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13 जून 2025

ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट

मृत्यु अटल सत्य है, जो सम्बंधित व्यक्ति के परिजनों को दुःख-आँसू ही देती है लेकिन अहमदाबाद में 12 जून 2025 को हुई हवाई जहाज दुर्घटना दुखद तो है ही, झकझोरने वाली भी है. इस दुर्घटना से सम्बंधित चित्र, वीडियो, दिवंगत हो गए लोगों के परिजनों के आँसू देखकर मन विचलित है. इनको देखकर जीवन-मृत्यु को संचालित करने वाली शक्ति से इतनी ही प्रार्थना है कि इस दुर्घटना जैसी मृत्यु किसी के जीवन में न लिखे. कारण यह नहीं कि यह दुर्घटना भयावह थी बल्कि इसलिए क्योंकि इस दुर्घटना में हमेशा को चले जाने वाला व्यक्ति वास्तविक में हमेशा को ही चला गया.

 

किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होने पर वह व्यक्ति सदा-सदा को चला जाता है, उसे फिर कभी वापस नहीं आना होता है. इस दुर्घटना में भी मृतकों को कभी वापस नहीं आना है मगर उनके परिजनों के हिस्से में भी न भुलाया जाने वाला दर्द सदा-सदा को आ गया है. उस पल की कल्पना करके ही आँखें नम हो जा रहीं जबकि हँसकर परिवार वालों ने अपनों को विदा किया होगा. एक पल को भी किसी को आभास भी नहीं हुआ होगा कि वे उनको अंतिम विदाई दे रहे हैं. हँसते-मुस्कुराते विदा करते लोगों से फिर मिल पाना सम्भव न होगा, उनको कुछ पलों बाद पहचान पाना भी सम्भव न होगा.

 



सामान्य मृत्यु की स्थिति में परिजन साथ होते हैं. आँखों में दुःख होने के साथ-साथ एक संतोष का भाव होता है. अंतिम संस्कार को पावन कृत्य के रूप में स्वीकार्य मानने के पीछे संभवतः यही कारण रहा होगा कि परिजन अपने जाने वाले सम्बंधित व्यक्ति को संतोषी भाव से मुक्त करें, उसे अनंत यात्रा के लिए प्रस्थान करने दें. इस हवाई जहाज दुर्घटना में किसी को भी एक पल के लिए झूठे भी ख्याल नहीं आया होगा कि ये उसकी अंतिम यात्रा है. किसी के परिवार वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि वे अपने प्रिय को अंतिम यात्रा के लिए हँसते हुए विदा कर रहे हैं. आँखों में कितने सपने होंगे. दिल में कितनी खुशियाँ होंगी. भविष्य के लिए बहुत सारी आशाएँ सजा रखी होंगी. सबकुछ एक झटके में स्वाहा हो गया.

 

परिवार वाले दूर जाते परिजन का हाथ थाम कर उससे कुछ कह न सके. हमेशा के लिए सबसे दूर जाता व्यक्ति आँखों में संतोष लेकर नहीं जा सका. पता नहीं उस चले गए व्यक्ति की अपने ही किसी परिजन से लम्बे समय से मुलाकात न हुई होगी. न जाने कितने परिजनों, मित्रों, सहयोगियों से अगली यात्रा में आकर मिलने का वादा किया होगा. न जाने कितने परिजनों ने अगली बार अपने घर आने का न्यौता दिया होगा. न जाने क्या-क्या, बहुत कुछ आपस में तय किया गया होगा, निर्धारित किया गया होगा मगर नियति को कुछ और ही निर्धारित करना था. उसने सब एक झटके में निर्धारित करके सबकी आँखों के सपने छीन लिए, परिवार की खुशियाँ मिटा दीं, भविष्य की आशाओं पर पानी फेर दिया.

 

जाने वाला तो चला ही गया, शेष रह गया परिजनों के हिस्से में आया दुःख, आँसू, खाली हाथ, अफ़सोस और ज़िन्दगी भर के लिए असहनीय कष्ट.




22 अप्रैल 2024

भुलाए न भूले जो तारीख

समय गुजरता रहता है. दिन, महीने, साल भी गुजरते जाते हैं. इनके साथ-साथ तारीखें भी गुजरती जाती हैं मगर कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो गुजरने के बाद भी अपनी जगह पर रुकी रहती हैं. ऐसा नहीं कि ये तारीखें दिन, महीने, साल के साथ आगे नहीं बढ़तीं, ये भी आगे बढ़ती हैं मगर इन तारीखों में मिले निशान ज्यों के त्यों बने रहते हैं, जिसके कारण ऐसा लगता है कि ये तारीख ज्यों की त्यों अपनी जगह पर रुकी हुई है. लगभग सभी के जीवन में ऐसी कोई न कोई तारीख होती होगी, काश! ऐसी कोई तारीख किसी के जीवन में न आये जो हर पल, हर क्षण अपने होने का दुखद एहसास करवाती रहे. तमाम सारी दुखद तारीखों के बीच एक ऐसी ही दुखद तारीख हमारे लिए 22 अप्रैल है. ये एक ऐसी तारीख है जिसे चाह कर भी न तो हम भुला पा रहे हैं और निश्चित रूप से ताउम्र हमारे अभिन्न में इस तारीख को भुला सकेगा.

 



इस तारीख में जो होना था वो तो हो ही गया मगर इसे न भूल पाने का कारण इस तारीख को मिले वे निशान, वे ज़ख्म हैं जो हर पल साथ हैं, सोते-जागते अपना एहसास कराते हैं. एक दुर्घटना के बाद जो ज़ख्म, जो निशान, जो दर्द मिला उसके बाद बहुत से अपनों-परायों ने सांत्वना देने के लिए, हिम्मत बढ़ाने के लिए कहा कि समय के साथ इसे भूलने की कोशिश करो. अपने आपको काम में व्यस्त करके इस दुर्घटना के ज़ख्म को, निशान को भूलने का प्रयास करो. चूँकि अपने विश्वास, अपनी शक्ति पर विश्वास अखंड है तो सोचा कि एक बार ऐसी कोशिश करने में क्या समस्या है. आखिर जब खुद को मौत के मुँह के सामने खड़ा पाकर भी वापस लाने में किसी तरह की समस्या हमने खुद में महसूस नहीं की तो उस दुर्घटना के ज़ख्म को, दर्द को भुलाने में क्या समस्या? यही सोचकर पिछले कुछ सालों में लगातार प्रयास किया कि इस दर्द को भुला सकें मगर लाख चाहने के बाद भी इसे भुलाना संभव न हुआ.

 

यदि किसी एक दिन के आरम्भ को सुबह से जोड़कर देखें तो आखिर इस ज़ख्म को कैसे भुला दें जबकि नींद खुलने के बाद अपने दोनों पैरों को सामान्य स्थिति में लाने के लिए बीस-पच्चीस मिनट तक उनकी मालिश करनी होती है? कैसे भुला दें अपनी शारीरिक अक्षमता को जबकि स्वयं को खड़ा करने के लिए एक कृत्रिम पैर की आवश्यकता पड़ती है? कृत्रिम पैर के सहारे दोनों पैरों के दर्द को खुद में पीते हुए दैनिक कर्म संपन्न किये जाते हैं, इसे कैसे भूला जा सकता है? घर से बाहर जाने के लिए तैयार होने के पहले दाहिने पैर के क्षतिग्रस्त पंजे पर पट्टी के बाँधने का अनिवार्य कृत्य करना कैसे भुला देगा कि बिना इस पट्टी के चलना संभव नहीं? रात को सोने की कोशिश में बार-बार पंजे को इधर-उधर टकराने से बचाने का काम करते हुए नींद भी लेना, ऐसी कोशिश में कैसे भूल जाएँ 22 अप्रैल को? 2005 में हुई दुर्घटना के बाद से आज इस पोस्ट के लिखे जाने तक एक पल, एक क्षण ऐसा नहीं गुजरा जबकि दाहिने पंजे में, पैर में दर्द न हुआ हो तब कैसे भूल जाएँ इस दर्द को? अपने काम के दौरान, तमाम सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, अकादमिक गतिविधियों के दौरान बाँए कृत्रिम पैर द्वारा दिए जा रहे कष्ट को सहते हुए कैसे भूल जाएँ कि हमारा एक पैर नहीं है?

 



कई बार लगता है कि बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे में कहना बहुत आसान होता है मगर उस कहे को व्यावहारिक रूप देना बहुत कठिन होता है, लगभग असंभव होता है. ऐसा ही कुछ असंभव सा अब हमारे साथ जुड़ा हुआ है. ऐसा ही आजीवन साथ  रहने वाले दर्द हमारे साथ है. हमारे शरीर का अंग न होने के बाद भी शरीर का अंग बने कृत्रिम पैर के साथ पूरे जीवन भागदौड़ करनी है. किसी समय मैदान पर दस हजार मीटर की दौड़ लगाने वाले एथलीट का एक कदम अब बिना छड़ी के नहीं उठता है. ऐसी तमाम स्थितियों को, दिक्कतों कि साथ लेकर एक-एक पल गुजारते समय कैसे भुलाया जा सकता है इस तारीख को? बस आज इस तारीख को याद करते हुए शाम गुजर गई, रात गुजरने वाली है. दर्द जो हमेशा साथ रहना है, उसके लिए क्या रोना? जो ज़ख्म ज़िन्दगी भर के लिए यारी निभाने आया है उसे कैसे भुलाया जाये? ये भी उन्हीं मित्रों, रिश्तेदारों की तरह हैं जिनको छोड़ा भी नहीं जा सकता और जिनसे पीछा छुड़ाया भी नहीं जा सकता. 


 

22 सितंबर 2022

हम खुद पैदा करते हैं दुःख, कष्ट

प्रसन्न रहना भी दूसरे लोगों के लिए परेशानी का कारण बनता है. उनको इसी बात पर समस्या हो जाती है कि अगला व्यक्ति खुश कैसे है? किस तरह हँस लेता है? ऐसा नहीं होता कि जो व्यक्ति खुश दिख रहा है, हँस रहा है उसके पास समस्याएँ नहीं अथवा वह किसी बात पर दुखी नहीं. हँसते-मुस्कुराते व्यक्ति के पास भी उसी तरह की समस्याएँ हो सकती हैं जैसी कि अन्य व्यक्ति के पास हो सकती हैं. समस्याओं का होना और समस्याओं के होने के बाद भी हँसते-मुस्कुराते हुए कार्य को करते रहना दो अलग-अलग बातें हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे पास कष्ट नहीं हैं, हमारे पास समस्याएँ नहीं हैं मगर बचपन से एक आदत रही है, किसी भी परेशानी में अपना धैर्य न खोने की, अपना विश्वास न खोने की. इसी के चलते बड़ी सहजता से किसी भी तरह की परेशानी, किसी भी तरह के कष्ट से बाहर निकलने का रास्ता निकल आता है.


लोग अक्सर कुछ निश्चित से सवाल हमसे पूछते रहते हैं. उन सवालों में हमें कभी टेंशन में न देखने की बात होती है. उनके सवालों में हमेशा हमारे चेहरे पर हँसी के भाव बने रहने का कारण होता है. उनके प्रश्न हमारी समस्याओं, कष्टों आदि से सम्बंधित होते हैं. यदि हम ये कहें कि हमें किसी तरह का कष्ट नहीं या फिर हम दुखी नहीं होते तो यह नितांत झूठ होगा. हम भी एक साधारण से इन्सान हैं, हमारी भी भावनाएँ हैं, हमारी भी इच्छाएँ हैं और उन्हीं के चलते हमें भी किसी आम आदमी की तरह कष्ट होता है, हम भी दुखी होते हैं. जैसी कि आदत रही है, उसके अनुसार अपने कष्टों, अपने दुखों, अपनी समस्याओं को अपने तक सीमित रखते हुए उनको दूर करने का प्रयास करते हैं.




यहाँ दुखों, कष्टों, समस्याओं को दूर करने, उनसे मुकाबला करने की बात से पहले यह समझना आवश्यक है कि हम सबके दुःख का, कष्ट का कारण क्या रहता है? बहुत से कष्ट और समस्याएँ ऐसे होते हैं जो हम स्वतः बना लेते हैं या कहें कि खुद ही उनको जन्म देते हैं. इसके पीछे दूसरे लोगों से हमारी अपनी अपेक्षा का बना होना होता है. हम सभी किसी न किसी रूप में दूसरों से अपेक्षाएँ पाले होते हैं. चूँकि सभी व्यक्तियों की अपनी-अपनी सीमायें हैं, अपने-अपने अधिकार हैं, ऐसे में अक्सर अपेक्षाओं का पूरा न हो पाना हम सबके लिए कष्ट का विषय बनता है. इसी तरह बहुत बार हम आने वाले समय में होने वाली किसी भी घटना की कल्पना करके भी परेशान होते हैं. अभी जो घटना हुई नहीं होती है, उसके बारे में काल्पनिक बातें सोचते-सोचते खुद को कष्ट में डाल देते हैं. कई बार किसी भी समस्या के सामने आ जाने के बाद लोग धैर्य खो देते हैं, ऐसे में वे उस स्थिति को और भी अधिक परेशानी भरा बना देते हैं. इसके चलते भी व्यक्ति अक्सर दुःख का, कष्ट का शिकार हो जाता है. ऐसी घटनाओं के अलावा बहुत सी घटनाएँ ऐसी होती हैं जो आकस्मिक रूप से होती हैं. अक्सर हम सभी ऐसी घटनाओं-दुर्घटनाओं के लिए किसी देवीय शक्ति को जिम्मेवार मान लेते हैं. कई बार कुछ घटनाओं के लिए प्राकृतिक आपदा भी जिम्मेवार होती है. ऐसी घटनाओं से उत्पन्न दुःख और कष्ट आदि को भी मनुष्य सहता है.


किसी भी तरह की समस्या, दुःख, कष्ट आदि के सम्बन्ध में एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जो बात हम सबके हाथ में है, उसके लिए किसी भी तरह से परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि वह हमारे हाथ में है, उसका करना हमारे हाथ में है. इसके उलट ऐसी कोई बात जिसका किया जाना हमारे हाथ में नहीं है तो उसके बारे में सोचा-विचारी नहीं करनी चाहिए, उसके बारे में परेशान नहीं होना चाहिए क्योंकि उसका नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं है. लगभग सभी लोगों की आदत होती है कि लोग ऐसी बातों के लिए भी परेशान होते हैं जो उनके हाथ में होते हैं और कुछ लोग उन बातों को अपने लिए समस्या बनाये रखते हैं, जो उनके नियंत्रण में नहीं होते हैं.


इन सबके अलावा एक बात विशेष रूप से याद रखनी चाहिए कि हम सभी को अपेक्षाओं के दायरे से बाहर रहना चाहिए. कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने दोस्त, अपने रिश्तेदार, अपने सहकर्मी अथवा अन्य किसी भी परिचित से बहुत ज्यादा अपेक्षाएँ न करें. उनके ऊपर अपनी विचारधारा को, अपने निर्णयों को थोपने का प्रयास भी न करें. सभी की अपनी जीवन-शैली है, सभी के अपने विचार हैं. ऐसे में उन पर अपने विचारों का थोपा जाना अथवा उसका प्रयास करना भी आपस में मनमुटाव का, आपसी तनाव का कारण बनता है. इससे भी व्यक्ति कष्टों, दुखों का सामना करता है. यह ध्यान रखते हुए कि सभी का जीवन, सभी की जीवन-शैली उसकी अपनी व्यक्तिगत है. उसकी रुचियाँ, उसकी कार्यप्रणाली, उसका स्वभाव उसका अपना है. जिस तरह हम स्वयं को किसी दूसरे के लिए नहीं बदल सकते, ऐसे ही हमें भी किसी दूसरे को अपनी तरह से बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए.


धैर्य, विश्वास, संयम के साथ हँसते-मुस्कुराते हुए जीवन में आगे बढ़ा जायेगा तो किसी भी तरह की समस्या, दुःख, कष्ट, परेशानी भले पास आ जाये मगर हताश, निराश नहीं कर सकेगी.