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04 सितंबर 2025

मशीनी शैक्षिक दौर में शिक्षकों का महत्त्व

विकास के परिवर्तनशील चरणों में शिक्षा क्षेत्र में भी अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. शिक्षा व्यवस्था परिवर्तनों के दौर में गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. इसके बाद भी समाज से शिक्षकों के महत्त्व को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. जब तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेदारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. किसी भी शिक्षक का काम विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र नहीं है, उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है. ऐसा होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में शिक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. अध्यापन कार्य के पीछे की मूल भावना के अनुसार एक शिक्षक को किसी उत्पाद का निर्माण नहीं करना है वरन वह एक नागरिक तैयार करना है, एक व्यक्तित्व का विकास करना है.

 

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को ही शिक्षक मान लिया गया है. ये मशीनी अंग शिक्षक के सहायक उपकरण तो हो सकते हैं किन्तु किसी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकते हैं. मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से किसी विषय को भले ही सहजता से समझाया जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों को विकसित नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है.

 

सत्यता यही है कि मशीन ज्ञान तो दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

 


05 सितंबर 2024

गुरु और शिक्षक का अंतर

ओ फ़ेसबुक की भेड़चाल में बहकने वाले/वालियो

 

आप सबने ज़िन्दगी से सीखा, माता-पिता पहले गुरु रहे, प्रकृति से ज्ञान प्राप्त किया, इससे लिया, उससे बटोरा, कण-कण ने दिया, वक्त ने सिखाया आदि-आदि. सारी बातें सही हैं, आदर्श विचारक हैं मगर बहकते-भटकते कुछ और जानकारी भी सीख लो, सहेज लो. गुरु कोई भी हो सकता है, कोई भी से मतलब कोई भी. ज्ञान किसी से भी मिल सकता है, किसी से भी माने किसी से भी. ये लोग माता-पिता, कोई रिश्तेदार, सहयोगी, मित्र, कोई भी कामगार, किसी भी व्यवसाय का व्यक्ति, किसी भी संस्थान का सदस्य, निरक्षर, साक्षर आदि कोई भी हो सकते हैं. ये गुरु हो सकते हैं पर शिक्षक नहीं.

 

हर कोई शिक्षक नहीं बन सकता. हर किसी को शिक्षक नहीं कहा जा सकता. प्रशासनिक अधिकारी प्रशासनिक अधिकारी ही होगा. पुलिस वाला पुलिस वाला ही रहेगा. डॉक्टर को डॉक्टर ही कहा जायेगा. इंजीनियर इंजीनियर ही रहेगा. व्यापारी भी यही रहेगा. हाँ, ये गुरु हो सकते हैं. इनको गुरु माना-समझा-कहा जा सकता है. इससे इतर शिक्षक एक निश्चित प्रक्रिया के बाद शैक्षिक संस्थान में नियुक्त व्यक्ति होता है. निश्चित डिग्री, निश्चित अर्हता, निश्चित प्रक्रिया के बाद ही कोई व्यक्ति शिक्षक कहलाता है.

 

शिक्षक दिवस देश के एक शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्मदिन पर मनाते हैं. यह दिन उनके जन्मदिन पर शिक्षकों का सम्मान करने का दिन है. इनसे इतर किसी और से ज्ञान पाने वाले को गुरु कहिए, उनका सम्मान गुरु पूर्णिमा को करिए.


04 सितंबर 2021

घर की मुर्गी को मुर्गी ही समझा गया


 

कल शिक्षक दिवस है. इस अवसर पर सरकारी, गैर-सरकारी आयोजन होते हैं, शिक्षकों को सम्मानित करने के. इस वर्ष स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. ऐसे में जानकारी हुई थी कि उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में 75 शिक्षकों का (महाविद्यालय स्तर पर) सम्मान किया जाना है. 


इस बारे में रात को आधिकारिक सूचना भी प्राप्त हो गई. अपने महाविद्यालय से सम्मानित होते कई शिक्षकों के बीच हमारा भी नाम चमक रहा है. अच्छा लगा अपने लोगों के बीच सम्मानित होने में. यद्यपि सम्मान समारोह कल होना है मगर ख़ुशी अभी से है. ख़ुशी इसलिए भी हो रही है कि भले ही ये शासन-प्रशासन का कार्यक्रम हो मगर 'घर की मुर्गी दाल बराबर' वाली बात को थोड़ा किनारे कर दिया गया है. सरकारी नीति के तहत ही सही, सभी जनपदों में ही सही 'घर की मुर्गी को मुर्गी ही' समझा गया है.


सभी को बधाई, शुभकामना. सभी शिक्षकों को, गुरुजनों को शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

05 सितंबर 2017

वर्तमान दौर में शिक्षकों की जिम्मेवारी बढ़ी है

समाज ने लगातार विकास के नए-नए आयामों को प्राप्त किया है. कई-कई नए-नए मानक स्थापित भी किये हैं. इन्हीं में एक मानक शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थापित किया गया है. इक्कीसवीं सदी तक आते-आते शिक्षा क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए, कई अत्यावश्यक कदमों को उठाया गया. शिक्षा व्यवस्था ने कई तरह के परिवर्तनों को देखते-समझते हुए अपना स्वरूप भी बदला. आज शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्वति से निकल कर ई-लर्निंग तक आ गई है. उसके द्वारा कितना भी विकास कर लिया गया हो, इसके बाद भी समाज से शिक्षकों की महत्ता कम नहीं मानी जा सकती है. तकनीकी विकास ने संस्थागत अनेकानेक बिन्दुओं को दरकिनार कर दिया हो किन्तु इससे शिक्षकों की जिम्मेवारियाँ और उनका दायित्वों पर नकारात्मक असर नहीं हुआ है. वे समय के साथ कम नहीं हुई हैं वरन बढ़ी ही हैं. एक समय जबकि तकनीकी विकास आज की तरह नहीं था तब शिक्षकों के पास अपने विद्यार्थियों की समस्त प्रकार की समस्याओं के समाधान करने की महती जिम्मेवारी हुआ करती थी. आज जबकि तकनीकी विकास हाथों-हाथों में मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से सुसज्जित है तब भी शिक्षकों की जिम्मेवारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है.

आज ऐसा माना जाने लगा है कि किसी भी शिक्षक का काम किसी संस्थान में, किसी कमरे में बैठे अनेक विद्यार्थियों को उसकी पुस्तक को समाप्त करवा देना मात्र है. शिक्षक के लिए उसका दायित्व सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना मात्र नहीं है और होना भी नहीं चाहिए. प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समस्त सोपानों में एक विद्यार्थी का साथ अबसे अधिक एक शिक्षक के साथ ही रहता है. ऐसे में किसी भी स्तर के शिक्षक की जिम्मेवारी बनती है कि वह भावी पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में कार्य करने की मानसिकता से निर्मित करे. यह विचार करना शायद आज किसी के लिए संभव नहीं हो पा रहा है कि अध्यापन कार्य किसी तरह के व्यवसाय से सम्बंधित करके कभी नहीं देखा गया है. इसके पीछे की मूल भावना सिर्फ इतनी थी कि एक शिक्षक किसी तरह का उत्पाद निर्मित नहीं करता है वरन वह एक नागरिक तैयार करता है, एक व्यक्तित्व का विकास करता है. ऐसे में उसके कार्यों, उसकी भावना, उसकी मानसिकता का प्रभाव उसके विद्यार्थियों पर पड़ता है. किसी भी शिक्षक को अपना आदर्श मानकर एक विद्यार्थी उससे बहुत कुछ सीखता है. उसकी कही बातों को गाँठ बांधकर जिंदगी भर उन पर अमल करने की कोशिश करता है.

आज जबकि तकनीकी विकास के दौर में ई-लर्निंग, ई-मैटर आदि के द्वारा शिक्षा देने की बात होने लगी है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के साथ-साथ ऑनलाइन शिक्षा की अवधारणा ने यह साबित करने का प्रयास किया है कि शिक्षक का कार्य विशुद्ध रूप से अपने पाठ्यक्रम को पूरा करवा देना, विद्यार्थियों की परीक्षा लेना, उनकी उत्तर-पुस्तिका जाँचकर अंक देना रह गया है. वैश्वीकरण के आधुनिक दौर में कम्प्यूटर, मोबाइल, पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, ई-मेल, मैसेज, सोशल-मीडिया आदि को शिक्षक माना-समझा जाने लगा है. ये किसी भी शिक्षक के सहायक उपकरण तो सिद्ध हो सकते हैं न कि किसी शिक्षक के स्थान पर स्वीकार्य हो सकते हैं. आज विकास की अंधी दौड़ में अभिभावकों के पास समय की अत्यंत कमी देखने को मिलती है. ऐसे में उनके द्वारा प्रयास यही किया जाता है कि शिक्षा का कोई ऐसा माध्यम मिल जाये जो नितांत उन्हीं के बच्चे पर ध्यान दे सके. मोबाइल क्रांति के बाद इंटरनेट क्रांति ने जैसे अभिभावकों के मन की मुराद पूरी कर दी हो. एक क्लिक पर समस्त जानकारियों को अपने सामने देखकर अभिभावक भी संतुष्टि का एहसास कर रहे हैं. इस बिंदु पर आकर वे यह समझना नहीं चाहते कि ऑनलाइन माध्यम से जानकारी तो मिल सकती है किन्तु किसी योग्य व्यक्ति का सान्निध्य नहीं मिल सकता है, जो बच्चों को सही-गलत समझा सके. भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा लेने का अर्थ सिर्फ पाठ्यक्रमों का पूरा कर लेना मात्र कभी नहीं रहा है. यही कारण है कि शिक्षा व्यवस्था के किसी भी चरण में नैतिक शिक्षा, शारीरिक शिक्षा, हमारे पूर्वजों के बारे में शिक्षा आदि को भी साथ-साथ दिया जाता रहा है. ऐसा माना जाता रहा है कि एक शिक्षक अपने पाठ्यक्रम के साथ-साथ अपने विद्यार्थियों में समाज के प्रति सेवा-भावना, राष्ट्र के प्रति जिम्मेवारी का भाव, प्राणीमात्र के लिए परोपकार की भावना, संगठन-शक्ति का विकास, सामूहिकता की स्वीकार्यता आदि गुणों का विकास भी करता है. ऐसे में समझना कतई मुश्किल नहीं है कि मशीनी संस्कृति, मशीनी शिक्षा के द्वारा विषय-सामग्री की उपलब्धता तो हो सकती है किन्तु उससे सम्बंधित विषय पर ज्ञान मिलेगा, ऐसा कहा नहीं जा सकता है.

मशीनीकृत शिक्षा व्यवस्था, ऑनलाइन क्लासेज या फिर कांफ्रेंसिंग के जरिये किसी विषय को सहजता से समझाया भले ही जा सकता हो किन्तु किसी व्यक्ति में उसके व्यावहारिक लक्षणों का विकास नहीं किया जा सकता है. तकनीकी रूप से मशीनी शिक्षा के प्रति आसक्ति ने विद्यार्थियों में सहनशीलता, सामूहिकता, सांगठनिकता, बड़ों के प्रति सम्मान, समाज के प्रति दायित्व-बोध, परोपकार की भावना आदि को कम करने के साथ-साथ लगभग समाप्त ही किया है. ऐसा होने के कारण आज समाज में बच्चों को, नवयुवकों को बड़ी संख्या में अवसाद में जाते देखा जा सकता है. नवयुवकों की बहुत बड़ी संख्या नशे की गिरफ्त में जा रही है. जरा-जरा सी बात में नाकामी मिलने पर निराशा छा जाना और उसकी तीव्रता इतनी बढ़ जाना कि उनका आत्महत्या करने को प्रवृत्त होना आदि आज आम होता जा रहा है. वर्तमान में विवादास्पद मोबाइल गेम ‘ब्लू व्हेल’ को भी इसी रूप में देखा जा सकता है. ऐसे बच्चों को बताने वाला ही कोई नहीं कि क्या सही है क्या गलत है. ये समझने वाली बात है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? आज लोगों की जीवन-शैली तकनीकी रूप से, भौतिक रूप से पहले से कहीं अधिक संपन्न हुई है. लोगों को अपने मनमाफिक कार्यक्षमता के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त हुई है. ऐसे में समाज में शिक्षकों के प्रति गंभीरता का भाव समाप्त भले ही न हुआ हो किन्तु कम अवश्य हुआ है. तकनीक को सर्वस्व मानने वालों के लिए एक शिक्षक का महत्त्व संस्थान स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति जितना रह गया है. तकनीक को हाथ में लिए घूमने वाली पीढ़ी को लगता है कि वह अपने साथ ज्ञान का सीमित भंडार लेकर चल रहा है, ऐसे में उसे किसी शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. देखा जाये तो किसी भी तरह का तकनीकी विकास किसी भी शिक्षक की महत्ता को कम नहीं कर सकता है. किसी भी शिक्षक की स्थान-पूर्ति नहीं कर सकता है.


मशीन ज्ञान दे सकती है किन्तु आत्मविश्वास नहीं जगा सकती. ऑनलाइन शिक्षा किसी भी विषय पर सामग्री की उपलब्धता सहज करवा सकती है किन्तु उसके व्यावहारिक पक्षों से परिचित नहीं करा सकती. ई-लर्निंग से घर बैठे विषय से सम्बंधित जानकारी मिल सकती है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति का तरीका नहीं मिल सकता. किसी समय में तकनीक के, सामग्री के, पुस्तकों आदि के अभाव ने शिक्षकों की महत्ता को स्थापित किया होगा किन्तु आज तकनीकी विकास के दौर में भी शिक्षकों का होना अनिवार्य है. बचपन से संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा, सामूहिकता, समन्यव, सहयोग आदि की जिस भावना का विकास एक शिक्षक करता है वह किसी और के द्वारा नहीं हो सकता है. यही कारण है कि आज भी बच्चों को विद्यालय भेजने की परंपरा का निर्वहन सभी के द्वारा किया जा रहा है, भले ही वह उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी भौतिकता के चलते घर में स्थापित करवा सकता हो. तकनीक के साथ विकास करते समाज को शिक्षकों के महत्त्व को समझते हुए नई पीढ़ी को भी इनके महत्त्व को समझाना होगा.

05 सितंबर 2014

शिक्षक बनने-बनाने के प्रति सोच ही कहाँ है



देश के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाने वाले शिक्षक दिवस पर लोगों को शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते देखकर सुखद एहसास हुआ. महाविद्यालय के उन विद्यार्थियों द्वारा, जो आये दिन अपने कृत्यों से शिक्षकों को अपमानित करने का अवसर नहीं चूकते, आज सम्मान करते देखा गया; उन महानुभावों के द्वारा, जो शिक्षकों को निठल्ला कहकर अपमानित करना अपना धर्म समझते हैं, शिक्षकों द्वारा माला पहनाते देखा गया; ऐसे लोगों द्वारा, जो शिक्षकों को ‘हराम की कमाई खाने वाले’ कहकर तिरस्कृत करते हैं, आज प्रशस्ति-पत्र, अंगवस्त्र पहनाते देखा गया. दिल ने खुद से ही सवाल उठाया कि शिक्षक का सम्मान आज तमाम विकृत स्थितियों के बाद भी बरक़रार है या फिर सिर्फ आज शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजनात्मक व्यवस्था भर है? शिक्षक दिवस गुजरते ही किसी भी शिक्षक के प्रति चढ़ा सम्मान को चश्मा भी उतारकर रख दिया जायेगा या फिर ये सम्मान बरक़रार रहेगा? इन्हीं सवालों के मध्य एक और सवाल ने अंगड़ाई लेकर शिक्षक होने पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया. आज के आधुनिक सोच वाले, भौतिकतावादी दौर में, रातों-रात अकूत सम्पत्ति पैदा करने की लालसा रखने वाले समाज में कौन युवा शिक्षक बनना चाहता है; कौन से माता-पिता अपनी संतानों को अध्यापक बनाना चाह रहे हैं?
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वर्तमान व्यवस्था और जीवनशैली पर निगाह डाली जाये तो ये सवाल महज सवाल नहीं हैं वरन हम सबकी मानसिकता को परिलक्षित करते हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी-भरकम पैकेज के बीच, आधुनिक साजो-सामान से लैस निजी कंपनियों के लुभावने आवरण के बीच युवा वर्ग की मानसिकता शिक्षक बनने की दिखती ही नहीं है, इसके साथ ही इनके माता-पिता द्वारा भी इनको अध्यापन-कार्य हेतु प्रेरित भी नहीं किया जाता है. माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के दौरान ही अभिभावकों द्वारा अपनी संतानों के मन में इंजीनियरिंग, मेडिकल, एमबीए, एमसीए, सीए व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश का बीजारोपण कर दिया जाता है. उनको बड़ी-बड़ी व्यावसायिक डिग्री के प्रति जागरूक बनाया जाता है, बड़ी-बड़ी कंपनियों के बड़े-बड़े पैकेज लेने को प्रेरित किया जाता है, निजी कार्य के द्वारा अकूत संपत्ति (कैसे भी) पैदा करने के रास्ते बताये जाते हैं. हालाँकि इस भौतिकतावादी व्यवस्था के बीच युवाओं में शिक्षक बनने की होड़ हाल-फ़िलहाल में दिखने लगी है तथापि इस होड़ के पीछे के कारण बहुत अलग हैं.
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धन के पीछे भागती इस दुनिया में युवाओं में शिक्षक बनने की सोच, होड़ उस समय विकसित होती है जबकि तमाम रास्तों पर अवरोधक आने लगते हैं; नौकरी करने के, व्यवसाय करने के, बड़े-बड़े पैकेज मिलने के अवसर समाप्त से दिखने लगते हैं. यही कारण है कि इंजीनियरिंग सहित तमाम व्यावसायिक डिग्रीधारियों को आज प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक बनते देखा जा रहा है. दरअसल उनके शिक्षक बनने के पीछे का कारण उनकी अध्यापन-कार्य में आने की सोच या प्रेरणा नहीं वरन स्वयं को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना है. सोचा जा सकता है कि ऐसी मानसिकता में जो व्यक्ति इस क्षेत्र में आएगा वो अध्यापन-कार्य के साथ कितना न्याय कर पायेगा? विद्यार्थियों को शिक्षा के प्रति कितना संवेदित कर पायेगा? समाज में शिक्षकों के लिए कितनी सम्मानजनक स्थिति को बना पायेगा? सच्चाई तो ये है कि आज न तो युवा-वर्ग में शिक्षक बनने के प्रति जागरूकता है और न ही अभिभावकों द्वारा उनको इसके लिए प्रेरित किया जाता है. ऐसी स्थिति में महज धनोपार्जन के लिए बने शिक्षकों से उत्कृष्टता की उम्मीद रखना बेमानी ही है. और शायद यही कारण है कि शिक्षा का स्तर दिनों-दिन गिरता जा रहा है, समाज में शिक्षकों के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है, विद्यार्थियों में नैतिकता का ह्रास होता जा रहा है. अभिभावकों को इसके लिए जागना होगा, यदि उनको अपने बच्चों को के लिए बेहतर शिक्षा चाहिए है तो शिक्षण संस्थानों में उत्कृष्ट शिक्षकों का होना अनिवार्य है. किसी को तो अपने बच्चों में मात्र धनार्जन के नहीं वरन शिक्षा देने के संस्कार पैदा करने होंगे, शिक्षक बनने के गुण विकसित करने होंगे. 
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04 सितंबर 2013

शिक्षा क्षेत्र में गिरावट के बीच मनाएं शिक्षक दिवस




शिक्षा के उठते-गिरते स्तर के बीच शिक्षक दिवस औपचारिकता के साथ मनाया जायेगा. कुछ सेवानिवृत शिक्षकों का सम्मान किया जायेगा, कुछ जुगाड़धारी शिक्षकों को भी सम्मानित कर दिया जायेगा. अब शिक्षक दिवस का आयोजन सम्मान के लिए, छोटे-बड़े पदक, सम्मान-पत्र हासिल करने भर के लिए किया जाने लगा है. विकास की रफ़्तार के दौर में शिक्षा क्षेत्र में जिस तरह से गिरावट आ रही है उसने शिक्षकों के प्रति सम्मान-भाव समाप्त ही किया है. शिक्षकों के प्रति सम्मान में कमी आम जनता में, अभिभावकों में देखने को तो मिल ही रही है, स्वयं विद्यार्थी भी अब सम्मान करते नहीं देखे जाते हैं. ये आकलन करना मुश्किल होता जा रहा है कि शिक्षक-शिक्षार्थी संबंधों में पतन का दोषी किसे माना जाये.
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प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक लगभग सभी जगह गिरावट का माहौल देखने को मिल रहा है. प्राथमिक स्तर का शिक्षक कुछ ले-देकर स्कूल जाने से बचने की, पढ़ाने से बचने की कोशिश में लगा रहता है. मिड-डे-मील के समायोजन में, स्कूल की इमारत बनवाने के गुणा-भाग में उसकी संलिप्तता को देखा जा सकता है. माध्यमिक स्तर के शिक्षकों को राजनीति करने की जबरदस्त छूट होने के कारण अधिसंख्य शिक्षक बजाय अध्यापन के राजनीति करने में व्यस्त रहते हैं. अलग-अलग गुटों से, राजनैतिक दलों से जुड़े होने के कारण शिक्षा अधिकारियों द्वारा इन पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं हो पाता है. कमोबेश राजनीति, अध्यापन से बचने की प्रवृत्ति उच्च शिक्षा में भी पाई जा रही है. यहाँ शिक्षकों के साथ-साथ विद्यार्थी भी राजनीति से जुड़ा हुआ होता है, इस कारण स्थिति में और भी विकृतता आ जाती है. राजनैतिक दलों द्वारा समय-समय पर छात्र-संगठनों को सहयोग देने से भी कई बार अराजकता की स्थिति महाविद्यालयों/विश्वविद्यालयों में उत्पन्न हो जाती है.
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शिक्षा क्षेत्र में निजी संस्थानों के अंधाधुंध रूप से खुल जाने के कारण उनका उद्देश्य बजाय शिक्षा के धनार्जन करने का हो गया है. विद्यार्थियों के मन में, अभिभावकों के मन में अपने संस्थान के प्रति बेहतर छवि प्रस्तुत करने की लालसा होती है जिसके चलते अधिसंख्यक शिक्षण-संस्थान नक़ल जैसी अराजक स्थिति उत्पन्न करते हैं. येन-केन-प्रकारेण उन्हें अपने विद्यालय का परिणाम बेहतर चाहिए होता है. डिग्री देना, विद्यार्थियों को उत्तीर्ण कर देना सभी संस्थानों का एकमात्र उद्देश्य बनता जा रहा है. ऐसे हालातों में जहाँ विद्यार्थी पढ़ने के लिए आने से बचता है वहीं शिक्षक वर्ग भी अध्यापन से विरत बना रहता है. शिक्षक दिवस की महत्ता को, इसके मूल में छिपे शिक्षाविद् को तो लगभग विस्मृत ही कर दिया गया है. आखिर सोचा जा सकता है कि जब शिक्षा को ही महत्त्व नहीं दिया जा रहा है तो उस शिक्षाविद् को क्या महत्त्व दिया जायेगा, जिसके सम्मान में हम सब इस दिवस को मनाते हैं. शिक्षा के प्रति सरकारी, सामाजिक उपेक्षा का ही परिणाम है कि हम आज भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ शैक्षिक संस्थानों में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाए हैं.

06 सितंबर 2011

शिक्षक दिवस के बाद की सम्मानित अवस्था


पांच सितम्बर को पूरे देश में यथासम्भव पूरी धूमधाम से शिक्षक दिवस मनाया गया। जगह-जगह चले विभिन्न आयोजनों में सेवानिवृत्त शिक्षकों को और वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों को उनके अतुलनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। प्रत्येक कार्यक्रम में शिक्षकों को सम्मानित करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों का, नेताओं का जमावड़ा होता ही है और ये सभी अपने-अपने मुखारविन्द से शिक्षकों के सम्मान में बातों के सुन्दर-सुन्दर बताशे फोड़ते दिखते हैं।

शिक्षकों के सम्मान की आयोजना, प्रशासनिक अधिकारियों और विभिन्न नेताओं द्वारा उनके सम्मान में दिये गये वक्तव्य पूरे वर्ष में मात्र एक दिन के लिए ही होते हैं। इस एक तिथि के गुजर जाने के बाद सेवानिवृत्त शिक्षक अपने ही विभाग के बाबुओं के चक्कर लगाता है और अपनी पेंशन के तथा विभिन्न मदों में जमा अपनी ही धनराशि के लिए गिड़गिड़ाते घूमता है। ऐसी स्थिति में न तो उस प्रशासनिक अधिकारी का सहयोग मिलता है जो अभी कुछ दिन पहले ही उसी शिक्षक को माला-अंगवस्त्र पहना कर सम्मानित कर रहा था और नेताओं से तो किसी भी सहायता की उम्मीद रखना ही बेमानी है।

ठीक इसी तरह से विद्यार्थियों का भी हाल है। पूरे वर्ष भर अपने शिक्षक की बेइज्जती करने के बाद वे भी पश्चाताप करने जैसे भाव न रखने के बाद भी शिक्षकों को सम्मान देते दिखाई देते हैं। यहां पांच सितम्बर गुजरी नहीं कि इन विद्यार्थियों के मन से अपने शिक्षक के प्रति सम्मान का भाव भी तिरोहित हो जाता है। एक दिन के सम्मान के बाद विद्यार्थी अत्यधिक श्रद्धा के भाव से समस्त प्रकार के श्रद्धाभाव को भुलाते हुए कक्षा में मोबाइल की रिंगटोन के सुर छेड़ता है तो गानों के द्वारा रसमय वातावरण का सृजन करता है। किसी भी विद्यार्थी को इस तरह की किसी भी प्रकार की उद्दण्डता को रोकने, परीक्षा में नकल न करने देने की हिमाकत यदि कोई शिक्षक कभी कर भी जाता है तो उसे विद्यालय से बाहर देख लेने का प्रस्ताव भी सुना दिया जाता है। और भी कुछ ऐसे धर्मकार्य विद्यार्थियों के द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं जिनका जिक्र करना यहां ठीक नहीं।

बात थी शिक्षक की और उसके सम्मान की, दिवस की और शिक्षक दिवस की। तो यह बात तो सत्य है कि हम सभी एक दिन अपने-अपने तरीके से शिक्षकों को सम्मान देकर वर्ष भर उनके प्रति किये गये असम्मानपूर्ण रवैये का, कार्यों का एक प्रकार से पश्चाताप सा कर लेते हैं और वह भी मन में किसी प्रकार के पश्चाताप का भाव लाये बिना। इसी बात पर जोर से बोलिये शिक्षक....जिन्दाबाद!!! अरे! शिक्षक दिवस तो निकल गया....कोई बात नहीं फिर ये बोलो, शिक्षक...अमर रहे!!!




05 सितंबर 2009

शिक्षक दिवस पर डॉo आदित्य का सम्मान


आज शिक्षक दिवस पर शहर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था पहचान तथा एक विद्यालय एल डोरेडो पब्लिक स्कूल के संयुक्त तत्वावधान में एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस आयोजन में नगर के सबसे प्रतिष्ठित एवं पुराने महाविद्यालय दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डाo आदित्य कुमार जी का सम्मान किया गया।
डाo आदित्य जी के बारे में विशेष बात यह रही कि वे इस महाविद्यालय के छात्र भी रहे और शिक्षक दिवस से ठीक एक दिन पूर्व यानि कि 04 सितम्बर को राजनीति विज्ञान विभाग में प्रवक्ता पद का कार्यभार ग्रहण किया था। कल उनको महाविद्यालय तथा विभाग को अपनी सेवाएँ देते हुए पूरे 35 वर्ष भी हो चुके हैं।
इस दौरान डाo आदित्य जी ने विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक, रंगमंचीय, समाजसेवी संस्थाओं के साथ काम भी किया। वर्तमान में वे नई दिल्ली की एक संस्था विकासशील समाज अध्ययन केन्द्र (सीएसडीएस) के उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के प्रभारी हैं।
वैसे यदि डाo आदित्य जी के बारे में बताने बैठें तो सम्भव है कि ये पोस्ट कभी समाप्त ही न हो और हो सकता है कि हम बस लिखते ही रहें। ऐसे लिखने का भी क्या फायदा जो आप लोगों तक भी न पहुँचे। आप उनके व्यक्तित्व की सरलता का आकलन ऐसे भी कर सकते हैं कि आज तक कहीं भी, किसी से भी उन्होंने अपने कार्यों, अपनी सफलताओं का बखान नहीं किया। अनेक पुस्तकों, पत्रिकाओं का सम्पादन कर चुके डाo आदित्य जी आप लोगों के लिए भी अब अनजान नहीं हैं। वर्तमान में एक ब्लाग के माध्यम से आप सबके बीच हैं और अपने विचारों को आप तक पहुँचा भी रहे हैं।
शीघ्र ही शब्दकार और पहला एहसास भी उनके विचारों से लाभान्वित होगा। उनके द्वारा एक अन्य ब्लाग प्रस्तावित है जिसके माध्यम से वे जनपद जालौन के दिवंगत और जीवित रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाओं को आपके सामने प्रस्तुत करेंगे।
चलिए आदित्य जी चूँकि हमारे पितातुल्य हैं, अभिभावक हैं तो हम तो उनके बारे में बताते ही रहेंगे। आप लोग आज के कार्यक्रम का संक्षिप्त में मजा लीजिए फोटो के द्वारा और उनके विचारों को जाने उनके ब्लाग के द्वारा।
माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पपण एवं दीप प्रज्ज्वलन करते अतिथिजन
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डाo आदित्य जी का सम्मान करते पूर्व प्राचार्य, दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई डाo रामस्वरूप खरे तथा तपस्या के प्रसून खण्डकाव्य लिखने वाले वरिष्ठ साहित्यकार श्री यज्ञदत्त त्रिपाठी

बाएँ डॉo रामस्वरूप खरे तथा दायें श्री यज्ञदत्त त्रिपाठी
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शिक्षक दिवस पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते तथा आयोजकों को धन्यवाद देते डाo आदित्य कुमार
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डाo आदित्य जी के बारे में प्रकाश डालते डाo वीरेन्द्र सिंह यादव, प्रवक्ता हिन्दी विभाग दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई
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डाo आदित्य जी के बारे में प्रकाश डालते प्रतिष्ठित लोक कला विशेषज्ञ श्री अयोध्या प्रसाद गुप्त कुमुद
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समारोह में उपस्थित श्रोतागण
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कार्यक्रम का संचालन करते प्रतिष्ठित कवि श्री विनोद गौतम
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05 सितंबर 2008

शिक्षा, शिक्षक दिवस

इस देश की कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी संस्कृति को भुला कर पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते जा रहे हैं. विभिन्न भारतीय पर्वों, त्योहारों को मनाने के स्थान पर "डे" मनाने लगे हैं. अपनी परम्परा को त्याग कर पाश्चात्य परम्परा का अनुकरण करने लगे हैं. किस बात को कहा जाए किसे नहीं ये बात भी अब समझ से परे हो गई है. हम ख़ुद तय नहीं कर पा रहे हैं कि हमें चाहिए क्या है? हर बात में सबके अपने-अपने तर्क, अपने-अपने मशविरे हैं.
आज का दिन है जिसे हम लोग शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। ये आयोजन इसलिए नहीं कि हम अपनी संस्कृति को भूल कर पाश्चात्य संस्कृति की तरफ़ जा रहे हैं, ये आयोजन तो याद दिलाता है उस महान व्यक्तित्व की जिसने अपने अभावों को दरकिनार कर शिक्षा के चरम को छुआ. अनेक तर्कों से अपने ज्ञान से भारतीय दर्शन की एक नई इबारत लिखी. भरतीय दर्शन को एक पहचान दी, देश की शिक्षा व्यवस्था को सुधरने के उपाय दिए.
कभी-कभी शर्म तो इस बात पर आती है कि ये वो देश है जहाँ अच्छी बातों का समर्थन करने वाले कम, बाल की खाल निकलने वाले बहुत मिल जायेंगे। ब्लॉग के मारों का क्या कहना, वे तो बाल की खाल निकालते हैं उस खाल में फ़िर एक बाल पैदा करते हैं और फ़िर उसमें से खाल निकालते हैं. जहाँ हम शिक्षक दिवस को टीचर्स डे कहने लगे हों, सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पाश्चात्य सभ्यता से रंगा मानने लगे हों वहां सेक्स एजुकेशन को लेकर क्या समझाया जाए?
टीचर बहुत हैं जो सेक्स की सिक्षा दे रहे हैं पर उचित दंग से नहीं, प्रोग्शालायें बहुत हैं पर फैला रहीं हैं एड्स और तमाम यौन संक्रामक बीमारियाँ. बहरहाल भटकाईए अपने बच्चों को चोरी-छिपे रहस्यों को समझने की दुनिया में और बना दीजिये यौन रोगी. पुराने लोग अपनी बात न करें जो सालों बिता देते थे खिड़की और छत पर ताका-झांकी करने में, ये नै जेनरेशन है जो कच्ची उमर में पके फल खा रही है. क्या सर्वे रिपोर्ट्स नहीं पढ़ते? चलिए कौन किसे समझाए....जब टीचर उपलब्ध हैं......प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं तो कमी कहाँ है? जानकारी की बुराई करने वाले ही परदे के पीछे बैठ कर रंगीन किताबों के रंगीन चित्रों में अपनी तृप्ति करते हैं, इन्टरनेट कैफे की आड़ वाली सीट पर बैठ कर रंगीन फिल्मों का मजा लेते हैं, इन्टरनेट पर गिने चुने शब्दों के सहारे, गिने चुने ब्लॉग के सहारे अपनी तृप्ति का साधन खोजते हैं और कहते हैं कि क्या जरूरत है सेक्स एजुकेशन की? वाह री सिक्षा व्यवस्था.....वाह रे उसके ऐसे हर जगह उपलब्ध शिक्षक.