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26 जनवरी 2024

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व : हमारा प्यारा तिरंगा


तिरंगा हम सबकी शान है. उन्मुक्त गगन में लहराते तिरंगे को नमन करने के साथ ही याद आया अपना लेखकीय तिरंगा. ये वो तिरंगा है जो हमें ताकत देता है, सच कहने की, असत्य के खिलाफ लिखने की, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की. 

इस तिरंगे को भी नमन. 

हमारी शान, हमारी ताकत, हमारा गर्व
हमारा प्यारा तिरंगा.... 
❤ ❤ ❤
26 जनवरी 2024


13 अगस्त 2023

सम्मान बचा रहे वीर-वीरांगनाओं का

राष्ट्रीय पर्व हमेशा से जन-जन में राष्ट्रभक्ति का उफान लाते रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस हो या फिर गणतंत्र दिवस, नागरिकों का जोश, उत्साह, उमंग देखने लायक होता है. देशभक्ति के रंग में सराबोर होकर उनके द्वारा अपने आसपास के वातावरण को भी देशभक्तिमय बनाने का प्रयास होता है. इसमें भी तिरंगा सबसे ऊँचे स्थान पर विराजमान होता है. इसके प्रति सम्मान प्रदर्शित करने में आम आदमी किसी भी तरह की कंजूसी नहीं करता है, किसी भी तरह का संकोच नहीं करता है. खुद को, अपने घर को, कार्यालय को, वाहन को या कोई भी सामान को वह तिरंगे में रँगे देखना चाहता है. रंगीन झालरों से, कपड़ों से, रंगों से वह अपने आसपास का वातावरण तिरंगा जैसा बना देता है. 




इस तरह के प्रदर्शन में प्रशासन भी पीछे नहीं रहता है. उसके स्तर पर जहाँ भी, जैसे भी होता है माहौल को देशभक्ति से भरपूर करने के प्रयास किये जाते हैं. शहर भर को तीन रंगों में सजाने का अभियान सा चल पड़ता है. चौराहों को, सरकारी भवनों को, कार्यालयों को, सड़कों पर लगे बिजली के खम्बों को, जगह-जगह लगी लाइट को उसके द्वारा तीन रंग में चमकाने के कदम उठाये जाने लगते हैं. देशभक्ति के इस जोश में अक्सर कुछ बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता है. तिरंगे के प्रति सम्मान, देशभक्ति का जूनून इस कदर हावी होता है कि छोटी-मोटी गलती को न देखा जाता है और न ही उस पर ध्यान दिया जाता है. 




उरई शहर के एक चौराहे को, जहाँ कि रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा लगी हुई है, प्रशासन द्वारा तीन रंगों में सजाने का काम किया गया. सम्बंधित कार्यालय के कर्मी दत्तचित्त होकर चौराहे को सजाने में लगे रहे. तीन रंग के कपड़ों से चौराहे को सजाया गया, इसके अलावा बिजली वाली झालर को भी तीन रंग में संयोजित करके रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को चमकाने-सजाने का काम किया गया. एक तरफ काम पूरा करने का दबाव और दूसरी तरफ देशभक्ति का जोश, कर्मचारियों ने इसका ध्यान ही नहीं दिया कि बिजली की जिन तीन रंगों की झालरों से रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा को सजाने का काम किया जा रहा, उन झालरों को उनके हाथ का सहारा देकर ही चारों तरफ फैलाया गया है.




निश्चित ही किसी भी कर्मचारी द्वारा ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया होगा मगर उनको कम से कम इसका ध्यान रखना चाहिए था कि देशभक्ति के जोश में जिन वीर-वीरांगनाओं के नाम की जय-जयकार की जा रही है, उनके प्रति तो सम्मान बनाये रखा जाये. बिजली की उन झालरों को फ़ैलाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा के हाथ का सहारा लेने के स्थान पर उसके आसपास कोई खम्बा अथवा कोई सहारा लगा दिया जाता. 


(चित्र लेखक द्वारा स्वयं निकाले गए हैं. @13-08-2023)



 

14 अगस्त 2022

तिरंगे को सच्ची सलामी कब?

स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया थातब हवा हमारी थीपानी हमारा थाजमीं हमारी थीआसमान हमारा था. सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी. पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी. स्वभाव में अभिमान था. स्वर में प्रसन्नता थी. सिर गर्व से ऊँचा उठा था. समय बदलता गयापरिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहाहर वर्ष फहराया जाता रहा. सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा. गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा. आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही. यह एहसास साल दर साल कम होता रहा. सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा. आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई.


आज समूचा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. हर देशवासी आज हर घर तिरंगा के माध्यम से अपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान और आदर से देख रहा है. इसके बाद भी कई बार लगता है कि कुछ न कुछ कमी सी हम सबके आसपास है. पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे. अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्रचारित्रिक पतन को दिखा रहा है. पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारीबेबसीहताशाभयआतंकअविश्वास आदि के हैं. सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है. हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है.


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेलेवतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे. इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रताखुलकर घूमने की आजादीअपना स्वरूप तय करने की आजादी. हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर. राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है. ये सब एकाएक नहीं हो गया हैदरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लियाजिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति हैशहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह हैआजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक है. ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दताउच्शृंखलता आदि बना हुआ हैआजादी के गीतराष्ट्रगीतवन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं.




इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है. कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैंकभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है. हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं. हमारी गुरुकुल परम्परा एकदम से विलुप्त ही हो गई है. गुरु-शिष्य के संबंधों में भी लगातार गिरावट देखने को मिलने लगी. ये किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए.


अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमाउनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं. हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है. अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं कीदुष्कर्म की खबरें आ रही हैं. हमने औद्योगीकरणउपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकेंपेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये. बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं. मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं. हाथों में औजार थामे नजर आते . अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये.


देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं. मॉलजगमगाते शहरमैट्रोमल्टीस्टोरीजशॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं. जब तक एक भी बच्चा भूखा हैएक भी बच्चा अशिक्षित हैएक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं. हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है. जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगाजब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगेजब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगाजब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगेजब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगाजब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगीजब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगाजब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं.


ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या काइन सबका हल हैमगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा. आपसी विभेद को समाप्त करना होगा. वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज काअपने परिवार का विकास कैसे करेगाबच्चे हमारे भविष्य का आधार हैंयदि वे ही अशिक्षितभूखेअस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है. याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैंनागरिक किसी भी धर्म के होंकिसी भी जाति के होंकिसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश केइस सोच के द्वारा हम विकास कीएकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं. यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगादृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगेजयहिन्दवन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा.

 




 

01 दिसंबर 2021

उरई टाउन हॉल परिसर में विशाल तिरंगा : वीडियो

उरई (जालौन) टाउन हॉल परिसर में विशाल तिरंगा 
01.12.2021




 


उरई में फहराया विशालकाय तिरंगा

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा कहीं भी लहरा रहा हो, किसी भी आकार का हो हमें व्यक्तिगत रूप से बहुत आकर्षित करता है. किसी भी जगह पर लहराते, फहराते ध्वज को देखकर लगता है कि बस उसे देखते रहा जाये. दिल-दिमाग जैसे झंकृत होते रहते हैं और मन मंत्रमुग्ध सा होकर बस उसे ही देखता रहता है. किसी समय में राष्ट्रीय ध्वज का लहराना-फहराना सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों पर ही होता था और वो भी शासकीय भवनों, इमारतों पर. कालांतर में कुछ कानूनी विषयों के उठाये जाने के बाद आम आदमी को भी ध्वज फहराने का अधिकार मिला. सरकारी इमारतों के साथ-साथ निजी भवनों में राष्ट्रीय ध्वज को फहराए जाने की छूट मिली. इसी क्रम में देश के विभिन्न शहरों में पार्कों में, किसी विशाल जगह पर, मुख्य स्थलों पर बड़े-बड़े ऊँचे पोल के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का भव्य स्वरूप लहराता-फहराता दिखाई देने लगा.


बरसों पहले राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का भव्य, मनमोहक रूप में फहराना दिल्ली में राजीव चौक पर देखा था. उससे पहले इतने विशालकाय तिरंगे को कहीं फहराते हुए नहीं देखा था. लगभग डेढ़ सौ फीट ऊँचे पोल पर विशालकाय तिरंगा का फहराना देखकर एक पल को हम सम्मोहन की स्थिति में आ गए थे. किस काम से वहाँ आना हुआ है, भूलकर उस भव्य स्वरूप को अपने कैमरे में कैद करने लगे थे. उसे देखकर मन में विचार आया था कि क्या इस तरह विशाल स्वरूप तिरंगा हमारे उरई में नहीं फहराया जा सकता? क्या इसके लिए स्थानीय स्तर पर पहल नहीं की जा सकती है? इस बारे में कई बार चर्चा हुई, सम्बंधित व्यक्तियों तक अपनी बात पहुंचाई गई. अनेक बार तमाम सारी बैठकों, मीटिंगों में तिरंगा शहर में लगाये जाने सम्बन्धी बातें उठीं मगर कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका.


आज, दोपहर बाद महाविद्यालय से वापसी हो रही थी. मौसम बहुत सुहाना बना हुआ था. हलकी-हलकी हवा भी चल रही थी. जिसे गुलाबी सर्दी कहा जाता है, उसका एहसास हो रहा था. उसी गुलाबी एहसास में एकदम से खुली आँखों के सामने स्वप्न सा तैर गया. बादलों भरे आसमान में तिरंगा शान से लहरा रहा था. एक पल को विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा उरई में देखने को मिल रहा है. स्कूटर सी दिशा में मोड़ दिया. सामने वास्तविकता होने के बाद भी वास्तविकता स्वीकार सी नहीं हो रही थी. फिलहाल, सबकुछ भूल कर अपनी पूरी भव्यता के साथ लहराते तिरंगे को कैमरे में, दिल में कैद करने लगे.




राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा उरई शहर के टाउन हॉल परिसर में सौ फीट ऊँचे पोल पर पूरी आन-बान-शान के साथ लहरा रहा था. उसके लगाये जाने के पीछे की कहानी की यहाँ चर्चा करना उचित नहीं. उस समय जानकारी हुई कि अभी उसके आसपास रौशनी बनाये रखने की दृष्टि से लाइट लगाये जाने का काम चल रहा है, जो देर रात तक पूरा होगा. रात को दस बजे के आसपास सौ फीट ऊँचाई पर लहराते तिरंगे को रौशनी में रखने के लिए उसके चारों तरफ लाइट को व्यवस्थित करने का काम पूरा हो सका. तिरंगे का या कहें कि अपने शहर में विशाल तिरंगे को फहराते देखने की अभिलाषा के पूरा होने का सम्मोहन था कि रौशनी में जगमगाते देखने की मंशा लेकर रात दस बजे भी तिरंगे के दर्शन करने पहुँच गए.




स्थानीय जिम्मेवार लोगों के द्वारा यह पुनीत कार्य करवाया जा रहा है, सो सम्बंधित व्यक्तियों से जान-पहचान भी थी. इसी के चलते लाइट की व्यवस्था सम्बन्धी कुछ स्पेशल टिप्स भी दे डाले, जिनको माना भी गया. चारों तरफ से पड़ती रौशनी में तिरंगा अपनी आभा को बिखेरने में लगा था. किसी समय दिल्ली के राजीव चौक पर लहराते तिरंगे को देखकर मन में उपजी अभिलाषा आज पूरी हुई. उरई शहरवासियों के लिए यह गौरव का विषय है, अब हम भारतीयों की शान, गर्व के प्रतीक तिरंगे की आन-बान-शान की रक्षा करना, उसकी देखभाल करने का दायित्व समस्त उरईवासियों का है. 





27 जुलाई 2021

पहली बार देखा इतना बड़ा तिरंगा

 ओलम्पिक के चलते रोज ही अनेकानेक फोटो देखने को मिल रही हैं जहाँ कि खिलाड़ी तिरंगे के साथ खड़े हुए हैं. उनको देखकर अपने आपमें ही गर्व की अनुभूति होती है. वैसे शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे तिरंगा देखकर गर्व की, गौरव की अनुभूति न होती होगी. सभी के साथ इससे जुड़े अनेक किस्से होंगे. तिरंगे के साथ की तमाम कहानियाँ हम सभी आये दिन सुनते रहते हैं जो हमें ऊर्जा से भरती हैं.


उस दिन हम दिल्ली में मेट्रो की पहली बार सवारी कर रहे थे. उसके पहले दो-चार बार दिल्ली से ट्रेन से गुजरने के दौरान मेट्रो के दर्शन हुए थे मगर उसमें बैठने का सुख प्राप्त नहीं हुआ था. वर्ष 2014 में एक इंटरनेशनल सेमिनार में सहभागिता के लिए दिल्ली जाना हुआ था. उसी समय मेट्रो में सफ़र का आनंद भी लिया. नोयडा से अपनी छोटी बहिन के साथ, गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन से बैठे थे राजीव चौक के लिए. किसी समय कनॉट प्लेस के नाम से जाने जाना वाला स्थान अब राजीव चौक के नाम से जाना जाता है.


राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरने के पहले प्लेटफ़ॉर्म से हमें छोटी बहिन द्वारा मोबाइल के द्वारा लगातार गाइड किया जा रहा था. उसे डर लग रहा था कि कहीं हम मेट्रो स्टेशन की भीड़ में कहीं भटक न जाएँ. किस प्लेटफ़ॉर्म से कहाँ को जाना है और फिर कहाँ से, किस तरफ के रास्ते से बाहर जाना है, यह उसके द्वारा लगातार बताया जा रहा था. हमने उससे फोन पर कहा भी कि गुड़िया, हम इतने छोटे नहीं कि खो जाएँ और फिर कहीं भटकने की स्थिति में किसी से पूछ लेंगे. इसके बाद भी वो लगातार हमें मार्गदर्शन देती रही, आखिर उसे जानकारी थी कि हम पहली बार मेट्रो की सवारी कर रहे हैं.




बहरहाल, राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले तो वहाँ की धूप से आँखें कम चकाचौंध हुईं, अपनी आँखों के सामने बड़ा सा तिरंगा लहराते देख ज्यादा चमक उठीं. जैसे पहली बार मेट्रो देख कर आँखें चमकी थीं, वैसे ही पहली बार इतना बड़ा तिरंगा लहराते देख कर बच्चों जैसी स्थिति हो रही थी. ये भूलकर कि हम किस काम से राजीव चौक पर आये हैं, मोबाइल निकालकर तिरंगे के लहराने को कैद करने लगे. वीडियो बनाते समय, फोटो खींचते समय ध्यान दिया कि पहले वहाँ कोई भी ऐसा नहीं कर रहा था, शायद संकोच रहा होगा मगर अब कई लोग ऐसा करने में लगे थे. कुछ लोगों की फोटो भी फिर हमने खींची.


उस बड़े से तिरंगे के लहराने को अपने दिल में बसा कर हम अपने गंतव्य की तरफ चल दिए जहाँ हमारे मित्र हमारा इंतजार कर रहे थे.

29 जनवरी 2020

शहीदों का सम्मान बचाये रहना भी है श्रद्धांजलि


गणतंत्र दिवस हो या फिर स्वतंत्रता दिवस, इन राष्ट्रीय पर्वों पर दिल-दिमाग पर एक अजब तरह की खुमारी चढ़ी रहती है. ऐसे माहौल में, जबकि देह का रोम-रोम देशभक्ति के एहसास में डूबा रहता है किसी भी देशभक्त के प्रति अनादर जैसी स्थिति देख मन विचलित हो जाता है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी उस समय हुआ जबकि अपनी नियमित संध्या घुमक्कड़ी में बाजार में टहलना हो रहा था. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शहर को तिरंगे से सजाया जा रहा था. कहीं कपड़ों के द्वारा सजावट हो रही थी तो कहीं गुब्बारों के द्वारा तो कहीं बिजली की झालरें तीन रंग बिखेरने में लगी थीं. आज़ादी के मतवालों को याद करते हुए, मन ही मन में देशभक्ति के तराने गुनगुनाते हुए जैसे ही रानी लक्ष्मीबाई चौराहे के नजदीक पहुँचना हुआ तो दिमाग एकदम से झनझना उठा.


रानी लक्ष्मीबाई की मूर्ति जी घेरे के भीतर लगी हुई थी, उसे तिरंगे कपड़ों से सजाया गया था. चारों तरफ से झालरनुमा सजावट करने के प्रयास में तिरंगे कपड़ों को रानी लक्ष्मीबाई के बांये हाथ पर आकर तमाम कपड़े बाँध दिए गए थे. अपनी कतिपय शारीरिक दिक्कतों के चलते वहाँ तक पहुँच कर उन गाँठों को खोल पाना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था. उरई नगर पालिका परिषद् की ओर से ये सजावट करवाई जा रही थी. रात के लगभग नौ बजने को आये थे. कुछ जिम्मेवार लोगों को फोन करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए कहा कि आवश्यक नहीं कि इन क्रांतिकारियों की तरह कोई क्रांति ही करो मगर कम से कम इनका सम्मान तो करते रहो. गुस्सा इसलिए भी था क्योंकि कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक सजावट के क्रम में रानी झाँसी के घोड़े की पूँछ को किसी खूंटे की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था, अबकी ऐसा बर्ताव रानी झाँसी के हाथ के साथ किया गया.


फिलहाल, कुछ फोन, सोशल मीडिया पर फोटो के लगाने और थोड़ी सी भागदौड़ के बाद उस विचित्र सी स्थिति को सुधार दिया गया. आज़ादी के लिए अपनी जान की परवाह न करने वाले इन शहीदों का सम्मान बचा रहे,यही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.



30 दिसंबर 2018

पहली अंतरिम सरकार के मुखिया द्वारा राष्ट्र ध्वज फहराना


व्यावहारिक रूप से हमने भले ही आज़ादी सन 1947 में पाई हो मगर हम एक तरह से  30 दिसंबर 1943 को ही आजाद हो गए थे. यह दिन शायद बहुत से देशवासियों को स्मरण भी न हो मगर सत्य यही है कि इसी दिन इस देश के एक क्रांतिकारी बेटे ने स्वतंत्र भारत के रूप में राष्ट्र ध्वज फहराया था. देश के जन-जन में बसे महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सबसे पहले अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्र ध्वज फहराया था. नेताजी देश की तत्कालीन पहली अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में राष्ट्रध्वज के वाहक बने थे.


इसके बाद कतिपय स्थितियाँ ऐसी बनी कि नेताजी की सेना अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल न हो सकी. खुद नेता जी के अस्तित्व को लेकर सवाल अभी तक खड़े होते रहे. ऐसे ही अनेक कारणों-कारकों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत से अंग्रेजी शासन का अंत हुआ. देश की बागडोर हमारे राजनेताओं के हाथों में आ गई. हम सभी देशवासी इस दिन को पूरी श्रद्धा और देशभक्ति के साथ मनाते हैं.  अपने उन अनेकानेक वीर सपूतों को याद करते हैं जिनकी कुर्बानी से हमें आजादी मिली. इसके बाद भी कहीं न कहीं हम सभी नेता जी के योगदान को विस्मृत कर देते हैं. अंग्रेजों की कैद से निकल कर विदेश जाना और वहाँ पहुँच कर तमाम देशों के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन करना अपने आपमें अभूतपूर्व कार्य था. एक-दो नहीं वरन एशिया के अनेक देशों के सहयोग से नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन किया. सन 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी सेना के साथ जापानी सेना का युद्ध चल रहा था. जापानी पूरे उत्साह के साथ नेताजी की आजाद हिंद सेना का सहयोग कर रहे थे. अंग्रेजों से लड़ते हुए जापानी सेना 1942 में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक आ पहुंची और 23 मार्च 1942 को जापानी सेना ने अंडमान के द्वीपों पर कब्जा कर वहां से अंग्रेजी सेना को खदेड़ दिया. 25 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने भी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी. तब तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरिम आजाद हिंद सरकार का गठन कर चुके थे. जापानियों के साथ नेताजी के संबंध बहुत ही घनिष्ठ बन चुके थे. अंडमान-निकोबार पर जापानियों का कब्जा हो चुका था. ऐसा सन्देश मिलते ही नेताजी ने अंडमान-निकोबार द्वीपों का दौरा करने का निश्चय किया. 

नेताजी से प्रभावित होकर तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने 07 नवंबर 1943 को अंडमान-निकोबार द्वीपों को नेताजी की अंतरिम सरकार को सौंप दिया. इसके बाद नेताजी ने 30 दिसंबर 1943 को पहली बार अंडमान-निकोबार की धरती पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया. उन्होंने ने केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराया बल्कि इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज रखा. आज भी पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान को अब नेताजी स्टेडियम के नाम से जाना जाता है, यहाँ पर तिरंगा फहराने के बाद नेताजी ने वहां के क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सिपाहियों तथा जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि हिंदुस्तान की आजादी की जो गाथा अंडमान की भूमि से शुरू हुई है वह दिल्ली में वायसराय के घर पर तिरंगा फहराने के बाद ही रुकेगी.  वर्तमान में भारत सरकार द्वारा एक स्मारक का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहाँ कि नेताजी ने तिरंगा फहराया था. इस स्थान पर प्रतिवर्ष 30 दिसंबर को स्थानीय प्रशासन द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पोर्ट ब्लेयर जैसे छोटे से शहर में इस मौके पर हजारों की भीड़ का जुटना इसका परिचायक है कि अंडमान-निकोबार के निवासी सारे नेताजी को बहुत आदर के साथ याद करते हैं.

21 अक्टूबर 2018

देश की पहली सरकार की स्मृति और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस


21 अक्टूबर का दिन देश के लिए ऐतिहासिक दिन है. इसे महज इसलिए याद नहीं किया जाना चाहिए कि इस दिन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया. यह आज़ाद देश में पहली बार है जबकि 21 अक्टूबर को किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा फहराया. आज का दिन इसलिए गर्व का दिन है क्योंकि आज आज़ाद हिन्द सरकार की 75वीं वर्षगाँठ है. यह उन लोगों के लिए अवश्य ही कौतूहल भरी बात होगी जिन्हें देश का इतिहास नहीं मालूम. नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर 1943 को नेता जी के द्वारा आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई.


कोलकाता में अपने घर पर ही नजरबन्द किये गए नेता जी 18 जनवरी 1941 को गायब होकर काबुल होते हुए जर्मनी पहुँच गए. वहां पहुँच उन्होंने हिटलर से मुलाकात की. वहीं सरदार अजीत सिंह ने उन्हें आज़ाद हिन्द लश्कर के बारे में बताकर इसे और व्यापक रूप देने को कहा. इसके साथ-साथ जापान में रासबिहारी बोस द्वारा बनाये आजाद हिन्द संघ का 1942 में एक सम्मेलन हुआ. इसमें रासबिहारी बोस ने जापान शासन की सहमति से नेताजी को आमन्त्रित किया. मई 1943 में जापान आकर नेताजी ने प्रधानमन्त्री जनरल तोजो से भेंट कर अंग्रेज़ों से युद्ध की अपनी योजना पर चर्चा की. नेताजी ने एक समारोह में 60,000 लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा- यह सेना न केवल भारत को स्वतन्त्रता प्रदान करेगी, अपितु स्वतन्त्र भारत की सेना का भी निर्माण करेगी. हमारी विजय तब पूर्ण होगी, जब हम ब्रिटिश साम्राज्य को दिल्ली के लाल क़िले में दफना देंगे. आज से हमारा परस्पर अभिवादन जय हिन्द और हमारा नारा दिल्ली चलो होगा. उन्होंने 4 जुलाई 1943 को तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा का उद्घोष किया. इसके बाद 21 अक्टूबर 1943 ई० को नेता जी ने सिंगापुर में अस्थायी भारत सरकार आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की. सुभाषचन्द्र बोस इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष तीनों बने. वित्त विभाग एस० सी० चटर्जी को, प्रचार विभाग एस० ए० अय्यर को तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया. 

आज़ाद हिन्द फ़ौज का प्रतीक चिह्न झंडे पर दहाड़ता हुए बाघ का चित्र था. क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा इस संगठन का वह गीत बना, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे. नेता जी द्वारा अस्थायी सरकार का गठन कर लेना जितना महत्त्वपूर्ण था उतना महत्त्वपूर्ण उस सरकार को अन्य देशों द्वारा मान्यता देना भी रहा. जर्मनी, जापान तथा उनके समर्थक अनेक देशों द्वारा आज़ाद हिन्द सरकार को मान्यता प्रदान की गई. सिंगापुर और रंगून में आज़ाद हिन्द फ़ौज का मुख्यालय बनाया गया. कालांतर में आज़ाद हिन्द फ़ौज और सरकार का अंतिम परिणाम वह नहीं रहा जो नेता जी ने सोच रखा था. बावजूद इसके उनकी सेना और सरकार की जबरदस्त उपस्थिति के चलते भी अंग्रेजो में खलबली मच गई थी. जिसके चलते उन्हें देश से भागने का विचार करना पड़ा. आज़ाद भारत का ध्वज नेता जी लाल किले पर लहराता हुआ देखना चाहते थे. संदिग्ध परिस्थितियों के चलते भले ही वे प्रत्यक्ष में इस सपने को पूरा नहीं कर सके किन्तु उनके सपने को आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री द्वारा पूरा किया गया. यह नेता जी और उनके कर्तव्यनिष्ठ सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है. यह तथ्य अपने आपमें सत्य है कि आज़ाद भारत का पहला प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति कोई और है मगर इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजों की गुलामी के बीच पूरी हनक के साथ देश की सरकार स्थापित कर उसके पहले राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री के रूप में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को याद किया जायेगा.


आज, 21 अक्टूबर 2018 से एक नई परम्परा का सूत्रपात हुआ है. न केवल हमें बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इस दिन के बारे में, नेता जी के बारे में, अस्थायी सरकार गठन के बारे में, आज़ाद हिन्द फ़ौज के बारे में, फ़ौज के सेनानियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए.  

15 अगस्त 2018

सच्ची सलामी के इंतजार में है तिरंगा


स्वतंत्र भारत की पहली आधी रात को जब लाल किले से सबका प्रिय तिरंगा फहराया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था। सब कुछ हमारा था पर वहाँ उपस्थित जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र हवा में लहराते हुए अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन अवश्य था मगर उन सभी की आत्मा में दृढ़ता थी। स्वभाव में अभिमान था। स्वर में प्रसन्नता थी। सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा। गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा। आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। सलामी को उठते हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा। आँखों की नमी आँसुओं में बदल गई। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने थे। अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है। हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं। इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। 

अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमें अभी भी बालिका शिक्षा के लिए लोगों को जागरूक करना पड़ रहा है। अभी भी बेटियों को बचाने की गुहार लगानी पड़ रही है उसके बाद भी बालिका संरक्षण गृहों से यातनाओं की, दुष्कर्म की खबरें आ रही हैं। महिला सशक्तिकरण के आँकड़े दिखाए जा रहे हैं किन्तु एक लड़ाई तीन तलाक और हलाला के लिए भी लड़ी जा रही है। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। बच्चे अभी भी किताबों की जगह कूड़ा बीनने वाले झोले पकड़े दिखाई पड़ते हैं। मजदूरी करते दिखाई पड़ते हैं। हाथों में औजार थामे नजर आते । अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।

15 अगस्त 2016

तिरंगे को सच्ची सलामी अभी बाकी है

          जब पहली आधी रात को तिरंगा फहराया गया था, तब हवा हमारी थी, पानी हमारा था, जमीं हमारी थी, आसमान हमारा था तब भी जन-जन की आँखों में नमी थी। पहली बार स्वतन्त्र आबो-हवा में अपने प्यारे तिरंगे को सलामी देने के लिए उठे हाथों में एक कम्पन था मगर आत्मा में दृढ़ता थी, स्वभाव में अभिमान था, स्वर में प्रसन्नता थी, सिर गर्व से ऊँचा उठा था। समय बदलता गया, परिदृश्य बदलते रहे किन्तु तिरंगा हमेशा फहरता रहा, हर वर्ष फहराया जाता रहा। सलामी हर बार दी जाती रही किन्तु अहम् हर बार मरता रहा; गर्व से भरा सिर हर बार झुकता रहा; आत्मा की दृढ़ता हर बार कम होती रही। यह एहसास साल दर साल कम होता रहा। हाथों का कम्पन हर बार बढ़ता रहा; आँखों के आँसू हर बार तेजी से बहते रहे मगर कभी हमने हाथों के कम्पन को नहीं थामा, आँसुओं का बहना नहीं रोका; आँखों के आँसू नहीं पोंछे। पहली बार जब हाथ काँपे थे तो वे हमारे स्वाभिमान का परिचायक बने, अब यही कम्पन हमारे नैतिक चरित्र, चारित्रिक पतन को दिखा रहा है। पहली बार आँखों से बहते आँसू खुशी के थे मगर अब लाचारी, बेबसी, हताशा, भय, आतंक, अविश्वास आदि के हैं। सामने लहराता हमारा प्यारा तिरंगा हमसे हमारी स्वतन्त्रता का अर्थ पूछता है; हमसे हमारे शहीदों के सपनों का मर्म पूछता है।


          शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ ऐसा सोचकर ही हमारे वीर-बाँकुरों ने आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। इस महान सोच के बाद ही हमें प्राप्त हुई खुलकर हँसने की स्वतन्त्रता, खुलकर घूमने की आजादी, अपना स्वरूप तय करने की आजादी। हम आजाद तो हुए किन्तु विचारों की खोखली दुनिया को लेकर। राष्ट्रवाद जैसी अवधारणा अब हमें प्रभावित नहीं करती वरन् इसमें भी हमें साम्प्रदायिकता का बोध होने लगा है। यही कारण है कि आज हर ओर अराजकता का, हिंसा, अपराध, अत्याचार, भेदभाव आदि का बोलबाला दिख रहा है। ये सब एकाएक नहीं हो गया है, दरअसल स्वतन्त्र भारत के वक्ष पर एक ऐसी पीढ़ी ने जन्म ले लिया, जिसके लिए गुलामी एक कथा की भाँति है, शहीदों की शहादत उसके लिए गल्प की तरह है, आजादी के मतवालों की कुर्बानियाँ महज एक इत्तेफाक। ऐसी पीढ़ी के लिए आजादी का अर्थ स्वच्छन्दता, उच्शृंखलता आदि बना हुआ है; आजादी के गीत, राष्ट्रगीत, वन्देमातरम् इनके लिए आउटडेटेड हो गये हैं।

          आजाद भारत में लोकतन्त्र एक तरह की राजशाही में परिवर्तित होता चला जा रहा है। जनप्रतिनिधि अब जनता के सेवक से ज्यादा उनके हुक्मरान बनते जा रहे हैं। आजादी के दीवानों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि विकास के नाम पर सत्तासीन लोग समाज के विकास के स्थान पर अपनी पीढ़ियों का विकास करने में जुट जायेंगे; विकसित समाज की अवधारणा में आम आदमी को महत्व नहीं मिल पायेगा। यही कारण है कि समय-समय पर देश में अलगाववादी ताकतें, नक्सलवादी ताकतें अपना सिर उठाने लगती हैं। अपने अधिकारों की माँग करते-करते ये ताकतें आतंकवादी शक्तियों में परिवर्तित हो जाती हैं और देश में अराजकता को फैलाने लगती हैं।

          इक्कीसवीं सदी में खड़े हमारे आजाद देश के पास आज भी स्थिरता का अभाव सा दिखाई देता है। कभी हम अपने पड़ोसी देशों की कृत्सित नीतियों का शिकार बनते हैं, कभी हमें सीमापार से हो रहे आतंकी हमलों से बचना पड़ता है तो कभी यह आग हमारे ही घरों में लगी दिखाई देती है। हम मंगल ग्रह पर पानी और जीवन की आशा में करोड़ों रुपये का अभियान चलाकर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के सामने सीना ठोंकते हैं तो शिक्षा के नाम पर वैश्विक जगत में अभी भी बहुत पीछे होने के कारण शर्मिन्दा होते हैं। अपनी संस्कृति के साथ विश्व की तमाम संस्कृतियों का समावेश कर हम सांस्कृतिक प्रचारक-विचारक के रूप में विख्यात होते हैं तो अपने देश की महिलाओं की गरिमा, उनकी जान की सुरक्षा न कर पाने के चलते शर्म से सिर झुका बैठते हैं। हमने औद्योगीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हाथों में मोबाइल तो थमा दिये किन्तु शिक्षा के लिए हर हाथ को पुस्तकें, पेन्सिलें नहीं पकड़ा पाये। अभिजात्य वर्ग एवं पश्चिमीकरण की नकल में हमने हर हाथ को सस्ते दरों पर बीयर तो उपलब्ध करवा दी किन्तु बहुतायत में अपनी जनता को पीने का स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं करवा पाये।

          देखा जाये तो विकास के बाद भी हम विकास की खोखली अवधारणा को पोषित करते जा रहे हैं। मॉल, जगमगाते शहर, मैट्रो, मल्टीस्टोरीज, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि हमारी विकास की सफलता नहीं हैं। जब तक एक भी बच्चा भूखा है, एक भी बच्चा अशिक्षित है, एक भी बच्चा रोगग्रस्त है तब तक हम अपने को विकसित और आजाद कहने योग्य नहीं। हमें आजादी की परिभाषा को समझाने-समझने की जरूरत है। जब तक देश का युवा भटकता हुआ आतंक की शरण में जाता रहेगा, जब तक विदेशी ताकतों के द्वारा हम संचालित रहेंगे, जब तक राजनीति में तुष्टिकरण हावी रहेगा, जब तक लोकतन्त्र के स्थान पर राजशाही को स्थापित करने के प्रयास होते रहेंगे, जब तक गाँवों की उपेक्षा कर औद्योगीकरण किया जाता रहेगा, जब तक कृषि के स्थान पर मशीनों को प्राथमिकता प्रदान की जाती रहेगी, जब तक इंसान उपभोग की वस्तु के तौर पर देखा जाता रहेगा, जब तक हमारी जाति हमारी पहचान का साधन बनी रहेगी तब तक हम अपने को वास्तविक रूप में आजाद कहने के हकदार नहीं।

          ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर कोई हल नहीं इस समस्या का? है, मगर उसके लिए सत्ताधारियों के इंतजार के बजाय नागरिकों को ही आगे आना होगा। आपसी विभेद को समाप्त करना होगा। वैमनष्यता के चलते व्यक्ति अपना ही विकास नहीं कर सकता है तो वह समाज का, अपने परिवार का विकास कैसे करेगा? बच्चे हमारे भविष्य का आधार हैं, यदि वे ही अशिक्षित, भूखे, अस्वस्थ रहेंगे तो विकास की अवधारणा बेमानी है। याद रखना होगा कि जिन्हें सत्ता चाहिए वो हमारा ही उपयोग करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो क्या हम स्वयं के लिए अपना उपयोग कर अपना और अपने राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते हैं? नागरिक किसी भी धर्म के हों, किसी भी जाति के हों, किसी भी क्षेत्र के हों किन्तु देश हमारा है और हम देश के, इस सोच के द्वारा हम विकास की, एकता की राह पर आगे बढ़ सकते हैं। यदि ऐसा हम कर पाते हैं तो हम अपने प्यारे तिरंगे को सच्ची सलामी दे सकेंगे और एक बार फिर हमारा सिर उसके सामने गर्व से भरा होगा, दृढ़ता से हमारे हाथ उठे होंगे, जयहिन्द, वन्देमातरम् का घोष हमारे कंठों से निकलकर समूचे आसमान में गूँज उठेगा।


चित्र गूगल छवियों से साभार 

20 फ़रवरी 2016

तिरंगा, सैनिक हैं सम्मान के हकदार

कल्पना कीजिये उस क्षण की जबकि आपके आसपास गोलियाँ चल रही हों, बम के धमाके हो रहे हों और उसी समय आपका कोई साथी, जो एक पल पहले आपके साथ था, दुश्मन की गोली का शिकार हो जाता है. सोचकर देखिये वो दृश्य जबकि परिवार के बड़े-बुजुर्गों के सामने उस युवा का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा रखा हुआ है, जो कुछ दिनों पहले उनके सामने खेला-कूदा करता था. यकीनन आप किसी भी विचारधारा के हों मगर ऐसे दृश्य आपको भाव-व्हिवल कर देंगे. निश्चित ही ऐसे किसी भी दृश्य को याद करके आपके आँसू छलक उठेंगे. आँसू फिर छलके और इस बार उस व्यक्ति की आँख में छलके जिसने अपने जीवन में का-कई बार अपनी आँखों के सामने अपने साथियों को अंतिम विदा लेते देखा होगा; कई-कई बार अपने साथ हँसी-मजाक करने वाले साथियों को अपनी आँखों के सामने, अपने हाथों में शहीद होते देखा होगा. वो दृढशक्ति का प्रतीक, वो बहादुरी का प्रतीक, शौर्य का जीता-जागता उदाहरण कहे जाने वाले जर्नल बख्शी को समूचे देश ने आँसू छलकाते हुए देखा. उनकी बातों में, उनके आँसुओं में एक दर्द दिखाई दिया. उनका कहना कि हम सैनिक बहुत अकेले हो गए हैं नितांत सत्य के करीब है.

जेएनयू प्रकरण के बाद से देश में लगातार सामने आती देशहित की, देश-विरोधी बातों, घटनाओं के बीच यदि सरकारी स्तर पर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने की अनिवार्यता जैसी बात सामने आई है तो इसको जबरन तूल देने के बजाय स्वागत की दृष्टि से देखना चाहिए था. तिरंगे को फहराने के सम्बन्ध में जिस तरह से तर्क-कुतर्क किये जा रहे हैं, जिस तरह से सरकारी तानाशाही बताया जा रहा है, जिस तरह से सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया जा रहा है वो निंदनीय है. असल में भारतीय परिवेश में आरंभिक काल से ही तिरंगे को आम नागरिकों से बहुत दूर रखा गया. गिने-चुने अवसरों पर तिरंगा फहराने के अलावा सामान्यजन को तिरंगे से परिचित होने का अवसर ही प्रदान नहीं किया गया. भला हो नवीन जिंदल का जिन्होंने के अदालती लड़ाई के बाद आम नागरिक को भी तिरंगा फहराने का अधिकार दिलवाया. हमारे देश में इसके बाद भी तिरंगे को सार्वजनिक स्थलों पर, सार्वजनिक जीवन में सहज भाव से लहराते नहीं देखा गया. इससे सामान्यजन में तिरंगे के प्रति वो सम्मान का भाव जग ही नहीं सका जो होना चाहिए था. इसके बाद भी ये सत्य है कि तिरंगे का फहराया जाना आज भी लोगों में जोश, जूनून पैदा करता है. देश में होने वाले अनेकानेक आन्दोलन इसके गवाह हैं.


बहरहाल, जिस तरह से तिरंगा फहराए जाने को लेकर तर्क-वितर्क का दौर चल रहा है उससे यकीनन उन सभी लोगों को ठेस पहुंची होगी जो तिरंगे को अपनी आन-बान-शान समझते हैं. जर्नल बख्शी के आँसू अपने में बहुत बड़ी बात कह जाते हैं. तिरंगे के लिए अपने आपको न्योछावर करने वाले सैनिको से पूछिए कि तिरंगे को लेकर चलती अनर्गल बहस का क्या अर्थ है? जी तिरंगे को देखकर जोश उमड़ पड़ता हो उसके फहराए, न फहराए जाने को लेकर किये जा रहे विवाद से लगता ही है कि वे सैनिक आज अकेले पड़ गए हैं जो इसी तिरंगे के लिए अपना सबकुछ छोड़कर रणभूमि में जमे रहते हैं. तिरंगा फहराने को लेकर जबरिया विवाद उठाते लोग क्या बताएँगे कि अफज़ल के नाम पर तो देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रदर्शन होने लगते हैं, आयोजन होने लगते हैं मगर क्या वे एक पल को शहीद सैनिकों के लिए आयोजन भी करते हैं? ये अपने आपमें अत्यंत शर्मनाक है कि देश में तिरंगा फहराए जाने को लेकर विवाद हो रहा है. होना ये चाहिए था कि प्रत्येक शिक्षण संस्थान में, सार्वजनिक स्थलों पर, सरकारी कार्यालयों में, पार्कों आदि में तिरंगा अनिवार्य रूप से लहराता रहना चाहिए. इससे देश के व्यक्ति-व्यक्ति को तिरंगे से अपनत्व का भाव जागेगा, उसके साथ जुडाव महसूस होगा. तिरंगे पर विवाद पैदा करने वालों को ध्यान देना होगा कि ये विवाद महज देश के अन्दर ही नहीं वरन वैश्विक स्तर पर देखा जा रहा है, जो न केवल देश की वरन देशवासियों की छवि को ख़राब कर रहा है. हमारे जांबाज़ सैनिकों के प्रति असम्मान प्रकट कर रहा है. 

26 जनवरी 2014

भारतीय ध्वज की विकास-यात्रा और भारतीय ध्वज संहिता




भारतीय आन-बान-शान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज तीन रंगों से बना हुआ है इसी कारण इसे हम तिरंगा कह कर भी पुकारते हैं। ध्वज में सबसे ऊपर केसरिया रंग, बीच में सफ़ेद और सबसे नीचे गहरा हरा रंग समानुपातिक रूप में होता है। सफ़ेद पट्टी में बीचों-बीच गहरे नीले रंग का एक चक्र भी बना होता है, जिसको सारनाथ में स्थापित सिंह के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। इस चक्र में 24 तीलियाँ होती हैं। ध्‍वज को साधारण भाषा में झंडा भी कहा जाता है। झंडे की लम्‍बाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 होता है। राष्‍ट्रीय ध्‍वज को 22 जुलाई 1947 को भारत के संविधान द्वारा अपनाया गया था।
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राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के संभी रंगों का अपना विशेष महत्त्व है. केसरिया रंग वैराग्य का रंग है। आज़ादी के दीवानों ने इसको अपने ध्वज में सबसे ऊपर इसी सोच के कारण स्थान दिया कि आने वाले दिनों में देश के नेता स्वार्थ छोड़ कर देश के विकास में खुद को समर्पित कर दें। तिरंगे का सफ़ेद रंग प्रकाश और शांति के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाता है। हरे रंग को प्रकृति से सम्बंधित करके इसके माध्यम से संपन्नता को दर्शाया गया है। तिरंगे के केंद्र में स्थित चक्र गतिशीलता के साथ-साथ  अशोक चक्र धर्म के 24 नियमों की याद दिलाता है।
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पहला भारतीय ध्वज –   सन 1906 में पहली बार भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज फ़हराया गया। इसे सन 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था। तत्पश्चात 7 अगस्त 1906 को बंगाल के विभाजन के विरोध में कलकत्ता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। हमारा पहला ध्वज लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बना हुआ था। सबसे ऊपर की हरी पट्टी रखी गई थी जिसमें 8 आधे खिले हुए कमल के फूल थे। झंडे में सबसे नीचे लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वन्दे मातरम् लिखा हुआ था।

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दूसरा भारतीय ध्वज-- दूसरा ध्वज भीकाजी कामा और उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा सन 1907 में फहराया गया था। कुछ लोगों मानना है कि ऐसा कार्य सन  1905 में हुआ था। बताया जाता है कि सुबह साढ़े आठ बजे इंडिया गेट पर लोगों की भीड़ ने  करतल ध्वनि के बीच यूनियन जैक को उतारकर इसी भारतीय राष्ट्रीय झंडे को फहराया था। इस दूसरे ध्वज में कुछ बदलाव भी किये गए, जिनमें सबसे ऊपर की हरी पट्टी का रंग हरे से केसरिया कर दिया गया और उसमें कमल के फूलों का स्थान सात तारों, जिन्हें सप्तऋषि के समकक्ष माना गया, ने ले लिया। सबसे नीचे की पट्टी का रंग भी लाल से परिवर्तित करके हरे में बदल दिया गया. शेष ध्वज पहले की तरह ही रहा। इस ध्‍वज को बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
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तीसरा भारतीय ध्वज -- भारतीय राजनीतिक संघर्ष सन 1917 तक आते-आते एक निश्चित मोड़ लिया। एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने अपने आंदोलन के दौरान इसे फहराया था। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियाँ एक के बाद बनी हुई थीं और सप्‍तऋषि आकृति में इस पर सात सितारे बने हुए थे। बांये हिस्से में ऊपरी किनारे पर यूनियन जैक और दूसरे दायें कोने में सफ़ेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।




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चौथा भारतीय ध्वज -- सन 1916 में एक ऐसे ध्वज की कल्पना की गई जो सभी भारतवासियों को एकसूत्र में बाँध सके। इस पहल को देखते हुए एक नेशनल फ़्लैग मिशन का गठन किया गया। सन 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बना कर महात्मा गांधी को दिया। इसमें दो रंगों को शामिल किया गया था। लाल और हरे रंग को दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम के प्रतिनिधित्‍व के रूप में प्रदर्शित किया गया था। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए। इसी के चलते ध्वज का यह चौथा रूप सामने आया।
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पाँचवाँ भारतीय ध्वज -- वर्ष 1931 को ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष कहा जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज में रंग को लेकर तरह-तरह के वाद-विवाद चलते रहे। काफ़ी तर्क वितर्क के बाद भी जब सब एकमत नहीं हो पाए तो सन 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को मूर्त रूप देने के लिए 7 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया। इस ध्‍वज का स्‍वरूप वर्तमान ध्वज की तरह ही (तीन रंगों – केसरिया, सफ़ेद और हरा को शामिल किया गया) रखा गया और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे को दर्शाया गया था। यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया था कि इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं है। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा।
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वर्तमान भारतीय ध्वज -- आज़ादी के परवानों ने इसी ध्वज के तले अनेक आंदोलन किए और 1947 में अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आज़ादी की घोषणा से कुछ दिन पहले राष्ट्रीय ध्वज को नया रूप देने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई और तीन सप्ताह के भीतर ही 14 अगस्त को इस कमेटी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता देने की सिफ़ारिश की। इसमें सिर्फ इतना परिवर्तन किया गया कि बीच की सफ़ेद पट्टी में चरखे के स्थान पर चक्र को प्रतिस्थापित किया गया। 15 अगस्त 1947 को यही तिरंगा हमारी आज़ादी और हमारे देश की आज़ादी का प्रतीक बन गया।
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तिरंगे का सम्मान : ध्वज के सम्मान की बात भी स्पष्ट कर दी गई कि ध्वज फहराने के समय किस आचरण संहिता का ध्यान रखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी भूमि पर नहीं गिरना चाहिए और ना ही धरातल के संपर्क में आना चाहिए। सन 2005 के पहले तक इसे वर्दियों और परिधानों में उपयोग में नहीं लाया जा सकता था, लेकिन सन 2005 में फिर एक संशोधन के साथ भारतीय नागरिकों को इसका अधिकार दिया गया लेकिन इसमें ध्यान रखने वाली बात ये है ये किसी भी वस्त्र पर कमर के नीचे नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज कभी अधोवस्त्र के रूप में नहीं पहना जा सकता है।
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भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-2002 में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-2002 को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया है।
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झंडा फहराने का सही तरीका
* जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

* सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है, जिसके अलग से प्रावधान किये गए हैं।

* झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।

* झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।

* फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।

* झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।

* किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।

* झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।

* जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।
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आइये हम सब अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को सम्मान दें और देश की आज़ादी के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि प्रदान करें। जय हिन्द....