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02 नवंबर 2016

समाजवादी परिवार का लाभ अखिलेश के पार्टी बनाने में निहित है

उत्तर प्रदेश विगत कुछ समय से जिस तरह से सरकार और एक परिवार के आपसी विवाद का चल रहा है वो चुनावी वर्ष में क सोची-समझी रणनीति समझ आ रही है. समाजवादी पार्टी के वर्तमान विवाद को जिस तरह से पारिवारिक विवाद के साथ-साथ संगठन और सरकार का विवाद दिखाया जा रहा है, असलियत उससे कहीं अलग है. समूचा घटनाक्रम इस तरह से सामने लाया जा रहा है कि देखने वाले को ये चाचा-भतीजा, बाप-बेटे, भाई-भाई का विवाद समझ आये. यदि गम्भीरता से समाजवादी पार्टी की सरकार के वर्तमान कार्यकाल, उसकी कार्यशैली, मंत्रियों से लेकर सामान्य कार्यकर्त्ता के कार्यों का आकलन, अध्ययन किया जाये तो सहज रूप में इस विवाद के पीछे बहुत कुछ दिखाई दे जाता है. लगभग एक माह पहले स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा भ्रष्टाचार के चलते एक मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से बाहर करने के साथ-साथ अपने ही चाचा शिवपाल यादव के समस्त विभागों को छीन लिया गया था. उसके बाद के नाटकीय घटनाक्रम के पश्चात् न केवल शिवपाल यादव के तमाम विभागों की वापसी हुई वरन मुख्यमंत्री द्वारा बर्खास्त किये गए मंत्री की भी मंत्रिमंडल में वापसी हुई. ये अपने आपमें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत दुखद एवं शर्मनाक पहलू था कि मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त किये गए व्यक्ति की वापसी उसे दोषमुक्त करवाने के बजाय सड़कों पर उतर कर करवाई गई. 



उस शर्मनाक अवसर के गवाह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बने और उन्होंने अपनी लोकप्रियता के ग्राफ में कुछ गिरावट अवश्य ही महसूस की. उस मौके पर अखिलेश यादव को माननीय राज्यपाल महोदय को अपना इस्तीफ़ा सौंपकर विधानसभा भंग करके चुनाव की सिफारिश कर देनी चाहिए थी. यही वो बिंदु था जो न केवल उनकी राजनैतिक छवि को और मजबूत करता वरन कहीं न कहीं उन्हीं के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की नैया भी पार लगा सकता था. लेकिन चूक हो चुकी थी. समाजवादी सरकार के विगत साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल पर जनता की असंतुष्टि की खबर समाजवादी आलाकमान के पास न हो, ऐसा संभव नहीं. ऐसे में समाजवादी पार्टी आलाकमान की तरफ से इस भूल सुधार करने के अलावा और कोई चारा बचता भी नहीं था. विवाद के ऊपरी-ऊपरी सिरों को न देखते हुए उसके सूक्ष्म तत्त्व पर निगाह डाली जाये तो बहुत कुछ स्वतः स्पष्ट सा होता दिखता है.

सबसे पहले शिवपाल यादव का अचानक ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना आश्चर्य का विषय है. सरकारी स्तर पर देखा जाये तो उनके द्वारा इधर ऐसा कौन सा अपराध किया गया था जिसके चलते उनको बर्खास्त किया गया? इस बर्खास्तगी के साथ अन्य चार की बर्खास्तगी भी सवालिया निशान लगाती है. ऐसे में विवाद के पूर्वनियोजित होने का आभास होता है. इस आभास को तब और बल मिलता है, जबकि खुद मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व में हटाये गए मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल में यथावत रखा जाता है. राजनैतिक विश्लेषकों के लिए ये अपने आपमें शोध, चुनौती का विषय होना चाहिए कि आखिर इसके पीछे की समूची राजनीति आखिर है क्या? और यदि है भी तो क्यों?

उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति जनता में एक तरह की असंतुष्टि, एक तरह की नाराजगी, एक तरह का आक्रोश है. इसके पीछे उसके कार्यों से ज्यादा मंत्री स्तर से लेकर कार्यकर्त्ता स्तर तक की कार्यशैली जिम्मेवार है. इसके बाद भी जनमानस में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रति सहानुभूति की लहर है. लोगों में ऐसा विश्वास है कि वे युवा होने के नाते अच्छा काम कर सकते थे किन्तु पारिवारिक और पार्टी के बुजुर्गों के दवाब में ऐसा नहीं कर सके. पार्टी आलाकमान कहीं न कहीं जनता की इस सहानुभूति को अपने पक्ष में वोट के रूप में परिवर्तित करना चाहता है. हालिया विवाद इसी पृष्ठभूमि से निकल कर सामने खड़ा हुआ है. पिछले स्वर्णिम अवसर कर की गई चूक की भरपाई के साथ-साथ आम जनमानस में अखिलेश के प्रति संवेदनात्मक वातावरण का निर्माण भी अदृश्य रूप से किया जा रहा है. इसी रणनीति के अंतर्गत अखिलेश का लालन-पालन उनकी बुआ के द्वारा किया जाना, स्वयं उन्हीं के द्वारा अपना नाम रखना, सौतेली माता का अपने पुत्रमोह में होना, चाचा शिवपाल यादव से नाराजगी आदि विषयों को इसी समय उठाया गया है. एक ऐसी पार्टी जिसकी कार्यशैली को लेकर जनमानस में नाराजगी, असंतुष्टि है उसके पदाधिकारी, आलाकमान ठीक चुनावों के समय इस तरह सार्वजनिक रूप से विवाद पैदा कर रहे हैं, ये सोचने का विषय है.

समाजवादी पार्टी में किसी वजह से आंतरिक कलह मची हुई हो, उनके पारिवारिक सदस्यों में किसी तरह का मनमुटाव हो इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है किन्तु वे सब अपने इसी विवाद के द्वारा उत्तर प्रदेश की चुनावी वैतरणी को पार करने का मन बना चुके हैं. ऐसा इसलिए कि यदि समाजवादी पार्टी इस विवाद के साथ चुनावों में उतरती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, अखिलेश यादव के साथ-साथ रामगोपाल यादव, अमर सिंह, आजम खान जैसे दिग्गजों के अपने-अपने गुट बदला लेने की भावना के साथ भितरघात का काम करें. सम्भावना इसकी भी प्रबल है कि मतदाता समाजवादी पार्टी को नकारते हुए किसी दूसरी पार्टी के प्रति अपना विश्वास व्यक्त करे. ऐसे आशंकित वातावरण में यदि अखिलेश यादव नई पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में उतारते हैं तो उनके ज्यादा सफल होने की सम्भावना है. इसके पीछे का कारण जनमानस में उनके प्रति विश्वास होना.

जैसा कि अभी तक की स्थितियाँ सामने हैं, उसे देखकर वर्तमान संकट पूर्वनियोजित लग रहा है और यदि वाकई ऐसा है तो अखिलेश के नई पार्टी बना लेने से समाजवादी पार्टी को किसी भी रूप में नुकसान नहीं होने वाला है. नई पार्टी बनाये जाने से जहाँ समाजवादी का वो परंपरागत मतदाता जो मुलायम सिंह के नाम पर एकजुट होता है वो निश्चित रूप से समाजवादी पार्टी को ही वोट करेगा. ऐसा मतदाता जो समाजवादी पार्टी की वर्तमान कार्यप्रणाली से असंतुष्ट है वो तथा ऐसा मतदाता जो अखिलेश के प्रति सहानुभूति रखता है वो निश्चित रूप से अखिलेश के पक्ष में मतदान करेगा. इसके अलावा अखिलेश के नई पार्टी बनाये जाने से उन मतदाताओं को किसी तरह की समस्या महसूस नहीं होगी जो मुलायम सिंह को, समाजवादी पार्टी को कारसेवकों पर गोलियाँ चलाये जाने का दोषी मानते हैं.

ज़ाहिर है कि ऐसी स्थितियों के कारण यदि अखिलेश तीन अंक में सीट जीत ले जाते हैं तो यकीनन सत्ता के दावेदारों में शामिल हो सकते हैं. युवा, स्वस्थ सोच, स्वतंत्र निर्णय लेने की सम्भावना, समाजवादी के तथा परिवार के बुजुर्गों के नियंत्रण से बाहर रहने, विकास के प्रति नजरिया आदि होने के चलते उन्हें अन्य दूसरे दलों का समर्थन भी मिल सकता है. इसके साथ-साथ यदि वर्तमान संकट पारिवारिक स्तर पर नियोजित है तो फिर समाजवादी पार्टी का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष समर्थन भी उनके लिए संजीवनी का काम कर सकता है.

वर्तमान हालात में इस समूचे विवाद को पारिवारिक तौर पर नियोजित कहने का एक और आधार बनता है और वो है बहुजन समाज पार्टी को सत्ता से दूर करने की मानसिकता. देश में, प्रदेश में राजनैतिक उठापटक का, राजनैतिक स्वार्थ का कैसा भी माहौल क्यों न बना हो किन्तु गेस्ट हाउस कांड के बाद से समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के बीच, मुलायम सिंह, मायावती के बीच किसी तरह के राजनैतिक सुलह-समझौते के आसार शून्य ही हैं. ऐसे में समाजवादी किसी भी रूप में नहीं चाहेगी कि उनकी नाकामी का, उनके प्रति जनता के आक्रोश का, नाराजगी का लाभ किसी भी रूप में बहुजन समाज पार्टी को मिले. इस दृष्टि से भी वर्तमान संकट को पूर्वनियोजित माना जा सकता है.


फ़िलहाल तो समाजवादी पार्टी में समझौते जैसे कोई आसार दिख नहीं रहे हैं. भले ही मुलायम सिंह ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बने रहने के संकेत कर दिए हैं किन्तु जिस तरह से उन्होंने अमर सिंह, शिवपाल यादव का समर्थन किया है उससे स्पष्ट है कि ये झींगामुश्ती बहुत लम्बे समय तक नहीं चलेगी. इस विवाद के सहारे पार्टी आलाकमान अपने मंत्रियों, विधायकों, कार्यकर्ताओं, मतदाताओं का लिटमस टेस्ट भी कर ले रहा है. जिसके आधार पर चुनाव से पहले अखिलेश के प्रति जन्मी मतदाताओं की, जनता की सहानुभूति को वोट में परिवर्तित किया जायेगा, भले ही इसके लिए परदे के पीछे से अखिलेश को नई पार्टी बनाये जाने के रास्ते क्यों न खोले जाएँ. 

27 अक्टूबर 2016

नियोजित विवाद का लाभ समाजवादी परिवार को ही

समाजवादी पार्टी के वर्तमान विवाद जिस तरह से पारिवारिक विवाद के साथ-साथ संगठन और सरकार का विवाद दिखाया जा रहा है, असलियत उससे कहीं अलग समझ आती है. प्रथम दृष्टया देखने पर ऐसा ही प्रतीत हो रहा है जैसे कि ये मंत्रियों का, मंत्रिमंडल का, सरकार का विवाद न होकर विशुद्ध पारिवारिक विवाद है. समूचा घटनाक्रम इस तरह से सामने लाया जा रहा है कि देखने वाले को ये चाचा-भतीजा, बाप-बेटे, भाई-भाई का विवाद समझ आये. यदि गम्भीरता से समाजवादी पार्टी की सरकार के वर्तमान कार्यकाल, उसकी कार्यशैली, मंत्रियों से लेकर सामान्य कार्यकर्त्ता के कार्यों का आकलन, अध्ययन किया जाये तो सहज रूप में इस विवाद के पीछे बहुत कुछ दिखाई दे जाता है. लगभग एक माह पहले स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा भ्रष्टाचार के चलते एक मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से बाहर करने के साथ-साथ अपने ही चाचा शिवपाल यादव के समस्त विभागों को छीन लिया गया था. उसके बाद के नाटकीय घटनाक्रम के पश्चात् न केवल शिवपाल यादव के तमाम विभागों की वापसी हुई वरन मुख्यमंत्री द्वारा बर्खास्त किये गए मंत्री की भी मंत्रिमंडल में वापसी हुई. ये अपने आपमें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत दुखद एवं शर्मनाक पहलू था कि मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त किये गए व्यक्ति की वापसी उसे दोषमुक्त करवाने के बजाय सड़कों पर उतर कर करवाई गई.


उस शर्मनाक अवसर के गवाह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बने और उन्होंने अपनी लोकप्रियता के ग्राफ में कुछ गिरावट अवश्य ही महसूस की. उस मौके पर अखिलेश यादव को माननीय राज्यपाल महोदय को अपना इस्तीफ़ा सौंपकर विधानसभा भंग करके चुनाव की सिफारिश कर देनी चाहिए थी. यही वो बिंदु था जो न केवल उनकी राजनैतिक छवि को और मजबूत करता वरन कहीं न कहीं उन्हीं के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की नैया भी पार लगा सकता था. लेकिन चूक हो चुकी थी. समाजवादी सरकार के विगत साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल पर जनता की असंतुष्टि की खबर समाजवादी आलाकमान के पास न हो, ऐसा संभव नहीं. ऐसे में समाजवादी पार्टी आलाकमान की तरफ से इस भूल सुधार करने के अलावा और कोई चारा बचता भी नहीं था. ऐसे में शिवपाल यादव का अचानक ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना आश्चर्य का विषय है. उनके द्वारा इधर ऐसा कौन सा अपराध किया गया था जिसके चलते उनको बर्खास्त किया गया? इस बर्खास्तगी के साथ अन्य चार की बर्खास्तगी भी सवालिया निशान लगाती है. विवाद के नियोजित होने के आभास को तब और बल मिलता है, जबकि खुद मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व में हटाये गए मंत्री गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल में यथावत रखा जाता है.

उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति जनता में एक तरह की असंतुष्टि, एक तरह की नाराजगी, एक तरह का आक्रोश है. इसके पीछे उसके कार्यों से ज्यादा मंत्री स्तर से लेकर कार्यकर्त्ता स्तर तक की कार्यशैली जिम्मेवार है. इसके बाद भी जनमानस में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के प्रति सहानुभूति की लहर है. लोगों में ऐसा विश्वास है कि वे युवा होने के नाते अच्छा काम कर सकते थे किन्तु पारिवारिक और पार्टी के बुजुर्गों के दवाब में ऐसा नहीं कर सके. पार्टी आलाकमान कहीं न कहीं जनता की इस सहानुभूति को अपने पक्ष में वोट के रूप में परिवर्तित करना चाहता है. हालिया विवाद इसी पृष्ठभूमि से निकल कर सामने खड़ा हुआ है. पिछले स्वर्णिम अवसर कर की गई चूक की भरपाई के साथ-साथ आम जनमानस में अखिलेश के प्रति संवेदनात्मक वातावरण का निर्माण भी अदृश्य रूप से किया जा रहा है. इसी रणनीति के अंतर्गत अखिलेश का लालन-पालन उनकी बुआ के द्वारा किया जाना, स्वयं उन्हीं के द्वारा अपना नाम रखना, सौतेली माता का अपने पुत्रमोह में होना, चाचा शिवपाल यादव से नाराजगी आदि विषयों को इसी समय उठाया गया है.

जैसा कि अभी तक की स्थितियाँ सामने हैं, उसे देखकर वर्तमान संकट पूर्वनियोजित लग रहा है और यदि वाकई ऐसा है तो अखिलेश के नई पार्टी बना लेने से समाजवादी पार्टी को किसी भी रूप में नुकसान नहीं होने वाला है. नई पार्टी बनाये जाने से जहाँ समाजवादी का वो परंपरागत मतदाता जो मुलायम सिंह के नाम पर एकजुट होता है वो निश्चित रूप से समाजवादी पार्टी को ही वोट करेगा. ऐसा मतदाता जो समाजवादी पार्टी की वर्तमान कार्यप्रणाली से असंतुष्ट है वो तथा ऐसा मतदाता जो अखिलेश के प्रति सहानुभूति रखता है वो निश्चित रूप से अखिलेश के पक्ष में मतदान करेगा. इसके अलावा अखिलेश के नई पार्टी बनाये जाने से उन मतदाताओं को किसी तरह की समस्या महसूस नहीं होगी जो मुलायम सिंह को, समाजवादी पार्टी को कारसेवकों पर गोलियाँ चलाये जाने का दोषी मानते हैं. यदि अखिलेश ऐसी स्थितियों में सीट जीत ले जाते हैं तो यकीनन सत्ता के दावेदारों में शामिल हो सकते हैं. युवा, स्वस्थ सोच, स्वतंत्र निर्णय लेने की सम्भावना, समाजवादी के तथा परिवार के बुजुर्गों के नियंत्रण से बाहर रहने, विकास के प्रति नजरिया आदि होने के चलते उन्हें अन्य दूसरे दलों का समर्थन भी मिल सकता है. इसके साथ-साथ यदि वर्तमान संकट पारिवारिक स्तर पर नियोजित है तो फिर समाजवादी पार्टी का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष समर्थन भी उनके लिए संजीवनी का काम कर सकता है.

फ़िलहाल तो समाजवादी पार्टी में समझौते जैसी स्थिति के बाद भी समझौते के आसार दिख नहीं रहे हैं. भले ही मुलायम सिंह ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बने रहने के संकेत कर दिए हैं किन्तु जिस तरह से उन्होंने अमर सिंह, शिवपाल यादव का समर्थन किया है उससे स्पष्ट है कि ये झींगामुश्ती बहुत लम्बे समय तक नहीं चलेगी. इस विवाद के सहारे पार्टी आलाकमान अपने मंत्रियों, विधायकों, कार्यकर्ताओं, मतदाताओं का लिटमस टेस्ट भी कर ले रहा है. जिसके आधार पर चुनाव से पहले अखिलेश के प्रति जन्मी मतदाताओं की, जनता की सहानुभूति को वोट में परिवर्तित किया जायेगा, भले ही इसके लिए परदे के पीछे से अखिलेश को नई पार्टी बनाये जाने के रास्ते क्यों न खोले जाएँ.



10 अक्टूबर 2016

चूके सुधार के बड़े अवसर से

चार वर्ष पहले जब युवा मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश सत्ता में आये तो लगभग सभी ने ऐसा मान लिया था कि प्रदेश की भलाई से सम्बंधित कुछ कार्य अवश्य ही सामने आयेंगे. ऐसा उनके युवा, जागरूक, उच्च शिक्षित होने के कारण हुआ था. तब पारिवारिक सहमति से उनके मुख्यमंत्री बनने को जनता ने अहमियत न देकर उनको हर्ष के साथ स्वीकार किया था. समाजवादी पार्टी की आधारभूत छवि से इतर उनके बयानों में एक गंभीर प्रशासनिक पद की छाप स्पष्ट रूप से दिखती थी. उनके कार्यों का केंद्र बहुतायत में उनका गृहनगर भले ही रहा हो मगर बहुतायत योजनाओं, कार्यों में प्रदेश की जनता को लाभ भी मिला. गृहनगर के कार्यों की आलोचनाओं के बीच उन्हें अन्य कार्यों के लिए जबरदस्त प्रशंसा ही मिली. लैपटॉप का वितरण हो, लखनऊ मेट्रो मामला हो, कन्या धन वितरण हो, समाजवादी पेंशन हो सभी में उनकी दूरगामी सोच की तारीफ की गई. समय बीतता रहा, कार्य होते रहे मगर इसके बाद भी युवा मुख्यमंत्री अपने परिवार और पार्टी के बुजुर्गजनों के नियंत्रण में ही कार्य करते से नजर आये. अधिसंख्यक मामलों में उनको अपने इन बुजुर्गों के सामने असहाय सा देखा-पाया गया. ऐसी स्थिति के बाद भी आशान्वित लोग ये मान रहे थे कि नवोन्मेषी होने के कारण वे किंचित असहाय से भले ही दिख रहे हों किन्तु असफल नहीं हैं. उसके पीछे का एक कारण अखिलेश का हँसमुख दिखना, मेलजोल वाला व्यक्तित्व समझ आने के साथ-साथ उनकी तरफ से आते बयानों में गंभीरता दिखाई देती थी. 


इधर विगत डेढ़-दो वर्षों से उनकी कार्यशैली देखने के बाद लगने लगा था जैसे कि वे इन वरिष्ठजनों की प्रेतच्छाया से बाहर आने को व्याकुल हैं. उनके कार्यों, उनकी प्रशासनिक क्षमता, कार्यशैली, बयानों के आधार पर महसूस किया जा रहा था जैसे कि वे इन बुजुर्गों के नियंत्रण में परिपक्व ही हुए हैं. विधानसभा चुनावों की आहट को भली-भांति महसूस कर रहे प्रदेश में यदि नजर दौड़ाई जाये तो अखिलेश यादव के अलावा कोई और व्यक्ति मुख्यमंत्री पद के योग्य दिखाई भी नहीं दे रहा है. ऐसा सिर्फ सपा में ही नहीं वरन सभी दलों में है. किसी के पास वर्तमान में ऐसा कोई चेहरा नहीं जो मुख्यमंत्री के तौर पर निर्विवाद रूप से स्वीकार्य हो. ऐसे में न केवल सपा पक्षधर लोगों की तरफ से वरन गैर- समाजवादी दलों के समर्थकों की तरफ से भी ऐसी चर्चाएँ होने लगी थीं कि प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश तो अच्छा काम कर रहे हैं बस वे अपने पिता-चाचा की छाया से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. कहीं न कहीं खुले स्वरों में, दबे स्वरों में इसकी चर्चा आम हो गई थी कि अखिलेश अपने बुजुर्गों के नियंत्रण में पूरी तरह से हैं और वे लोग ही उन्हें खुलकर काम नहीं करने दे रहे हैं.

ऐसी नियंत्रण की स्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट अखिलेश में देखने को मिली. चुनावी वर्ष में उनके द्वारा कार्यों का लेखा-जोखा बेहतर तरीके से सामने लाया जाने लगा. विगत कई वर्षों की जातिवादी राजनीति, समर्थकों की गुंडई, जबरिया कब्जे की घटनाओं के बीच खिसकते जनाधार को वापस लाने की कवायद उनके द्वारा की जाने लगी थी. सपा मुखिया मुलायम सिंह द्वारा समय-समय पर मंत्रियों, समर्थकों, कार्यकर्ताओं को सीख देने वाली भाषा में उनके द्वारा की जाने वाली विसंगतियों का स्वीकार्य छिपा होने के बाद भी अखिलेश ने समूचे मामलों को बड़ी ही सहजता से निपटाने का प्रयास किया. इसी बनाव-बचाव की स्थिति के बीच अचानक तूफ़ान सा आ खड़ा हुआ, जिसने न केवल समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह को सामने रखा, न केवल उनके पारिवारिक मतभेद को उजागर किया बल्कि अखिलेश की छवि को भी तार-तार किया. विगत कुछ समय से दो-दो, चार-चार घटनाओं के सहारे सामने आता सपा का मामला किसी से छिपा नहीं है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि कहीं न कहीं पार्टी स्तर पर अखिलेश की बढ़ती छवि को ही कम करने या कहें कि समाप्त करने की कोशिश की गई है.

पहले मुख़्तार अंसारी के दल का विलय रोकना फिर दागी मंत्री को बाहर का रास्ता दिखाना इस बात की पैरवी कर रहा था कि अखिलेश कुछ अच्छा करने की कोशिश में हैं, भले ही ये कोशिश चुनावों को देखते हुए है. ऐसे सशक्त क़दमों के उठाये जाने के तत्काल बाद उनको प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया जाना, फिर उसके बाद के नाटकीय घटनाक्रम के पश्चात् न केवल उनके चाचा के समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन वरन उस दागी मंत्री की वापसी होना अखिलेश के कद को ही कम करता है. अखिलेश समर्थकों को पार्टी से जुड़े तमाम पदों, संगठनों से हटाया गया. उनके समर्थक एमएलसी हटाये गए. वर्चस्व दिखाए जाने का ये खेल महज इतने पर ही नहीं रुका. जिस दल का विलय अखिलेश नहीं चाहते थे, उस दल का विलय हुआ. दागी मंत्री की न केवल वापसी हुई वरन दोबारा मंत्री भी बनाया गया. इसके बाद भी अखिलेश शांत क्यों बने रहे. क्या अपने पिता मुलायम के आदेश के चलते? क्या पिता की कतिपय अंदरूनी मजबूरियों के चलते? क्या अपने परिवार की इज्जत की खातिर? इस बिंदु पर अखिलेश को समझना चाहिए कि वे किसी एक परिवार के मुख्यमंत्री नहीं हैं वरन पूरे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. जहाँ किसी मुख्यमंत्री के पास इतनी शक्ति, इतने अधिकार नहीं कि वह अपने मंत्रिमंडल के भ्रष्ट मंत्री को बाहर का रास्ता दिखा सके तो उसका मुख्यमंत्री बने रहना सवालिया निशान है. समाजवादी की गिरती छवि के बीच अखिलेश की अपनी छवि, अपनी लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ था जो इस प्रकरण के बाद पूरी तरह से विलुप्त हो गया है. समूचे प्रदेशवासियों के बीच एक सन्देश स्पष्ट रूप से चला गया कि वे तमाम सारे निर्णय लेने के बाद भी अपने परिजनों के, वरिष्ठ पार्टीजनों के नियंत्रण में हैं.

जिस समय शिवपाल और उनके समर्थकों द्वारा सड़क पर शक्ति प्रदर्शन किया जा रहा था, उनकी वापसी के साथ-साथ रामगोपाल, अमर सिंह को बाहर किये जाने के नारे लग रहे थे, चाय के साथ वार्ताओं के दौर चल रहे थे, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सरगर्मियाँ बढ़ी हुई थीं. लेने-छोड़ने के दावे किये जा रहे थे तभी अखिलेश को कठोर और सशक्त कदम उठाये जाने की जरूरत थी. परिवार की एकता के लिए, पिता की इज्जत के लिए उनका खामोश रहना भले ही तारीफ काबिल कदम हो किन्तु एक मुख्यमंत्री के नाते, उच्च प्रशासनिक दायित्व के चलते निकाले गए दागी मंत्री की वापसी, वापस लिए गए पदों की बहाली किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है. इससे बेहतर होता कि अखिलेश मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर सूबे में चुनाव की माँग कर देते. आज नहीं तो कल चुनाव तो होना ही है, पर अखिलेश के त्यागपत्र से उनकी लोकप्रियता, कद में जबरदस्त वृद्धि हो जाती. आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर मिले अपने पिता मुलायम के बँगले को छोड़कर दूसरे बँगले में अखिलेश का जाना स्पष्ट करता है कि सबकुछ सही नहीं हुआ है. कुछ इसी तरह से पद छोड़कर अखिलेश बहुत कुछ सही करने का सन्देश अवश्य दे सकते थे. प्रदेश को, लोकतंत्र विरोधियों को, अपने विरोधियों को एक सार्थक सन्देश देने में अखिलेश चूक कर गए. हो सकता है कि इस चूक की कीमत उन्हें भी आगामी विधानसभा चुनावों में उठानी पड़ जाये.