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19 नवंबर 2025

Men's Day पर महिलाओं की बधाई, शुभकामना??



Women's Day पर कूद-कूद कर बधाई शुभकामना देने वाले पुरुषो, सोशल मीडिया को रंग देने वाले पुरुषो, महिलाओं की प्रोफाइल में घुस-घुस कर बधाई देने वाले पुरुषो.....

आज Men's Day पर कितनी महिलाओं ने तुमको बधाई, शुभकामना दी हैं?

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ध्यान रखो... तुम कुछ भी करो, कुछ भी करते फिरो मगर बहुतायत महिलाओं की निगाह में तुम आज भी लम्पट, कामुक, शोषक, बलात्कारी, निर्लज्ज, हिंसक, अराजक आदि-आदि ही हो.....


08 मार्च 2024

आठ मार्च महिला दिवस पर विचार करिए

आज है अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस और चारों तरफ कार्यक्रमों की औपचारिकता का निर्वहन दिखाई दे रहा है. जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों, रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है. सरकारी संगठनों के साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं अवश्य ही करें. यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों ने ही किया होता. आये दिन की भाषणबाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात वहीं का वहीं है. केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद महिलाओं द्वारा.




कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार अवश्य होना चाहिए.


वंश-वृद्धि की लालसा में पुत्र प्राप्ति की चाह रखने वाले बतायें कि क्या जवाहरलाल नेहरू का वंश किसी लड़के के कारण चल रहा है?

स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?

बेटे की चाह में लड़की को मारने वाले अपने लड़के के विवाह के लिए लड़का कहाँ से लायेंगे?

इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कम होता रहा तो आने वाले समय में होने वाली स्त्री हिंसा की भयावहता को कौन रोकेगा?

बराबर का दर्जा सिद्ध करती स्त्री आने वाले समय में कम संख्या के कारण अपनी खरीद-बिक्री को कैसे रोक सकेगी? (आज भी कई घटनायें इस तरह की प्रकाश में आईं हैं जहाँ कि परिवारों में पुरुष स्त्रियों को खरीद कर ला रहे है)

लड़कियों की लगातार गिरती संख्या से क्या समाज में अनाचार की और विकट स्थिति पैदा होने वाली नहीं है?


सवाल बहुत हैं पर जवाब.......???


जवाब हमें ही देना होगा, मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है. समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे. पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा. क्या आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?





 

08 मार्च 2020

महिला दिवस : सफल महिलाओं की कहानी या पुरुष विरोध

आठ मार्च. महिला दिवस या फिर महिलाओं द्वारा पुरुष विरोधी मानसिकता को दर्शाने का दिन? ऐसा अकारण लिखना नहीं हो रहा. विगत कई वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत रहने के दौरान इस दिन से विशेष रूप से परिचय होता है. ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि अपने जनपद में कन्या भ्रूण हत्या निवारण के सम्बन्ध में उस समय से कार्यक्रम का सञ्चालन कर रहे हैं, जबकि इस तरफ प्रशासन भी संवेदित नहीं था. इसी कारण से आठ मार्च के कार्यक्रमों में शामिल होने का आमंत्रण विशेष रूप से हमारे पास आता है. ऐसे कार्यक्रमों में महिलाओं की उन्नति, उनके विकास, उनकी आत्मनिर्भरता, उनके आर्थिक स्वावलंबन की चर्चा कम होती है इसके उलट पुरुषों पर दोषारोपण किये जाने का काम अधिक होता है. समझ से परे है कि इस दिन का आयोजन किसलिए किया जाता है?

यहाँ सभी से, खासतौर से महिलाओं से हमारा एक ही सवाल मुख्य रूप से रहता है कि ये प्रतिद्वंद्विता किससे, पुरुष से या पति से? क्या एक भाई अपनी बहिन की उन्नति देखकर उससे जलन करेगा? क्या एक पिता अपनी बेटी के विकास में अवरोध पैदा करता है? (अपवादों को यहाँ मुख्य चर्चा में शामिल न किया जाये तो बेहतर) वर्तमान में समाज में स्त्री और पुरुष ने अपने-अपने मानक बना लिए हैं. उसी आधार पर उनकी अपनी-अपनी सोच का निर्माण हो गया है. अब पुरुष को स्त्री की बात गलत लगती है और इसी तरह महिला को भी किसी पुरुष की बात गलत लगती है. किसी भी महिला के विकास में उसके परिवार के अथवा किसी अन्य रूप में किसी पुरुष का क्या योगदान है, इसे विस्मृत कर दिया जाता है. ऐसा संभव ही नहीं है कि किसी भी व्यक्ति की सफलता में सिर्फ उसी व्यक्ति का योगदान हो. जाने-अनजाने, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कई तत्त्व, कई कारक ऐसे होते हैं जो किसी भी व्यक्ति की उन्नति में सहायक होते हैं. ऐसा ही महिलाओं के विकास में होता है. 

आज जबकि महिलाओं की तरक्की की चर्चा होती है तो किसी महिला के ट्रेन चलाने की, किसी के बस चलाने की, किसी के हवाई जहाज चलाने की, किसी के अन्तरिक्ष जाने की, किसी के चिकित्सक बनने की अथवा किसी के अन्य क्षेत्र में उन्नति करने की, सफलता के झंडे गाड़ने की चर्चा होती है. उन महिलाओं की इन सफलताओं के पीछे उस महिला की लगन, उसका संघर्ष, उसका विश्वास आदि प्रमुखता से सामने लाया जाता है. यहाँ सोचने की बात है कि क्या उस सफल महिला के पीछे वाकई किसी पुरुष का हाथ नहीं है? क्या वह महिला सिर्फ अपनी ही मेहनत से सफल हो गई? क्या उसने पैदा होने के अगले दिन अथवा कुछ सालों बाद स्वतः ही सफलता पा ली थी? नहीं न, ऐसा ही है. इसके बाद भी समाज में वर्षों से चले आ रहे स्त्री और पुरुष के विभेद को स्त्री-विमर्श के नाम पर और बढ़ाया जा रहा है.


फिलहाल तो महिला दिवस पर उन्हीं महिलाओं द्वारा भड़ास निकाली जा रही है जो किसी न किसी रूप में मंच पर बैठने की स्थिति में हैं. वे सिर्फ पुरुषों को गरियाने का काम कर रही हैं. उनके द्वारा अन्य किसी मजबूर महिला की सहायता करने जैसा काम न के बराबर किया जा रहा है. आज आवश्यकता है कि उन महिलाओं को भी सफलता का स्वाद चखाया जाये जो किसी न किसी तरह से मेहनत करके अपने परिवार को पाल रही हैं. अपनी दिनचर्या से अपने बच्चों को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं. कठोर से कठोर काम करके खुद को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही हैं. असल में महिला दिवस ऐसी ही महिलाओं को समर्पित होना चाहिए. 
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

08 मार्च 2019

स्त्री, पुरुष दोनों को ही विचार करना होगा

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस का आना हुआ नहीं कि कार्यक्रमों की औपचारिकता का निर्वहन प्रारम्भ हो गया. जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों, रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है. सरकारी संगठनों के साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं अवश्य ही करें. यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों ने ही किया होता. आये दिन की भाषणबाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात वहीं का वहीं है. केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद महिलाओं द्वारा. भाषणों में विकास के आयाम खोजने की बजाय यह खोजा जाता है कि एक और विभेद स्त्री-पुरुष के बीच कहाँ से पैदा किया जाये. यह सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि कैसे स्त्रियों को शोषित बताया जाये. कैसे स्त्री को पुरुष से ज्यादा संघर्ष करने वाली बताया जाये. कैसे साबित किया जाये कि एक बेटी के रूप में एक स्त्री अपने माता-पिता का ख्याल अधिक रखती है बजाय एक बेटे के.  


बहरहाल, कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार अवश्य होना चाहिए.

वंश-वृद्धि की लालसा में पुत्र प्राप्ति की चाह रखने वाले बतायें कि स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?
बेटे की चाह में लड़की को मारने वाले अपने लड़के के विवाह के लिए लड़का कहाँ से लायेंगे?
इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कम होता रहा तो आने वाले समय में होने वाली स्त्री हिंसा की भयावहता को कौन रोकेगा?
बराबर का दर्जा सिद्ध करती स्त्री आने वाले समय में कम संख्या के कारण अपनी खरीद-बिक्री को कैसे रोक सकेगी? (आज भी कई घटनायें इस तरह की प्रकाश में आईं हैं जहाँ कि परिवारों में पुरुष स्त्रियों को खरीद कर ला रहे है)
लड़कियों की लगातार गिरती संख्या से क्या समाज में अनाचार की और विकट स्थिति पैदा होने वाली नहीं है?

सवाल बहुत हैं पर जवाब.......??? जवाब शायद हम सभी खोजना भी नहीं चाहते क्योंकि यही काम मुश्किल है. सरल काम है गोष्ठी करवा लेना, रैली निकलवा लेना, किसी कार्यक्रम का आयोजन करवा लेना. तो क्या हो? जवाब न खोजे जाएँ? ऐसा भी नहीं है. जवाब हमें ही देना होगा, जवाब हमें ही खोजने होंगे. मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है. समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे. पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा. क्या आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?

09 मार्च 2018

हमारी नजर में ये सिर्फ महिलायें नहीं


कल और आज महिला दिवस को लेकर कई कार्यक्रमों में सहभागिता रही. बिना किसी अपनी सहभागिता के बस उपस्थिति ही बनाये रखी. इसके पीछे कारण उन कार्यक्रमों का बजाय सामाजिक होने के प्रशासनिक हो जाना रहा. प्रशासनिक कार्यक्रमों का एक तरीके का आयोजन रहता है. उनका जो मुखिया हो उसकी चापलूसी करते रहो, उसके बारे में गुणगान करते रहो. इसके बदले में मिलता ये है कि जो आयोजन करता है उसके साथ के कुछ लोगों को सम्मानित कर दिया जाता है. कुछ विशेष लोगों संग सेल्फी निकलवा ली जाती है. उन्हीं लोगों के बारे में कह-सुन लिया जाता है. उन्हीं लोगों को मंच पर बोलने बुला लिया जाता है. बहरहाल, प्रशासन के अलावा भी अन्य कई जगहों पर अपनी सक्रिय सहभागिता की. आत्मिक रूप से इसलिए प्रसन्नता हुई क्योंकि ऐसे लोग संसाधनों से विहीन हैं मगर कुछ करने की इच्छा रखते हैं. हमारे साथ भी कुछ ऐसा था. वर्ष 1997-98 में जब हमने कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम जिले में शुरू किया था तो जिला प्रशासन के पास भी इससे सम्बंधित कोई सामग्री नहीं थी. चिकित्साधिकारी भी इससे शून्य थे. ऐसे में हमने अपने कुछ मित्रों संग अँधेरे में तीर मारना शुरू किया. इधर-उधर से सामग्री जुटाई और लोगों को बेटियों के बारे माँ जागरूक करना शुरू किया. तब हमारे पास भी संसाधन नहीं थे. हमने भी उसी समय परास्नातक परीक्षा पास की थी. बेरोजगार होने का बिल्ला माथे पर चिपकाये समाजसेवा में निकल पड़े थे. बेटियों को बचाने निकल पड़े थे. इसीलिए आज भी जब कोई ऐसा व्यक्ति जो संसाधन-रहित होता है बेटियों के बारे में कोई भी कार्यक्रम करता है, करना चाहता है, हम उसे पूरा सहयोग करते हैं.


इन जमीनी कार्यक्रमों के अलावा सोशल मीडिया पर भी कार्यक्रम चल रहे हैं. इधर-उधर से कॉपी-पेस्ट की हुई फोटो, विचारों आदि को दे दनादन इधर से उधर भेजा जा रहा है. इसी भेजा-भिजाई में सब अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ले रहे हैं. सामाजिक कार्यों से जिनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, वे सम्मानित हो रहे हैं. उनकी पोस्ट पर हजारों-हजार की संख्या में लाइक, कमेन्ट मिल रहे हैं. जिनका जमीनी काम है वे संसाधनों से रहित होने के कारण कहीं कोने में कार्यक्रम करने में लगे हैं. बहरहाल, इस बीच कई-कई लोगों ने हमसे कहा कि आज भी आपने कुछ नहीं लिखा. (इधर लोगों की मानसिकता बदलने की नीयत से विगत एक माह से अधिक समय से हम सोशल मीडिया या कहें कि फेसबुक से गायब हैं) सही भी है आज हमने कुछ लिखा भी नहीं, महिला दिवस पर. आखिर समझ ही नहीं आया कि क्या लिखना? महिलाओं का झंडा उठाये लोगों को मानना नहीं है कि उनके विकास में पुरुषों का योगदान महिलाओं से ज्यादा है. जिन लोगों ने स्त्री-विमर्श का इतिहास पढ़ रखा होगा उनको भली-भांति पता होगा कि वैश्विक स्तर पर स्त्री-सशक्तिकरण सम्बन्धी घटित चार बड़ी घटनाओं में से तीन का आरम्भ पुरुषों द्वारा किया गया. आज स्थिति ये है कि स्त्री को सफलता मिलती है तो वह उसके अपने निजी प्रयास से और असफलता मिलती है तो पुरुष द्वारा अवरोध पैदा करने के कारण.

आज जिस तरह से विभेद को समाप्त करने के लिए विभेद की नीति अपनाई जा रही है वह समाज में स्त्री और पुरुष के बीच खाई पैदा ही नहीं करेगी वरन और बढ़ाएगी. बहरहाल, आज हमने इसलिए कुछ नहीं लिखा क्योंकि समझ नहीं आया कि किसके लिए लिखें? क्या उन अईया या नानी के लिए बधाई सन्देश लिखें जिन्होंने हमारे इस धरती में आने का आधार रचा? उनके द्वारा जन्मी संतति ही हमारे जन्म का आधार बनी. वे दोनों लोग उस स्थिति तक पूज्य हैं, जो स्थिति भगवान से भी ऊपर है हमारे लिए. भगवान को क्या शुभकामना, क्या बधाई. इसके बाद क्या माँ को बधाई दें? उस माँ को जो हमारी नज़रों में मात्र महिला नहीं बल्कि किसी देवी से कम नहीं. पिता के साथ उसके साहचर्य का परिणाम है कि हम इस दुनिया में हैं. इसलिए उस देवी को मात्र महिला कैसे मान लिया जाये? उस माँ के अलावा यदि किसी ने आत्मीयता से अपने गले लगाया है तो वो है हमारी बहिन. उस बहिन ने हमें सिखाया कि कैसे दुनिया की बाकी महिलाओं का सम्मान किया जा सकता है, उसकी राखी की कैसे रक्षा की जा सकती है. कैसे वह बहिन मित्र भी बन जाती है, माँ भी बन जाती है, हमराज़ भी बन जाती है. उस बहिन को मात्र महिला कैसे समझ लें, जिसने महिलाओं के विविध आयामों को समझाया? इसके बाद जीवन में आई महिला मित्र. ऐसी दोस्तों को कैसे सिर्फ महिला मान लें. उन्होंने हमारे प्रति समाज के विश्वास को सशक्त किया कि अकेले में भी हमारे साथ वे सुरक्षित हैं. ऐसी दोस्तों को कैसे सिर्फ महिलाओं के खांचे में खड़ा कर दें, जो अपने अस्तित्व से ज्यादा हमारे अस्तित्व को स्वीकारने में सक्रिय हों.


इसके अलावा जिस महिला के साथ अग्नि के सामने सात फेरे लिए, जो इन्सान अपना सबकुछ छोड़कर हमारे साथ न केवल जीवन को आगे बढ़ाने आया हो वरन हमारे परिवार का सदस्य बनकर आया हो. जिस इन्सान ने पत्नी के रूप में न केवल हमारे अस्तित्व को स्वीकार किया बल्कि हमारे अस्तित्व को अपना अस्तित्व बनाया. इसके बाद भी अपने व्यक्तित्व का विकास करने के साथ-साथ हमारे विकास में भी सहायक बनी, उसे मात्र महिला कैसे मान लें? इन सबके अलावा हमारी बेटियों ने भी हमारे गौरव को आगे बढ़ाया है. जिस कार्य के लिए हमने पूरे समाज के बीच अलख जगाने का काम किया वही बेटियों के रूप में हमारे परिवार का अंग बनी हुई हैं. उन बेटियों का प्यार, उनकी शरारतें, उनका दुलार, उनका हँसना, उनकी जिद, उनकी पल-पल की गतिविधियाँ हम सबके लिए जीवन का आधार बनी. ऐसी बेटियों को मात्र महिलाओं में कैसे शामिल कर दें?

आखिर किसे दें हम महिला दिवस की शुभकामनायें? क्योंकि सम्पूर्ण समाज की महिलाएं किसी न किसी रूप में किसी की माँ, किसी की बहिन, किसी की दोस्त, किसी की पत्नी, किसी की बेटी है. ऐसे में सभी सुखी रहें, प्रसन्न रहें, बस इतनी कामना है.


08 मार्च 2010

बधाई और शुभकामनायें हमारी तरफ से भी स्वीकारें

पुरुषों से बधाई स्वीकारने में तो कोई पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए?

एक माँ के पुत्र, एक बहिन के भाई, एक पत्नी के पति, एक बेटी के पिता और महिला मित्रों के मित्र और बहुत से उन सम्बन्धों को आपस में जोड़कर-जो स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की पारस्परिकता के सूचक हैं- ऐसे पुरुष की ओर से अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई एवं शुभकामनाएँ।


शुभकामनाएँ, महिलाओं की संसद में भागीदारी को भी स्वीकार्यता मिलने की।

आज और कुछ नहीं सिर्फ बधाई और शुभकामनाएँ।

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चित्र साभार गूगल छवियों से

07 मार्च 2009

सोचिये कुछ इस तरफ़ भी क्योंकि..........

कल है अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस और कार्यक्रमों की औपचारिकता का निर्वहन आज से ही प्रारम्भ हो गया है। जगह-जगह संगोष्ठियों, सभाओं, भाषणों, रैलियों आदि की औपचारिकता निभाई जाने लगी है। सरकारी संगठनों के साथ-साथ उन स्वयंसेवी संगठनों की मजबूरी भी है जो महिला-सशक्तीकरण के लिए कार्य कर रहे हैं कि वे इस दिन पर कार्यक्रम करें, सिर्फ करें ही नहीं अवश्य ही करें।
यदि भाषणों, रैलियों, कार्यक्रमों से ही विकास होना सम्भव होता तो हमारा मानना है कि सबसे अधिक विकास हम भारतवासियों ने ही किया होता। आये दिन की भाषणवाजियों और सभाओं के बाद भी विकास वहीं का वहीं है, नारियों की स्थिति वहीं की वहीं है, कन्या भ्रूण हत्या की स्थिति वहीं की वहीं है, स्त्री-पुरुष लिंगानुपात वहीं का वहीं है।
केवल भाषणों से नारी की स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है, यह चाहे पुरुषों द्वारा किया जा रहा हो या फिर खुद महिलाओं द्वारा। कुछ बिन्दु ऐसे है जिन पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार अवश्य होना चाहिए।

  • वंश-वृद्धि की लालसा में पुत्र प्राप्ति की चाह रखने वाले बतायें कि क्या जवाहरलाल नेहरू का वंश किसी लड़के के कारण चल रहा है?
  • स्वामी विवेकानन्द, शहीद भगत सिंह, रानी लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेक महापुरुषों का नाम किस लड़के के कारण चल रहा है?
  • बेटे की चाह में लड़की को मारने वाले अपने लड़के के विवाह के लिए लड़का कहाँ से लायेंगे?
  • इसी प्रकार से स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कम होता रहा तो आने वाले समय में होने वाली स्त्री हिंसा की भयावहता को कौन रोकेगा?
  • बराबर का दर्जा सिद्ध करती स्त्री आने वाले समय में कम संख्या के कारण अपनी खरीद-बिक्री को कैसे रोक सकेगी? (आज भी कई घटनायें इस तरह की प्रकाश में आईं हैं जहाँ कि परिवारों में पुरुष स्त्रियों को खरीद कर ला रहे है)
  • लड़कियों की लगातार गिरती संख्या से क्या समाज में अनाचार की और विकट स्थिति पैदा होने वाली नहीं है?

सवाल बहुत हैं पर जवाब.......???
जवाब हमें ही देना होगा, मात्र किसी दिवस की औपचारिकता को पूरा करने के लिए ही आवाज उठाना और फिर शान्त हो जाना नैतिक नहीं है। समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे, एकसाथ करने होंगे। पुरुष-स्त्री को आपसी विभेद को दूर करना होगा। क्या आधुनिकता का, ज्ञान का, अहम का रंग अपने ऊपर चढ़ा चुके स्त्री और पुरुष (दोनों को विचारना होगा) इस बात को समझेंगे?