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26 जुलाई 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद

संसद की कार्यवाही और ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा की जिद.

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संसद में लगातार बहस मची हुई है ऑपरेशन सिन्दूर पर चर्चा किये जाने की. इस ऑपरेशन के बारे में सबकुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई. ऐसे विषयों की सूची लम्बी हो सकती है किन्तु संक्षेप में इसे निम्न बिन्दुओं के सापेक्ष समझा जा सकता है. काश! सदन के अन्दर बैठे जनप्रतिनिधियों ने कभी इन विषयों पर भी चर्चा करने पर विचार किया होता.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लायेआज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.

24 दिसंबर 2018

सार्थक पहल की भ्रूण हत्या

ऐसा लगता है जैसे विषय से भटकना हम सबकी आदत में शामिल है. विषयांतर कर देना, मूल मुद्दे से इतर बात करने लगना न केवल आम आदमी की आदत में शामिल है वरन बड़े-बड़े बुद्धिजीवी तक इससे पीड़ित हैं. आए दिन होने वाले सेमिनार, अकादमिक कार्यक्रमों में ऐसे लोगों की सहभागिता देखने को मिलती है. अनेक कार्यक्रमों में, गोष्ठियों में इनके वक्तव्यों को सुनने का अवसर मिलता है. अनेकानेक अवसरों में से कोई एक-आध अवसर ऐसा होगा जिसमें कोई वक़्ता अथवा कार्यक्रम संयोजक अपने उद्देश्य से भटका न हो. यही भटकाव समूचे कार्यक्रम, आयोजन की प्रतिष्ठा, उसके उद्देश्य पर चोट कर देता है. अपने तमाम पुराने अनुभवों को एकबार फिर उसी रूप में देखा. एक बहुत ही सार्थक आयोजन, अत्यंत सारगर्भित विषय सहभागिता करने वालों के भटकाव के कारण अपनी मूल भावना के साथ इंसाफ़ न कर सका. इसमें कुछ हद तक संयोजक को भी शामिल किया जा सकता है.

अवसर था जेंडर संवाद के आयोजन का. महज़ दो शब्दों के इस शीर्षक के पीछे की गम्भीरता को समझने के लिए जिस समझ की आवश्यकता चाहिए थी वह सम्बंधित आयोजन क्षेत्र में तो व्याप्त ही नहीं थी, सहभागियों में भी अधिकांश इसके प्रति संज्ञा-शून्य की स्थिति में रहे. तीन दिवसीय इस आयोजन के द्वारा महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान, अधिकार की चर्चा होनी थी जो वक्ताओं के अपने व्यक्तिगत अनुभवों से गुज़रती हुई स्त्री-पुरुष अंतर्विरोध, उनके आपसी संघर्षों, महिला वर्ग के इतिहास, समाज की पूर्वकालिक मान्यताओं पर ही केंद्रित बनी रही. जेंडर फ़्रीडम के रूप में संचालित साइकिल यात्रा के साये में चर्चा स्त्री-पुरुष सम्बंधों, महिलाओं की शारीरिक स्थिति, माहवारी पर आकर टिकती रही. समझ नहीं आया कि तमाम वक़्ता जेंडर की नवीन परिभाषा तय करने की ज़िद सी क्यों पकड़े रहे? स्त्री को ज़बरन स्त्री-विषयक अलंकरणों से लादने का विरोध होना चाहिए पर उसका वास्तविक स्वरूप सुदूर ग्रामीण अंचल की महिलाओं तक कैसे और किस रूप में पहुँचेगा, यह स्पष्ट नहीं किया जा सका.

जेंडर को समाज द्वारा और सेक्स को प्रकृति द्वारा बनाए जाने को स्थापित करते हुए सेक्स को प्राकृतिक लैंगिक और जेंडर जो समाजिक लैंगिक के रूप स्वीकारा गया. समझना और समझाना होगा कि जेंडर के जिस हिन्दी अनुवाद लिंग को पुरुष सत्ता का पर्याय बताते हुए उसका बहिष्कार करने की बात अनेक वक्ताओं, आयोजक ने की, उसी को सामाजिक लैंगिक या सामाजिक लिंग के रूप में स्वीकार कर किस नवीन अवधारणा को स्वीकार किया जा रहा है? जेंडर के हिन्दी अनुवाद लिंग को नकारते हुए सामाजिक लिंग को स्वीकार करने से क्या पुरुषवादी सत्ता का लोप हो जाएगा? क्या ऐसा कर देने भर से महिलाओं को जेंडर फ़्रीडम मिल जाएगा? क्या इस परिभाषा का, शब्दावली का उपयोग महिलाओं को सशक्त बना देगा? इस बारे में आयोजक से लेकर वक्ताओं तक द्वारा मौन बनाए रखा गया.

जेंडर शब्द के अलावा चर्चा का बिंदु माहवारी शब्द भी बना रहा. घूम-फिर कर माहवारी पर चर्चा को मोड़ देने का औचित्य समझ से परे रहा. यहाँ विचारणीय यह है कि माहवारी के दिनों में महिलाओं को अपवित्र मानने जैसी किसी भी मान्यता का विरोध किया जाना चाहिए पर इसके साथ इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इस विषय पर घरों में आम चर्चा किस रूप में हो. देश की अत्याधुनिक महिलाओं द्वारा हैप्पी टू ब्लीड का आयोजन किया जाना भी एक सत्य है तो माहवारी पर चुप्पी धारण कर जाना भी एक सत्य है. अभी अनेकानेक क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ इस विषय पर चर्चा को उचित नहीं माना जाता. सामान्य शिष्टाचार में आज भी ऐसा सोचना कल्पना से परे लगता है जबकि बाप-बेटी आपस में माहवारी पर चर्चा करें. यह भी मुश्किल सा ही है कि भाई-बहिन माहवारी पर चर्चा करें. इन दिनों में महिलाओं की कठिनाई, उसकी शारीरिक समस्या, कष्ट, उनके निराकरण, उन दिनों में साफ़-सफ़ाई की सामान्य चर्चा कई बार के चरणों के बाद होना सम्भव दिखती है. एकाधिक स्थितियों में ही सम्भव है कि कोई पति अपनी पत्नी की इन दिनों की शारीरिक पीड़ा को न समझता होगा. शहरी क्षेत्रों में इन दिनों में आपसी समन्वय, सहयोग देखने को मिलता है, हाँ ग्रामीण अंचलों में सभी इस विषय में जागरूकता लाने की आवश्यकता है. जेंडर फ़्रीडम और माहवारी की चर्चा का यहाँ उद्देश्य और सार्थकता को स्पष्ट करने के यहाँ भी पूर्वाग्रहयुक्त विमर्श होता रहा.

बेटियों को कैसे सशक्त बनाया जाए, उनको कैसे स्वाभिमानी बनाया जाए, उनको अपने अधिकारों के लिए कैसे सजग किया जाए, अपने प्रति होने वाले अत्याचार के विरुद्ध कैसे लड़ा जाए आदि बिंदुओं पर किसी तरह की चर्चा सामने नहीं आई. जेंडर संवाद के द्वारा जेंडर समानता स्थापित किए जाने की भावना का लोप दिखाई दिया. समाज के लोगों तक कैसे संदेश जाए कि किसी भी बेटी पर अत्याचार समूचे समाज पर तमाचा है, व्यवस्था पर तमाचा है यह परिभाषित नहीं किया गया. आयोजन स्थल की समस्याओं का ज़िक्र करने के बाद भी वहीं के स्त्री-विषयक मूल मुद्दों को विस्मृत कर देना भी आयोजक की, वक्ताओं की भूल रही. राइड फ़ोर जेंडर फ़्रीडम के साथ शुरू यात्रा जेंडर संवाद के द्वारा एक नई राह का निर्माण कर सकती थी पर अफ़सोस ऐसा होता हाल-फ़िलहाल तो नहीं दिखा. समुचित व्यवस्थित निर्देशन के अभाव में इसे एक सार्थक पहल की भ्रूण हत्या कहा जा सकता है. एक विचार, एक यात्रा पूर्णतः पल्लवित-पुष्पित होने के पहले ही उसी रूप में खड़ी दिखाई देने लगी, जहाँ से आरम्भ हुई थी. कदाचित यह सम्पूर्ण आयोजन में व्याप्त भटकाव का परिणाम कहा जाएगा. 

23 दिसंबर 2018

स्त्री और पुरुष के बीच वर्ग-संघर्ष जैसी स्थिति

जेंडर संवाद के लिए शिवहर (बिहार) का चुना जाना और देश के कई राज्यों से बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकारों, रंगमंचीय प्रतिभाओं का एकजुट होना अपने आपमें किसी यज्ञ से कम नहीं है. तीन दिवसीय इस आयोजन की अंतिम रिपोर्ट अभी बनाया जाना शेष है क्योंकि अंतिम दिन, 24 दिसम्बर अभी बाक़ी है. दो दिन के संवाद, परिचर्चा से किसी तरह का अंतिम निष्कर्ष निकालना भले ही जल्दबाज़ी हो मगर उनकी सुगंध अवश्य महसूस की जा सकती है. महिलाओं की समानता, स्वाधीनता, अधिकार आदि से सम्बंधित इस आयोजन में अनेक लोगों के, जिनमें स्त्री, पुरुष दोनों ही शामिल रहे, विचार सामने आए. उनके आधार पर किसी तरह का निर्णय या निष्कर्ष दे देना जल्दबाज़ी ही होगी. इसके बाद भी जैसा कि महिला-विषयक आयोजनों के तकनीकी सत्रों की स्थिति होती है, लगभग वैसी ही स्थिति इस आयोजन में देखने को मिली.

जेंडर संवाद के द्वारा महिलाओं की स्थिति के साथ-साथ जेंडर पर भी गम्भीर चर्चा की माँग थी. इस आयोजन के द्वारा जेंडर के हिन्दी अनुवाद ‘लिंग’ अथवा ‘लैंगिक’ को नकारते हुए इस शब्द को इसी रूप में स्वीकार किए जाने पर ज़ोर दिया गया. जेंडर और सेक्स की निर्धारित परिभाषाओं को ख़ारिज करते हुए इनका अलग निर्धारण अपनी बौद्धिकता को भले ही पोषित करता हो किंतु वह महिलाओं की समाजिक स्थिति को प्रभावित करने की क्षमता का विकास क़तई नहीं करता है. प्राकृतिक लिंग और सामाजिक लिंग जैसे शब्दों के द्वारा अकादमिक लेखों में, वक्तव्यों में महिलाओं की परस्थिति को परिभाषित करने के अलावा कोई और काम होने वाला नहीं है. शब्द-विस्तार, शब्द-संकुचन के नियमों को ख़ारिज करते हुए जब सार्थक चर्चा शब्दों के स्त्रीलिंग, पुर्लिंग उनके व्यवहार पर टिक जाए तो साफ़ समझ आता है कि अभी वास्तविक निष्कर्ष बहुत दूर है. महिलाओं की जीवन-चर्या, पुरुष का उसके लिए सहयोग, महिला का महिला के लिए सहयोग, महिलाओं-पुरुषों की प्राकृतिक शारीरिक बनावट, उनकी अपनी माँग-पूर्ति पर निरर्थक चर्चाओं के बीच संवाद गुम सा होता समझ आया. हमेशा की तरह एकमात्र स्थिति ज्यों की त्यों दिखाई दी और वो थी एक विभेद को समाप्त करने के लिए दूसरा विभेद पैदा करना. इस तरह की अनावश्यक बहसों, एक-दूसरे को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी न कहने के बाद भी प्रतिद्वंद्वी जैसा समझना समाज में स्त्री और पुरुष के बीच एक खाई ही पैदा कर रहा है. ऐसे किसी भी आयोजन में शामिल होने वाले स्त्री, पुरुष गम्भीरता से दोनों के सह-सम्बंध, दोनों के समन्वय, दोनों के साहचर्य पर एकराय होने का प्रयास नहीं करते हैं. इसके उलट दोनों ही एक-दूसरे की खींची लकीर को मिटाने की कोशिश में लगे रहते हैं. ऐसा ही कुछ-कुछ इन चर्चाओं में यहाँ भी दृष्टिगत हो रहा था. होना यह चाहिए कि अपनी लाइन को बड़ा किया जाए, ख़ुद को सक्षम बनाया जाए. स्त्रियों का स्त्रियों के रूप में विकास करने से इतर उनका पुरुष बनने की दिशा में अंधी दौड़ लगाना दिखता रहा.

विचार, व्यवहार, व्यक्तित्व अपने और समाज के विकास हेतु होना चाहिए न कि विभेद बढ़ाने के लिए. तमाम बहसों, विचारों को, तर्कों-कुतर्कों को, उदाहरणों को देखने-सुनने के बाद मन अचानक ही कह उठा कि यदि इस देश में कभी वर्ग-संघर्ष जैसे हालात बने तो वह किसी जाति के बीच नहीं, किसी धर्म के बीच नहीं, किसी क्षेत्र के बीच नहीं वरन स्त्री और पुरुष के बीच होगा. हो सकता है कि ये आज हास्यास्पद कल्पना लगे किंतु जेंडर संवाद की आज की चर्चा को सुनकर इसे वास्तविक मानने से कोई न करेगा, बस उसने पूर्वाग्रह रहित होकर विमर्श, बहस, संवाद को सुना, समझा, परखा हो. 

28 अप्रैल 2010

बहस कोई भी हो किन्तु तथ्यपरक और पूर्वाग्रह रहित होनी चाहिए...


सवाल मन में न उठे तो मन का भावशून्य और विचारशून्य होना समझ में आता है और विचार आने के बाद उसको सकारात्मक दिशा न मिले तो विचारों का उठना निरर्थक जाता है। अकसर देखा गया है कि हम आपस में अथवा किसी चर्चा के दौरान किसी भी ऐसे विषय पर बहस करना शुरू कर देते हैं जिस पर हमारी गहराई तक पकड़ भी नहीं होती है।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)

उदाहरण के रूप में दो-तीन मुद्दों पर ध्यान खींचेंगे--

अभी हाल ही में एक पुस्तक आई थी जिसमें रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध लड़ने की इच्छा को लेकर कुछ सवाल उठाये गये थे। इतिहास में तथ्यों की आवश्यकता तो होती ही है साथ ही इस बात की आवश्यकता भी होती है कि हम उन तथ्यों को बिना किसी पूर्वाग्रह के आत्मसात कर उसमें से सही परिणाम सामने लायें।

रानी झाँसी अंग्रेजों से अपनी झाँसी को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहीं थीं और ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में हो सकता है कि यह सत्य हो कि यदि अंग्रेजों ने उनको झाँसी लौटा दी होती तो वे युद्ध न करतीं। यदि अपने-अपने हितों को देखकर ही उस समय युद्ध लड़ा गया होता तो भी अंग्रेजों को हम हराने में सक्षम होते। युद्ध चाहे किसी भी तरह से, किसी भी मंशा से लड़ा गया हो किन्तु यह सभी को पता है कि वीरता की कोई दूसरी मिसाल इस रूप में नहीं मिलती है।

रानी झाँसी से सम्बन्धित एक और तथ्य अपनी सत्यता-असत्यता को लेकर बहस के घेरे में हमेशा रहता है। झलकारी बाई के अस्तित्व को लेकर बहुत से विचारक, विद्वान संशय व्यक्त करते हैं। झलकारी बाई को कोरी समाज पूज्य रूप में स्वीकार कर उसके व्यक्तित्व को इतिहास से विस्मृत किये जाने का विरोध करता है। वहीं एक वर्ग ऐसा है जो उसके अस्तित्व पर ही सवाल उठाता है। सत्यता और असत्यता ऐतिहासिक तथ्यों में छिपी है और बिना सत्य की खोज किये दोनों पक्ष अपना-अपना राग अलापते हैं।

इसी तरह का एक और राग राष्ट्रीय स्तर पर आलापा जाता है और वह है राम-शंबूक कांड। पता नहीं सत्य क्या है पर राम के चरित्र को लेकर यहाँ भी बहस होती है। यहाँ हमारा तात्पर्य राम के अथवा शंबूक के चरित्र पर बहस करना-करवाना नहीं है। हमारा मत केवल इतना है कि राम-शंबूक प्रकरण को आज जिस तरह से साहित्य के द्वारा पेश किया जा रहा है वह विद्रूपता की निशानी है।

बहस कोई भी हो किन्तु उस पर तथ्यात्मक और बिना पूर्वाग्रह के होनी चाहिए। इसी बहस की कड़ी में एक विषय और भी शामिल किया जा सकता है और वह है स्त्री-पुरुष विवाद। यह वह बहस है जिसने परिवारों को तोड़ना शुरू कर दिया है, समलैंगिकता को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। अभी इस पर नहीं...क्योंकि मूल विषय यह है कि बहस तो हो किन्तु उन तथ्यों के आलोक में जो वाकई सत्यता दर्शाते हों। महज किसी धर्म, जाति, वर्ग की भावनाओं को आहत करने के लिए, किसी एक वर्ग विशेष को महिमामंडित करने के लिए इस तरह की बहसों से, कुतर्कों के प्रस्तुतिकरण से समाज का भला नहीं होने वाला।


30 मार्च 2010

टिप्पणी दें कि यदि समाज के लिए आवश्यक है ये सब, तो घर से ही शुरुआत करें




विशेष - इन विषयों पर चर्चा जरूरी समझ में आई, इस कारण आज टिप्पणी कि सुविधा शुरू की जा रही हैकृपया टिप्पणी करने के लिए नहीं, कोई विचारात्मक चर्चा के लिए यहाँ आयें
विस्तार से कहना चाहें तो कृपया हमें मेल भी करियेगानिवेदन है, ये
e-mail - dr.kumarendra@gmail.com
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कल शाम हम मित्रों की बैठकी लगी तो कुछ मतलब के और कुछ बिना मतलब के विषयों पर चर्चा छिड़ गई। अब पता नहीं कि ब्लाग संसार के लिए यह विषय मतलब का है या नहीं पर हमें लगा कि समाज के लिए मतलब का होना चाहिए।

आजकल एकदम से समलैंगिकता, लिवइन रिलेशनशिप, विवाहपूर्व सम्बन्ध, नाबालिग विवाह, कुँवारा मातृत्व आदि पर चौंकाने वाले परिणाम और निर्णय आते दिख रहे हैं। यहाँ किसी भी विषय पर अपने विचारों को नहीं रखना है क्योंकि हमें पता है जब तक समाज से स्त्री-पुरुष का विभेद समाप्त नहीं होगा तब तक ऐसे विषयों पर सिर्फ और सिर्फ बहस ही जारी रहेगी।


हमारा इस पोस्ट को सामने लाने का मात्र इतना ही उद्देश्य है कि क्या महिलाओं और पुरुषों के लिए सेक्स का माहौल एकदम से खुला कर देने से दोनों का विकास हो जायेगा?

क्या समलैंगिक सम्बन्धों से, लिव इन रिलेशन से भी दोनों का व्यक्तित्व विकास अथवा चेतनात्मक विकास होने लगेगा?

और भी ऐसे विषय जिन पर हमें लगता है और कहीं न कहीं हम सभी को लगता है कि भारतीय संस्कृति के मूल रूप से छेड़छाड़ है, वे क्या हमारे समाज और परिवार के लिए आवश्यक हैं?

यदि हाँ, तो हम आज से ही अपनी बहिन, बेटी, माँ, पत्नी को समाज में खुला छोड़ दें। लिव इन रिलेशन के लिए, किसी से भी यौन सम्बन्ध बनाने के लिए, विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाने के लिए, कुँवारी माँ बनने का सौभाग्य उठाने के लिए, एक पति की अवधारणा से अलग कई-कई मर्दों की बाजारू परम्परा के निर्वाह के लिए।

यदि यह सही है तो हम अपने भाई, पुत्र, पिता और स्वयं को भी बाजार में उतार दें, एक बाजारू संस्करण की तरह से, एक उत्पाद की तरह से, इधर-उधर सम्बन्धों की शारीरिकता की तलाश में।

यदि यह सब सही है तो क्यों न हम इसे अपने घर से ही अपनाना शुरू करें। हमारे घर में तो हम सभी को भी इन सभी की चाह रहती ही है।

क्या कहना है आप सभी का, इस तरह के मामलों की वकालत करने वालों का?





चित्र गूगल छवियों से साभार