हमारा प्यारा तिरंगा....
26 जनवरी 2024
राष्ट्रीय पर्व हमेशा से जन-जन में
राष्ट्रभक्ति का उफान लाते रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस,
नागरिकों का जोश, उत्साह, उमंग देखने लायक होता है. देशभक्ति के रंग में सराबोर
होकर उनके द्वारा अपने आसपास के वातावरण को भी देशभक्तिमय बनाने का प्रयास होता
है. इसमें भी तिरंगा सबसे ऊँचे स्थान पर विराजमान होता है. इसके प्रति सम्मान
प्रदर्शित करने में आम आदमी किसी भी तरह की कंजूसी नहीं करता है, किसी भी तरह का
संकोच नहीं करता है. खुद को, अपने घर को, कार्यालय को, वाहन को या कोई भी सामान को
वह तिरंगे में रँगे देखना चाहता है. रंगीन झालरों से, कपड़ों से, रंगों से वह अपने
आसपास का वातावरण तिरंगा जैसा बना देता है.
इस तरह के प्रदर्शन में प्रशासन भी पीछे नहीं
रहता है. उसके स्तर पर जहाँ भी, जैसे भी होता है माहौल को देशभक्ति से भरपूर करने
के प्रयास किये जाते हैं. शहर भर को तीन रंगों में सजाने का अभियान सा चल पड़ता है.
चौराहों को, सरकारी भवनों को, कार्यालयों को, सड़कों पर लगे बिजली के खम्बों को,
जगह-जगह लगी लाइट को उसके द्वारा तीन रंग में चमकाने के कदम उठाये जाने लगते हैं.
देशभक्ति के इस जोश में अक्सर कुछ बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. तिरंगे के
प्रति सम्मान, देशभक्ति का जूनून इस कदर हावी होता है कि छोटी-मोटी गलती को न देखा
जाता है और न ही उस पर ध्यान दिया जाता है.
उरई शहर के एक चौराहे को, जहाँ कि रानी
लक्ष्मीबाई की प्रतिमा लगी हुई है, प्रशासन द्वारा तीन रंगों में सजाने का काम किया
गया. सम्बंधित कार्यालय के कर्मी दत्तचित्त होकर चौराहे को सजाने में लगे रहे. तीन
रंग के कपड़ों से चौराहे को सजाया गया, इसके अलावा बिजली वाली झालर को भी तीन रंग
में संयोजित करके रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को चमकाने-सजाने का काम किया गया. एक
तरफ काम पूरा करने का दबाव और दूसरी तरफ देशभक्ति का जोश, कर्मचारियों ने इसका
ध्यान ही नहीं दिया कि बिजली की जिन तीन रंगों की झालरों से रानी लक्ष्मीबाई की
प्रतिमा को सजाने का काम किया जा रहा, उन झालरों को उनके हाथ का सहारा देकर ही
चारों तरफ फैलाया गया है.
निश्चित ही किसी भी कर्मचारी द्वारा ऐसा
जानबूझकर नहीं किया गया होगा मगर उनको कम से कम इसका ध्यान रखना चाहिए था कि
देशभक्ति के जोश में जिन वीर-वीरांगनाओं के नाम की जय-जयकार की जा रही है, उनके
प्रति तो सम्मान बनाये रखा जाये. बिजली की उन झालरों को फ़ैलाने के लिए रानी
लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के हाथ का सहारा लेने के स्थान पर उसके आसपास कोई खम्बा
अथवा कोई सहारा लगा दिया जाता.
स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले
से सबका प्रिय तिरंगा फहराया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी
थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के
लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव
में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार
मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही.
यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा.
आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.
आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है.
हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से
देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली
बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे
नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार
आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी
स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ
ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर
कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की
आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी
अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध
होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल
स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों
की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की
कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो
गये हैं.
इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज
भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों
का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी
हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल
ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक
समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत
पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल
परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट
देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.
अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों
का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने
देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर
पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों
को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके
बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं की, दुष्कर्म
की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी
संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को
पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी
किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते
हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने
हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को
पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.
देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली
अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉल, जगमगाते शहर, मैट्रो, मल्टीस्टोरीज, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा
भूखा है, एक भी बच्चा अशिक्षित है, एक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य
नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा
भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगा, जब तक विदेशी
ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगे, जब तक राजनीति में
तुष्टिकरण हावी रहेगा, जब तक लोकतन्त्र के स्थान पर
राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगे, जब तक
गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगा, जब
तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगी, जब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगा, जब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को
वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं
इस समस्या का? इन सबका हल है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा.
आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर
सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे
करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें
सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं
के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के
हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम
देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने
प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व
से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से
निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.
राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहीं भी लहरा रहा हो, किसी भी आकार का हो हमें व्यक्तिगत रूप से बहुत आकर्षित करता है. किसी भी
जगह पर लहराते, फहराते ध्वज को देखकर लगता है कि बस उसे
देखते रहा जाये. दिल-दिमाग जैसे झंकृत होते रहते हैं और मन मंत्रमुग्ध सा होकर बस
उसे ही देखता रहता है. किसी समय में राष्ट्रीय ध्वज का लहराना-फहराना सिर्फ
राष्ट्रीय पर्वों पर ही होता था और वो भी शासकीय भवनों,
इमारतों पर. कालांतर में कुछ कानूनी विषयों के उठाये जाने के बाद आम आदमी को भी
ध्वज फहराने का अधिकार मिला. सरकारी इमारतों के साथ-साथ निजी भवनों में राष्ट्रीय
ध्वज को फहराए जाने की छूट मिली. इसी क्रम में देश के विभिन्न शहरों में पार्कों
में, किसी विशाल जगह पर, मुख्य स्थलों
पर बड़े-बड़े ऊँचे पोल के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का भव्य स्वरूप लहराता-फहराता दिखाई
देने लगा.
बरसों पहले राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का भव्य, मनमोहक रूप में फहराना दिल्ली में राजीव चौक पर देखा था. उससे पहले इतने
विशालकाय तिरंगे को कहीं फहराते हुए नहीं देखा था. लगभग डेढ़ सौ फीट ऊँचे पोल पर
विशालकाय तिरंगा का फहराना देखकर एक पल को हम सम्मोहन की स्थिति में आ गए थे. किस
काम से वहाँ आना हुआ है, भूलकर उस भव्य स्वरूप को अपने कैमरे
में कैद करने लगे थे. उसे देखकर मन में विचार आया था कि क्या इस तरह विशाल स्वरूप
तिरंगा हमारे उरई में नहीं फहराया जा सकता? क्या इसके लिए
स्थानीय स्तर पर पहल नहीं की जा सकती है? इस बारे में कई बार
चर्चा हुई, सम्बंधित व्यक्तियों तक अपनी बात पहुंचाई गई.
अनेक बार तमाम सारी बैठकों, मीटिंगों में तिरंगा शहर में
लगाये जाने सम्बन्धी बातें उठीं मगर कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका.
आज, दोपहर बाद महाविद्यालय
से वापसी हो रही थी. मौसम बहुत सुहाना बना हुआ था. हलकी-हलकी हवा भी चल रही थी. जिसे
गुलाबी सर्दी कहा जाता है, उसका एहसास हो रहा था. उसी गुलाबी
एहसास में एकदम से खुली आँखों के सामने स्वप्न सा तैर गया. बादलों भरे आसमान में
तिरंगा शान से लहरा रहा था. एक पल को विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा उरई में देखने को
मिल रहा है. स्कूटर सी दिशा में मोड़ दिया. सामने वास्तविकता होने के बाद भी
वास्तविकता स्वीकार सी नहीं हो रही थी. फिलहाल, सबकुछ भूल कर
अपनी पूरी भव्यता के साथ लहराते तिरंगे को कैमरे में, दिल
में कैद करने लगे.
राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा उरई शहर के टाउन हॉल परिसर
में सौ फीट ऊँचे पोल पर पूरी आन-बान-शान के साथ लहरा रहा था. उसके लगाये जाने के
पीछे की कहानी की यहाँ चर्चा करना उचित नहीं. उस समय जानकारी हुई कि अभी उसके
आसपास रौशनी बनाये रखने की दृष्टि से लाइट लगाये जाने का काम चल रहा है, जो देर रात तक पूरा होगा. रात को दस बजे के आसपास सौ फीट ऊँचाई पर लहराते
तिरंगे को रौशनी में रखने के लिए उसके चारों तरफ लाइट को व्यवस्थित करने का काम
पूरा हो सका. तिरंगे का या कहें कि अपने शहर में विशाल तिरंगे को फहराते देखने की
अभिलाषा के पूरा होने का सम्मोहन था कि रौशनी में जगमगाते देखने की मंशा लेकर रात
दस बजे भी तिरंगे के दर्शन करने पहुँच गए.
स्थानीय जिम्मेवार लोगों के द्वारा यह पुनीत कार्य करवाया जा रहा है, सो सम्बंधित व्यक्तियों से जान-पहचान भी थी. इसी के चलते लाइट की व्यवस्था सम्बन्धी कुछ स्पेशल टिप्स भी दे डाले, जिनको माना भी गया. चारों तरफ से पड़ती रौशनी में तिरंगा अपनी आभा को बिखेरने में लगा था. किसी समय दिल्ली के राजीव चौक पर लहराते तिरंगे को देखकर मन में उपजी अभिलाषा आज पूरी हुई. उरई शहरवासियों के लिए यह गौरव का विषय है, अब हम भारतीयों की शान, गर्व के प्रतीक तिरंगे की आन-बान-शान की रक्षा करना, उसकी देखभाल करने का दायित्व समस्त उरईवासियों का है.
ओलम्पिक के चलते रोज ही अनेकानेक फोटो देखने को मिल रही हैं जहाँ कि खिलाड़ी तिरंगे के साथ खड़े हुए हैं. उनको देखकर अपने आपमें ही गर्व की अनुभूति होती है. वैसे शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे तिरंगा देखकर गर्व की, गौरव की अनुभूति न होती होगी. सभी के साथ इससे जुड़े अनेक किस्से होंगे. तिरंगे के साथ की तमाम कहानियाँ हम सभी आये दिन सुनते रहते हैं जो हमें ऊर्जा से भरती हैं.
उस दिन हम दिल्ली में मेट्रो की पहली बार सवारी
कर रहे थे. उसके पहले दो-चार बार दिल्ली से ट्रेन से गुजरने के दौरान मेट्रो के
दर्शन हुए थे मगर उसमें बैठने का सुख प्राप्त नहीं हुआ था. वर्ष 2014 में एक
इंटरनेशनल सेमिनार में सहभागिता के लिए दिल्ली जाना हुआ था. उसी समय मेट्रो में
सफ़र का आनंद भी लिया. नोयडा से अपनी छोटी बहिन के साथ, गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन से बैठे थे राजीव चौक के लिए. किसी समय कनॉट प्लेस के नाम से जाने जाना वाला
स्थान अब राजीव चौक के नाम से जाना जाता है.
राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरने के पहले
प्लेटफ़ॉर्म से हमें छोटी बहिन द्वारा मोबाइल के द्वारा लगातार गाइड किया जा रहा
था. उसे डर लग रहा था कि कहीं हम मेट्रो स्टेशन की भीड़ में कहीं भटक न जाएँ. किस
प्लेटफ़ॉर्म से कहाँ को जाना है और फिर कहाँ से, किस तरफ के
रास्ते से बाहर जाना है, यह उसके द्वारा लगातार बताया जा रहा
था. हमने उससे फोन पर कहा भी कि गुड़िया, हम इतने छोटे नहीं कि खो जाएँ और फिर कहीं
भटकने की स्थिति में किसी से पूछ लेंगे. इसके बाद भी वो लगातार हमें मार्गदर्शन
देती रही, आखिर उसे जानकारी थी कि हम पहली बार मेट्रो की
सवारी कर रहे हैं.
बहरहाल, राजीव चौक मेट्रो
स्टेशन से बाहर निकले तो वहाँ की धूप से आँखें कम चकाचौंध हुईं, अपनी आँखों के सामने बड़ा सा तिरंगा लहराते देख ज्यादा चमक उठीं. जैसे
पहली बार मेट्रो देख कर आँखें चमकी थीं, वैसे ही पहली बार
इतना बड़ा तिरंगा लहराते देख कर बच्चों जैसी स्थिति हो रही थी. ये भूलकर कि हम किस
काम से राजीव चौक पर आये हैं, मोबाइल निकालकर तिरंगे के
लहराने को कैद करने लगे. वीडियो बनाते समय, फोटो खींचते समय
ध्यान दिया कि पहले वहाँ कोई भी ऐसा नहीं कर रहा था, शायद
संकोच रहा होगा मगर अब कई लोग ऐसा करने में लगे थे. कुछ लोगों की फोटो भी फिर हमने
खींची.
उस बड़े से तिरंगे के लहराने को अपने दिल में
बसा कर हम अपने गंतव्य की तरफ चल दिए जहाँ हमारे मित्र हमारा इंतजार कर रहे थे.