ऐसे में सबके लिए आवश्यक है कि इस विषय पर पूरी गंभीरता से बात हो. लेकिन क्या भारतीय परिदृश्य में ऐसा पूरी तरह से संभव है? क्या आज के परिवेश में मध्यम वर्गीय परिवारों में आसान है किसी लड़की के लिए इस विषय पर अपने पिता या भाई से चर्चा करना? समझने वाली बात ये है कि पारिवारिक अवधारणा से इतर अभी मध्यम स्तर के नगरों, शहरों, कस्बों तक में ऐसी मानसिकता विकसित नहीं हो सकी है कि सहकर्मी महिला-पुरुष इस विषय पर खुलकर बात कर सकने में सहजता महसूस करते हों. विद्यालयों, महाविद्यालयों तक में स्त्री-पुरुष सम्बन्धी विषयों पर दोनों तरफ से बातचीत में शर्म, संकोच देखने को मिलता है. जब तक स्त्री-पुरुष आपस में शर्म, संकोच त्यागकर ऐसे विषयों पर चर्चा को आम नहीं करेंगे तब तक फ़िल्में हिट होती रहेंगी, समाज में चर्चा का विषय बनती रहेंगी, लोगों की वाहवाही लेती रहेंगी मगर नतीज वहीं का वहीं रहेगा.  

05 फ़रवरी 2018

देह और यौन सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ती चर्चाएँ

जिस तेज़ी से समाज बदल रहा है, उतनी तेज़ी से समाज में चर्चाओं के विषय में भी परिवर्तन हो रहा है. ये बदलाव किसी तरह की सामाजिकता के चलते आता हुआ नहीं है बल्कि इसके पीछे भी एक तरह का सेक्सुअल कारक काम कर रहा है. सामान्य रूप से देखा जाए तो ऐसा लगता है जैसे समाज और यहाँ के चंद जागरूक नागरिक समाजिक बदलाव लाने को सचेत हैं. वे इसी सचेतन दशा में इन चर्चाओं को आगे लाते रहते हैं. वैसे समाज में कहीं भी किसी बदलाव के लिए चर्चाओं का होना ज़रूरी है. समाज में ही क्या कहीं भी किसी तरह के परिवर्तन के लिए चर्चा होती ही है. घर में कोई काम होना है तो चर्चा तय है. किसी की पढ़ाई का मामला हो, किसी की शादी का मामला हो, किसी की ख़रीददारी होनी हो, किसी के रोज़गार का विषय हो सभी में चर्चा का होना मुख्य है. होना भी चाहिए क्योंकि चर्चा करने से सम्बंधित विषय पर उपयुक्त राय मिल जाती है या फिर सही राह दिख जाती है. वैसे भी समवेत चर्चा से निकले निर्णयों के आधार पर ठोस परिणाम मिलने की अपेक्षा रहती है. इस अपेक्षा पर वे चर्चाएँ ही खरी उतरती हैं जिनमें कुछ सार्थकता होती है. इधर कुछ समय से बदलाव के दौर से गुज़रता समाज अतिशय चर्चाबाज़ हो गया है. चंद सार्थक चर्चाओं के चारों तरफ़ निरर्थक चर्चाओं की भीड़ लगी हुई है. सबकी अपनी चर्चाएँ हैं, सबके अपने मंतव्य हैं. 

चर्चाओं के चलते दौर लगातार परिवर्तित होकर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की तरफ़ मुड़ जाते हैं. वैसे इधर चर्चाओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अधिकता देखने को मिल रही है. चर्चा ही क्या दैनिक क्रियाकलाप भी इसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं. स्त्री ने ये किया, उस महिला ने वो पहना, फ़लाँ लड़की का फ़लाँ लड़के के साथ चक्कर है, वो आदमी उस महिला को घूर रहा है, फ़लाँ लड़का रोज़ नई लड़की को घुमा रहा है, उस व्यक्ति ने उस महिला को छुआ, वो उसे देख मुस्कुराई, उसने उसे अजीब नज़रों से देखा आदि-आदि विषय तो रोज़ चर्चा में रहते ही हैं. इनके अलावा भी कुछ क्रांतिकारी विषय चर्चा में आने लगे हैं. इनके मूल में समाजिक बदलाव की बात कही जाती है, किसी गोपन विषय पर अगोपन होने की मंशा व्यक्त की जाती है, व्यक्तिगत विषयों पर खुली बहस करवाने की बात की जाती है. सोशल मीडिया पर एक हैशटैग आंदोलन शुरू होता है और फिर सब खुलकर चर्चाओं में शामिल होने लगते हैं. फिर चर्चा काम प्रदर्शन शुरू होने लगता है. कौन कितनी अश्लीलता से खुलकर सामने आ सकता है, इसकी होड़ लग जाती है. कौन कितना अशालीन लिख सकता है, इस पर ज़ोर दिया जाने लगता है. किसके विषयों में, भावाभिव्यक्ति में कामुकता अधिक समाहित हो सकती है, इसको प्रमुखता दी जाने लगती है. महिला-पुरुष सम्बन्धों के सार्थक, सकारात्मक विस्तार के लिए शुरू होने वाली चर्चाएँ देह-विमर्श के रूप में बदलने लगती हैं. किसके दाग़ अच्छे हैं, किसकी दैहिक संतुष्टि अधिक है, कौन कितने मिनट टिक सकता है आदि चर्चा के विषय बनने लगते हैं. 

स्त्री हो या पुरुष, उसके सम्बन्धों को जब तक देह की तराज़ू पर तौला जाता रहेगा तब तक खुला विमर्श कामुकता, अश्लीलता की कहानी ही लिखता रहेगा. जिस तरह स्त्री देह की समस्या को लेकर खुली चर्चा की वकालत की जा रही है, उससे क्या लगता है कि सारी समस्या सुलझ जाएगी? क्या लगता है कि आज के तकनीकी, इंटरनेट युग में लोगों को माहवरी, उसकी समस्या, स्त्री की परेशानी के बारे में जानकारी न होगी? क्या लगता है कि ऐसे लोग पैड के बारे में न जानते होंगे? क्या लगता है कि खुली चर्चा से सभी एक-दूसरे की मदद करने लगेंगे उन पाँच दिनों में? क्या खुली चर्चा की सार्थकता तब होगी जब पारिवारिक मर्यादा को भूल लोग आपस में उन दिनों की चर्चा करने लगेंगे? आधुनिकता के कथित आवरण को ओढ़कर हम सोचने लगे हैं कि खुले दिमाग़ और विचार के हो गए हैं. जहाँ आज भी परीक्षा ड्यूटी के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा लड़की के हाथों  नक़ल  पर्ची छीनना छेड़खानी माना जाता हो, बाज़ार में किसी सहायता के लिए महिला  पुकारना या उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना फ़्लर्ट करना समझा जाता है, ज़हम महिला को देखना भी अपराध की श्रेणी में आता हो वहाँ ख़ुद महिलाओं से उनके पीरियड्स पर, पैड पर, उसके दाग़ पर खुली चर्चा की अपेक्षा करना समझा जा सकता है. ऐसे लोगों से, जो इस तरह के विषयों पर खुली चर्चा का दम भरते हैं, एक सवाल कि किसी ऐसी युवती  जो अपने काम करने में सक्षम नहीं है, किसी परिस्थिति में उसके पिता, भाई द्वारा इसके पैड को बदलना-पहनाना सम्भव है? 

चर्चाएँ हों, खुलकर हों, इन्हीं विषयों पर हों पर उनके उद्देश्य को भटकाया न जाए, भटकने न दिया जाए. और ऐसा हाल-फ़िलहाल सम्भव नहीं दिखता है. 

04 फ़रवरी 2018

हैप्पी टू ब्लीड से पैडमैन तक

पता नहीं देश ज़्यादा जल्दी में है या कुछ देशवासी? वैसे कुछ की बजाय सभी किसी न किसी जल्दी में हैं. किसी को धन कमाने की जल्दी, किसी को अपने काम में तरक़्क़ी करने की जल्दी, किसी को सबकुछ पा लेने की जल्दी, किसी को सबकुछ सुधार देने की जल्दी, किसी को दोष मढ़ देने की जल्दी. इस जल्दी-जल्दी के खेल में बहुतेरे तो हड़बड़ी के शिकार हुए जा रहे हैं. इस हड़बड़ी में समय को समय से पहले खींचे ला रहे हैं. इस हड़बड़ी में उनको भान नहीं कि वे कर क्या रहे हैं? कह क्या रहे हैं? जल्दबाज़ी का खेल बिना सोचे-समझे खेला जा रहा है. इस खेल में अपने पक्ष को ही प्रामाणिक मानने को एक तरह की धौंस दी जा रही है और उसके लिए क्या सही, क्या ग़लत इस तरफ़ विचार भी नहीं किया जा रहा है. 

जल्दबाज़ी में ख़ुद को यथोचित स्थापित करने की लालसा ने समाज में बराबर स्त्री-सम्बंधी मुद्दों को स्त्रियों, पुरुषों द्वारा उठाया जाता रहा है. समाज में स्त्रियों को लेकर एक तरह की धारणा यही बनी हुई है कि वो कमज़ोर है, पुरुष के अधीन है, शोषित है. इन सबके साथ-साथ यहाँ तक माना जा रहा है कि स्त्रियों पर किसी भी तरह के धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक कृत्यों पर लगने वाले प्रतिबंधों को पुरुषों द्वारा लगाया गया है. घर में, घर बाहर किसी भी स्त्रीगत स्थिति का एकमात्र ज़िम्मेवार सिर्फ़ पुरुष को माना-समझा गया. इन्हीं विचारों के चलते कुछ समय पूर्व सोशल मीडिया पर अपने स्त्रीवादी आंदोलनों की धार को तेज़ करने के लिए हैप्पी टू ब्लीड जैसा कार्यक्रम चलाया गया था. इसका मक़सद महिलाओं के मासिक धर्म के प्रति समाज में बनी सोच के प्रति सकारात्मक माहौल बनाया जाना होना चाहिए था पर वही न होकर सबकुछ हुआ. एक से एक महिलाओं ने अपनी-अपनी फ़ोटो डाल कर समाज को बताने की कोशिश की कि उसको भी मासिक धर्म होता है. इन महिलाओं की अपने ब्लीड होने को लेकर हैप्पी वाली स्थिति सिर्फ़ फ़ोटो खींचने और सोशल मीडिया पर शेयर करने भर तक सीमित रही. इसके बाद पता नहीं वे कितने दिन बिना पैड के रहीं या फिर अब तक बिना पैड के ही रह रहीं हैं? 


आंदोलन छेड़ने वाली ये आधुनिक, क्रांतिकारी महिलाएँ पैड धारण कर रहीं हैं ता नहीं, उनको ब्लीड से हैप्पीनेस हो रही है या नहीं ये उनका विषय पर हाल ही में सामाजिक सुधारों के स्वनामधन्य ब्राण्ड एम्बेसडर बने अभिनेता जी पैड आधारित फ़िल्म लेकर आ गए. फ़िल्म देखी तो नहीं हमने पर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसमें महिलाओं के उन्हीं पाँच दिनों की बात होगी. पैड वाली समस्या के साथ-साथ सुधारवादी चर्चा भी हो सकती है. पैड की आड़ में महिलाओं की शारीरिक सुरक्षा की बात हो सकती है. मासिक धर्म को लेकर सामाजिक विमर्श की चर्चा भी हो सकती है. होनी भी चाहिए क्योंकि आज भी इस मुद्दे को पुरुषों से ज़्यादा महिलाओं द्वारा ही नकारात्मक रूप से देखा जाता है. उन दिनों रसोई में  जाना, पूजा  करना, सामान  छूना आदि प्रतिबंध महिलाएँ ही लगाती हैं. सामाजिक दृष्टि से एक सार्थक पहल, यदि इस फ़िल्म से हो रही है, को कुछ नौटंकीधारियों ने भटकाना शुरू कर दिया है. नामचीन महिलाएँ पैड लेकर फ़ोटो सोशल मीडिया पर शेयर करने लग गईं हैं. इस क्रांति से चर्चा होगी. अब परिवार में सब एकसाथ बैठकर अलग-अलग उम्र की महिलाओं के अलग-अलग आकार, अलग-अलग ब्राण्ड के पैड को पसंद कर सकेंगे. इस फ़िल्म ने पैड का प्रचार कर हैप्पी टू ब्लीड समर्थकों के ख़िलाफ़ काम किया है. समाज में भ्रम को फैलाया है. अब ब्लीड करती हुई महिला बिना पैड सार्वजनिक आए या फिर पैड को बाँधे? आख़िर प्राकृतिक, नैसर्गिक शारीरिक क्रिया पर प्रतिबंध क्यों? चर्चाओं को विस्तार देते हुए सभी को झिझक छोड़ परिवार की, पड़ोस की, कार्यालय की महिलाओं से जानकारी लेते रहना चाहिए. आख़िर समभाव के नाते उन पाँच दिनों के कष्टों को सिर्फ़ हैप्पी टू ब्लीड वाले, पैडमैन वाले ही क्यों जानें, उसके बारे में सब जानें, सब समझें. बस महिलाएँ ख़ुद  तैयार कर लें इन पर चर्चा के लिए. क्या वे अभी हैं तैयार? 

07 जनवरी 2018

विमर्शों की बहस में

समाज और साहित्य सदैव से एक-दूसरे के लिए आईने का काम करते रहे हैं. कभी समाज ने साहित्य से कुछ लिया, कभी साहित्य ने समाज से कुछ लिया. इधर कुछ वर्षों से साहित्य और समाज में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श का चलन व्यापक रूप से देखने को मिला है। इन दोनों विमर्शों को अधिकतर एकसाथ सम्बद्ध करके देखने की प्रवृत्ति समाज में बनती जा रही है। इसके पीछे दोनों-स्त्री और दलित- को शोषित, दबा-कुचला माना जाना एक प्रमुख कारण रहा है। यह सही है कि देश में स्त्रियों की, दलितों की स्थिति दयनीय दशा में रही है और इनके उत्थान के लिए, इनके विकास के लिए समाज में लगातार प्रयास किये जाते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। इन्हीं तमाम सारे कामों के, प्रयासों के बीच विमर्श भी अपनी भूमिका निभाता रहता है। दोनों विमर्शों के पक्षधर लोग अपने-अपने हिसाब से स्थितियों को दर्शाकर अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वाह करते रहते हैं और इसके परिणामस्वरूप साहित्य-समाज एकदूसरे पर अपना-अपना प्रभाव छोड़ते रहते हैं। साहित्य से समाज और समाज से साहित्य कुछ न कुछ अंगीकार करते हुए स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श को प्रतिस्थापित करते रहते हैं।


            इन दोनों विमर्शों को एकसाथ इनके परिणामों के रूप में देखने की आज आवश्यकता प्रतीत होती है। समाज में इन दोनों वर्गों के आज अपने-अपने आलम्बरदार बन गये हैं, अपने-अपने मोर्चे खोल लिये गये हैं, अपने-अपने झंडे फहराने शुरू कर दिये गये हैं। इस कारण से कई बार समाज में, साहित्य में स्थिति सुधरने के स्थान पर विकृत होने की सम्भावना पनपने लगती है। आज दोनों ही विमर्शों के परिणामस्वरूप जो नया तबका उभरकर सामने आया है उसने न तो समाज का ध्यान रखा है और न ही साहित्य की सम्भावनाओं का ध्यान रखा है। ऐसे तबके का ध्यान पूरी तरह से किसी न किसी रूप में सिर्फ और सिर्फ स्वयं को प्रतिस्थापन करने में लगा हुआ है। ऐसा होने से स्त्री-विमर्श तथा दलित-विमर्श के द्वारा जो सकारात्मक परिणाम सामने आने चाहिए थे, वे कदापि नहीं आये। स्त्री-विमर्श की आड़ लेकर स्त्रियों के एक बहुत बड़े तबके ने अपनी स्वतन्त्रा का दुरुपयोग करना शुरू किया और इसका परिणाम यह हुआ कि महिलायें पुरुषों के चंगुल से बाहर आकर महिलाओं के हाथों की कठपुतली बन गईं। इसी तरह से दलित-विमर्श के नाम पर दलित साहित्यकारों ने अपनी कलम के द्वारा, अपने साहित्य के द्वारा समाज में एक प्रकार का विभेद पैदा करना शुरू कर दिया। इससे न केवल सामाजिक वैमनष्य बढ़ा है और अगड़े-पिछड़े के बीच की खाई पटने के स्थान पर बढ़ी ही है। आज दोनों विमर्शों के सिपहसालार बजाय स्थितियों को सुधारने के स्थितियों को बिगाड़ने में लगे हुए हैं।


            विमर्श के नाम पर आज साहित्य में, समाज में जिस तरह से शिगूफा चलाया जा रहा है, उससे न तो समाज का भला होने वाला है और न ही साहित्य का। कम से कम इन दोनों विमर्शों के वे महारथी, जो ये समझते-मानते हैं कि आपसी वैमनष्यता से, आपसी भेदभाव से यदि दोनों तबकों का भला हो जायेगा, उनकी स्थिति सुधर जायेगी तो वे कहीं न कहीं गलत कर रहे हैं। यदि सामाजिक सक्रियता बनाये रखने वाले, साहित्यिक क्षेत्र में सक्रियता दिखाने वाले वाकई इन दोनों वर्गों का सकारात्मक भला करना चाहते हैं तो उन्हें विभेद को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि कटुता दर्शाकर, विभेद दिखाकर समाज का, साहित्य का भला कदापि नहीं होगा बल्कि रिश्तों में कड़वाहट ही बढ़ती रहेगी। हाल-फ़िलहाल स्त्री-विमर्श में विगत कुछ दिनों से मेरिटल रेप जैसी शब्दावली का निर्माण करके उसके इर्द-गिर्द छद्म क्रांतिकारी बयान देखने को मिलने लगे हैं। कुछ लेखन भी देखने को मिल रहा है। इस नवोन्मेषी विषय पर जल्द ही।  

12 जून 2016

अभियान के नाम पर देह से खिलवाड़

विगत कुछ समय से स्त्री-सम्बन्धी मुद्दों पर या फिर स्त्री-केन्द्रित विषयों पर ज्यादा ही चर्चा देखने को मिल रही है. इस चर्चा में, विमर्श में स्त्री की आज़ादी की बात की जा रही है. उसके स्वतंत्र विचारों की बात हो रही है. उसके अस्तित्व पर बहस हो रही है. सोचकर, सुनकर अच्छा लगता है कि समाज में स्त्री, पुरुष दोनों ही स्त्री-विकास की, स्त्री-सशक्तिकरण की बात करने में लगे हैं. इस अच्छे-भले सुनने, महसूस करने के बीच यदि स्त्री-स्वतंत्रता, स्त्री-सशक्तिकरण के लिए उठाये गए मुद्दों पर दृष्टिपात करने पर कहानी कुछ और ही समझ आती है. स्त्री की आज़ादी की आवाज़ उठाने वाले विषयों में हैप्पी टू ब्लीड, फ्री सेक्स, मैरिटल रेप, उन्मुक्त शारीरिक सम्बन्ध, माहवारी पर चुप्पी तोड़ो, मंदिर प्रवेश आदि-आदि दिखाई देते हैं. कहीं, किसी तरफ से स्त्रियों के स्वावलंबन की बात नहीं होती है. किसी तरफ से स्त्रियों की आर्थिक आज़ादी की चर्चा नहीं होती है. कोई भी स्त्रियों के वास्तविक अधिकारों की बात करता नहीं दिखता है. ऐसा लगता है जैसे स्त्री की समूची दुनिया को देह के इर्द-गिर्द, सेक्स के आसपास, धर्म के चारों तरफ ही केन्द्रित कर दिया गया है. समाज में एक तरफ स्त्री-सशक्तिकरण की वकालत करने वाले, स्त्रियों के अधिकारों की चर्चा करने वाले, स्त्री-अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले समाज पर ही आरोप लगाते हैं कि स्त्रियों को सदैव सेक्स और धर्म के नाम पर कैद किया जाता रहा; उसके अस्तित्व को छोटा करके दिखाया जाता रहा; महिलाओं की सोच को कुंठित करके रखा गया और इसके ठीक उलट उन्हीं के द्वारा स्त्री-आज़ादी के लिए धर्म और सेक्स को ही मुख्य बिन्दु बनाया जाता है.

समझने वाली बात है कि क्या सेक्स की आज़ादी से, देह की आज़ादी से, माहवारी की चुप्पी तोड़ने से स्त्री को वाकई आज़ादी मिल जाएगी? कहीं ये स्त्री-सशक्तिकरण का झंडा उठाये वर्ग द्वारा एक तरह का षड्यंत्र तो नहीं जो स्त्री को सेक्स और धर्म की चाशनी में लपेटकर उसी में बंधक बना देना चाहता है? हैप्पी टू ब्लीड से लेकर माहवारी पर चुप्पी तोड़ो पर इस तरह से होहल्ला मचाया गया जैसे कि स्त्री की आज़ादी की राह में यही सबसे बड़ा रोड़ा है. प्रतिमाह आने वाली इस शारीरिक प्रक्रिया के बारे में इस तरह से दुष्प्रचार किया जा रहा मानो इन पाँच दिनों में स्त्री को सिर्फ पुरुष ही बंधक बना लेता हो; सिर्फ पुरुष ही उसकी आवाज़ को खामोश कर देता हो. प्राकृतिक शारीरिक संरचना में अनिवार्यता के चलते उत्पन्न कतिपय दैहिक क्रियाविधि को घर-परिवार की महिलाओं द्वारा ही सबसे ज्यादा निशाने पर लिया जाता है. मंदिर में प्रवेश न करना, पूजादि धार्मिक कृत्य न करना, रसोई में घुसने, खाद्य-पदार्थ छूने की मनाही आदि-आदि सहित अनेक कार्यों से महिलाओं को महिलाओं द्वारा ही वंचित किया जाता है. स्त्री की देह को जिस तरह से प्रश्नवाचक चिन्ह लगा कर देखा जाता है, जिस तरह से उसकी शारीरिक सञ्चालन की प्राकृतिक गतिविधि को केन्द्रित करके स्त्री को लक्ष्य किया जाता है, उस सोच पर, उस गतिविधि पर नियंत्रण लगाये जाने की आवश्यकता है.


वर्तमान में जिस तरह का परिवेश समाज में बनता जा रहा है उसमें सेक्स को, स्त्री-देह को प्रमुखता दी जाने लगी है. किसी भी उत्पाद का विज्ञापन हो, किसी भी तरह का म्यूजिकल कार्यक्रम हो, कोई भी एलबम हो, क्रिकेट का मैदान हो सभी जगह किसी न किसी रूप में स्त्री-देह को सजा-संवार कर पेश किया जाता है. यदि इस तथ्य को ध्यान में रखा जाये तो कहीं ऐसा तो नहीं कि स्त्री से सम्बंधित इस तरह के संचालित अभियानों का कथित उद्देश्य उनकी देह को ही विमर्श के केंद्र में रखना हो? स्त्री देह से सम्बंधित विभिन्न समस्याओं का समाधान संभव हो कि सार्वजनिक सहभागिता से निकले किन्तु इस तरह के सार्वजनिक अभियानों से कतई नहीं निकलने वाला. ये अभियान विवाद पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं. सोचिये एक मिनट रुक कर कि हैप्पी टू ब्लीड से किस तरह का सन्देश दिया गया? फ्री सेक्स के द्वारा किस तरह से संबंधों की वकालत की जा रही है? मैरिटल रेप जैसी अवधारणा से क्या दाम्पत्य जीवन सुखमय बनेगा? माहवारी पर चुप्पी किससे तोड़नी होगी और कैसे? बेहतर हो कि ऐसे विषयों पर सकारात्मक चर्चा हो न कि प्रचार की तरह इन्हें इस्तेमाल किया जाये. माहवारी जैसे विषयों को, सेक्स जैसे विषयों को समाज की गति को देखते हुए, उसके परिवेश को देखते हुए पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये. अपनी देह के गोपन को जानना-समझना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है किन्तु ये किसी का अधिकार नहीं कि वो स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे की देह से खेलने का कार्य करे. 

14 फ़रवरी 2016

स्त्री स्वतंत्रता का भटकाव

विमर्शों के इस दौर में महिलाओं की आज़ादी के नाम पर स्त्री-विमर्श के बहाने से देह के आसपास घूमते विमर्श को तलाशने का प्रयत्न किया जाने लगा है; यौन स्वच्छंदता के रूप में आज़ादी की चाहना सामने रखी जाने लगी है. स्त्री को उसकी यही स्वतंत्रता दिलाने हेतु आन्दोलन शुरू हुये, महिला सशक्तिकरण की राह निर्मित की गई. नारी मुक्ति आन्दोलन का आरम्भ मुख्यतः ग्रेट ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका से हुआ. पूँजीवादी देशों में नारी की दशा पुरुषों के मुकाबले दोयम थी. कानून और धर्मशास्त्र के द्वारा भी पराधीनता की व्यवस्था की गई थी. ऐसे में सन् 1792 में मेरी वोल्सटोनक्राफ्ट ने स्त्रियों के पक्ष में पहला और महत्वपूर्ण दस्तावेज स्त्रियों के अधिकारों का औचित्य साधनलिखा. महिलाओं की लगातार सक्रियता से आन्दोलन को अतिवादी रूप मिला, जिसके चलते सौन्दर्य प्रसाधनों का बहिष्कार होने लगा, सड़कों पर चोलियों को जलाया जाने लगा, स्त्री-पुरुष प्रतिद्वंद्वी के रूप में आमने सामने खड़े होने लगे. परिणाम यह हुआ कि स्त्री-पुरुष समलैंगिकता, मुक्त यौनाचार, हत्याओं, आत्महत्याओं आदि का सिलसिला चल पड़ा. ऐसे अतिवाद का परिणाम यह हुआ कि नारी मुक्ति का आन्दोलन अपनी मंजिल से पूर्व ही राह भटक गया.

भारतीय नारी सदियों से दासता से मुक्त होने की राह देख रही थी किन्तु यहाँ इसके शुरूआती दौर को पुरुषों ने ही सँभाला. ईश्वरचन्द विद्यासागर द्वारा गठित बेहरामजी माला-बारी संघकी ओर से विधवा विवाह करवाये जाने और बाल विवाह पर रोक लगाये जाने की माँग के साथ अभियान का आरम्भ हुआ. सन् 1866 में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाकर नारी मुक्ति की दिशा में प्रयास किया. ब्रह्म समाज ने भी नारी मुक्ति आन्दोलन को दिशा दी. इसके बाद भी भारतीय नारी सशक्तीकरण अपनी स्वीकार्यता की माँग कर रहा है. इसके पीछे मूल कारण ये रहा कि नारी सशक्तीकरण के नाम पर महिलाओं द्वारा अपनी कुंठा को बाहर निकाला जाने लगा और इसे आत्मविश्वास का नाम देकर परिभाषित किया जाने लगा. नारीवादी संगठनों द्वारा समय-समय पर उठायी जाती आवाजों में यौन वर्जनाओं के टूटने की ध्वनि सुनायी दी.

महिलाओं द्वारा समय-समय पर स्वतंत्रता की आवाज़ उठाई जाने लगी. ऐसे में सवाल यह उठता है कि नारी को स्वतन्त्रता किससे चाहिए? स्वतन्त्रता के नाम पर आधुनिक समझने वाली नारियों ने खुद को उत्पाद के रूप में स्थापित करवा दिया है, बाजारवाद के चलते वह स्वयं बाज़ार में सज रही है. परिवार, घर, बच्चों की परवरिश को अपनी गुलामी समझने वाली नारी को टी0वी0 की सेल्युलाइड चमक तथा पर्दे की रंगीनियाँ आजादी का सपना तो दिखा सकती है पर वास्तविक आजादी नहीं दिलवा सकती है. यही कारण है कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए निर्माता नग्न महिला को ही पसंद कर रहा है. नारी सशक्तीकरण के नाम पर नारी की देह को परोसा जा रहा है पर उसे अब इसमें किसी प्रकार के शोषण अथवा असम्मान की झलक नहीं दिखायी देती है क्योंकि यह सब उसके स्वयं के द्वारा हो रहा है.


इसमें कोई दोराय नहीं कि महिलाओं ने समय-समय पर अपनी क्षमताओं को दर्शाकर साबित किया है कि वे पुरुषों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं. स्त्री-मुक्ति का यह आन्दोलन इसी रूप में आगे बढ़ता तो किसी सार्थक मुकाम पर अवश्य पहुँचता किन्तु विदेशी नारी मुक्ति आन्दोलन की तरह शारीरिक सुख, यौन स्वतन्त्रता के चलते वह भी विकृत हो गया. परिणाम यह हुआ कि अधिकारों, दायित्वों, कार्यों की माँग करने वाली महिलायें यौन स्वतन्त्रता की बात करने लगीं. उनका लक्ष्य नारी देह की स्वतन्त्रता हो गया, यौन स्वतन्त्रता हो गया. इसे नारी सशक्तीकरण की बिडम्बना ही कही जायेगी कि नारी सशक्तीकरण की समर्थक स्त्री नारी सशक्तीकरण की सफलता इस बात से तय करती है कि कब पुरुष वेश्यालय बनेंगे? सशक्तीकरण की आड़ लेकर एक स्त्री को पिता, पति, पुत्र शासक के रूप में दिखता है और वह स्वयं को इनका शोषित समझती है. स्वतंत्रता की चाह रखने वाली ऐसी महिलाओं को समझना होगा कि महिलाओं को मिलते अधिकार, शिशु प्रजनन सम्बन्धी अधिनियम, परिवार को सीमित रखने का अधिकार, तलाकशुदा स्त्री को बच्चा पाने का कानूनी अधिकार आदि उनकी स्वछन्द यौन-प्रस्तुति से सम्भव नहीं हुए हैं. इसके पीछे लगनशील महिलाओं का योगदान रहा है जिन्होंने आज़ादी के लिए महिला शरीर को आधार नहीं बनाया. स्वयं को उत्पाद बना कर, देह को आधार बना कर नारी सशक्तीकरण की चर्चा बेमानी सी प्रतीत होती है. खुद महिलाओं को ही विचार करना होगा कि बाजारवाद के इस दौर में स्वयं को वस्तु सिद्ध करती नारी किस स्वतन्त्रता, किस सशक्तीकरण की बात कर रही है? इस ओर विचार स्त्रियों को ही करना होगा क्योंकि पुरुष वर्ग द्वारा किया गया विचार नारीवादी समर्थकों को ढकोसला ही दिखायी देगा. 

30 जनवरी 2016

धार्मिक समानता का नाटक


एक बार फिर स्त्री और मंदिर विवादों के केन्द्र में है. अबकी शनि देव पर तेल चढ़ाने को लेकर बवाल मचा हुआ है. ये समझ से परे है कि आखिर ऐसी जागरूक महिलाएँ धर्म के नाम पर ऐसी आज़ादी की माँग किसके लिए और क्यों कर रही हैं? एक तरफ यही जागरूक और प्रगतिशील महिलाएँ धर्म को महिलाओं के लिए बंधन, उनको गुलाम बनाने वाला बताती हैं और दूसरी तरफ यही महिलाएँ सड़कों पर आन्दोलन करने में लगी हुई हैं. समूचे परिदृश्य को देखकर बहुत कुछ स्पष्ट होता है कि ऐसी महिलाओं का उद्देश्य समाज की अन्य स्त्रियों को शनिदेव की पूजा करने, उन पर तेल चढ़ाने की आज़ादी दिलवाना नहीं है वरन किसी न किसी रूप में अपने आपको मीडिया में स्थापित किये रहना ही है. यही वे महिलाएं हैं जो कुछ समय पूर्व किस ऑफ़ लव का आन्दोलन छेड़े हुए थीं, फिर उसके बाद यही महिलाएं हैप्पी टू ब्लीड के समर्थन में उतरी और अब धर्म के नाम पर झंडा उठाये घूम रही हैं.
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सड़क पर आंदोलित इन महिलाओं के हिसाब से औरत को पूरी आज़ादी चाहिए है. सच भी है, किसी भी इन्सान को महज इस कारण आज़ादी से वंचित नहीं किया जा सकता है कि वो स्त्री है अथवा पुरुष है. यदि महिलाओं की वास्तविक आज़ादी शनिदेव को तेल चढ़ाने से ही होती है तो फिर धार्मिकता के नाम पर महिलाओं को गुलाम बनाये जाने का आरोप इस समाज पर क्यों गढ़ा जाता है? दरअसल ये विरोध न तो धर्म के लिए है, न महिलाओं की आज़ादी के लिए है वरन ये विरोध केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध है, हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है. यहाँ एक बात विशेष रूप से समझने वाली है कि जिन महिलाओं द्वारा समाज में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था की माँग की जाती हो, ट्रेन में अलग महिला कोच की माँग की जाती हो, स्कूल, बैंक, बाज़ार आदि की अलग माँग रखी जाती हो वे धर्म के नाम पर ही समानता क्यों चाहती हैं? समानता की माँग के बाद भी देह की विशिष्टता को बनाये रखकर ऐसी प्रगतिशेल महिलाएं खुद को ही आरोपी बना रही हैं, अपने आन्दोलन को, अपनी माँग को कटघरे में खड़ा कर रही हैं.
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देह को विशिष्ट बनाकर उसको भेदभाव का अंग बनाकर पुरुषों को आरोपी बना देना सहज है और फिर इसी के उलट समानता की बात करना एक तरह का छद्म दिखाता है. परीक्षाओं के दौरान किसी पुरुष शिक्षक द्वारा किसी छात्रा की तलाशी महज उसके स्त्री होने के कारण नहीं हो सकती; सड़क चलते किसी स्त्री की देह का अनायास स्पर्श हो जाना भी पुरुष को बलात्कारी बना देता है; राह चलते किसी स्त्री को देख लेना भी कानूनी जुर्म हो गया है, तब समानता के लिए एकमात्र स्थान मंदिर ही बचता है. ऐसी जागरूक महिलाओं को धर्म के साथ-साथ अन्य स्थानों पर जागरूकता, समानता लाने का काम करना चाहिए. ऐसा नहीं कि महिलाओं का प्रवेश मंदिर में नहीं होना चाहिए; ऐसा भी नहीं कि महिलाओं द्वारा किसी देव विशेष के पूजन कर लेने से समाज में प्रलय आ जाएगी किन्तु महज प्रचार की, आत्ममुग्धता की दृष्टि से किये ऐसा जाने की मंशा को अवश्य निषेध किया जाना चाहिए. एक तरफ मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलित होना दूसरी तरफ विरोध के लिए खुद को दैहिक रूप से स्वतंत्र बना देना कहीं न कहीं आंदोलनरत महिलाओं के दोहरेपन के रवैये को रेखांकित करता है.
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समाज में किसी भी गलत कार्य का विरोध होना चाहिए, किसी भी अमान्य स्थिति के विरोध में आन्दोलन होना चाहिए मगर महज विरोध की राजनीति के लिए विरोध नितांत भ्रम की स्थिति है, सर्वथा गलत है. इन्हीं जागरूक महिलाओं द्वारा उन महिलाओं के पक्ष में अभियान क्यों नहीं छेड़ा जाता जो आज भी खुले में शौच को मजबूर हैं; जो असमय अपनी शिक्षा को छोड़ दिए जाने को बाध्य कर दी जाती हैं; जो कम उम्र में कई-कई बच्चों की माँ बना दी जाती हैं; जो आज भी दहेज़ के नाम पर आये दिन प्रताड़ित की जा रही हैं; जो आज भी कार्यक्षेत्रों में अपने सहकर्मियों द्वारा शोषित की जा रही हैं; जो आज भी लोकतान्त्रिक रूप से प्रतिनिधि बनने के बाद भी पारिवारिक पुरुषों की गुलाम बनी हुई हैं; जो समान कार्य करने के बाद भी पुरुषों के समान अवसरों से वंचित रह जा रही हैं.

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03 जनवरी 2016

माताओं का चरित्रहनन है ये आरोप


‘चयन के बदले डीडीसीए के चयनकर्ता द्वारा सेक्स की माँग की गई’ जैसे आरोप की गम्भीरता को समझने की आवश्यकता है. इस आरोप को सामान्य आरोप अथवा झूठा बयान कहकर विस्मृत नहीं किया जा सकता है क्योंकि ऐसे आरोप की जानकारी किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा नहीं दी गई है. संवैधानिक पद पर बैठे, मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेवार पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा यदि इस तरह के आरोप का खुलासा किया जा रहा है तो ऐसे आरोप को आपसी विवाद कहकर नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दिल्ली मुख्यमंत्री के सचिव के कार्यालय पर सीबीआई के छापे के तत्काल बाद ही जागृत अवस्था में आये दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को डीडीसीए के घोटालों में घेरने का प्रयास किया. इसी प्रयास में वे खिलाड़ी के चयन के बदले सेक्स की माँग जैसे आरोप को सामने रखने से भी नहीं चूके. ये आरोप जितनी सपाट तरीके से डीडीसीए चयनकर्ताओं पर लगाया गया उतनी ही सपाट तरीके से इसे भुला सा दिया गया. इस आरोप की गम्भीरता पर न तो डीडीसीए की तरफ से ध्यान दिया गया और न ही स्वयं दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा दिया गया. इस तरह के आरोप के द्वारा भले ही केजरीवाल ने डीडीसीए को अथवा जेटली को घेरने का प्रयास किया हो किन्तु इसे हलके में नहीं लिया जा सकता है. प्रत्यक्ष रूप से न सही किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से ही केजरीवाल ने अनेकानेक चयनकर्ताओं की माँओं के चरित्र पर सवालिया निशान लगा दिए. डीडीसीए चयनकर्ताओं ने मात्र उसी एक खिलाड़ी का चयन नहीं किया होगा, यदि सेक्स की माँग सही है तो केवल उसी के खिलाड़ी की माँ से नहीं की गई होगी और यदि ऐसा कोई भी आरोप असत्य है तो भी कितनी-कितनी महिलाओं, कितने-कितने खिलाडियों को शर्मसार होना पड़ रहा होगा इसका अंदाजा स्वयं केजरीवाल को नहीं होगा.
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ऐसे आरोप की जानकारी होने के बाद भी केजरीवाल का शांत होकर बैठ जाना अपने में एक अलग कहानी कहता है. जैसा कि उनके द्वारा बताया गया कि एक पत्रकार ने उनको ऐसी जानकारी दी तो उन्हें समूचे घटनाक्रम को स्वयं संज्ञान में लेते हुए डीडीसीए के चयनकर्ताओं के खिलाफ जाँच बैठानी चाहिए थी. और यदि इस तरह की बयानबाज़ी में कोई सत्यता नहीं है तो केजरीवाल ने न केवल समूचे लोकतंत्र का अपमान किया है बल्कि तमाम महिलाओं का अपमान किया है, देश की प्रतिभाओं का भी अपमान किया है. मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा ऐसी जानकारी देने के बाद भी किसी तरह की जाँच न करना इसे कपोलकल्पित सिद्ध करता है. यदि ऐसा महज राजनैतिक कटुता के कारण किया गया है तो घिनौनी राजनीति का इससे बड़ा उदाहरण कहीं और नहीं मिलेगा. ऐसे बयान के बाद भी आश्चर्य देखिये कि किसी भी जागरूक महिला संगठन की तरफ से, न किसी राजनैतिक दल की तरफ से, न डीडीसीए की तरफ से, न किसी पत्रकार संगठन की तरफ से इसका कोई विरोध नहीं किया गया है. ये समझाने के लिए ही पर्याप्त है कि किस तरह से राजनीति में महिलाओं को सम्मान दिया जा रहा है. किसी वरिष्ठ राजनीतिक द्वारा सौ टका टंच माल से लेकर एक मुख्यमंत्री द्वारा सेक्स की माँग के बयान तक उतर आना समूची स्थिति को स्पष्ट करता है.
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अपने आन्दोलन के बाद से जिस तरह से केजरीवाल और उनकी टीम ने लोकप्रियता हासिल की थी वो उनके क्रियाकलापों के चलते लगातार कम होती जा रही है. उनके समर्थक भले ही कुछ भी कहते रहें किन्तु आम आदमी पार्टी की रैली में एक किसान की आत्महत्या के प्रयास में मृत्यु हो जाना, दिल्ली में हुए रेप कांड के नाबालिग आरोपी को रिहाई पश्चात् आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाए जाने सम्बन्धी बयान, आम आदमी पार्टी के मंत्रियों, नेताओं का कई-कई आपराधिक मामलों में लिप्त पाया जाना, मुख्यमंत्री के सचिव के कार्यालय से विदेशी मुद्रा का मिलना और अब स्वयं मुख्यमंत्री केजरीवाल द्वारा महिलाओं, खिलाडियों के चरित्र को घेरे में खड़ा कर देना अत्यंत क्षोभजनक है. केजरीवाल को समझना चाहिए कि दिल्ली का मुख्यमंत्री होना किसी राज्य का मुख्यमंत्री होना भर नहीं है; देश की राजधानी होने के कारण वैश्विक दृष्टि दिल्ली में लगी रहती है. उनके इस बयान के दीर्घगामी परिणाम/दुष्परिणाम क्या होंगे ये तो आने वाला समय बताएगा किन्तु इस तरह के बयान को देने और फिर किसी भी तरह की कार्यवाही न करना उनकी क्षुद्र मानसिकता को ही दर्शाता है. राजनीति में विभिन्न दलों के बीच, विभिन्न व्यक्तियों के मध्य आपसी वाद-विवाद चलते ही रहते हैं किन्तु राजनैतिक विवाद में जिस तरह के कदम केजरीवाल द्वारा अथवा उनके अन्य नेताओं द्वारा उठाये जाते रहे हैं वे निंदनीय हैं. कहीं न कहीं ‘राजनीति बदलने आये हैं’ जैसे उनके बयान की ही बखिया उधेड़ते हैं. यहाँ इन नेताओं को नहीं वरन उन महिलाओं को सजग होने की आवश्यकता है जो जरा-जरा सी बात को महिलाओं की इज्जत से जोड़ते हुए वितंडा खड़ा करने लगती हैं. केजरीवाल ने जो कुछ कहा है वो महज बयान नहीं, महज एक आरोप नहीं बल्कि अनेकानेक माताओं का चरित्रहनन है.

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