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10 जनवरी 2024

पत्थर होती मानवीय संवेदना

एक स्टार्ट-अप कंपनी की सीईओ ने अपने चार वर्षीय बेटे की हत्या कर दी. हत्या का कारण तलाक प्रक्रिया के दौरान अदालत द्वारा उसके पति को बेटे से मिलने की अनुमति प्रदान किया जाना था. अदालत के इस निर्णय से वह महिला चिढ़ी हुई थी. ये घटना इसी समाज की है जहाँ स्वीकारा जाता है कि पूत तो कपूत हो सकता है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं हो सकती. तलाक की प्रक्रिया जिस पति से चल रही, उससे चिढ़ होना सहज है मगर उसके चलते अपने ही बेटे की हत्या कर देना संवेदनहीनता के साथ-साथ मानसिक असंतुलन का परिचायक है. मामूली सी बात पर अपने ही परिजन की हत्या जैसा जघन्य अपराध समाज के लिए नया नहीं है. 




अभी कुछ दिनों पूर्व खबर आई कि एक महिला ने अपने पति की हत्या महज इस कारण से कर दी क्योंकि उसके पति ने महिला को सोशल मीडिया पर रील बनाने से रोका था. यद्यपि किसी भी रूप में किसी इन्सान की हत्या को स्वीकार्य नहीं माना जाता है तथापि स्वरक्षा हेतु किसी अपराधी की, आतातायी की जान ले भी ली जाये तो उसे कानूनी रूप में, सामाजिक रूप में क्षम्य माना गया है. अब जिस तरह की घटनाओं के चलते हत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं उनमें तो विवाद भी इस तरह का नहीं होता है कि आवेश में, क्रोध में, बदले की भावना में किसी व्यक्ति की जान ले ली गई हो. लिव इन रिलेशन में रहने के बाद मन ऊब जाने के कारण हत्या कर देना रहा हो, प्रेम विवाह के बाद मनमुटाव होने पर सूटकेस में टुकड़े-टुकड़े में मिलना, प्रेमी के साथ मिलकर पति और बच्चों की हत्या, व्यावसायिक लाभ के लालच में पत्नी का सौदा करना, नशा न करने देने पर माता-पिता की हत्या, पिता द्वारा बेटी के साथ बलात्कार करना आदि खबरें प्रतिदिन ही हमारी नज़रों के सामने से गुजरती हैं. बड़ी संख्या में होती इन घटनाओं को किसी बाहरी तत्व द्वारा अंजाम नहीं दिया जा रहा है वरन परिवार के निकट सम्बन्धियों द्वारा ऐसा किया जा रहा है.


इस तरह की घटनाएँ स्पष्ट रूप से मानवीय संवेदनाओं के मृत होने की ओर इशारा करती हैं. तकनीकी, बौद्धिक रूप से समृद्ध होते जा रहे समाज की यह बहुत बड़ी विडम्बना बनती जा रही है कि यहाँ मानवीयता के प्रति नकारात्मकता देखने को मिल रही है. संवेदनाओं के कम होने के कारण, मानवता के प्रति लोगों की सकारात्मकता कम होने से आपसी प्रेम-स्नेह, समन्वय आदि में भी गिरावट आई है. मानवीय संवेदना के चलते ही एक मनुष्य दूसरे से संपर्क रखता है, उसके साथ रिश्तों का निर्वहन करता है. ऐसा होने के कारण ही मनुष्य अपनी व्यक्तिगत सीमा-रेखा से बाहर आकर अपने परिवार के साथ-साथ अपने आस-पड़ोस, अपने क्षेत्र, समाज आदि के प्रति चिंता का भाव रखता है. संवेदना ही मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने में सहायक होती है. संवेदनाओं का लगातार क्षरण होते जाने से मनुष्य क्रूरतम से क्रूरतम कदम उठाने से नहीं डर रहा है.


मानवीय संवेदनों के समाप्त होने के पीछे के कारण मानव ने स्वयं उत्पन्न किये हैं. तीव्रतम गति से किसी भी रूप में सफलता को प्राप्त कर लेने की तृष्णा ने जैसे सोचने-समझने की शक्ति को छीन लिया है. शिक्षित होने के बाद भी समाज से नैतिक शिक्षा का लोप हो चुका है. सोशल मीडिया की स्वतंत्रता ने रिश्तों की गरिमा को तार-तार कर दिया है. इस तरह की प्रवृत्ति ने जहाँ एक तरफ नैतिकता को,मानवीयता को समाप्त किया है वहीं दूसरी तरफ हमारे संस्कारों की, संस्कृति की पाठशाला संयुक्त परिवारों का भी क्षरण किया है. संयुक्त परिवारों के विघटन के बाद जन्मे एकाकी परिवारों ने बच्चों की सामूहिकता समाप्त कर दी है. अब उनका बचपन विशुद्ध रूप से मशीनों के साथ बीतता है. ऐसे में उसके भीतर संस्कारों का, संवेदनाओं का होना एक कल्पना ही है.


संवेदनाओं की लगातार होती कमी के साथ मानव में सहनशक्ति की भी कमी होती जा रही है. इधर देखने में आ रहा है कि विगत कुछ समय से इस तरह की जघन्य वारदातों, अपराधों के पीछे बहुत छोटी सी बात, मामूली सी घटना ही कारण हुआ करती है. पारिवारिक सदस्यों को किसी काम को करने से रोकना, उनको अनुशासन में रहना सिखाना, अनुपयोगी कार्यों को न करने की सलाह देना आदि ऐसे कारण बनते हैं. देखा जाये तो एक व्यक्ति के जीवन में बचपन से लेकर अंतिम अवस्था तक कदम-कदम पर घर-परिवार में, विद्यालय में, कार्यक्षेत्र में, समाज में एक तरह का प्रतिस्पर्द्धा का माहौल बना रहता है. उसे न केवल समाज में, अपने कार्यक्षेत्र में बल्कि परिवार तक में आपसी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है. ऐसा करने के लिए उसे प्रेरित भी किया जाता है, कभी-कभी उसे हतोत्साहित करके भी आपसी प्रतिस्पर्द्धा में शामिल कर दिया जाता है. प्रतिस्पर्द्धा के इस तरह के बनावटी माहौल में ऐसा इन्सान अपने-पराये का, अच्छे-बुरे का, संयम-आवेश का अंतर भुला बैठता है, सहनशीलता को विस्मृत कर देता है. उसके लिए किसी भी रूप में सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत विजय ही मायने रखती है.


सहानुभूति, संवेदना, दुःख, मानवीयता आदि रहित इन्सान जब समाज में अपना अस्तित्व बनाता जा रहा है तो आये दिन इस प्रकार की शर्मसार करने वाली घटनाएँ घटित होना स्वाभाविक है. आज नैतिक मूल्यों का ह्रास और आडम्बर के द्वारा खुद को उच्च स्तर पर दिखाना जीवन बन गया है. पति-पत्नी का साथ-साथ रहना मुश्किल हो गया है, माता-पिता और संतानों में कटुतापूर्ण रिश्ते बने हुए हैं, रक्त-सम्बन्धी ही एक-दूसरे के खून के प्यासे हों तो उस वातावरण में मानवीय मूल्यों का जीवंत बने रहना दुष्कर ही है. 





 

24 अक्टूबर 2020

06 अप्रैल 2020

नमन आपके चरणों में

रिश्तों के निर्वहन के लिए रक्त-सम्बन्धी होना अनिवार्य या आवश्यक नहीं. ये विशुद्ध भावनात्मक पहलू है और इसी के चलते रिश्तों में गरिमा, उष्णता बनी रहती है. रिश्ते एक तरफ भावनात्मक मजबूती प्रदान करते हैं तो दूसरी तरफ भावनात्मक रूप से कमजोर भी करते हैं. यह कमजोरी उस समय प्रमुखता से सामने आती है जबकि हम अपने किसी रिश्ते के समाप्त होने के, उसके ख़त्म होने के दौर से गुजर रहे होते हैं. यह कमजोरी ही दुःख, करुणा, आँसू को जन्म देती है.



ऐसे ही दुःख, आँसूओं से सामना आज करना पड़ा. हमारा जुड़ाव भावनात्मक रूप से परिवार के ही अंग स्वरूप कई परिवारों के साथ है, जहाँ से पारिवारिक सदस्य की भांति ही पहचान मिलती है. इसमें अचानक से उस समय आघात लगा जबकि मित्र स्वरूप छोटे भाई सुभाष का फोन आया. आवाज की कम्पन आभास करवा रही थी कि खबर दुखद ही है. हुआ भी वही. खबर मिली माता जी के हम सबको छोड़कर चले जाने की. खबर तो दुखद तो थी ही साथ ही एक तरह की क्षति की तरफ भी इशारा कर रही थी.

जो क्षति हो चुकी थी, उसकी भरपाई किसी भी रूप में नहीं की जा सकती थी. प्रकृति के, परमशक्ति के इस कदम को, निर्णय को भारी मन से स्वीकारना ही था. स्वीकारना ही था कि माँ रूप में जिनका स्नेह, आशीर्वाद सदैव मिलता रहा, उनसे मिलना अब नहीं हो सकेगा. उनको देख पाना भी अब संभव नहीं.

उनके चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि.


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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

02 अगस्त 2018

स्तनपान के लिए भी जागरूकता कार्यक्रम


पता नहीं मानव समाज विकास के किस रास्ते पर है जहाँ मूल कार्यों को करने के लिए भी सरकारों को, सामाजिक संगठनों को आगे आना पड़ता है. कभी स्वच्छता के नाम पर, कभी खुले में शौच न जाने के सम्बन्ध में, कभी शिक्षा के नाम पर, कभी स्तनपान करवाने के नाम पर. आपको शायद आश्चर्य लगे किन्तु यह सत्य है कि विगत कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्तनपान करवाने को लेकर जागरूकता कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. इसी कड़ी में अगस्त माह का प्रथम सप्ताह विश्व स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है. इसे विद्रूपता ही कहा जायेगा कि अब माएं अपने नवजात शिशुओं को स्तनपान करवाने से बच रही हैं. इनके पीछे क्या कारण हैं, ये हर बिंदु के हिसाब से अलग-अलग है.


इस सप्ताह के दौरान माँ के दूध के महत्त्व की जानकारी दी जाती है. माताओं को, समाज को बताया जाता है कि नवजात शिशुओं के लिए माँ का दूध अमृत के समान है. माँ का दूध शिशुओं को कुपोषण व अतिसार जैसी बीमारियों से बचाता है. शिशुओं को जन्म से छ: माह तक केवल माँ का दूध पिलाने के लिए महिलाओं को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाता है. स्‍तनपान शिशु के जन्‍म के पश्‍चात एक स्‍वाभाविक क्रिया है. इसके बारे में सही ज्ञान की जानकारी न होने से बच्‍चों में कुपोषण एवं संक्रमण से दस्‍त शुरू हो जाते हैं. माँ के दूध में ज़रूरी पोषक तत्व, हार्मोन, प्रतिरोधक तत्त्व, आक्सीडेंट आदि होते हैं जो नवजात शिशु के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माने जाने हैं. माँ का प्रथम दूध, जिसे कोलोस्‍ट्रम कहते हैं वह गाढ़ा, पीला होता है और यह शिशु जन्‍म से लेकर अगले चार-पाँच दिनों तक उत्‍पन्‍न होता है. इसमें विटामिन, एन्‍टीबॉडी, अन्‍य पोषक तत्‍व अधिक मात्रा में होते हैं, जो नवजात शिशु को संक्रमणों से बचाता है, प्रतिरक्षण करता है.

ऐसा नहीं है कि वैश्विक स्तर पर किसी प्रोजेक्ट के अंतर्गत अथवा किसी सरकारी योजना के नाते नवजात शिशुओं को स्तनपान करवाने के लिए आज जोर दिया जा रहा है. इधर लगातार देखने में आ रहा है कि कामकाजी महिलायें, स्तनपान करवाने की समस्याएँ, शारीरिक सौन्दर्य बनाये रखने की चाह में स्तनपान न करवाने की मंशा, जीरो फिगर जैसी कथित अवधारणा का पोषण करने के कारण कम भोजन, पौष्टिक भोजन की कमी के चलते माताओं के स्तनों में कम दूध का आना अथवा न आना, स्तनपान करवाने की सही स्थिति की जानकारी न होने से असुविधा महसूस करना आदि ऐसी समस्याएं हैं, जिनके कारण स्तनपान को बढ़ावा देने की, इसके प्रति जागरूकता लाने की बात की जा रही है. असल में ये सारी समस्याएं कहीं न कहीं मानवजन्य हैं मगर यदि गहराई से देखा जाये तो स्तनपान के अनेक फ़ायदे हैं. नवजात शिशु के लिए माँ के दूध से बेहतर और कोई भी दूध नहीं होता है. माँ का दूध सुपाच्य होता है जो नवजात शिशु को पेट सम्बन्धी परेशानियों से बचाता है. स्तनपान से शिशु की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है, इसका कारण माता के दूध में तमाम सारे पौष्टिक तत्त्वों का समावेश होना है. स्तनपान कराने वाली माँ और उस शिशु के बीच एक तरह की भावनात्मकता का विकास होता है, इससे शिशु की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है. नवजात शिशुओं के साथ-साथ माताओं को भी स्तनपान से लाभ होता है. ऐसी माताएं स्तन कैंसर अथवा गर्भाशय के कैंसर के खतरे में कम आती हैं. वैज्ञानिक शोधों के आधार पर कहा गया है कि माँ के दूध में पाए जाने वाले तत्त्व डी०एच०ए० (DHA) तथा  ए०ए० (AA) मस्तिष्क की कोशिकाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

स्तनपान के अनेक फायदे बताते हुए इस सप्ताह में सभी को जागरूक किया जाता है. इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति समाज के लिए क्या होगी कि एक तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्तनपान करवाए जाने का अभियान चलाया जाता है वहीं दूसरी तरफ पत्रिका के मुखपृष्ठ पर स्तनपान करवाती तस्वीर के साथ सार्वजनिक स्थानों पर स्तनपान करवाए जाने का अभियान महिलाओं द्वारा छेड़ा जाता है. फ़िलहाल वैज्ञानिक रूप से, चिकित्सकीय रूप से यह साबित हो चुका है कि नवजात शिशु के लिए माँ का दूध अत्यंत लाभकारी है. ऐसे में भावी पीढ़ी के विकास के लिए इस तरफ भी समाज को, युवाओं को, नवदंपत्ति को जागरूक होने की आवश्यकता है.

09 मार्च 2018

हमारी नजर में ये सिर्फ महिलायें नहीं


कल और आज महिला दिवस को लेकर कई कार्यक्रमों में सहभागिता रही. बिना किसी अपनी सहभागिता के बस उपस्थिति ही बनाये रखी. इसके पीछे कारण उन कार्यक्रमों का बजाय सामाजिक होने के प्रशासनिक हो जाना रहा. प्रशासनिक कार्यक्रमों का एक तरीके का आयोजन रहता है. उनका जो मुखिया हो उसकी चापलूसी करते रहो, उसके बारे में गुणगान करते रहो. इसके बदले में मिलता ये है कि जो आयोजन करता है उसके साथ के कुछ लोगों को सम्मानित कर दिया जाता है. कुछ विशेष लोगों संग सेल्फी निकलवा ली जाती है. उन्हीं लोगों के बारे में कह-सुन लिया जाता है. उन्हीं लोगों को मंच पर बोलने बुला लिया जाता है. बहरहाल, प्रशासन के अलावा भी अन्य कई जगहों पर अपनी सक्रिय सहभागिता की. आत्मिक रूप से इसलिए प्रसन्नता हुई क्योंकि ऐसे लोग संसाधनों से विहीन हैं मगर कुछ करने की इच्छा रखते हैं. हमारे साथ भी कुछ ऐसा था. वर्ष 1997-98 में जब हमने कन्या भ्रूण हत्या निवारण कार्यक्रम जिले में शुरू किया था तो जिला प्रशासन के पास भी इससे सम्बंधित कोई सामग्री नहीं थी. चिकित्साधिकारी भी इससे शून्य थे. ऐसे में हमने अपने कुछ मित्रों संग अँधेरे में तीर मारना शुरू किया. इधर-उधर से सामग्री जुटाई और लोगों को बेटियों के बारे माँ जागरूक करना शुरू किया. तब हमारे पास भी संसाधन नहीं थे. हमने भी उसी समय परास्नातक परीक्षा पास की थी. बेरोजगार होने का बिल्ला माथे पर चिपकाये समाजसेवा में निकल पड़े थे. बेटियों को बचाने निकल पड़े थे. इसीलिए आज भी जब कोई ऐसा व्यक्ति जो संसाधन-रहित होता है बेटियों के बारे में कोई भी कार्यक्रम करता है, करना चाहता है, हम उसे पूरा सहयोग करते हैं.


इन जमीनी कार्यक्रमों के अलावा सोशल मीडिया पर भी कार्यक्रम चल रहे हैं. इधर-उधर से कॉपी-पेस्ट की हुई फोटो, विचारों आदि को दे दनादन इधर से उधर भेजा जा रहा है. इसी भेजा-भिजाई में सब अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ले रहे हैं. सामाजिक कार्यों से जिनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, वे सम्मानित हो रहे हैं. उनकी पोस्ट पर हजारों-हजार की संख्या में लाइक, कमेन्ट मिल रहे हैं. जिनका जमीनी काम है वे संसाधनों से रहित होने के कारण कहीं कोने में कार्यक्रम करने में लगे हैं. बहरहाल, इस बीच कई-कई लोगों ने हमसे कहा कि आज भी आपने कुछ नहीं लिखा. (इधर लोगों की मानसिकता बदलने की नीयत से विगत एक माह से अधिक समय से हम सोशल मीडिया या कहें कि फेसबुक से गायब हैं) सही भी है आज हमने कुछ लिखा भी नहीं, महिला दिवस पर. आखिर समझ ही नहीं आया कि क्या लिखना? महिलाओं का झंडा उठाये लोगों को मानना नहीं है कि उनके विकास में पुरुषों का योगदान महिलाओं से ज्यादा है. जिन लोगों ने स्त्री-विमर्श का इतिहास पढ़ रखा होगा उनको भली-भांति पता होगा कि वैश्विक स्तर पर स्त्री-सशक्तिकरण सम्बन्धी घटित चार बड़ी घटनाओं में से तीन का आरम्भ पुरुषों द्वारा किया गया. आज स्थिति ये है कि स्त्री को सफलता मिलती है तो वह उसके अपने निजी प्रयास से और असफलता मिलती है तो पुरुष द्वारा अवरोध पैदा करने के कारण.

आज जिस तरह से विभेद को समाप्त करने के लिए विभेद की नीति अपनाई जा रही है वह समाज में स्त्री और पुरुष के बीच खाई पैदा ही नहीं करेगी वरन और बढ़ाएगी. बहरहाल, आज हमने इसलिए कुछ नहीं लिखा क्योंकि समझ नहीं आया कि किसके लिए लिखें? क्या उन अईया या नानी के लिए बधाई सन्देश लिखें जिन्होंने हमारे इस धरती में आने का आधार रचा? उनके द्वारा जन्मी संतति ही हमारे जन्म का आधार बनी. वे दोनों लोग उस स्थिति तक पूज्य हैं, जो स्थिति भगवान से भी ऊपर है हमारे लिए. भगवान को क्या शुभकामना, क्या बधाई. इसके बाद क्या माँ को बधाई दें? उस माँ को जो हमारी नज़रों में मात्र महिला नहीं बल्कि किसी देवी से कम नहीं. पिता के साथ उसके साहचर्य का परिणाम है कि हम इस दुनिया में हैं. इसलिए उस देवी को मात्र महिला कैसे मान लिया जाये? उस माँ के अलावा यदि किसी ने आत्मीयता से अपने गले लगाया है तो वो है हमारी बहिन. उस बहिन ने हमें सिखाया कि कैसे दुनिया की बाकी महिलाओं का सम्मान किया जा सकता है, उसकी राखी की कैसे रक्षा की जा सकती है. कैसे वह बहिन मित्र भी बन जाती है, माँ भी बन जाती है, हमराज़ भी बन जाती है. उस बहिन को मात्र महिला कैसे समझ लें, जिसने महिलाओं के विविध आयामों को समझाया? इसके बाद जीवन में आई महिला मित्र. ऐसी दोस्तों को कैसे सिर्फ महिला मान लें. उन्होंने हमारे प्रति समाज के विश्वास को सशक्त किया कि अकेले में भी हमारे साथ वे सुरक्षित हैं. ऐसी दोस्तों को कैसे सिर्फ महिलाओं के खांचे में खड़ा कर दें, जो अपने अस्तित्व से ज्यादा हमारे अस्तित्व को स्वीकारने में सक्रिय हों.


इसके अलावा जिस महिला के साथ अग्नि के सामने सात फेरे लिए, जो इन्सान अपना सबकुछ छोड़कर हमारे साथ न केवल जीवन को आगे बढ़ाने आया हो वरन हमारे परिवार का सदस्य बनकर आया हो. जिस इन्सान ने पत्नी के रूप में न केवल हमारे अस्तित्व को स्वीकार किया बल्कि हमारे अस्तित्व को अपना अस्तित्व बनाया. इसके बाद भी अपने व्यक्तित्व का विकास करने के साथ-साथ हमारे विकास में भी सहायक बनी, उसे मात्र महिला कैसे मान लें? इन सबके अलावा हमारी बेटियों ने भी हमारे गौरव को आगे बढ़ाया है. जिस कार्य के लिए हमने पूरे समाज के बीच अलख जगाने का काम किया वही बेटियों के रूप में हमारे परिवार का अंग बनी हुई हैं. उन बेटियों का प्यार, उनकी शरारतें, उनका दुलार, उनका हँसना, उनकी जिद, उनकी पल-पल की गतिविधियाँ हम सबके लिए जीवन का आधार बनी. ऐसी बेटियों को मात्र महिलाओं में कैसे शामिल कर दें?

आखिर किसे दें हम महिला दिवस की शुभकामनायें? क्योंकि सम्पूर्ण समाज की महिलाएं किसी न किसी रूप में किसी की माँ, किसी की बहिन, किसी की दोस्त, किसी की पत्नी, किसी की बेटी है. ऐसे में सभी सुखी रहें, प्रसन्न रहें, बस इतनी कामना है.


05 मार्च 2018

सार्वजनिक स्तनपान : मातृत्व या विज्ञापन


ऐसा माना जाता रहा है कि पढ़-लिख कर व्यक्ति विमर्श करने की क्षमता का विकास कर लेता है. वह तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर तर्कशील बन जाता है. ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आये हैं जबकि ऐसा हुआ भी है. शिक्षित व्यक्तियों ने अपने ज्ञान के आधार पर तर्कों पर तमाम निष्कर्षों को कसा है. इधर तकनीकी विकास के साथ साक्षर होती पीढ़ी ने, तकनीकी का सहारा लेकर कुछ कर-गुजरने वाली मानसिकता ने शिक्षित होने, साक्षर होने के बाद तर्क-वितर्क को कुतर्क के रास्ते पर उतार दिया है. इस तर्क-वितर्क में बहुधा महिलाओं से सम्बंधित मुद्दे, महिलाओं से सम्बंधित विषय ज्यादा सामने आने लगे हैं. इन विषयों पर, मामलों पर कुतर्क जैसी स्थितियाँ न केवल पुरुषों द्वारा बल्कि स्त्रियों द्वारा भी अपनाई जा रही हैं.

विगत कुछ समय से स्त्री-विषयक बहसें लगातार सामने आ रही हैं. समझ से परे है कि ये स्त्रियों को स्वतंत्रता का अधिकार का ज्ञान कराने के लिए हो रहा है या फिर उनकी स्वतंत्रता की आड़ में बाजार को सशक्त किया जा रहा है? कुछ दिनों पहले हैप्पी टू ब्लीड जैसा आन्दोलन चला. जिसके द्वारा महिलाओं की माहवारी को केंद्र में रखा गया. कुछ अतिजागरूक महिलाओं ने खुद को इस आन्दोलन में सूत्रधार की तरह से आगे धकेलते हुए माहवारी के दाग के साथ खुद को प्रदर्शित किया. इस हैप्पीनेस को पाने के बाद इन्हीं आन्दोलनरत महिलाओं ने सेनेटरी पैड के मुद्दे को हवा देने का काम किया. इस बार इनका मुद्दा सस्ते पैड नहीं वरन इन पैड के विज्ञापनों में दिखाए जा रहे नीले रंग को लेकर था. आखिर जब खून लाल रंग का होता है तो फिर पैड के विज्ञापन में नीला रंग क्यों? वाकई स्त्री-सशक्तिकरण के नाम पर धब्बा था ये नीला रंग. आखिर लाल को नीले से परिवर्तित करके पुरुष महिलाओं को रंगों के अधीन भी लाना चाहता होगा.


अब एक नई बहस छिड़ी हुई है स्तनपान को लेकर. एक पत्रिका के कवर पर स्तनपान कराती मॉडल का चित्र बहुतों के लिए अशोभनीय रहा, बहुतों के लिए मातृत्व का परिचायक. इस मॉडल के मातृत्व के पक्ष में बहुतों ने न केवल हिन्दू धार्मिक उदाहरणों को सामने रखा वरन विदेशी संसद की कुछ महिलाओं के उदाहरण भी दिए. इस तरह की चर्चा लगभग दो-तीन साल पहले उस समय भी छिड़ी थी जबकि कुछ मॉडल्स ने नग्न, अर्धनग्न रूप में स्तनपान कराते हुए फोटोसेशन करवाया था. बहरहाल, स्तनपान किसी भी महिला के जीवन का सुखद क्षण होता है, सुखद अनुभूति होती है. स्तनपान के द्वारा वह न केवल अपने शिशु को भोजन दे रही होती है वरन उस शिशु के साथ गहरा तादाम्य स्थापित कर रही होती है. उन पावन क्षणों को जिन महिलाओं और पुरुषों ने पावनता के रूप में देखने की कोशिश की होगी उनको इसका अनुभव होगा कि उस क्षण जहाँ शिशु के हाथ-पैर माता के स्तन से खेल रेक होते हैं वहीं माता के हाथ उसके सिर पर आशीष-रूप बने रहते हैं. इस दौरान उन माताओं के हावभाव कम से कम इस पत्रिका की मॉडल जैसी भाव-भंगिमा जैसे नहीं होते हैं. उनके चेहरे की आत्मीयता, संतुष्टि का भाव इसके चेहरे जैसा कामुक नहीं होता है.

ऑस्ट्रेलियाई संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी बेटी को स्तनपान कराकर इतिहास रचने वाली सीनेटर लैरिसा वा‌र्ट्स
असल में बाजार ने महिलाओं को आधुनिकता के नाम पर उत्पाद बनाकर रख दिया है. स्त्री-सशक्तिकरण से जुडी महिलाएं, अपने आपको मंचों के सहारे महिलाओं की अगुआ बताने वाली महिलाएं ऐसे किसी भी मामले के लिए पुरुष को दोषी ठहराएँ मगर सत्य यही है कि आज महिलाएं स्वतः बाजार के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है. न केवल महिलाओं से जुड़े उत्पादों में वरन पुरुषों से जुड़े उत्पादों में भी स्त्री-देह निखर कर सामने आ रही है. विज्ञापनों में महिलाओं को विशुद्ध कामुकता की पुतली बनाकर पेश करने की होड़ लगी हुई है. वर्तमान में उठा स्तनपान का ये मुद्दा विशुद्ध बाजारीकरण की देन है. इन्हें न माता से मतलब है, न शिशु से मतलब है और न ही स्तनपान से. बाजार के लिए बस अपने उत्पादों का विक्रय अनिवार्य है. किसी न किसी कीमत पर उनको बेचना उनकी प्राथमिकता है. अब इसके लिए चाहे हैप्पी टू ब्लीड के दाग हों, चाहे पैड का नीला-लाल रंग हो, कंडोम की कामुकता हो, अगरबत्ती में छिपी मादकता हो, ब्रा-पैंटी का उभार हो या फिर स्तनपान के द्वारा स्त्री-देह का प्रदर्शन हो. मातृत्व की आड़ में सामने लाये गए, बहस का विषय बनाये गए स्तनपान के बाद देखिये बाजार किस-किस गोपन को अगोपन बनाकर सामने लाता है?

09 नवंबर 2009

माँ की बात मानते लड़कों को पसंद नहीं करतीं हैं लड़कियां???

कल रात पढ़ने के लिए बैठे तो कमरे में टी0वी0 पर आधुनिक भारत का विवाह सम्बन्धी कार्यक्रम या कहें कि भारत का आधुनिक विवाह सम्बन्धी कार्यक्रम देखा जा रहा था। कार्यक्रम के माध्यम से परफेक्ट ब्राइड को चुना जाना है। पढ़ने से ज्यादा लिखना हो रहा था इस कारण टी0वी0 के शोर से किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं हो रही थी।

बाधा हमने स्वयं ही उत्पन्न की जब दिमाग ने लिखने वाली सामग्री से ध्यान हटाकर आधुनिक भारत के आधुनिक विवाहों के ऊपर लगाया। समाजशास्त्र के अध्ययन में विवाह के प्रकार पढ़ रखे थे। (इस बारे में बाद में) हमारे दिमाग ने कहा कि अब तो समाजशास्त्रीय परिभाषाओं से अलग हटकर भी विवाह हो रहे हैं, इन्हें क्या नाम दिया जायेगा?

दिमाग ने अलग विवाह के चलन का संकेत भेजा और हमने तुरन्त अपनी मेहनत करने के स्थान पर दिमाग को ही काम सौंपा ऐसे विवाहों के बारे में पता लगाने का। तुरन्त जवाब मिला, एक विवाह (अभी हुआ नहीं है) स्वयंवर के माध्यम से हुआ राखी सावंत का। दूसरा होने जा रहा था, पता नहीं हुआ कि नहीं, राहुल महाजन का। इन दो के कार्यक्रम को तो स्वयंवर की श्रेणी में रखा जा सकता है किन्तु कल रात जिस वैवाहिक कार्यक्रम को सुना (देख नहीं रहे थे) उसे समझ नहीं आया कि वाकई क्या नाम दिया जाये?

कुछ लड़कियाँ, कुछ लड़के, लड़कियों-लड़कों की मम्मियाँ और खेल शुरू, शादी-शादी। सवाल ये नहीं कि क्या कार्यक्रम है, क्या होना चाहिए, क्या विवाह है, कैसा होना चाहिए आदि-आदि। माथा तो तब ठनका जब कान में एक वाक्य घुसा कि फलां लड़के को (नाम याद नहीं) इस कारण कोई लड़की नहीं मिल सकी क्योंकि वो हर बात में अपनी माँ को महत्व देता है।

अब माथा ठनका तो पलटकर भी देखा (अबकी कार्यक्रम थोड़ा सा देखा) रिश्तों के पारखी भी बैठे थे (अरे भाई! कार्यक्रम विचित्र है तो जजों को जज कैसे कह दें, नाम भी विचित्र देंगे) उनमें से एक मलायका अरोरा थीं बोलीं कि आज की लड़कियों को बहुत ही अटपटा लगता है जब कोई लड़का उससे ज्यादा माँ को महत्व देता दिखता है। (हो सकता है कि शब्दों में कोई हेरफेर हो किन्तु भाव यही थे, क्षमा करेंगीं मलायका जी)

लगा कि ये कार्यक्रम भारत का आधुनिक विवाह नहीं है बल्कि वाकई आधुनिक भारत का विवाह कार्यक्रम है। जिस समाज में माँ से अधिक महत्व उस लड़की को दिया जाये जो अभी पत्नी भी नहीं बनी है या फिर ऐसी लड़की जो अभी पत्नी भी नहीं बनी है और माँ के नाम से ही अटपटा महसूस करती हो, उस समाज को आधुनिक के स्थान पर और क्या कहा जायेगा?

एक घटना तुरन्त याद आई उसे कह कर अपनी बात समाप्त करते हैं क्योंकि कितना भी समझाइये होगा वही ढाक के तीन पात।

घटना ये है कि महाविद्यालय के विद्यार्थियों के एक कार्यक्रम में दो साल पहले जाना हुआ। वहाँ एक प्रोफेसर साहब ने उनसे सवाल किया कि एक नाव में आप, आपकी माता और आपकी पत्नी जा रहे हों। नाव में किसी तरह से पानी भरने लगता है और किसी एक को नाव से उतार देने पर नाव डूबने से बच जायेगी तो आप किसे नाव से कूदने को कहेंगे?

इस पर कई जवाब मिले किन्तु एक जवाब ने चैंकाया कि हम भारत में ही रह रहे या कहीं और, जवाब था कि माता को क्योंकि माता अब बूढ़ी हो गईं हैं कितने साल जिन्दा रहेंगीं।


वाकई हम इक्कीसवीं सदी में आ गये हैं जहाँ माँ नाम के इन्सान को अब आउटडेटेड समझ कर हाशिये पर खड़ा किया जा रहा है। भला हो ऐसे समाज का, ऐसे नवजवानों का, ऐसी सोच का।

10 मई 2009

माँ का सम्मान भी व्यावसायिक बन गया

10 मई, ‘मदर्स डे’ मना लिया गया, माँ को याद कर लिया गया। इस पोस्ट के लिखने के बारे में उस दिन से ही विचार करना शुरू कर दिया था जिस दिन से समाचार-पत्रों में, टी0वी0 में इस दिन के लिए विज्ञापन दिखा। माँ एक अक्षर होने के बाद भी अपने आप में सम्पूर्णता लिए होता है। हिन्दी भाषा के अनुसार किसी भी रचना में वर्ण का महत्व होता है। एक वर्ण अपने आप में पूर्णता नहीं लिए होता है। दो या दो से अधिक वर्णों के योग से एक शब्द का निर्माण होता है; दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से एक वाक्य की रचना होती है; दो या दो से अधिक वाक्यों के मेल से एक अनुच्छेद बनता है और इसी तरह एक पूरी रचना निर्मित हो जाती है।
इसके ठीक उलट माँ एक वर्ण होने के बाद भी सम्पूर्ण है। आज मदर्स डे से सम्बन्धित मैसेज देखकर (मोबाइल और ई-मेल पर) देखकर लगा कि माँ जैसा पावन रिश्ता भी आज व्यावसायिकता में रंग दिया गया है। हो सकता है कि बहुत से लोग हमारे विचारों से सहमत न हों (वैसे भी ऐसे लोगों का कोई इलाज नहीं) पर हमारा मानना है कि माँ के लिए सम्मान व्यक्त करने के लिए एक दिन विशेष का होना उसकी महत्ता को ही कम करता है।
बहुत से लोगों का मानना है कि कम से कम इस एक दिन के बहाने ही हम माँ के प्रति अपने मनोभावों को व्यक्त कर लेते हैं (ऐसा आज हमने कई लोगों से पूछ कर देखा और पता किया) क्या वाकई आज माँ के प्रति आदर सम्मान व्यक्त करने के लिए किसी दिन की जरूरत है?
देखा जाये तो इस प्रकार की संस्कृति का विकास विदेशी सभ्यता के कारण ही हममें विकसित हुआ। विदेशों में हमें इस बात की कतई जानकारी नहीं कि वहाँ इस प्रकार के रिश्तों की आपस में क्या अहमियत है (बाबा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी, भाई-भाभी, बहिन-बहनोई , माँ-पिता, पत्नी, अन्य रिश्ते) सम्भव है कि वहाँ की भागदौड़ भरी जिन्दगी में माँ के लिए भी समय न निकल पाता हो और इस तरह के एक दिन की अवधारणा का विकास हो गया हो?
हम यदि अपने देश की बात करें तो माँ का रिश्ता इस प्रकार का रिश्ता है जिसे किसी भी प्रकार से परिभाषित नहीं किया जा सकता है। कोई व्यक्ति अपने मन में रिश्तों के जितने भी रूप तय कर ले सभी को वह माँ में समाहित देख सकता है। एक व्यक्ति रिश्तों की गरिमा के जितने स्वरूप निर्धारित करले वह सब माँ के द्वारा देख सकता है। माँ के लिए दो-चार शब्द लिख देना, कविता लिख देना अवश्य ही उसके प्रति हम कुछ समर्पण जैसा ही भाव रखते हैं पर क्या उसे भी एक दिन में ही बाँधा जाये?
आज जब सभी प्रकार से रिश्तों की गरिमा नष्ट हो रही है, आपस में मधुरता समाप्त हो रही है, रिश्तों के नाम पर संशय के बादल घिरे रहते हैं इस विषम स्थिति में भी माँ अपने आँचल की छाँव में मन को शीतलता देती है। प्रातःकाल उठकर ही माँ को याद कर लेना उसके प्रति सम्मान व्यक्त करना है। माँ कोई गिफ्ट नहीं चाहती, माँ कोई औपचारिकता नहीं चाहती, माँ कोई समारोह नहीं चाहती, माँ अपने लिए कोई दिन विशेष नहीं चाहती....बस माँ के लिए आदर, उसके लिए सम्मान ही उसका समारोह है, उसका गिफ्ट है।
(जो नारी-समर्थक इस दिन को एक दिन नारी के सम्मान के रूप में परिभाषित करना चाहते हैं उनसे हाथ जोड़ कर निवेदन है कि कम से कम माँ को केवल नारी जैसे दो शब्दों में न बदलें, माँ सिर्फ माँ है; वह जननी है; पूज्या है; पावन है। उसे तर्क-वितर्क, विमर्श की घालमेल से दूर ही रखो)

04 अप्रैल 2009

माँ को समर्पित एक कविता - "माँ तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो"

माँ को समर्पित कुछ पंक्तियाँ। संसार की हर माँ ऎसी ही होती है।
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आसमान की तेज धूप में,
शीतल छाया सी लगती हो।
मन के अँधियारे में,
धवल चाँदनी सी सजती हो।
दुःखों में नहीं तन्हा रहा,
विश्वास की ढाल बनती हो।
सफलता मिली जब भी कभी,
सिर पर ताज सा चमकती हो।
दूर रहे जब भी तुमसे,
धड़कन बनकर धड़कती हो।
क्या अस्तित्व है तुम्हारे बिना?
माँ, तुम ही मेरी जिन्दगी हो।

चुनावी चकल्लस-

वे अब बहुत ही कायदे से मिलते हैं,
हर मुलाकात में फायदा ही देखते हैं।
फिर लाये हैं भर कर वादों की टोकरी,
मांगो या न मांगो बिना भाव तौलते हैं।
शामो-सहर जब आयें जोड़ कर हाथ,
समझो कि सिर पर चुनाव डोलते हैं।