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15 अगस्त 2020

कार्य की सराहना हो तो प्रसन्नता होती है

स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पूर्व मीडिया से सम्बंधित मित्र का फोन आया. उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम सम्बन्धी कुछ जानकारियाँ प्राप्त कीं उसी के साथ-साथ इस अधिनियम को लेकर चल रहे हमारे कार्यों के बारे में भी जानकारी ली. चूँकि वे पहले से परिचित हैं इसलिए जानकारी देने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं हुई. थोड़ी सी बातचीत के बाद उन्होंने इस सन्दर्भ में अवगत कराया. आज सुबह समाचार पत्र में सूचना का अधिकारी अधिनियम से सम्बंधित अपने कार्यों का प्रकाशन देखा तो ख़ुशी हुई. कार्य की सराहना हो तो वाकई प्रसन्नता होती है और वह प्रसन्नता उस समय और बढ़ जाती है जबकि आप वास्तविक रूप में कार्य कर रहे हों.



सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के बारे में जानकारी उस समय हुई थी जबकि हम एक ट्रेन दुर्घटना के चलते गम्भीर रूप से घायल होकर घर में ही कैद रह गए थे. किसी भी तरह की सामाजिक गतिविधि संचालित नहीं हो रही थी. उसी समय इस अधिनियम के बारे में जानकारी मिलने पर उसके बारे में अध्ययन किया. कुछ आरम्भिक सूचनाएँ महज अनुभव लेने के लिए प्राप्त की गईं. अनुभवों ने निराश नहीं किया. लगा कि इस अधिनियम के द्वारा बहुत से लोगों की सहायता की जा सकती है. इसके द्वारा आम आदमी को वह शक्ति मिल गई थी जिसके द्वारा वह महज गोपनीयता कानून का नाम लेकर किसी भी सूचना पर से पर्दा उठा सकता था. वर्ष 2006 तो इसके अध्ययन और कुछ छुटपुट सूचनाओं को प्राप्त करने में गुजरा. इसके बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे अनुभव बढ़ता गया, लोगों का जुड़ना भी होता रहा.

इसी सबके बीच एक घटना ऐसी घटी जिसने इसके व्यापक दृष्टिकोण की तरफ ध्यान खींचा. स्थानीय प्रशासन से सम्बंधित एक सूचना की प्राप्ति के रूप में दवाब बनाया जाने लगा. एक कार्यक्रम के दौरान ऐसी शिकायत, समस्या अनेक मित्रों ने व्यक्त की. बस फिर क्या था, सभी मित्रों ने मिलकर एक आरटीआई फोरम का गठन कर डाला. इसके द्वारा न केवल सूचनाओं को प्राप्त करने का प्रयास किया गया बल्कि स्थानीय प्रशासन के अनावश्यक दवाब से बचाने का काम भी किया गया. इसी के साथ-साथ लोगों को जागरूक करने का काम भी किया गया. सूचना अधिकार अधिनियम के द्वारा बैंक, रेलवे, शिक्षा विभाग, समाज कल्याण विभाग, नगर पालिका, स्वास्थ्य विभाग, विद्युत् विभाग आदि सहित अनेकानेक विभागों से सूचनाओं की न केवल प्राप्ति की गई वरन उनका लाभ भी उचित व्यक्तियों को दिलवाया गया.

आरटीआई एक ताकत है जिसके द्वारा आम आदमी सूचनाओं को छिपा जाने की मानसिकता से लड़ सकता है. अपने अधिकारों, दायित्वों के लिए सजग हो सकता है. ये भी सच है कि इस अधिनियम का बहुतायत लोगों द्वारा दुरुपयोग भी किया जाने लगा है मगर अभी वह स्तर बहुत कम है. अभी तो इस ताकत का प्रयोग आम नागरिक अपनी सूचनाओं को प्राप्त करने में कर रहा है और उसका लाभ ले रहा है. बहुत से मामलों में सरकारों ने इसे अपने गले की हड्डी समझा है और इस अधिनियम में अपने अनुरूप परिवर्तन करने का प्रयास भी किया है. कई जगह कुछेक परिवर्तन किये भी गए हैं मगर अभी भी अधिनियम को कमजोर नहीं किया जा सका है. आरटीआई कार्यकर्ताओं को यहाँ स्मरण रखना होगा कि एक तरफ वे सूचनाओं को प्राप्त कर भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलने का काम कर रहे हैं तो दूसरी तरफ वे उनको भी सामने लाने का काम करें जो इसका दुरुपयोग कर रहे हैं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

21 जनवरी 2016

सार्थक और सकारात्मक ढंग से हो सूचना का अधिकार का उपयोग

          आज़ादी के छह दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी बहुतायत देशवासियों में अभी भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सार्थकतापूर्ण पालन करने की मानसिकता का विकास होता नहीं दिखता है. हम आज भी सुविधाओं, अधिकारों, नियमों, कानूनों का अपनी सुविधानुसार उपयोग करने लगते हैं. इस उपयोग की स्वतंत्रता के चलते, अधिकारों के प्रयोग की निरंकुश आज़ादी के चलते हम लोग अक्सर अतिक्रमण सा कर बैठते हैं. कुछ ऐसा ही सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के साथ हो रहा है. सरकारी तंत्र से जानकारी लेने की, गोपनीयता के नाम पर छिपाकर रखी जानकारी को प्राप्त कर लेने की स्वतंत्रता का उपयोग सकारात्मक रूप से जितना होना चाहिए था उससे कहीं अधिक उसका उपयोग नकारात्मक रूप में किया गया. पीएमओ कार्यालय के आरटीआई विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2015 में लगभग तेरह हजार आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें बहुतायत में ऐसे रहे जिनका पीएमओ से कोई लेना-देना भी नहीं था. इसके बाद भी वहाँ के आरटीआई विभाग को अधिनियम की बाध्यता के चलते उनका जवाब देने को मजबूर होना पड़ा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कब-कब रोजा-इफ्तार पार्टी में गए? उनका संविधान ज्ञान कितना, कैसा है? उनकी रसोई में कौन सा एलपीजी सिलेंडर प्रयोग होता है? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बायोडाटा, उनका फोटो, उनका मोबाइल नंबर तक आरटीआई आवेदन द्वारा माँगा गया. स्पष्ट है कि इस तरह की जानकारियों के लिए आरटीआई का प्रयोग किया जाना कहीं न कहीं इस सशक्त अधिनियम को कमजोर करने की दिशा में उठाया गया कदम समझा जा सकता है.

कुछ इसी तरह की सूचनाओं की प्राप्ति के आवेदनों के चलते, इस अधिनियम के दुरुपयोग को देखते हुए हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने सूचनाओं की प्राप्ति के लिए संशोधन प्रस्तुत किये हैं. इसके अंतर्गत प्रदेश सरकार ने सूचना प्राप्त करने सम्बन्धी अनुरोध की शब्द-सीमा निर्धारित करते हुए पाँच सौ शब्द निर्धारित कर दी है. माँगी गई सूचना सम्बंधित लोक प्राधिकारी द्वारा रखे गए या उसके नियंत्रणाधीन अभिलेखों का एक भाग होनी चाहिए. इसके साथ-साथ माँगी गई सूचना में प्रश्न ‘क्यों’ जिसके माध्यम से किसी कार्य के किये जाने अथवा न किये जाने के औचित्य की माँग की गई हो, का उत्तर दिया जाना अंतर्ग्रस्त नहीं होना चाहिए; माँगी गई सूचना में काल्पनिक प्रश्न का उत्तर प्रदान करना अंतर्ग्रस्त नहीं होना चाहिए; माँगी गई सूचना इतनी विस्तृत नहीं होनी चाहिए कि उसके संकलन में संसाधनों का अननुपाती रूप से विचलन अंतर्ग्रस्त हो जाने के कारण सम्बंधित लोक प्राधिकारी की दक्षता प्रभावित हो जाये. इससे भी आगे जाते हुए प्रदेश सरकार ने सूचना प्राप्ति के लिए एक अधिकृत प्रारूप का निर्माण भी किया है, भविष्य में अब उसी प्रारूप में सूचना माँगना अनिवार्य किया गया है. कुछ वर्ष पूर्व इस तरह के संशोधन कर्नाटक, महाराष्ट्र सरकारों द्वारा किये जा चुके हैं.

          देखा जाये तो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश में स्वतन्त्रता के अधिकार का हवाला देते हुए इस गोपनीयता कानून को समाप्त करने की, इसमें व्यापक फेरबदल करने की वकालत की जाने लगी थी. देश के विभिन्न आयोगों, संस्थाओं और विभागों आदि की ओर से भी इस कानून में बदलाव की सिफारिश की गई. प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग 1968, भारतीय विधि आयोग 1971, भारतीय प्रेस परिषद् 1981, द्वितीय प्रेस आयोग 1982 आदि ने समय-समय पर गोपनीयता कानून में व्यापक संशोधन की बात को उठाया. वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा में सन् 1946 में एक प्रस्ताव में कहा गया कि सूचना का अधिकार मनुष्य का बुनियादी अधिकार है तथा यह उन सभी स्वतन्त्रताओं की कसौटी है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ ने प्रतिष्ठित किया है. इसी तरह सन् 1948 में अन्तर्राष्ट्रीय कन्वेंशन में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने घोषणा की कि जानकारी पाने की इच्छा रखना, उसे प्राप्त करना तथा किसी माध्यम द्वारा जानकारी एवं विचारों को फैलाना मनुष्य का मौलिक अधिकार है.

देश में सूचना का अधिकार लागू करने की दिशा में कार्य सन् 1989 में श्री वी0पी0सिंह की सरकार द्वारा शुरू कर दिया गया था. कालांतर में दिल्ली विधानसभा ने सन् 2001 में सूचना का अधिकार विधेयक पारित किया. इसे अक्टूबर 2001 से लागू भी कर दिया गया, इसमें दिल्ली राज्य सरकार के 119 विभागों से सम्बन्धित सूचनाओं को प्राप्त किया जा सकता था. दिल्ली के आन्दोलन के पूर्व सूचनाधिकार को केवल मस्टर रोल की कॉपी देख लेने, फोटोकॉपी प्राप्त कर लेने, किसानों के आन्दोलन तक सीमित कर रखा था. दिल्ली में प्रारम्भ हुए इस आन्दोलन के बाद से आम नागरिकों के साथ-साथ शासन-प्रशासन को भी इस अधिकार की महत्ता पता चली. झारखण्ड में विधानसभा गेस्टहाउस प्रकरण, विधानसभा में अनियमित नियुक्तियों आदि सहित कई मामलों का पर्दाफाश हुआ. इन घटनाओं के होने से आम आदमी को एहसास होने लगा कि सूचना का अधिकार का प्रयोग करके सूचनाओं को प्राप्त तो किया ही जा सकता है, साथ ही भ्रष्टाचार के खात्मे की राह भी निर्मित की जा सकती है. इन समवेत प्रयासों का सकारात्मक परिणाम यह रहा कि हमारा देश सूचना का अधिकार लागू करने वाला दुनिया का 61वां देश बना. केन्द्रीय स्तर पर मार्च 2005 को एक प्रस्ताव संसद में पेश किया गया और उसी वर्ष 12 मई को राज्यसभा में इसे पारित करने के साथ ही 12 जून 2005 को राष्ट्रपति ने स्वीकृति दे दी.

सूचनाधिकार का उपयोग केवल किसानों, मजदूरों, राशनकार्ड, मस्टररोल, वेतन भुगतान तक ही सीमित नहीं रह गया था. जागरूक संस्थाओं, जनता ने इस अधिकार का प्रयोग करके शासन-प्रशासन के कार्यों में अनियमितताओं, कमियों, भ्रष्टाचार को उजागर किया. सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार के उजागर होने के साथ ही मंत्रालयों के कार्यों में अनियमितताओं का मिलना, मंत्रियों द्वारा की जा रही विसंगतियों का पाया जाना भी प्रमुख रहा है. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से लाभान्वित होने वालों की सूची निकलवाने का मामला हो अथवा जेपी नगर के किसान द्वारा कृषि बजट में आय-व्यय के आँकड़ों को प्राप्त कर सही तस्वीर ज्ञात करने की कोशिश; बोफोर्स कांड का हिसाब माँगने का उच्चस्तरीय प्रयास रहा हो अथवा पुणे की शिक्षिका के रुके वेतन का जारी होना; महाराष्ट्र में स्थानान्तरण को उद्योग बना देने की साजिश का भंडाफोड़ होना हो अथवा शैक्षणिक ऋण प्राप्त करने में सूचनाधिकार का उपयोग सभी किसी न किसी रूप में सफलता को ही सही साबित कर रहे थे.

इन सफलताओं के बाद भी अधिनियम की विगत एक दशक की यात्रा में केन्द्रीय सरकार द्वारा तीन बार संशोधन के प्रयास करना अपनी तरह की कहानी कहता है. ये और बात है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं के विरोध और अन्य कारणोंवश केन्द्रीय सत्ता द्वारा अधिनियम में संशोधन नहीं किये जा सके हैं किन्तु जिस तरह से आये दिन आरटीआई के दुरुपयोग किये जाने की घटनाएँ सामने आ रही हैं वो अपने आपमें चिंता का विषय है. बहुतायत में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जिनसे ज्ञात हुआ कि कथित तौर पर आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा सूचनाएँ मांगे जाने के नाम पर आवेदन करने के बाद सम्बंधित विभाग से, अधिकारियों से लेन-देन करके मामले को दबा दिया गया. ऐसे मामलों और सरकारी भ्रष्टाचार के लगातार उजागर होते जाने के चलते आरटीआई सरकार के गले की फाँस बनता जा रहा है. ऐसे में सरकारी तंत्र द्वारा अधिनयम की विसंगतियों के नाम उसे कमजोर करने के अवसर तलाश रही है और अधिनियम का दुरुपयोग करने वाले बेतुकी, अतार्किक, असंगत सूचनाओं की माँग करके सरकार को संशोधन करने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध करवाते जा रहे हैं.

सत्य तो यह है कि सूचना का अधिकार एक ऐसा वरदान है जिसके पूर्ण रूप से सफल होने के लिए हम सभी को संगठित होने की आवश्यकता है. सामाजिक संगठनों को, जागरूक नागरिकों को इस ओर सकारात्मक, सार्थक कार्य करने की आवश्यकता है. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों के हाथों में व्यापक अधिकारों को सौंपता है. यदि देश की कार्यपालिका के पास शासकीय गोपनीयता कानून है, विधायिका के पास संसदीय विशेषाधिकार है, न्यायपालिका के पास न्यायालय की अवमानना सम्बन्धी कानून है तो भारतीय नागरिकों के पास कारगर और अचूक अधिकार सूचना का अधिकार है. इस अधिकार को बचाए-बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि आरटीआई से जुड़े लोग इसके सदुपयोग को लेकर, इसकी सार्थकता को लेकर, इसकी सकारात्मकता को लेकर भी सजग रहें अन्यथा वो दिन दूर नहीं जबकि सरकार इसकी विसंगतियों को दूर करने के नाम पर आम आदमी के अधिकार को कमजोर कर देगी.  

उक्त आलेख दैनिक जागरण, दिनांक-२१.०१.२०१६ के राष्ट्रीय संस्करण के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया....

05 जून 2013

खुद आये लपेटे में तो बिलबिलाये



अभी कुछ समय पहले तक अपनी तमाम नाकामियों, असफलताओं को छिपाने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम को लागू करने का श्रेय लेकर खुद अपनी पीठ थपथपाने वाली कांग्रेस आज इसी अधिनियम का विरोध करती दिख रही है. खुद को देश की एकमात्र पाकसाफ पार्टी कहने वाली माकपा भी विरोध का झंडा उठाकर कांग्रेस के साथ उतर आई. इसी तरह से खुद को सभी दलों से अलग दिखाने वाली भाजपा ने भी केन्द्रीय सूचना आयोग के फैसले का स्वागत नहीं किया. आयोग के फैसले से राजनैतिक दलों का बिलबिलाना समझ में आता है, आखिर आयोग ने आम आदमी को भी इन दलों के आय-व्यय का हिसाब-किताब लेने का अधिकार जो दे दिया है. देखा जाये तो इसमें गलत क्या है, आज जिस तरह से सभी दलों के द्वारा चुनावों में अंधाधुंध खर्च किया जा रहा है, पोस्टर, बैनर में जिस तरह से जनता के धन का अपव्यय किया जा रहा है, उसे देखते हुए जनता को भी ये जानना आवश्यक हो जाता है कि राजनैतिक दलों को मिलने वाले धन का स्त्रोत क्या है. 
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आयोग के फैसले के विरोध में कांग्रेस जिस तरह से सामने आई है और इससे पहले भी एकाधिक अवसरों पर उसके द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम में परिवर्तन करने की मंशा जाहिर की है, उससे साबित होता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम आन्दोलनकारी जनता के भारी दबाव के कारण व्यवहार में आया न कि कांग्रेस की अपनी नियत के चलते. सूचना अधिकार अधिनियम के बनने के पूर्व इसको लेकर जिस तरह से सामाजिक संगठनों द्वारा, सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा क्रियाविधि की जा रही थी, उसे देखते हुए कांग्रेस को उम्मीद भी नहीं रही होगी कि राशन कार्ड, पेंशन, बिजली कनेक्शन, फण्ड आदि की सूचना उपलब्ध करवाने वाला ये अधिनियम उनके ही गले की फाँस बन जायेगा. यदि कांग्रेस को अधिनियम के पारित होने के समय तनिक भी भान इस बात का होता कि आगे चलकर ये अधिनियम सरकारी तंत्र को भयंकर रूप से परेशान करता हुआ राजनैतिक दलों के लिए शिकंजा बन जायेगा तो कदाचित इसे लागू ही नहीं किया जाता. यही कारण है कि आज भी तमाम सारे बिल सदन में पारित होने की प्रत्याशा में लटके पड़े हैं. 
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आयोग के इस फैसले का स्वागत होना चाहिए, भले ही ऐसा राजनैतिक दलों की तरफ से न हो पर कम से कम आम जनमानस की तरफ से ऐसा हो. जनता प्रत्येक चुनावों में करोड़ों रुपये का अपव्यय एक-एक प्रत्याशी द्वारा होते हुए देखती है, चुनाव आयोग के लाखों रुपये की सीमा से कहीं बहुत आगे निकल कर प्रत्येक दल, प्रत्याशी द्वारा खर्च को खुद बर्दाश्त करती है. जब कभी भी इस सम्बन्ध में आवाज़ उठाई भी जाती है तो इसे पार्टी का चंदा कहकर समस्त स्त्रोतों को बताने से मना कर दिया जाता है. सूचना अधिकार अधिनियम में राजनैतिक दलों के आने को अलोकतांत्रिक कदम बताने वाले राजनैतिक दल अपनी ताकत का दुरुपयोग करके अदालत जाने, सूचना न देने, जनसूचना अधिकारी नियुक्त न करने जैसा अलोकतांत्रिक कदम उठा सकते हैं. राजनैतिक दलों के इस तरह के कदमों से उन तमाम गैर-सरकारी संगठनों को भी इस अधिनियम का विरोध करने का बहाना मिल जायेगा जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सरकारी मदद लेते रहते हैं. देश में जबकि घनघोर अव्यवस्था दिख रही है, हताशा-निराशा का माहौल राजनैतिक दलों की तरफ से दिख रहा है, जनता में किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति दिख रही हो तब केन्द्रीय सूचना आयोग के इस फैसले का स्वागत आगे बढ़कर खुद राजनैतिक दलों को करना चाहिए था. सूचना अधिकार अधिनियम को सरकारी मशीनरी में पारदर्शिता बरतने के लिए बताने के साथ-साथ राजनैतिक दलों के लिए भी पारदर्शी बताने का साहस इन राजनैतिक दलों को करना चाहिए था. आखिर सरकारी मशीनरी भी इन्हीं राजनैतिक दलों के इर्द-गिर्द घूमती है और जब ये खुद को पारदर्शी बनाने के प्रति सचेत नहीं होंगे तो सरकारी मशीनरी के पारदर्शी होने की, सचेत होने की कल्पना करना भी बेमानी होगा. 
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04 जून 2013

जनजागरूकता के बिना सूचना अधिकार अधिनियम है सिर्फ शोपीस



केन्द्रीय सूचना आयोग ने राजनैतिक दलों (अभी मात्र छः राष्ट्रीय दल) को सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन किये जाने का निर्णय दिए जाने से दो तरीके की प्रतिक्रियाएं देखने-सुनने को मिली. एक उन लोगों की तरफ से जो  निर्णय से प्रसन्न दिखे कि अब राजनैतिक दलों से भी उनका हिसाब-किताब माँगा जा सकता है और दूसरी उन लोगों से जो राजनैतिक दलों से सम्बंधित हैं और इन लोगों ने इस निर्णय को आयोग की तानाशाही बताया. आयोग के इस निर्णय का आम जनता को क्या लाभ होगा, राजनैतिक दलों को क्या नुकसान होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है किन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि इससे न तो आम आदमी को बहुत लाभ मिलने वाला है और न ही राजनैतिक दलों को बहुत बड़ा नुकसान. 
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सूचना का अधिकार अधिनियम को लागू हुए लगभग आठ वर्ष होने को आये और इन वर्षों में आम जनता में से चंद लोग (उँगलियों पर गिने जाने वाले) ही इसका उपयोग करते दिखे. इसी तरह से जो संस्थाएं, व्यक्ति सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना देने के लिए नियत हैं वे भी समय से सूचनाएँ नहीं दे रही हैं. बहुत से विभाग/संस्थान ऐसे हैं जो सूचना देते ही नहीं हैं, और तो और प्रथम अपीलीय अधिकारी अथवा आयोग की तरफ से भी बहुत सकारात्मक सहयोग प्राप्त नहीं होता है. अधिसंख्यक मामलों में सूचनाओं को दबा जाने, सूचनाएँ न देने, गलत सूचनाएँ देने, सूचनाएँ समय पर न देने, अकारण सूचनाओं को न देने जैसी कार्यवाहियां होते दिखती हैं. ऐसी स्थिति में प्रथम अपीलीय अधिकारी की भूमिका भी बहुत विश्वसनीय, सहयोगी की नहीं दिखी है, ऐसे मामलों के आयोग में पहुँचने पर भी ज्यादातर मामलों में आयोग ने भी सम्बंधित सूचना अधिकारी के समर्थन में ही अपने फैसलों को दिया है. इस कारण से आम जनमानस में सूचना अधिकार अधिनियम को लेकर बहुत उत्साह अब नहीं दिखाई देता है.
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जनसूचना अधिकारी, प्रथम अपीलीय अधिकारी, आयोगों के इस तरह लापरवाह कदमों के पीछे कहीं न कहीं आम जनमानस का हाथ माना जायेगा. सूचना अधिकार अधिनियम के बनने के बाद भी चंद लोगों द्वारा इसका उपयोग किया जा रहा है. इस उपयोग में भी अधिसंख्यक मामलों में बदले की भावना, दूसरे को फंसाने की मंशा देखने को मिली है. कुछ जागरूक, सक्रिय सूचना कार्यकर्ताओं के मारे जाने से, उनपर हमला किये जाने की घटनाओं से भी आम जनता में भय का वातावरण बन गया है. इसके अलावा देश में आज भी जनता के बीच से शिकायत किये जाने सम्बन्धी जागरूकता न के बराबर ही देखने को मिलती है. गली-मोहल्ले में, चाय-पान की दुकान पर खड़े होकर सरकार को गरियाने का काम, अव्यवस्थाओं को रोने का, अधिकारियों को कोसने का काम कर लिया जाता है पर लिखित में शिकायत करने का हौसला चन्द मुट्ठी भर लोग ही जुटा पाते हैं. जनता की यही सुसुप्तावस्था न केवल जनसूचना अधिकारियों को, प्रथम अपीलीय अधिकारियों को शेर बनाती है बल्कि सूचना अधिकार अधिनियम को भी कमजोर करती है.
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केन्द्रीय आयोग के फैसले से भले ही ख़ुशी का, दुःख का वातावरण फैलता सा दिख रहा हो किन्तु इसका बहुत लाभ जनता को नहीं मिलने वाला और इसका कोई नुकसान राजनैतिक दलों को होता नहीं दिखता है. इस अधिनियम के सम्बन्ध में एक बात गौर करने लायक ये है कि जबतक आम जनता शिकायत करना नहीं सीखेगी, हर छोटी-छोटी कमी पर सर उठाकर खड़ा होना नहीं सीखेगी, ‘ठीक है, सब चलता है’ जैसी सोच से बाहर निकलने का प्रयास नहीं करेगी तब तक ऐसे सशक्त अधिनियम सिर्फ और सिर्फ शोपीस बने दिखते रहेंगे.

15 अगस्त 2012

सूचना अधिकार अधिनियम का उपयोग हो सकारात्मक रूप में



उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बैठी एक अतिउत्साही बच्ची ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का उपयोग करते हुए एक बार फिर से जनभावनाओं को हिलाने जैसा कार्य किया है। केन्द्र सरकार के मंत्रालयों से मांगी गई सूचना के आधार पर ज्ञात हुआ कि 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्टूबर को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाये जाने का कोई भी लिखित आदेश नहीं है। सम्भव है कि प्रथम दृष्टया तकनीकी रूप से इन दिवसों को पर्व के रूप में मनाये जाने से सम्बन्धित प्रपत्र का न होना गलत माना जाये पर यदि जनभावनाओं की दृष्टि से देखा जाये तो इस तरह की बातों और सूचनाओं के द्वारा सिर्फ और सिर्फ भ्रम की स्थिति ही पैदा की जा सकती है। इससे पूर्व भी उस बच्ची के सूचना अधिकार सम्बन्धी आवेदन-पत्र के माध्यम से ज्ञात हुआ था कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहे जाने सम्बन्धी कोई आदेश सरकार के पास नहीं है; हॉकी अथवा किसी भी खेल को राष्ट्रीय खेल का स्थान प्राप्त नहीं है।

सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का इस तरह की सूचनाओं की प्राप्ति के लिए प्रयोग किया जाना किसी न किसी रूप में आम आदमी के लिए बने एक सशक्त अधिनियम को भविष्य में कमजोर करने का कार्य करेगा। सूचना का अधिकार अधिनियम को लागू करवाये जाने के पीछे जिन लोगों की मेहनत और आन्दोलन ने अपना असर दिखाया है उन्हें तनिक भी भान नहीं होगा कि ऐसे सशक्त कानून का प्रयोग इस तरह की सूचनाओं की प्राप्ति के लिए किया जायेगा।

राजधानी की बच्ची के द्वारा मांगी जाने वाली सूचनाओं पर पर्याप्त जानकारी, प्रपत्र के न मिलने से आम जनमानस में सरकार के विरुद्ध एक प्रकार का वातावरण तो बन ही रहा है साथ ही जनभावनाओं पर ठेस भी लग रही है। इस देश की आजादी और यहां के संविधान की स्वीकार्यता वाले दिन को सम्पूर्ण राष्ट्र द्वारा उत्साहपूर्वक मनाये जाने के लिए एक अदना से कागज की आवश्यकता है? सम्पूर्ण देश यदि पूर्ण श्रद्धाभावना से यदि इन दिनों पर आयोजन करता है तो उसे सम्पन्न करवाने के लिए क्या किसी मंत्रालय के आदेश की आवश्यकता है? यदि ऐसा है तो शायद कल को होली, दीपावली, ईद, क्रिसमस, गुरुनानक जयंती आदि को मनाने के लिए भी सरकारी आदेश की आवश्यकता पड़ेगी। यदि यही हाल हमारी कथित जागरूकता का रहा तो सम्भव है कि आने वाले दिनों में परिवार कल्याण मंत्रालय से अथवा किसी और विभाग से हमें इस बात का प्रपत्र मांगना पड़े कि माता को माता और पिता को पिता कहने का आदेश कब हुआ था, किसके द्वारा हुआ था?

जागरूकता, उत्साह, सक्रियता आदि आवश्यक है और ये इस तरह की स्थितियों से सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं पर कभी-कभी इनके प्रति अतिशयता की स्थिति से भ्रम ही उत्पन्न होता है। इस बच्ची की देखादेखी अथवा इसी के द्वारा कल को सम्भव है कि इस तरह की जानकारी भी ली जा सकती है कि किस आदेश के अन्तर्गत सड़क पर बांयी ओर चलने का नियम बनाया गया? किस आदेश से स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियों की व्यवस्था की गई? किसने आदेश दिया था कि यातायात के संचालन में लाल रंग से रुकना होगा और हरे रंग से चलना होगा? किस आदेश के द्वारा देश के सभी कार्यालयों को दिन में खोला और रात को बन्द रखा जाता है? किस सरकारी आदेश के द्वारा व्यक्तियों को अपने नाम के साथ विभिन्न उपनाम लगाने की अनुमति दी गई है? फिजिक्स का हिन्दी में भौतिकी कहना सही है अथवा भौतिकशास्त्र और इसे किस आदेश के द्वारा ऐसा कहा जाता है? और भी बहुत से सवाल बन सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ मीडिया में स्थान दिला सकते हैं, क्षणिक प्रसिद्धि दिला सकते हैं।

हमें इस बात को समझना होगा कि कई बार अतिशय उत्साह में हम जनभावनाओं का असम्मान करते हैं। महात्मागांधी के राष्ट्रपिता घोषित करने सम्बन्धी प्रपत्र/आदेश के न होने से गांधी को राष्ट्रपिता मानने अथवा न मानने वालों की संख्या में कमी-वृद्धि नहीं हो जायेगी पर इससे एक अनावश्यक बहस को बल मिलेगा। ऐसे अधिनियमों/कानूनों, जिनके द्वारा एक आम आदमी को वे सारे तथ्य जानने का अधिकार मिला है जिन्हें संसद के द्वारा जाना जा सकता है, का प्रयोग सोच-समझ कर सकारात्मक रूप में किया जाना चाहिए। उस बच्ची के भीतर अपार उत्साही ऊर्जा का भंडार है, उसके अंदर सूचना का अधिकार अधिनियम के उपयोग का इतना ही जज्बा है तो वह इसका प्रयोग कमजोर को, वंचितों को, गरीबों को, पिछड़ों को, जरूरतमंदों को लाभ दिलवाने में करे। यदि उसके माता-पिता के द्वारा उसको पर्याप्त सकारात्मक सहयोग प्राप्त है तो वे उसे उन मुद्दों पर सूचना प्राप्ति के लिए प्रेरित करें जिनसे समाज का भला हो, समाज के विभिन्न वर्गों का भला हो न कि अनावश्यक रूप से विवाद की स्थिति पैदा हो, जनभावनाओं को ठेस लगने जैसी स्थिति का जन्म हो।

सूचना का अधिकार अधिनियम का प्रयोग इस तरह की सूचनाओं के लिए कर रहे ऐसे सभी लोगों को ध्यान में रखना होगा कि ऐसे सशक्त कानून का इस तरह से दुरुपयोग होने से आने वाले दिनों में इस कानून में पता नहीं किस तरह के और क्या-क्या संशोधन करके इसे पंगु कानून बना दिया जाये। भविष्य में जनता के अधिकारपूर्ण कदम के सुरक्षित उठाये जाने हेतु वर्तमान की इस तरह की बेतुकी सूचना-प्राप्ति से बचना होगा, सशक्त जनसूचना अधिकार अधिनियम को कमजोर होने से बचाना होगा।

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चित्र गूगल छवियों से साभार


12 दिसंबर 2010

सूचना का अधिकार अधिनियम --- नए लोकतंत्र की राह


नये लोकतन्त्र के उदय की राह निर्मित
डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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सूचना अधिकार अधिनियम पर एक संक्षिप्त जानकारी

समाज की व्यवस्था और सत्ता पक्ष में लगातार परिवर्तन होते दिखते हैं। परिवर्तन के इसी दौर से भारतीय लोकतन्त्र भी गुजर रहा है। देश में लोकतन्त्र होने के बाद भी बहुधा हमें राजशाही के दर्शन हो जाया करते हैं। यह राजशाही लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ चुपके से चली आ रही होती है। यह लोकतान्त्रिक राजशाही आम आदमी से सत्ता पक्ष की, शासन वर्ग की तमाम सारी कमियों और बुराइयों को छिपा कर रखती है। इस व्यवस्था का प्रयास होता है कि किसी भी जानकारी, सूचना का उपयोग लोकतान्त्रिक राजा ही कर सके।



चित्र गूगल छवियों से साभार

औद्योगिक क्रांति तथा उदारीकरण के आगमन ने नागरिक स्वतन्त्रता की अवधारणा को जन्म दिया। इस अवधारणा के बाद लोकतान्त्रिक शासन प्रणालियों में बदलाव आने शुरू हुए। सत्ता पक्ष को एहसास होने लगा कि अब ज्यादा दिनों तक गोपनीयता को अपनी थाती बताकर सूचनाओं को दबाकर रख पाना सम्भव नहीं।

यह देश की शासन व्यवस्था की विद्रूपता ही कही जायेगी कि जनता के द्वारा जनता के लिए बना शासन ही जनता के पक्ष में खड़ा नहीं दिखता है। लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के द्वारा चुनकर आये जनप्रतिनिधि स्वयं को जनता का शासक समझकर कार्य करने लगते हैं। उनके कार्यों का लेखा-जोखा किसी भी रूप में जनता को देखने-मांगने का अधिकार नहीं दिया गया था। इस सोच के पीछे से चुपके-चुपके से बदलाव की बयार चलनी शुरू हुई। विश्व के कई देशों में नागरिक स्वतन्त्रता के रूप में सूचनाधिकार का आना भारत देश के नागरिकों के लिए भी संजीवनी की तरह से कार्य करने वाला था।

सामाजिक कार्यकर्ताओं, जागरूक संस्थाओं और जिम्मेवार नागरिकों की लम्बी लड़ाई और संघर्ष के बाद देश में सूचनाधिकार अधिनियम के प्रति सरकारों ने उत्तरदायी होने की चेष्टा की। इस क्रम में अन्ततोगत्वा सूचना अधिकार का प्रारूप मार्च 2005 को सेसद में पेश किया गया। 11 मई 2005 को लोकसभा में यह 144 संशोधनों के साथ पारित हुआ तथा 12 मई को इसे राज्यसभा में भी पारित कर दिया गया। इसके बाद 12 जून 2005 को राष्ट्रपति ने इसे स्वीकृति दे दी जिसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 से सूचना का अधिकार अधिनियम, जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर समूचे देश में लागू हो गया।

नागरिक स्वतन्त्रता की यह बहुत बड़ी जीत थी और इसके बाद देश के आम नागरिक को सूचना मांगने, जानने के स्तर पर एक सांसद और विधायक के समान ही अधिकार प्राप्त हो गये। अधिकारों के प्राप्त होने के बाद जागरूक नागरिकों ने लोकतान्त्रिक राजशाही पर नकेल लगाने का प्रयास भी शुरू कर दिया। भ्रष्ट अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों के कारनामों को उजागर कर दिया। आम आदमी भी अब सरकार के कार्यों को अन्दरूनी रूप में देखने-समझने का अधिकार रखने लगा। यह अधिकार जहां एक ओर आम नागरिक के अधिकारों की जीत थी वहीं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने इसे अपने अधिकारों का हनन समझा। इसका परिणाम यह हुआ कि सूचना अधिकारी ही इस अधिनियम के रास्ते का रोड़ा बनने लगे।

अपने अधिकारों और गोपनीयता कानून की आड़ लेकर काले कारनामें करते भ्रष्टजन इस अधिनियम के कारण खुलासे में आ गये। अपने कारनामों के उजागर होने, अधिकारों में कमी आने, जनता के जागरूक होकर उनके कार्यों का लेखा-जोखा मांगने से खीझे, आक्रोशित अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों ने सूचना का अधिकार अधिनियम का मखौल उड़ाना शुरू कर दिया। सूचना मांगने पर समय से सूचना न देना, बेवजह सूचना मांगने वालों को परेशान करना, शुल्क की नियम विरुद्ध मांग करना, याचिकाकर्ता को डराना-धमकाना आदि भी किया जाने लगा। पराकाष्ठा तो इस बात की हो गई कि इस अधिकार से घबराये कुछ भ्रष्टजनों के कलुषित कदमों ने कई सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को मौत के घाट भी उतार दिया।

पिछले पांच वर्ष की अधिनियम की यात्रा में खट्टे-मीठे अनुभव हुए हैं। सफलता के द्वार भी खुले हैं तो भय का रास्ता भी दिखाई पड़ा है। इसके बाद भी यह साफ तौर से दिखाई देता है कि इस अधिकार ने आम आदमी को जागरूक किया है। हालांकि अभी भी जागरूकता दर में कमी है फिर भी सफलता की कहानी सुखद मालूम होती है। कुछ छिटपुट घटनाओं और कमियों के बाद भी सूचनाधिकार की शक्ति को कम करके नहीं आंका जा सकता है। स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के साथ भारतीय लोकतन्त्र में एक और नये, जागरूक लोकतन्त्र का उदय हो रहा है।


12 जनवरी 2010

आर टी आई, माननीय जज और कुछ सवाल

माननीय जज महोदय भी सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में आयेंगे। इस पर मच गया हड़कम्प। अब कुछ सवाल-


क्या माननीय जज आदमी नहीं, जो उनसे उनके कार्यों के बारे में न पूछा जाये?
क्या सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत किसी से कुछ भी जानने का तात्पर्य उसके भ्रष्ट होने से लगाया जाता है?
माननीय जज साहब से यदि कुछ भी (संवैधानिक) पूछे जाने पर क्या देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो सकते हैं?
न्यायालयीन प्रक्रिया सीधे-सीधे आम आदमी की संवेदनाओं से जुड़ी होती है, क्या ऐसे में माननीय जज साहबों का सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में आना असंवैधानिक है?


सवाल बहुत हैं, पर सिर्फ सवाल न रह जायें, इनके जवाब भी मिलें इसका प्रयास रहेगा। आप क्या कहेंगे इन सवालों पर?

क्या सारे अधिनियम, कानून, प्रावधान सिर्फ आम आदमी के लिए ही हैं?


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चित्र साभार गूगल छवियों से

18 अगस्त 2008

फोन पर सूचना प्राप्ति

बिहार सरकार ने सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी लेने के उद्देश्य से कॉल सेंटर की स्थापना की है। इसके मध्यम से दूरभाष संख्या 155311 पर राज्य के किसी भी कोने से कोई व्यक्ति किसी कार्यालय या विभाग के लोक-सूचना अधिकारी से सूचना मांग सकता है। इस दूरभाष के माध्यम से वह व्यक्ति अपील भी दायर कर सकता है।बिहार सरकार का इस सम्बन्ध में नारा है

"सरकार है अब खुली किताब,फोन लगायें पायें जवाब।

(ये जानकारी मेघदूत पोस्टकार्ड पर छपी है, नीतिश कुमार के चित्र के साथ)

22 जुलाई 2008

ई-आवेदन की योजना शुरू

सूचना के अधिकार के लिए सरकार लगातार प्रयासरत है पर लोगों में जागरूकता कम है। सरकार अब सूचना के अधिकार के लिए ई-आवेदन की योजना शुरू कर रही है।