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24 जनवरी 2025

महाकुम्भ और एआई संचालित पत्रकारिता

सनातन के वास्तविक लोग, महाकुम्भ के सजग नागरिक कथित मीडिया और इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के हमले से सावधान रहें.

 

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खम्भा माना जाता है. यहाँ ध्यान रहे कि 'माना' जाता है, वो चौथा खम्भा है नहीं. लोकतंत्र में मात्र तीन खम्भे ही सहज स्वीकार्य हैं-कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका. पत्रकारिता को जबरिया एक खम्भा घोषित कर दिया गया है. इस चौथे स्तम्भ की आड़ में उपजे कथित जबरिया, नियंत्रण-मुक्त, उच्छृंखल सोशल मीडिया खम्भे ने बहुत नुकसान पहुँचाया है. इसे प्रयागराज के महाकुम्भ में देखा जा सकता है.

 

हर हाथ मोबाइल, हर हाथ इंटरनेट ने सबको सोशल मीडिया चैनल बना दिया है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस पड़े. न सवाल पूछने की अकल, न विषय की गम्भीरता, न वातावरण-देशकाल का भान.... बस मोबाइल का मोबाइल ओं और बन गए पत्रकार. सनातन संस्कृति के पवित्र, पावन, भव्य, संस्कारित आयोजन महाकुम्भ पर ऐसे कथित मीडिया मंचों से बचने की आवश्यकता है. इन कथित मानसिकता वालों को पर्याप्त मदद मिल रही है कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से.


सावधान रहें.




18 जनवरी 2025

मीडिया की आड़ में महाकुम्भ की नौटंकी

मीडिया में जिस तरह से असंवेदनशील लोग घुस चुके हैं, उससे विषयों का लगातार क्षरण हो रहा है. हर हाथ में स्मार्ट फोन का कैमरा, इंटरनेट, सोशल मीडिया का मंच होने से सभी को किसी न किसी मीडिया मंच का मालिक बना रखा है. जहाँ मन हुआ मुँह उठाकर घुस गए. इसी मुँह उठाकर घुसने की प्रवृत्ति के कारण विषयों का गाम्भीर्य गायब होता जा रहा है. इसका उदाहरण प्रयागराज में चल रहा पावन महाकुम्भ है. जिसे देखो वो मुँह उठाये खुद को स्वयंभू मीडिया चैनल घोषित करके गम्भीरता से इतर बस दो कौड़ी की रील बना-बना ठेलने में लगा है. किसी को माला बेचती युवती की आँखें दिख रही हैं, किसी को IIT वाला बाबा दिख रहा है, किसी को स्त्री-सौन्दर्य आकर्षित करने में लगा है.

 



मोबाइल के सहारे क्रांति करते कथित मीडिया व्यक्तियों को शायद जानकारी नहीं होगी कि महाकुम्भ किसे कहते हैं? नागा बाबा कौन हैं? अखाड़ों का वास्तविक अर्थ क्या है? पूरे महाकुम्भ में मात्र कुछ दिन ही विशेष स्नान क्यों होते हैं? त्रिवेणी में तीसरी नदी कहाँ है? और भी बहुत सी महत्त्वपूर्ण जानकारी इन कम-दिमाग वालों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं. इनको बस ये पता करना है कि किस युवती की आँखें ज्यादा मोहक हैं? कौन सी युवती सर्वाधिक मोहक साध्वी है? देह के आकर्षण में खोये ये बददिमाग कथित मीडियामैन महाकुम्भ में भी सिर्फ रील बनाने का 'माल' खोज रहे हैं. इनको महाकुम्भ की गहराई से कोई मतलब नहीं. महाकुम्भ के भावार्थ से कोई लेना-देना नहीं. प्रयागराज की गम्भीरता का कोई मोल नहीं? त्रिवेणी के अलौकिक सौन्दर्य का कोई महत्त्व नहीं.

 


29 नवंबर 2020

बुन्देलखण्ड के कुछ समाचार-पत्र

कुछ साल पहले बुन्देलखण्ड में पत्रकारिता से सम्बंधित एक प्रोजेक्ट में सहयोग किया था. उस समय सम्बंधित साहित्य का अध्ययन करने और क्षेत्र के समाचार-पत्रों पर समीक्षात्मक टिप्पणी करने की दृष्टि से कुछ समाचार-पत्रों की प्रतियाँ, कुछ की फोटो-प्रतियाँ हमें देखने को मिली थीं. उनकी फोटोकॉपी हमने करवा कर रख ली थी. आज एक कागज़ खोजते समय वे सारी फोटो-प्रतियाँ देखने को मिल गईं. सोचा आपको भी उनके दर्शन करवाते चलें. 
 



































वंदेमातरम्

10 मई 2020

कोरोना योद्धा की काल्पनिकता से बाहर निकले मीडिया

संभव है कि हमारे मीडिया के कई साथी इस पोस्ट पर नाराजगी जताएँ. हमारे कई दोस्त, उम्र में हमसे बड़े-छोटे लोग, हमारे कई विद्यार्थी मीडिया से जुड़े हुए हैं. उनकी नाराजगी की चिंता से अधिक आवश्यक हमें उनकी चिंता करना लगा. वे सभी लोग कुछ बिन्दुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए अपने कदम बढ़ाएंगे, ऐसी अपेक्षा ही कर सकते हैं.


पहली बात, आप ऐसी कौन सी जानकारी सरकार तक, प्रशासन तक पहुँचाना चाहते हैं, जो उनके पास अपने स्त्रोतों से उनको उपलब्ध नहीं हो सकती?

दूसरी बात, आपके द्वारा कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या, इससे होने वाली मौतों की संख्या आदि का आम नागरिकों के लिए क्या लाभ है?

तीसरी बात, विचार करिए कि लॉकडाउन के कारण उत्पन्न अनेक तरह की समस्याओं का उल्लेख करके आप जनता को सुकून दिलवा रहे हैं अथवा परेशान कर रहे हैं?

चौथी बात, इस समय किसी शहर में किसी भी तरह की राजनैतिक, सांस्कृतिक, खेलकूद आदि से सम्बंधित कार्यक्रम संचालित नहीं हो रहे हैं, जिनका प्रकाशन/प्रसारण आपके लिए आवश्यक है.

पाँचवीं बात, सामान्य दिनों में भी बहुत सी खबरों का कवरेज आपके द्वारा ही नहीं किया जाता था बल्कि सूत्रों के द्वारा आपको उनकी प्राप्ति होती थी.

छठवीं बात, प्रत्येक जिले में सूचना कार्यालय होता है, उसका काम सूचनाएँ उपलब्ध करवाना ही होता है.


चलिए मान लेते हैं कि आपका ही कवरेज करना अत्यंत आवश्यक है तो लॉकडाउन के दौरान खुद के द्वारा प्रकाशित/प्रसारित की गई खबरों पर ही निगाह डाल लीजिये. उनमें से कितनी ऐसी हैं जो अत्यावश्यक अथवा अनिवार्य हैं?

एक बात स्वीकारिये कि कोरोना से सम्बंधित किसी भी खबर का प्रसारण सरकारी गाइडलाइन के आधार पर ही हो रहा है. आप लोगों द्वारा भी प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी ही प्रकाशित/प्रसारित की जा रही है.

प्रशासन द्वारा जगह-जगह लॉकडाउन के पालन की स्थिति का अवलोकन, नगरीय सीमाओं पर आने वालों की भीड़, पुलिस की मुस्तैदी-जांच आदि की खबरों के लिए क्या सम्बंधित स्थान पर आपका ही रहना आवश्यक है?

अपने-अपने क्षेत्र में अपना whatsapp नंबर सबके बीच सार्वजनिक कीजिये. प्रशासन से अथवा अन्य लोगों से उसी पर खबरें, फोटो, वीडियो प्राप्त करिए.

एक विशेष बात, विगत कुछ दिनों से पत्रकारों के लिए मुआवजे की बात की जा रही है. इसका अर्थ यह निकला कि आप भी आशंकित हैं. ऐसे में एक बार अपने परिजनों से उनकी मंशा जान लीजिये कि वे आपके स्थान पर सरकारी मुआवजा स्वीकारने को तैयार हैं?

इसके अलावा एकबारगी मुआवजे की बात को सरकार मान भी ले तो क्या आप मीडिया से जुड़े होने के बाद भी मीडिया की अंदरूनी वास्तविकता से परिचित नहीं? किसी संस्थान द्वारा एक जिले में कितने लोग वास्तविक रूप में उसके कर्मियों के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, ये आपको भी ज्ञात होगा. ऐसे में मुआवजे की स्थिति में सरकारी नीति में कितने लोग आयेंगे, ये भी आपको पता होगा.

इन सब बातों से बड़ी बात, मीडिया के लोग खुद को कोरोना योद्धा, चौथा खम्बा आदि की काल्पनिकता से भी बाहर निकलने का प्रयास करें. संवैधानिक रूप से तीन ही खम्बे हैं. कोरोना योद्धा के रूप में वे लोग ही तत्पर हैं जो सरकारी दायित्वों से बंधे हैं, अन्यथा की स्थिति में बहुतायत निजी चिकित्सक घर में ही रह रहे हैं.

एक बात पूरी तरह से दिमाग से निकाल दीजिए कि आप लोग खबरें नहीं देंगें तो लोगों को खबर न होगी. वर्षों पहले गिने-चुने समाचार-पत्र होते थे, एक ही चैनल हुआ करता था तब भी खबरें लोगों तक पहुँचती हैं. आज तो हर व्यक्ति समाचार-पत्र है, हर व्यक्ति चैनल है. आप अपने शहर की बात कर रहे, व्यक्तियों के पास अन्तरिक्ष की खबरें तक हैं.

अच्छी बात है, आप सभी बधाई के पात्र हैं कि रोज की खबरें जनता तक पहुँचाना आप अपना दायित्व समझते हैं मगर विचार करिए कि इस कोरोना के दौर में, लॉकडाउन में कितने लोग समाचारों के लिए अखबारों और न्यूज़ चैनल्स का सहारा ले रहे हैं?

खबरों के प्रसारण के लिए सरकारी तंत्र पर्याप्त सक्रिय है. कुछ महीनों के लिए खोजी पत्रकारिता टाइप कदम रुके रहेंगे तो कोई प्रलय नहीं आ रही मगर आप लोगों को कुछ होता है तो आपके घर अवश्य प्रलय आ जाएगी. यहाँ फिर वही बात कि इस लॉकडाउन में किस तरह की खोजी खबर, गुप्त जानकरी आप लाना चाहते जो नागरिकों के लिए लाभकारी होगी, ये बताएं और बन जाएँ कोरोना योद्धा.

कहना हमारा फ़र्ज़ था क्योंकि आप हमारे हैं. अब मानना या न मानना आपके ऊपर क्योंकि ये तय आपको करना है कि आपके परिजन आपके हैं या नहीं? ध्यान रखियेगा, कोरोना का संक्रमण पद, प्रतिष्ठा, प्रस्थिति, कार्य, वर्ग, धर्म, जाति, क्षेत्र आदि देखकर नहीं हो रहा.

घर में रहिये, स्वस्थ रहिये, सुरक्षित रहिये.

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#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

28 अप्रैल 2020

लिखने का कीड़ा और छपास का रोग

लिखने का कीड़ा बचपन में ही काट गया था. उस समय हम लगभग दस-ग्यारह साल के रहे होंगे, उस समय पहली कविता लिखी थी. वह कविता न केवल लिखी गई बल्कि प्रकाशित भी हुई. बाद में पढ़ाई का, परीक्षाओं का सोंटा चला तो लिखने का कीड़ा कहीं दुबक गया. यह कीड़ा कभी-कभी कुलबुला जाता और इधर-उधर काट कर वापस सुसुप्तावस्था में चला जाता.


यद्यपि आज के जैसा दौर नहीं था जहाँ कि बच्चे चौबीस घंटे बस पढ़ाई और कैरियर के लिए चिंताग्रस्त दिखते हैं तथापि इतना अवश्य था कि पढ़ना है, पास होना है. क्या बनना है जैसा सवाल हर पल बदलता रहता था. नब्बे के दौर में स्नातक के अध्ययन के दौरान भी कैरियर के प्रति गंभीरता नहीं आ सकी, हाँ इतना अवश्य हुआ कि ये समझ आने लगा कि स्नातक के कुछ दिन बाद आजीविका के लिए कुछ करना अवश्य पड़ेगा. इस में ध्यान दिया, लोगों से राय ली, पूछा-ताछी की गई तो हमें अपने मनमाफिक सिविल सेवा में जाना लगा. ये जब तक दिमाग में आता उसके पहले ही लिखने वाला कीड़ा वापस बाहर आ गया. आखिर अब पढ़ाई का सोंटा घर की तरफ से पड़ना बंद हो गया था.


एक तरफ सिविल सेवा की तैयारी चल रही थी दूसरी तरफ लिखने वाला कीड़ा अपने रूप को विस्तार देने का विचार बना रहा था. लिखा तो जा रहा था पर छपना? कीड़े ने फिर काटा, अबकी छपास रोग साथ में लेकर आया. सबसे आसान लगा सम्पादक के नाम पत्र में लिखना और छप जाना. इसे चुनने के पीछे दो कारण भी रहे. एक तो समसामयिक विषयों पर त्वरित टिप्पणी दी जा सकती थी और खुद अपने आपको अपडेट रखा जा सकता था. समाचार-पत्रों में पत्र छपना शुरू हो गए. पत्रिकाओं में साहित्यिक रचनाएँ भी प्रकाशित होती रहीं.


उन्हीं दिनों अमर उजाला समाचार पत्र ने पत्र कॉलम में प्रकाशित एक विशेष पत्र को ख़ास ख़त नाम से प्रकाशित करना आरम्भ किया. हमारे पत्र लगातार प्रकाशित हो रहे थे. उन पत्रों के प्रकाशन ने खूब नाम दिया, पहचान दी. इसके बाद जब ख़ास ख़त का प्रकाशन होने लगा तो उसमें भी पत्र प्रकाशन नियमित रूप से होने लगा. लम्बे समय तक यह व्यवस्था अमर उजाला की तरफ से चलती रही और हमारा प्रकाशन उसमें चलता रहा. कालांतर में लेखन की दिशा बदली. सामायिक, साहित्यिक विषयों के साथ-साथ शोध-पत्रों के लेखन की तरफ मुड़ना हुआ. पी-एच०डी० के लिए शोध कार्य में जुटना पड़ा. धीरे-धीरे पत्र कॉलम में लिखना कम होते-होते बंद हो गया.

उन सभी प्रकाशित पत्रों को संग्रहीत करके रखा हुआ था. कालांतर में ख़ास ख़त कॉलम में प्रकाशित समस्त पत्रों को ख़ास ख़त नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित भी करवाया. इस लॉकडाउन के फुर्सत भरे समय में स्मृति वन में भटकना, टहलना लगातार हो रहा है. आज टहलते-टहलते पत्रों की उसी दुनिया में पहुँच गए, जिसने हमारी पहचान बनाई, जिसने हमें व्यापक क्षेत्र में परिचित करवाया. इसका सुखद अनुभव भी उसी दौर में हम ले चुके थे.



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#हिन्दी_ब्लॉगिंग

03 मई 2019

आज़ाद प्रेस की मानसिकता


कितना हास्यास्पद लगता है, आज़ाद प्रेस के होने के दौर में भी आज, 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस (World Press Freedom Day) मनाया जाना. किसी तरह के हास्य से पहले जानकारी दे दी जाये कि इसे मनाने का निर्णय 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के जनसूचना विभाग ने मिलकर किया था. इस निर्णय के पूर्व नामीबिया में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि प्रेस की आज़ादी को जनसंचार की आज़ादी के रूप में देखा जाना चाहिए. इसके बाद प्रस्ताव पारित होने के बाद प्रतिवर्ष 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाने लगा. अब बात की जाये हास्य की, आज़ादी उस देश में माँगी जा रही है जहाँ कि आज़ादी पहले से है. किसी देश में देखा गया है कि वहाँ के प्रधानमंत्री को हत्यारा, कातिल, खून का सौदागर कहा जाये? नहीं सुना होगा न. इसके अलावा भारत में प्रेस का काम भाजपा-विरोधी होना, हिन्दू-विरोधी होना है. यदि ऐसा न होता तो देश की मीडिया आज इस तरह से कम न कर रही होती. बहरहाल, आज दिन है प्रेस की स्वतंत्रता का तो कुछ उसी पर.


यह दिवस प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तथा प्रेस में सेवारत रहते हुए दिवंगत हुए संवाददाताओं को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है. इसके बाद भी देखा जाये तो प्रेस अपने इसी दायित्व का निर्वहन भी सही ढंग से नहीं कर रहा है. अपनी आज़ादी का उचित दायित्व निर्वहन तो अलग वह अपने अंग रहे लोगों को श्रद्धांजलि देने का काम भी उचित ढंग से नहीं कर रहा है. कम से कम आज के दिन तो खबरों में झूठ बोलने से, उनको टीआरपी के झमेले में पड़ने से परहेज करना चाहिए था. अनावश्यक विचारों, बयानों के प्रसारण से बचा जाना चाहिए था. जनहित सम्बन्धी खबरों के स्थान पर मिर्च-मसालेदार खबरों के प्रसारण से परहेज किया जाना चाहिए था, मगर ऐसा होता नहीं दिखता. आज यह भले ही कहा जाये कि प्रेस जनता का आइना है, मगर असलियत यह है कि प्रेस ने जनता को गुमराह करने का काम किया है. यही कारण है कि आज़ादी की माँग के साथ-साथ प्रेस पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ नियम और संगठन बने हुए हैं. ये समय-समय पर प्रेस को अपने दायरे में रहकर काम करते रहने की याद दिलाते रहते हैं. सत्यता तो यह है कि प्रेस की आज़ादी को छीनना एक तरह से देश की आज़ादी को छीनने जैसा ही है. वर्तमान में चीन, जापान, जर्मनी, पाकिस्तान जैसे देशों में प्रेस को पूर्णत: आज़ादी नहीं है. यहां प्रेस पर सरकार का सीधा नियंत्रण है. इस दृष्टि से भारत में प्रेस की स्थिति अत्यंत सशक्त है. 

इसके बाद भी यहाँ भी प्रेस में बहुतेरे लोग अपनी हनक दिखाने के लिए प्रविष्ट होने लगे हैं. इनका उद्देश्य जन-जागरूकता फैलाने के बजाय अपनी धाक जमाना ही अधिक होता है. अपनी गाड़ियों में प्रेस लिखे लोग प्रत्येक शहर में मिल जायेंगे. ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनके द्वारा किसी समाचार-पत्र, पत्रिका का प्रकाशन उसी स्थिति में होता है, उन्हीं दिनों में होता है जबकि उससे संदर्भित विज्ञापन मिलना होता है. इन्हीं विज्ञापन के द्वारा वे न केवल प्रशासन पर अपनी हनक दिखाते हैं बल्कि अपनी रोजी-रोटी की जुगाड़ भी करते हैं. ऐसे लोग अपने आपको स्थापित करने लिए मीडिया का रास्ता चुनते हैं. ऐसे लोगों से प्रेस को बचने की आवश्यकता है. उसे समझना होगा कि प्रेस की आज़ादी का अर्थ किसी सन्दर्भ में किसी भी तरह की खबर का प्रसारण कर देना नहीं है. प्रेस को इस बात का संज्ञान लेना होगा कि किसी पूर्वाग्रह के साथ खबरों का, विचारों का प्रसारण न हो. यदि ऐसा होता है तो यह प्रेस की अक्षमता ही है, साथ ही समाज के लिए अहितकर भी है.

30 मार्च 2019

न फोटो खींचने से रुकेंगे, न अपनी बात कहने से


शहर के किसी कोने में होने वाली किसी भी तरह की गड़बड़ी को जैसे ही कैमरे में लेने की कोशिश की जाती है वैसे ही आसपास वालों की निगाह में पत्रकारिता से जुड़ा होने का भाव जाग जाता है. जो चंद लोग जानते-पहचानते हैं वे तो मुस्कुराते हुए किनारे से, अगल-बगल से निकल जाते हैं और जो नहीं पहचानते हैं उनके लिए कैमरे से की जाने वाली कारीगरी सिवाय पत्रकारिता के कुछ और नहीं होती है. ये एक सजग सोच कही जा सकती है किसी भी व्यक्ति की कि वह समाज में हो रही किसी भी तरह की अव्यवस्था, अनियमितता को उजागर करने के लिए पत्रकारिता को, पत्रकार को सक्षम समझता है. इस सजग, सकारात्मक सोच के साथ-साथ एक नकारात्मकता भी चिपकी होती है और वह होती है उस फोटो से की जाने वाली कमाई को लेकर. ऐसा हमारा स्वयं का व्यक्तिगत अनुभव रहा है, एक बार का नहीं अनेक बार का, जबकि ऐसी किसी भी स्थिति की फोटो निकालते समय आसपास के लोगों के कई सवालों से जूझना पड़ा, कई तरह के विचारों को जानने-सुनने का मौका मिला. ऐसा एक हमारे शहर का हाल नहीं है वरन बहुतायत में ऐसा होते दिख जाता है. ट्रेन में, बस में, बाजार में, कार्यालय में, स्कूल में, विश्वविद्यालय में ऐसे मंजर आसानी से आपके साथ खड़े हो जाते हैं. 


अभी इसी माह ऐसे कई बिंदु आँखों के सामने से गुजरे. हर हाथ में चिपके मोबाइल के कारण ऐसी किसी भी स्थिति का फोटो निकालना आसान हो जाता है. कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया के whatsapp ग्रुप से जुड़ना हुआ जो हमारे इंटरमीडिएट के साथियों द्वारा बनाया गया. उरई के राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़े साथियों का एकसाथ आना सुखद अनुभूति सा महसूस हुआ. दिमाग में आया कि सन 1990 के बाद से कॉलेज को छोड़कर जा चुके साथियों के लिए अपने कॉलेज के आज के चित्र भेजे जाएँ. ऐसा सोचकर कॉलेज की पुरानी इमारत की तरफ जाना हुआ. अंग्रेजों के समय की बनी इस इमारत के साथ-साथ उससे लगी हुई दूसरी इमारत में भी हम लोगों को पढ़ने का अवसर मिला था. दूसरी इमारत सन 1990 से कुछ समय पहले ही बनाई गई थी. इस समय पुरानी इमारत पूरी तरह से परित्यक्त है. उसका बहुत बड़ा भाग गिर चुका है और बहुत सा हिस्सा गिरने की स्थिति में है. इस इमारत के मुख्य द्वार से लगी बगिया भी उजड़ चुकी है. पुरानी जर्जर इमारत और उजड़ी हुई बगिया अब नशेबाजों की शरणगाह बने हुए हैं. उस दिन फोटो खींचने के उद्देश्य से अन्दर जाने पर दो-चार नशेबाजों से सामना हुआ. मोबाइल से फोटो निकालते देख उनमें से कुछ तो चल दिए, एक-दो जो वहां जमे रहे उन्होंने अपनी शंका का समाधान किया और हमारे बताते ही कि हम मीडिया से नहीं हैं, वे निश्चिन्त भाव से अपने काम में लग गए.


कॉलेज कैंपस की जर्जरता का अपने लिए लाभ उठा रहे उन नशेबाजों ने तो कुछ नहीं कहा मगर उरई के पुराने भवन टाउन हॉल में लगे लैम्पों की दुर्दशा की, शहर भर में फुटपाथ पर पार्किंग बना दिए जाने की, बैंक, मॉल, तहसील आदि के सामने जबरन पार्किंग बना दिए जाने की, बाजार में रखे डिवाइडर्स के अस्त-व्यस्त बने रहने के फोटो के दौरान भी ऐसी स्थिति से गुजरना हुआ, जबकि लोगों की नकारात्मकता का आभास हुआ. आसपास वालों ने जानकारी लेनी चाही तो पार्किंग वालों ने भी आपत्ति दर्ज की. आम नागरिकों का मानना था कि इस तरह की फोटो खींचने के बाद सुधार तो कुछ होना नहीं है, मीडिया के नाम पर उगाही कर ली जाएगी. कुछ लोगों ने सीधे हमसे बात की और कुछ आपस में बतियाते रहे. उन सबका सार यही था कि कमीशन न मिला होगा, इस बार का हिस्सा न पहुँचा होगा, ठेकेदार से, नगर पालिका से कुछ अनबन हो गई होगी, कोई काम न बना होगा आदि-आदि. 


मीडिया के प्रति इस तरह की नकारात्मकता उभरने के पीछे के अपने कारण हैं, उन पर चर्चा फिर कभी. मूल बात ये कि समाज के लोग अव्यवस्थाओं से अनियमितताओं के इतने आदी हो चुके हैं कि वे स्वयं इसमें बदलाव के लिए आगे बढ़ना ही नहीं चाहते. जो है, जैसा है, सब चलता है, ठीक है आदि की मनोदशा में वे अपने आपको उन्हीं अव्यवस्थाओं, अनियमितताओं के सहारे आगे ले जा रहे हैं. यही कारण है कि अब किसी मुद्दे पर जन-आन्दोलन जैसी स्थिति नहीं दिखती है. इसी कारण से सम्बंधित पक्ष भी एकतरफा काम करते हुए कार्यवाही करता है. बहरहाल, सुधार होगा या नहीं, बदलाव आएगा या नहीं, लोग सुधरेंगे या नहीं ये बाद की बातें हैं पर हम तो न फोटो खींचने से रुकेंगे और न ही अपनी बात कहने से.

30 दिसंबर 2018

सोशल मीडिया की उन्मुक्त प्रजाति


मीडिया के साथ जुड़ाव बचपन से ही रहा है. पिताजी के एक मित्र उरई से ही दैनिक एलार्म समाचार-पत्र का प्रकाशन करते थे. उनके साथ पारिवारिक संबंधों के कारण पत्रकारिता को बहुत करीब से देखने का अवसर बचपन से ही मिला है. इसी तरह प्रिंट लाइन में जनपद जालौन में अपनी सबसे अलग स्थान रखने वाले श्री राजाराम गुप्ता जी से भी पारिवारिक सम्बन्ध होने के कारण इस क्षेत्र की बारीकियों को भी बहुत करीब से देखने-समझने का अवसर बचपन से ही मिला. स्नातक के बाद अपने लेखन शौक के कारण हम खुद भी मीडिया के संपर्क में आ गये. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संपर्क हुआ, सम्बन्ध बने. इस मीडिया से संपर्क विस्तार के बाद जब सोशल मीडिया में प्रवेश किया तो पता नहीं था कि उसमें जितनी राहें हैं वे सारी भूलभुलैया की तरह काम करती हैं. जरा सा भटके नहीं कि फिर उसी में खो गए. सोशल मीडिया की राह पर चलना शुरू किया ब्लॉग के माध्यम से जो चलते-चलते कब फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ट्विटर आदि तक पहुँच गया, पता ही नहीं चला. 


वैचारिक आदान-प्रदान के लिए सर्वोत्तम मंच समझकर यहाँ अपनी उपस्थिति कुछ ज्यादा ही बना ली. इस उपस्थिति के अपने ही परिणाम निकले. बहुत से लोग बौद्धिक विमर्श में सहायक बने, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला. कुछ लोग सामाजिकता में वृद्धि करते दिखे तो उनसे भी सीखा गया. कुछ लोगों का कार्य पूर्वाग्रह से भरकर सिर्फ वैमनष्यता ही फैलाता दिखा तो कुछ दिन उनसे तर्क-वितर्क की स्थिति के बाद लगा कि ऐसे लोगों से बहस का कोई सार नहीं. सो ऐसे लोगों से किनारा करना ज्यादा उचित समझ आया. और भी तमाम तरह की प्रजातियाँ सोशल मीडिया पर मिलीं. इन्हीं में से एक प्रजाति ऐसी मिली जिसका काम इनबॉक्स में आकर हाय, हैलो करना, दो-चार बार के बाद उससे भी कई कदम आगे जाकर प्यार का इजहार करना, शारीरिक सम्बन्ध बनाने की चाह व्यक्त करना, न्यूड फोटो भेजना शुरू हो जाता. इस तरह के कृत्य करने के बाद भी इस प्रजाति का दम ये भरना रहता कि हमसे प्रेम करती हैं, दिल की गहराइयों से प्रेम करती हैं, हमारे प्यार में सबकुछ कर गुजर जायेंगी. हालाँकि कई बार शंका होती इनके फर्जी होने की तथापि कई प्रोफाइल सही भी पायी गईं. तब लगा कि सोशल मीडिया के प्रति लोगों के, विशेष रूप से युवाओं के आकर्षण ने विचारों की अभिव्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता दे दी है. विचारों में भी ख़ास तौर से सेक्स सम्बन्धी अभिव्यक्ति को, नग्नता प्रदर्शित करने सम्बन्धी अभिव्यक्ति को. सेक्स की इस उन्मुक्त अभिव्यक्ति के साथ ये युवा पीढ़ी किस स्वतंत्रता की पोषक बनेगी, पता नहीं.

05 नवंबर 2016

चैनल प्रतिबन्ध और राजनीति

पठानकोट पर हुए आतंकी हमले के समय देश की आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में न रखते हुए किये गए प्रसारण के लिए एनडीटीवी पर एक दिनी प्रतिबन्ध लगाया गया है. केबल टीवी नेटवर्क कानून के तहत प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने प्रतिबन्ध लगाये जाने का आदेश दिया है. इस खबर के आते ही तमाम विपक्षी दल केंद्र सरकार पर हमलावर की भूमिका में आ गए हैं. उनके द्वारा इस प्रतिबन्ध को आपातकाल जैसी स्थिति बताया जाने लगा है. राजनैतिक दलों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर इस प्रतिबन्ध के पक्ष, विपक्ष में बहस छिड़ गई है. कदाचित प्रथम दृष्टया देखने पर ऐसा ही महसूस होता है कि सरकार द्वारा तानाशाही रवैया अपनाते हुए चैनल पर एक दिन का प्रतिबन्ध लगा दिया है. इसके साथ-साथ यदि चैनलों की, मीडिया की, सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाये तो इस प्रतिबन्ध के पीछे बहुत से बिंदु ऐसे निकल कर सामने आयेंगे जो ऐसे क़दमों के उठाये जाने की अनुशंसा करेंगे. 


चैनल पर प्रतिबन्ध लगाये जाने के पीछे का कारण पठानकोट हमले के समय के प्रसारण को आधार बनाया गया है. ये कोई पहली बार नहीं हुआ है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ से कि देश की आंतरिक सुरक्षा को उन्होंने ताक पर रख दिया हो. अभी विगत दिनों सेना द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक की सूचना के बाद जिस तरह से मीडिया द्वारा सीमा पर जाकर वहाँ सेना की स्थित, जवानों की लोकेशन, वहाँ के सुरक्षा इंतजाम, बंकरों की स्थिति, सीमा से लगे हुए गाँवों के नागरिकों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए उठाये गए क़दमों का प्रसारण किया गया वो प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता है. मीडिया की, इलेक्ट्रॉनिक चैनल की कुछ इसी तरह की अतिशय उत्साहित स्थिति का खामियाजा देश के जवानों को उस समय भुगतना पड़ा था जबकि वे मुंबई हमले के समय आतंकियों को काबू में करने के लिए जूझ रहे थे. उस समय भी अनेकानेक चैनलों द्वारा समूचे ऑपरेशन का सीधा प्रसारण करके खुद को सबसे तेज, सबसे आगे रखने की तृष्णा में समूची रणनीति को दुश्मनों तक पहुंचा दिया था.

देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने का कार्य अकेले इलेक्ट्रॉनिक चैनल ही नहीं कर रहे हैं, कई बार ऐसा काम प्रिंट मीडिया द्वारा भी कर दिया जाता है. आये दिन मीडिया द्वारा सेना की, पुलिस की जानकारी रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित कर दी जाती है. कहाँ-कहाँ हमारे जवान तैनात हैं, कहाँ-कहाँ कितना असलहा है, कितना गोला-बारूद है, कहाँ-कहाँ किस तरह की कमियां हैं, कहाँ-कहाँ खामियां हैं आदि-आदि को दिखाकर, प्रकाशित करके मीडिया चैनल अथवा पत्र-पत्रिकाएं जागरूक किस्म की पत्रकारिता न करके देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ ही कर रही हैं. आज भी देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका की एक रिपोर्ट दिमाग से हटती नहीं जबकि विमान अपहरण के बाद एक आतंकी को छोड़ने की शर्त आतंकियों द्वारा केंद्र सरकार के सामने रखी गई थी. उस समय उस पत्रिका ने उस आतंकी के रिहा किये जाने के पहले ही सम्बंधित जेल के नक़्शे सहित एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें जेल की दीवारों की ऊँचाई, बैरकों की स्थिति, उस आतंकी के कैद किये जाने की स्थिति, वहाँ की सुरक्षा व्यवस्था आदि को लेकर ग्राफिक्स सहित जानकारी प्रकाशित की गई थी. सोचने वाली बात है कि उस रिपोर्ट का फायदा उठाकर आतंकी यदि अपने साथ को छुड़ा ले जाते और फिर किसी दूसरे आतंकी को छोड़े जाने की माँग करने लगते तो इसका जिम्मेवार कौन होता? दरअसल मीडिया हो अथवा सोशल मीडिया, सभी ने स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया है. उनके लिए अपने-अपने खेमे बना लिए गए हैं. इस कारण उनका उद्देश्य अपने खेमे को सबसे आगे रखना, उसको तमाम खूबियों से परिपूर्ण दिखाना और विपक्षी खेमे को नीचा दिखाना, उसकी कमियों को बढ़ा-चढ़ा कर सामने लाना बन गया है. ऐसे में अक्सर देश की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ भी हो जाता है. कई-कई गोपनीय जानकारियाँ सार्वजनिक हो जाती हैं.


ऐसी स्थिति में अब जबकि केंद्र सरकार द्वारा चैनल पर एक दिन के प्रसारण रोक का प्रतिबन्ध लगाया गया है तो इसे सम्पूर्ण मीडिया पर प्रतिबन्ध न समझा जाये. इस प्रतिबन्ध को आपातकाल जैसा घोषित करके विपक्षियों द्वारा देशवासियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की जा रही है, जो खतरनाक है. वैसे भी ये कोई पहला अवसर नहीं है जबकि केंद्र सरकार ने किसी चैनल पर प्रतिबन्ध लगाया है. इससे पहले खुद कांग्रेसनीत पिछली सरकार में बीस से अधिक बार प्रतिबन्ध की कार्यवाही की जा चुकी है. तब ये कार्यवाही अश्लील सामग्री, एडल्ट सामग्री दिखाए जाने को लेकर की गई थी, जो कई-कई सप्ताह, महीनों की थी. ऐसे में ये भी सोचना लाजिमी है कि अश्लील, पोर्न सामग्री को दिखाए जाने पर महीनों के हिसाब से लगाया गया प्रतिबन्ध आपातकाल की आहट नहीं था, मगर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सार्वजनिक करने पर मात्र एक दिन का प्रतिबन्ध आपातकाल की आहट हो गई. ये भी विचार करना होगा कि असीम त्रिवेदी के द्वारा बनाये गए कार्टून पर उसे हिरासत में लेना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन नहीं था मगर सेना की ख़ुफ़िया जानकारियों को सार्वजनिक करने पर लगी रोक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन है. सोचना होगा कि अनशन करने के दौरान रात को सोते हुए अनशनकारियों पर लाठीचार्ज करवा देना आपातकाल की आहट नहीं था मगर देश की सुरक्षा से लगातार खिलवाड़ पर सख्त कदम का उठाया जाना आपातकाल जैसा हो गया. विडम्बना ये है कि आज देशहित से आगे स्वार्थ हो गया है. जिसके चलते विरोध के लिए विरोध करना अनिवार्य सा हो गया है और यही कारण है कि चैनल पर एक दिनी प्रतिबन्ध पर सार्थक बहस के स्थान पर जबरिया विरोध की राजनीति की जाने लगी है. ये स्थिति किसी भी रूप में देश के सुखद भविष्य की राह निर्मित नहीं करती है.

25 अगस्त 2016

मीडिया का राजनैतिक रूप

राष्ट्रवाद, राष्ट्रप्रेम को लेकर वर्तमान में देश में एक अजब सा माहौल बना हुआ है. भाजपा सरकार के पक्षकार और विपक्षी दोनों तरफ से ऐसे विषयों पर अपने-अपने तर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं. इन बयानों, तर्कों को कसौटी पर कसे बिना, उनकी सत्यता को जाँचे बिना मीडिया द्वारा आग में घी डालने का काम किया जा रहा है. राष्ट्रवाद के पक्ष में अथवा विपक्ष में किसी भी तरह का बयान आने के बाद कतिपय मीडिया मंचों द्वारा अपनी टीआरपी को ध्यान में रखा जाने लगता है. स्वार्थमयी सोच के आगे ये विचार करना बंद कर दिया जाता है कि उनके इस तरह के प्रसारण से देश को किस तरह का नुकसान होने का अंदेशा है. विगत दो वर्षों से, जबसे कि केंद्र में भाजपा सरकार का आना हुआ है, मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाइयों द्वारा ऐसे कृत्य कुछ अधिक ही होने लगे हैं. ऐसा माहौल बनाया जाने लगा है कि जो हो रहा है वो बस अभी ही हुआ है, न इससे पहले कभी ऐसा हुआ है और न कभी इसके बाद होगा. यदि इसके बाद होने की आशंका है और ये भाजपा के कार्यकाल में हुआ तो और भी भयानक होगा, इस तरह के प्रसारण से देशहित को ही नुकसान हुआ है.

विगत की आपत्तिजनक बातों को पुनः दोहराने का कोई लाभ नहीं. इसके उलट यदि वर्तमान की कुछ घटनाओं का संज्ञान लिया जाये तो भी स्थिति वहीं की वहीं दिख रही है. एक अभिनेत्री का बयान आया कि पाकिस्तान में सबकुछ नरक नहीं है और बस बवेला शुरू. पक्ष-विपक्ष अपने-पाने हथियार लेकर मैदान में उतर आये. बिना ये जाने-सोचे समझे कि उसने वाकई क्या कहा, क्या कहना चाहा. इसी तरह संघ प्रमुख का बयान आया कि किस कानून ने हिन्दुओं को अधिक बच्चे पैदा करने से रोका है, बस हो-हल्ला आरम्भ. मीडिया ने, गैर-भाजपाई मानसिकता वालों ने इसे ऐसे प्रसारित किया कि संघ प्रमुख ने हिन्दुओं से अधिक बच्चे पैदा करने को कहा है. ये कोई एकमात्र अथवा नया उदाहरण नहीं है किसी भी बयान पर मीडिया का दोहरा रवैया अपना लेना. देखने में आ रहा है कि मीडिया परिवार इस समय मीडिया से ज्यादा राजनीति सी करने में लगे हैं. अपने आपको एक राजनैतिक दल की तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं. केंद्र की भाजपा सरकार के सामने विपक्ष की भांति खड़े हुए हैं. खड़े भी होना चाहिए, आखिर मीडिया ने, पत्रकारिता ने स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ घोषित किया है. इसके बाद भी उसके द्वारा पूर्वाग्रह से ग्रसित पत्रकारिता देखने को मिल रही है. अभी हाल ही में भाजपा के एक नेता जी के बयान पर हो-हल्ला हुआ. एक दलित महिला के अपमान की बात उठी, उन पर आरोप तय किये गए, जेल भेजा गया, जमानत हुई और इन सबमें मीडिया ने बड़ी तन्मयतापूर्ण भूमिका का निर्वहन किया. अब जबकि मामला शांत है, उसी मीडिया ने जरा भी नहीं सोचा कि जिस बयान के द्वारा इतना हो-हल्ला मचा उसी बयान में बसपा की मुखिया पर टिकट बेचने का आरोप लगाया गया था. क्या मीडिया की जिम्मेवारी नहीं बनती थी कि वो इस आरोप के सम्बन्ध में भी तन्मयता दिखाती, तत्परता दिखाती?


देश भर में मीडिया द्वारा, गैर-भाजपाई दलों द्वारा इस तरह का माहौल बनाया जा रहा है कि भाजपा के द्वारा सिर्फ और सिर्फ गलत ही किया जा रहा है. हाल ही में अभिनेत्री के बयान को तवज्जो देने वाली मीडिया, संघ प्रमुख के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली मीडिया जेएनयू के बलात्कारी छात्र नेता वाले प्रकरण पर खामोश रही. किसी राजनैतिक दल की तरफ से कोई बयान नहीं आया. किसी मीडिया मंच ने इस पर आन्दोलन सा खड़ा नहीं किया. जबकि यही मीडिया, यही राजनैतिक दल कश्मीर के आतंकवादी के मारे जाने पर हुए उपद्रव को ऐसे तूल देने में लगे हैं जैसे देश में एकमात्र मुद्दा यही है. मीडिया को तथा राजनैतिक दलों को समझना होगा कि अनर्गल प्रसारण से वे भाजपा का नहीं देश का नुकसान कर रहे हैं. देशवासियों को खतरे में डाल रहे हैं. 

18 मार्च 2016

विवाद-पसंद परिदृश्य

वैश्विक परिदृश्य में जिस तरह से मल्टीनेशनल कंपनियों को बाज़ार की तलाश बराबर रहती है, ठीक उसी तरह से भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में गैर-भाजपाई दलों को और मीडिया को विवादों की तलाश रहती है. विवादों की चाह इस तीव्रता से होती है कि यदि कोई विवाद मिल भी नहीं रहा है तो ये लोग किसी न किसी घटना को भी मनमाफिक रंग में रँग कर विवाद को जन्म दे देते हैं. विवादों को जन्मने की इनकी कला इतनी प्रभावी है कि विगत लगभग दो वर्षों से देश को विवादों का ऐसा जंगल बना दिया है, जहाँ सिर्फ और सिर्फ काँटे ही काँटे हैं. इंसानी मौत से लेकर जानवर के घायल होने तक बिना किसी संवेदना के ऐसे लोगों का मंतव्य विवाद पैदा करना ही होता है. संभवतः ये इंसानी मानसिकता ही है कि वो बहुत जल्दी ही अपनी समकालीनता से तारतम्य बना लेता है और इसी कारण से वो पुरानी बातों को लगातार विस्मृत सा करता हुआ वर्तमान में जीता जाता है. यही कारण है कि जब भी कोई नया विवाद पैदा होता है तो पुराने विवाद की असलियत को जाने समझे बिना लोग मीडिया के, राजनेताओं के बहकावे में नए विवाद पर चिल्ला-चोट करने लग जाते हैं. बिना आगा-पीछा सोचे महज विवादों के लिए विवाद को जन्मना और फिर उसी के सहारे सरकार को कोसते रहना किसी भी रूप में सुखद संकेत नहीं है.
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पूर्व की शनि मंदिर में प्रवेश की घटना हो, अख़लाक़ की मौत का मामला हो, पुरस्कार वापसी का मसला हो, रोहित की आत्महत्या हो, जेएनयू का मसला हो सभी में कहीं न कहीं मीडिया का अतिरेक दिखाई दिया, गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों का पूर्वाग्रह दिखा. अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहने वाली मीडिया ने समूचे मामलों में एकतरफा रुख बनाये रखा तो गैर-भाजपाई दलों ने भी विपक्ष की भूमिका की बजाय विवाद-निर्माता की भूमिका निभाई. पूर्व के विवादों में सरकार की आलोचना करते हुए हमला तेज बना रहा किन्तु सरकार के विरोध में जनमानस को एकत्र करने का काम इनके द्वारा न हो पाने के कारण मीडिया और गैर-भाजपाई दलों द्वारा विवादों की खेती लगातार जारी है. इसका कारण ये भी रहा कि जिन-जिन विवादों को जन्म दिया गया, उनमें साजिश का पर्दाफाश होता रहा और कहीं न कहीं सरकार की छवि और सशक्त होकर सामने आती रही, साथ ही साजिश करने वालों के चेहरे से नकाब उतरता रहा. इन साजिशकर्ताओं का मुख्य निशाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी है, जो अपने मुख्यमंत्रित्वकाल से ही विवादों के साये में बने रहे हैं और लगातार निर्दोष होकर सामने आते रहे हैं. इस तरह की स्थितियों ने उनको सशक्तता ही प्रदान की है. अब जबकि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं तो उन्होंने अपने स्वरूप को, देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त किया है. विरोधियों द्वारा जिस तरह का वातावरण लोकसभा चुनाव के पहले बनाया गया था, नरेन्द्र मोदी जी की जिस छवि का निर्माण किया गया था, वैसा कुछ भी देखने को नहीं मिल रहा है. ऐसे में तमाम राजनैतिक दलों की तथा मीडिया की बेचैनी को समझा जा सकता है. इसी बेचैनी का परिणाम सामने आया ‘भारत माता की जय’ और घोड़े शक्तिमान के घायल होने वाले विवाद के रूप में.
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अब जबकि विवादों पर विवादों के कैक्टस खड़े करने के बाद भी सरकार के क़दमों को घायल नहीं कर पाए तो फिर नए विवाद को जन्म दिया गया. इस विवाद की भी भ्रूण हत्या सी हो गई, खुद इन्हीं के कदमों से. घोड़े शक्तिमान के मामले में जिस तरह से भाजपा विधायक को दोषी बनाया जा रहा था, वो मामला एक झटके में एक वीडियो के सामने आने से साफ़ हो गया. इसी तरह भारत माता की जय नहीं बोलूँगा के रूप में विवाद का नया रूप खड़ा करने की साजिश उसी समय मटियामेट हो गई जबकि देश के अनेकानेक भागों से मुसलमानों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाये. यहाँ सोचने वाली बात ये है कि आखिर अभी ऐसे मुद्दे को उठाने का औचित्य क्या था? किस संगठन ने, किस व्यक्ति ने भारत माता की जय अथवा किसी और नारे को लगाये जाने की बात कही थी? बिना किसी बात के, अकारण सरकार को घेरने के लिए लगाये जाये कँटीले विवाद खुद-ब-खुद समाप्त होते जा रहे हैं. इस तरह के क़दमों से समाज में मीडिया को लेकर, गैर-भाजपाई दलों के बारे में नकारात्मक माहौल तो बन ही रहा है, वैश्विक स्तर पर भी देश की छवि, देश के राजनैतिक स्वरूप पर नकारात्मक असर तो हो ही रहा है. बहरहाल, लगता तो ये है कि ये साजिशकर्ता, विवाद-पसंद लोग तो मानेंगे नहीं और लगे होंगे किसी नए विवाद को जन्म देने की प्रक्रिया में. 

08 जनवरी 2016

पठानकोट और मालदा के संकेत


नववर्ष आते ही देश में एकदम से भूचाल ला देगा, इसका कतई अंदाज़ा नहीं था. मात्र एक सप्ताह के भीतर ही देश में दो अलग-अलग घटनाओं के चलते हलचल मच गई. पठानकोट में आतंकी घुसपैठ और पश्चिम बंगाल के मालदा में साम्प्रदायिक हिंसा. पठानकोट की आतंकी घटना ने जहाँ एक तरफ हमारी सुरक्षा व्यवस्था को आईना दिखाया है वहीं पाकिस्तान के साथ शांति-वार्ता जैसी पहल की आशंका को भी चकनाचूर सा किया है. ऐसा इसलिए क्योंकि चंद रोज पहले ही देश के प्रधानमंत्री ने एकाएक पाकिस्तान की यात्रा करके सबको भौचक कर दिया था. उनकी इस औचक यात्रा के साये में उपजे कुछ हलके-फुल्के पलों और उसके बाद की गतिविधियों के चलते ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कुछ सकारात्मक कदम उठें. हालाँकि पाकिस्तान अपनी आदतों से बाज़ आने वाला नहीं था, ऐसा मानना था तथापि एक नई पहल हो इसकी गुंजाईश से इंकार भी नहीं किया जा सकता था. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान की उस औचक यात्रा के अपने निहितार्थ निकाले जा सकते हैं, जो पाकिस्तान की, वहाँ की सेना की आतंकवाद के सापेक्ष असलियत को ही उजागर करते हैं.
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देखने और सोचने की बात है कि मोदी जी जितनी देर पाकिस्तान में ठहरे, उतनी देर पाकिस्तान में कहीं से भी किसी आतंकी घटना की खबर नहीं आई, वहाँ कहीं भी कोई बम नहीं फूटा. इसके साथ-साथ भारत में कहीं से भी किसी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन ने अपनी कोई गतिविधि अंजाम नहीं दी. जबकि ये सर्वविदित है कि मोदी जी पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादियों की हिट-लिस्ट में सबसे ऊपर हैं. स्पष्ट है कि मोदी जी की सुरक्षा व्यवस्था चौकस रखने की मजबूरी और मोदी जी को मिलते अंतर्राष्ट्रीय समर्थन के चलते उनके पाकिस्तान में रहने के दौरान वहाँ के हुक्मरान, वहाँ की सेना, वहाँ के सत्ताधीश लोगों ने किसी न किसी तरह आतंकी कार्यवाहियों को नियंत्रित किये रखा. इस घटनाक्रम ने सम्पूर्ण विश्व में एक सन्देश भी प्रसारित किया था कि यदि पाकिस्तान की सेना, वहाँ के सत्ताधारी यदि चाह लें तो कोई भी आतंकी संगठन एक बम धमाका भी नहीं कर सकता है. ऐसे में यात्रा के तत्काल बाद ही पठानकोट पर आतंकी हमला सारी कहानी स्पष्ट करता है. ये कहीं न कहीं आतंकियों की वो खीझ है जो मोदी जी की यात्रा के बाद उपजी है, एक तरह की हताशा है जो कहीं न कहीं पाकिस्तान के कुछ उदार कदमों के उठाये जाने की सम्भावना से उपजी होगी.
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इस बाहरी हमले के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में मालदा में हुए हिंसात्मक प्रदर्शन ने भी हमें डराया है. पूरे दिन लाखों मुस्लिम उन्मादी सडकों पर उत्पात मचाते रहे, निजी, सार्वजनिक संपत्ति को लूटते, मिटाते, जलाते रहे, पुलिसवालों को, मासूम नागरिकों को मारते रहे किन्तु उनको नियंत्रित करने कोई आगे नहीं आया. मजहबी उन्माद का इससे भयंकर उदाहरण और क्या होगा जबकि लगभग ढाई लाख मुस्लिमों ने बेख़ौफ़ उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया. ये समझने वाली बात है कि कल को देश में यदि कोई बड़ा आतंकी हमला हो जाये और उसी समय देश में कई-कई जगहों पर मालदा जैसी स्थितियाँ पैदा हो जाएँ तो सुरक्षा, शांति व्यवस्था को संभालना किसी भी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन जाएगी. इससे भी भयावह स्थिति ये रही कि उत्तर प्रदेश के दादरी में अख़लाक़ के साथ हुई घटना को मीडिया ने जिस तरह से वैश्विक स्तर पर उभार दिया था; देश के कथित धर्मनिरपेक्ष लोगों ने पुरस्कार/सम्मान वापसी का घृणास्पद कार्य करना शुरू कर दिया था; गैर-भाजपाई राजनैतिक दलों ने जिस तरह से वैमनष्यतापूर्ण बयानबाज़ी की थी वे सब मालदा की हिंसा पर शांति धारण किये रहे. तुष्टिकरण की नीति राजनीति से निकल कर अब समाज में, मीडिया में जिस तरह से फ़ैल रही है वो भविष्य के लिए घातक संकेत है.
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फ़िलहाल तो पठानकोट का आतंकी हमला कई सवाल छोड़ गया; मालदा की साम्प्रदायिक हिंसा ने भी कई सवाल छोड़े हैं किन्तु अब इनको अनदेखा किया जाना राष्ट्रहित में नहीं होगा. सरकार के लिए जितना आवश्यक बाहरी आतंकी ताकतों से लड़ना है उससे कहीं अधिक आवश्यक आंतरिक ताकतों से निपटना भी है. ये आंतरिक आतंकी ताकतें अलग-अलग, नामालूम से स्वरूप में हमारे तंत्र के साथ मिली-जुली हैं और यही कारण है कि इनके द्वारा कभी पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाये जाते हैं कभी पाकिस्तान के, कभी आईएसआईएस के झंडे फहराए जाते हैं, कभी भारत मुर्दाबाद का शोर उठाया जाता है, कभी तिरंगा जलाया जाता है. ऐसे में स्पष्ट रूप से संकेत स्वतः मिलता है कि अब शांति और ज्यादा देर तक नहीं, अब धैर्य बहुत समय तक नहीं. पठानकोट में शहीद सैनिकों को, मालदा के हिंसात्मक प्रदर्शन में मारे गए मासूम नागरिकों को विनम्र श्रद्धांजलि के साथ यही कामना कि सबकुछ जल्द सही हो.

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