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24 जनवरी 2025

महाकुम्भ और एआई संचालित पत्रकारिता

सनातन के वास्तविक लोग, महाकुम्भ के सजग नागरिक कथित मीडिया और इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के हमले से सावधान रहें.

 

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता है. यहाँ ध्यान रहे कि 'माना' जाता है, वो चौथा खम्भा है नहीं. लोकतंत्र में मात्र तीन खम्भे ही सहज स्वीकार्य हैं-कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका. पत्रकारिता को जबरिया एक खम्भा घोषित कर दिया गया है. इस चौथे स्तम्भ की आड़ में उपजे कथित जबरिया, नियंत्रण-मुक्त, उच्छृंखल सोशल मीडिया खम्भे ने बहुत नुकसान पहुँचाया है. इसे प्रयागराज के महाकुम्भ में देखा जा सकता है.

 

हर हाथ मोबाइल, हर हाथ इंटरनेट ने सबको सोशल मीडिया चैनल बना दिया है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस पड़े. न सवाल पूछने की अकल, न विषय की गम्भीरता, न वातावरण-देशकाल का भान.... बस मोबाइल का मोबाइल ओं और बन गए पत्रकार. सनातन संस्कृति के पवित्र, पावन, भव्य, संस्कारित आयोजन महाकुम्भ पर ऐसे कथित मीडिया मंचों से बचने की आवश्यकता है. इन कथित मानसिकता वालों को पर्याप्त मदद मिल रही है कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से.


सावधान रहें.




30 मई 2019

हिन्दी का पहला समाचार-पत्र उदन्त मार्तण्ड


आज, 30 मई को हिन्दी के पहले समाचार-पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन आरम्भ हुआ था. पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने सन 1826 में पहले हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया. वे मूल रूप से कानपुर संयुक्त प्रदेश के निवासी थे. उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन कलकत्ता के कोलू टोला नामक मोहल्ले की 37 नंबर आमड़तल्ला गली से से एक साप्ताहिक पत्र के रूप में शुरू हुआ था. उस समय अंग्रेज़ी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकल रहे थे किंतु हिन्दी में एक भी पत्र नहीं निकलता था. इसका प्रकाशन एक क्रांतिकारी घटना मानी जा सकती है. 


उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है समाचार-सूर्य. अपने नाम के अनुरूप ही इस समाचार पत्र ने हिन्दी की समाचार दुनिया में कार्य किया. यह पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था जब हिन्दी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की आवश्यकता महसूस हो रही थी. इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उदन्त मार्तण्ड ने समाज में चल रहे विरोधाभासों एवं अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध आम जन की आवाज़ को उठाने का कार्य किया था. क़ानूनी और आर्थिक कारणों के चलते 19 दिसम्बर 1827 को उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन बंद हो गया. इसके अंतिम अंक में एक नोट प्रकाशित हुआ था जिसमें उसके बंद होने की पीड़ा झलकती है. इसमें कहा गया था,
आज दिवस लौ उग चुक्यों मार्तण्ड उदन्त।
अस्ताचल को जाता है दिनकर दिन अब अंत।।

यह साप्ताहिक पत्र पुस्तकाकार (12x8) छपता था और प्रति मंगलवार को निकलता था. इसके कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए थे. वर्तमान में पत्रकारिता एक बड़ा कारोबार बन गया है. इन 193 वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में काफ़ी तेजी आई है. इसके द्वारा साक्षरता बढ़ी भी है. पंचायत स्तर पर राजनीतिक चेतना बढ़ी है. इसके लिए उदन्त मार्तण्ड के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है. इस पत्र को हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर कहा जाता है. इसके सम्मान में ही प्रतिवर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है.

30 मार्च 2019

न फोटो खींचने से रुकेंगे, न अपनी बात कहने से


शहर के किसी कोने में होने वाली किसी भी तरह की गड़बड़ी को जैसे ही कैमरे में लेने की कोशिश की जाती है वैसे ही आसपास वालों की निगाह में पत्रकारिता से जुड़ा होने का भाव जाग जाता है. जो चंद लोग जानते-पहचानते हैं वे तो मुस्कुराते हुए किनारे से, अगल-बगल से निकल जाते हैं और जो नहीं पहचानते हैं उनके लिए कैमरे से की जाने वाली कारीगरी सिवाय पत्रकारिता के कुछ और नहीं होती है. ये एक सजग सोच कही जा सकती है किसी भी व्यक्ति की कि वह समाज में हो रही किसी भी तरह की अव्यवस्था, अनियमितता को उजागर करने के लिए पत्रकारिता को, पत्रकार को सक्षम समझता है. इस सजग, सकारात्मक सोच के साथ-साथ एक नकारात्मकता भी चिपकी होती है और वह होती है उस फोटो से की जाने वाली कमाई को लेकर. ऐसा हमारा स्वयं का व्यक्तिगत अनुभव रहा है, एक बार का नहीं अनेक बार का, जबकि ऐसी किसी भी स्थिति की फोटो निकालते समय आसपास के लोगों के कई सवालों से जूझना पड़ा, कई तरह के विचारों को जानने-सुनने का मौका मिला. ऐसा एक हमारे शहर का हाल नहीं है वरन बहुतायत में ऐसा होते दिख जाता है. ट्रेन में, बस में, बाजार में, कार्यालय में, स्कूल में, विश्वविद्यालय में ऐसे मंजर आसानी से आपके साथ खड़े हो जाते हैं. 


अभी इसी माह ऐसे कई बिंदु आँखों के सामने से गुजरे. हर हाथ में चिपके मोबाइल के कारण ऐसी किसी भी स्थिति का फोटो निकालना आसान हो जाता है. कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया के whatsapp ग्रुप से जुड़ना हुआ जो हमारे इंटरमीडिएट के साथियों द्वारा बनाया गया. उरई के राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़े साथियों का एकसाथ आना सुखद अनुभूति सा महसूस हुआ. दिमाग में आया कि सन 1990 के बाद से कॉलेज को छोड़कर जा चुके साथियों के लिए अपने कॉलेज के आज के चित्र भेजे जाएँ. ऐसा सोचकर कॉलेज की पुरानी इमारत की तरफ जाना हुआ. अंग्रेजों के समय की बनी इस इमारत के साथ-साथ उससे लगी हुई दूसरी इमारत में भी हम लोगों को पढ़ने का अवसर मिला था. दूसरी इमारत सन 1990 से कुछ समय पहले ही बनाई गई थी. इस समय पुरानी इमारत पूरी तरह से परित्यक्त है. उसका बहुत बड़ा भाग गिर चुका है और बहुत सा हिस्सा गिरने की स्थिति में है. इस इमारत के मुख्य द्वार से लगी बगिया भी उजड़ चुकी है. पुरानी जर्जर इमारत और उजड़ी हुई बगिया अब नशेबाजों की शरणगाह बने हुए हैं. उस दिन फोटो खींचने के उद्देश्य से अन्दर जाने पर दो-चार नशेबाजों से सामना हुआ. मोबाइल से फोटो निकालते देख उनमें से कुछ तो चल दिए, एक-दो जो वहां जमे रहे उन्होंने अपनी शंका का समाधान किया और हमारे बताते ही कि हम मीडिया से नहीं हैं, वे निश्चिन्त भाव से अपने काम में लग गए.


कॉलेज कैंपस की जर्जरता का अपने लिए लाभ उठा रहे उन नशेबाजों ने तो कुछ नहीं कहा मगर उरई के पुराने भवन टाउन हॉल में लगे लैम्पों की दुर्दशा की, शहर भर में फुटपाथ पर पार्किंग बना दिए जाने की, बैंक, मॉल, तहसील आदि के सामने जबरन पार्किंग बना दिए जाने की, बाजार में रखे डिवाइडर्स के अस्त-व्यस्त बने रहने के फोटो के दौरान भी ऐसी स्थिति से गुजरना हुआ, जबकि लोगों की नकारात्मकता का आभास हुआ. आसपास वालों ने जानकारी लेनी चाही तो पार्किंग वालों ने भी आपत्ति दर्ज की. आम नागरिकों का मानना था कि इस तरह की फोटो खींचने के बाद सुधार तो कुछ होना नहीं है, मीडिया के नाम पर उगाही कर ली जाएगी. कुछ लोगों ने सीधे हमसे बात की और कुछ आपस में बतियाते रहे. उन सबका सार यही था कि कमीशन न मिला होगा, इस बार का हिस्सा न पहुँचा होगा, ठेकेदार से, नगर पालिका से कुछ अनबन हो गई होगी, कोई काम न बना होगा आदि-आदि. 


मीडिया के प्रति इस तरह की नकारात्मकता उभरने के पीछे के अपने कारण हैं, उन पर चर्चा फिर कभी. मूल बात ये कि समाज के लोग अव्यवस्थाओं से अनियमितताओं के इतने आदी हो चुके हैं कि वे स्वयं इसमें बदलाव के लिए आगे बढ़ना ही नहीं चाहते. जो है, जैसा है, सब चलता है, ठीक है आदि की मनोदशा में वे अपने आपको उन्हीं अव्यवस्थाओं, अनियमितताओं के सहारे आगे ले जा रहे हैं. यही कारण है कि अब किसी मुद्दे पर जन-आन्दोलन जैसी स्थिति नहीं दिखती है. इसी कारण से सम्बंधित पक्ष भी एकतरफा काम करते हुए कार्यवाही करता है. बहरहाल, सुधार होगा या नहीं, बदलाव आएगा या नहीं, लोग सुधरेंगे या नहीं ये बाद की बातें हैं पर हम तो न फोटो खींचने से रुकेंगे और न ही अपनी बात कहने से.

09 दिसंबर 2018

देश की पहली महिला फोटो पत्रकार होमी व्यारावाला


होमी व्यारावाला, यह नाम बहुत से लोगों के लिए अनजाना, अपरिचित होगा. वास्तव में यह ऐसा नाम है, जिसके बारे में बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई है. होमी व्यरावाला को भारत की पहली महिला फोटो पत्रकार माना जाता है. अपने क्षेत्र में वे अपने लोकप्रिय उपनाम डालडा 13 से जानी जाती रही हैं. उनके इस नाम के पीछे एक रोचक कहानी जुड़ी हुई है. उनका जन्म 1913 में हुआ. अपने होने वाले पति से उनकी पहली मुलाकात 13 वर्ष की उम्र में हुई. उनकी पहली कार का नंबर डी०एल०डी० 13 था. 13 के इस संयोग और कार नंबर के DLD ने उनको डालडा 13 का उपनाम प्रदान करवा दिया. उनके ज्यादातर चित्र उनके इसी उपनाम के साथ ही प्रकाशित हुए. उनका जन्म 13 दिसम्बर 1913 को गुजरात के नवसारी में एक पारसी परिवार में हुआ था. उनके पिता पारसी उर्दू थियेटर में अभिनेता थे. मुंबई में आरम्भिक जीवन गुजारने के दौरान उनको फोटोग्राफी का शौक अपने मित्र मानेकशॉ व्यारावाला से मिला, कालांतर में उनका आपस में विवाह हो गया. मानेकशॉ टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छायाकार के रूप में काम किया करते थे. जे०जे० स्कूल ऑफ आर्ट से फोटोग्राफी की बारीकियाँ सीखने के बाद होमी की पहली तस्वीर बॉम्बे क्रॉनिकल में प्रकाशित हुई.  यहाँ उनके प्रत्येक चित्र के लिए बतौर पारिश्रमिक एक रुपया प्राप्त होता था. विवाह पश्चात् वे वह अपने पति के साथ दिल्ली आ गईं. यहाँ उन्होंने ब्रिटिश सूचना सेवा के कर्मचारी के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चित्र लेने का काम शुरू किया. 



द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने इलेस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया मैगजीन के लिए कार्य करना शुरू किया. उनके कई फोटोग्राफ टाइम, लाइफ, दि ब्लैक स्टार तथा कई अन्य अन्तरराष्ट्रीय प्रकाशनों में फोटो-कहानियों के रूप में प्रकाशित हुए. दिल्ली आते ही होमी को अपने काम को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी शुरू हो गई. सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मुहम्मद अली जिन्ना की उतारी गईं उनकी कई तस्वीरें चर्चा में रहीं. बाद के दिनों में उनके छायांकन के प्रिय विषय भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू रहे. सिगरेट पीते हुए जवाहरलाल नेहरू और साथ ही भारत में तत्कालीन ब्रिटिश उच्चायुक्त की पत्नी सुश्री सिमोन की मदद करते हुए उनके द्वारा निकाली गई तस्वीर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की एक अलग ही छवि दर्शाती है. 



उन्होंने अपनी तस्वीरों के माध्यम से देश के तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक जीवन को दर्शाया था. अगस्त 1947 को लाल किले पर पहली बार फहराये गये झंडे, भारत से लॉर्ड माउन्टबेटन के प्रस्थान, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा लाल बहादुर शास्त्री की अंतिम यात्रा के छायाचित्र भी उनके द्वारा लिए गए थे. वे सादा माध्यम (ब्लैक एंड व्हाइट) को वरीयता देती थीं. दिन की रौशनी के दौरान, लो-एंगल शॉट तथा छवियों के विस्तार के लिए बैक लाइट का उपयोग करती थीं. ऐसा करने के पीछे विषय-वस्तु की गहराई तथा ऊँचाई को स्पष्टता से दर्शाना रहता था. 


गूगल द्वारा उनके 104वें जन्मदिन पर बनाया गया डूडल 


सन 1970 में अपने पति की मृत्य के बाद होमी व्यारावाला ने अचानक अपने पेशे से संन्यास ले लिया और दिल्ली छोड़कर वडोदरा आ गईं. बाद के लगभग 40 साल उन्होंने कैमरे से एक भी चित्र नहीं खींचा. इसकी वजह उन्होंने नई पीढ़ी के छायाकारों के बुरे बर्ताव को बताया. जब उनसे इसकी वजह पूछी गई तो उनका कहना था कि अब इसका कोई औचित्य नहीं रह गया था. हमारी पीढ़ी के पास छायाकारों के लिए कुछ उसूल थे. यहां तक कि हम लोगों ने अपने लिए एक ड्रेसकोड का भी पालन किया. हमने एक दूसरे को सहकर्मी के रूप में सहयोग और सम्मान दिया, लेकिन अचानक सब कुछ बुरी तरह से बदल गया. नई पीढ़ी जिस किसी भी प्रकार से पैसे कमाने के पीछे पड़ी थी, मैं इस भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी. सन 1982 में वे अपने बेटे फारूख के पास पिलानी आ गईं. फारूख पिलानी के बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (बिट्स) में अध्यापन कार्य करते थे. सन 1989 में कैंसर से उनके देहांत के बाद होमी एक बार फिर अकेली हो गईं और जीवनपर्यंत वडोदरा के एक छोटे से घर में रहीं. उनका निधन 15 जनवरी 2012 को हुआ. अपने अंतिम दिनों में उन्होंने अपने चित्रों का संग्रह दिल्ली स्थित अल-काज़ी फाउंडेशन ऑफ आर्ट्स को दान कर दिया. सन 2010 में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, मुंबई ने अल-काज़ी फाउंडेशन ऑफ आर्ट्स के साथ मिलकर उनके छायाचित्रों की एक प्रदर्शनी का आयोजन किया. उनकी विशिष्ट उपलब्धियों को देखते हुए सन 2011 में उन्हें नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. 


आज उनके जन्मदिन पर उन्हें सादर श्रद्धांजलि.  

25 अगस्त 2016

मीडिया का राजनैतिक रूप

राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम को लेकर वर्तमान में देश में एक अजब सा माहौल बना हुआ है. भाजपा सरकार के पक्षकार और विपक्षी दोनों तरफ से ऐसे विषयों पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं. इन बयानों, तर्कों को कसौटी पर कसे बिना, उनकी सत्यता को जाँचे बिना मीडिया द्वारा आग में घी डालने का काम किया जा रहा है. राष्ट्रवाद के पक्ष में अथवा विपक्ष में किसी भी तरह का बयान आने के बाद कतिपय मीडिया मंचों द्वारा अपनी टीआरपी को ध्यान में रखा जाने लगता है. स्वार्थमयी सोच के आगे ये विचार करना बंद कर दिया जाता है कि उनके इस तरह के प्रसारण से देश को किस तरह का नुकसान होने का अंदेशा है. विगत दो वर्षों से, जबसे कि केंद्र में भाजपा सरकार का आना हुआ है, मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा ऐसे कृत्य कुछ अधिक ही होने लगे हैं. ऐसा माहौल बनाया जाने लगा है कि जो हो रहा है वो बस अभी ही हुआ है, न इससे पहले कभी ऐसा हुआ है और न कभी इसके बाद होगा. यदि इसके बाद होने की आशंका है और ये भाजपा के कार्यकाल में हुआ तो और भी भयानक होगा, इस तरह के प्रसारण से देशहित को ही नुकसान हुआ है.

विगत की आपत्तिजनक बातों को पुनः दोहराने का कोई लाभ नहीं. इसके उलट यदि वर्तमान की कुछ घटनाओं का संज्ञान लिया जाये तो भी स्थिति वहीं की वहीं दिख रही है. एक अभिनेत्री का बयान आया कि पाकिस्तान में सबकुछ नरक नहीं है और बस बवेला शुरू. पक्ष-विपक्ष अपने-पाने हथियार लेकर मैदान में उतर आये. बिना ये जाने-सोचे समझे कि उसने वाकई क्या कहा, क्या कहना चाहा. इसी तरह संघ प्रमुख का बयान आया कि किस कानून ने हिन्दुओं को अधिक बच्चे पैदा करने से रोका है, बस हो-हल्ला आरम्भ. मीडिया ने, गैर-भाजपाई मानसिकता वालों ने इसे ऐसे प्रसारित किया कि संघ प्रमुख ने हिन्दुओं से अधिक बच्चे पैदा करने को कहा है. ये कोई एकमात्र अथवा नया उदाहरण नहीं है किसी भी बयान पर मीडिया का दोहरा रवैया अपना लेना. देखने में आ रहा है कि मीडिया परिवार इस समय मीडिया से ज्यादा राजनीति सी करने में लगे हैं. अपने आपको एक राजनैतिक दल की तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं. केंद्र की भाजपा सरकार के सामने विपक्ष की भांति खड़े हुए हैं. खड़े भी होना चाहिए, आखिर मीडिया ने, पत्रकारिता ने स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ घोषित किया है. इसके बाद भी उसके द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रसित पत्रकारिता देखने को मिल रही है. अभी हाल ही में भाजपा के एक नेता जी के बयान पर हो-हल्ला हुआ. एक दलित महिला के अपमान की बात उठी, उन पर आरोप तय किये गए, जेल भेजा गया, जमानत हुई और इन सबमें मीडिया ने बड़ी तन्मयतापूर्ण भूमिका का निर्वहन किया. अब जबकि मामला शांत है, उसी मीडिया ने जरा भी नहीं सोचा कि जिस बयान के द्वारा इतना हो-हल्ला मचा उसी बयान में बसपा की मुखिया पर टिकट बेचने का आरोप लगाया गया था. क्या मीडिया की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वो इस आरोप के सम्बन्ध में भी तन्मयता दिखाती, तत्परता दिखाती?


देश भर में मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाई दलों द्वारा इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि भाजपा के द्वारा सिर्फ और सिर्फ गलत ही किया जा रहा है. हाल ही में अभिनेत्री के बयान को तवज्जो देने वाली मीडिया, संघ प्रमुख के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली मीडिया जेएनयू के बलात्कारी छात्र नेता वाले प्रकरण पर खामोश रही. किसी राजनैतिक दल की तरफ से कोई बयान नहीं आया. किसी मीडिया मंच ने इस पर आन्दोलन सा खड़ा नहीं किया. जबकि यही मीडिया, यही राजनैतिक दल कश्मीर के आतंकवादी के मारे जाने पर हुए उपद्रव को ऐसे तूल देने में लगे हैं जैसे देश में एकमात्र मुद्दा यही है. मीडिया को तथा राजनैतिक दलों को समझना होगा कि अनर्गल प्रसारण से वे भाजपा का नहीं देश का नुकसान कर रहे हैं. देशवासियों को खतरे में डाल रहे हैं. 

21 जुलाई 2014

इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता और पत्रकारों को संभलने की आवश्यकता



संसाधनों के विकसित होते जाने से प्रसार माध्यमों ने भी लगातार विकास किया है. सूचनाओं के आदान-प्रदान में सहजता हुई है और पल भर में सुदूर देश की खबर हमारे सामने होती है. तकनीक के इस क्रांतिकारी विकास ने समूचे विश्व को एक गाँव में बदल कर रख दिया है. आज धरातलीय दूरियों का एहसास उस समय होता है जबकि हम व्यक्तिगत रूप से प्रत्यक्ष में एक-दूसरे से मिलने की आकांक्षा रखते हैं अन्यथा की स्थिति में लाखों-लाख किमी की दूरी भी कम महसूस होने लगी है. संचार माध्यमों की विकसित अवस्था ने जहाँ हमें प्रचार-प्रसार का उन्नत साधन उपलब्ध करवाया है वहीं इसके साये में काम कर रहे कुत्सित मानसिकता वालों ने इसे नकारात्मकता के साथ प्रयोग कर इसकी उपयोगिता पर ही सवाल उठा दिया है. संचार के इन माध्यमों में आज इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को, इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता को प्रमुखता के साथ देखा जा सकता है.
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इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता ने पत्र माध्यम की और रेडिओ की पत्रकारिता से कई कदम आगे आकर अपने श्रोताओं को खबरों के साथ, घटनाओं के साथ साक्षात् जुड़ने का मंच प्रदान किया. पत्रकारिता के माध्यमों में एकाएक उत्कर्ष प्राप्त कर लेने से इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के लिए कार्य कर रहे चैनलों, व्यक्तियों ने मुखरता से भी एक कदम आगे जाकर स्वयंभू ठेकेदार बनने का काम करना शुरू कर दिया. अपनी अहमियत को जानकर, समझकर इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने खुद को ही अंतिम सत्य, अंतिम निष्कर्ष के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. आज भी शायद ही कोई नागरिक होगा जो आरुषि हत्याकांड के समय इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, चैनलों, पत्रकारों द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग को भुला पाया हो. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जुड़े पत्रकार खुद को पत्रकार से ऊपर ले जाकर किसी जांच एजेंसी की तरह व्यवहार करने लगे थे. ग्राफिक्स की मदद से बनाये जाते आकलन, निकाले जाते निष्कर्ष से समूचे केस को एक झटके में ही हल कर दिया था जबकि साक्ष्यों की कहानी कुछ और कह रही है. इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता का विद्रूप भरा चेहरा उस समय भी सामने आया जबकि इनके पत्रकार मुम्बई पर आतंकी हमले और किसी समय सीमा पर चल रही गोलाबारी की लाइव रिपोर्टिंग कर दुश्मनों को हमारे सैनिकों की स्थिति की पल-पल की खबर (भले ही अनजाने में ही सही) भेजते रहे.
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अब इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के ये पत्रकार, एंकर इससे भी आगे बढ़कर खुद ही अंतिम निष्कर्ष निकालने वाले बन गए हैं. किसी भी विषय पर बहस, चर्चा के दौरान; किसी घटना की लाइव कवरेज के दौरान; किसी खबर के प्रसारण के समय इनके द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग महज खबर सुनाने वाली, जानकारी देने वाली नहीं होती बल्कि सामने वाले के मुँह में अपने शब्द ठूँसने की, सिर्फ अपनी ही बात कहने की, बात-बात पर झल्लाने की होती है. संभवतः जिस तरह की पत्रकारिता के बारे में आजतक पढ़ा-सुना है, ये वैसी तो नहीं है. पत्रकारिता जगत में आते हैं एक सामान्य से व्यक्ति में एक अजब तरह का गुरूर अपने आप जन्म ले लेता है, जो इलेक्ट्रॉनिक चैनलों, माध्यमों के पत्रकारों में और भी तीव्रतम रूप से प्रकट होता है. ये समझ से परे है कि आखिर पत्रकारिता जो समाज-शासन-प्रशासन के मध्य एक तरह के पुल का काम करती है उसमें कार्य करते पत्रकारों में अहंकार का भाव किसके लिए और क्यों पैदा हो जाता है? टीवी पर दिखाई देने के कारण एक अतिरिक्त भाव से लोगों से प्रश्नों का पूछना, अपनी बात को ही अंतिम सत्य बताकर दूसरे के विचारों पर थोपना, किसी भी दल, व्यक्ति, विचार के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होना किसी भी रूप में पत्रकारिता के अंतर्गत नहीं आता है. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की निरंतर बढ़ती जा  ये निरंकुशता जहाँ एक तरह पत्रकारिता के मूल्यों को नुकसान पहुँचा रही है वहीं दूसरी तरफ समाज के लिए भी घातक है. संभवतः हमारे पाठक-श्रोता और खुद मीडिया से जुड़े लोग विगत दिनों एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल के पत्रकारों की करतूत को भूले नहीं होंगे. इलेक्ट्रॉनिक चैनल को, पत्रकारों को, इनके मालिकों को संभलने की आवश्यकता है; प्रेस कौंसिल जो जागरूक होने की जरूरत है; मंत्रालय को सचेत होने की जरूरत है.  
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