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09 अप्रैल 2026

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों पर रॉयल्टी

वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी



शारदा जी से पहली मुलाकात हुई थी हमारे ही जनपद के कोंच में एक साहित्यिक कार्यक्रम में. परिचय इस मुलाकात से भी पुराना था और ये दोनों बातें ही श्वेतवर्णा के जन्म लेने से भी बहुत पुरानी थीं.


बहरहाल, श्वेतवर्णा का अस्तित्व में आना हुआ और हम जैसे स्वान्तः सुखाय लेखकों को भी जीवन मिला. अपने छपास रोग के आरम्भिक दिनों में कुछ पुस्तकों का प्रकाशन स्वयं ही करवाया. इसके बाद एक-दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ अपने मित्रों के सहयोग से. उसी समय शारदा जी ने श्वेतवर्णा की जानकारी दी. इसके बाद तपती दुपहरी की शाम के साथ पुराने परिचय-सम्बन्ध-विश्वास ने ऐसा रंग जमाया कि अपनी पुस्तकों का कहीं और से प्रकाशन का सोच भी नहीं सके. जिस विश्वास से हमने पुस्तकों का प्रकाशन जारी रखा, उसी अधिकार से एक बार शारदा जी ने धमकी भी दे डाली थी कि हमने कहीं और से पुस्तकें प्रकाशित करवाईं तो अच्छा नहीं होगा.


आज उसी विश्वास-अपनत्व ने सुखद एहसास करवाया. इस वित्तीय वर्ष 2025-26 में श्वेतवर्णा से प्रकाशित पुस्तकों में से सात पुस्तकों पर रॉयल्टी भी प्राप्त हुई है. यह सुखद एहसास विगत कई वर्षों में पहली बार मिला है. इसमें हमारी एकल लेखन वाली पुस्तकें तो हैं ही, इसके साथ ही देवेन्द्र सिंह जी की पुस्तक और ऋचा सिंह राठौर के साथ लिखी गईं पुस्तकें भी शामिल हैं. (हालाँकि इन लोगों के साथ वाली पुस्तकों की रॉयल्टी हम ही डकार जायेंगे)


संलग्न चित्र में बाकी विवरण इसीलिए छिपा दिया है ताकि कुछ लोग जलन महसूस न करने लगें. विवरण के लिए ऐसे लोग आकुल-व्याकुल न हों. ये विवरण हमारी थाती है, हमारे-शारदा जी के-श्वेतवर्णा के आपसी विश्वास, अपनत्व-अधिकार का परिचायक है.




11 अप्रैल 2024

उम्मीदों की प्याली : एक अभिनव प्रयोग

पिछले दिनों 'उम्मीदों की प्याली' का आना हुआ. इसे लेकर मित्रों में, परिचितों में एक उत्सुकता दिखाई दी. प्रकाशन पूर्व जब भी इस बारे में चर्चा हुई तो सभी को यही बताया गया कि इस पुस्तक में एक तरह का प्रयोग किया गया है.



अब प्रकाशन पश्चात् इस प्रयोग से कितने लोग पुस्तक के माध्यम से परिचित हुए, इसकी जानकारी नहीं मगर प्रयोग के बारे में पूछा बहुत लोगों ने. पुस्तक कौन खरीदेगा, कौन नहीं... ये अलग विषय है, यहाँ इस पुस्तक में किये गए प्रयोग के बारे में कुछ शब्द.

कविताओं के रूप में होने के बाद भी इसमें संकलित रचनाओं को कविता नहीं कह सकते. असल में किसी कविता को पढ़ कर, बातचीत के दौरान उभरे पद्य विचार को, दो-चार काव्य-पंक्तियों के प्रत्युत्तर के रूप में उभरी काव्य-पंक्तियों को संकलित करके पुस्तक का रूप दे दिया.



इस प्रयोग के साथ-साथ एक प्रयोग ये भी किया कि इस पुस्तक में संकलित सभी 80 काव्य-रचनाओं को एक-एक स्केच के द्वारा सजाया है.




रचनाकार-द्वय के बीच बातचीत के रूप में उभरी काव्य-रचनाओं को स्केच भी रचनाकार-द्वय के द्वारा मिले हैं.
उम्मीदों की प्याली को आप अपने हाथों में लेकर उसका स्वाद लेंगे तो एहसास और भी सुखद होगा.





'उम्मीदों की प्याली' श्वेतवर्णा प्रकाशन की वेबसाइट www.shwetwarna.com पर उपलब्ध है.



 

06 जनवरी 2024

तुहिना सहेजे है शबनम सी सहज भावनाओं को

बहुत दिनों बाद एक ऐसा काव्य-संग्रह देखने-पढ़ने का अवसर मिला जिसकी न केवल रचनाएँ साहित्यिक हैं बल्कि उसका नाम भी साहित्यिक है. तुहिना, जी हाँ, यही नाम है काव्य-संग्रह का. चलिए, पहला परिचय संग्रह के शीर्षक से ही करवाते हैं आपका. बहुत से लोगों के लिए यह शब्द जाना-पहचाना होगा और बहुत से लोगों के लिए इस शब्द, तुहिना से पहली बार परिचय हुआ होगा. ओस की बूँद का अर्थ स्वयं में सहेजे इस शब्द के संग्रह में कुछ इसी तरह की रचनाएँ हैं जो ओस की बूँद की तरह अपनी तरफ आकर्षित करती हैं.


इस आकर्षण में चमक उस समय और बढ़ जाती है जबकि जानकारी होती है कि यह काव्य-संग्रह लेखिका का पहला काव्य-संग्रह है. अध्यापन, लेखन से जुड़ी डॉ. ऋचा सिंह राठौर का पहला काव्य-संग्रह, तुहिना उनकी रचनात्मकता के साथ-साथ उनकी भावनात्मकता, संवेदनशीलता को दर्शाता है. जिस तरह से उन्होंने सूक्ष्म बिंदु से लेकर विस्तृत फलक तक अपनी दृष्टि को दौड़कर उसे अपनी कलम के सहारे शब्दों से सजाया है, वह सराहनीय है.


उनकी रचनाओं में एक तरफ उनके अपने जीवन की गति सी दिखाई देती है तो उसी के साथ वे देश भावना के साथ भी दिखाई देती हैं. प्रकृति के अंगों-उपांगों को जहाँ वे अपनी कलम से सजाती हैं तो देश के वीरों-वीरांगनाओं के प्रति भी सम्मान भाव प्रकट करती हैं. ऋचा सिंह की कविताएँ ऊर्जा का संचार करती सी मालूम होती हैं. उनकी शब्द संरचना निराशा का नहीं वरन आशा का संचार करती हैं. इसका प्रमाण उनकी रचनाएँ स्वतः देती हैं. इसे महज इस रूप में समझा जा सकता है कि ज़िन्दगी, एक लम्हे की ज़िन्दगी, ज़िन्दगी मुझे छोड़ आगे निकल गई, बूँद सी ज़िन्दगी, ज़िन्दगी के फैसले, जी भर जीने दो ज़िन्दगी आदि कविताओं में वे ज़िन्दगी के विविध रूप-रंग को दर्शाती हैं. इस ऊर्जा के कारण वे कहती हैं कि


ज़िन्दगी जाम तो नहीं

जो घूँट-घूँट पी जाये,

मिली है बड़ी शिद्दतों से

क्यों न जी भर के जी जाये.


उनकी कलम ज़िन्दगी को लेकर बस इतनी सी बात न कह कर आगे उसके खेल के बारे में भी अपनी बात रखती है.


ज़िन्दगी भी अजब

खेल दिखाती है

सोचो कुछ और

कुछ और करवाती है.


यह वाकई एक ऐसा सत्य है जिससे प्रत्येक व्यक्ति दो-चार होता है. हर एक व्यक्ति अपने जीवन में बहुत कुछ सोचता है मगर उसे क्या करना पड़ जाये, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. जीवन के अनिश्चय के बीच वे खुशियों को अपने घर बस जाने का आमंत्रण देती हैं.


हौसला, विश्वास, इरादा, भाव-बोध आदि कविताओं के द्वारा ऋचा सिंह दिल में छिपे गुबार को/अश्क बन कर बह जाने दो की तरह से बहुत सारे विचारों को तुहिना में बहा देती हैं. इसके लिए वे नियति को किसी भी तरह दोषी नहीं मानती हैं. वे बड़े ही सकारात्मक भाव से स्वीकारती हैं कि


क्या ख़ुशी क्या ग़म

आँसू थे किस्मत में

तो खुशियों में भी

आँखों से गिरे.


इसी सकारात्मकता के कारण वे जहाँ जीवन के विविध रंगों को अपनी कलम से सजाती हैं तो वे काली कराल सी, अंतस के राम, गांडीव उठा अर्जुन, लहू राणा का, दुर्गा स्वरूपा लक्ष्मी आदि के द्वारा ऐतिहासिक प्रतीकों को निखारती हुईं आज की बात करती हैं. वे अपनी इन कविताओं के सहारे लोगों को जागने का सन्देश देती हैं.


हे राम! अपने जीवन का

लक्ष्य साधो

नाराच के प्रहार से

पापियों को

मर्यादा में बांधो,

हे अंतस के राम!

तुम जागो.


ज़िन्दगी के, प्रकृति के, देश के बारे में कलम चलाती ऋचा सिंह बहुत ही सहज भाव से जीवन के कोमलकांत पक्ष पर भी लेखनी का प्रवाह दिखाती हैं. उन्होंने जिस सहजता के साथ ज़िन्दगी की कठोरता को चित्रित किया है, उसी सहजता के साथ वे प्यार, ख़ुशी जैसी कोमल भावना को चित्रित करती हैं. ऐ ख़ुशी, तू आना मेरा घर/बस जाना तू यहाँ आकर जैसी रचना स्वतः ही उनकी कोमल भावनाओं का उदघाटन करती है. वे ज़िन्दगी के कठोर और कोमल भावनाओं को समझती हैं.


जब लब होते खामोश

आँखें कहती हैं सारी कहानी

शब्दों से जो न कहा गया

वो मौन बहता है बनके

तेरी आँखों का पानी.


इसी तरह से


जज्बात-ए-दिल को

दफ्न किये रहे बरसों,

ख़ामोशी से लबों को

सिये रहे बरसों.


के द्वारा उनकी कलम दिल की मजबूरी को दर्शाती है. यह सूक्ष्म भावना उसी रचनाकार के दिल से उभर सकती है जिसने गंभीरता के साथ समाज के सभी पहलुओं पर अपनी दृष्टि डाली हो.


अपने पहले ही काव्य-संग्रह के द्वारा डॉ. ऋचा सिंह राठौर ने साहित्य जगत में एक आशा की किरण जगाई है. निश्चित ही निकट भविष्य में उनके द्वारा और भी महत्त्वपूर्ण कृतियों से साहित्य संसार जगमगाएगा.  


एक बूँद बन मोती की

धरती को

अम्बर की कहानी

सुनाती तुहिना.


निश्चित ही तुहिना ऐसी अनेक कहानियाँ सुनाती है. बस इसे दिल से, संवेदना से सुनने की आवश्यकता है.   

 


20 जुलाई 2020

'दिल के करीब' अमेज़न किंडल पर उपलब्ध

तकनीक का लाभ समय-समय पर लेते रहना चाहिए. पिछले दिनों आत्मकथा कुछ सच्ची कुछ झूठी के प्रकाशन के सम्बन्ध में बहुत परेशानी उठानी पड़ी. ये और बात है कि अंततः वह प्रकाशित हो ही गई. तकनीक के दौर में इसका लाभ इसलिए भी लेते रहना चाहिए क्योंकि इससे प्रचार-प्रसार सहज हो जाता है. किसी भी सामग्री की, उत्पाद की पहुँच अधिक से अधिक लोगों तक हो जाती है. विगत वर्षों में कई पुस्तकों का प्रकाशन करवाया गया, बहुत सी सामग्री का ऑनलाइन प्रकाशन वेबसाइट अथवा ब्लॉग के माध्यम से हुआ, जिनके अनुभव के आधार  कहा जा सकता है कि प्रिंट से ज्यादा पाठक वर्तमान में इंटरनेट पर हैं. इसी तकनीक का लाभ लेने का विचार काफी समय से चल रहा था.


विचारों का क्रियान्वयन करते हुए अपने कविता संग्रह दिल के करीब को अमेज़न पर किंडल संस्करण के रूप में प्रकाशित कर दिया. यह हमारा पहला काव्य-संग्रह है जो अमेज़न पर किंडल संस्करण के रूप में आया है. आप सभी लोगों से अनुरोध है कि इसे अधिक से अधिक स्नेह प्रदान करके हमें प्रोत्साहित करने का कष्ट करें.




फोटो पर क्लिक करके भी दिल के करीब पहुँचा जा सकता है.
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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

17 दिसंबर 2018

दिल के करीब - 1400वीं पोस्ट

एहसास ही हैं जो किसी भी व्यक्ति को जीवंत बनाये रखते हैं. यदि व्यक्ति की ज़िन्दगी से एहसासों को निकाल दिया जाये तो मनुष्य और किसी पत्थर में कोई अंतर नहीं रह जायेगा. एहसास ही हैं जो व्यक्ति को वर्तमान और अतीत से जोड़े रखते हैं. विगत को वर्तमान में लाकर जीवंत बनाये रखने की कला भी किसी इन्सान में इसी कारण पैदा हो पाती है. यह एहसास ही है जबकि महज चंद दिनों की मुलाकात के बाद कोई इन्सान विश्वास के साथ एक आवाज़ दे और उस आवाज़ में अजनबीपन न हो बल्कि एक विश्वास ही हो, एक तरह का अपनापन ही हो तब उस पर भी अविश्वास करने जैसा कुछ शेष नहीं बचता. हाथों में लहराते चंद कागज के टुकड़े और आँखों में विश्वास की चमक के साथ उसके द्वारा चंद शब्दों में कही गई बात ही यह दर्शाने को पर्याप्त है कि कोई व्यक्ति आपके बारे में क्या धारणा रखता है. एक विश्वास के साथ चंद कागजों के रूप में एक एहसास संभाल कर सुरक्षित रख लिए गए. विश्वास ही वह सम्पदा है जो निहायत कोमल है, अत्यंत नाजुक है. जरा सी ठेस भी समूचे विश्वास को दरकाती ही नहीं वरन समूल नष्ट कर देती है. उस समय के महज चंद शब्दों के एहसास से उत्पन्न विश्वास खंडित न हो, चकनाचूर न हो यह प्रयास सदैव बना रहा.


बनते-बिगड़ते पलों के बीच के खुशनुमा पल जिस तेजी से आये, उसी तेजी से चले भी गए. उनमें न कुछ अपना था, न कुछ बेगाना था बस समय को गुजरना था सो गुजर गया. एक एहसास उस समय भी बना हुआ था, एक एहसास आज भी बना हुआ है. चंद शब्द उस दिन भी कागज़ पर जज्बातों को बयान कर रहे थे, चंद शब्द आज भी उन्हीं जज्बातों का बयान थे. समय की गति बराबर बनी हुई थी, तब भी कुछ अलग स्थिति थी, आज भी कुछ अलग स्थिति बनी हुई है मगर शब्दों का कलेवर तब भी वही था, आज भी वही है. इसका कारण भी संभवतः यही होगा कि शब्दों में तब भी एहसास वही थे, उन्हीं शब्दों में आज भी वही एहसास हैं. एहसासों के साये में खुद को आगे बढ़ाते रहने का नाम ही ज़िन्दगी है. एहसासों को ज़िन्दगी के साथ आगे संभाले रखना भी ज़िन्दगी है. यही एहसास है जो दिल के करीब है, दिल का हिस्सा है.
++

कोई तो है जो
दिल के आसपास रहता है सदा,
अपने अहसास,
अपनी उपस्थिति को
दर्शाता है सदा।
उसके पास होने का
अहसास मात्र ही
तन्हा नहीं होने देता है कभी,
नहीं होने देता है उदास,
न ही परेशान।
लगा रहता है.......मन में
सदा यही..........कि
उदासी का एक लम्हा ही
उदास कर जाएगा उसे भी,
जो है दिल के आसपास
अपनी याद के सहारे,
एक मीठे अहसास के सहारे।
पर..........इस मीठे अहसास के पीछे भी
एक दर्द है छिपा,
वह.........
बहुत पास होकर भी
बहुत दूर है अभी,
आंखों के सामने है फ़िर भी
हाथों की पहुँच से दूर है अभी।
आवाज़ उसकी, दिल तक हमारे पहुँचती है,
हवा में उड़-उड़ कर
उसकी खुशबू फैलती है।
अहसास के सहारे वह
रहता है आसपास
पर......
हकीकत में बहुत दूर है अभी।
लेकिन यही क्या कम है कि
यादों के सहारे ही सही,
अहसास के सहारे ही सही,
हवा में फैलती खुशबू के रूप में ही सही,
कोई है तो हमारा अपना
जो........
दूर होकर भी बहुत,
दिल के करीब है बहुत।


+++
इस ब्लॉग की 1400वीं पोस्ट 

09 अक्टूबर 2018

डाकिया डाक लाया फिर भी उस ख़त का इंतजार


आज के दिन यानि कि 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य जनमानस में बीच डाक विभाग के उत्पादों की जानकारी देना, उनको डाक विभाग की सेवाएँ लेने के लिए जागरूक करना तथा जनता और डाकघरों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है. इसका आयोजन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के द्वारा किया जाता है. 9 अक्टूबर 1874 को जनरल पोस्टल यूनियन के गठन के लिए बर्न स्विटजरलैंड में 22 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किये. कालांतर में सन 1969 में जापान के टोकियो में इसी दिन को विश्व डाकघर दिवस घोषित किया गया. तबसे वैश्विक स्तर पर डाक सेवाओं के योगदान को रेखांकित करने के लिए प्रतिवर्ष विश्व डाकघर दिवस मनाया जाने लगा. 1 अप्रैल 1879 को जनरल पोस्टल यूनियन का नाम बदलकर यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन (Universal Postal Union सार्वभौमिक डाक संघ अथवा यूपीयू) कर दिया गया.


भारत यूनीवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य 1 जुलाई 1876 को बना. सदस्यता लेने वाला यह पहला एशियाई देश बना. भारत में एक विभाग के रूप में डाक विभाग की स्थापना 1 अक्तूबर 1854 को लार्ड डलहौजी के काल में हुई थी. वर्तमान में डाकघरों में बुनियादी डाक सेवाओं के अतिरिक्त बैंकिंग, वित्तीय व बीमा सेवाएं भी उपलब्ध हैं. इस वैश्विक दिवस के साथ-साथ भारतीय डाक विभाग 9 से 14 अक्टूबर के बीच डाक सप्ताह मनाता है. इसका उद्देश्य लोगों को डाक विभाग के योगदान से अवगत कराना है. सप्ताह के हर दिन अलग-अलग दिवस मनाये जाते हैं. 10 अक्टूबर को सेविंग बैंक दिवस, 11 अक्टूबर को मेल दिवस, 12 अक्टूबर को डाक टिकट संग्रह दिवस, 13 अक्टूबर को व्यापार दिवस तथा 14 अक्टूबर को बीमा दिवस मनाया जाता है. 

आज मोबाइल, ई-मेल, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि के दौर में भले ही चिट्ठी का कोई महत्त्व नहीं रह गया हो मगर किसी समय लोगों की निगाहें और कान डाकिया की राह पर लगे रहते थे. वर्तमान में चिट्ठियों की प्रासंगिकता भले ही कम हो गई हो मगर डाक विभाग ने जिस तरह से अपनी सेवाओं, उत्पादों का दायरा विस्तृत किया है, उससे उसकी पहचान जनमानस में अभी भी स्थापित है.

इस अवसर पर स्व-लिखित कविता....

पत्र..
एक साधन
जो जोड़ता है दो दिलों को,
बनाता है उस लड़ी को।
अधूरी पड़ी
उन रिश्तों की डोर को
थाम कर
जो हैं बहुत दूर-दूर,
उन सभी को साथ ले,
हर तरह के रंगों को
अपने में समेटे
किसी की खुशी,
किसी के आँसू
अपने में लपेटे,
हवा के साये सा
उड़ कर आता है,
पास हमारे।
देने को संदेश उन सभी का
जो बैठे हैं हमारे
दूर कहीं हमसे।
बनके खुद साथी उनका,
बनके एक साथी हमारा,
हर पल, प्रतिक्षण,
कोई न कोई रहता है गुम,
किसी के ख्याल में,
किसी की चाह में।
होगी कोई माँ भी
कहीं दूर उदास,
होगी उसे भी अपने बेटे के
खत की आस।
सूनी आँखों में आँसुओं के मोती
नित्य सजाती होगी,
अपने बुढापे को
दरवाजे की चैखट पर बिताती होगी।
तो गुम होगी कहीं कोई
अपने प्रियतम की याद में,
सूनी रात की काली तन्हाई से
घबराती होगी,
झिलमिल तारों के बीच
सजे चाँद में
अपने प्रियतम का चेहरा बनाती होगी।
ऐसा ही एक इन्तजार
हमें भी है,
न किसी खास का,
न किसी यार का,
न किसी प्रेम का,
न किसी प्रियतम का,
वो खत हमें
बहार ने लिखा होगा,
होगी उसमें खबर
फसल प्यार की उगने की,
महक स्नेह और अमन के
फैलने की,
करवायेगा वो खत मुलाकात
हमारे भाइयों से,
जो अब
लड़ न रहे होंगे
राम-रहीम के नाम पर।
गोलियों की गूँज और
अपनों की चीखों की जगह
नदियों की कल-कल,
पक्षियों का कलरव होगा।
वही प्यारा चमन,
वही सुहाना वतन होगा।
बस हमें तो हर पल
इसी खत का इन्तजार है,
महज इन्तजार, वर्षों का इन्तजार
कि कब समय हमारी भी सुधि लेगा?
कब हमें अपनी खबर भेजेगा?
हर पल बस यही आस है
कि कभी तो मेरा खत आयेगा,
आज नहीं तो
कल तो अवश्य ही आयेगा।



01 सितंबर 2018

वक़्त का परिंदा

कोई क्या कहेगा, उसे कहने दो,
ये वक़्त का परिंदा है, उसे उड़ने दो.

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लिखे जा रहे कविता संग्रह 'रात का शहर' से...
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यादों में बस गया था वो रात का शहर,
इक अफसाना बन गया वो रात का शहर.

साथ बैठकर पढ़ने का करके बहाना,
यार-दोस्तों के साथ घर से निकल जाना.

साइकिल का उड़ना, हवा से बातें करना,
किसी चौखट पर ठिठकना फिर आगे बढ़ना.

यूँ बेफिक्र, बेमकसद सी चलती आवारगी,
किसी दुकान पर चाय-पकौड़ी पर तना-तनी.

खुले आसमान किसी मैदान में खड़े ही खड़े,
सपनों की सीढ़ियाँ न जाने कितनी बार चढ़े.

हर बार लगता कितना सुहाना है सफ़र,
हमसफ़र सा लगने लगता वो रात का शहर.

07 जुलाई 2018

ख़ामोशी


एक निस्तब्धता
हम दोनों के बीच
सदियों से छाई है।
हम दोनों साथ चलते रहे
जाने कब से मगर
इस मौन को न तोड़ सके।
वह बात
जो मैं सुनना चाहता था
तुम्हारी आवाज़ में,
उसे नज़रों की भाषा में
पढ़ सके।
हमारी बात दिल की
दिल में ही रह गई,
एक खामोश मौन की
गहराइयों में बह गई।
तुम्हारे लबों पर,
तुम्हारे विचारों की लय पर
पहरा लगा था समाज का,
परदा पड़ा था
शर्म और लाज़ का,
पर मैं...मैं क्यों मौन रहा?
क्यों खामोशी का दामन थामे
यूँ चलता रहा?
हवा के हर झोंके ने,
बादलों की हर अँगड़ाई ने
छूकर पास से,
सिरहन मचाकर तन में
मौन को तोड़ना चाहा,
पर....
सफर यूँ ही खामोश कटता रहा।
आज फिर तुम्हारी नज़रों ने
संग ले इस सुहाने मौसम का
कुछ पूछना चाहा,
खामोश दर्प को तोड़ना चाहा।
नज़रों ने
नज़रों की निस्तब्धता को तोड़ा,
हम फिर भी
वैसे ही खामोश रहे,
नज़रों के सहारे ही
कुछ कहते रहे।
और चल पड़े अगले पल
वैसे ही खामोश, मौन,
निस्तब्धता लिए।
न पता कब तक
यूँ अनवरत,
शायद जनम-जनम तक,
इस जनम से उस जनम तक।

24 अप्रैल 2018

विश्व पुस्तक दिवस पर नई पुस्तक-लेखन आरम्भ - 'रात का शहर'


कल पुस्तक दिवस मनाया गया. जिनको पुस्तकों से प्रेम है उन्होंने तो जोश के साथ मनाया और जिनको पुस्तकों के प्रति प्रेम दर्शाना था उन्होंने सेल्फी के साथ मनाया. किताबों के प्रति हमारे लगाव का एक बहुत बड़ा कारण आनुवांशिक कहा जा सकता है. पिताजी को और बाबाजी को जबरदस्त शौक था पढ़ने का. बाबाजी को हमने पूरे दिन कुछ न कुछ पढ़ते बराबर देखा है. समाचार-पत्र को वे इस तरह पढ़ते कि कोई एक समाचार भी उनसे बचकर नहीं निकल पाता. इसी तरह पिताजी को हमने एक दिन में उपन्यास समाप्त करते देखा है. उरई में हमारे परिचित की एक दुकान हुआ करती थी. मंगलवार साप्ताहिक बंदी के चलते दुकान बंद रहती. पिताजी को उस एक दिन में किताब समाप्त करते देखा है. इसके अलावा तमाम सारी पत्रिकाएँ हमारे घर में आती. हम बच्चों के लिए भी अनेक पत्रिकाएँ पिताजी लाया करते थे. चंपक, लोटपोट, चंदामामा, गुड़िया, नंदन, सुमन सौरभ, चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी आदि से परिचय बराबर होता रहता था. आगे चलकर राजन-इक़बाल सीरीज ने खूब आकर्षित किया. न जाने कितनी कॉमिक्स हम दोस्तों के बीच इधर से उधर होती रहतीं. पढ़ने के इस शौक में उस समय चार चाँद लग गए जबकि कक्षा छह में एडमीशन लेने पर जीआईसी कैम्पस में राजकीय पुस्तकालय के दर्शन हो गए. आज भी राजकीय पुस्तकालय नियमित रूप से जाना होता है. आज भी पुस्तकों के साथ दोस्ती बहुत गहरी है. सफ़र में आज भी कई-कई किताबें हमारी सहयात्री बनती हैं.


पढ़ने के अपने शौक के बीच याद नहीं कि कब बचपन में लिखने का भी शौक लग गया था, जो आज तक बना हुआ है. उस समय हमारी उम्र शायद नौ-दस वर्ष की रही होगी जबकि हमने अपनी पहली कविता लिखी थी. पिताजी की तरफ से हमेशा ऐसे कामों के लिए प्रोत्साहन मिलता रहा. उन्होंने उस कविता को उस समय दैनिक भास्कर, स्वतंत्र भारत और आज में प्रकाशित करवाया था. बहरहाल, समय के साथ पढ़ना-लिखना दोनों बढ़ता ही रहा. किताबों की संख्या अलमारी में बराबर बढ़ती रही. लिखने वाली सामग्री भी बढ़ती रही. इस लिखने के शौक का जब छपास रोग से संपर्क हुआ तो लिखना और तेज हो गया. अब चूँकि छपने के लिए भी लिखना था सो पढ़ना और भी ज्यादा जरूरी हो गया, सो पढ़ना उससे भी अधिक तेज हो गया. कालांतर में तकनीकी विकास ने लेखन को ब्लॉग, वेबसाइट ने विकास के आयाम दिए. बहुत कुछ लिख-पढ़ लेने के बाद कुछ अपने बारे में लिखने-बताने की इच्छा हुई तो आत्मकथा कुछ सच्ची, कुछ झूठी का लेखन शुरू किया. अपने चालीस वर्ष के जीवन को जैसे देखा-समझा, इतने वर्षों में बहुत से खट्टे-मीठे अनुभव हुए, बहुत से अपने-पराये साथ आये उन सभी अनुभवों को इकठ्ठा करने का काम किया.


आत्मकथा लेखन पूर्ण हुआ और उसके प्रकाशन की प्रक्रिया आरम्भ करनी है, बस किसी प्रकाशक की सहमति के इंतजार में हैं. इस बीच कुछ अन्य विषयों पर पुस्तक लिखने का विचार बन रहा था. जिसमें से एक पुस्तक काव्य-रूप में है. इसमें एक शहर को जिंदगी से, व्यक्तियों से, किसी स्थान से, किसी सजीव-निर्जीव से, समय-काल-परिस्थिति आदि से सम्बंधित करके दिखाया गया है कि वह शहर रात में किस तरह की अनुभूति करता है. आत्मकथा लेखन के पश्चात् इसी पुस्तक रात का शहर को लिखने का विचार था. कल पुस्तक दिवस के अवसर इसे आरम्भ किया है. दस-बारह पंक्तियों की काव्य-रचना के द्वारा इसी अनुभूति को रात के शहर के सम्बन्ध में दर्शाने का प्रयास किया गया है. अभी बने खाँचे के अनुसार विचार ये किया है कि महज इक्यावन काव्य-रचनाओं का संकलन किया जायेगा.
एक काव्य-रचना को उदाहरण स्वरूप देखिएगा-

यादों में बस गया था वो रात का शहर,
इक अफसाना बन गया वो रात का शहर.

सूनी गली के घर से झांकती आँखें,
फैक्ट्री से लौटते पिता को ताकती राहें.

झींगुरों के गीतों से सन्नाटों का बिखरना,
पहरेदारों की तरह था कुत्तों का विचरना.

खांसना-खखारना किसी बुजुर्ग पड़ोसी का,
गूंजता स्वर ले लो मूंगफली, लईया, पट्टी का.

झिर-झिर कर आती रौशनी हलकी सी,
अंधकार को जीतने की कोशिश ज़ारी थी,

खम्बे के उस बल्ब को किसी की नजर लग गई,
घुप्प अन्धकार में घिर गया वो रात का शहर.

12 अप्रैल 2018

स्वार्थमय सोच


दूर कहीं से आती एक चीख ने 
दिल दहला दिया,
घबरा कर हमने
अपने को समेट कर
घोंसले रूपी घर में छिपाया,
उस चीख में छिपे भय को
अपने आसपास पाया।
कहीं वह भय, कहीं यह चीख
हमारी शांति को न छीन ले?
कहीं उस चीख में छिपी
करुणा, वेदना
हमसे कुछ माँगने न लगे?
इसी डर से, इसी भय से हम
छिपे रहते हैं।
बगल के कमरे में सोती
पुत्री को देखते हैं,
डरते हैं कि कहीं उस चीख में
छिपे न हों काले हाथ, जो
प्रविष्ट होकर हमारे घर में
लूट न लें अस्मत।
कभी माँ से लिपट कर सोते
मासूम बेटे को देखते हैं,
कभी कमरे की खिड़कियों का
ठीक से लगा होना देखते हैं।
उस समय हमारे सामने होता है
हमारा परिवार, हमारा घरबार।
वही छोटी सी दुनिया होती है
हमारा वतन, हमारा चमन।
कितने निर्मोही, स्वार्थी, अंधे होकर
बना लेते हैं
एक भरोसे का अदृश्य घेरा,
आपस में सिमट कर सभी
हो जाते हैं एकाकार,
दुबक जाते हैं अपने आप में
करके घुप्प अंधकार।
उस चीख का कारण भी नहीं खोजते।
कभी यह भी न सोचते कि
क्यों उत्पन्न हुई वह चीख?
क्यों उपजा वह शोर
खामोशी को चीर?
कहीं वह चीख भूख से दम तोड़ते
किसी बालक की तो नहीं?
किसी घर के कोने में जल रही
किसी नारी की तो नहीं?
कहीं उस चीख में
किसी बुढ़ापे का सहारा
तो नहीं छिना?
उस चीख ने किसी का
सुहाग तो नहीं उजाड़ा?
हो सकता है कि वह शोर
किसी नारी की इज्जत मिटने का हो,
मदद को, हमें,
चीख कर पुकारा हो?
पर नहीं...
हम स्वार्थपरक सोच लिए,
उन्नत विचारों और
उच्च मानसिकता का ढोंग लिए
अनसुना कर देते हैं
उस आवाज को
और समा जाते हैं
अपने संसार में,
अपने छोटे से
स्वार्थमय संसार में।