विजयादशमी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विजयादशमी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

30 सितंबर 2025

अंतर्मन का रावण मारें

विजयादशमी का पर्व पूरे जोश-उत्साह के साथ मनाया जाता है. रावण का पुतला जलाया जाता है. सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराईअत्याचार के प्रतीक को सत्य और न्याय के प्रतीक के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्यहिंसाअत्याचारबुराई बढ़ती जाती है. साल-दर-साल रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है. देखा जाये तो विजयादशमी का पावन पर्व आज सिर्फ सांकेतिक पर्व बनकर रह गया है. इंसानी बस्तियों में छद्म रावण कोछद्म अत्याचार को समाप्त करके लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. दरअसल समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. व्यक्तियों के बिना समाज का कोई आधार ही नहीं. समाज की समस्त अच्छाइयाँ-बुराइयाँ उसके नागरिकों पर ही निर्भर करती हैं. इसके बाद भी नागरिकों में समाज के प्रति कर्तव्य-बोध जागृत नहीं हो रहा है. समाज के प्रतिसमाज की इकाइयों के प्रतिसमाज के विभिन्न विषयों के प्रति नागरिक-बोध लगातार समाप्त होता जा रहा है. इसी के चलते समाज में विसंगतियाँ तेजी से बढ़ रही हैं. आलम ये है कि नित्य-प्रति एक-दो नहीं सैकड़ों घटनाएँ हमारे सामने आती हैं जो समाज की विसंगतियों को दृष्टिगत करती हैं.

 

प्रत्येक वर्ष पूरे देश में प्रत्येक नगर में, कस्बे में रावण को जलाने का कार्य किया जाता है, इसके बाद भी देश भर में रावण के विविध रूप अपना सिर उठाये घूमते दिखते हैं. कहीं आतंकवाद के रूप में, कहीं हिंसा के रूप में; कहीं जातिवाद के रूप में, कहीं क्षेत्रवाद के रूप में; कहीं भ्रष्टाचार के रूप में, कहीं रिश्वतखोरी के रूप में. यही वे स्थितियाँ हैं जो समझाती हैं कि आत्मा अमर-अजर है. यदि वाकई देह की मौत के साथ-साथ आत्मा की भी मृत्यु हो जाती तो जिस समय राम ने रावण को मारा था उसी समय उसी वास्तविक मौत हो गई होती. वह अपने विविध रूपों के साथ प्रत्येक कालखण्ड में अराजकता की स्थिति को पैदा नहीं कर रहा होता. आत्मा की अमरता के कारण ही रावण प्रत्येक वर्ष अपना रूप बदल कर हमारे सामने आ खड़ा होता है और हम हैं कि विजयादशमी को उसके पुतले को जलाकर इस मृगमारीचिका में प्रसन्न रहते हैं कि हमने रावण को मार गिराया है. वास्तविकता में रावण किसी भी वर्ष मरता नहीं है बल्कि वह तो साल-दर-साल और भी विकराल रूप धारण कर लेता है; साल-दर-साल अपार विध्वंसक शक्तियों को ग्रहण करके अपनी विनाशलीला को फैलाता रहता है.

 



सुनने में बुरा भले लगे मगर कहीं न कहीं हम सभी में किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवारसमाजसंस्थानों आदि में स्नेहप्रेमभाईचारा आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसाअत्याचारबुराई आदि कहीं भी सिखाई नहीं जाती है. ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरणपरिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन लगातार किये जाते रहते हैंइसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करकेकभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

 

अपनी इसी मूल फितरत के चलते समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी कीबच्चियों के साथ दुराचार कीबुजुर्गों के साथ अत्याचार कीवरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठनाहत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जानासामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठनास्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इसके चलते ही समाज में हिंसाअत्याचारअनाचारअविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है, आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.

 

हममें से कोई नहीं चाहता होगा कि समाज मेंपरिवार में अत्याचार-अनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा हैहमारे परिवार में हो रहा हैहमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैंहमारे अपने हैं. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. हमें संकल्प लेना पड़ेगा कि देश में फैले विकृतियों के रावणों को जलाने का, मारने का कार्य करें. अपने आपको चारित्रिक शुचिता की शक्ति से सँवारें ताकि गली-गली, कूचे-कूचे में घूम-टहल रहे रावणों को मार सकें. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे.


24 अक्टूबर 2023

सनातन संस्कृति के विरुद्ध तथ्यहीन, असत्य बातों का प्रचार

विजयादशमी का पावन पर्व उसी तरह से गुजर गया जैसे कि प्रतिवर्ष गुजरता है. एक दिन पहले से शुभकामनाओं का आदान-प्रदान चलना शुरू हुआ. सोशल मीडिया के तमाम मंचों के द्वारा नीलकंठ के दर्शन करवा दिए गए, पान खिलवा दिए गए. इधर कई वर्षों से ऐसा होने लगा है कि अब किसी भी पर्व-त्यौहार पर मिलने-जुलने का काम मोबाइल के द्वारा होने लगा है. चित्रों के, शब्दों के माध्यम से शुभकामनाओं का आना-जाना हो जाता है, उसी को मिलना-जुलना, लोगों का आना-जाना मान लिया जाता है. जितना उत्साह मोबाइल पर, सोशल मीडिया के मंचों पर दिखाई देता है, उससे अधिक उदासीनता एक-दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने में दिखती है. 




इस उदासीन सी स्थिति के साथ-साथ विगत कुछ वर्षों से एक चलन और देखने को मिलने लगा है कि दशहरा आते ही रावण को महान बताये जाने के प्रयास होने लगते हैं. उसे एक भावुक इंसान, अत्यंत विद्वान, सजग भाई, जिम्मेवार पति, मानवीय दृष्टिकोण रखने वाला बताया जाने लगता है. राम के सापेक्ष उसके व्यक्तित्व को इस तरह से खड़ा किया जाने लगता है कि राम को मानने वाले खुद में शर्म महसूस करने लगें. रावण को इतना महान बताया जाने लगता है कि समाज के बहुत से लोग उसी की तरह के भाई, पति, इंसान मिलने की कल्पना करने लगते हैं. दरअसल ये जहाँ एक तरफ सनातन संस्कृति को धूमिल करने का, उसे बदनाम करने का षड्यंत्र है वहीं दूसरी तरफ सनातन संस्कृति वालों के द्वारा अपनी ही संस्कृति से विमुख होने का दुष्परिणाम है.


इक्कीसवीं सदी में आने के बाद से लोगों में आधुनिक होने का ऐसा नशा चढ़ा है कि अपनी ही संस्कृति को नकारना उनके लिए गर्व की बात होने लगी है. जिस तरह से किसी अत्याधुनिक अथवा आधुनिक माने लाने वाले परिवार के लिए यह बड़े गर्व की बात होने लगी है कि उसकी बेटी रसोई का काम नहीं जानती, ठीक इसी तरह से यह भी गौरवान्वित करने वाली बात होने लगी है कि किसी व्यक्ति को हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी नहीं, सनातन संस्कृति की समझ नहीं, अपने ही धर्म ग्रंथों, धार्मिक व्यक्तित्वों के बारे में कोई जानकारी नहीं. ऐसे में केवल उन लोगों को ही दोष नहीं दिया जा सकता जो सनातन संस्कृति के खिलाफ काम कर रहे हैं. वे तो अपने काम को पूर्ण मनोयोग से करने में लगे हैं. उनको इस काम के लिए उचित मानदेय, पारिश्रमिक भी मिल रहा है. समय-समय पर ऐसे लोग सम्मानित भी किये जाते हैं. इसके उलट सनातन संस्कृति के लोग क्या कर रहे हैं? हिन्दू धर्म के रक्षक होने का दावा करने वाले क्या कर रहे हैं?


ये लोग भी ऐसी बातों का विरोध इसलिए भी नहीं कर पाते क्योंकि अपने ही धर्म के बारे में इनको ज्ञान नहीं. रावण के बारे में बताई जा रही अनर्गल बातों की काट के सम्बन्ध में असली ज्ञान इनको है ही नहीं. रावण ने सीता जी का स्पर्श क्यों नहीं किया; रावण और उसकी बहिन के आपसी सम्बन्ध क्या थे; रावण के पतिरूप, पितारूप, भाईरूप की असलियत क्या थी आदि बातों को तब समझा जाता जबकि अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया होता. इंटरनेट पर बिखरी बड़ी काल्पनिक, असत्य, तथ्यहीन बातों को पढ़कर हिन्दू धर्म को, सनातन संस्कृति को समझने का दंभ भरने वालों ने ही ऐसी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर समाज में फैला रखा है. वर्तमान दौर में सनातन संस्कृति के विरुद्ध काम करने वालों को सबक सिखाने से कहीं ज्यादा आवश्यक है कि सनातन संस्कृति, हिन्दू धर्म, इनके व्यक्तित्वों, धार्मिक ग्रंथों के बारे में प्रचारित तथ्यहीन, असत्य बातों को फैलने से रोका जाये. 





 

16 अक्टूबर 2021

अपने भीतर के रावण को भी मारना होगा

विजयादशमी का पर्व पूरे जोश-उत्साह के साथ मनाया गया. दस सिर के रावण का पुतला फिर जलाया गया. फिर बुराई पर अच्छाई की विजयअसत्य पर सत्य की विजय का सन्देश समाज में प्रसारित-प्रचारित किया गया. साल-दर-साल विजयादशमी पर रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है. समाज में सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराईअत्याचार के प्रतीक रावण को सत्य और न्याय के प्रतीक राम के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्यहिंसाअत्याचारबुराई आनुपातिक रूप से बढ़ती दिखाई देती है. सांकेतिक पर्व महज संकेत बनकर रह जाता है. इस पावन पर्व पर इंसानी बस्तियों में छद्म रावण कोछद्म अत्याचार को समाप्त करके सभी लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. आज आवश्यकता रावण के पुतले को फूँकने की सांकेतिकता से साथ-साथ व्यावहारिक रूप में अपने भीतर बैठे अनेकानेक सिरों वाले रावण को जलाने की है.




संभव है कि सुनने में बुरा लगे मगर कहीं न कहीं हम सभी में किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवार मेंसमाज मेंसंस्थानों में विभिन्न तरीके से स्नेहप्रेमसौहार्द्रभाईचारा आदि-आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसाअत्याचारअनाचारबुराई आदि कहींकिसी भी रूप में सिखाये नहीं जाते हैं. सीधी सी बात है कि ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरणदेशकालपरिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन कई तरह से लगातार किये जाते रहते हैंइसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करकेकभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

अपनी इसी मूल फितरत के चलते समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी कीबच्चियों के साथ दुराचार कीबुजुर्गों के साथ अत्याचार कीवरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठनाअनावश्यक सी बात पर हत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जानासामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठनास्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इस रावण के चलते ही समाज में हिंसाअत्याचारअनाचारअविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है. अविश्वास इस कदर कि आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.


आखिर क्या हम सब महज एक दिन रावण के सांकेतिक पुतले को मारकर सांकेतिक रूप में ही बुराई को मारने का दम भरते रहेंगेक्या हम सब एक दिन बुराई का अंत करने का प्रहसन सा करके शेष पूरे वर्ष भर बुराईअत्याचार को बढ़ावा देते रहेंगेहम में से शायद कोई नहीं चाहता होगा कि हमारे समाज मेंहमारे परिवार में अत्याचारअनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा हैहमारे परिवार में हो रहा हैहमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारी ही बेटियों को गर्भ में मारा जा रहा है. हमारी ही बेटियों को दहेज़ के नाम पर मारा जा रहा है. हमारे ही अपनों की संपत्ति को कब्जाया जा रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. और करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैंहमारे अपने हैंहम में से ही कोई हमारा है. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. न सही एक दिन मेंएक बार में मगर समय-समय पर नियमित अन्तराल में अपने अन्दर के रावण की एक-एक बुराई को समाप्त करते रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जबकि हमें बाहरी रावण को मारने की जरूरत पड़ेगी. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगेवास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे.

.

25 अक्टूबर 2020

रावण को आदर्श मानने वालों/वालियों के लिए

इधर देखने में आ रहा है कि विजयादशमी आते-आते बहुत से लोगों (विशेष रूप से महिलाओं) को रावण बहुत पसंद आने लगता है. बहुतेरी तो रावण जैसा भाई पाने की कामना जैसी बातें भी सार्वजनिक रूप से करने लगती हैं. इसी से सम्बंधित पोस्ट सोशल मीडिया पर लगाई, जिस पर बहुत सारी टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं. दो टिप्पणी खुद में विशेष समझ आईं, वही आज की पोस्ट के रूप में.

+++++


रावण को पति के रुप मे पाने की चाह रखने वाली फेमिनिस्ट सुंदरी से मेरे चंद सवाल......

हमारे पुराणों के अनूसार....

रावण की तीन पत्नियां थी

पहली का नाम मंदोदरी

दुसरी का नाम दम्यमालिनी

तीसरी का नाम अज्ञात है पर इसके रावण से तीन पुत्र थे

देवांतक , नरांतक और प्रहष्था जिसका रामानंद सागर जी

के बनाई रामायण धारावाहिक में भी उल्लेख है

और रावण ने अपनी तीसरी पत्नि की हत्या कर दी थी....

.

और भी रावण के कहानियां हैं....

.

एक रावण ने मंदोदरी की बड़ी बहन से बलात्कार करने की

कोशिश की थी जिसमे वो असफल रहा था...

.

एक रावण ने अपने सौतेले छोटे भाई कुबेर की पत्नी रंभा से

बलात्कार किया था जिसके फलस्वरूप उसे कुबेर ने श्राप

दिया था कि वो किसी भी महिला के मर्जी के विरूद्ध अगर

उससे संसर्ग करने की कोशिश करेगा तो उसके मस्तक के

सैकड़ो टुकड़े हो जायेंगे , तभी वो सीता मैया से जबरदस्ती

विवाह नही कर पाया...

.

एक रावण ने वेदवती नामक महिला से उस समय बलात्कार

करने की कोशिश की जब वो श्री हरी विष्णु को पति के रुप

में पाने के लिए तपस्या कर रही थी उसके उस कुकृत्य की

वजह से वेदवती ने तपस्या में ही प्राण त्याग दिये ....

.

एक रावण वो था जिसकी तीन पत्नियों के अलावा हजारों

दासियां थी जिस से वो समय समय पर संसर्ग करता रहता

था....

.

तो है रावण को पति रूप में पाने की चाह रखने वाली लंकनी

रुपी मंदोदरी....

तुम इन में से किस बलात्कारी रावण रूप से विवाह करना चाहोगी ???




+++++


रावण को भाई के रूप में वही पसन्द कर सकती है जिसका चरित्र सूर्पनखा जैसा हो। जो वन-वन घूम कर दूसरी स्त्रियों का पति चुराती हो। या जो किसी सुन्दर स्त्री को देखे तो अपने भाई को उसका हरण करने के लिए प्रेरित करे। ऐसी स्त्रियाँ कभी आदर्श नहीं हो सकतीं।


रावण को भाई के रूप में वही पुरुष पसन्द करता है जिसका चरित्र कुंभकर्ण जैसा हो। जो सज्जन होने के बावजूद भाई के कुकर्मों के समय आंख बंद कर ले। ऐसे लोग कभी अनुकरणीय नहीं हो सकते।


रावण को पति के रूप में वही स्त्री पसन्द कर सकती है, जो अपने पति को हजार टुकड़ों में बंटते देख सकती हो। जो देख सकती हो कि उसका पति यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर, राक्षस, यवन सभी जाति की स्त्रियों का हरण करे और बलपूर्वक अपनी पत्नी बना कर रखे। जो सहन कर सकती हो कि उसका पति उसकी किसी भी बात को न माने... वह गिड़गिड़ाती रहे, पर उसका पति उसकी बात अनसुनी कर के पाप करता रहे।


रावण को मित्र के रूप में वही पसन्द कर सकते हैं जिनका चरित्र बाली के जैसा हो। जो अपने छोटे भाई की स्त्री को बलपूर्वक छीनने में लज्जा का अनुभव नहीं करता हो। जो तारा जैसी विदुषी पत्नी की भी कोई बात नहीं मानता हो। ऐसे लोग भी सम्मान के योग्य नहीं होते।


रावण को अपना नायक वही मान सकते हैं जिन्हें न धर्म का ज्ञान है, न वेद का। रावण उन राक्षसों का नायक था जो ऋषियों के हवन कुंड में हड्डियां डालते थे, जो ऋषियों को मार कर खा जाते थे, जो मनुष्यों को जीने नहीं देते थे। रावण ऐसे ही अमानुषों का नायक हो सकता है।


रावण को एक आदर्श पुत्र मानने वाले मूर्ख ही हैं, क्योंकि रावण के कुकर्मों के कारण स्वयं उसके पिता ने उसका त्याग कर दिया था। जिस व्यक्ति के कारण उसका लज्जित पिता नगर छोड़ दे, वह और कुछ भी हो आदर्श पुत्र नहीं हो सकता।


रावण ब्राह्मणों का नायक न था, न है, न होगा... ब्राह्मणों के आदर्श हैं वे गुरु वशिष्ठ जिन्होंने राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाया। ब्राह्मणों के नायक हैं वे दधीचि, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां दान कर दी। आधुनिक काल मे भी ब्राह्मणों के नायक चाणक्य, वर्षकार, पतंजलि, शंकराचार्य, या करपात्री जी महाराज हैं, कोई रावण नहीं है। रावण उन ब्राह्मण वंशियो को ही प्रिय हो सकता है जिन्होंने धर्म का त्याग कर वामपंथ स्वीकार किया हो, वे इतने महत्वपूर्ण नहीं कि वे ब्राह्मणों को दिशा दें। मैं तो उन्हें ब्राह्मण ही नहीं मानता।


भारतीय लोक रावण को हर विजया के दिन बुराई के प्रतीक के रूप में जलाता रहा है, और जलाता रहेगा। आज भी, और हजार वर्ष बाद भी... लोक किताबी विचारकों की बात नहीं सुनता, उसकी गोद में रोज हजारों चार्वाक, मार्क्स, कन्फ्यूशियस जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। लोक अपने ही गति से मुस्कुराता हुआ चलता रहता है। यही भारत है...

 



.
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

01 अक्टूबर 2017

आवश्यकता है अपने अन्दर के रावण को मारने की

हम सब मिलकर फिर जलाएंगे रावण के पुतले को. हम सब फिर एक-दूसरे के साथ शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करेंगे. बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बताकर सभी लोग प्रसन्नता में विजयादशमी पर्व को संपन्न करेंगे. त्योहारों, पर्वों की विभिन्नता के बीच राष्ट्रीय एकता का सन्देश देता हमारा समाज एक और पर्व को हर्षोल्लास से मनाये जाने के बाद अपने पुराने ढर्रे पर वापस लौट आएगा. क्या एक पल को भी इस पर विचार किया है कि साल-दर-साल विजयादशमी पर रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है, क्यों? प्रतिवर्ष सांकेतिक रूप से बुराई के प्रतीक रावण को मारकर क्या वाकई समाज में अच्छाई का प्रतिपादन किया जा रहा है? क्या शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते समय किसी ने भी एक पल को समाज से न सही खुद अपने भीतर से बुराई को दूर करने का संकल्प लिया? समाज में सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराई, अत्याचार के प्रतीक रावण को सत्य और न्याय के प्रतीक राम के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्य, हिंसा, अत्याचार, बुराई आनुपातिक रूप से बढ़ती क्यों दिखाई दे रही है? शायद ऐसा हममें से कोई भी नहीं करता होगा और शायद ऐसा करने का प्रयास भी नहीं किया होगा.

देखा जाये तो विजयादशमी का पावन और महान सन्देश देने वाला पर्व आज सिर्फ सांकेतिक पर्व बनकर रह गया है. इस पावन पर्व पर इंसानी बस्तियों में छद्म रावण को, छद्म अत्याचार को समाप्त करके सभी लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. आज आवश्यकता रावण के पुतले को फूँकने की सांकेतिकता से साथ-साथ व्यावहारिक रूप में अपने भीतर बैठे अनेकानेक सिरों वाले रावण को जलाने की है. दरअसल समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. व्यक्तियों के बिना समाज का कोई आधार है ही नहीं. समाज की समस्त अच्छाइयाँ-बुराइयाँ उसके नागरिकों पर ही निर्भर करती हैं. इसके बाद भी नागरिकों में समाज के प्रति कर्तव्य-बोध जागृत नहीं हो पा रहा है. समाज के प्रति, समाज की इकाइयों के प्रति, समाज के विभिन्न विषयों के प्रति नागरिक-बोध लगातार समाप्त होता जा रहा है. इसी के चलते समाज में विसंगतियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं. विजयादशमी के पावन पर्व के मनाये जाने के बाद भी समाज से बुराइयों को दूर न कर पाने के पीछे इंसानों की यही सोच प्रभावी भूमिका निभाती है कि वो खुद समाज के लिए क्या सोचता है. आज समाज में विसंगतियों का आलम ये है कि नित्य-प्रति एक-दो नहीं सैकड़ों घटनाएँ हमारे सामने आती हैं जो समाज की विसंगतियों को दृष्टिगत करती हैं.

यह सुनने-पढने में बुरा लग सकता है मगर सत्यता यही है कि इसी इन्सान में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवार में, समाज में, संस्थानों में विभिन्न तरीके से स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा आदि-आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसा, अत्याचार, अनाचार, बुराई आदि कहीं, किसी भी रूप में सिखाये नहीं जाते हैं. सीधी सी बात है कि ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरण, देशकाल, परिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन कई तरह से लगातार किये जाते रहते हैं, इसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करके, कभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

इन्सान की इसी मूल चारित्रिक विशेषताओं या कहें कि दुर्गुणों के कारण ही समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी की, बच्चियों के साथ दुराचार की, बुजुर्गों के साथ अत्याचार की, वरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठना, अनावश्यक सी बात पर हत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जाना, सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठना, स्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इस रावण के चलते ही समाज में हिंसा, अत्याचार, अनाचार, अविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है. अविश्वास इस कदर कि आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.


सोचिये, ऐसे में आखिर क्या एक दिन रावण के सांकेतिक पुतले को मारकर सांकेतिक रूप में ही बुराई को मारने का काम कर लेंगे? हम में से शायद कोई नहीं चाहता होगा कि हमारे समाज में, हमारे परिवार में अत्याचार, अनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा है, हमारे परिवार में हो रहा है, हमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारी ही बेटियों को गर्भ में मारा जा रहा है. हमारी ही बेटियों को दहेज़ के नाम पर मारा जा रहा है. हमारे ही अपनों की संपत्ति को कब्जाया जा रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. और करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैं, हमारे अपने हैं, हम में से ही कोई हमारा है. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. न सही एक दिन में, एक बार में मगर समय-समय पर नियमित अन्तराल में अपने अन्दर के रावण की एक-एक बुराई को समाप्त करते रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जबकि हमें बाहरी रावण को मारने की जरूरत पड़ेगी. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगे, वास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगे, वास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे. 

11 अक्टूबर 2016

अपने अन्दर का रावण मारें

विजयादशमी का पर्व पूरे जोश-उत्साह के साथ मनाया गया. दस सिर के रावण का पुतला फिर जलाया गया. फिर बुराई पर अच्छाई की विजय, असत्य पर सत्य की विजय का सन्देश समाज में प्रसारित-प्रचारित किया गया. साल-दर-साल विजयादशमी पर रावण का पुतला फूँकने के बाद भी समाज से न तो बुराई दूर हो सकी और न ही असत्य को हराया जा सका है. समाज में सांकेतिक रूप से सन्देश देने के लिए प्रतिवर्ष बुराई, अत्याचार के प्रतीक रावण को सत्य और न्याय के प्रतीक राम के हाथों मरवाया जाता है इसके बाद भी समाज में असत्य, हिंसा, अत्याचार, बुराई आनुपातिक रूप से बढ़ती दिखाई देती है. सांकेतिक पर्व महज संकेत बनकर रह जाता है. इस पावन पर्व पर इंसानी बस्तियों में छद्म रावण को, छद्म अत्याचार को समाप्त करके सभी लोग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. आज आवश्यकता रावण के पुतले को फूँकने की सांकेतिकता से साथ-साथ व्यावहारिक रूप में अपने भीतर बैठे अनेकानेक सिरों वाले रावण को जलाने की है.



संभव है कि सुनने में बुरा लगे मगर कहीं न कहीं हम सभी में किसी न किसी रूप में एक रावण उपस्थित रहता है. इसका मूल कारण ये है कि प्रत्येक इन्सान की मूल प्रवृत्ति पाशविक है. उसे परिवार में, समाज में, संस्थानों में विभिन्न तरीके से स्नेह, प्रेम, सौहार्द्र, भाईचारा आदि-आदि सिखाया जाता है जबकि हिंसा, अत्याचार, अनाचार, बुराई आदि कहीं, किसी भी रूप में सिखाये नहीं जाते हैं. सीधी सी बात है कि ये सब दुर्गुण उसके भीतर जन्म के साथ ही समाहित रहते हैं जो वातावरण, देशकाल, परिस्थिति के अनुसार अपना विस्तार कर लेते हैं. यही कारण है कि इन्सान को इन्सान बनाये रखने के जतन कई तरह से लगातार किये जाते रहते हैं, इसके बाद भी वो मौका पड़ते ही अपना पाशविक रूप दिखा ही देता है. कभी परिवार के साथ विद्रोह करके, कभी समाज में उपद्रव करके. कभी अपने सहयोगियों के साथ दुर्व्यवहार करके तो कभी किसी अनजान के साथ धोखाधड़ी करके. यहाँ मंतव्य यह सिद्ध करने का कतई नहीं है कि सभी इन्सान इसी मूल रूप में समाज में विचरण करते रहते हैं वरन ये दर्शाने का है कि बहुतायत इंसानों की मूल फितरत इसी तरह की रहती है.

अपनी इसी मूल फितरत के चलते समाज में महिलाओं के साथ छेड़खानी की, बच्चियों के साथ दुराचार की, बुजुर्गों के साथ अत्याचार की, वरिष्ठजनों के साथ अमानवीयता की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं. जरा-जरा सी बात पर धैर्य खोकर एक-दूसरे के साथ हाथापाई कर बैठना, अनावश्यक सी बात पर हत्या जैसे जघन्य अपराध का हो जाना, सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए उसके परिजनों के साथ दुर्व्यवहार कर बैठना, स्वार्थ में लिप्त होकर किसी अन्य की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना आदि इसी का दुष्परिणाम है. ये सब इंसानों के भीतर बसे रावण के चलते है है जो अक्सर अपनी दुष्प्रवृतियों के कारण जन्म ले लेता है. अपनी अतृप्त लालसाओं को पूरा करने के लिए गलत रास्तों पर चलने को धकेलता है. यही वो अंदरूनी रावण है जो अकारण किसी और से बदला लेने की कोशिश में लगा रहता है. इस रावण के चलते ही समाज में हिंसा, अत्याचार, अनाचार, अविश्वास का माहौल बना हुआ है. अविश्वास इस कदर कि एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से भय लगने लगा है. अविश्वास इस कदर कि आपसी रिश्तों में संदिग्ध वातावरण पनपने लगा है.


आखिर क्या हम सब महज एक दिन रावण के सांकेतिक पुतले को मारकर सांकेतिक रूप में ही बुराई को मारने का दम भरते रहेंगे? क्या हम सब एक दिन बुराई का अंत करने का प्रहसन सा करके शेष पूरे वर्ष भर बुराई, अत्याचार को बढ़ावा देते रहेंगे? हम में से शायद कोई नहीं चाहता होगा कि हमारे समाज में, हमारे परिवार में अत्याचार, अनाचार बढ़े. इसके बाद भी ये सबकुछ हमारे बीच हो रहा है, हमारे परिवार में हो रहा है, हमारे समाज में हो रहा है. हमारी ही बेटियों के साथ दुराचार हो रहा है. हमारी ही बेटियों को गर्भ में मारा जा रहा है. हमारी ही बेटियों को दहेज़ के नाम पर मारा जा रहा है. हमारे ही अपनों की संपत्ति को कब्जाया जा रहा है. हमारे ही किसी अपने की हत्या की जा रही है. हमारे ही किसी अपने का अपहरण किया जा रहा है. और करने वाले भी कहीं न कहीं हम सब हैं, हमारे अपने हैं, हम में से ही कोई हमारा है. ऐसे में बेहतर हो कि हम लोग रावण के बाहरी पुतले को मारने के साथ-साथ आंतरिक रावण को भी मारने का काम करें. न सही एक दिन में, एक बार में मगर समय-समय पर नियमित अन्तराल में अपने अन्दर के रावण की एक-एक बुराई को समाप्त करते रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जबकि हमें बाहरी रावण को मारने की जरूरत पड़ेगी. तब हम वास्तविक समाज का निर्माण कर सकेंगे, वास्तविक इन्सान का निर्माण कर सकेंगे, वास्तविक रामराज्य की संकल्पना स्थापित कर सकेंगे.

06 अक्टूबर 2011

विकृतियों के रावण को मारने के लिए शुचिता की शक्ति धारण करें


सभी धर्मों के द्वारा एक बात बड़े ही जोर-शोर से कही और समझाई जाती है कि इंसान का शरीर ही मरता है, उसकी आत्मा कभी नहीं मरती है। आत्मा के अमर-अजर होने का प्रमाण हमें पहले कभी मिला हो या न मिला हो किन्तु अब समझ में जरूर आ गया है। पूरा देश विगत कई दशकों से, कई सदियों से विजयादशमी का पर्व पूरे जोशोखरोश से मनाता रहा है और रावण का वध भी पूरे देश में प्रत्येक वर्ष होता रहा है।



अब देखिये न, प्रत्येक वर्ष पूरे देश में प्रत्येक नगर में, गांव में, कस्बे में रावण को जलाने का कार्य किया जाता है, इसके बाद भी देश भर में रावण के विविध रूप अपना सिर उठाये घूमते दिखाई पड़ते हैं। कहीं आतंकवाद के रूप में तो कहीं हिंसा के रूप में; कहीं जातिवाद के रूप में तो कहीं क्षेत्रवाद के रूप में; कहीं महिला हिंसा के रूप में तो कहीं कन्या भ्रूण हत्या के रूप में; कहीं भ्रष्टाचार के रूप में तो कहीं रिश्वतखोरी के रूप में। उसको जहां जैसा मौका मिला है उसने वैसा ही अपना रूप धारण करके देशवासियों को परेशान करना प्रारम्भ किया है।

यही वे स्थितियां हैं जो समझाती हैं कि आत्मा अमर-अजर है, यदि वाकई देह की मौत के साथ-साथ आत्मा की भी मृत्यु हो जाती तो जिस समय राम ने रावण को मारा था उसी समय उसी वास्तविक मौत हो गई होती। वह अपने विविध रूपों के साथ प्रत्येक कालखण्ड में देश में अराजकता की स्थिति को पैदा नहीं कर रहा होता। आत्मा की अमरता के कारण ही रावण प्रत्येक वर्ष अपना रूप बदल कर हमारे सामने आ खड़ा होता है और हम हैं कि विजयादशमी के दिन उसके पुतले को मार कर इस मृगमारीचिका में प्रसन्न रहते हैं कि हमने रावण को मार गिराया है। वास्तविकता में देखें तो रावण किसी भी वर्ष मरता नहीं है बल्कि वह तो साल दर साल और भी विकराल रूप धारण कर लेता है, साल दर साल वह अपार विध्वंसक शक्तियों को ग्रहण करके अपनी विनाशलीला को फैलाता रहता है।

हमारे प्रत्येक वर्ष रावण के पुतले को जलाने से, इसके बाद हर्षोल्लास मनाने से किसी भी प्रकार से कोई भला नहीं होने वाला। हमें संकल्प लेना पड़ेगा कि हम देश में फैले विकृतियों के रावणों को जलाने का, मारने का कार्य करें। अपने आपको चारित्रिक शुचिता की शक्ति से संवारें ताकि वर्तमान में गली-गली में, कूचे-कूचे में घूम-टहल रहे रावणों को मार सकें।



चित्र गूगल छवियों से साभार

17 अक्टूबर 2010

मिटें वैसे ही अंधियारे.....


रावण आज मिटा जैसे,
मिटें वैसे ही अंधियारे,
जगमग दीपों की ज्योति,
हो रोशन जीवन में आपके


चित्र गूगल छवियों से साभार

==========================
विजयादशमी की आप सभी को शुभकामनायें

09 अक्टूबर 2008

विजयादशमी की शुभकामनायें

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।
बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।