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15 मई 2023

कृषि-पदार्थों की विपणन व्यवस्था में हो सुधार

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है. यहाँ के जीवन और अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका है. देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में कृषि की सशक्त भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है. देश की बहुसंख्यक आबादी कृषि पर निर्भर है. माना जाता है कि लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का सराहनीय योगदान होने के साथ-साथ विश्व में भी कृषि के कारण भारत की साख बनी हुई है. ऐसी स्थिति के बाद भी इस क्षेत्र में कतिपय समस्याएँ निरंतर विद्यमान रहती हैं. जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण कृषि क्षेत्र समस्याग्रस्त भी बना रहता है.


शहरों के विकास और वहाँ तीव्रतर गति से बढ़ती जनसंख्या के परिणामस्वरूप खाद्य फसलों की आवश्यकता तेजी से महसूस हुई. किसान अब वाणिज्यिक फसलों को महत्व देने लगा. कृषि के बढ़ते वाणिज्यीकरण, बाजारीकरण के कारण लगातार चली आ रही पुरानी विपणन व्यवस्था में सुधार की ओर ध्यान देना आवश्यक है. अच्छी विपणन व्यवस्था एक ओर औद्योगिक विकास के हित में है, साथ ही किसानों के लिए भी लाभप्रद है. उचित विपणन में यह आवश्यक होता है कि कोई उपभोक्ता हो, साथ ही बिक्री सम्बन्धी एक मानक व्यवस्था हो. इसमें कृषि-उपज को बिक्री हेतु एकत्र करना, उसे मण्डियों तक लाना, परिवहन की व्यवस्था करना, उनके गोदाम में रखने की व्यवस्था करना, इसके बाद ही बिक्री की कड़ी आती है.




देखने में आया है कि कृषि-पदार्थों की विपणन व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं हो पा रही है. विपणन व्यवस्था में कमी के साथ-साथ भारतीय कृषि की दशायें भी इस पर अपना प्रभाव डालती हैं. किसान की गरीबी और पिछड़ेपन के कारण भी विपणन की आदर्श स्थिति निर्मित नहीं हो पाती है. वर्तमान में देश में अनेक प्रकार की विपणन व्यवस्थायें कार्य कर रहीं हैं. ये व्यवस्थायें समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वतः ही निर्मित हो जातीं हैं. आज भी बड़े पैमाने पर गाँव के छोटे किसान परिवहन की समस्या, फसल का मूल्य शीघ्र ही पाने की विवशता, जीवन-निर्वाह के लिए तथा अन्य दूसरे कार्यों के लिए धन की नितांत आवश्यकता के चलते कम दामों में अपनी फसल को गाँवों में ही बेचने को विवश होता है. अनेक किसान अपनी फसल को गाँव में न बेचकर आसपास लगने वाली हाट में बेच देते हैं. इसके पीछे किसान का एक कारण उसी बाजार से अपनी जरूरत का सामान भी क्रय कर लेना होता है. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बड़े किसान जिनके पास फसल का आधिक्य होता है वे इस प्रकार से हाट में अपनी फसल नहीं बेचते हैं. यहाँ वे किसान विपणन के लिए आते हैं जिन्हें नकद धनराशि की आवश्यकता शीघ्र ही होती है. असल में यातायात की कठिनाई के कारण, मंडियों में आढ़तियों और दलालों के कपटपूर्ण व्यवहार के चलते संकोचवश एवं आशंकित होकर भी छोटे किसान बड़ी मंडियों में जाने से घबराते हैं. इस कारण वे गाँव के आसपास के छोटे शहर में बनी मंडी में अपनी फसल को बेच देते हैं. इस प्रकार की मंडियों का संचालन थोक व्यापारियों के हाथों में होता है. इस व्यवस्था में किसान कई बार घाटे का शिकार हो जाता है.

 

कृषि उत्पादों का सही मूल्य दिलवाने और किसानों का कपटपूर्ण व्यवहार से बचाने के लिए सहकारी विपणन पर जोर दिया जाता है. सहकारी विपणन समितियाँ थोड़े-थोड़े विपणन आधिक्य को एकत्र कर बेचतीं हैं. इसमें सामूहिक रूप से फसल को इकट्ठा कर मण्डी में बेचा जाता है. इससे सौदा करने की शक्ति बढ़ती है, किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है और वे अपने उत्पादन की बेहतर कीमत प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं. इससे किसानों में उत्पादन करने के प्रति भी एक उत्साह का संचार होता है. वर्तमान में हमारे देश में सहकारी विपणन व्यवस्था के साथ-साथ अन्य विपणन व्यवस्थायें भी काम कर रहीं हैं. इनके चलते कृषि विपणन व्यवस्था में कई प्रकार के दोष देखने में आते हैं. इन दोषों के कारण किसानों को एक तो उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, दूसरे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. गाँव आधारित विपणन व्यवस्था में सबसे बड़ा दोष संग्रहण का होता है. फसल के संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. इस प्रकार के संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने से, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष कहा जा सकता है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. इससे किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं. किसानों को ऋण चुकाने के लिए, आगामी फसल के लिए माल लेने के लिए, जीविकोपार्जन के लिए धन की आवश्यकता के कारण उचित विपणन व्यवस्था प्राप्त नहीं हो पाती है. मूल्य की सही जानकारी न लगना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जायेगी.


यदि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो, सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए. इसके लिए सरकार सहकारी मंडियों को तो बढ़ावा देने के साथ-साथ श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी, दूरदर्शन और अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाई जाए. नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. 






 

16 अप्रैल 2018

विपणन व्यवस्था सुधारे बिना कृषि विकास संभव नहीं


किसी भी सरकार द्वारा अब कृषि के बजाय औद्योगीकरण की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है. कारोबारियों को तमाम तरह के लाभ देने के साथ-साथ व्यवसाय से सम्बंधित अनेक कार्यक्रम भी समय-समय पर सरकारी स्तर पर किये जाते हैं. इसके बाद भी अनेक तरह के व्यवसाय के बीच, विभिन्न तरह के कारोबार विकसित होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि को नकारा नहीं जा सकता है. आज मानसून की अनियमितता के चलते अथवा मौसम के लगातार बनते-बिगड़ते स्वभाव के बाद भी भले ही कृषि का चक्र अनियमित दिखता हो किन्तु इसके बाद भी देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. कृषि का सराहनीय योगदान न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था में बना हुआ है वरन सम्पूर्ण विश्व में भी भारतीय कृषि की अपनी ही साख बनी हुई है. चाय, चावल, मूँगफली तथा तम्बाकू ऐसे कृषि उत्पाद हैं जिनके उत्पादन के चलते वैश्विक स्तर पर भारत का पहले तीन देशों में कोई न कोई स्थान बना रहता है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. देखा जाये तो ऐसी समस्या देश की आर्थिक, सामाजिक, प्राकृतिक स्थितियों के साथ-साथ अन्य कारणों के चलते है. जोतों का छोटा आकार होना, कृषि की मानसून पर निर्भरता, भू-स्वामित्व प्रणाली का दोषपूर्ण होना, वित्त सुविधाओं का अभाव, परम्परागत ढंग से कृषि करना, जनसंख्या का दवाब आदि ऐसी स्थितियाँ हैं जिनके कारण भारतीय कृषि पिछड़ी दशा में है. इन समस्याओं के अतिरिक्त कृषि पदार्थों के विपणन की व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि को पिछड़ा बना रही है. देश का बहुसंख्यक किसान कृषि फसल के उचित विपणन न होने के कारण कृषि कार्य में उन्मुक्त रूप से संलिप्त नहीं हो पाता है. 


हमारे देश में कृषि विपणन व्यवस्था में वर्तमान में कई प्रकार के दोष देखने को मिलते हैं. इन दोषों के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है. संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. इससे किसान को कभी-कभी अपनी उपज का लगभग 50 प्रतिशत तक ही दाम मिल पाता है. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.

दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए, उद्योगों के विकास के लिए सम्बंधित नियम-कानूनों में व्यापक संशोधन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इसके अंतर्गत किसान अपनी फसल आढ़तियों, जो कहीं न कहीं दलाल के रूप में काम करते हैं, के सहारे बेचने को विवश होते हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


इस तरह की विषम परिस्थितयों के बीच किसानों को मल्टीब्रांड रिटेल के सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.



15 जून 2016

विपणन व्यवस्था सुधारे बिना कृषि-विकास नहीं

मानसून के रुष्ट रहने के बाद मौसम विभाग आशा बंधा रहा है कि अबकी बारिश बहुत अच्छी होगी. किसानों को इस बार मानसून से किसी तरह की शिकायत नहीं होगी. हाल-फ़िलहाल विगत दो-चार दिनों से बादलों के रंग-ढंग देखते हुए ऐसी अपेक्षा की जा सकती है. इस अपेक्षा के साथ ही एक तरह का भय भी बना रहता है कि कहीं आशा से अधिक बारिश हो जाये और सूखे की स्थिति के ठीक उलट बाढ़ की, अतिवृष्टि की स्थिति न पैदा हो जाये. बहरहाल, ये स्थितियां मानसून पर निर्भर करती हैं. सूखे की, बाढ़ की, अतिवृष्टि की स्थिति को पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर माना जाता है. इनके अनियमित होने का सीधा असर किसान पर पड़ता है, कृषि पर पड़ता है. ऐसा नहीं है कि बाकी किसी अन्य रोजगार या फिर किसी अन्य व्यवस्था पर सूखे का या बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता मगर जिस तरह से कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था से सीधे-सीधे सम्बद्ध है, उससे सीधा और स्पष्ट प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ता है.

वर्तमान में औद्योगीकरण, वैश्वीकरण के दौर में भी भारतीय कृषि का अपना महत्त्व बना हुआ है. अनेक तरह के व्यवसाय होने के बाद भी, उन्नत उद्योग-धंधे स्थापित होने के बाद भी कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. देश की राष्ट्रीय आय, रोजगार, जीवन-निर्वाह, पूँजी-निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों आदि में इसकी सशक्त भूमिका है. देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, वहीं लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है. इसके बाद भी भारतीय कृषि पिछड़ेपन की स्थिति से जूझ रही है, यहाँ का कृषक आत्महत्या जैसे कदमों को उठाने पर मजबूर है. कृषि कार्य के अनेक कारकों के अलावा मूल रूप से कृषि विपणन व्यवस्था का सही न होना भी किसानों की स्थिति को कमजोर बनाता है. सरकारी स्तर पर भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है. हाल ही में बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बुन्देलखण्ड पैकेज के करोड़ों रुपयों को मंडी स्थल बनाने में फिजूलखर्च कर दिया गया. ग्रामीण अंचलों से दूर बनाई गई नवीन मंडी स्थल तक पहुँचने के साधनों को विकसित नहीं किया गया. गाँव के साहूकार, महाजन, बड़े किसानों के चंगुल को कमजोर नहीं किया गया, ऐसे में छोटे और मंझोले किसान इन्हीं के चंगुल में फँसकर अपनी फसल को कम कीमत में बेचने को मजबूर होते हैं.

विपणन व्यवस्था में कई प्रकार के दोष होने के कारण किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है, इससे वे उत्पादन की दिशा में भी हतोत्साहित होते हैं. विपणन व्यवस्था में ऐसे दोष के रूप में संग्रहण को देखा जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज उन्नत तकनीक के बाद भी फसल-संग्रहण के लिए मिट्टी के बर्तन, कच्चे कोठों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे संग्रहण से उपज के सड़ने-गलने, कीटनाशको चूहों आदि से नष्ट होने का खतरा अधिक रहता है. नष्ट हो जाती फसल, जानवरों द्वारा ख़राब कर दी गई फसल के कारण किसान फसलों के संग्रहण को लेकर सदैव चिंतित रहता है और इसी से बचने के लिए वह काफी कम दामों में अपनी फसल का विक्रय कर देता है.

संग्रहण के साथ-साथ परिवहन साधनों की अनुपलब्धता अथवा उनका संपन्न न होना भी विपणन व्यवस्था की एक कमी कही जा सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था सुलभ न होने के कारण किसान बड़ी मंड़ियों, सहकारी मंडियों तक नहीं पहुँच पाते हैं. फसल के आवागमन सम्बन्धी कठिनाई को देखते हुए वे अपनी फसल को गाँव में ही बेचने को विवश हो जाते हैं. ऐसी कमियों के चलते ग्रामीण इलाकों में मध्यस्थों की, दलालों की संख्या में वृद्धि होने लगती है. मध्यस्थों की बहुत बड़ी संख्या भी विपणन प्रणाली का एक दोष है. किसानों के मंडी में पहुँचने के पूर्व ही तमाम दलाल सक्रिय हो जाते हैं. दलालों की सक्रियता के अतिरिक्त अनियंत्रित मंडियों का संचालन भी विपणन व्यवस्था को प्रभावित करता है. इस प्रकार की मंडियों में कपटपूर्ण नीतियों के चलते किसान लगातार शिकार होते रहते हैं.

दरअसल हमारे देश में उदारीकरण, औद्योगीकरण के बाद से उद्योगों में तो कई तरह से परिवर्तन किये गए किन्तु कृषि क्षेत्र में सुधार की तरफ सकारात्मक रूप से ध्यान नहीं दिया गया. कृषि क्षेत्र में अभी भी किसान अपने उत्पाद को सन 1953 में बने एपीएमसी कानून के तहत बेचने को बाध्य हैं. इस कानून के द्वारा न तो नए व्यापारियों को लाइसेंस मिलता है और न ही नई मंडियों का निर्माण किया जा रहा है. इसके उलट हो ये रहा है कि जो विपणन संस्थाएं आधुनिकीकरण के लिए कार्य करने को बनाई गईं थीं वे बजाय इस क्षेत्र में काम करने के राज्य सरकारों के लिए राजस्व उगाही का माध्यम बन गईं हैं. हालाँकि वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन करके एक मॉडल एपीएमसी कानून बनाया गया, जिसमें निजी तथा कॉरपोरेट सेक्टर को विपणन नेटवर्क बनाने का रास्ता खोला गया. इसके बाद भी राजस्व नुकसान की आशंका के चलते और आढ़तियों की जबरदस्त लोबिंग के कारण देश के अधिसंख्यक राज्यों द्वारा इस कानून को अपनाया नहीं गया है. इस कारण किसान अभी भी अपनी फसल को सीधे उपभोक्ता को बेचने के स्थान पर इन दलालों, मध्यस्थों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.


आवश्यकता इस बात की है कि किसान को उसकी फसल का उचितमूल्य प्राप्त हो. सभी किसान उत्साहजनक रूप से देश के कृषि विकास में सहायक सिद्ध हों तो आवश्यक है कि उनकी फसल के लिए उचित विपणन व्यवस्था का निर्माण किया जाये. इसके लिए सरकार को चाहिए कि वह श्रेणी विभाजन और मानकीकरण के अनुसार फसल के उत्पादन पर जोर दे. मंडियों में पक्के माल-गोदामों का निर्माण करे. आकाशवाणी के द्वारा, दूरदर्शन के द्वारा तथा सरकार अपनी मशीनरी के द्वारा समय-समय पर किसानों को उपज मूल्य की सही-सही जानकारी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करे. इसके साथ-साथ सरकार को चाहिए कि नियंत्रित मंडियों के स्वरूप के साथ-साथ ग्रामीण स्तर पर छोटी-छोटी नियंत्रित मंडियाँ हों जिससे छोटे किसान भी अपनी फसल को सही दाम पर बेच कर उसका उचित मूल्य प्राप्त कर सकें. इस तरह के कुछ उपायों को सकारात्मक रूप से लागू करके सरकारों द्वारा कृषि फसल को बचाया जा सकता है, कृषि उत्पाद का उचित मूल्य कृषकों को प्रदान करवाया जा सकता है, कृषकों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.