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25 मार्च 2023

भावनात्मकता से दूर होता समाज

आये दिन खबरें आ रही हैं युवाओं की मौत की. बहुत बड़ी संख्या में मौत का शिकार बन रहे युवाओं में बहुत कम ऐसे हैं जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए मौत की नींद सो गए. समाचारों, जानकारियों के अनुसार बहुत बड़ी संख्या में अवसाद के कारण, किसी बीमारी के कारण, हार्ट अटैक के कारण, आत्महत्या करके युवा मौत का शिकार बन रहे हैं. इन युवाओं की उम्र बहुत अधिक नहीं है. इनमें से बहुत तो किशोरावस्था के होंगे. बहरहाल, इन युवाओं की उम्र कुछ भी रही हो, वह चिंता का विषय हो उससे बड़ी चिंता का विषय उनका असमय चले जाना होना चाहिए. किसी भी युवा की मौत पर कुछ दिन का मातम मना लिया जाता है, उसके कामों के कारण उसे याद कर लिया जाता है और फिर सभी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं. इस तरफ ध्यान देने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की मौत क्यों हो रही है? सभी युवा आत्महत्या नहीं कर रहे हैं मगर बहुत बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है हो हार्ट अटैक का शिकार बने हैं. ये भी सोचने का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसी किस तरह की जीवन शैली समाज में चलन में आती जा रही है कि तीस से चालीस वर्ष तक के युवा भी हृदयाघात का शिकार होने लगे हैं?




वैसे यदि हम सकारात्मकता के साथ अपने आसपास निगाह डालें, अपनी ही दिनचर्या पर विचार करें, अपने संपर्क और लोगों से मेल-मुलाक़ात पर ध्यान दें तो हमें खुद एहसास होगा कि किस तरह से हम सभी लगातार एकाकी जीवन जीने की तरफ बढ़ रहे हैं. दिन-दिन भर सोशल मीडिया पर आभासी संपर्क भले बना रहे मगर व्यक्तिगत रूप से हम लोग आपस में बहुत कम मिल रहे हैं. बातचीत तो लगभग बंद सी ही है. अब बातचीत का सहारा सोशल मीडिया के तमाम मंच बन गए हैं. सुबह-शाम के सन्देश पर उसी के अनुसार स्माइली भेजकर सामने वाले को जवाब भी दे दिया जाता है. जिस औपचारिकता से सन्देश भेजा गया होता है, उसी औपचारिकता से भेजी गई स्माइली को भी स्वीकार कर लिया जाता है. एक पल रुक कर यह भी विचार नहीं किया जाता है कि कम से कम एक बार सामने वाले को फोन लगाकर बात कर ली जाये, उसके हालचाल ले लिए जाएँ.


यह एक सार्वभौम सत्य है कि किसी भी व्यक्ति के मन का, उसकी मानसिकता का, हावभाव का पता मोबाइल पर भेजे जाने वाले, पाए जाने वाले संदेशों से, स्माइली से कदापि नहीं हो सकता है. सन्देश, फोटो, वीडियो या स्माइली आदि किसी भी तरह से व्यक्ति के तात्कालिक मनोभावों को नहीं बता सकते. इसका अंदाजा तो बस आपस में बातचीत के द्वारा हो सकता है. बात करने के लहजे से, सामने वाले के बोलने के अंदाज से समझ में आसानी से आता है कि वह खुश है या दुखी है. बातचीत को हम सभी लोग जैसे समाप्त ही कर चुके हैं. मोबाइल के युग में, इंटरनेट के युग में आज एक ही घर में आपस में बातचीत न के बराबर हो रही है. ऐसे में जाहिर है कोई युवा, किशोर यदि किसी भी तरह की समस्या में घिरा है तो इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. वर्तमान दौर में प्रत्येक व्यक्ति को अनेक तरह की समस्याओं से सामना करना पड़ता है. किसी को पढ़ाई की समस्या है तो किसी के सामने कैरियर की दिक्कत है. कोई पारिवारिक समस्याओं से दो-चार हो रहा है तो कोई आर्थिक रूप से तंगहाली से गुजर रहा है. ऐसे में भावनात्मक सहारा, संबल न मिल पाने के कारण युवा, किशोर या तो अवसाद में ग्रसित हो जाते हैं या फिर वे हताशा में कोई गलत कदम उठा लेते हैं.


जीवन सिर्फ जिन्दा रहने के लिए नहीं है वरन खुलकर आनंद लेने के लिए है. हताशा, निराशा, असफलता के दौर तो सबके साथ आते जाते हैं मगर यदि उसको भावनात्मक संबल मिल जाये तो वह इन सबसे सहजता से उबर आता है. अपने युवाओं को, किशोरों को असमय मौत के मुँह में जाने से रोकने के लिए आइये हम सब फिर से उसी दुनिया को बनाने का प्रयास करें जहाँ मोबाइल, इंटरनेट ने हमारे रिश्तों को, संबंधों को, भावनात्मकता को नहीं खाया था. 







 

07 अगस्त 2020

नौजवानों को डिप्रेशन से बचाने को आइडल्स बदलने की ज़रुरत

क्रिस काइल की SEAL ट्रेनिंग कुछ ऐसी थी कि सुबह से शाम तक ठन्डे पानी में बिठा दिया जाता था। घंटो पानी के पाइप से तीखी धार मारी जाती थी। इस बीच इतनी झंड की जाती थी कि ट्रेनिंग लेते कई साथी बीच में छोड़ के भाग जाते थे। कीचड़ में कोहनियों के बल कई-कई किलोमीटर चलने के लिए कहा जाता था। इन सब ट्रेनिंग, जिसे आप यातना भी कह सकते हो, के बाद क्रिस को इराक में पोस्टिंग मिली। क्रिस क्योंकि स्नाइपर थे तो दूर बैठे ही अलगाववादियों के मत्थे भेद दिया करते थे। साठ से ज़्यादा सटीक निशाने लगाने के कारण पहले ही टूर में क्रिस को The Legend का ख़िताब मिल गया था।


काइल जब रमादी शहर में भेजे गए थे तब वो एक खंडहर में लेटे मरीन ऑफिसर्स के कॉनवॉय को प्रोटेक्ट कर रहे थे, तभी उनकी नज़र एक बुर्खा पहने औरत पर पड़ी जिसके हाथ में दो फिट लम्बा ग्रेनेड था। उस औरत ने वो ग्रेनेड अपने बच्चे को थमा दिया जो बामुश्किल 10 साल का होगा, वो बच्चा अमेरिकी कॉनवॉय की तरफ दौड़ने लगा, क्रिस अपने स्कोप से सब देख रहे थे, क्या करना है ये निर्णय सिर्फ क्रिस को लेना था जो उन्होंने अगले ही पल लिया। उस बच्चे की छाती में गोली मार दी। उसकी माँ रोती बिलखती आई और फिर उसने वो ग्रेनेड उठा लिया, क्रिस को मजबूरन उसे भी गोली मारनी पड़ी।

अपनी बायोग्राफी में क्रिस ने लिखा कि वो औरत शायद पहले ही मर चुकी थी, मैं बस उसकी मौत के साथ अपने मरीन साथियों को मरने से बचा रहा था।

इस घटना की वजह से क्रिस महीनों चैन से नहीं सो पाए। ये था डिप्रेशन। इसे कहते हैं अवसाद पर क्रिस ने ये अवसाद अपने किसी साथी या अपने परिवार के सामने ज़ाहिर नहीं किया। क्रिस को ड्यूटी के दौरान दो बार गोली लगी और छः बम धमाके वो झेल गए पर जब भी किसी से मिले, मुस्कुराते हुए मिले।

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एक मेजर माइक टैंगो हैं जो बचपन में विजेता फिल्म दस-दस बार देखा करते थे, तभी से उनका मन आर्मी में शामिल होने का बन चुका था। वो दो बार NDA एग्जाम में फेल हो गया पर उसने हार न मानी। जब पास हुआ तो ट्रेनिंग के वक़्त उसके सीनियर उसे कश्मीर में होते ऑपरेशन्स के किस्से सुनाया करते थे। माइक ने तभी तय कर लिया मैं और कुछ नहीं सिर्फ स्पेशल फ़ोर्स ऑफिसर बनूंगा। इसके बाद उसने IMA ज्वाइन की और 2004 में उसे स्पेशल फ़ोर्स की ट्रेनिंग के लिए चुना गया। स्पेशल फ़ोर्स में जो भी जाता है वो शरीर से लोहा तो बन ही चुका होता है पर पैरा ऑफिसर स्पेशल इसलिए होते हैं कि वो दिमाग से भी मजबूत बनाये जाते हैं।

छः महीने के प्रोबेशन ट्रेनिग पीरियड के दौरान माइक को रात-रात भर गटर में बैठा दिया जाता था। सड़ते हुए जानवर कटवाए जाते थे। एक दफा तो रात दो बजे उठा दिया गया, कहा बेनज़ीर भुट्टो पर 1000 शब्दों का निबंध लिखो कि कैसे उसकी माहवारी के कारण पश्चिम बंगाल में में मानसून आ गया, ये सिर्फ लिखना ही नहीं था, सारे ऑफिसर्स को इस निबंध से सहमत भी करवाना था। फिर हर ऑफिसर निकलते-बढ़ते बेइज्ज़ती करता रहता था। ज़लील करता चलता था। इसके बावजूद माइक ने 6 महीने की ट्रेनिंग 4 महीनों में पूरी कर ली। 

माइक को एक ऐसे मिशन पर कश्मीर भेजा गया जो पहले से तय था कि फेल होना है। मिशन से लौटने के बाद माइक के कमांडर ने बहुत बुरी तरह लताड़ा और उसे SF के लिए मिसफिट करार दे दिया। उसे निकाल बाहर कर नॉर्मल इन्फेंट्री में भर्ती करने का ऑर्डर आया, वो सामान पैक करने लगा तो आँखें भर आई। इतनी मेहनत की और सब ज़ाया। उसी वक़्त एक वेटर आया और बताया कि CO साहब ने बुलाया है। माइक पहुँचा तो CO ने उसे 50 पुशप्स मारने के लिए कहा। माइक भला कैसे इनकार करता, माइक ने जब पुशअप पूरी की तो देखा उसके CO के हाथ में मेहरून कैप थी जो ख़ास स्पेशल फ़ोर्स ऑफिसर्स के लिए होती है। माइक की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। असल में माइक उन सारे ऑफिसर्स में बेस्ट था पर CO उसकी बर्दाश्त करने की शक्ति को तौलना चाह रहा था।

मेजर माइक टैंगो! ये वही ऑफिसर है जिसकी लीडिंग में सर्जिकल स्ट्राइक अंजाम दी गयी थी और 80 कमांडोज़ में से एक भी कमांडो हताहत नहीं हुआ।

अब सोचिए क्या डिप्रेशन लेवल रहा होगा उस शख्स का जिसे हर कोई लताड़ रहा है, जिसे गटर में रखा जाता है और उससे सड़ा माँस कटवाया जाता है। अब आप दिल पे हाथ रखकर बताइए कि हीरो कौन हैं? हृतिक रौशन या शाहरुख़ खान? जिन्हें देखकर हमारे बच्चे वैसा बनना चाहते हैं और न बन पाने की सूरत में नस काट लेते हैं या मेजर माइक टैंगो और क्रिस काइल जिनके नाम तक आम लोगों तक नहीं पहुँच पाते पर उनकी वजह से आज हम चैन से बैठे हैं?

मुझे लगता है, इस देश के नौजवानों को डिप्रेशन से निकलना है तो उन्हें अपने आइडल्स बदलने की ज़रुरत है पर आपको ये पोस्ट शेयर करने से पहले मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं है।

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(माइक टैंगो की कोई फोटो या असली नाम सुरक्षा कारणों से सर्वजनिक नहीं किये गए हैं।)

पोस्ट अवनींद्र जादौन की फेसबुक वाल से साभार 
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