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31 जुलाई 2023

खो गई पत्रों की आत्मीय सुगंध

तकनीक के आने से बहुत सारी सुविधाओं की प्राप्ति हुई तो उसने अनेक तरह के एहसासों  से वंचित भी किया है। बहुत सारे एहसासों  के गायब होने के बीच सर्वाधिक कमी महसूस होती है पत्र मिलने की, पत्र लिखने की। ‘हम सब यहाँ कुशल से हैं और आशा करते हैं कि  आप सभी लोग भी कुशल से होंगे। आगे समाचार ये है कि....’ जैसी आत्मीयता भरी पंक्ति से आज की मोबाइल पीढ़ी परिचित ही नहीं होगी। यादों का पिटारा खोलकर बैठे तो लगा कि  अत्यंत तीव्रगति से संदेशों को इधर से उधर भेज देने वाली तकनीक मे हमने संदेशों को भले प्राप्त कर लिया हो मगर उसके भीतर छिपे एहसासों को खो दिया है। उस दौर मे जबकि एक-दूसरे के कुशलक्षेम का माध्यम पत्र हुआ करता था, तब पत्र बाँटने वाला डाकिया भी किसी रिश्ते की डोर से बँधा  होता था। उसके आने मात्र की आहट मन को, दिल को उमंगित कर जाती थी। किसका पत्र होगा, क्या समाचार आया होगा इन सबके बीच सबसे पहले पत्र पढ़ने की होड़ लगा करती थी। किसी आत्मीय का, स्वजन का, मित्र का विशेष पत्र होने पर उसे घंटों के हिसाब से कई-कई दिनों तक पढ़ा जाता था। बहुतेरे पत्र तो किसी अनमोल खजाने की तरह से हमेशा के लिए सुरक्षित रख लिए जाते थे।




तकनीक के आने ने संदेशों का, समाचारों का संप्रेषण अत्यधिक तीव्र कर दिया है। इधर एक तरफ से एक क्लिक किया गया दूसरी तरफ तत्काल उस संदेश की प्राप्ति हो जाती है। इस तीव्रगति से भागती संदेशों की दुनिया मे संदेश तो तत्काल प्राप्त हो गए मगर उनसे जुड़ना नहीं हो पा रहा है। मोबाइल, कम्प्यूटर के मैसेज, ई-मेल के इलेक्ट्रॉनिक रूप से उत्पन्न मशीनी शब्दों मे वो आत्मीयता नहीं दिखाई देती है जो हस्तलिपि वाले पत्रों मे हुआ करती है। बैठकर इत्मीनान से पत्र पढ़ने के बजाय अब चलते-फिरते, गाड़ी चलाते, सफर करते संदेशों पर निगाह डाल ली जाती है। कभी-कभी सुरक्षित या सँजोकर रखने वाले संदेश भी क्लियर ऑल के चक्कर मे सदैव को गायब हो जाते हैं।


देखा जाए तो पत्र लेखन का एक इतिहास है जो हजारों वर्षों से हम सबके बीच उपस्थित है। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन मिस्र में मृतकों को पत्र लिखना आम बात है। पत्र लेखन का कोई व्यवस्थित इतिहास तो नहीं मिलता है मगर ऐसा माना जाता है कि अब तक लिखा गया पहला पत्र लगभग 500 ईसा पूर्व फारस की रानी एटोसा द्वारा भेजा गया था। ट्रिनिटी कॉलेज डबलिन के इतिहास और मानविकी प्रोफेसर ब्रिड मैकग्राथ द्वारा इसे अब तक के सबसे महत्वपूर्ण पत्र के रूप में उद्धृत किया गया है। मैकग्राथ के अनुसार रानी ने पत्रों को लंबी दूरी के संचार का सामान्य और प्रभावी रूप दिया। समय के साथ इसने लेखन सामग्री के निर्माण के लिए संपूर्ण उद्योगों का निर्माण किया और अंततः डाक सेवा का आधार बनाया जो आज भी फल-फूल रही है।


असल मे पत्र लेखन के माध्यम से महज संदेशों का संप्रेषण ही नहीं होता है बल्कि विचारभिव्यक्ति को भी एक मंच मिलता है। पत्र लेखन के द्वारा भावों से परिचय करवाने के साथ-साथ लेखन कला से भी परिचित होने का अवसर मिला करता है। वैश्विक स्तर पर बहुत सारे नामचीन लोगों के पत्रों को आज भी आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाता है। विश्व स्तर के दो महानुभावों के मध्य हुए पत्राचार को आज अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, उनका प्रकाशन होता है, उनके विचारों को उल्लेखित भी किया जाता है। यह सब महज संयोग नहीं है। पत्रों द्वारा एक पीढ़ी के विचारों का हस्तांतरण दूसरी पीढ़ी को होता है। उस दौर की पीढ़ी के विचार, उनकी मानसिकता, जीवन-शैली, उस समय की दशा-दिशा आदि का बोध भी पत्रों के माध्यम से जानना-समझना संभव होता है।


सामान्य पाठ्यक्रम के रूप मे पत्रों को औपचारिक और अनौपचारिक श्रेणी मे बाँटकर भले ही आज विद्यार्थियों के बीच रखा जा रहा हो मगर उनको पत्र-लेखन से परिचित नहीं करवाया जा रहा है, न ही उसका व्यावहारिक ज्ञान दिया जा रहा है। तकनीक ने पत्रों की औपचारिक श्रेणी को तो लगभग समाप्त ही कर दिया है। अनौपचारिक पत्रों की श्रेणी आज भी सरकारी, गैर-सरकारी कार्यों के कारण जीवित है। आज की पीढ़ी बहुत हद तक उसी से परिचित है। विभागीय पत्र, नियुक्ति संबंधी पत्र, शिकायती पत्रों आदि से आए दिन उसका सामना होता रहता है मगर उनके द्वारा भावनाओं की, एहसासों की सुगंध का अनुभव उसे नहीं हो पाता है। इस सुगंध से उसका परिचय होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण उसमें छिपी आत्मीयता है। व्यक्ति के जीवन मे अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जबकि वह अपनी बात को खुलकर सामने नहीं रख पाता है। बहुत बार देखने मे आता है कि  अनेक अवसरों पर अत्यंत निकट व्यक्ति के सामने, अत्यंत आत्मीय के सामने भी शब्दों का प्रस्फुटन नहीं हो पाता है। पत्र-लेखन इसी बंधन से मुक्त करता है। अपनी बात को बेझिझक, खुलकर अपनी ही भावनाओं मे व्यक्त करने का अवसर देता है।


संभव है कि आज की तीव्रतम गति से भागती दुनिया को, तत्काल ही फल प्राप्त कर लेने वाली मानसिकता को ये सारी बातें दकियानूसी, अनुपयोगी प्रतीत हो रही हों। सच भी है, क्योंकि अब वो धैर्य दिखाई नहीं देता जो किसी एक पत्र के लिए कई-कई दिन तक डाकिया की राह देखा करता था। बावजूद इसके कि समय के साथ बहुत सी चीजें पीछे छूट गईं हैं, अनुपयोगी हो गईं हैं, आम चलन में नहीं हैं मगर उनको किसी न किसी रूप में हमारा समाज जीवित रखे हुए है। झोपड़ी, लालटेन, मिट्टी का चूल्हा आदि आज रेस्टोरेंट, होटलों मे आधुनिक रूप मे सुसज्जित होकर हम सबको आकर्षित करते हैं। ग्रामीण जीवन से बाहर निकल कर शहरी जीवन में प्रवेश करने के बाद भी हम किसी न किसी बहाने ग्रामीण अञ्चल के जीवन का अनुभव करने का प्रयास करते हैं, ठीक इसी प्रकार से आज की तकनीकी दुनिया मे अनौपचारिक पत्र अनुपयोगी से, महत्तवहीन से भले लगने लगे हों मगर अपने बच्चों को ‘हम सब यहाँ कुशलता से रहकर तुम सबकी कुशलता की कामना करते हैं..’ पंक्ति की सुगंध से, एहसास से परिचित करवाने का प्रयास करना चाहिए।  

  

(विश्व पत्र दिवस के अवसर पर)



 

30 जुलाई 2022

पत्र लिखने का एहसास आज भी जिंदा है

किसी समय जुलाई महीना आने की ख़ुशी होती थी. बाद में ये ख़ुशी बढ़ गई. ख़ुशी इसलिए बढ़ गई क्योंकि जिस छोटे भाई का जन्मदिन इसी माह पड़ता है, उसकी जीवन संगिनी का जन्मदिन भी इसी माह पड़ता है. इस ख़ुशी में बढ़ोत्तरी उस समय हुई जबकि हमारे छोटे भाई समाज शरद ने पत्र लेखन को लेकर एक अभियान छेड़ दिया. शरद वर्तमान में पत्रकारिता से जुड़े हैं और जाना-पहचाना नाम हैं, उनके बारे में फिर कभी.


हो सकता है कि बहुत से लोगों को जानकारी न हो कि 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस मनाया जाता है. इस दिन को मनाये जाने के पीछे कारण यही है कि लोग एक-दूसरे को पत्र लिखें. यदि हम इससे इतर व्यक्तिगत अपने स्तर पर बताएँ तो 31 जुलाई हमारे लिए ख़ुशी का एक और कारण लेकर आई है. इस दिन हमारी बेटी का जन्म हुआ था. जहाँ एक तरफ लोग इस दिन को प्रेमचंद जयंती के रूप में मनाते हैं, वहीं हम इसे अपनी बेटी के जन्मदिन के रूप में और पत्र दिवस के रूप में मनाते हैं.




पत्र दिवस मनाये जाने का कोई ख़ास कारण नहीं मगर इतना ख़ास है कि हम आज के ई-मेल, सोशल मीडिया सन्देश के ज़माने में लोगों को पत्र लिखते हैं. इस आश्चर्य के ऊपर एक आश्चर्य ये कि पत्र हम अपनी हस्तलिपि में लिखते हैं, वो भी फाउंटेन पेन से. पत्र लिखने के संस्कार बचपन से ही हमारे अन्दर आ गए थे. वैसे देखा जाये तो किसी भी बच्चे में किसी भी चीज के संस्कार उसके परिवार से आते हैं, उसके आसपास के माहौल से आते हैं. आज तो मोबाइल का जमाना है, इंटरनेट का युग है, ऐसे में कौन पत्र लिखने की तरफ ध्यान देता है.


इसी युग के सापेक्ष हम जब अपने उस पत्र लेखन वाले युग को याद करते हैं तो वही ज्यादा सुखद लगता है. उस दौर में भावनाओं को सुरक्षित रख पाना संभव था. आज सारे एहसास, सारी भावनाएँ एक क्लिक पर निर्भर हैं. उस दौर में दिन भर डाकिये का इंतजार रहता था, आज बार-बार घंटी बजाने वाले नोटिफिकेशन सर दर्द समझ आने लगते हैं.


बहरहाल, यदि पत्रों पर लिखने बैठे तो पोस्ट लम्बी हो जाएगी. इधर इंटरनेट ने वर्तमान पीढ़ी को कुछ इस तरह का बना दिया है कि वह लम्बी पोस्ट पढ़ना ही नहीं चाहती. और वैसे भी उसने पत्रों की दुनिया को देखा नहीं है, उसका एहसास नहीं किया है तो उसके लिए यह पोस्ट किसी काम की नहीं. यह पोस्ट तो हम जैसे उन लोगों के लिए है जिन्होंने पत्र के एहसास को देखा है, जिया है.


31 जुलाई, विश्व पत्र दिवस की सभी को शुभकामनायें.


31 जुलाई 2021

जब की गई थी हमारे पत्रों की जाँच

आज, 31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस का आयोजन किया जाता है. हमारे छोटे भाई शरद इसे लेकर विगत कई वर्षों से एक अभियान छेड़े हुए हैं. चूँकि हमें पत्र लेखन का बहुत पुराना शौक है. आज भी प्रतिमाह पत्र लिखना होता है, भले ही किसी का जवाब आये या न आये.




आज इस मौके पर उन दिनों की एक घटना याद आ रही है जबकि रोज ही दसियों पत्रों का लिखा जाना होता था और दस-पंद्रह पत्र रोज ही आते थे. इसे संयोग ही कहा जायेगा कि अपने जन्म से लेकर अभी तक उरई में हमारे सामने मात्र दो मकानों में रहने की, दो मोहल्लों में रहने की स्थिति आई. पहले हम पाठकपुरा में किराये से रहते थे फिर रामनगर में अपने मकान में आ गए. ये भी संयोग कहा जायेगा कि दोनों जगह डाकिया ऐसे मिले जो आत्मीयता से जुड़े रहे, पारिवारिक रूप में जुड़े रहे. इसका सुखद परिणाम ये हुआ कि कभी कोई पत्र गायब नहीं हुआ. (हाँ, कुछ महीनों के लिए एक खुरापाती डाकिया अवश्य मिला वो भी पिताजी की एक फटकार के बाद किसी और जगह के लिए निकल लिया था.)


खैर, घटना उन अत्याधिक पत्रों के आने से सम्बंधित है. एक दिन हमें पत्र मिले तो लगभग सभी पत्र खुले हुए थे कि वे अपने आप नहीं खुले बल्कि फाड़कर खोले गए थे. और खुले भी कुछ इस तरह से थे कि वे मात्र खोले नहीं गए थे बल्कि ऐसा समझ आ रहा था कि खोलकर पढ़े भी गए हैं. हमारे कुछ बोलने से पहले ही डाकिया ने कहा कि ये हमें खुले मिले हैं और पोस्टमास्टर ने दिए हैं.


हम तुरंत ही डाकघर पहुँचे और पोस्टमास्टर से मिले. उनको जब अपना नाम बताया तो वे तुरंत ही हमारे पत्रों के खोले जाने की बात बताने लगे. उनके अनुसार ऊपर के आदेश पर कोई कमिटी बनाई गई है जो लगातार आते तमाम सारे पत्रों को जांचेगी. उसी कमेटी ने हमारे पत्रों को खोलकर देखा था. पोस्टमास्टर ने बताया कि आपके रोज ही पंद्रह-बीस पत्र आते हैं, इस कारण से ऐसा किया गया.


अब इस कमेटी वाली बात में कितनी सच्चाई थी, ये तो वही जानें मगर उसके बाद से हमारे किसी पत्र को खोलकर नहीं देखा गया.


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(आपको बताते चलें कि ये बात 1995-96 की थी, तब हम सामाजिक क्षेत्र में आज की तरह सक्रिय नहीं थे. इस कारण भी शायद लगा होगा कि किसी अनाम, अपरिचित नामवाले के इतने सारे पत्र क्यों और किसलिए आते हैं?)

12 सितंबर 2020

साधारण डाक यदि कूड़े के ढेर में मिले तो कोई आश्चर्य नहीं

तकनीकी विकास ने पत्र-लेखन को लगभग समाप्त ही कर दिया है. इधर इसके साथ-साथ एक बात और देखने को मिली है कि साधारण डाक का वितरण भी लगभग शून्य हो गया है. इस जुलाई में पत्र लेखन दिवस पर बहुत से मित्रों को पत्र लिखे थे. इन मित्रों में स्थानीय मित्र भी शामिल थे और देश के अनेक प्रदेशों के मित्र भी शामिल रहे. बहुत से मित्रों को पत्र मिले और बहुत से मित्र अभी तक पत्र से वंचित हैं. कुछ दिन पहले एक पंजीकृत पत्र के वितरण में हो रही अनावश्यक देरी के कारण अपने एक अधिकारी मित्र को अपनी समस्या से अवगत कराया. उनकी सहायता से पत्र तो प्राप्त हुआ मगर इस कोरोना काल में डाक विभाग की समस्या से भी परिचित होने का मौका मिला. उस पत्र के विलम्ब से वितरण का कारण समझ आया.


कोरोना काल के दौर में लागू किये गए लॉकडाउन और ट्रेनों की, परिवहन के अन्य साधनों की आवाजाही बंद करवाने के कारण पत्र वितरण में समस्या आनी स्वाभाविक थी. इस समस्या के चलते मन ने स्वीकार कर लिया कि शहर/जनपद से बाहर के पत्र वितरण में परिवहन के साधनों की उचित उपलब्धता के कारण देरी होना स्वाभाविक है मगर शहर के अन्दर पत्र वितरण में देरी का क्या कारण है? हमने अपने जनपद के मित्रों को तो पत्र लिखे ही साथ ही उरई शहर के अनेक मित्रों को पत्र लिखे. शहर के कुछ मित्रों को पत्र मिल भी गए मगर जनपद के अन्य स्थानों तक पत्र नहीं पहुँचे. समझ नहीं आया कि उरई शहर की डाक को उरई शहर में वितरित करने के लिए कौन सी ट्रेन की आवश्यकता है? यदि जनपद के अन्य स्थानों की बात पर भी विचार करें तो भी अब निजी वाहनों का चलना आरम्भ हो गया है. ऐसे में पत्रों का जनपद में ही, शहर में ही वितरित न हो पाना समझ से परे है.


साधारण डाक वितरण का सुस्त रहना या फिर वितरण ही न किया जाना आज की समस्या नहीं वरन उस समय की भी समस्या है जबकि समाचारों के आदान-प्रदान का माध्यम पत्र ही हुआ करते थे. बहुत अच्छी तरह से याद है कि एक बार हमारे शहर के एक डाकिये की शिकायत पर उसके खिलाफ जाँच बैठाई गई तो मालूम हुआ कि वह सारी की सारी साधारण डाक अपने घर ले जाकर चूल्हे में जला देता है. ऐसी घटनाओं के होने के बाद भी तब डाक व्यवस्था अपने सुव्यवस्थित रूप में काम किया करती थी. आज भी बहुत सी जगहों पर डाक व्यवस्था अच्छी सेवा के रूप में जानी जा रही है. इसका उदाहरण स्वयं हम हैं. कोरोना काल में जैसे ही डाक सेवाएँ सामान्य हुईं वैसे ही हमारी डाक नियमित रूप से आने लगी. सप्ताह में दो-तीन दिन डाक को आना ही होता है. इस बात को हमारे क्षेत्र में अभी तक कार्यरत रहे डाकिये भली-भांति जानते रहे हैं.

कुछ साल पहले तक हम इन डाकियों की परीक्षा भी ले लिया करते थे. खुद ही एक पोस्टकार्ड लिख कर डाल दिया करते थे. उसमें किसी तरह का कोई समाचार न लिख कर कोई नंबर, कोई पंजीकरण संख्या आदि लिख देते थे. पोस्टकार्ड देखने पर समझ आता कि कोई बहुत महत्त्वपूर्ण समाचार नहीं है, कोई अनिवार्य रूप से पहुँचाने वाला सन्देश नहीं है, इसके बाद भी हमारा पोस्टकार्ड हम तक पहुँचता. कई बार डाक की गड़बड़ी हमारे साथ भी हुई मगर उसकी शिकायत के द्वारा वह गड़बड़ी भी दूर करवा दी जाती रही.

फ़िलहाल तो अब पत्र लिखने वाले भी न के बराबर हैं, डाक से सामग्री पाने वाले भी न के बराबर हैं. ऐसे में डाकिये भी डाक की, साधारण डाक की महत्ता को जान-समझ रहे हैं. यदा-कदा आने वाली साधारण डाक यदि कूड़े के ढेर में मिले या फिर नाले में, आग के हवाले चली जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

27 अगस्त 2020

पत्र के इंतजार का भी अपना मजा है

31 जुलाई को पत्र दिवस मनाया गया. इस अवसर पर हमने कई मित्रों को पत्र लिखे. सोशल मीडिया के दौर में, संचार तकनीकी विकास के दौर में बहुत से लोगों के लिए पत्र लेखन एक अजूबे से कम नहीं है. सोशल मीडिया के बहुत से मित्रों ने अपने-अपने पते भेजे, उन सभी मित्रों को तत्काल पत्र लिख दिए गए. पत्र लेखन हमारे लिए हमेशा से एक शौक की तरह रहा है. हमें कभी भी पत्र लिखने में ऊबन नहीं हुई और न ही हमने कभी कभी पत्र लिखने में संकोच किया. आज भी ये स्थिति है कि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं पर पत्र लिख कर लेखकों को बधाई, शुभकामनायें देने का काम करते ही हैं. इसके लिए उनसे परिचित होना हमारे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है.



पत्र लेखन के लिए हमारा मानना है कि साहित्यिक विधा में पत्र लेखन एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा विचारों को ही नहीं वरन संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों आदि को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जा सकता है. आज भले ही तकनीकी के प्रसार के दौर में संदेशों का, विचारों का तत्काल एक-दूसरे तक पहुँचना आसान हो गया हो मगर पत्रों के द्वारा जिस तरह से भावनाएं, संवेदनाएं एक-दूसरे के बीच हस्तांतरित हुआ करती हैं, वो बात आज के तकनीकी सन्देश माध्यमों में नहीं है.

बहुत से मित्रों को पत्र मिले और बहुत से मित्रों को पत्र नहीं भी मिले. कोरोना काल में जहाँ बहुत सी व्यवस्थाएँ ध्वस्त सी दिख रही हैं, उसी में डाक व्यवस्था का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है. पत्रों के न के बराबर आने-जाने से भी डाक व्यवस्था इस तरफ लगभग सुस्त रहती है. ऐसे में अनेक मित्रों ने ऐसे संशय प्रकट किया है मानो हमने उनको पत्र नहीं लिखा है. हमको जिन-जिन मित्रों के पते मिले हैं, उन सभी को हमने पत्र लिख भी दिए हैं. अब वे अपने-अपने क्षेत्र के डाकिया से संपर्क साधे रहें और पत्र का इंतजार करें. वैसे पत्र लेखन की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ पत्र प्राप्ति के इंतजार का अपना ही एक अलग मजा है.

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01 अगस्त 2020

शरारत भरी हेराफेरी के साथ पत्र लेखन का शौक

31 जुलाई को विश्व पत्र दिवस मनाये जाने पर हमने विचार किया था कि उस दिन अपने मित्रों को पत्र लिखेंगे. इसी सम्बन्ध में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लगाकर उन मित्रों के पते चाहे जो हमारा पत्र पाना चाहते हों. लगभग आधा सैकड़ा मित्रों ने अपने पते हमें भेज कर पत्र भेजने की इच्छा व्यक्त की. इतने सारे मित्रों की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखकर उत्साह बढ़ गया. कल और आज तमाम कामों के बीच से समय निकाल कर बहुत से मित्रों को पत्र लिख भी डाले. पत्र लिखने में बड़ा ही मजा आ रहा था. यद्यपि पत्रों के आने-जाने के लगभग न के बराबर माहौल में भी हम नियमित रूप से पत्र लिखते रहते हैं तथापि इतनी बड़ी संख्या में पत्र बहुत दिन बाद लिखना हो रहा है.


इनको लिखने के दौरान वे दिन भी सामने आकर खड़े हो जा रहे हैं जबकि पत्रों के द्वारा मित्रों, परिचितों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान होता था. पढ़ने के उन दिनों में पत्र लिखने का चाव बहुत बुरी तरह से हम मित्रों के बीच बना हुआ था. हम दोस्तों की बातें किसी और को पता न चलें इसके लिए लिफाफे का इस्तेमाल किया जाता था. मंहगा होने के बाद भी इसका इस्तेमाल करना मजबूरी थी. एक तरफ अपनी बातों को सबसे छिपाना होता था दूसरे बातें इतनी अधिक होती थीं कि उनका अंतर्देशीय पत्र में सिमट पाना संभव ही नहीं होता था. ऐसे में न तो अंतर्देशीय पत्र काम करता था और पोस्टकार्ड की तरफ तो देखा भी न जाता था. कई-कई पन्नों में हम दोस्तों की अपनी गाथा सिमटी होती थी. अलग-अलग शहरों में पढ़ रहे हम मित्र अपने कॉलेज की, दोस्तों की, पढ़ाई की चर्चा करते रहते.



जेबखर्च की सीमित स्थिति के चलते डाक टिकटों के साथ कुछ शरारत कर ली जाया करती थी. साधारण डाक लिफाफा एक रुपये का हुआ करता था. किसी कागज़ का लिफाफा बनाकर उस पर दस-दस पैसे के दस टिकट अलग-अलग जगहों पर लगाये जाते थे. ऐसा करने से कई बार कुछ डाक टिकट मुहर लग जाने से बच जाया करते थे. उनका दोबारा उपयोग कर लिया जाता था. एक-दो बार प्रयोग किये गए लिफाफों को भी चला दिया गया. प्राप्ति वाले पते को काट कर लिख दिया कि ये व्यक्ति यहाँ नहीं रहता है और वापसी वाला पता डाल दिया जाता था. हालाँकि ऐसा एक-दो बार ही किया गया मगर काम बन गया था.

आज तकनीकी इस कदर तेज है कि पलक झपकने के साथ लोगों तक अपनी बात पहुँच जा रही है. इसके बाद भी हम खुद महसूस करते हैं कि उन दिनों जैसी भावनाएं मशीनी पत्र में देखने को नहीं मिल रही हैं. आज के मशीनी संदेशों का संकलन आसान हो गया है मगर उनको पढ़ने में, उनको दोबारा खोलकर देखने में किसी एहसास की अनुभूति नहीं होती है. शब्दों का टाइप होना, कागज छूने का एहसास न होना, अनजाने ही उस व्यक्ति का चेहरा उन लिखे शब्दों में बनना अब महसूस ही नहीं होता. बहरहाल, ये तकनीक है जो बदल कर इस दौर में ले आई है मगर हमें हमारे मित्रों ने उन्हीं पुराने दिनों की याद ताजा करवा दी है. सभी का हृदय से आभार.

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