कानून लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कानून लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 जुलाई 2025

गाली वाली रील पर गिरफ़्तारी किन्तु नग्न, अर्धनग्न वाली रील पर ख़ामोशी

सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी हुई कि संभल में दो लड़कियों को अश्लील कंटेंट बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करने के कारण गिरफ्तार किया गया. खबर के बाद उनकी रील देखी तो प्रथम दृष्टया जो बात समझ आई वो ये कि वे दोनों खुलेआम गालियाँ देते हुए रील बनाती हैं. उनकी तमाम सारी रील देखने के बाद भी कहीं शारीरिक नग्नता नहीं दिखी.


यदि सिर्फ गालियाँ देने के कारण ही उनकी गिरफ़्तारी हुई है तो ऐसी बहुतायत में रील हैं जिनमें खुलेआम गालियाँ दी जा रही हैं, खुलकर देह प्रदर्शन किया जा रहा है, नंगपन चरम सीमा पर है. इस तरह की रील बनाने वालों की गिरफ़्तारी क्यों नहीं हो रही हैकहाँ और कैसे शिकायत करने पर गिरफ़्तारी होगी, हमें वहाँ का पता दिया जाये. उनकी शिकायत करके उनकी भी गिरफ़्तारी सुनिश्चित करवाई जाएगी. 


यदि गालियाँ अश्लीलता है तो फिर नग्न होकर, अर्धनग्न होकर रील बनाना भी अश्लीलता है.

 

04 नवंबर 2019

कानून से उलझता कानून


सोशल मीडिया पर पुलिस-वकील झड़प के कई वीडियो देखने को मिले. वकीलों का जिस तरह का आक्रोशित स्वरूप दिखा वह अकल्पनीय नहीं कहा जायेगा. ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है जबकि वकीलों और पुलिस में झड़प हुई हो और वकीलों ने कानून को अपने हाथों में लेकर पुलिस वालों के साथ मारपीट की हो. ऐसा वकीलों द्वारा कई बार होता रहा है. ऐसा नहीं है कि पुलिस भी ऐसे मामलों में दूध की धुली हो. उसके द्वारा भी अपनी वर्दी का अहंकार समय-समय पर जनता पर निकलता ही रहता है. इसी अहंकार में कई बार वकील भी चपेटे में आ जाते हैं. असल में दोनों ही अपनी-अपनी वर्दी में कानून का साथ लिए घूमते हैं. एक को अपने आपमें ये अहंकार है कि किसी भी मामले की शिकायत के लिए उसी के पास आया जायेगा. ठीक इसी तरह दूसरे पक्ष को भी इसका अहंकार है कि मामला तो उसी के क्षेत्र में आकर निपटेगा. ऐसी स्थिति में दोनों पक्ष खुद को कानून का पालन करवाने वाले या उसका अमल करवाने नहीं बल्कि खुद को कानून समझते हैं.


हालिया जिस झड़प की चर्चा चारों तरफ फैली है, उसके मूल में पार्किंग है. एक कार को पार्किंग में खड़े करने को लेकर शुरू हुई बहस इस तरह रास्ता पकड़ लेगी, इसका अंदाजा तो उन दोनों को नहीं होगा. एक कार की पार्किंग में काले कोट और खाकी वर्दी की बहद ने देशव्यापी विवाद खड़ा करवा दिया. यहाँ इस घटना से स्पष्ट है कि जब अधिकारों का, शक्ति का आधिक्य व्यक्ति के पास हो जाता है तो वह संतुलन बना पाने में कामयाब नहीं रहता है. देखा जाये तो शक्ति का, कानून का, अधिकारों का आधिक्य पुलिस, वकील दोनों के पास है. दोनों ही किसी रूप में खुद को किसी से कम मानने को तैयार नहीं रहते. ऐसे में इस तरह के उपद्रव आम बात हैं. आज जबकि समाज में किसी भी रूप में शक्ति प्रदर्शन का, सत्ता की सामर्थ्य का, खुद के बाहुबल का प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है वैसे में खुद को कानून से ऊपर मान बैठना न तो पुलिस के लिए मुश्किल है, न ही वकीलों के लिए. ऐसे में दोनों पक्षों का टकराना और आपस में लात-जूता करना सहज प्रक्रिया है. यहाँ इस सन्दर्भ में याद रखना चाहिए कि एक ही क्षेत्र से संदर्भित बार-बेंच विवाद को निपटाने की सलाह लगातार दी जाती रहती है मगर शायद ही कहीं ये विवाद सुलझता दिखता हो. ऐसे में पुलिस और वकील दो अलग-अलग क्षेत्र हैं, दो अलग-अलग विधान हैं तब उनमें विवाद का न दिखना अपने आपमें आश्चर्य ही कहा जायेगा. 

बहरहाल, पुलिस जनता की रक्षा के लिए है, कानून को अमली जामा पहनाने के लिए है, कानूनी प्रक्रिया का पालन करवाने के लिए है. इसी तरह वकील उसी कानून की सही व्याख्या करने के लिए, कानून के सही प्रयोग के द्वारा निर्दोष को सजा-मुक्त करवाने और दोषी को सजा दिलवाने के लिए है. इसके बाद भी दोनों पक्ष अपने आपको ही कानून मान बैठते हैं. पुलिस का जनता के साथ किया जाने वाला व्यवहार स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे खुद को क्या समझते हैं और उनकी निगाह में जनता की कीमत क्या है. सीधी सी बात है जब तक ये दोनों पक्ष खुद को कानून मान कर चलते रहेंगे या फिर खुद को कानून से ऊपर मानते रहेंगे तब तक ऐसी घटनाएँ सामने आती रहेंगी. कभी वकील पुलिस पर हावी रहेंगे, कभी पुलिस वकील पर हावी रहेगी. इन सबसे अलग सबसे बड़ा सत्य यह है कि इन दोनों के बीच भले ही कोई विवाद न हो मगर ये दोनों हमेशा ही आम जनता पर भारी पड़ते रहेंगे. उस पर कानूनी दांव-पेंच चलाते रहेंगे.

24 नवंबर 2018

विवाहेतर संबंधों को कानूनी मान्यता के बाद भी...


पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने क्रांतिकारी निर्णय देते हुए दो धाराओं की दिशा बदल दी. एक से समलैंगिक सम्बन्ध बनाने वालों को राहत मिली और दूसरी धारा से विवाहेतर सम्बन्ध बनाने वालों को. अदालत द्वारा धारा 370 और धारा 497 की दिशा बदली गई उसके बाद समाज की दिशा बदले या न बदले मगर कानून की, पुलिस की दिशा अवश्य बदलनी चाहिए. यहाँ चर्चा इन निर्णयों के बाद भी सामने आने वाली कुछ खबरों के सन्दर्भ में है, जिसमें हाल-फिलहाल धारा 497 को शामिल किया गया है. लगभग दो माह होने को आये हैं जबकि विवाहेतर संबंधों के बनाये जाने को कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी कई घटनाएँ सामने आईं हैं जहाँ कि दो बालिग स्त्री-पुरुष के द्वारा आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाये जाने के बाद भी उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया. अदालत द्वारा जबकि इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यह कानून एक तरह से महिलाओं के साथ भेदभाव करता है. उसका ऐसा कहना किसी और सन्दर्भ में हो सकता है मगर जबकि कानूनी रूप से स्त्री और पुरुष दोनों को आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट मिल गई है तब ऐसा करने वालों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करना क्या अदालत के आदेश का अपमान नहीं? 


लेखक कानून का जानकार नहीं, इसलिए ऐसा सवाल दिमाग में आना स्वाभाविक है. ऐसा सवाल इसलिए भी जेहन में उपजा क्योंकि किसी शिकायत पर पुलिस प्रशासन का किसी के घर पहुँच कर, किसी होटल पहुँच कर छापामारी करने, बालिग स्त्री-पुरुष को गिरफ्तार करने की खबरें नियमित रूप से सुनाई पड़ रही हैं. सवाल यह भी उपजता है कि यदि कोई बालिग स्त्री-पुरुष आपसी सहमति से अपने घर में, किसी होटल में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं और इसके प्रमाण मिलते हैं कि उनके द्वारा किसी रूप में वेश्यावृत्ति नहीं की जा रही है, होटल प्रबंधक, मालिक द्वारा किसी तरह से वेश्यावृत्ति की संलिप्तता नहीं है तो फिर ऐसे बालिग स्त्री-पुरुष को गिरफ्तार क्यों किया जाता है? यह भी एक तथ्य है कि वे दोनों किसी सार्वजनिक स्थान पर शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना रहे होते हैं तब क्या उनको गिरफ्तार किया जा सकता है? यदि आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाना अब गैर-कानूनी नहीं तो फिर क्या इस सम्बन्ध में पुलिस प्रशासन को सचेत नहीं किया गया है? जबकि यह सर्वविदित है कि कानून का पालन करवाना पुलिस का ही काम है.

इस विषय पर इसलिए भी चर्चा आवश्यक है क्योंकि ऐसे ही बहुत सारे विषय हैं जिनके कारण समाज में विसंगति देखने को मिलती है. ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिनको लेकर कानून कुछ कहता है और पुलिस प्रशासन कुछ और करता है. इस तरह का दोहरा व्यवहार, बर्ताव भी समाज में न्यायालय की उस सोच को बाधित करता है, जिसके द्वारा उसके द्वारा हाल ही में दो-दो धाराओं की दिशा बदली गई.

05 जुलाई 2018

अपराधियों के साथ हम सब भी दोषी हैं


हम सब नागरिक बहुत परेशान हैं. समाज में रोज ही बलात्कार की खबरें आ रही हैं. अब तो बच्चियों के साथ बलात्कार की खबरें आने लगी हैं. इन खबरों को पढ़कर, सोशल मीडिया पर देखकर खून खौल जाता है मगर बस उतनी देर ही खौलता रहता है जितनी देर तक हम सब अपना स्टेटस, कोई फोटो सोशल मीडिया पर शेयर नहीं कर लेते. जैसे ही ये सब किया, दो-चार-दस लाइक, कमेंट मिले बस खून का उबाल ठंडा पड़ जाता है. कुछ लोगों का खून ज्वालामुखी की तरह खौलता है, लावा फेंकता है पर तब तक ही ऐसा होता है जब तक कि वे मोमबत्ती न जला लें, किसी जुलूस में शामिल न हो लें, उसकी सेल्फी खींच कर सोशल मीडिया पर शेयर न कर लें. इतना करने के बाद खून खौलना बंद हो जाता है और खून की रवानी दूसरी दिशा में मुड़ जाती है. अब खून के खौलाव के बाद बने बादल दिमाग में चढ़ जाते हैं और फिर वे किस एक महिला, किसी एक बच्ची को नहीं देखते वरन सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं. दिमाग में चढ़े खून के बादल समग्रता में देखने लगते हैं. बस उनके बरसने की देर होती है. आखिर बरसने के लिए भी कोई जगह चाहिए, कोई अवसर चाहिए. इसी अवसर, इसी जगह के मिलते ही दिमाग में चढ़े बादल वैचारिकी के साथ बरस पड़ते हैं. सामाजिक दर्शन के साथ बरस पड़ते हैं.


इस समग्रता में समूचा समाज ख़राब लगने लगता है. समाज रहने लायक नहीं लगता. ये देश रहने लायक नहीं लगता. कुछ लोगों को देश में आपातकाल दिखाई देने लगता है. कुछ लोगों के लिए देश सांप्रदायिक हो जाता है. कुछ समाज में अराजकता का बोलबाला देखते हैं. कुछ हिंसात्मक समाज का स्वरूप देखने लगते हैं. इतना सब कुछ होने के बाद भी ऐसे लोग आराम से जीवन-यापन कर रहे होते हैं. इतनी भयानक स्थिति होने के बाद भी ऐसी सोच वालों का परिवार सुखद रूप में समाज के बीच रह रहा होता है. ऐसी सोच का प्रसार करने वाले ही खुलेआम मॉल में, बाजार में घूमते दिखाई देते हैं. न उनके साथ कोई छेड़छाड़ होती है, न उनका कोई मर्डर करता है, न उनके साथ कोई चोरी-चकारी होती है, न उनके साथ कोई हिंसा होती है, न उनके साथ कोई अराजकता होती है. इतने के बाद भी उनको समाज रहने लायक नहीं लगता है. खबरों में देखने-पढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर सक्रियता दिखाने के बाद चैन की नींद सोने वालों के लिए ही ये समाज रहने लायक नहीं रहता है. ऐसे लोग ही इसका दुष्प्रचार करते नजर आते हैं. ऐसे विचारों का प्रसार करने वालों से पूछना चाहिए कि समाज में कितनी बार इनके परिवार को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा कि जिससे उन्हें लगा हो कि समाज अब रहने लायक नहीं? ऐसे लोगों से जानना चाहिए कि समाज में विपत्ति में फँसे कितने लोगों की इन्होंने मदद की है? इनकी राय इस पर भी प्राप्त करनी चाहिए कि जमीनी रूप से समाज को सुधारने के लिए इन्होंने कितना काम किया?

यहाँ यह कहने का अर्थ कतई नहीं है कि समाज में स्थितियाँ बेहतर हैं, सुखद हैं. यदि ऐसा होता तो हम सब रोज ही बलात्कार जैसी घटनाओं से दो-चार नहीं हो रहे होते. यदि समाज में सबकुछ सुखद ही होता तो बच्चियाँ दुर्दांत अपराधियों की हवस का शिकार नहीं बन रही होती. जिस तरह की आपराधिक घटनाएँ दिख रही हैं, उसके पीछे इसी तरह की मानसिकता के लोग भी जिम्मेवार हैं. अपराधी की मनोवृत्ति अपराध करने की होती है मगर उन व्यक्तियों की मनोवृत्ति कैसी होनी चाहिए जो अपने आपको समाज का जिम्मेवार नागरिक मानते हैं? क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि समाज में लगातार आ रही विसंगतियों के खिलाफ खड़े हों? क्या उनका फ़र्ज़ नहीं बनता कि आये दिन आँखों के सामने होने वाली आपराधिक घटनाओं का विरोध उनके द्वारा भी हो? ऐसे लोगों की स्थिति यह है कि विरोध तो दूर मौका पड़ने पर वे यह तक स्वीकारने को तैयार नहीं होते कि वारदात के समय वे वहां मौजूद थे. ऐसे में अपराधियों का हौसला तो बढ़ना ही है. यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो आप खुद महसूस करेंगे कि सड़क चलते हर इन्सान हत्या नहीं कर रहा है. सड़क चलता हर व्यक्ति बलात्कार नहीं कर रहा है. सड़क चलता हर इन्सान किसी का सामान नहीं चुरा रहा है. असल में ऐसा करने वाले अवसर की, जगह की, स्थिति की प्रतीक्षा में रहते हैं.

अपराधियों को ऐसी स्थिति, ऐसा अवसर वही लोग उपलब्ध कराते हैं जो इस समाज को अब हिंसात्मक, आपराधिक मान रहे हैं. जमीनी रूप में सजगता दिखाने के बजाय आलोचना करना सबसे ज्यादा आसान होता है. इस कारण से समाज का कथित बुद्धिजीवी वर्ग खुद को कमरे में बंद करके बैठा रहता है और अपराधियों को अवसर उपलब्ध करवाता रहता है. सत्य यह है कि अपराधी जबरदस्त तरीके से डरपोक किस्म का होता है और यही कारण है कि वे एक समूह में चलते हैं. रात के अंधियारे में चलते हैं. कानून से बचते फिरते हैं. इसके साथ-साथ यह और भी बड़ा सत्य है कि खुद को जिम्मेवार मानने वाला, बुद्धिजीवी मानने वाला नागरिक इनसे भी बड़ा डरपोक होता है. उसके एक इसी डरपोकपने के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और इसी कारण समाज में रोज ही आपराधिक घटनाएँ हो रही हैं.

01 जुलाई 2018

बलात्कारियों में डर-भय नहीं कानून का


दिल्ली गैंगरेप के बाद दिल्ली समेत देश के कई भागों में इन बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की माँग जोर पकड़ने लगी थी, ऐसा ही कुछ अब हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के निर्धारण से देश में बलात्कारियों में डर व्याप्त हो जायेगा अथवा बलात्कार होने बन्द हो जायेंगे। याद होगा शायद सभी को कि धनञ्जय चटर्जी को बलात्कार के आरोप में ही फाँसी दी गई थी। क्या हुआ उसके बाद? क्या बदला उसके बाद? विगत कुछ माह से लगातार होती आ रही या कहें कि रोज ही होती आ रही बलात्कार की घटनाएँ चिंतित करने वाली हैं, विचलित करने वाली हैं। चिंता इसकी कि अब ऐसा लग रहा है कि समाज में महिलाएं सुरक्षित ही नहीं हैं और विचलित करने वाली घटनाएँ इसलिए क्योंकि बलात्कार की, सामूहिक बलात्कार की घटनाओं में अब बच्चियों को शिकार बनाया जाने लगा है। कभी लगता है कि जनता जाग रही है तो कभी लगता है कि वह एकदम भावशून्य पड़ी हुई है। प्रशासन-शासन की विफलता के बाद उसको चेताने के लिए, जगाने के लिए जनता का जागरूक होना आवश्यक है। इस जागरण में सिर्फ और सिर्फ फाँसी की माँग करना अकेले ही इस समस्या का समाधान नहीं।


बलात्कार के लिए फांसी की सजा की मांग करने के पूर्व हमें उन तमाम सारे कानूनों की ओर भी ध्यान देना होगा जिनके द्वारा किसी अपराध के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है। क्या उन तमाम अपराधों में कमी आई है अथवा वे अपराध होना बन्द हो गये है? पूर्वाग्रह दृष्टि न रखने वालों का एक ही जवाब इसके लिए होगा और वो भी न में। तमाम सारे वे अपराध आज भी तेजी से समाज में होते दिख रहे हैं, जिनके लिए सजा के रूप में फांसी की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा एक और तथ्य महत्वपूर्ण है कि यदि बलात्कार की सजा के रूप में फांसी को मुख्य रूप से स्वीकार कर लिया गया तो इसके कई दुष्परिणाम महिलाओं के प्रति ही खड़े होने की आशंका है। यह सर्वविदित है कि यदि किसी भी महिला से बलात्कार हुआ तो जाहिर है कि वह महिला किसी न किसी रूप में शारीरिक दृष्टि में उस बलात्कारी पुरुष से कमजोर साबित हुई है। इसके अलावा गैंग रेप के केस में तो जाहिर है कि उस महिला के साथ दुराचार करने वालों की संख्या एक से अधिक रही होगी। ऐसे में यदि बलात्कार की सजा फांसी हो जाती है तो बहुत हद तक सम्भावना है कि सम्बन्धित महिला को दुराचारी लोग जीवित ही न छोड़ें। आखिर उन बलात्कारियों को पहचानने वाला, उनकी शिकायत करने वाला, उनके विरुद्ध गवाही देने वाला यदि कोई होगा तो सिर्फ और सिर्फ वह महिला ही। ऐसे में उन दुराचारियों के द्वारा उसको जीवित छोड़ देने की सम्भावना न्यूनतम होने की आशंका है।

जनता जागरूक होकर सरकार को, प्रशासन को घेरने का काम करे। वह इसके लिए शासन-प्रशासन को विवश कर दे कि वह चुस्त-दुरुस्त होकर काम करे। यदि शासन-प्रशासन अपनी तरफ से चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था रखने के लिए तत्पर हो जाये तो परिणाम कुछ हद तक सुखद मिलने की सम्भावना है। यदि जागरूकता लोगों को सजग रहने के लिए दिखाई जाये तो महिलाओं को इस तरह से आये दिन दुराचारियों का शिकार न होना पड़े। यदि एकजुटता की स्थिति को अपराधियों में मन में खौफ पैदा करने के लिए दिखाई जाये तो पल प्रति पल ऐसी वीभत्स घटनाओं से हमें दो-चार नहीं होना पड़ेगा। दिल्ली कांड के बाद कानून बनाया गया मगर क्या हुआ उसका? इसी काण्ड के अपराधियों को अभी तक सजा नहीं दी जा सकी है। और तो और विपक्षी दल, वे चाहे कोई भी हों सब किसी न किसी बहाने सरकार पर हमला बोलने की मंशा बनाये रहते हैं। उनके कदमों से ऐसा लगता है जैसे उन्हें न महिलाओं से मतलब है, न बच्चियों से मतलब है, न ही अपराधियों से। वे सब महज अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आग तलाशते रहते हैं। यदि वाकई कानून का, किसी तरह की सजा का कोई डर-भय होता तो दिल्ली कांड के बाद भी देश के कई भागों में गैंगरेप के और मामले सामने नहीं आये होते।



01 सितंबर 2016

नहीं बिकेगी कोख

केंद्रीय कैबिनेट ने सेरोगेसी अर्थात किराए की कोख के व्यावसायीकरण रोक सम्बन्धी एक बिल को मंजूरी दे दी है. इस बिल में सेरोगेट मदर और बच्चे के अधिकारों को ध्यान में रखा गया है. साथ ही कानून को ज्यादा सख्त बनाने की कोशिश की गई है. इसके अंतर्गत व्यावसायिक सेरोगेसी को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है. इस कानून के आने के बाद सिर्फ उन दंपत्ति को ही सेरोगेसी की अनुमति मिलेगी जिन्हें वाकई संतान पैदा करने में समस्या है और जिनके विवाह को पाँच वर्ष हो चुके हों. दरअसल भारत सेरोगेसी का एक बहुत बड़ा बाज़ार बनता जा रहा था. सरकार के साथ-साथ अन्य जागरूक संगठनों द्वारा लगातार इसके सम्बन्ध में कड़े कानून बनाये जाने की कवायद की जाती रही है. देखा जाये तो भारत सरोगेसी के लिए सर्वोत्तम प्लेटफ़ॉर्म के रूप में विकसित हुआ है. एक अनुमान के अनुसार प्रजनन विज्ञान की इस सहायक विधि ने सालाना 63 अरब रुपए से अधिक के कारोबार का रूप ग्रहण कर लिया है. इसे विधि आयोग ने स्वर्ण कलश का नाम दिया है. भारत में सरोगेसी सम्बन्धी कानून न होने तथा बच्चा गोद लेने की जटिल प्रक्रिया के कारण यह निःसंतान दम्पत्तियों के लिए बेहतरीन और पसंदीदा विकल्प बन गई है. 


सरोगेसी लैटिन शब्द सबरोगेट से बना है जिसका अर्थ है किसी और को अपने काम के लिए नियुक्त करना. तकनीक रूप से सरोगेसी दो प्रकार, ट्रेडिशनल और जेस्टेटशनल से होती है. ट्रेडिशनल सरोगेसी में संतान सुख के इच्छु्क दंपत्ति में से पिता के शुक्राणुओं को एक स्वस्थ महिला के अंडाणु के साथ प्राकृतिक रूप से निषेचित कर सरोगेट माँ के प्राकृतिक अण्डोत्सर्ग के समय डाला जाता है. इसमें जेनेटिक संबंध सिर्फ पिता से होता है. जेस्टेसशनल सरोगेसी में माता-पिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवाकर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्चे्दानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है. इसमें बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता दोनों से होता है. हाल ही में फिल्म अभिनेता तुषार कपूर द्वारा इस विधि से पिता बनने के बाद सेरोगेसी तकनीक पुनः चर्चा में आई. इससे पूर्व शाहरुख़ खान द्वारा भी ऐसा किये जाने पर सवाल उठाये गए थे, जबकि उनके पहले से अपनी पत्नी से दो बच्चे थे. ये दो उदाहरण मात्र उदाहरण ही नहीं हैं वरन समाज की मानसिकता का परिचायक हैं. वर्तमान में आधुनिक पीढ़ी में कैरियर के प्रति अतिशय सजगता आने से नवयुवतियों में माँ बनने सम्बन्धी लालसा कम हुई है. ऐसे में सेरोगेसी को बढ़ावा मिला है. इसके साथ-साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रहे युगल, समलैंगिकों के बीच, एकल पुरुष, महिला के द्वारा भी सेरोगेसी तकनीक के द्वारा बच्चे प्राप्त किये जाने का चलन बढ़ा है.

देश में किसी तरह का कानून न होने के कारण सेरोगेट मदर के लिए अनेक तरह की समस्याएँ पैदा हो रही थी. अक्सर किसी न किसी तरह की बीमारी के कारण अथवा असामान्य रूप में जन्मे शिशु को उसके पिता द्वारा अपनाने से इंकार कर दिया जाता था. धन की लालसा में सेरोगेट बनने वाली महिला के लिए ऐसी स्थिति में बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जाती थी. उसके पास कानूनी रास्ता भी नहीं रह जाता था. अब ऐसा किया जाना संभव नहीं. बिल में प्रावधान किया गया है कि सेरोगेसी से उत्पन्न संतान को हरहाल में उसके पिता द्वारा अपनाना ही होगा. कानून के अभाव में पहले ऐसा नहीं था. चूँकि भारत में सरोगेसी पर सख्त कानून नहीं है साथ ही फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, इटली, स्पेन, बुल्गारिया में सरोगेसी पूरी तरह प्रतिबंधित होने तथा अमेरिका, ब्रिटेन समेत कुछ देशों में अत्यंत खर्चीली तकनीक होने के कारण विदेशी दंपत्ति भी सरोगेसी के लिए भारत आते हैं. किसी विदेशी दंपत्ति के लिए सरोगेसी से भारत में पैदा होने वाले बच्चे की नागरिकता पर उठते प्रश्नचिन्ह को देखते हुए आठ यूरोपीय देशों- जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड, चेक रिपब्लिक, इटली, नीदरलैंड्स, बेल्जियम और स्पेन ने भारत सरकार को पत्र लिख कर अनुरोध किया था कि यदि उनके देश का कोई दंपत्ति भारत में सरोगेसी से बच्चा पैदा करता है तो उन्हें संबंधित देश के दूतावास से इसकी अनुमति लेने के लिए कहा जाए. इसको ध्यान में रखते हुए पूर्व में प्रावधान किया गया था कि अनिवासी भारतीयों सहित विदेशी नागरिक जो सरोगेसी की चाह में भारत आएंगे, उन्हें प्रस्तावित कानून के अंतर्गत इस आशय का प्रमाणपत्र देना होगा कि उनके देश में सरोगेसी को कानूनी मान्यता प्राप्त है और जन्म के बाद शिशु को उनके देश की नागरिकता दी जाएगी. हाल ही में कैबिनेट से पारित बिल में विदेशियों को सेरोगेसी के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया है. अब किसी भी रूप में उनको देश में सेरोगेसी की सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई जा सकेगी.

कैबिनेट से पास बिल में इस तरह के प्रावधान किये गए हैं जो सेरोगेट मदर को और जन्मे शिशु को संरक्षण देते हैं. बिल में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अगर किसी के पास एक बच्चा है अथवा किसी ने एक बच्चा गोद ले रखा है तो उन्हें सेरोगेसी की अनुमति नहीं होगी. मूलरूप से प्रजनन विज्ञान की सहायक तकनीक के रूप में विकसित सरोगेसी के द्वारा ऐसे दम्पत्तियों को संतानसुख प्रदान किया जाता है जो कतिपय कारणोंवश संतान पैदा नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें किसी अन्य महिला को गर्भस्थ करने और गर्भावस्था के दौरान होने वाले खर्च सहित, उसकी फीस चुकानी होती है. इसी को किराये की कोख या सेरोगेट मदर का नाम दिया गया है. इस तकनीक का उपयोग एक तरफ तो निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए कर रहे हैं साथ ही वे धनवान महिलाएँ भी कर रही हैं जो प्रसूति के दौरान होने वाली तकलीफों से बचना चाहती हैं. ऐसी स्थिति से बचने के लिए बिल में प्रावधान किया गया है कि लिव-इन-रिलेशन में रहने वालों को, समलैंगिकों को, एकल पुरुष-महिला को सेरोगेसी का लाभ नहीं मिलेगा.


नियम-कानून का पूरी तरह कड़ाई से पालन हो सके इसके लिए भी बिल में व्यवस्था की गई है. अब सेरोगेसी क्लीनिक वालों को सेरोगेसी से पैदा बच्चे का रिकॉर्ड 25 वर्ष तक रखना अनिवार्य किया गया है. ऐसा न किये जाने पर दस वर्ष की सजा का प्रावधान है. फ़िलहाल कानून बन चुका है, अब देखना है कि कितनी कड़ाई से, सख्ती से इसका पालन करवाया जाता है, किया जाता है. यदि ये कानून वाकई कारगर ढंग से काम कर सका तो किसी गरीब महिला की मजबूरी का फायदा धनिकों द्वारा, मौज-मस्ती करने वालों द्वारा नहीं उठाया जा सकेगा. 

23 दिसंबर 2015

कानून पर्याप्त नहीं अपराध रोकने को


अंततः किशोर न्याय कानून को राज्यसभा से मंजूरी मिल ही गई, अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलना बाकी है. इस मंजूरी के बाद ये विधेयक पूर्ण रूप से कानून बनकर सामने आएगा. इस कानूनी विधेयक के अनुसार सोलह से अठारह वर्ष तक के किशोर अपराधियों पर भी वयस्क अपराधियों की तरह मुकदमा चलाये जाने का प्रावधान किया गया है. इसके साथ ही विधेयक में ऐसी व्यवस्था की गई है कि किसी भी किशोर अपराधी को फाँसी अथवा उम्रकैद नहीं दी जा सकेगी. इस कानून के अनुसार अधिकतम सात वर्ष से दस वर्ष तक की सजा दी जा सकेगी. संसद में बहस के दौरान इस तरह से दर्शाया गया कि इस कानून के अमल में आने के बाद नाबालिग अथवा किशोर अपराधियों में भय का माहौल बनेगा, वे अपराध करने से डरने लगेंगे. किशोर न्याय कानून किस तरह से किशोर अपराधियों को भयभीत करेगा, किस तरह समाज में किशोरवय के लोगों को अपराध करने से रोकेगा ये तो आने वाला समय बताएगा. दिल्ली में हुए जघन्य रेप कांड के बाद जिस तरह से नाबालिग अपराधियों पर मुकदमा चलाये जाने, उन्को भी वयस्कों की तरह सजा दिए जाने की माँग उठी थी, उस माँग को तीव्रता पुनः उसी अपराधी के छूट जाने के बाद मिली. पीड़ित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसके गुप्तांग में सरिया गुसेड़ कर सड़क पर फेंक दिए जाने जैसा ह्रदयविदारक अपराध करने वाले अपराधी को महज तीन साल की सजा देकर इसलिए बरी कर दिया जाता है क्योंकि अपराध करने के समय वो नाबालिग था. ये अपने आपमें विद्रूप है कि एक व्यक्ति जो बलात्कार करने में सक्षम है, किसी भी महिला से शारीरिक सम्बन्ध बनाने में सक्षम है, किसी की हत्या करने की मानसिकता रखता है उसे उम्र के आधार पर नाबालिग होने के कारण सजा से वंचित रखा जाता है.
.
यदि हाल-फ़िलहाल में सिर्फ बलात्कार को ही आधार बनाया जाये तो समाज में किशोर बलात्कारियों से अधिक संख्या वयस्क बलात्कारियों की है. लगभग रोज ही किसी न किसी महिला को वयस्क उम्र के व्यक्ति द्वारा अपनी हवस का शिकार बनाया जाता है. और ऐसा तब हो रहा है जबकि बलात्कारियों को सजा देने के लिए कानून बना हुआ है. कानून बने होने के बाद भी, बलात्कार के मामलों में सजा होने के बाद भी समाज में ऐसे अपराधों को रोका नहीं जा सका है; अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा नहीं किया जा सका है; लोगों को कानून का भय दिखाकर अपराध से दूर रहने को सजग नहीं किया जा सका है. ऐसे में किस आधार पर कहा जा सकता है कि किशोर न्याय कानून बनने के बाद किशोरवय के अपराधियों में डर जागेगा? किस आधार पर कहा जा सकता है कि किशोर इस कानून के आने के बाद खुद को अपराध करने से रोक सकेंगे? यहाँ एक बात समझनी होगी कि महज कानून बना देने से किसी अपराधी मानसिकता वाले को  अपराध करने से रोका नहीं जा सकता है. हाँ, इस कानून के आने के बाद इतना अवश्य होगा कि नाबालिग अपराधियों (16 वर्ष से 18 वर्ष तक की उम्र वाले) पर वयस्कों की भांति मुकदमा चलाया जा सकता है. कहा जा सकता है कि ये कानून ऐसे अपराधियों पर मुकदमा चलाये जाने की कानूनी अनुमति प्रदान करता है. इसके बाद भी सवाल खड़ा होता है कि 14-15 वर्ष तक की उम्र वाला कोई किशोर यदि दिल्ली कांड जैसा जघन्य अपराध करता है तो उसे किस कानून के द्वारा दण्डित किया जा सकेगा? क्या उसके लिए फिर से संसद के द्वारा नए कानून को लाना पड़ेगा? या फिर कानून के अभाव में ऐसा अपराधी एकबार फिर रिहा कर दिया जायेगा?
.
कानूनी दृष्टि से किसी के साथ भेदभाव का होने पाए या फिर अपराध रोकने की दृष्टि से अपराधी की मानसिकता, उसकी उम्र को आधार भले ही बनाया जाये किन्तु उसके साथ-साथ उस अपराध की जघन्यता को भी ध्यान में रखा जाये. कोई व्यक्ति जो अपराध को वीभत्स स्थिति तक अंजाम देता हो उसे महज उम्र के आधार पर, उसकी मानसिकता के आधार पर रिहा करना कहाँ तक न्यायसंगत है? जघन्य अपराध की मामूली सी सजा देकर समाज में आपराधिक मानसिकता के लोगों के बीच कौन सा सन्देश प्रेषित किया जायेगा, ये समझ से परे है. आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों में किस तरह से ये कानून भय पैदा करेगा, उन्हें अपराध करने से रोकेगा, कहना मुश्किल है. कानून का काम आवश्यक रूप से समाज में अपराधियों में भय पैदा करना और नागरिकों को निर्भय होकर जीवन-यापन करने देने का होता है. मगर जब आपराधिक मानसिकता का कोई व्यक्ति इन्हीं कानूनों का सहारा लेकर अपराध करने लगे तो समाज में निर्भय जीवन-यापन की कल्पना करना संभव नहीं है. इस नए कानून का स्वागत किया जाना चाहिए किन्तु साथ ही कानून को, न्यायालयों को अपने आपमें इतनी छूट लेनी होगी कि वो अपराधी के जघन्य कृत्य के आधार पर भी कानून से इतर समाजहित में कोई निर्णय ले सके. यदि ऐसा नहीं किया जा सकता तो संभव है कि अन्य कानूनों की भांति किशोर न्याय कानून भी कानूनी किताबों में, दस्तावेजों में सुशोभित होता रहेगा.

.