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09 अगस्त 2025

ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में चर्चा

ऑपरेशन सिन्दूर पर संसद में क्या चर्चा हुई, क्या बहस हुई इसे न देखा और न ही सुना क्योंकि पिछले सप्ताह की हरकतें देखकर समझ आ गया था कि चर्चा तो बस एक बहाना है, असल में लाइव टीवी के माध्यम से विपक्ष को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं को, अपने समर्थकों को ये दिखाना है कि उनका प्रतिनिधि कितने चिल्ला-चिल्ला के संसद में बहस कर लेता है. ऑपरेशन सिन्दूर, जो लगभग साफ़-साफ़ तस्वीर दिखा रहा है, उसके लिए बहस-चर्चा करने वाले विपक्ष ने कभी भी कुछ विषयों पर खुली बहस-चर्चा करने की हिम्मत नहीं जुटाई.

 

==>> नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु से सम्बंधित कई-कई आयोगों के बनाये जाने के बाद भी आज के विपक्ष ने संसद में इसकी चर्चा करवाने की हिम्मत न जुटाई.

 

==>> देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में मृत्यु होना आज तक संदेहास्पद है मगर इस पर संसद में चर्चा करवाने के लिए आज के विपक्ष ने कभी जोर न लगाया.

 

==>> देश की एक और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही आवास पर, उनके ही सुरक्षा गार्डों द्वारा कर दी गई. सुरक्षा की दृष्टि से आजतक की सबसे बड़ी चूक पर कांग्रेस ने, आज के विपक्ष ने कभी संसद में बहस करवाने के बारे में विचार नहीं किया.

 

==>> देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या होना भी सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी चूक कही जाएगी मगर इस पर कांग्रेस या आज के विपक्ष ने कभी संसद में चर्चा करवाए जाने पर संसद की कार्यवाही को बाधित नहीं किया.

 

क्या कभी इन घटनाओं पर विचार किया जायेगा? क्या इनके लिए संसद में बहस की कोई गुंजाइश नहीं? क्या आज के विपक्ष की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वो इन घटनाओं की सत्यता को देश की जनता के सामने संसद के माध्यम से लाये? आज का विपक्ष भी कभी सरकार में था. इन घटनाओं से मुँह मोड़ लेने से और सिर्फ शोर मचाने की मानसिकता से संसद की कार्यवाही को बाधित कर देने से वे लोग अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते.


23 जनवरी 2023

मृत्यु और गुमनामी की रहस्यगाथा

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के निधन को एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई थीअधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है. नेताजी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेताजी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़ से पता चलता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था. 


इसी तथ्य पर मिशन नेताजी से जुड़े अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि 14 अगस्त से 25 अक्तूबर 1945 के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. नेताजी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि जिस शव का अंतिम संस्कार किया गया वो शव नेताजी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. इसी कारण बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेताजी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया थाजिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.




नेताजी की कार्यशैलीउनकी प्रतिभाकार्यक्षमता को जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेताजी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है. लोगों में विश्वास बना हुआ है कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही थे. इसके पीछे लोग कई कारण गिनाते हैं. अगर वह व्यक्ति एक साधारण संत था तब वह फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन कैसे बोलता थाउनके पास दुनिया भर के नामचीन अखबारपत्रिकाएंसाहित्यसिगार कहाँ से आती थी? यदि वह व्यक्ति नेता जी नहीं तो उसके पास नेताजी से जुड़ी चीजें कैसे आईंगुमनामी बाबा का अंतिम संस्कार सैन्य संरक्षित क्षेत्र में क्यों हुआउनकी मृत्यु के बाद पूरा प्रशासनिक अमलालोकल इंटेलीजेंस यूनिट समेत दूसरे लोग क्यों सक्रिय रहेजब लोगों ने और समाचार पत्रों ने उनके नेता जी होने का दावा किया तो प्रशासन ने इसका खंडन क्यों नहीं कियाऐसे बहुत से सवाल हैं जो नेता जी के रहस्य को और गहरा देते हैं. गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं. वे गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देखकर यह कहते हुए फफक पड़ी थीं कि यह सब कुछ उनके चाचा का ही है. इसके बाद स्थानीय लोगों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया.


फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवन अथवा गुमनामी बाबा के देहांत की खबर वर्ष 1985 में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के 2761 सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं.


समय-समय पर गुमनामी बाबा के सामानों की जाँच के लिए भी आवाज़ उठी. फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटोअनेक पत्रन्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मेमँहगे-विदेशी सिगारनेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँजर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थीब्रिटेन का बना ग्रामोफोनरिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईंइन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्मएक नक्शाप्रचुर साहित्यिक सामग्रीअमरीकी दूतावास का पत्रनेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.




रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? लम्बे समय तक चले सामाजिक और न्यायिक प्रयासों के बाद मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहालय में रखा जाए ताकि आम लोग उन्हें देख सकें. 


लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था-1945 में एक प्लेन क्रैश में मारे गए नेताजी की मृत्यु के संदर्भ में विभिन्न इतिहासकारों और पत्रकारों की खोजबीन को खंगालने के बाद निष्कर्ष निकला है कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मृत्यु हुई या नहींइस बारे में निश्चित राय कायम नहीं की जा सकतीपर यह तथ्य निर्विवाद और सर्वविदित है कि नेताजी स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सभी के दिल में आजादी का जज्बा भर दिया था. ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति या उनकी धरोहर आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणादायक है. अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबाजिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों व उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए. 


न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया जाना है और ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही है किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है.

 





 

23 जनवरी 2021

नामी का गुमनामी होना

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के निधन को एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है. नेताजी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेताजी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़ से पता चलता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था.


इसी तथ्य पर मिशन नेताजी से जुड़े अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि 14 अगस्त से 25 अक्तूबर 1945 के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट था और अब इसका नाम ताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट है.) नेताजी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि जिस शव का अंतिम संस्कार किया गया वो शव नेताजी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. इसी कारण बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेताजी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया था, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.




नेताजी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता को जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेताजी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है. समय-समय पर गुमनामी बाबा के सामानों की जाँच के लिए भी आवाज़ उठी. अब फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.


फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवन अथवा गुमनामी बाबा के देहांत की खबर वर्ष 1985 में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के 2761 सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं.


रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया जाना है और ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही है किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है.


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वंदेमातरम्

18 अगस्त 2019

मृत्यु और गुमनामी की रहस्यगाथा में समाया विराट व्यक्तित्व


कहते हैं कि जो आया है वो जायेगा ही मगर कोई आने वाला बजाय जाने के विलुप्त ही हो जाये तो? क्या ऐसा भी हो सकता है कि आने वाला विलुप्त हो जाये? यदि ऐसा होता भी है तो वह विलुप्त क्यों हुआ? यदि खुद अपनी मर्जी से विलुप्त नहीं हुआ तो फिर किसने विलुप्त करवाया? उसके खुद विलुप्त होने में, किसी के द्वारा विलुप्त करवाए जाने में लाभ किसका? विश्व की तमाम रहस्यगाथाओं से ज्यादा बड़ी और रहस्यमयी गाथा नेता जी के विलुप्त होने की गाथा है. यह रहस्यमयी इसलिए भी है कि नेता जी का व्यक्तित्व जितना विराट और चुम्बकीय रहा है, उसी अनुपात में या कहें उससे भी अधिक जनमानस के बीच उनकी गाथा तैरती रही है, आज के दिन यानि 18 अगस्त 1945 को उनके गायब हो जाने की. कोई कुछ भी कहे मगर तमाम सारे घटनाक्रम, अनेक तथ्य इशारा इस तरफ करते हैं कि आज के दिन हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी.


दरअसल आज़ादी के आन्दोलन में सुभाषचंद्र बोस ब्रिटिश हुक्मरानों की आंख की किरकिरी बने रहे, साथ ही तत्कालीन कांग्रेस के लिए भी, गाँधी-नेहरू के लिए विरोधी रूप में प्रचारित रहे सो उनके हिस्से में केवल उपेक्षा, अपमान और विलुप्तता ही आई. उनकी मृत्यु को जिस विमान दुर्घटना में हुआ प्रचारित किया जाता है, कहा जाता है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना ताइवान में हुई ही नहीं. इसका ऐतिहासिक प्रमाण यह है कि 03 सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. यहां यह गौर करने वाली बात है कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था.

नेता जी के निजी गनर रहे जगराम भी दावा करते रहे हैं कि अगर विमान हादसे में नेताजी की मौत होती तो कर्नल हबीबुर्रहमान ज़िंदा कैसे बच जाते? क्योंकि वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहते थे. रूस के इस घटनाक्रम में शामिल होने की चर्चा करते हुए डॉ० सुब्रह्मण्यम स्वामी दावा करते रहे हैं कि नेताजी की हत्या नेहरू के कहने पर रूसी तानाशाह जोसेफ स्तालिन ने करवा दी थी. डॉ० स्वामी के मुताबिक़, मेरठ निवासी श्यामलाल नेहरू के स्टेनो थे. नेताजी की मौत की ख़बर के पब्लिक होने के पहले नेहरू ने उन्हें आसिफ अली के घर बुला कर एक पत्र टाइप करावाया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली को लिखा था कि उनका वॉर क्रिमिनल रूस के क़ब्ज़े में है. नेता जी की मौत के रहस्य पर क़िताबें लिखने वाले और मिशन नेताजी के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने कुछ साल पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और कांग्रेस का एक बंगाली नेता दोनों नहीं चाहते थे कि नेताजी के बारे में रहस्यों से परदा हटे. उन्होंने कड़ी मेहनत से लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से 05 सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था.

ऐसी चर्चाएँ बराबर बनी रहीं कि नेता जी रूस चले गए जहाँ से बाद में उनको भारत आने का सुरक्षित रास्ता प्रदान किया गया. भारत में उनके प्रवास की सर्वाधिक चर्चा फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के रूप में रही हैं. यद्यपि बहुत से लोगों का मानना है कि नेता जी का व्यक्तित्व जिस तरह का था वैसे में संभव नहीं कि वे गुमनामी में अपना जीवन व्यतीत कर देते. इसके बाद भी सम्बंधित व्यक्ति को लेकर लोगों में विश्वास बना हुआ है कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ही थे. इसके पीछे लोग कई कारण गिनाते हैं. लोगों का कहना है कि अपने आसपास गोपनीयता बनाकर रहने वाला यह व्यक्ति कौन था? अगर यह व्यक्ति एक साधारण संत था तब वह फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन कैसे बोलता था? उनके पास दुनिया भर के नामचीन अखबार, पत्रिकाएं, साहित्य, सिगार कहाँ से आती थी? यदि वह व्यक्ति नेता जी नहीं तो उसके पास नेताजी से जुड़ी चीजें कैसे आईं? गुमनामी बाबा का अंतिम संस्कार सैन्य संरक्षित क्षेत्र में क्यों हुआ? उनकी मृत्यु के बाद पूरा प्रशासनिक अमला, लोकल इंटेलीजेंस यूनिट समेत दूसरे लोग क्यों सक्रिय रहे? जब लोगों ने और समाचार पत्रों ने उनके नेता जी होने का दावा किया तो प्रशासन ने इसका खंडन क्यों नहीं किया? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो नेता जी के रहस्य को और गहरा देते हैं. गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके नेताजी होने की बातें फैलने लगीं तो नेताजी की भतीजी ललिता बोस कोलकाता से फैजाबाद आईं. वे गुमनामी बाबा के कमरे से बरामद सामान देखकर यह कहते हुए फफक पड़ी थीं कि यह सब कुछ उनके चाचा का ही है. इसके बाद स्थानीय लोगों ने आन्दोलन करना शुरू कर दिया.

गुमनामी बाबा के सामानों से मिला नेता जी का चित्र 

लम्बे समय तक चले सामाजिक और न्यायिक प्रयासों के बाद मामले की सुनवाई करते हुए 31 जनवरी, 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहालय में रखा जाए ताकि आम लोग उन्हें देख सकें. 

लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था-
1945 में एक प्लेन क्रैश में मारे गए नेताजी की मृत्यु के संदर्भ में विभिन्न इतिहासकारों और पत्रकारों की खोजबीन को खंगालने के बाद निष्कर्ष निकला है कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मृत्यु हुई या नहीं, इस बारे में निश्चित राय कायम नहीं की जा सकती, पर यह तथ्य निर्विवाद और सर्वविदित है कि नेताजी स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे सेनानी थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सभी के दिल में आजादी का जज्बा भर दिया था.
ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति या उनकी धरोहर आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणादायक है. अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा, जिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों व उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए. 

नेता जी की मृत्यु की जांच से सम्बंधित बने आयोगों की अपनी-अपनी रिपोर्ट्स रही हैं. जिस तरह का रहस्य, जिस तरह की गोपनीयता नेता जी की मृत्यु को लेकर बनाई जाती रही है, वैसी ही गुमनामी बाबा के निधन और उनके अंतिम संस्कार को लेकर बनाई गई. यह सब इस रहस्य को और गहरा करता है. अंतिम सत्य क्या है यह तो उसी सत्य को भोगने वाला ही जानता है मगर एक सत्य यह है कि जनमानस को विश्वास है कि नेता जी की मृत्यु आज के दिन बताई जाने वाली तथाकथित विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी. उनकी मौत का रहस्य अभी भी रहस्य है. जब तक यह रहस्य उजागर नहीं होता तब तक उनकी मौत को स्वीकारना नेता जी के अस्तित्व को, उनकी विराटता को नकारना ही होगा. आज के दिन वे विलुप्त हुए हैं, मृत नहीं और यह भी अपने आपमें परम सत्य है कि विलुप्त होने वाले मरते नहीं वरन अमरत्व को प्राप्त कर जाते हैं. महाकाल बन जाते हैं.
जय हिन्द

30 दिसंबर 2018

पहली अंतरिम सरकार के मुखिया द्वारा राष्ट्र ध्वज फहराना


व्यावहारिक रूप से हमने भले ही आज़ादी सन 1947 में पाई हो मगर हम एक तरह से  30 दिसंबर 1943 को ही आजाद हो गए थे. यह दिन शायद बहुत से देशवासियों को स्मरण भी न हो मगर सत्य यही है कि इसी दिन इस देश के एक क्रांतिकारी बेटे ने स्वतंत्र भारत के रूप में राष्ट्र ध्वज फहराया था. देश के जन-जन में बसे महान स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने सबसे पहले अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्र ध्वज फहराया था. नेताजी देश की तत्कालीन पहली अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में राष्ट्रध्वज के वाहक बने थे.


इसके बाद कतिपय स्थितियाँ ऐसी बनी कि नेताजी की सेना अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल न हो सकी. खुद नेता जी के अस्तित्व को लेकर सवाल अभी तक खड़े होते रहे. ऐसे ही अनेक कारणों-कारकों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत से अंग्रेजी शासन का अंत हुआ. देश की बागडोर हमारे राजनेताओं के हाथों में आ गई. हम सभी देशवासी इस दिन को पूरी श्रद्धा और देशभक्ति के साथ मनाते हैं.  अपने उन अनेकानेक वीर सपूतों को याद करते हैं जिनकी कुर्बानी से हमें आजादी मिली. इसके बाद भी कहीं न कहीं हम सभी नेता जी के योगदान को विस्मृत कर देते हैं. अंग्रेजों की कैद से निकल कर विदेश जाना और वहाँ पहुँच कर तमाम देशों के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन करना अपने आपमें अभूतपूर्व कार्य था. एक-दो नहीं वरन एशिया के अनेक देशों के सहयोग से नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन किया. सन 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजी सेना के साथ जापानी सेना का युद्ध चल रहा था. जापानी पूरे उत्साह के साथ नेताजी की आजाद हिंद सेना का सहयोग कर रहे थे. अंग्रेजों से लड़ते हुए जापानी सेना 1942 में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक आ पहुंची और 23 मार्च 1942 को जापानी सेना ने अंडमान के द्वीपों पर कब्जा कर वहां से अंग्रेजी सेना को खदेड़ दिया. 25 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने भी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी. तब तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरिम आजाद हिंद सरकार का गठन कर चुके थे. जापानियों के साथ नेताजी के संबंध बहुत ही घनिष्ठ बन चुके थे. अंडमान-निकोबार पर जापानियों का कब्जा हो चुका था. ऐसा सन्देश मिलते ही नेताजी ने अंडमान-निकोबार द्वीपों का दौरा करने का निश्चय किया. 

नेताजी से प्रभावित होकर तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो ने 07 नवंबर 1943 को अंडमान-निकोबार द्वीपों को नेताजी की अंतरिम सरकार को सौंप दिया. इसके बाद नेताजी ने 30 दिसंबर 1943 को पहली बार अंडमान-निकोबार की धरती पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया. उन्होंने ने केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराया बल्कि इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज रखा. आज भी पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान को अब नेताजी स्टेडियम के नाम से जाना जाता है, यहाँ पर तिरंगा फहराने के बाद नेताजी ने वहां के क्रांतिकारियों, आजाद हिंद फौज के सिपाहियों तथा जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि हिंदुस्तान की आजादी की जो गाथा अंडमान की भूमि से शुरू हुई है वह दिल्ली में वायसराय के घर पर तिरंगा फहराने के बाद ही रुकेगी.  वर्तमान में भारत सरकार द्वारा एक स्मारक का निर्माण उसी जगह पर किया गया है जहाँ कि नेताजी ने तिरंगा फहराया था. इस स्थान पर प्रतिवर्ष 30 दिसंबर को स्थानीय प्रशासन द्वारा अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पोर्ट ब्लेयर जैसे छोटे से शहर में इस मौके पर हजारों की भीड़ का जुटना इसका परिचायक है कि अंडमान-निकोबार के निवासी सारे नेताजी को बहुत आदर के साथ याद करते हैं.

21 अक्टूबर 2018

देश की पहली सरकार की स्मृति और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस


21 अक्टूबर का दिन देश के लिए ऐतिहासिक दिन है. इसे महज इसलिए याद नहीं किया जाना चाहिए कि इस दिन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया. यह आज़ाद देश में पहली बार है जबकि 21 अक्टूबर को किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा फहराया. आज का दिन इसलिए गर्व का दिन है क्योंकि आज आज़ाद हिन्द सरकार की 75वीं वर्षगाँठ है. यह उन लोगों के लिए अवश्य ही कौतूहल भरी बात होगी जिन्हें देश का इतिहास नहीं मालूम. नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर 1943 को नेता जी के द्वारा आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई.


कोलकाता में अपने घर पर ही नजरबन्द किये गए नेता जी 18 जनवरी 1941 को गायब होकर काबुल होते हुए जर्मनी पहुँच गए. वहां पहुँच उन्होंने हिटलर से मुलाकात की. वहीं सरदार अजीत सिंह ने उन्हें आज़ाद हिन्द लश्कर के बारे में बताकर इसे और व्यापक रूप देने को कहा. इसके साथ-साथ जापान में रासबिहारी बोस द्वारा बनाये आजाद हिन्द संघ का 1942 में एक सम्मेलन हुआ. इसमें रासबिहारी बोस ने जापान शासन की सहमति से नेताजी को आमन्त्रित किया. मई 1943 में जापान आकर नेताजी ने प्रधानमन्त्री जनरल तोजो से भेंट कर अंग्रेज़ों से युद्ध की अपनी योजना पर चर्चा की. नेताजी ने एक समारोह में 60,000 लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा- यह सेना न केवल भारत को स्वतन्त्रता प्रदान करेगी, अपितु स्वतन्त्र भारत की सेना का भी निर्माण करेगी. हमारी विजय तब पूर्ण होगी, जब हम ब्रिटिश साम्राज्य को दिल्ली के लाल क़िले में दफना देंगे. आज से हमारा परस्पर अभिवादन जय हिन्द और हमारा नारा दिल्ली चलो होगा. उन्होंने 4 जुलाई 1943 को तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा का उद्घोष किया. इसके बाद 21 अक्टूबर 1943 ई० को नेता जी ने सिंगापुर में अस्थायी भारत सरकार आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की. सुभाषचन्द्र बोस इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष तीनों बने. वित्त विभाग एस० सी० चटर्जी को, प्रचार विभाग एस० ए० अय्यर को तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया. 

आज़ाद हिन्द फ़ौज का प्रतीक चिह्न झंडे पर दहाड़ता हुए बाघ का चित्र था. क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा इस संगठन का वह गीत बना, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे. नेता जी द्वारा अस्थायी सरकार का गठन कर लेना जितना महत्त्वपूर्ण था उतना महत्त्वपूर्ण उस सरकार को अन्य देशों द्वारा मान्यता देना भी रहा. जर्मनी, जापान तथा उनके समर्थक अनेक देशों द्वारा आज़ाद हिन्द सरकार को मान्यता प्रदान की गई. सिंगापुर और रंगून में आज़ाद हिन्द फ़ौज का मुख्यालय बनाया गया. कालांतर में आज़ाद हिन्द फ़ौज और सरकार का अंतिम परिणाम वह नहीं रहा जो नेता जी ने सोच रखा था. बावजूद इसके उनकी सेना और सरकार की जबरदस्त उपस्थिति के चलते भी अंग्रेजो में खलबली मच गई थी. जिसके चलते उन्हें देश से भागने का विचार करना पड़ा. आज़ाद भारत का ध्वज नेता जी लाल किले पर लहराता हुआ देखना चाहते थे. संदिग्ध परिस्थितियों के चलते भले ही वे प्रत्यक्ष में इस सपने को पूरा नहीं कर सके किन्तु उनके सपने को आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री द्वारा पूरा किया गया. यह नेता जी और उनके कर्तव्यनिष्ठ सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है. यह तथ्य अपने आपमें सत्य है कि आज़ाद भारत का पहला प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति कोई और है मगर इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजों की गुलामी के बीच पूरी हनक के साथ देश की सरकार स्थापित कर उसके पहले राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री के रूप में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को याद किया जायेगा.


आज, 21 अक्टूबर 2018 से एक नई परम्परा का सूत्रपात हुआ है. न केवल हमें बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इस दिन के बारे में, नेता जी के बारे में, अस्थायी सरकार गठन के बारे में, आज़ाद हिन्द फ़ौज के बारे में, फ़ौज के सेनानियों के बारे में जानकारी होनी चाहिए.  

09 जुलाई 2018

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में बढ़ती पवित्र यात्रा


पेट भरो आन्दोलन की संकल्पना के साथ डॉ० राजीव श्रीवास्तव ने एक पुनीत कार्य आरम्भ किया अनाज बैंक का. जैसा सुनने में लगा ठीक वैसा ही एहसास देखने में भी होता है. बैंक जैसी प्रक्रिया, बैंक जैसा लेन-देन, बैंक जैसा प्रबंधन, बैंक जैसा दस्तावेजीकरण. आम बैंकों और इस बैंक में महज इतना अंतर है कि यहाँ समस्त लेनदेन अनाज के रूप में होता है न कि किसी तरह की मुद्रा के रूप में. इस बैंक में खाताधारक दो तरह के हैं. एक वे जो अनाज बैंक से मदद पाते हैं और एक वे जो अनाज बैंक में अपना खाता खुलवाकर उसमें किसी न किसी रूप में सहयोग दिया करते हैं. यहाँ किसी न किसी रूप से तात्पर्य आर्थिक नहीं वरन अनाज के रूप में ही है. कभी अनाज के रूप में, कभी आटा के रूप में, कभी दालों के रूप में तो कभी चीनी आदि के रूप में यहाँ सहयोगकर्ता अपना योगदान जमा करते हैं. पेट भरो आन्दोलन के द्वारा स्थापित अनाज बैंक ने संकल्प लिया कि कोई भी भूखा न सोये और यह बैंक इस संकल्प को पूरा करने के लिए दत्तचित्त है.


डॉ० राजीव श्रीवास्तव के अनाज बैंक, जो विश्व में अपनी तरह का पहला बैंक है, से प्रेरित होकर बुन्देलखण्ड का पहला अनाज बैंक जनपद जालौन के उरई में खोला गया. इस अनाज बैंक की उरई में स्थापना, सञ्चालन का विशेष रूप से श्रेय डॉ० अमिता सिंह जो एक महिला महाविद्यालय की प्राचार्य हैं, को जाता है. नवम्बर 2017 से आरम्भ बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक ने नियमित रूप से अनाज बैंक की संकल्पना को आगे बढ़ाया है. प्रतिमाह दो बार लाभार्थी महिलाओं को अनाज वितरण करते अनाज बैंक से बहुत से लोग जुड़े और बहुत से लोगों ने जुड़ने की इच्छा व्यक्त की. वैसे भी समाज में भूखे को रोटी, प्यासे को पानी देने की अपनी पावन मान्यता है. इस पावन मान्यता में यदि सार्थकता जुड़ जाए, निस्वार्थ भावना जुड़ जाए तो सबकुछ और सहज-सरल लगने लगता है. इस सहज-सरल के बीच समर्पण, सेवाभावना, लगनशीलता उरई के अनाज बैंक से जुड़े लोगों में दिख रही थी मगर वाराणसी से आई केन्द्रीय टीम की कार्यशीलता को देखकर लगा कि यदि सम्पूर्ण देश में चंद लोग ही इस मानसिकता के हो जाएँ तो कोई भी कहीं भूखा न रह सकेगा.

अनाज बैंक, भारत की प्रबंध निदेशक अर्चना भारतवंशी के निर्देशन में केन्द्रीय टीम ने आकर न केवल बुन्देलखण्ड के अनाज बैंक का निरीक्षण किया वरन उसकी कार्यप्रणाली को और आधुनिक बनाया. इन सबके बीच अर्चना भारतवंशी के साथ आये सदस्यों - दीपाली भारतवंशी, इली भारतवंशी, तंजीन भारतवंशी की कार्यक्षमता, कार्यकौशल देखकर लगा कि यदि व्यक्ति का उद्देश्य पावन है, निस्वार्थ है तो वह स्वतः ही उसके कार्य से परिलक्षित होता है. अल्प आयु में सामाजिक सरोकारों से तादाम्य स्थापित करना, परोपकार को सर्वाधिक उच्च स्थान पर स्थापित करना, अनथक रूप से अपने-अपने कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ संपन्न करना अचानक ही नहीं आता. खुद में ईमानदारी का आयाम स्थापित करके, समाज के गरीब, मजबूर, असहाय लोगों को अपने परिवार का हिस्सा समझना, उनको की जाने वाली मदद को अहंकार नहीं वरन उनके प्रति अपना कर्तव्यबोध समझना ही वह चारित्रिक विशेषता है जो इन सदस्यों को सबसे अलग खड़ा करती है. यकीनन हम सब भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग देते हैं. समाज के गरीब, मजबूर वर्ग की सहायता करते हैं. यही मानसिकता उन सभी को एकसाथ जोड़ती है जो समाज में पुनीत कार्य करना चाहते हैं. बुन्देलखण्ड अनाज बैंक से जुड़े लोग भी कहीं न कहीं केन्द्रीय टीम के साथ तादाम्य स्थापित करते नजर आये. अपने आप ही एक साहचर्य स्थापित होता नजर आया. इस सम्बन्ध में, सुयोग में, आपसी मानसिक धरालत के एक होने के पीछे उस विराट व्यक्तित्व का असर अवश्य ही होगा जिसने किसी आपातकाल में देश से बाहर जाकर भारतवासियों को एकजुट करने का कार्य किया था. देश को अंग्रेजों से मुक्त करवाने के लिए मैराथन प्रयास किया था. परम पावन नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आशीर्वाद के आँचल में अनाज बैंक की, विशाल भारत संस्थान की पवित्र यात्रा सतत आगे बढ़ती रहे, यही कामना है.

23 जनवरी 2018

नामधारी का गुमनाम होना अखरता है

इस देश में ही क्या, समूचे विश्व में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अतिरिक्त शायद ही कोई और होगा जिसकी मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. इसको एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा था और ये स्थिति आज भी बनी हुई है. नेताजी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेताजी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़ से पता चलता है कि १८ अगस्त १९४५ के दिन ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्स के भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजी से जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. (तब ताईहोकू के इस हवाई अड्डे का नाम मात्सुयामा एयरपोर्ट था और अब इसका नाम ताईपेह डोमेस्टिक एयरपोर्ट है.) नेताजी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि जिस शव का अंतिम संस्कार किया गया वो शव नेताजी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुरा का था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. इसी कारण बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेताजी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे-लपेटे ही कर दिया गया था, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.


नेताजी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता को जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेताजी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है. समय-समय पर गुमनामी बाबा के सामानों की जाँच के लिए भी आवाज़ उठी. अब फ़ैजाबाद के डबल लॉक में रखे गुमनामी बाबा के सामानों के खुलासे ने उम्मीद जगाई है कि शायद नेताजी का सच अब सामने आ सके. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.

फ़ैजाबाद के रामभवन में प्रवास के दौरान किसी के भी सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले भगवन अथवा गुमनामी बाबा के देहांत की खबर वर्ष १९८५ में आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. देश का सच्चा सपूत आज़ादी के बाद भी भले ही गुमनाम बना रहा किन्तु उनकी भतीजी ललिता बोस और देशवासी रामभवन में मिले सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा को ही नेताजी स्वीकारते रहे. ये महज संयोग नहीं कि इनके लम्बे संघर्ष पश्चात् सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के २७६१ सामानों की एक सूची बनाई गई जो फैजाबाद के सरकारी कोषागार में रखे हुए हैं. रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा १३ जनवरी २०१३ को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के २४ बड़े लोहे के डिब्बों और ८ छोटे डिब्बों अर्थात कुल ३२ डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को लगने लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया जाना है और ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही है किन्तु अंतिम विजय का पर्दा उठाना अभी शेष है. 


18 अगस्त 2017

अभी भी रहस्यमय है महानायक

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है. तीन-तीन जाँच आयोगों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा किसी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. एक तरह की सरकारी मान्यता देने के बाद कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना में हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा इसे स्वीकार पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है. नेता जी की कार्यशैली, उनकी प्रतिभा, कार्यक्षमता, देश के प्रति उनकी भक्ति, निष्ठा को देखने-जानने के बाद उनके प्रशंसकों ने नेता जी की उपस्थिति को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में स्वयं से स्वीकार किया है. इसका सशक्त उदाहरण गुमनामी बाबा के रूप में देखा जा सकता है.


नेता जी की मृत्यु की खबर और बाद में उनके जीवित होने की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई गई वहीं ताईवानी अख़बार सेंट्रल डेली न्यूज़से पता चला कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान (तत्कालीन फारमोसा) की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नही हुआ था. इसी तथ्य पर हिन्दुस्तान टाइम्सके भारतीय पत्रकार (मिशन नेताजीसे जुड़े) अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि 14 अगस्त से 25 अक्तूबर 1945 के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है. बाद में ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर मुखर्जी आयोग के सामने भी यही बातें दुहराते रहे हैं. यदि विमान दुर्घटना में नेता जी की मृत्यु की खबर को एकबारगी सच मान भी लिया जाए तो उनका अंतिम संस्कार 22 अगस्त को किया जाना संदेह पैदा करता है. नेता जी की मृत्यु को अफवाह मानने वालों का मानना है कि वो शव नेता जी का नहीं वरन एक ताईवानी सैनिक इचिरो ओकुराका था जो बौद्ध धर्म को मानने वाला था. बौद्ध परम्परा का पालन करते हुए ही उसका अंतिम संस्कार मृत्यु के तीन दिन बाद नेता जी के रूप में किया गया. इस विश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि सम्बंधित शव का अंतिम संस्कार चिकित्सालय के कम्बल में लपेटे हुए ही कर दिया गया, जिससे किसी को भी ये ज्ञात नहीं हो सका कि वो शव किसी भारतीय का था या किसी ताईवानी का.

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि नेता जी उस विमान दुर्घटना में जीवित बच गए थे तो फिर वे गए कहाँ थे? ये तथ्य किसी से भी छिपा नहीं है कि अंग्रेज भले ही भारत देश को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को राष्ट्रद्रोही घोषित करके उनके ऊपर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इसके साथ-साथ नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर नेता जी को ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का अनावश्यक दवाब बनायेंगे. हो सकता है तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो. ऐसे में इन सहयोगियों ने एक योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवा दी हो. इस तथ्य को इस कारण से भी बल मिलता है कि नेता जी समेट वे तीन व्यक्ति (नेताजी के सहयोगी और संरक्षक के रूप में जनरल सिदेयी, विमान चालाक मेजर ताकिजावा और सहायक विमान चालक आयोगी) ही इस दुर्घटना में मृत दर्शाए गए थे जिन्हें सोवियत संघ में शरण दिलवाई जानी थी.

इसके बाद भी बहुत से लोगों को विश्वास है कि नेता जी देश की आज़ादी के बाद देश में निवास करने लगे थे. ऐसे में पुनः वही सवाल खड़ा होता है कि आज़ाद देश में नेता जी को अज्ञातवास में रहने को किस कारण से मजबूर होना पड़ा? इस सवाल के जवाब के लिए बहुत से लोग गाँधी, नेहरू के साथ नेता जी के वैचारिक मतभेद का जिक्र करते हैं. इसका भी संदेह जताया जाता है कि चूँकि ब्रिटेन नेता जी पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाना चाह रहा था, ऐसे में संभव है कि आज़ादी के समय किसी अप्रत्यक्ष शर्त या समझौते के तहत नेता जी को ब्रिटेन को सौंपे जाने पर सहमति बन गई हो. इसके अतिरिक्त नेता जी की लोकप्रियता, उनकी कार्यक्षमता, बुद्धिमत्ता, राष्ट्रभक्ति को नेहरू-गाँधी और उनके समर्थक भली भांति जानते-समझते थे. ऐसे में वे नहीं चाहते होंगे कि नेता जी वापस आकर देश का नेतृत्व करने लग जाएँ. नेहरू के कार्यकाल में जिस तरह की लालफीताशाही, घोटालों की संस्कृति आज़ादी के तुरंत बाद ही उपजी (इसके लिए 1948 में देश के पहले घोटाले जीप घोटालाको देखा जा सकता है और घोटाला करने वाले ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन, जो नेहरूजी के दाहिने हाथ रहे थे) उसे देखकर इस पर यकीन करना संभव ही नहीं कि नेहरू खुद ही नेता जी बचाए रखना चाहते थे. इस तथ्य को सभी भली-भांति जानते थे कि नेता जी कठोर और अनुशासित प्रशासनिक क्षमता से परिपूर्ण हैं और गाँधी के शब्दों में जन्मजात नेतृत्व करने वाले व्यक्तित्व हैं, ऐसे में नेहरू अपनी सत्ता को गँवाना नहीं चाहते रहे होंगे. नेहरू के अलावा सत्ता का केन्द्रीयकरण कर चुके लोग भी नहीं चाह रहे थे कि नेता जी का सत्य किसी भी रूप में सामने आये या फिर खुद नेता जी ही सामने आयें और सत्ता विकेन्द्रित हो जाये. इस मानसिकता के चलते गठित किये गए शाहनवाज़ आयोग के निष्कर्षों को सांसदों ने, देश की जनता ने ठुकरा दिया और अंततः साढ़े तीन सौ सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद 1970 में इंदिरा गाँधी को जस्टिस जी० डी० खोसला की अध्यक्षता में एक दूसरा आयोग गठित करना पड़ा. इस जाँच आयोग के गठन के सम्बन्ध में भी सरकार की नीयत में खोट ही दिखाई देती है, जिसको ऐसे समझा जा सकता है कि खोसला नेहरूजी के मित्र थे; वे जाँच के दौरान ही इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे समझा जा सकता है कि तत्कालीन सरकार नेता जी की मृत्यु पर उठे संशय के बादलों को दूर करने के लिए कतई संकल्पित नहीं थी. ये तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि जाँच के लिए बना तीसरा मुखर्जी आयोग कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बनाया गया. इसमें सरकार के हस्तक्षेप को नकारते हुए न्यायालय ने स्वयं ही मुखर्जी को आयोग का अध्यक्ष बना दिया तो सरकार ने उनकी जांच में अड़ंगे डालना शुरू कर दिए. इसको ऐसे समझा जा सकता है कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिये गये थे, वे दस्तावेज तक मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये जाते. प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सभी जगह से नौकरशाहों का एक रटारटाया जवाब आयोग को मिलता कि भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का प्रिविलेजउन्हें प्राप्त है.

इसके साथ-साथ भारत सरकार के रवैये के चलते इस प्रकरण की जाँच की सकारात्मकता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाते हैं.

भारत सरकार ने वर्ष 1965 में गठित शाहनवाज आयोगको ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. समूची की समूची जाँच आयोग ने देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया.

1970 में गठित खोसला आयोगको भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया.

मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. अधिकारियों ने वही पुराना राग अलापा कि एविडेंस एक्ट की धारा 123 एवं 124 तथा संविधान की धारा 74(2) के तहत इन फाइलों को नहीं दिखाने का प्रिविलेजउन्हें प्राप्त है.

भारत सरकार ने 1947 से लेकर अब तक ताइवान सरकार से उस दुर्घटना की जाँच कराने का अनुरोध भी नहीं किया है.

आज भी हमारी सरकार के ताइवान के साथ कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं कायम हो सके हैं. इसके पार्श्व में नेहरू का, सरकारों का चीन-प्रेम भी हो सकता है, नेता जी का सत्य भी हो सकता है. नेता जी के बारे में उपजे संदेह के बादलों को पहले तो स्वयं नेहरू ने और फिर बाद में केंद्र सरकारों ने छँटने नहीं दिया. पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. अमेरिका-ब्रिटेन-चीन आदि जैसे विकसित और सैन्य-शक्ति से संपन्न देशों के भारी दवाब के चलते भी संभव है जाँच अपनी मंजिल को प्राप्त न कर पाती हो. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता का; नेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दिया; वे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए. ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. भले ही नेता जी अपने अंतिम समय में गुमनामी बाबा बनकर रहे और स्वर्गवासी हुए फिर भी उनकी आत्मा आज भी आज़ादी के लिए भटक रही है, तड़प रही है. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करें.

जय हिन्द!!!

30 मार्च 2016

अंतिम सत्य अभी शेष है

फ़ैजाबाद के रामभवन में लगभग दस वर्ष तक प्रवास पर रहने के बाद भी किसी के सामने प्रत्यक्ष रूप में न आने वाले ‘भगवन’ आज भी लोगों के लिए उतने ही गुमनाम से हैं जितने कि अपने प्रवास के दौरान थे. अपने प्रवास के दौरान किसी ने, यहाँ तक कि उनके मकान मालिक ने भी उन्हें नहीं देखा था. यदा-कदा किसी से मुलाकात होने की स्थिति में वह रहस्यमय व्यक्तित्व परदे के पीछे रहकर मुलाक़ात करता था. अपनी इस रहस्यमयी पहचान के चलते वे लोगों में ‘भगवन’ के नाम से प्रसिद्द हो गए और यही भगवन कालांतर में लोगों में ‘गुमनामी बाबा’ के रूप में स्वीकारे जाने लगे. भगवन, गुमनामी बाबा के रूप में चर्चित रहस्यमयी व्यक्तित्व के वर्ष 1985 में देहांत के पश्चात् स्थानीय लोगों को बजाय उनके दर्शनों के उनके सामानों के दर्शन हुए. गुमनामी बाबा के देहांत की खबर आग की तरह समूचे फ़ैजाबाद में फ़ैल गई और लोग उनके अंतिम दर्शनों के लिए अत्यंत उत्सुक थे. ऐसे में भी उस रहस्यमयी व्यक्तित्व का रहस्य बनाये रखा गया और अत्यंत सशंकित रूप से उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी किनारे कर दिया गया. आश्चर्य इसका कि उनकी पार्थिव देह को तिरंगे में लपेटा गया था, ऐसा किसलिए किया गया होगा? इसके अलावा उनका अंतिम संस्कार उच्च प्रशासनिक एवं सैन्य अधिकारियों की देखरेख में हुआ. इसके साथ ही सैन्य-संरक्षित क्षेत्र में गुमनामी बाबा को अंतिम विदा देना भी कहीं न कहीं स्थानीय लोगों के विश्वास को पुष्ट करता है कि वे कोई असाधारण व्यक्तित्व ही थे. इस आश्चर्य, विश्वास को तब और बल मिला जबकि गुमनामी बाबा के तमाम सारे सामानों को देखकर लगभग सभी ने एक स्वर में उन सामानों को नेताजी से सम्बंधित माना.

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देश की आज़ादी के लिए देश से बाहर जाकर अपनी जीवटता और नेतृत्व-क्षमता के चलते सैन्य गठन करके नेताजी अंग्रेजी शासन के लिए समस्या बने हुए थे. उनके संघर्ष का, उनकी सेना के युद्ध का अंतिम परिणाम क्या होता इसको देखने के पूर्व ही नेताजी अचानक रहस्यमयी व्यक्तित्व बन गए. 18 अगस्त 1945 को तथाकथित विमान दुर्घटना का होना, उस कथित दुर्घटना में नेताजी की कथित मृत्यु ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की दिशा को प्रभावित किया ही आज़ादी की लड़ाई को भी प्रभावित किया. अनेकानेक वीर योद्धाओं का संघर्ष काम आया, अनेकानेक शहीदों की शहादत रँग लाई और देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी चंगुल से मुक्त हो गया. ये अपने आपमें विचित्र विडम्बना ही कही जाएगी कि देश तो मुक्ति पा गया, अपनी स्वतंत्र पहचान पा गया किन्तु देश का एक सपूत उसके बाद भी गुमनामी में बना रहा. विमान दुर्घटना का होना या न होना, नेताजी की उसमें मृत्यु होना या न होना, नेताजी का गुप्त रूप से रूस चले जाना या रूस भेज दिया जाना, अंग्रेजों और नेहरू के बीच की संधि होना या न होना, रूस में उनकी हत्या कर दिया जाना या कैद कर लिया जाना आदि-आदि न जाने क्या-क्या बातें लगातार तैरती रहीं. इनमें सत्य क्या है, कौन सी बात है ये तो स्वयं नेताजी ही भली-भांति जानते-समझते होंगे किन्तु फ़ैजाबाद के गुमनामी बाबा के सामानों ने तार्किक रूप से उनको ही नेताजी मानने को विवश सा किया है. गुमनामी बाबा के देहांत के पश्चात् नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भतीजी ललिता बोस उन सामानों को देखकर अपने आँसू रोक नहीं सकी थी. ये महज संयोग ही नहीं कि बाद में ललिता बोस ने उन सामानों को सुरक्षित रखवाने के लिए सरकार से लम्बी लड़ाई लड़ी. सामानों को देखकर स्थानीय लोगों के साथ-साथ ललिता बोस ने भी माना कि उन सामानों के आधार पर गुमनामी बाबा ही उनके चाचा थे. आखिरकार ललिता बोस तथा स्थानीय नागरिकों के प्रयासों से सरकार द्वारा गुमनामी बाबा के सामानों की एक सूची बनाई गई. 23 मार्च 1986 से 23 अप्रैल 1987 के दौरान बनाई गई सूची के अनुसार आज भी फैजाबाद के सरकारी कोषागार में लगभग 2761 सामान रखे हुए हैं.
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गुमनामी बाबा का प्रवासकेंद्र रहे रामभवन के उत्तराधिकारी एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र के संयोजक शक्ति सिंह द्वारा 13 जनवरी 2013 को याचिका दाखिल कर अनुरोध किया कि भले ही ये सिद्ध न हो पाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे किन्तु गुमनामी बाबा के सामानों के आधार पर कम से कम ये निर्धारित किया जाये कि वो रहस्यमयी संत आखिर कौन था? इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने कोषागार में रखे गुमनामी बाबा के सामानों को वैज्ञानिक विधि से सुरक्षित करने, संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक करने एवं रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में समिति गठित कर गुमनामी बाबा के सामानों से पर्दा हटाने का निर्देश उत्तर प्रदेश सरकार को दिया. न्यायालय के आदेश पश्चात गुमनामी बाबा के 24 बड़े लोहे के डिब्बों और 8 छोटे डिब्बों अर्थात कुल 32 डिब्बों में संगृहीत सामानों को जब सामने लाया गया तो देश के एक-एक नागरिक को विश्वास होने लगा कि गुमनामी बाबा और कोई नहीं नेताजी ही थे. सूचीबद्ध किये गए सामानों में परिवार के फोटो, अनेक पत्र, न्यायालय से मिले समन की वास्तविक प्रति से उनके नेताजी के होने का संदेह पुष्ट होता है. इसी तरह गोल फ्रेम के चश्मे, मँहगे-विदेशी सिगार, नेताजी की पसंदीदा ओमेगा-रोलेक्स की घड़ियाँ, जर्मनी की बनी दूरबीन-जैसी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज अथवा नेताजी द्वारा प्रयुक्त की जाती थी, ब्रिटेन का बना ग्रामोफोन, रिकॉर्ड प्लेयर देखकर सहज रूप से सवाल उभरता है कि एक संत के पास इतनी कीमती वस्तुएँ कहाँ से आईं? इन सामानों के अलावा आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म, एक नक्शा, प्रचुर साहित्यिक सामग्री, अमरीकी दूतावास का पत्र, नेताजी की मृत्यु की जाँच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें आदि लोगों के विश्वास को और पुख्ता करती हैं.
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सामानों के आधार पर बाबा को नेताजी माना जा सकता है किन्तु आधिकारिक पक्ष अभी आना बाकी है. हाल फिलहाल तो गुमनामी बाबा का सामान सूचीबद्ध करके पुनः तालाबंदी में है. जल्द ही यदि न्यायालयीन आदेश पर इस सामान को संग्रहालय के रूप में सार्वजनिक किया गया तो ये भी लोगों के विश्वास की जीत ही होगी. नेताजी के प्रशंसकों के विश्वास की अंतिम विजय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के रहस्य से पर्दा उठने पर ही होगी.
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21 अप्रैल 2015

परदे में नेता जी की मृत्यु का सच


नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु पर आज तक संदेह बना हुआ है और विद्रूपता ये कि अद्यतन सरकारों द्वारा किसी तरह की ठोस सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई है. इसको प्रसारित करने और एक तरह की सरकारी मान्यता देने कि नेता जी की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को एक विमान दुर्घटना में ही हो गई थी, अधिसंख्यक लोगों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है. नेता जी की मृत्यु की खबर के सन्दर्भ में सामने आते कुछ तथ्यों ने भी समूचे घटनाक्रम को उलझाकर रख दिया है. जहाँ एक तरफ नेता जी की मृत्यु एक बमबर्षक विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने पर बताई जा रही है वहीं ताईवानी अख़बार 'सेंट्रल डेली न्यूज़' के अनुसार १८ अगस्त १९४५ को ताइवान की राजधानी ताइपेह के ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था. इसी तथ्य पर मिशन नेताजीसे जुड़े अनुज धर के ई-मेल के जवाब में ताईवान सरकार के यातायात एवं संचार मंत्री लिन लिंग-सान तथा ताईपेह के मेयर ने जवाब दिया था कि १४ अगस्त से २५ अक्तूबर १९४५ के बीच ताईहोकू हवाई अड्डे पर किसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बाद में २००५ में ताईवान सरकार के विदेशी मामलों के मंत्री और ताईपेह के मेयर ने ‘मुखर्जी आयोग’ के सामने भी इन्हीं बातों को दोहराया था. 

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि नेता जी उस विमान दुर्घटना में जीवित बच गए थे तो फिर वे गए कहाँ थे? तमाम वर्ष उन्होंने कहाँ व्यतीत किये? इन सवालों के जवाब जानने के लिए ये तथ्य जानना आवश्यक है कि आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना और इटली, जापान, जर्मनी से मदद लेने के पीछे नेता जी का एकमात्र उद्देश्य भारत को स्वतंत्र करवाना था. ये गतिविधियाँ ब्रिटेन को किसी भी रूप में पसंद नहीं थी अतः उसने नेता जी को अंतर्राष्ट्रीय अपराधी घोषित कर दिया था. अंग्रेज भले ही भारत को स्वतंत्र करना चाह रहे थे किन्तु वे नेता जी को अपराधी घोषित कर मुकदमा चलाने को बेताब थे. इधर नेता जी के सहयोगी रहे स्टालिन और जापानी सम्राट तोजो किसी भी कीमत पर उनको ब्रिटेन-अमेरिका के हाथों नहीं लगने देना चाहते थे. वे इस बात को समझते थे कि मित्र राष्ट्र में शामिल हो जाने के बाद ब्रिटेन-अमेरिका उन पर नेता जी को सौंपने का दवाब बनायेंगे. ऐसे में संभव है कि तत्कालीन स्थितियों में इस दवाब को नकार पाना इनके वश में न रहा हो और इन सहयोगियों ने किसी योजना के तहत नेता जी को अभिलेखों में मृत दिखाकर उन्हें अन्यत्र शरण दिलवा दी हो.

नेता जी की मृत्यु के सच को सामने न आने देने के पीछे कई बार नेहरु जी की मंशा काम करती दिखती है. संसद में जब-जब नेता जी की दुर्घटना की जाँच करवाए जाने की माँग उठी, नेहरू जी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. यहाँ तक कि जाँच आयोग बनाये जाने की माँग भी वे कई वर्षों तक टालते रहे. जब जनप्रतिनिधियों ने गैर-सरकारी जाँच आयोग बनाने का निर्णय ले लिया तब नेहरू जी ने सन १९५६ में पहले जाँच आयोग के गठन का निर्णय लिया. इसके साथ ही आज़ादी के बाद न तो नेता जी को और न ही आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्ज़ा दिया गया. इसके उलट स्वतंत्र भारत में आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया. इस तथ्य के अतिरिक्त स्टालिन द्वारा आज़ादी के बाद नेता जी को वापस भारत बुला लेने के सम्बन्ध में नेहरू जी को लिखा पत्र भी महत्त्वपूर्ण है. इस पत्र के जवाब में नेहरू स्टालिन को लिखते हैं, वे जहाँ हैं, उन्हें वहीं रहने दिया जाये.

नेहरू अथवा सरकार की कार्यप्रणाली ने बराबर संदेह ही पैदा किया है. सत्ता का केन्द्रीयकरण कर चुके लोग नहीं चाह रहे थे कि नेता जी का सत्य किसी भी रूप में सामने आये या फिर खुद नेता जी ही सामने आयें और सत्ता विकेन्द्रित हो जाये. इस मानसिकता के चलते गठित किये गए ‘शाहनवाज़ आयोग’ के निष्कर्षों को बहुतायत सांसदों ने, देश की जनता ने ठुकरा दिया और अंततः साढ़े तीन सौ सांसदों द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद १९७० में इंदिरा गाँधी को जस्टिस जी० डी० खोसला की अध्यक्षता में एक दूसरा आयोग गठित करना पड़ा. इस जाँच आयोग के गठन के सम्बन्ध में भी सरकार की नीयत में खोट ही दिखाई देती है क्योंकि खोसला नेहरूजी के मित्र थे और वे जाँच के दौरान ही इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे. जाँच के लिए बना तीसरा ‘मुखर्जी आयोग’ कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश के बाद बनाया गया. इसमें सरकार के हस्तक्षेप को नकारते हुए न्यायालय ने स्वयं ही मुखर्जी को आयोग का अध्यक्ष बना दिया तो सरकार ने उनकी जांच में अड़ंगे डालना शुरू कर दिए. जो दस्तावेज ‘खोसला आयोग’ को दिये गये थे, वे ‘मुखर्जी आयोग’ को देखने तक नहीं दिये गए. प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय सहित सभी जगह से नौकरशाहों का रटा-रटाया जवाब आयोग को मिलता कि भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को नहीं दिखाने का ‘प्रिविलेज’ उन्हें प्राप्त है. इन तमाम बातों, मानसिकताओं, मतभेदों के साथ-साथ भारत सरकार के रवैये पर संक्षिप्त रूप से निगाह डालें तो इस प्रकरण की जाँच पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाते हैं. भारत सरकार ने वर्ष १९६५ में गठित 'शाहनवाज आयोग' को ताइवान जाने की अनुमति नहीं दी थी. आयोग ने समूची की समूची जाँच देश में बैठे-बैठे ही पूरी कर ली थी. और शायद इसी का सुखद पुरस्कार उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करके दिया गया. १९७० में गठित 'खोसला आयोग' को भी रोका गया था किन्तु कुछ सांसदों और कुछ जन-संगठनों के भारी दवाब के कारण उसे ताइवान तो जाने दिया गया मगर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से संपर्क नहीं करने दिया गया. ‘मुखर्जी आयोग’ ने भारत सरकार से जिन दस्तावेजों की मांग की वे आयोग को नहीं दिए गए. रूस में भी जाँच आयोग को पहले तो जाने नहीं दिया गया बाद में आयोग को न तो रूस में नेताजी से जुड़े दस्तावेज देखने दिए गए और न ही कलाश्निकोव तथा कुज्नेट्स जैसे महत्वपूर्ण गवाहों के बयान लेने दिए गए.  

पारदर्शिता बरतने के लिए लागू जनसूचना अधिकार अधिनियम के इस दौर में भी नेता जी से मामले में किसी भी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है. नेता जी दुर्घटना का शिकार हुए या अपनों की कुटिलता का; नेता जी देश लौटे या देश की सरकार ने उनको अज्ञातवास दे दिया; वे रूस में ही रहे या फिर कहीं किसी विदेशी साजिश का शिकार हो गए....ये सब अभी भी सामने आना बाकी है. ऐसे में सत्यता कुछ भी हो पर सबसे बड़ा सत्य यही है कि देश के एक वीर सपूत को आज़ादी के बाद भी आज़ादी नसीब न हो सकी. ये हम भारतवासियों का फ़र्ज़ बनता है कि कम से कम आज़ादी के एक सच्चे दीवाने को आज़ाद भारत में आज़ादी दिलवाने के लिए संघर्ष करें... जय हिन्द!!!  



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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स के दिनांक 21-04-2015 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित किया गया.